হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6881)


6881 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل مكة عام الفتح، وعلى رأسه المغفر. فلما نزعه جاء رجل فقال: ابن خطل متعلق بأستار الكعبة فقال:"اقتلوه".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (262) عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاري في الجهاد (3044) ومسلم في الحج (1357) كلاهما من حديث مالك بن أنس فذكره.

وذكر أهل المغازي أن جريمته أن رسول الله صلى الله عليه وسلم استعمله على الصدقة، وأصحبه رجلا يخدمه، فغضب على رفيقه لكونه لم يصنع له طعاما أمره بصنعه، فقتله، ثم خاف أن يُقتل فارتد، واستاق إبل الصدقة، وأنه كان يقول الشعر يهجو به رسول الله صلى الله عليه وسلم، ويأمر جاريتيه أن تغنيا به. ذكره الواقدي في مغازيه (2/ 859 - 860)، وابن هشام في سيرته (4/ 51 - 52).

فقد جمع هذا اللعين ثلاث جرائم وكلها مبيحة للدم: قتل النفس، والردة، والهجاء.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মক্কা বিজয়ের বছর মক্কায় প্রবেশ করেন। তখন তাঁর মাথায় শিরস্ত্রাণ (মগফির) ছিল। যখন তিনি তা খুললেন, তখন একজন লোক এসে বলল: ‘ইবন খাতাল কা’বার গিলাফ ধরে আছে।’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তাকে হত্যা করো।’









আল-জামি` আল-কামিল (6882)


6882 - عن ابن عباس قال: كان عبد الله بن سعد بن أبي سرْح يكتب لرسول الله صلى الله عليه وسلم فأزلّه الشيطان، فلحق بالكفار. فأمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُقتل يوم الفتح فاستجار له عثمان بن عفان، فأجاره رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (4358) والنسائي (4069) كلاهما من حديث علي بن الحسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره واللفظ لأبي داود.

وأما لفظ النسائي: فقال ابن عباس في سورة النحل: {مَنْ كَفَرَ بِاللَّهِ مِنْ بَعْدِ إِيمَانِهِ إِلَّا مَنْ
أُكْرِهَ وَقَلْبُهُ مُطْمَئِنٌّ بِالْإِيمَانِ وَلَكِنْ مَنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِنَ اللَّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [النحل: 106] فنسخ واستثنى من ذلك فقال: {ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُوا مِنْ بَعْدِ مَا فُتِنُوا ثُمَّ جَاهَدُوا وَصَبَرُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ} [النحل: 110] وهو عبد الله بن سعد بن أبي السرح، الذي كان على مصر، كان يكتب لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فأزله الشيطان، فلحق بالكفار، فأمر به أن يقتل يوم الفتح، فاستجار له عثمان بن عفان، فأجاره رسول الله صلى الله عليه وسلم. وإسناده حسن من أجل علي بن حسين وأبيه فإنهما حسنا الحديث.

وقصته مستفيضة في كتب المغازي والسير، ومنها ما رواه أبو داود، وهو الآتي:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু সা'দ ইবনু আবি সারহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লিখতেন (অর্থাৎ ওহী লিখতেন)। কিন্তু শয়তান তাকে পদস্খলিত করে দেয় এবং সে কাফিরদের সাথে যোগ দেয়। মক্কা বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে হত্যার নির্দেশ দেন। তখন উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য আশ্রয় (ক্ষমা) চাইলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আশ্রয় (ক্ষমা) দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6883)


6883 - عن سعد بن أبي وقاص قال: لما كان يوم فتح مكة اختبأ عبد الله بن سعد بن أبي سرْح عند عثمان بن عفان، فجاء به حتى أوقفه على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، بايع عبد الله. فرفع رأسه فنظر إليه ثلاثا، كل ذلك يأبى. فبايعه بعد ثلاث، ثم أقبل على أصحابه فقال:"أما كان فيكم رجل رشيد يقوم إلى هذا حيث رآني كففت يدي عن بيعته فيقتله" فقالوا: ما ندري يا رسول الله، ما في نفسك ألا أومأت إلينا بعينك! قال:"إنه لا ينبغي لنبي أن تكون له خائنة الأعين".

صحيح: رواه أبو داود (4359) والنسائي (4067) كلاهما من حديث أحمد بن المفضل، حدثنا أسباط بن نصر، قال زعم السدي، عن مصعب بن سعد، عن سعد بن أبي وقاص فذكره. وإسناده صحيح واللفظ لأبي داود.

وأما النسائي فرواه بأبسط من هذا فقال: لما كان يوم فتح مكة آمن رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إلا أربعة نفر، وامرأتين وقال: اقتلوهم وإن وجدتموهم متعلقين بأستار الكعبة: عكرمة بن أبي جهل، وعبد الله بن خطل، ومقيس بن صبابة، وعبد الله بن سعد بن أبي السرح".

فأما عبد الله بن خطل فأدرك وهو متعلق بأستار الكعبة فاستبق إليه سعيد بن حريث وعمار بن ياسر. فسبق سعيدٌ عمارًا. وكان أشبّ الرجلين فقتله. وأما مقيس بن صبابة فأدركه الناس في السوق فقتلوه. وأما عكرمة فركب البحر، فأصابتهم عاصف. فقال أصحاب السفينة: أخلصوا فإن آلهتكم لا غني عنكم شيئًا هاهنا.

فقال عكرمة: والله لئن لم ينجّني من البحر إلا الإخلاص لا ينجّني في البر غيره. اللهم إن لك عليّ عهدًا إن أنت عافيتني مما أنا فيه أن آتي محمدًا حتى اضع يدي في يده. فلأجدنّه عفوا كريما. فجاء فأسلم. وأما عبد الله بن أبي السرح فإنه اختبأ عند عثمان بن عفان. فلما دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إلى البيعة، جاء به حتى أوقفه على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، بايع عبد الله فذكر بقية القصة. هذه قصة ابن أبي سرْح أنه أسلم، ثم ارتد ولحق بأهل مكة، وبدأ يفتري على الله ورسوله فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بقتله.
وأما ما ذكر في كتب التفسير أنه صلى الله عليه وسلم إذا أملى عليه:"سميعا عليمًا" فكتب عليما حكيما" وإذا قال:"عليما حكيما" كتب"سميعا عليما" فشك وكفر وقال: إن كان محمد يوحى إليه، فقد أوحي إلي، وإن كان الله ينزله، فقد أنزلتُ مثل ما أنزل الله، قال محمد:"سميعا عليما" فقلت أنا:"عليما حكيما" فلحق بالمشركين.

