হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6861)


6861 - عن معاوية قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد في الرابعة فاقتلوه".

حسن: رواه أبو داود (4482) والترمذي (1444) وابن ماجه (2573) وأحمد (16859) وصحّحه ابن حبان (4446) والحاكم (4/ 372) والبيهقي (8/ 313) كلهم من حديث عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن معاوية فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن بهدلة فإنه حسن الحديث.

وأخرجه أحمد (16847) والنسائي (5298) كلاهما من وجه آخر من حديث المغيرة بن مقسم الضبي، عن معبد القاص، عن عبد الرحمن بن عبد، عن معاوية مثله. وهذا إسناد صحيح. ومعبد القاص: هو معبد بن خالد الجدلي وعبد الرحمن بن عبد هو أبو عبد الله الجدلي.




মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর যদি সে চতুর্থবার তা করে, তবে তাকে হত্যা করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (6862)


6862 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سكر فاجلدوه، ثم إن سكر فاجلدوه، ثم إن سكر فاجلدوه، فإن عاد الرابعة فاقتلوه".

حسن: رواه أبو داود (4484) والنسائي (5662) وابن ماجه (2572) وأحمد (7911) وصحّحه ابن حبان (4447) والحاكم (4/ 371) والبيهقي (8/ 313) كلهم من حديث ابن أبي ذئب، عن الحارث بن عبد الرحمن، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل الحارث بن عبد الرحمن القرشي العامري خال ابن أبي ذئب، فإنه حسن الحديث.

وزاد أحمد: قال الزهري: فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم برجل سكران في الرابعة فخلّى سبيله.

ورواه الحاكم (4/ 371) من وجه آخر عن سعيد بن أبي عروبة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر مثله. وقال:"صحيح على شرط مسلم".

ورواه عبد الرزاق (17081) عن معمر، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة
مثله. ومن طريقه النسائي في الكبرى (5296).

قال معمر:"فذكرت ذلك لابن المنكدر فقال: قد ترك القتل. قد أتي النبي صلى الله عليه وسلم بابن النعيمان فجلده، ثم أتي به فجلده، ثم أتي به فجلده، ثم أتي به الرابعة فجلده، أو أكثر".

قال الترمذي:"حديث معاوية هكذا روى الثوري أيضا، عن عاصم، عن أبي صالح، عن معاوية، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وروى ابن جريج ومعمر، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وقال: سمعت محمدًا يقول:"حديث أبي صالح عن معاوية عن النبي صلى الله عليه وسلم في هذا أصح من حديث أبي صالح، عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم" انتهى. وكذا رجح الدارقطني حديث أبي صالح عن معاوية."العلل" (10/ 91).

قلت: هذا قول الإمامين العظيمين، ولكن حسب القواعد الحديثية لا أرى ما يمنع من أن يكون لأبي صالح شيخان من الصحابة وهما معاوية وأبو هريرة والله تعالى أعلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সে নেশাগ্রস্ত হবে, তখন তাকে বেত্রাঘাত করো, অতঃপর যদি সে আবার নেশাগ্রস্ত হয়, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো, অতঃপর যদি সে আবার নেশাগ্রস্ত হয়, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো, অতঃপর সে যদি চতুর্থবারও ফিরে আসে (নেশাগ্রস্ত হয়), তবে তাকে হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6863)


6863 - عن شرحبيل بن أوس وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: من شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاقتلوه".

حسن: رواه الإمام أحمد (18053) والطبراني في الكبير (1/ 198) و (7/ 366) والحاكم (4/ 373) كلهم من حديث حريز بن عثمان الجمحي، قال: حدثني نمران بن مخْمر، عن شرحبيل بن أوس فذكره. قال الحافظ ابن حجر:"رواته ثقات".

قلت: وإسناده حسن من أجل نمران بن مخمر أبي الحسن الرحبي وهو من رجال"التعجيل" قال فيه: روى عنه حريز بن عثمان وبهذا ذكره البخاري. ولم يذكر فيه جرحا فقال: سمع أوسا.

قال الحافظ ابن حجر: قال أبو داود: شيوخ حريز كلهم ثقات. وذكره ابن حبان في"الثقات". وذكر ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (8/ 497) أن من شيوخه حريز بن عثمان، ومحمد بن الوليد الزبيدي، وحريث بن عمرو الحضرمي.

ثم روي هذا الحديث من وجه آخر. رواه أحمد (13023) والحاكم من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي بشر، قال: سمعت يزيد بن أبي كبشة يخطب بالشام قال: سمعت رجلًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يحدث عبد الملك بن مروان في الخمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر مثله.

قال الحاكم:"سمعت أبا علي الحافظ يحدث بهذا الحديث فقال في آخره: هذا الصحابي من أهل الشام هو شرحبيل بن أوس".




শুরাহবিল ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে পুনরায় তা করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে পুনরায় তা করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে (চতুর্থবারও) তা করে, তবে তাকে হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6864)


6864 - عن ابن عمر، ونفر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قالوا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شرب الخمر فاجلدوه، ثم إن شرب فاجلدوه، ثم إن شرب فاجلدوه، ثم إن شرب فاجلدوه، ثم إن شرب فاقتلوه".
حسن: رواه النسائي (5661) عن إسحاق بن إبراهيم، (ابن راهويه) قال: أنبأنا جرير، عن مغيرة الضبي، عن عبد الرحمن بن أبي نُعم، عن ابن عمر فذكره.

وصحّحه الحاكم (4/ 371) ورواه من طريق جرير بإسناده عن ابن عمر وحده وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وعبد الرحمن بن أبي نُعم البجلي من رجال الصحيح، وهو كوفي تابعي مشهور، وكان من أولياء الثقات كما قال الذهبي في الميزان (2/ 595) وقال: وقال أحمد بن أبي خيثمة: عن ابن معين: قال: ابن أبي نُعم ضعيف. كذا نقل ابن القطان. وهذا لم يتابعه عليه أحد". انتهى.

فهو لا ينزل عن درجة"صدوق".

وقد أشار أبو داود إلى حديث ابن عمر مع غيره بأن القتل كان في الرابعة، بدون شك.

وأما ما رواه هو (4483) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة، عن حميد بن يزيد، عن نافع، عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال بهذا المعنى (يعني حديث معاوية بن أبي سفيان) قال: وأحسبه في الخامسة قال:"إن شربها فاقتلوه" فهو ضعيف.

فإن حُميد بن يزيد وهو أبي الخطاب لم يرو عنه غير حماد بن سلمة فهو"مجهول الحال" كما في"التقريب" ومن طريقه رواه الإمام أحمد (6197).

قال ابن حجر:"قرأت بخط الذهبي يقول: لا يدري من هو؟".

وقال ابن القطان:"مجهول الحال".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একদল সাহাবী থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করবে, তোমরা তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি সে আবার পান করে, তবে তোমরা তাকে হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6865)


6865 - عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد الرابعة فاقتلوه، فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم برجل منا فلم يقتله.

حسن: رواه ابن حزم في المحلي (11/ 368) والطحاوي في شرحه (4836) والنسائي في الكبرى (5302) كلهم من طريق شريك، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله فذكره.

واللفظ لابن حزم. ولفظ الطحاوي:"فثبت الجلد ودُرِئَ القتل".

وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ ولكنه توبع.

روي ابن حزم أيضا من طريق النسائي (5303) أخبرنا محمد بن موسى، حدثنا زياد بن عبد الله البكائي، حدثني محمد بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شرب الخمر فاضربوه، فإن عاد فاضربوه، فإن عاد فاضربوه، فإن عاد الرابعة فاضربوا عنقه" فضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم نعيمان أربع مرات. فرأى المسلمون أن الحد قد وقع، وأن القتل قد رُفع.
فتابعه زياد بن عبد الله البكائي ومن طريقه رواه أيضا الحاكم (4/ 373) والبيهقي (8/ 314).