ووشى بعمار وجبير عند ابن الحضرمي - أو لبني عبد الدار، فأخذوهم، فعُذّبوا حتى كفروا، وجدع أذن عمار يومئذ فانطلق عمار إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأخبره بما لقي، والذي أعطاهم من الكفر، فأبى النبي صلى الله عليه وسلم أن يتولاه، فأنزل الله في شأن ابن أبي سرح وعمار وأصحابه من كفر بالله من بعد إيمانه: {إِلَّا مَنْ أُكْرِهَ وَقَلْبُهُ مُطْمَئِنٌّ بِالْإِيمَانِ وَلَكِنْ مَنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا} [النحل: 106] فالذي أكره عمار وأصحابه، والذي شرح بالكفر صدرًا ابن أبي سرح. فهو ضعيف.

رواه ابن جرير الطبري - سورة الأنعام: آية 93 - عن محمد بن الحسين قال: ثنا أحمد بن المفضل، قال: ثنا أسباط، عن السدي قال: {وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِيَ إِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَيْءٌ} إلى قوله: {الْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ} [الأنعام: 43] قال: نزلت في عبد الله بن سعد بن أبي سرْح، أسلم وكان يكتب للنبي صلى الله عليه وسلم فكان إذا أملى عليه:"سميعًا عليمًا … فذكره. وإسناده معضل. وفيه أسباط وهو ابن نصر الهمداني.

قال النسائي:"ليس بالقوي، وضعّفه أبو نعيم، وتوقف أحمد، ولكن وثّقه ابن معين"، وقال البخاري:"صدوق".

وكذلك روي نحوه من طريق ابن جريج، عن عكرمة. وابن جريج لم يسمع من عكرمة، وفيه إرسال. ونظرًا لضعف هذه الروايات لم يذكرها ابن كثير كعادته من سرد روايات ابن جرير الطبري. وأما ما رُوي عن جابر بن عبد الله قال: ارتدت امرأة عن الإسلام. فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يعرضوا عليها الإسلام، فإن أسلمت وإلا قُتلت. فعرض عليها الإسلام فأبت أن تُسلم، فقتلت. واسمها أم مروان. فهو ضعيف.

رواه الدارقطني (3/ 119) من وجهين عن محمد بن المنكدر، عن جابر، قال الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (4/ 49):"وإسنادهما ضعيفان".

وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة أن امرأة ارتدت يوم أحد فأمر النبي صلى الله عليه وسلم أن تُستتاب، فإن تابت وإلا قتلت. رواه الدارقطني أيضا من طريق الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

قال الحافظ ابن حجر:"وروي من وجه آخر ضعيف عن الزهري …".

ويستفاد من هذه الأحاديث أن المرتدة حكمها حكم المرتد. وقد ثبت أن أبا بكر قتل امرأة في خلافته ارتدت، والصحابة متواجدون، فلم ينكر ذلك عليه أحد.

وقال به ابن عمر والزهري وإبراهيم النخعي كما قال البخاري، وإليه ذهب جمهور أهل العلم:
مالك والشافعي وأحمد وإسحاق وغيرهم. واستدلوا أيضا بعموم قول النبي صلى الله عليه وسلم: من بدّل دينه فاقتلوه" يدخل فيه الرجال والنساء.

ووقع في حديث معاذ أن النبي صلى الله عليه وسلم لما أرسله إلى اليمن قال له:"أيما رجل ارتد عن الإسلام فادعه، فإن عاد وإلا فاضرب عنقه، وأيما امرأة ارتدت عن الإسلام فادعها، فإن عادت وإلا فاضرب عنقها" قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (12/ 272)، وسنده حسن.

وقال أبو حنيفة:"تُجبر على الإسلام، ولا تُقتل. وإجبارها يكون بحبسها إلى أن تُسلم أو تموت". وتمسك أيضا بعموم النهي عن قتل النساء في الحرب"لا تقتلوا المرأة".




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মক্কা বিজয়ের দিন এলো, তখন আব্দুল্লাহ ইবনু সা'দ ইবনু আবী সার্হ উসমান ইবনু আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লুকিয়ে গেলেন। অতঃপর তিনি (উসমান) তাকে নিয়ে এলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে দাঁড় করিয়ে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আব্দুল্লাহকে বায়আত করুন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুলে তার দিকে তিনবার তাকালেন, আর প্রতিবারই তা প্রত্যাখ্যান করলেন। তৃতীয়বারের পর তাকে বায়আত করলেন। এরপর তিনি সাহাবাদের দিকে ফিরে বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি এমন কোনো বুদ্ধিমান লোক ছিল না, যে এই লোকটিকে দেখে, যখন দেখল আমি তার বায়আত গ্রহণ থেকে হাত গুটিয়ে নিচ্ছি, তখন সে উঠে তাকে হত্যা করে ফেলত?" তারা বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার মনে কী ছিল তা আমরা জানি না। আপনি যদি চোখ দিয়ে ইশারা করতেন! তিনি বললেন: "কোনো নবীর জন্য এটা উচিত নয় যে, সে চোখের খেয়ানত করবে (অর্থাৎ ইঙ্গিতে হত্যার নির্দেশ দেবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6884)


6884 - عن ابن عباس قال: كان رجل من الأنصار أسلم، ثم ارتد، ولحق بالشرك، ثم تندم، فأرسل إلى قومه: سلوا لي رسول الله صلى الله عليه وسلم هل لي من توبة؟ فجاء قومه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: إن فلانا قد ندم وأنه أمرنا أن نسألك: هل له من توبة؟ فنزلت: {كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ} - إلى قوله - {غَفُورٌ رَحِيمٌ} [آل عمران: 89]. فأرسل إليه فأسلم.

صحيح: رواه النسائي (4068) والحاكم (4/ 366) كلاهما من طريق داود وهو ابن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. قال الحاكم: صحيح الإسناد.