ورواية جابر هذه ذكرها أيضا الزيلعي في نصب الراية (3/ 347) عن محمد بن إسحاق بإسناده، وعزاه إلى النسائي في"الكبرى" ثم قال:"ورواه البزار في مسنده عن ابن إسحاق به أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي بنعيمان قد شرب الخمر ثلاثا فأمر بضربه، فلما كان الرابعة أمر به فجلد الحد، فكان ناسخًا" انتهى.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন কেউ মদ পান করে, তখন তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার করে, তাহলে তাকে বেত্রাঘাত করো। যদি সে আবার করে, তাহলে তাকে বেত্রাঘাত করো। আর যদি সে চতুর্থবার করে, তবে তাকে হত্যা করো।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তিকে আনা হলো, কিন্তু তিনি তাকে হত্যা করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (6866)


6866 - عن ديلم الحميري أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إنا بأرض باردة، وإنا لنستعين بشراب يُصنع لنا من القمح. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيسكر؟" قال: نعم. قال:"فلا تشربوه" فأعاد عليه فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيسكر؟ قال: نعم، قال:"فلا تشربوه" فأعاد عليه الثالثة. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيسكر؟" قال: نعم، قال: فلا تشربوه" قال: فإنهم لا يصبرون عنه. قال: فإن لم يصبروا عنه فاقتلهم".

صحيح: رواه أحمد (18034) والطبراني في الكبير (4/ 269) كلاهما من حديث عبد الحميد بن جعفر، حدثنا يزيد بن أبي حبيب، حدثنا مرثد بن عبد الله اليزني، قال: حدثنا الديلم فذكره وإسناده صحيح.

والديلم هو ابن هوشع الحميري اليمني وفد على النبي صلى الله عليه وسلم من اليمن.

ورواه أيضا أحمد (18035) عن محمد بن عبيد، حدثنا محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله، عن ديلم الحميري قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إنا بأرض باردة، نعالج بها عملًا شديدًا. وإنا نتخذ شرابًا من هذا القمح نتقوى بها على أعمالنا، وعلى برد بلادنا، قال:"هل يسكر؟ قلت: نعم. قال:"فاجتنبوه" قال: ثم جئت من بين يديه. فقلت له مثل ذلك. فقال: هل يُسكر؟ قلت: نعم. قال:"فاجتنبوه" قلت": إن الناس غير تاركيه. قال:"فإن لم يتركوه فاقتلوهم".

ورواه البيهقي (8/ 292) من طريق شيخ أحمد وقال في آخره:"وكذلك رواه عبد الحميد بن جعفر، عن يزيد بن أبي حبيب".

ورواه أبو داود (3683) من طريق محمد بن إسحاق إلا أنه ذكر فيه القتل المرة الثانية. ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.




দিয়লাম আল-হিমইয়ারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: আমরা এক শীতল অঞ্চলে বাস করি, আর আমরা এমন পানীয়ের সাহায্য গ্রহণ করি, যা আমাদের জন্য গম থেকে তৈরি করা হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা কি নেশা সৃষ্টি করে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা তা পান করো না।" অতঃপর তিনি (দিয়লাম) বিষয়টি তাঁর কাছে পুনরায় বললেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তা কি নেশা সৃষ্টি করে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা তা পান করো না।" অতঃপর তিনি তৃতীয়বার বিষয়টি পুনরাবৃত্তি করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তা কি নেশা সৃষ্টি করে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা তা পান করো না।" তিনি (দিয়লাম) বললেন: লোকেরা তো তা ছাড়া ধৈর্য ধারণ করতে পারে না (অর্থাৎ তা পান করা ছাড়তে পারে না)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তারা তা ছাড়া ধৈর্য ধারণ না করে (অর্থাৎ তা পান করা না ছাড়ে), তবে তোমরা তাদের হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6867)


6867 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الخمر إذا شربوها فاجلدوهم، ثم إذا شربوها فاجلدوهم، ثم إذا شربوها فاجلدوهم، ثم إذا شربوها فاقتلوهم عند الرابعة".

حسن: رواه الإمام أحمد (6553) عن معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة وعبد الصمد
قال: حدثنا همام، حدثنا قتادة، عن شهر بن حوشب، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وصحّحه الحاكم (4/ 372) رواه من طريق قتادة. وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب غير أنه حسن الحديث إذا لم يُخالف. وقد كان ابن المديني والبخاري وغيرهما حسن الرأي فيه.

وأما ما روي عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شرب الخمر فاجلدوه، فذكر الحديث مثله. ثم قال: ائتوني برجل قد شرب الخمر في الرابعة، فلكم عليَّ أن أقتله. فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (6791) عن وكيع، حدثني قرة وروح، حدثنا أشعث وقرة بن خالد المعنى، عن الحسن، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.

والحسن البصري مدلس وقد عنعن ثم أنه لم يسمع هذا الحديث من عبد الله بن عمرو كما صرح به (6974) فقال: والله لقد زعموا أن عبد الله بن عمرو شهد بها على رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

قال: فكان عبد الله بن عمرو يقول: ائتوني برجل قد جلد في الخمر أربع مرات. فإن لكم علي أن أضرب عنقه.

فقول عبد الله بن عمرو لا ينقض الإجماع في نسخ القتل لأنه لم يصح عنه.

وفي الباب ما روي عن أبي سليمان مولى لأم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن أبا الرمداء حدثه أن رجلًا منهم شرب فأتوا به رسول الله صلى الله عليه وسلم فضربه، ثم شرب الثانية فضربه، ثم شرب الثالثة، فأتوا به إليه. فما أدري أفي الثالثة أو الرابعة أمر به فحمل على العجل، أو قال: على الفحل.

وفي رواية: أمر به فحمل على العجل. فضرب عنقه.

رواه ابن عبد الحكم في فتوح مصر (302) والدولابي في الكنى (1/ 30) والطحاوي في شرحه (4826) كلهم من طرق عن ابن لهيعة قال: حدثنا عبد الله بن هبيرة، عن أبي سليمان مولى أم سلمة فذكره.

وأبو سليمان مجهول. قال ابن القطان:"لا يعرف حاله" ثم إن في المتن نكارة. فإن الروايات الصحيحة أنه صلى الله عليه وسلم لم يقتل أحدًا في الرابعة بل خلّى سبيله.

وأعله ابن حجر في"الفتح" (12/ 79) بابن لهيعة، مع أن في بعض طرقه الراوي عنه عبد الله بن وهب وعبد الله بن يزيد المقرئ وروايتهما عنه قبل الاختلاط

وقال:"أفاد هذا الحديث أنه صلى الله عليه وسلم عمل به قبل النسخ، فإن ثبت كان فيه رد على من زعم أنه لم يعمل به" ولكنه لم يثبت بإسناد صحيح.

وفي الباب ما رُوي أيضا عن الشّريد بن سويد الثقفي أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا شرب الرجل فاجلدوه، ثم إذا شرب فاجلدوه، ثم إذا شرب فاجلدوه" أربع مرات أو خمس مرات"ثم إذا شرب فاقتلوه".

رواه أحمد (19460) والطبراني (7/ 317) والدارمي (2395) والنسائي في الكبرى (5301)
كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني عبد الله بن عتبة بن عروة بن مسعود الثقفي، عن عمرو بن الشّريد، عن أبيه فذكره هكذا بالشك في الرابعة أو الخامسة. وفي بعض المصادر أنه جاء الأمر بالقتل في الرابعة بدون شك.

وفي الإسناد عبد الله بن عتبة بن عروة لم يعرف من هو؟ وبه أعله أيضا الهيثمي في"المجمع" (6/ 727 - 278).

وأما ما رواه الحاكم (4/ 372) عن أبي عبد الله الصفار، ثنا محمد بن مسلمة، ثنا يزيد بن هارون، أنبأ محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن عمرو بن الشريد بإسناده مثله. وقال: صحيح على شرط مسلم، وهذا وهم منه.

فإن محمد بن مسلمة ليس من رجال مسلم، كما أنه ليس بثقة ضعّفه الخلال وغيره.

وفي الباب ما روي أيضا: عن أبي سعيد الخدري قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"من شرب الخمر فاجلدوه، ومن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاقتلوه".

رواه ابن حبان (4445) عن أبي يعلى، قال: حدثنا عثمان بن أبي شيبة قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم بن أبي النجود، عن أبي صالح، عن أبي سعيد فذكره.

قال ابن حبان:"هذا الخبر سمعه أبو صالح من معاوية ومن أبي سعيد معًا".