وقال عبد الرزاق في تفسيره (1/ 131): أخبرنا جعفر بن سليمان، حدثنا حميد الأعرج، عن مجاهد، قال: جاء الحارث بن سويد فأسلم مع النبي صلى الله عليه وسلم، ثم كفر الحارث، فرجع إلى قومه، فأنزل الله عز وجل: {كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ} [آل عمران: 86] إلى قوله تعالى: {إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [آل عمران: 89] قال: فحملها إليه رجل من قومه فقرأها عليه. فقال الحارث: إنك والله ما علمت لصدوق، وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصدق الثلاثة قال: فرجع الحارث فأسلم فحسن إسلامه. وإسناده منقطع.

وروى مالك في الأقضية (18) عن عبد الرحمن بن محمد بن عبد الله بن عبدٍ القاري، عن أبيه، أنه قال: قدم على عمر بن الخطاب رجل من قبل أبي موسى الأشعري، فسأله عن الناس فأخبره، ثم قال له عمر: هل كان فيكم من مغرّبةٍ خبرٌ؟ فقال: نعم، رجل كفر بعد إسلامه. قال: فما فعلتم
به قال: قرّبناه فضربنا عنقه. فقال عمر: أفلا حبسمتوه ثلاثًا، وأطعمتوه كل يوم رغيفًا، واستَتَبْتُموه لعله يتوب ويراجع أمر الله. ثم قال عمر: اللَّهم إن لم أحضر ولم آمر، ولم أرض إذ بلغني. ورواه الشافعي عن مالك، وعنه البيهقي (8/ 206).

قال الشافعي:"من لم يتأنّ به زعم أن الذي روي عن عمر ليس بثابت، لأنه لا يعلمه متصلًا.

وتعقبه ابن التركماني فقال:"أخرج هذا الأثر عبد الرزاق، عن معمر، وأخرجه ابن أبي شيبة، عن ابن عيينة كلاهما عن محمد بن عبد الرحمن بن عبد القارئ، عن أبيه، فعلى هذا هو متصل، لأن عبد الرحمن بن عبد سمع عمر".

قلت: عبد الله بن عبد - بغير إضافة - القاري - بتشديد الياء وعبد الرحمن بن عبد لهما رؤية، وقد قيل: لهما صحبة. وقوله:"مغرية خبر" أي هل هناك خبر جديد، جاء من البلاد النائية.

ويستفاد من الآية والحديث والآثار أن المرتد يستاب وبه قال جمهور أهل العلم أبو حنيفة ومالك والشافعي وأحمد. وبه قال عطاء بن أبي رباح وإبراهيم النخعي والأوزاعي وسفيان الثوري وغيرهم.

وفسروا قول النبي صلى الله عليه وسلم:"من بدل دينه فاقتلوه، أي إذا لم يرجع إلى الحق بعد التوبة، وأنه لا يقتل في الحال.

وفي المسألة أقوال أخرى ذكرها ابن المنذر في الأوسط (13/ 460) غير أن الصحيح ما ذهب إليه جمهور أهل العلم.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের মধ্যে এক ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করেছিল, এরপর সে মুরতাদ (ধর্মত্যাগী) হয়ে গেল এবং শিরকের সাথে যুক্ত হলো। এরপর সে অনুতপ্ত হলো এবং তার গোত্রের কাছে এই বলে পাঠালো: তোমরা আমার জন্য আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করো, আমার জন্য কি তওবার কোনো সুযোগ আছে?

এরপর তার গোত্রের লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং বললো: অমুক ব্যক্তি অনুতপ্ত হয়েছে এবং সে আমাদের নির্দেশ দিয়েছে আপনাকে জিজ্ঞেস করতে: তার জন্য কি তওবার কোনো সুযোগ আছে?

তখন নাযিল হলো: "{كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ} (আল্লাহ কীভাবে সেই জাতিকে পথ দেখাবেন, যারা ঈমান আনার পর কুফরি করেছে...)" – আয়াতটি "{غَفُورٌ رَحِيمٌ} (ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু)" [সূরা আল ইমরান: ৮৯] পর্যন্ত। তখন রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাছে লোক পাঠালেন এবং সে ইসলাম গ্রহণ করলো।

সহীহ: এটি নাসাঈ (৪০৬৮) ও হাকিম (৪/৩৬৬) বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়েই দাউদ ইবনু আবী হিন্দ, তিনি ইকরিমা, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেন: এর ইসনাদ সহীহ।

আব্দুর রাযযাক তার তাফসীরে (১/১৩১) বলেন: আমাদেরকে জা‘ফর ইবনু সুলাইমান খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন, আমাদেরকে হুমাইদ আল-আ‘রাজ হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি মুজাহিদ থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: হারিস ইবনু সুওয়াইদ এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ইসলাম গ্রহণ করেন। এরপর হারিস কুফরি করে নিজ গোত্রের কাছে ফিরে গেল। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: "{كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ} (আল্লাহ কীভাবে সেই জাতিকে পথ দেখাবেন, যারা ঈমান আনার পর কুফরি করেছে...)" [সূরা আল ইমরান: ৮৬] থেকে আল্লাহর বাণী: "{إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} (তবে যারা এরপর তওবা করে এবং নিজেদের সংশোধন করে নেয়, আল্লাহ তো ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।)" [সূরা আল ইমরান: ৮৯] পর্যন্ত। তিনি (মুজাহিদ) বলেন: তার গোত্রের একজন ব্যক্তি এই আয়াতটি তার কাছে নিয়ে গেল এবং তাকে পড়ে শোনালো। হারিস তখন বললো: আল্লাহর কসম, তুমি যা জানো, তাতে তুমি অবশ্যই সত্যবাদী। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো এই তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে সত্যবাদী। তিনি বলেন: এরপর হারিস ফিরে এলো এবং ইসলাম গ্রহণ করলো, আর তার ইসলাম উত্তম হলো।

মালিক ‘আল-আক্বদিয়াহ’ গ্রন্থে (১৮) আব্দুল রহমান ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দিল কারী থেকে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: আবূ মূসা আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে একজন লোক উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে লোকজনের অবস্থা জিজ্ঞেস করলেন, তখন সে তাকে খবর দিলো। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তোমাদের মধ্যে কি কোনো নতুন খবর (মুগরিবাহ খবর) ছিল? সে বললো: হ্যাঁ, এক ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণের পর কুফরি করেছে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা তার সাথে কী করলে? সে বললো: আমরা তাকে কাছে এনে তার গর্দান কেটে দিলাম। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা তাকে তিন দিন আটকে রাখলে না কেন? আর প্রতিদিন তাকে একটি করে রুটি খেতে দিলে না কেন? এবং তোমরা তাকে তওবা করতে বললে না কেন? হয়তো সে তওবা করে আল্লাহর নির্দেশের দিকে ফিরে আসতো। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া আল্লাহ! আমি সেখানে উপস্থিত ছিলাম না, আমি নির্দেশও দেইনি এবং যখন আমার কাছে খবর পৌঁছালো, তখন আমি তাতে সন্তুষ্ট ছিলাম না।

শাফেঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তাড়াহুড়ো করে, সে মনে করে যে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে তা প্রমাণিত নয়, কারণ সে তা মুত্তাসিল (সনদের ধারাবাহিকতা যুক্ত) রূপে জানে না।"

ইবনু তুর্কুমানী এর খণ্ডন করে বলেন: "এই আসারটি আব্দুর রাযযাক মা'মার থেকে এবং ইবনু আবী শাইবাহ ইবনু উয়ায়নাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়েই মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আব্দিল কারী থেকে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন। এই হিসেবে, এটি মুত্তাসিল (ধারাবাহিক), কারণ আব্দুর রহমান ইবনু আব্দ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শুনেছেন।"

আয়াত, হাদীস ও আছার (সাহাবীর বাণী/কর্ম) থেকে এটা জানা যায় যে, মুরতাদকে তওবা করতে বলা হবে। এই মত দিয়েছেন জমহুর উলামায়ে কিরাম (অধিকাংশ আলেমগণ), যেমন আবূ হানিফা, মালিক, শাফেঈ ও আহমাদ। আতা ইবনু আবী রাবাহ, ইব্রাহীম নাখঈ, আওযাঈ, সুফিয়ান সাওরী প্রমুখও এই মত দিয়েছেন।

তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই বাণীকে ব্যাখ্যা করেছেন: "যে ব্যক্তি তার ধর্ম পরিবর্তন করে, তাকে হত্যা করো।"—অর্থাৎ তওবার পর যদি সে সত্যের দিকে ফিরে না আসে, তবেই হত্যা করা হবে। তাৎক্ষণিকভাবে তাকে হত্যা করা হবে না।

এই মাসআলায় অন্যান্য আরও বক্তব্য আছে, যা ইবনু মুনযির ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে (১৩/৪৬০) উল্লেখ করেছেন। তবে সঠিক হলো সেটাই, যা জমহুর উলামায়ে কিরাম গ্রহণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6885)


6885 - عن أنس، أن نفرًا من عكل ثمانيةً، قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فبايعوه على الإسلام فاستوخموا الأرض وسقمتْ أجسامُهم. فشكوا ذلك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"ألا تخرجون مع راعينا في إبله فتصيبون من أبوالها وألبانها؟" فقالوا: بلى، فخرجوا فشربوا من أبوالها وألبانها فصحّوا. فقتلوا الراعي وطردوا الإبل. فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فبعث في آثارهم. فأُدركوا فجيء بهم، فأمر بهم فقطعت أيديهم وأرجلهم وسُمرتْ أعينهم. ثم نبذوا في الشمس حتى ماتوا.

وفي رواية: فأمر بمسامير فأُحميت فكحلهم وقطع أيديهم وأرجلهم وما حسمهم، ثم أُلقوا في الحرة يستسقون، فما سُقوا حتى ماتوا.

قال أبو قلابة: سرقوا وقتلوا وحاربوا الله ورسوله.

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (1804) ومسلم في القسامة (1671/ 10) كلاهما من
طريق أبي قلابة، حدثني أنس، فذكره. والسياق لمسلم. والرواية الثانية للبخاري.

ورواه البخاري من وجه آخر عن سعيد، عن قتادة، أن أنسا حدثهم فذكر نحوه (4192). وفيه: قال قتادة: بلغنا أن النبي صلى الله عليه وسلم بعد ذلك كان يحث على الصدقة، وينهى عن المثلة. وهذا البلاغ سيأتي موصولا في الباب الذي يليه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উক্বাল গোত্রের আটজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তারা ইসলামের উপর তাঁর হাতে বাইয়াত গ্রহণ করল। কিন্তু তারা (মদীনার) আবহাওয়াকে অস্বাস্থ্যকর মনে করল এবং তাদের শরীর রোগাক্রান্ত হয়ে গেল। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এ বিষয়ে অভিযোগ করলে তিনি বললেন: "তোমরা কি আমাদের রাখালের সাথে তার উটের পাল নিয়ে বাইরে যাবে না? তাহলে তোমরা সেগুলোর পেশাব ও দুধ পান করতে পারবে।" তারা বলল: হ্যাঁ। সুতরাং তারা বের হলো এবং উটের পেশাব ও দুধ পান করল, ফলে তারা সুস্থ হয়ে গেল। এরপর তারা রাখালকে হত্যা করল এবং উটগুলো তাড়িয়ে নিয়ে গেল। এ সংবাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি তাদের সন্ধানে লোক পাঠালেন। তাদেরকে পাকড়াও করে নিয়ে আসা হলো। তিনি তাদের ব্যাপারে নির্দেশ দিলেন, ফলে তাদের হাত ও পা কেটে দেওয়া হলো এবং তাদের চোখগুলোকে গরম শলাকা দ্বারা বিদ্ধ করা হলো। অতঃপর তাদের রোদে ফেলে রাখা হলো, যতক্ষণ না তারা মারা গেল।

অন্য বর্ণনায় আছে: তিনি পেরেক আনার নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তা গরম করে তাদের চোখে টেনে দিলেন (বা তাদের চোখ অন্ধ করে দিলেন) এবং তাদের হাত-পা কেটে দিলেন। তিনি (রক্তপাত বন্ধ করার জন্য) গরম লোহা ব্যবহার করেননি। এরপর তাদের হাররা নামক স্থানে ফেলে রাখা হলো। তারা পানি পান করার জন্য চাইছিল, কিন্তু তাদের পানি পান করানো হয়নি, অবশেষে তারা মারা গেল।

আবূ কিলাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: তারা চুরি করেছে, হত্যা করেছে এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6886)


6886 - عن عائشة قالت: إن قومًا أغاروا على لقاح رسول الله صلى الله عليه وسلم فقطع النبي صلى الله عليه وسلم أيديهم وأرجلهم وسمل أعينَهم.

حسن: رواه النسائي (4038) وابن ماجه (2579) كلاهما عن محمد بن المثنى وقرنه ابن ماجه بمحمد بن بشار عن إبراهيم بن أبي الوزير، قال: حدثنا الدراوردي، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الدراوردي، وهو وُصف بالخطأ إلا أنه توبع. فرواه النسائي (4037) من وجه آخر عن مالك بن سُعير، عن هشام بإسناده نحوه ومالك بن سُعير لا بأس به في المتابعات. وقد رُوي مرسلا، وهو لا يُعل ما جاء موصولا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুগ্ধবতী উটের ওপর আক্রমণ করেছিল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের হাত ও পা কেটে দেন এবং তাদের চোখ উপড়ে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6887)


6887 - عن عبد الله بن يزيد الأنصاري قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن النبي والمثلة.

صحيح: رواه البخاري في المظالم (2474) عن آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، حدثنا عدي بن ثابت، سمعت عبد الله بن يزيد الأنصاري وهو جده أبو أمه، قال: فذكر الحديث.

وقوله: وهو جده أبو أمه: أي جد عدي بن ثابت لأمه، والنهبة هو أخذ المال قهرًا.




আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াযিদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লুটতরাজ (নাহব) ও অঙ্গহানি (মুছলা) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6888)


6888 - عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحث في خطبته على الصدقة، وينهى عن المثلة.

صحيح: رواه النسائي (4047) عن محمد بن المثنى، قال: حدثنا عبد الصمد، قال: حدثنا هشام (هو الدستوائي)، عن قتادة، عن أنس فذكره.

ورواه أبو داود (4368) من وجه آخر عن هشام بإسناده في قصة عرينة وزاد: ثم نهى عن المثلة. وإسناده صحيح.

وذكرُ أبي داود النهي عن المثلة في قصة عُرينة يدل على أن قتادة كان يذكره موصولا وبلاغًا.

وهذا خلاف للحافظ ابن حجر الذي يرى أن النهي عن المثلة إدراج، وأن هذا القدر من الحديث لم يسنده قتادة عن أنس. الفتح (7/ 409).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবায় সাদকা (দান) করার জন্য উৎসাহিত করতেন এবং অঙ্গহানি (মুতলাহ) করতে নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6889)


6889 - عن الهياج بن عمران، أن عمران أبق له غلام، فجعل الله عليه لئن قدر عليه ليقطعن يده. فأرسلني لأسأل له فأتيت سمرة بن جندب فسألته فقال كان نبي الله صلى الله عليه وسلم يحثنا على الصدقة وينهانا عن المثلة. فأتيت عمران بن حصين فسألته، فقال: كان
رسول الله صلى الله عليه وسلم يحثنا على الصدقة، وينهانا عن المثلة.

حسن: رواه أبو داود (2667) عن محمد بن المثنى، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن الحسن، عن الهياج بن عمران فذكره.

وإسناده حسن، من أجل الهياج بن عمران فإنه وثقه ابن سعد، وذكره ابن حبان في الثقات.

وأما قول الحافظ:"مقبول" فالصواب أنه صدوق. ولذا قال في الفتح (7/ 459):"وإسناد هذا الحديث قوي، وقال: هياج بن عمران البصري وثّقه ابن سعد، وابن حبان، وبقية رجاله رجال الصحيح". وقال: وأخرجه أحمد من طريق سعيد، عن قتادة بهذا الإسناد إلى عمران بن حصين، وفيه قصة".




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিয়াজ ইবনে ইমরান থেকে বর্ণিত— উমরান নামক এক ব্যক্তির একটি গোলাম (দাস) পালিয়ে গিয়েছিল। উমরান আল্লাহর নামে মানত করেছিল যে, যদি সে তাকে ধরতে পারে, তবে অবশ্যই তার হাত কেটে দেবে। অতঃপর তিনি (উমরান) আমাকে এ বিষয়ে ফতোয়া জিজ্ঞেস করার জন্য পাঠালেন। আমি সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সাদাকা করার জন্য উৎসাহ দিতেন এবং বিকৃত শাস্তি (মুছলা) দিতে নিষেধ করতেন। এরপর আমি ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনিও বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সাদাকা করার জন্য উৎসাহ দিতেন এবং বিকৃত শাস্তি (মুছলা) দিতে নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6890)


6890 - عن ابن عباس أن أعمى كانت له أم ولده كانت تشتم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتقع فيه، فينهاها فلا تنتهي، ويزجرها فلا تنزجر، قال: فلما كان ذات ليلة جعلت تقع في النبي صلى الله عليه وسلم، وتشتمه، فأخذ المغولَ فوضعه في بطنها، واتكأ عليه فقتلها، فوقع بين رجليها طفل، فلطخت ما هنالك بالدم، فلما أصبح ذكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فجمع الناس فقال:"أنشد الله رجلًا فعل ما فعل، لي عليه حق إلا قام" فقام الأعمى يتخطى الناس، وهو يتزلزل حتى قعد بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أنا صاحبها، كانت تشتمك، وتقع فيك فأنهاها فلا تنتهي، وأزجرها فلا تنزجر، ولي منها ابنان مثل اللؤلؤتين، وكانت بي رفيقة، فلما كان البارحة جعلت تشتمك وتقع فيك، فأخذت المغول فوضعته في بطنها، واتكأت عليها حتى قتلتها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألا اشهدوا أن دمها هدر".

حسن: رواه أبو داود (4361) والنسائي (4070) وابن أبي عاصم في الديات (299)، والدارقطني (3/ 112)، والحاكم (4/ 354) كلهم من طريق إسرائيل، عن عثمان الشحام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل عثمان الشحّام العدوي أبو سلمة البصري. يقال اسم أبيه ميمون، أو عبد الله، وهو مختلف فيه. وثّقه أبو داود، وقال أحمد:"ليس به بأس" وقال أبو زرعة:"ما أرى بحديثه بأسا" وقال النسائي:"ليس بالقوي".