ولكن قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (12/ 69) المحفوظ من حديث معاوية. كما قال البخاري، وكذلك من حديث أبي هريرة. فلعل الخطأ كان من عاصم بن أبي بهدلة.

وفي الباب ما روي أيضا عن جرير بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد في الرابعة فاقتلوه".

رواه البخاري في التاريخ الكبير في ترجمة"خالد بن جرير" والطحاوي في شرحه (2/ 91) والحاكم (4/ 371) كلهم من طريق مكي بن إبراهيم، ثنا داود بن يزيد، عن سماك بن حرب، عن خالد بن جرير، عن جرير فذكره.

وداود بن يزيد هو الأودي الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.

وفي الباب أيضا ما روي عن أبي موسى أنه قال: حين بعثه النبي صلى الله عليه وسلم إلى اليمن فقال: إن قومي يصيبون من شراب من الذرة - يقال له المزر. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أيسكر؟ قال: نعم. قال:"فانههم عنه" ثم رجع إليه فسأله عنه فقال:"انههم عنه" ثم سأله الثالثة. فقال: قد نهيتُهم عنه فلم ينتهوا. قال:"فمن لم ينته منهم فاقتله".

رواه أحمد في كتاب الأشربة (ص 32) عن عبد الرزاق، قال: أخبرنا محمد بن راشد، قال: سمعت عمرو بن شعيب يحدث أن أبا موسى قال: فذكره.

وفيه انقطاع، فإن عمرو بن شعيب لم يدرك أبا موسى فإني لم أجد من نص على أنه روى عنه.
وفي الباب ما روي أيضا عن أم حبيبة بنت أبي سفيان أن أناسًا من أهل اليمن قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأعلمهم الصلاة والسنن والفرائض، ثم قالوا: يا رسول الله، إن لنا شرابًا نصنعه من القمح والشعير. قال: فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم، قال:"لا تطعموه" ثم لما كان بعد ذلك بيومين ذكروهما له أيضا، فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم، قال: ولا تطعموه" ثم لما أراد أن ينطلقوا سألوه عنه، فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم. قال:"لا تطعموه" قالوا: فإنهم لا يدعونها، قال:"من لم يتركها فاضربوا عنقه".

رواه أحمد (27407) عن حسن قال: حدثنا ابن لهيعة، قال: حدثنا دراج، عن عمر بن الحكم أنه حدثه عن أم حبيبة بنت أبي سفيان فذكرته.

ورواه أيضا أبو يعلى (7147) والطبراني (23/ 483) وصحّحه ابن حبان (5367) والبيهقي (8/ 292) كلهم من طرق عن دراج بإسناده اختصره البعض.

وإسناده ضعيف من أجل درّاج بتشديد الراء ابن سمعان أبو السمح، مختلف فيه. فوثّقه ابن معين والدارمي. وقال أبو داود:"أحاديثه مستقيمة" وضعّفه النسائي وأبو حاتم والدارقطني. وقال أحمد:"حديثه منكر" وقال ابن عدي:"عامة الأحاديث التي أمليتُها عن دراج مما لا يتابع عليه".

وفي الإسناد ابن لهيعة أيضا وفيه كلام مشهور إلا أنه توبع، تابعه عمرو بن الحارث عند اليهقي وغيره.

وفي الباب ما روي أيضا عن قبيصة بن ذُؤيب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد فاجلدوه، فإن عاد في الثالثة أو الرابعة، فاقتلوه" فأتي برجل قد شرب الخمر فجلده، ثم أتي به فجلده، ثم أتي به فجلده، ثم أتي به فجلده، ورُفع القتل، وكانت رخصة.

قال سفيان وهو ابن عيينة:"حدث الزهري بهذا الحديث وعنده منصور بن المعتمر ومخْول بن راشد فقال لهما: كونا وافدي أهل العراق بهذا الحديث".

رواه أبو داود (4485) عن أحمد بن عبدة الضبي، حدثنا سفيان قال الزهري: أخبرنا عن قبيصة بن ذُؤيب فذكره.

ورواه الشافعي في الأم (6/ 177) عن سفيان بن عيينة ومن طريقه البغوي في شرح السنة (10/ 335) والبيهقي (8/ 314) ورواه البيهقي أيضا من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن قبيصة بن ذُويب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره مثله. وقال في آخره: فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم برجل من الأنصار يقال له نعيمان فضربه أربع مرات. فرأى المسلمون أن القتل قد أخر، وأن الضرب قد وجب.

وقبيصة بن ذُؤيب ولد عام الفتح على الأصح، وروايته عن أبي بكر وعمر مرسلة.

قال الشافعي:"والقتل منسوخ بهذا الحديث وغيره، وهذا مما لا اختلاف فيه بين أحد من أهل العلم علمه".
وقال الترمذي:"إنما كان هذا في أول الأمر، ثم نسخ بعد ذلك. ثم قال:"والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم، لا نعلم بينهم اختلافا في ذلك في القديم والحديث. ومما يُقوي هذا ما رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم من أوجه كثيرة أنه قال:"لا يحل دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلا الله، وأني رسول الله إلا بإحدى ثلاث: النفس بالنفس، والثيب بالثيب، والتارك لدينه".

قال النووي في شرح مسلم:"وهذا الذي قاله الترمذي في حديث شارب الخمر هو كما قاله. فهو حديث منسوخ. دل الإجماع على نسخه".

وقال الترمذي أيضا في أول كتاب" العلل" الذي ختم به السنن:"جميع ما في هذا الكتاب من الحديث فهو معمول به، وقد أخذ به بعض أهل العلم ما خلا حديثين، حديث ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم جمع بين الظهر والعصر بالمدينة والمغرب والعشاء من غير خوف ولا سفر ولا مطر. وحديث النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا شرب الخمر فاجلدوه، فإن عاد في الرابعة فاقتلوه".

وقد بينا علة الحديثين جميعا في الكتاب. انتهى.

قال الحافظ:"وتعقبه النووي فسلّم قوله في حديث الباب دون الآخر".

قال ابن المنذر:"وقد كان هذا من سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم أزيل القتل عن الشارب في المرة الرابعة بالأخبار الثابتة عن نبي الله صلى الله عليه وسلم، وبإجماع عوام أهل العلم من أهل الحجاز، وأهل العراق، وأهل الشام، وكل من نحفظ قوله من أهل العلم عليه، إلا من شذّ ممن لا يعد خلافًا"."الأوسط" (13/ 16)

وقال الخطابي في معالمه:"قد يرد الأمر بالوعيد، ولا يراد به وقوع الفعل، فأنما يقصد به الردع والتحذير كقوله صلى الله عليه وسلم: لمن قتل عبده قتلناه، ومن جدع عبده جدعناه" وهو لو قتل عبده لم يقتل به في قول عامة العلماء، وكذلك لو جدعه لم يُجدع به بالاتفاق. وقد يحتمل أن يكون القتل في الخامسة واجبًا، ثم نسخ لحصول الإجماع من الأمة على أنه لا يقتل. وقد رُوي عن قبيصة بن ذُؤيب ما يدل على ذلك".

وقال المنذري:"أجمع المسلمون على وجوب الحد في الخمر، وأجمعوا أنه لا يُقتل إذا تكرر منه إلا طائفة شاذة، قالت: يُقتل بعد حده أربع مرات للحديث، وهو عند الكافة منسوخ". وبالله التوفيق.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তারা মদ পান করবে, তখন তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা আবার পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা আবার পান করে, তবে তাদের বেত্রাঘাত করো। এরপর যদি তারা চতুর্থবার পান করে, তবে তাদের হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6868)


6868 - عن * *




৬৬৮৮. থেকে ** **









আল-জামি` আল-কামিল (6869)


6869 - عن أبي بردة الأنصاري قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تجلدوا فوق عشرة أسواط إلا في حد من حدود الله".

وفي لفظ:"لا يُجلد فوق عشرة جلدات إلا في حدّ من حدود الله".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6850) ومسلم في الحدود (1708) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو، أن بكير بن الأشجّ حدّثه قال: بينما أنا جالسٌ عند سليمان بن يسار إذ جاء عبد الرحمن بن جابر فحدث سليمان بن يار، ثم أقبل علينا سليمان بن يسار، فقال: حدّثني عبد الرحمن بن جابر أن أباه حدّثه، أنه سمع أبا بردة الأنصاري قال فذكره. واللفظ للبخاري. قال أبو داود:"أبو بردة اسمه هانئ".