والمِغول: بكسر الميم، وسكون الغين. قال الخطابي:"شبه المِشْمَل، نصله دقّيق ماضٍ"، والمشمل السيف القصير، وسمي بذلك لأنه يشتمل عليه الرجل أي يغطيه بثوبه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক অন্ধ ব্যক্তির উম্মে ওয়ালাদ (সন্তানের জননী ক্রীতদাসী) ছিল। সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে গালি দিত এবং তাঁর দোষ বর্ণনা করত। অন্ধ লোকটি তাকে নিষেধ করত কিন্তু সে নিবৃত্ত হতো না, তাকে ধমকাত কিন্তু সে শান্ত হতো না।

তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন, যখন এক রাতে সে আবার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের দোষ বর্ণনা করতে ও তাঁকে গালি দিতে শুরু করল, তখন লোকটি 'মিগল' (এক ধরনের খঞ্জর) নিয়ে তার পেটে স্থাপন করল এবং তার উপর ভর দিয়ে তাকে হত্যা করল। তার দুই পায়ের মাঝখানে একটি শিশু পড়ে গেল এবং সেখানের সব রক্তে মাখামাখি হয়ে গেল।

যখন সকাল হলো, তখন বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে উল্লেখ করা হলো। তিনি লোকজনকে একত্রিত করে বললেন: "আমি আল্লাহর কসম দিয়ে সেই ব্যক্তিকে আহ্বান জানাচ্ছি, যে এই কাজ করেছে, আমার উপর যদি তার কোনো হক (অধিকার/দাবি) থাকে, সে যেন দাঁড়িয়ে যায়।"

তখন সেই অন্ধ লোকটি কাঁপতে কাঁপতে লোকজনকে ডিঙ্গিয়ে এগিয়ে গেল, এমনকি সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সামনে বসে পড়ল এবং বলল: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমিই তার হত্যাকারী। সে আপনাকে গালি দিত এবং আপনার দোষ বর্ণনা করত। আমি তাকে নিষেধ করতাম কিন্তু সে নিবৃত্ত হতো না, ধমকাত কিন্তু শান্ত হতো না। আমার কাছে তার থেকে দুটি মুক্তোর মতো সুন্দর সন্তান আছে এবং সে আমার প্রতি দয়ালুও ছিল। কিন্তু গত রাতে সে যখন আপনাকে গালি দিতে ও দোষ বর্ণনা করতে শুরু করল, তখন আমি 'মিগল' নিয়ে তার পেটে স্থাপন করলাম এবং তার উপর ভর দিয়ে তাকে হত্যা করলাম।"

তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমরা সাক্ষী থাকো, তার রক্ত মূল্যহীন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6891)


6891 - عن جابر بن عبد الله يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لكعب بن الأشرف، فإنه
آذى الله ورسوله؟" فقال محمد بن مسلمة: أنا يا رسول الله! أتحبُّ أن أقتله؟ قال:"نعم" فذهب فقتله.

متفق عليه: رواه البخاري في الرهن (2510) ومسلم في الجهاد (1801) كلاهما من حديث سفيان، عن عمرو، عن جابر فذكره مختصرا ومطولا.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কা'ব ইবনুল আশরাফের জন্য কে আছে? কারণ সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে কষ্ট দিয়েছে।" তখন মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা বললেন: "আমি, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি চান যে আমি তাকে হত্যা করি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" এরপর তিনি গিয়ে তাকে হত্যা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6892)


6892 - عن أبي برزة قال: كنت عند أبي بكر رضي الله عنه، فتغيظ على رجل فاشتد عليه، فقلت: تأذن لي يا خليفة رسول الله صلى الله عليه وسلم أضرب عنقه؟ قال: فأذهبت كلمتي غضبه، فقام فدخل فأرسل إلي فقال: ما الذي قلت آنفًا؟ قلت: ائذن لي أضرب عنقه، قال: أكنت فاعلًا لو أمرتك؟ قلت: نعم، قال: لا والله ما كانت لبشر بعد محمد صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه أبو داود (4363) والنسائي (4077) وأحمد (61) وابن أبي عاصم في الديات (302) كلهم من طريق يزيد بن زريع، عن يونس بن عبيد، عن حميد بن هلال، عن عبد الله بن مطرف، عن أبي برزة فذكره.

قال النسائي: هذا الحديث أحسن الحديث وأجودها".

وقال الدارقطني أيضا في العلل (1/ 236 - 237): رواه يونس بن عبيد فجوّد إسناده.

قلت: فيه عبد الله بن مطرف وهو ابن الشخير صدوق إلا أنه توبع.

فقد رواه النسائي (4071) وأحمد (54) والحاكم (4/ 354) كلهم من طرق عن شعبة، عن توبة العنبري قال: سمعت أبا سوار القاضي يقول: عن أبي برزة الأسلمي، قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق قال: فقال أبو برزة: ألا أضرب عنقه؟ فانتهره وقال: ما هي لأحد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وللحديث طرق أخرى ذكرها ابن أبي عاصم والدارقطني في العلل وغيرهما.

قال أبو داود: قال أحمد بن حنبل: أي لم يكن لأبي بكر أن يقتل رجلا إلا بإحدى الثلاث التي قالها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كفر بعد إيمان، أو زنا بعد إحصان، أو قتل نفس بغير نفسه وكان للنبي أن يقتل (أي من سبّه).

وذكر هذا القول الخطابي أيضا في معالمه فقال: أخبرني الحسن بن يحيى، عن ابن المنذر قال: قال أحمد بن حنبل فذكر مثله. وهو في الأوسط لابن المنذر (13/ 485).

قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى:"وقد استدل به على جواز قتل ساب النبي صلى الله عليه وسلم جماعة من العلماء، منهم: أبو داود، وإسماعيل بن إسحاق القاضي، وأبو بكر بن عبد العزيز، والقاضي أبو يعلى وغيرهم من العلماء. وذلك لأن أبا برزة لما رأى الرجل قد شتم أبا بكر، وأغلظ له حتى تغيّظ أبو بكر استأذنه في أن يقتله بذلك، وأخبره أنه لو أمره لقتله، فقال أبو بكر: ليس لأحد بعد النبي صلى الله عليه وسلم. وقال"فقد تضمن الحديث خِصيصتين لرسول الله صلى الله عليه وسلم.
إحداهما: أنه يطاع في كل من أمر بقتله (أي بخلاف غيره فإنه لا يطاع في كل من أمر بقتله إلا بحقه) والثانية: أن له أن يقتل من شتمه وأغلظ له.

وهذا المعنى الثاني الذي كان له باق في حقه بعد موته، فكل من شتمه، أو أغلظ في حقه كان قتله جائزا بل بعد موته أوكد وأوكد، لأن حرمته بعد موته أكمل، والتساهل في عرضه بعد موته غير ممكن.