قلت: وقيل: اسمه الحارث بن عمرو، وقيل غير ذلك وهو أبو بردة بن نِيار البلوي، حليف الأنصار صحابي.




আবু বুরদাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ্‌র নির্ধারিত কোনো হদ্দ (দণ্ড) এর ক্ষেত্রে ব্যতীত তোমরা দশটির বেশি বেত্রাঘাত করো না।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আল্লাহ্‌র নির্ধারিত কোনো হদ্দ (দণ্ড) এর ক্ষেত্রে ব্যতীত দশটির বেশি বেত্রাঘাত করা হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6870)


6870 - عن عبد الرحمن بن جابر، عمن سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا عقوبة فوق عشر ضربات إلا في حد من حدود الله".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6849) عن عمرو بن علي، حدثنا فضيل بن سليمان، حدثنا مسلم بن أبي مريم، حدثني عبد الرحمن بن جابر فذكره. هذا الحديث رُوي من ثلاثة أوجه:

الأول: إن عبد الرحمن بن جابر بن عبد الله رواه عن أبيه، عن أبي بردة الأنصاري، كما رواه مسلم في الحدود (1708/ 40).

والثاني: إن عبد الرحمن بن جابر سمع هذا الحديث من أبي بردة الأنصاري مباشرة.

والثالث: إن عبد الرحمن بن جابر يحدث بهذا الحديث عمن سمع النبي صلى الله عليه وسلم فأبهم اسم الصحابي.

ولا منافاة بين الوجه الثاني والثالث فإن عبد الرحمن بن جابر سمع هذا الحديث بدون واسطة أبيه إلا أنه مرة صرح باسم الصحابي وهو أبو بردة الأنصاري، وأخرى أبهمه.

والجمع بين الوجه الأول والوجهين الآخرين أنه سمع أولا من أبيه، عن أبي بردة، ثم تيسر له السماع من أبي بردة مباشرة. وهذا له أمثلة كثيرة في كتب الحديث.

فإذا أمكن الجمع فلا يلتفت إلى قول من قال: في إسناده اضطراب. لأن عبد الرحمن بن جابر بن عبد الله ثقة فإذا صرّح بالسماع يُقبل قوله. وإبهام الصحابي لا يضر كما هو معروف في هذا العلم.
وقد اتفق الشيخان على تصحيحه، وهما العمدة في التصحيح. إنما الخلاف في الترجيح فرجح الدارقطني رواية الليث، ورجح غيره رواية عمرو بن الحارث الذي ذكر الواسطة بين عبد الرحمن بن جابر وبين أبي بردة. وكله صحيح. وصحّحه أيضا الدارقطني بعد وقوفه على الاختلاف، وجنح إلى ما جنح إليه صاحبا الصحيح والحمد لله رب العالمين.

وله شاهد ضعيف وهو ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"لا تعزروا فوق عشرة أسواط" رواه ابن ماجه (2602) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، قال: حدثنا عبّاد بن كثير، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وعبّاد بن كثير هو الثقفي البصري ضعيف باتفاق أهل العلم حتى قال أحمد:"روى أحاديث كذب".




আব্দুল রহমান ইবনে জাবের থেকে বর্ণিত, যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আল্লাহ্‌র নির্ধারিত কোনো দণ্ড (হাদ) ব্যতীত অন্য কোনো ক্ষেত্রে দশটি বেত্রাঘাতের উপরে শাস্তি প্রদান করা যাবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6871)


6871 - عن ابن عمر أنهم كانوا يُضربون على عهد النبي صلى الله عليه وسلم إذا اشتروا طعامًا جزافًا أن يبيعوه في مكانهم حتى يُؤووه إلى رحالهم.

صحيح: رواه البخاري في الحدود (6852) عن عياش بن الوليد، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে তারা যখন অনুমান করে (جزافًا) খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করত, তখন তারা সেটিকে তাদের নিজ নিজ আস্তানায় না নিয়ে যাওয়া পর্যন্ত কেনা স্থানেই বিক্রি করলে তাদের শাস্তি দেওয়া হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (6872)


6872 - عن عائشة أنها قالت: ما خُيّر رسول الله صلى الله عليه وسلم بين أمرين إلا أخذ أيسرهما ما لم يكن إثما. فإن كان إثما كان أبعد الناس منه. وما انتقم رسول الله صلى الله عليه وسلم لنفسه إلا أن تُنتهك حُرمة الله عز وجل.

متفق عليه: رواه مالك في حسن الخلق (2) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته. ورواه البخاري في المناقب (3560) ومسلم في الفضائل (2327) كلاهما من طريق مالك به.

قال الترمذي بعد أن أخرج حديث أبي بردة الأنصاري (1463):"وقد اختلف أهل العلم في التعزير وأحسن شيء روي في التعزير هذا الحديث".

وقال بظاهره أحمد في المشهور عنه، وقال مالك والشافعي:"تجوز الزيادة على العشر".

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (7/ 404 - 410).

وخلاصته أن التعزير على قدر عظم الذنب وصغره قد يبلغ حد القتل إن كان فساده لا يزول إلا به، وهو ترجيح شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله لأن الفساد يتجدد ولا نهاية له.

قلت: مثل مهربي المخدرات، ومغتصبي الفتيات، ومروجي الدعارات.



وقال الله تعالى: {وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ} [الفلق: 4] والنفاثات: السواحر.

رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من عقد عقدة، ثم نفث فيها فقد سحر، ومن سحر فقد أشرك، ومن تعلق شيئًا وكل إليه.

رواه النسائي (4079) والطبراني في الأوسط (1492) كلاهما من حديث أبي داود الطيالسي قال: حدثنا عباد بن ميسرة المنْقري، عن الحسن، عن أبي هريرة فذكره.

والحسن هو الإمام البصري مدلس ولم يسمع من أبي هريرة. وعباد بن ميسرة المنْقري ضعيف، ضعفه الإمام أحمد وابن معين في رواية وأبو داود.

وخالفه أبان وهو بن صالح فرواه عن الحسن مرسلا وهو أوثق من عباد بن مسرة. وهذا أشبه بالصواب.

ورُوي عن صفوان بن عسّال أن يهودين قال أحدهما لصاحبه: اذهب بنا إلى هذا النبي نسأله، فقال: لا تقل له نبي؛ فإنه إن سمعها تقول نبي كانت له أربعة أعين، فأتيا النبي صلى الله عليه وسلم، فسألاه عن قول الله عز وجل: {وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى تِسْعَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ} [الإسراء: 101] فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تشركوا بالله شيئا، ولا تزنوا، ولا تقتلوا النفس التي حرم الله إلا بالحق، ولا تسرقوا، ولا تسحروا، ولا تمشوا ببريء إلى سلطان فيقتله، ولا تأكلوا الربا، ولا تقذفوا محصنة، ولا تفروا من الزحف - شك شعبة -، وعليكم يا معشر اليهود، خاصة ألا تعتدوا في السبت، فَقبَّلا يديه ورجليه، وقالا: نشهد أنك نبي، قال:"فما يمنعكما أن تسلما؟ ، قالا: إن داود دعا الله أن لا يزال في ذريته نبي، وإنا نخاف إن أسلمنا أن تقتلنا اليهود.

رواه الترمذي (3144) والنسائي (4078) وابن ماجه (3705) وصحّحه الحاكم (1/ 9) والبيهقي (8/ 166) كلهم من طرق عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن سلمة، عن صفوان بن عسّال قال: فذكره، واللفظ للترمذي.

وإسناده ضعيف من أجل عبد الله بن سلمة المرادي الكوفي، لم يرو عنه إلا عمرو بن مرة، وأبو إسحاق السبيعي.

قال الإمام أحمد: لا أعلم روى عنه غيرهما، وقال البخاري: لا يتابع على حديثه، وقال أبو حاتم:"يعرف وينكر". وقال شعبة عن عمرو بن مرة: كان عبد الله بن سلمة يحدثنا فيعرف وينكر.

قلت: قوله: تسع آيات بينات خطأ، فإن الذي ذكره في هذا الحديث ليست هي الآيات التسعة التي جاء ذكرها في القرآن، بل إنما هي من الوصايا والأحكام.

وثبت عن عمر بن الخطاب أمير المؤمنين أنه كتب لجزء بن معاوية عم الأحنف قبل موته بسنة: اقتلوا كل ساحر، وفي رواية: ساحر وساحرة.

رواه أحمد (1657) وأبو داود (3043) وأبو يعلى (890) وابن الجارود (1105) والبيهقي (8/ 136) كلهم من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار أنه سمع بجالة بن عبدة يقول: كنت
كاتبا لجزء بن معاوية. فأتانا كتاب عمر قبل موته بسنة يقول فيه: فذكره في سياق طويل. وهو في صحيح البخاري (3156) من هذا الوجه غير أنه لم يذكر"قتل الساحر".

وعن ابن عمر أن جارية لحفصة سحرتها، واعترفت بذلك. فأمرتْ بها عبد الرحمن بن زيد فقتلها. فأنكر ذلك عليها عثمان. فقال ابن عمر: ما تنكر على أم المؤمنين من امرأة سحرت، واعترفت، فسكت عثمان.

رواه عبد الرزاق (10/ 180 - 181) والبيهقي (8/ 136) كلاهما من طريق عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكر إلا أن عبد الرزاق شك كونه عبد الله بن عمر أو عبيد الله بن عمر.

وفي سنن البيهقي: فبلغ ذلك عثمان فغضب. فأتاه ابن عمر فقال: جاريتها سحرتها، أقرت بالسحر، وأخرجته، قال: فكف عثمان. وكأنه إنما كان غضبه لقتلها إياها بغير أمره.

وفيه دليل على أنه ليس لكل واحد أن يقتل، بل لا بد من الرفع إلى السلطان.

وقيد الشافعي في قتل الساحر إن كان سحره كفرًا، أو شركًا.

ولكن الذي نعرفه أن السحر كله كفر وشرك، فإن الساحر يعمل عمل الكفر والشرك في تأثير السحر، ويستخدم لذلك الشياطين ومردة الجن، وهم يأمرونه بالمعصية والشرك بالله، فإن لم يقبل أمرهم يقتلونه.

وقد حكي عن أبي حنيفة ومالك وأحمد: أن السحر كفر، وأن الساحر من أهل الذمة لا يقتل إلا إذا تعدى فساده بأن قتل بسحره أحدا فيقتل قصاصًا، وأما الساحر من المسلمين فيقتل لكفره ولا يستاب وبه قال أحمد وجماعة.

وفي الباب ما روي عن جندب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حد الساحر ضرية بالسيف".

رواه الترمذي (1406) وابن أبي عاصم في الديات (236) والدارقطني (3/ 114) والحاكم (4/ 360) والبيهقي (8/ 136) كلهم من حديث أبي معاوية، عن إسماعيل بن مسلم، عن الحسن، عن جندب، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه مرفوعًا إلا من هذا الوجه، وإسماعيل بن مسلم المكي يضعف في الحديث من قبل حفظه".

وإسماعيل بن مسلم العبدي البصري قال وكيع:"هو ثقة، ويُروى عن الحسن أيضا، والصحيح عن جندب موقوف".

وقال أيضا: والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم وهو قول مالك بن أنس. وقال الشافعي:"إنما يقتل الساحر إذا كان يعمل في سحره ما يبلغ به الكفر، فإذا عمل عملا دون الكفر لم نر عليه قتلًا".

وكذلك ضعّفه أيضا البيهقي فقال: إسماعيل بن مسلم ضعيف. وأما الحاكم فقال:"هذا
حديث صحيح الإسناد، وإن كان الشيخان تركاحديث إسماعيل بن مسلم فإنه غريب صحيح".

قلت: القول ما قال به جمهور أهل العلم وهو أن إسماعيل بن مسلم المكي أبو إسحاق ضعيف بالاتفاق. ورواه ابن عيينة، عن إسماعيل بن مسلم، عن الحسن قال النبي صلى الله عليه وسلم:"حد الساحر ضربة بالسيف" رواه عبد الرزاق (10/ 184) عن ابن عيينة فذكره مرسلًا.

وفي المصنف أيضا ما روي عن يزيد بن رومان أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي بساحر فقال:"أحبسوه، فإن مات صاحبه، فاقتلوه".

وفيه انقطاع. واختلف في توبته فقال مالك: لا يستتاب، ولا تقبل توبته، بل يتحتم قتله.

وقال الشافعي:"فإن تاب قبلت توبته". ولا خلاف بين أهل العلم أن عمل السحر حرام، وهو من الكبائر بالإجماع. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (7/ 159).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখনই দুটি বিষয়ের মধ্যে যেকোনো একটিকে বেছে নিতে বলা হতো, তিনি সহজটিই বেছে নিতেন, যদি না তাতে কোনো পাপ থাকত। আর যদি তাতে পাপ থাকত, তবে তিনি তা থেকে সবচেয়ে দূরে থাকতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের জন্য কখনও প্রতিশোধ নেননি, তবে যদি আল্লাহর পবিত্রতা (বা বিধান) লঙ্ঘন করা হতো (তাহলে তিনি আল্লাহর জন্য প্রতিশোধ নিতেন)।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক (২) ‘হুসনুল খুলক’ অধ্যায়ে ইবনু শিহাব, উরওয়াহ ইবনু যুবাইর থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন। আর ইমাম বুখারী ‘মানাকিব’ (৩৬৫০) ও ইমাম মুসলিম ‘ফাদাইল’ (২৩২৭) অধ্যায়ে উভয়েই মালিকের সূত্রে তা বর্ণনা করেছেন।

ইমাম তিরমিযী আবূ বুরদাহ আল-আনসারী (১৪৬৩)-এর হাদীস উদ্ধৃত করার পর বলেছেন: "তা'যীর (শাস্তি) নিয়ে জ্ঞানীরা মতভেদ করেছেন এবং তা'যীর সম্পর্কে বর্ণিত উত্তম বিষয় হলো এই হাদীস।" ইমাম আহমাদ তাঁর সুপরিচিত মত অনুসারে এর বাহ্যিক অর্থের ওপর আমল করেছেন। ইমাম মালিক ও ইমাম শাফিঈ বলেছেন: "দশ বেত্রাঘাতের ওপর বৃদ্ধি করা জায়েয।" (আরও দেখুন: আল-মিন্না আল-কুবরা (৭/৪০৪-৪১০)।) এর সারসংক্ষেপ হলো এই যে, পাপের বড়-ছোট হওয়ার ওপর নির্ভর করে তা'যীর নির্ধারিত হবে, এমনকি যদি সেই অপরাধের কারণে সৃষ্ট দুর্নীতি (ফাসাদ) মৃত্যুদণ্ড ছাড়া দূর না হয়, তবে তা মৃত্যুদণ্ড পর্যন্ত গড়াতে পারে। এটিই শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর অগ্রাধিকারপ্রাপ্ত মত। কারণ দুর্নীতি নতুনভাবে তৈরি হতে থাকে এবং এর কোনো শেষ নেই। (আমি (লেখক) বলি: যেমন মাদক চোরাচালানকারী, নারী ধর্ষক এবং যারা পতিতাবৃত্তি প্রচার করে।)

আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ} [আল-ফালাক: ৪] (আর গ্রন্থিতে ফুঁৎকারকারিণী জাদুকরীদের অনিষ্ট থেকে।) এবং 'নাফ্ফাছাত' হলো জাদুকরীরা।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো গ্রন্থি বাঁধল, অতঃপর তাতে ফুঁক দিল, সে যাদু করল। আর যে যাদু করল সে শিরক করল। আর যে ব্যক্তি কোনো কিছু ঝুলালো (তাকেই তার প্রতি সোপর্দ করা হলো)।" এটি নাসাঈ (৪০৭৯) ও ত্ববারানী (১৪৯২) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই আবূ দাঊদ তায়ালিসীর সূত্রে, তিনি আব্বাদ ইবনু মাইসারা আল-মিনকারী থেকে, তিনি হাসান (বাসরী) থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন। হাসান (বাসরী) একজন ইমাম এবং মুদাল্লিস (যারা শাইখের নাম গোপন করে) ছিলেন এবং তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সরাসরি শোনেননি। আর আব্বাদ ইবনু মাইসারা আল-মিনকারী দুর্বল, ইমাম আহমাদ, ইবনু মাঈন (এক বর্ণনায়) এবং আবূ দাঊদ তাকে দুর্বল বলেছেন। আব্বান, যিনি ইবনু সালিহ, আব্বাদের বিরোধিতা করেছেন এবং এটি হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে মুরসাল (সাহাবীর নাম ছাড়া) হিসেবে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি আব্বাদ ইবনু মাইসারা থেকে অধিক নির্ভরযোগ্য। এটিই বিশুদ্ধ হওয়ার বেশি নিকটবর্তী।

সাফওয়ান ইবনু আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, দুই ইহুদী একে অপরের সাথে বলল: চলো আমরা এই নবীর কাছে যাই এবং তাকে জিজ্ঞাসা করি। আরেকজন বলল: তাকে নবী বলো না; কারণ সে যদি শুনে যে তুমি তাকে নবী বলছ, তবে তার চোখ চারটি হয়ে যাবে (সে আরও বেশি প্রভাবিত হবে)। অতঃপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার এই বাণী: {وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى تِسْعَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ} [আল-ইসরা: ১০১] (আর আমরা মূসাকে নয়টি সুস্পষ্ট নিদর্শন দিয়েছিলাম) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা আল্লাহর সাথে কাউকে শিরক করবে না, যেনা করবে না, আল্লাহ যাকে হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ ছাড়া তাকে হত্যা করবে না, চুরি করবে না, যাদু করবে না, কোনো নিরপরাধ ব্যক্তিকে হত্যার উদ্দেশ্যে শাসকের কাছে নিয়ে যাবে না, সুদ খাবে না, সতীসাধ্বী নারীকে অপবাদ দেবে না, আর তোমরা যুদ্ধের ময়দান থেকে পালাবে না – (শু'বার সন্দেহ) – আর হে ইহুদী সম্প্রদায়, বিশেষভাবে তোমরা শনিবারে সীমালঙ্ঘন করবে না।" তখন তারা তাঁর দুই হাত ও দুই পায়ে চুমু খেল এবং বলল: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি নবী। তিনি বললেন: "তোমাদের ইসলাম গ্রহণে বাধা দিচ্ছে কিসে?" তারা বলল: দাউদ (আঃ) আল্লাহর কাছে এই দু'আ করেছিলেন যে তাঁর বংশধরে যেন সর্বদা নবী থাকে, আর আমরা ভয় পাই যে আমরা ইসলাম গ্রহণ করলে ইহুদীরা আমাদের মেরে ফেলবে।

এটি তিরমিযী (৩১৪৪), নাসাঈ (৪০৭৮) ও ইবনু মাজাহ (৩৭০৫) বর্ণনা করেছেন। আর হাকেম (১/৯) ও বাইহাকী (৮/১৬৬) এটিকে সহীহ বলেছেন। এঁরা সবাই শু'বা থেকে, তিনি আমর ইবনু মুররাহ থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু সালামাহ থেকে, তিনি সাফওয়ান ইবনু আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন। শব্দগুলো ইমাম তিরমিযীর। এর সনদ দুর্বল কারণ এতে আবদুল্লাহ ইবনু সালামাহ আল-মুরাদী আল-কুফী রয়েছেন। তাঁর থেকে কেবল আমর ইবনু মুররাহ এবং আবূ ইসহাক আস-সাবীয়ী বর্ণনা করেছেন। ইমাম আহমাদ বলেছেন: আমি জানি না যে এই দুজন ছাড়া আর কেউ তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী বলেছেন: তাঁর হাদীস অনুসরণযোগ্য নয়। আবূ হাতিম বলেছেন: 'তিনি পরিচিতও, আবার প্রত্যাখ্যাতও হন।' শু'বা আমর ইবনু মুররাহ থেকে বর্ণনা করেন: আবদুল্লাহ ইবনু সালামাহ আমাদের কাছে হাদীস বলতেন, তখন তার হাদীস পরিচিতও হতো, আবার প্রত্যাখ্যাতও হতো। (আমি (লেখক) বলি: তার এই কথা যে, 'নয়টি সুস্পষ্ট নিদর্শন' ভুল। কারণ এই হাদীসে তিনি যা উল্লেখ করেছেন, তা কুরআনে উল্লিখিত সেই নয়টি নিদর্শন নয়, বরং তা কতিপয় উপদেশ ও বিধান মাত্র।)

আর আমীরুল মু'মিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে প্রমাণিত আছে যে, তিনি তাঁর মৃত্যুর এক বছর পূর্বে আল-আহনাফের চাচা জুয ইবনু মু'আবিয়ার কাছে লিখেছিলেন: প্রত্যেক যাদুকরকে হত্যা করো। আরেক বর্ণনায়: যাদুকর ও যাদুকরীকে। এটি আহমাদ (১৬৫৭), আবূ দাঊদ (৩০৪৩), আবূ ইয়া'লা (৮৯০), ইবনু জারূদ (১১০৫) এবং বাইহাকী (৮/১৩৬) বর্ণনা করেছেন। সকলেই সুফইয়ান ইবনু উয়াইনা থেকে, তিনি আমর ইবনু দীনার থেকে, তিনি বাজালা ইবনু আবদাহকে বলতে শুনেছেন যে, তিনি জুয ইবনু মু'আবিয়ার লেখক ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর এক বছর আগে আমাদের কাছে তাঁর চিঠি আসে, যাতে দীর্ঘ বিবরণের মধ্যে এটি উল্লেখ ছিল। এটি সহীহ বুখারীতেও (৩১৫৬) এই সূত্রে রয়েছে, তবে তাতে 'যাদুকরকে হত্যা করার' কথা উল্লেখ নেই।

ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এক দাসী তাকে যাদু করেছিল এবং সে তা স্বীকারও করেছিল। তখন হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবদুর রহমান ইবনু যায়িদকে নির্দেশ দিলেন এবং সে তাকে হত্যা করল। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি অপছন্দ করলেন। তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি উম্মুল মু'মিনীন কর্তৃক এমন একজন মহিলাকে হত্যা করায় আপত্তি করছেন কেন যে যাদু করেছে এবং তা স্বীকার করেছে? তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নীরব রইলেন। এটি আবদুর রাযযাক (১০/১৮০-১৮১) ও বাইহাকী (৮/১৩৬) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার থেকে, তিনি নাফি' থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন। তবে আবদুর রাযযাক সন্দেহ পোষণ করেছেন যে এটি আবদুল্লাহ ইবনু উমার নাকি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার। বাইহাকীর সুনানে আছে: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যখন এই খবর পৌঁছাল, তিনি অসন্তুষ্ট হলেন। তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে এসে বললেন: তার দাসী তাকে যাদু করেছিল, সে যাদু স্বীকার করেছে এবং তা বের করে দিয়েছে। বর্ণনাকারী বলেন: তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেমে গেলেন। সম্ভবত তাঁর অসন্তুষ্টি ছিল এ কারণে যে, তাঁর অনুমতি ছাড়া তাকে হত্যা করা হয়েছিল। এতে প্রমাণ মেলে যে, হত্যা করার অধিকার প্রত্যেকের নেই, বরং তা শাসকের কাছে পেশ করতে হয়।

ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) যাদুকরকে হত্যার শর্ত হিসেবে বলেছেন যে, যদি তার যাদু কুফর বা শিরকের পর্যায়ে পৌঁছায়। তবে আমরা জানি যে, সকল প্রকার যাদুই কুফর ও শিরক, কারণ যাদুকর যাদুর কার্যকারিতা সৃষ্টি করতে কুফর ও শিরকের কাজ করে এবং এজন্য শয়তান ও দুষ্ট জিনদের ব্যবহার করে। আর তারা তাকে আল্লাহর অবাধ্যতা ও শিরক করার নির্দেশ দেয়, যদি সে তাদের আদেশ না মানে, তবে তারা তাকে মেরে ফেলে।

আবূ হানীফা, মালিক ও আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত আছে যে, যাদু হলো কুফর, এবং যিম্মী (অমুসলিম নাগরিক) যাদুকরকে হত্যা করা হবে না, যদি না তার দুর্নীতি (ফাসাদ) সীমা অতিক্রম করে যায়। যদি সে তার যাদু দ্বারা কাউকে হত্যা করে ফেলে, তবে কিসাসস্বরূপ তাকে হত্যা করা হবে। আর মুসলিম যাদুকরকে তার কুফরের কারণে হত্যা করা হবে এবং তাকে তওবার সুযোগ দেওয়া হবে না। ইমাম আহমাদ ও একদল আলেম এই মত দিয়েছেন।

এই প্রসঙ্গে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে তা হলো: তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাদুকরের শাস্তি হলো তরবারির দ্বারা এক আঘাত (মৃত্যুদণ্ড)।" এটি তিরমিযী (১৪০৬), ইবনু আবী আসিম 'আদ্-দিয়াত' (২৩৬), দারাকুতনী (৩/১১৪), হাকেম (৪/৩৬০) ও বাইহাকী (৮/১৩৬) বর্ণনা করেছেন। এঁরা সকলেই আবূ মু'আবিয়া থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু মুসলিম থেকে, তিনি হাসান (বাসরী) থেকে, তিনি জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী বলেছেন: "এই হাদীসটি আমরা মারফূ' (নবী পর্যন্ত সংযুক্ত) হিসেবে কেবল এই সূত্রেই জানি, আর ইসমাঈল ইবনু মুসলিম মাক্কীকে তাঁর স্মৃতিশক্তির কারণে হাদীসে দুর্বল বলা হয়।" ইসমাঈল ইবনু মুসলিম আল-আবদী আল-বাসরী সম্পর্কে ওয়াকী' বলেছেন: "তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।" আর তিনি হাসান থেকেও বর্ণনা করেন। আর সহীহ হলো জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি)। তিনি আরও বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ ও অন্যান্যদের মধ্যে কতিপয় আলেমের আমল এই হাদীসের ওপর, আর এটিই ইমাম মালিক ইবনু আনাস (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত। ইমাম শাফিঈ বলেছেন: "যাদুকরকে তখনই হত্যা করা হবে যখন তার যাদু কুফরের পর্যায়ে পৌঁছায়। যদি সে এমন কাজ করে যা কুফরের চেয়ে নিম্নমানের, তবে আমরা তাকে হত্যার পক্ষে নই।" বাইহাকীও এটিকে দুর্বল বলেছেন: ইসমাঈল ইবনু মুসলিম দুর্বল। তবে হাকেম বলেছেন: "এই হাদীসের সনদ সহীহ, যদিও শাইখদ্বয় (বুখারী ও মুসলিম) ইসমাঈল ইবনু মুসলিমের হাদীস গ্রহণ করেননি, তবে এটি গারীব (অপরিচিত) হওয়া সত্ত্বেও সহীহ।" আমি (লেখক) বলি: অধিকাংশ আলিমের অভিমতই সঠিক, আর তা হলো ইসমাঈল ইবনু মুসলিম আল-মাক্কী আবূ ইসহাক সর্বসম্মতভাবে দুর্বল। ইবনু উয়াইনাও এটি ইসমাঈল ইবনু মুসলিম থেকে, তিনি হাসান থেকে বর্ণনা করেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাদুকরের শাস্তি হলো তরবারির দ্বারা এক আঘাত।" এটি আবদুর রাযযাক (১০/১৮৪) ইবনু উয়াইনা থেকে মুরসাল (সাহাবীর নাম ছাড়া) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আবদুর রাযযাকের মুসান্নাফ গ্রন্থে ইয়াযিদ ইবনু রুমান থেকে বর্ণিত আছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এক যাদুকরকে আনা হলে তিনি বললেন: "তাকে আটকে রাখো। যদি তার শিকার মারা যায়, তবে তাকে হত্যা করো।" এর সনদে ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে। তার তওবা নিয়ে মতভেদ আছে। ইমাম মালিক বলেছেন: তাকে তওবার সুযোগ দেওয়া হবে না, তার তওবা কবুল করা হবে না, বরং তাকে হত্যা করা অপরিহার্য। ইমাম শাফিঈ বলেছেন: "যদি সে তওবা করে, তবে তার তওবা কবুল করা হবে।" তবে আলেমদের মধ্যে এই বিষয়ে কোনো মতভেদ নেই যে, যাদুর কাজ করা হারাম, এবং ইজমা অনুসারে এটি কবীরা গুনাহ। (আরও দেখুন: আল-মিন্না আল-কুবরা (৭/১৫৯)।)









আল-জামি` আল-কামিল (6873)


6873 - عن * *




৬৮৭৩ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (6874)


6874 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحلّ دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلا الله وأني رسول الله إلا بإحدى ثلاث: النفس بالنفس، والثيب الزاني، والمفارق لدينه التارك للجماعة".

متفق عليه: رواه البخاري في الديّات (6878) ومسلم في القسامة (1676) كلاهما من طريق الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে মুসলিম ব্যক্তি সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল, তার রক্তপাত (হত্যা) করা বৈধ নয়, তিনটি কারণের কোনো একটি ব্যতীত: প্রাণের (হত্যার) বদলে প্রাণ, বিবাহিত ব্যভিচারী, এবং যে তার দ্বীন ত্যাগ করে এবং জামা‘আত (মুসলিম সমাজ) ছেড়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6875)


6875 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي لا إله غيره، لا يحل دم رجل مسلم يشهد أن لا إلا الله، وأنّي رسول الله، إلا ثلاثة نفر: التارك للإسلام المفارق للجماعة، والثيب الزاني، والنفس بالنفس".

صحيح: رواه مسلم في القيامة (26: 1676) عن أحمد بن حنبل ومحمد بن المثنى قالا: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله فذكره.

قال الأعمش:"فحدثتُ به إبراهيم، فحدثني عن الأسود، عن عائشة بمثله".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সেই সত্তার কসম, যিনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই! কোনো মুসলিম ব্যক্তির রক্তপাত বৈধ নয়, যে সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল—তবে তিন প্রকার লোক ছাড়া: ইসলাম ত্যাগকারী, যে (মুসলিম) জামা'আত থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়; বিবাহিত (বা পূর্বে বিবাহ করেছে এমন) ব্যভিচারী এবং প্রাণের বদলে প্রাণ (অর্থাৎ খুনের শাস্তি)।”









আল-জামি` আল-কামিল (6876)


6876 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحل دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلا الله، وأن محمدًا رسول الله إلا بإحدى ثلاث: رجل زنى بعد إحصان فإنه يرجم، ورجل خرج محاربا لله ورسوله فإنه يُقتل أو يُصلب، أو ينفى من الأرض، أو يقتل نفسًا فيقتل بها، وفي رواية:"رجل يخرج من الإسلام يحارب الله ورسوله فيقتل".

صحيح: رواه أبو داود (4353)، والنسائي (4048)، والدارقطني (3/ 81)، والحاكم (4/ 367)، والبيهقي (8/ 283) كلهم من طريق إبراهيم بن طهمان، عن عبد العزيز بن رفيع، عن عبيد بن عمير، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط الشيخين".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো মুসলিম ব্যক্তির রক্তপাত বৈধ নয়, যে সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল; তবে তিনটি কারণের যেকোনো একটির ভিত্তিতে (তা বৈধ): এমন ব্যক্তি যে বিবাহিত হওয়ার পর ব্যভিচার করেছে, তাকে পাথর ছুঁড়ে মারা হবে (রজম করা হবে), আর এমন ব্যক্তি যে আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করার জন্য বের হয়, তাকে হত্যা করা হবে, অথবা শূলে চড়ানো হবে, অথবা দেশ থেকে নির্বাসিত করা হবে, অথবা যে ব্যক্তি কাউকে হত্যা করেছে, তাকে হত্যার বদলে হত্যা করা হবে। অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যে ব্যক্তি ইসলাম থেকে বেরিয়ে যায় এবং আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করে, তাকে হত্যা করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6877)


6877 - عن عائشة أنها قالت للأشتر: أنت الذي أردت قتل ابن أختي؟ قال: قد حرصتُ على قتله، وحرص على قتلي. قالت: أو ما علمت ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحل دم رجل إلا رجل ارتد، أو ترك الإسلام، أو زنى بعد ما أحصن، أو قتل نفسا بغير نفس".

حسن: رواه أحمد (25477) عن عبد الرحمن (ابن مهدي) عن سفيان، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن غالب، عن عائشة فذكرته.

ورواه النسائي (4017) والطحاوي في مشكله (1808) كلاهما من حديث سفيان إلا أن النسائي لم يذكر قصة الأشتر.

قلت: اختلف على أبي إسحاق السبيعي فرواه سفيان الثوري وجماعة عن أبي إسحاق السبيعي موصولًا. ورواه إسماعيل بن أبان الغنوي وحماد بن زيد وغيرهما عن أبي إسحاق السبيعي مرسلا عن عائشة. قال الدارقطني في"علله" (14/ 385):"والصواب قول الثوري ومن معه".

قلت: إسناده حسن من أجل الاختلاف في عمرو بن غالب غير أنه حسن الحديث. وقد وثقه النسائي وابن حبان، وصحح له الترمذي حديثا في سننه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আশতারকে বললেন: তুমিই কি সে, যে আমার ভাগ্নেকে হত্যা করতে চেয়েছিল? সে বলল: আমি অবশ্যই তাকে হত্যা করার জন্য দৃঢ়প্রতিজ্ঞ ছিলাম, এবং সেও আমাকে হত্যা করার জন্য দৃঢ়প্রতিজ্ঞ ছিল। তিনি (আয়েশা) বললেন: তুমি কি জানো না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কী বলেছেন? (তিনি বলেছেন:) "তিনটি কারণ ছাড়া কোনো মানুষের রক্তপাত বৈধ নয়: যে ব্যক্তি মুরতাদ হয়েছে, অথবা ইসলাম ত্যাগ করেছে, অথবা বিবাহিত হওয়ার পর যেনা (ব্যভিচার) করেছে, অথবা প্রাণের বিনিময়ে ছাড়া অন্য কাউকে হত্যা করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6878)


6878 - عن عكرمة، قال: أُتي علي رضي الله عنه بزنادقة فأحرقهم، فبلغ ذلك ابن عباس فقال: لو كنت أنا لم أحرقهم، لنهي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تعذبوا بعذاب الله" ولقتلتهم القول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من بدل دينه فاقتلوه".

صحيح: رواه البخاري في استتابة المرتدين (6922) عن أبي النعمان محمد بن الفضل، حدّثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن عكرمة، فذكره.

ورواه أبو داود (4351) وزاد في آخره من كلام علي"ويح ابن عباس" والترمذي (1457) وقال في آخره من كلام علي:"صدق ابن عباس ولفظ"ويح" أصله للدعاء عليه، ومعناه: المدح الله والإعجاب بقوله كما قال الخطابي.




ইকরিমাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট কিছু যিন্দীক (ধর্মদ্রোহী) আনা হলে তিনি তাদেরকে আগুন দিয়ে পুড়িয়ে দিলেন। এই সংবাদ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: যদি আমি হতাম, তবে আমি তাদেরকে আগুন দিয়ে পুড়াতাম না। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন: “তোমরা আল্লাহর শাস্তি (আগুন) দ্বারা শাস্তি দিও না।” বরং আমি তাদের হত্যা করতাম, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি: “যে ব্যক্তি তার দ্বীন পরিবর্তন করবে, তাকে হত্যা করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (6879)


6879 - عن عبد الله بن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من بدل دينه فاقتلوه".

صحيح: رواه النسائي (4065) وأحمد (2966) وصححه ابن حبان (4475) والبيهقي (8/ 202) كلهم من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا هشام بن أبي عبد الله، عن قتادة، عن أنس أن عليا أتي بأناس من الزُّطِّ يعيدون وثنا فأحرقهم. فقال ابن عباس فذكر الحديث. وإسناده صحيح.

وقوله:"الزُّط": بضم الراء ونشيد الطاء. هم جنس من السودان والهنود.

وقوله:"يعبدون وثنا": أي بعدما أسلموا.

وقوله:"أحرقهم": أي من رأي واجتهاد، ولذا لما بلغه حديث ابن عباس استحسنه ورجع إليه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ধর্ম পরিবর্তন করে, তাকে তোমরা হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6880)


6880 - عن أبي موسى الأشعري قال: أقبلت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعي رجلان من الأشعرين أحدهما عن يميني، والآخر عن يساري، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يستاك، فكلاهما سأل، فقال: يا أبا موسى، - أو يا عبد الله بن قيس - قال: قلت: والذي بعثك بالحق ما أطلعاني على ما في أنفسهما، وما شعرت أنهما يطلبان العمل. فكأني أنظر إلى سواكهـ تحت شفته قلصت، فقال: لن أولا نستعمل على عملنا من أراده، ولكن اذهب أنت يا أبا موسى أو يا عبد الله بن قيس إلى اليمن، ثم أتبعه معاذ بن جبل، فلما قدم عليه ألقى له وسادة قال: انزل، فإذا رجل عنده موثق، قال: ما هذا؟ قال: كان يهوديا فأسلم ثم تهود. قال: اجلس. قال: لا أجلس حتى يُقتل، قضاء الله ورسوله (ثلاث مرات)، فأمر به فقتل. ثم تذاكرا قيام الليل، فقال أحدهما: أما أنا فأقوم وأنام، وأرجو في نومتي ما أرجو في قومتي.

متفق عليه: رواه البخاري في استتابة المرتدين (6923) ومسلم في الإمارة (15: 1723) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد القطان، حدّثنا قرة بن خالد، حدثني حميد بن هلال، حدثني أبو بردة، قال: قال أبو موسى، فذكره.




আবু মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, আমার সাথে আশ'আরী গোত্রের দুইজন লোক ছিল। তাদের একজন ছিল আমার ডানপাশে এবং অন্যজন ছিল আমার বামপাশে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিসওয়াক করছিলেন। তখন তারা উভয়ে (নেতৃত্বের) জন্য প্রার্থনা করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হে আবু মূসা! অথবা (বললেন) হে আবদুল্লাহ ইব্‌ন কায়স! তিনি (আবু মূসা) বলেন: আমি বললাম: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! তারা উভয়ে তাদের অন্তরে যা ছিল, তা আমাকে জানায়নি এবং আমি বুঝতেও পারিনি যে তারা নেতৃত্ব বা কাজের জন্য প্রার্থনা করছে।

তখন আমার মনে হচ্ছে, আমি যেন তাঁর নিচের ঠোঁটের নিচে মিসওয়াকটিকে দেখছি, যা (আশ্চর্য হয়ে) গুটিয়ে গেল। এরপর তিনি বললেন: আমরা কখনও আমাদের কাজে এমন কাউকে নিযুক্ত করি না, যে তা চায়। তবে হে আবু মূসা! অথবা (বললেন) হে আবদুল্লাহ ইব্‌ন কায়স! তুমি ইয়ামেনে যাও। এরপর তার পিছনে মু'আয ইব্‌ন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন।

যখন তিনি (মু'আয) তার (আবু মূসার) নিকট আসলেন, তখন তিনি তার জন্য একটি বালিশ রাখলেন এবং বললেন: অবতরণ করুন। তখন সেখানে একজন লোককে বাঁধা অবস্থায় দেখতে পেলেন। মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এ কী? তিনি (আবু মূসা) বললেন: এ লোক ইহুদী ছিল, এরপর ইসলাম গ্রহণ করে, অতঃপর আবার ইহুদী হয়ে যায় (মুরতাদ হয়)। মু'আয বললেন: বসুন। আবু মূসা বললেন: আল্লাহর ও তাঁর রাসূলের সিদ্ধান্ত (তিনবার বললেন), একে হত্যা না করা পর্যন্ত আমি বসব না। তখন তার ব্যাপারে নির্দেশ দেওয়া হলো এবং তাকে হত্যা করা হলো।

এরপর তাঁরা দু'জন রাতে ইবাদত করা (কিয়ামুল্লাইল) নিয়ে আলোচনা করলেন। তখন তাদের একজন বললেন: আমি তো রাতের কিছু অংশ ঘুমাই এবং (কিছু অংশ) জাগ্রত থাকি (সালাত আদায় করি)। আর আমি আমার নিদ্রাবস্থাতেও সেই সওয়াবের আশা করি, যা আমার জাগ্রতাবস্থায় (সালাতে) আশা করি।