وهذا الحديث يُفيد أن سبّه في الجملة يبيح القتل، ويستدل بعمومه على قتل الكافر والمسلم. انتهى. انظر: الصارم المسلول علي شاتم الرسول صلى الله عليه وسلم (ص 128 - 129).

وكذلك من شتم نبيا من أنبياء الله يقتل ولا يستتاب.

قلت: قال ابن المنذر: أجمع عوام أهل العلم على أن حدّ من سب النبي صلى الله عليه وسلم القتلُ. وممن قاله مالك والليث وأحمد وإسحاق وهو مذهب الشافعي.

وقال: وحكي عن النعمان (أبو حنيفة):"لا يُقتل، يعني الذي هم عليه من الشرك أعظم" الإجماع (ص 144) وانظر أيضا الأوسط له (13/ 483).

لأن أبا حنيفة وأصحابه قالوا: لا ينتقض العهد بالسب، ولا يُقتل الذمي بذلك، لكن يعزر على إظهار ذلك كما يعزر على إظهار المنكرات.

ومن التعزير إذا رأى الإمام أن يَقْتل من سبّ النبي صلى الله عليه وسلم قتله سياسة لا حدًّا. وأما المسلم إن سب النبي صلى الله عليه وسلم فإنه يكفر بذلك، ويقتل بغير الخلاف وبه قال الأئمة الأربعة وغيرهم.

قال الخطابي:"لا أعلم أحدًّا من المسلمين اختلف في وجوب قتله".

وأما ما روي عن علي رضي الله عنه أن يهودية كانت تشتم النبي صلى الله عليه وسلم وتقع فيه، فخنقها رجل حتى ماتت، فأبطل رسول الله صلى الله عليه وسلم دمها فهو منقطع.

رواه أبو داود (4362) عن عثمان بن أبي شيبة وعبد الله بن الجراح، عن جرير، عن مغيرة، عن الشعبي، عن علي فذكره.

اختلف في سماع الشعبي من علي بن أبي طالب فأثبت سماعه البخاري في صحيحه (6812) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا سلمة بن كهيل، قال: سمعت الشعبي يحدث عن علي رضي الله عنه حين رجم المرأة يوم الجمعة وقال: قد رجمتها بسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وقد سئل الدارقطني في العلل (4/ 97) فقال:"سمع منه حرفا ما سمع غير هذا" هو يشير إلى ما ذكره البخاري. وينفي عنه سماعه مطلقا. وكذلك قال أحمد: إن روايته عن علي ليست بشيء. المراسيل (290).

وكذلك لا يصح ما روي عن عمير بن أمية، أنه كانت له أخت، وكان إذا خرج إلى النبي صلى الله عليه وسلم آذتْه وشتمت النبي صلى الله عليه وسلم، وكانت مشركة، فاشتمل لها يومًا على السيف، ثم أتاها فوضعه عليها فقتلها، فقام بنوها فصاحوا وقالوا: قد علمْنا من قتلها، فتُقْتل أمنا؟ وهؤلاء قوم لهم آباء وأمهات
مشركون، فلما خاف عمير أن يقتلوا غير قاتلها ذهب إلى النبي صلى الله عليه وسلم في فأخبره، فقال:"أقتلت أختك؟" قال: نعم، قال:"ولم؟" قال: لأنها كانت تؤذيني فيك، فأرسل النبي صلى الله عليه وسلم إلى بنيها فسألهم، فسموا غير قاتلها، فأخبرهم بي وأهدر دمها، فقالوا: سمعًا وطاعةً.

رواه ابن أبي عاصم في الديات (310) والطبراني في الكبير (17/ 64) كلاهما من حديث يعقوب بن حميد، نا عبد الله بن يزيد، عن سعيد بن أبي أيوب، أن يزيد بن أبي حبيب حدثه أن أسلم بن يزيد وزيد بن إسحاق حدثاه عن عمير بن أمية فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل يعقوب بن حميد بن كاسب المدني، وقد ينسب إلى جده، جمهور أهل العلم على تضعيفه.

قال العقيلي عن زكريا بن يحيى الحلواني:"رأيت أبا داود السجستاني قد جهل حديث يعقوب بن كاسب، وقال: مات على ظهور كتبه، فسألته عنه فقال: رأينا في مسنده أحاديث أنكرناها فطالبنا بالأصول فدافعنا، ثم أخرجها بعد فوجدنا الأحاديث في الأصول مغيرة بخط طري، كانت مراسيل فأسندها وزاد فيها".

وفي الإسناد أيضا أسلم بن يزيد، وكذلك زيد بن إسحاق وقيل: يزيد بن إسحاق وبعض هؤلاء من المجهولين. ولم يضبطهم الرواة. ولعله يعود ذلك إلى يعقوب بن حميد فإنه كثير الخطأ ويروي الغرائب والعجائب.




আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি একবার আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তিনি এক ব্যক্তির উপর ক্রুদ্ধ হলেন এবং তার প্রতি কঠোর হলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলীফা! আপনি কি আমাকে অনুমতি দেবেন যে আমি তার গর্দান (মাথা) উড়িয়ে দেই?

আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার এই কথায় তাঁর রাগ দূর হয়ে গেল। তিনি উঠে ভেতরে চলে গেলেন। এরপর তিনি আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: এইমাত্র তুমি কী বলেছিলে?

আমি বললাম, আমাকে অনুমতি দিন, আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই।

তিনি জিজ্ঞেস করলেন: আমি যদি তোমাকে আদেশ করতাম, তবে কি তুমি তা করতে?

আমি বললাম, হ্যাঁ।

তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আর কারো জন্য এটা (এই ক্ষমতা) নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6893)


6893 - عن أنس قال: كان رجل نصرانيًا، فأسلم، وقرأ البقرة وآل عمران. فكان يكتب للنبي صلى الله عليه وسلم فعاد نصرانيا فكان يقول: ما يدري محمد إلا ما كتبت له. فأماته الله فدفنوه. فأصبح وقد لفظته الأرض، فقالوا: هذا فعل محمد وأصحابه لما هرب منهم. نبشوا عن صاحبنا لما هرب منهم فألقوه. فحفروا له، وأعمقوا له في الأرض ما استطاعوا. فأصبح قد لفظته الأرض. فعلموا: أنه ليس من الناس فألقوه.

متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3617) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز، عن أنس فذكره.

وأخرجه مسلم في صفات المنافقين (2781) من وجه آخر عن أنس بن مالك وزاد فيه قوله: كان منا رجل من بني النجار قد قرأ البقرة وآل عمران، وكان يكتب لرسول الله صلى الله عليه وسلم: فانطلق هاربا حتى لحق بأهل الكتاب فرفعوه وقالوا: هذا قد كان يكتب لمحمد فأعجبوا به. فما لبث أن قصم الله عنقه فيهم فحفروا له فواروه، وذكر في دفنه ثلاث مرات ثم قال: فتركوه منبوذًا".

قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله: فهذا الملعون الذي افترى على النبي صلى الله عليه وسلم أنه ما كان
يدري إلا ما كتب له، قصمه الله وفضحه بأن أخرجه من القبر بعد أن دفن مرارًا. وهذا أمر خارج عن العادة، يدل كل أحد على أن هذا كان عقوبة لما قاله، وأنه كان كاذبًا، إذ كان عامة الموتى لا يُصيبهم مثل هذا، وأن هذا الجرم أعظم من مجرد الارتداد. إذ عامة المرتدين يموتون، ولا يُصيبهم مثل هذا وأن الله منتقم لرسوله ممن طعن عليه وسبه، ومظهر لدينه، ولكذب الكاذب، إذ لم يمكن الناس أن يقيموا عليه الحد".

ثم قال رحمه الله:"ونظير هذا ما حدثنا أعداد من المسلمين العدول أهل الفقه والخبرة عما جربوه مرات متعددة في حصر الحصون والمدائن التي بالسواحل الشامية لما حصر المسلمون فيها بني الأصفر في زماننا قالوا: كنا نحن نحصر الحصن أو المدينة الشهر أو أكثر من الشهر، وهو ممتنع علينا، حتى نكاد نيأس إذ تعرض أهله لسب رسول الله صلى الله عليه وسلم والوقيعة في عرضه، فعجلنا فتحه وتيسر ولم يكد يتأخر إلا يوما أو يومين أو نحو ذلك ثم يفتح المكان عنوة، ويكون فيهم ملحمة عظيمة قالوا: حتى إن كنا لنتباشر بتعجيل الفتح إذا سمعناهم يقعون فيه مع امتلاء القلوب غيظا بما قالوه فيه.

وهكذا حدثني بعض أصحابنا الثقات أن المسلمين من أهل الغرب حالهم مع النصاري كذلك، ومن سنة الله أن يعذب أعداءه تارة بعذاب من عنده، وتارة بأيدي عباده المؤمنين.

وكذلك لما تمكن النبي صلى الله عليه وسلم من ابن أبي سرح أهدر دمه لما طعن في النبوة وافترى عليه الكذب، مع أنه قد آمن جميع أهل مكة الذين قاتلوه وحاربوه أشد المحارية، ومع أن السنة في المرتد أنه لا يقتل حتى يستاب إما وجوبا أو استحبابا.

وسنذكر - إن شاء الله تعالى - أن جماعة ارتدوا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم ثم دعوا إلى التوبة وعرضت عليهم حتى تابوا فقبلت توبتهم.

وفي ذلك دليل على أن جرم الطاعن على رسول الله صلى الله عليه وسلم في الساب له أعظم من جرم المرتد". الصارم المسلول على شاتم الرسول صلى الله عليه وسلم (ص 148).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি খ্রিস্টান ছিল। সে ইসলাম গ্রহণ করল এবং সূরা বাকারা ও আলে ইমরান পড়ল। সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য ওহি লিখত। এরপর সে পুনরায় খ্রিস্টান হয়ে গেল। সে বলত: আমি যা লিখে দিয়েছি, মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ছাড়া আর কিছুই জানেন না।

আল্লাহ তাকে মৃত্যু দিলেন এবং তারা তাকে দাফন করল। কিন্তু সকালে দেখা গেল, মাটি তাকে বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। তখন তারা বলল: এটা মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সাহাবীদের কাজ, কারণ সে তাদের থেকে পালিয়ে গিয়েছিল। তারা আমাদের লোকটিকে কবর খুঁড়ে বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। এরপর তারা আবার তার জন্য কবর খনন করল এবং যতটা সম্ভব গভীরে খনন করল। কিন্তু সকালে দেখা গেল, মাটি তাকে পুনরায় বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। তখন তারা বুঝল যে, এটি মানুষের কাজ নয়। ফলে তারা তাকে (অনাদরে) ফেলে রাখল।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি মানাকিব অধ্যায়ে (৩৬১৭) আবু মাম্মার থেকে, তিনি আব্দুল ওয়ারিস থেকে, তিনি আব্দুল আযীয থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম মুসলিম এটি মুনাফিকদের বৈশিষ্ট্য অধ্যায়ে (২৭৮১) আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে এই অতিরিক্ত অংশটুকু উল্লেখ করেছেন: আমাদের আনসারদের বনু নাজ্জার গোত্রের একজন ব্যক্তি ছিল, যে সূরা বাকারা ও আলে ইমরান পাঠ করেছিল এবং সে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লিখত। এরপর সে পালিয়ে গিয়ে আহলে কিতাবের সাথে যোগ দিল। তারা তাকে গ্রহণ করল এবং বলল: এ তো মুহাম্মদের জন্য লিখত! তারা তাকে পেয়ে খুব খুশি হলো। কিন্তু বেশি দিন না যেতেই আল্লাহ তাদের মাঝেই তার ঘাড় ভেঙে দিলেন (তাকে মেরে ফেললেন)। তারা তার জন্য কবর খুঁড়ে তাকে দাফন করল। তার দাফনের ঘটনা তিনবার উল্লেখ করার পর তিনি বললেন: অতঃপর তারা তাকে পরিত্যক্ত অবস্থায় ফেলে রাখল।

শাইখুল ইসলাম ইবনে তাইমিয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এই অভিশপ্ত ব্যক্তি, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিরুদ্ধে অপবাদ দিয়েছিল যে তিনি শুধু তাই জানেন যা সে লিখে দিয়েছে— আল্লাহ তার ঘাড় ভেঙে দিয়েছেন এবং তাকে অপদস্থ করেছেন এই বলে যে, তাকে বারবার দাফন করার পরেও কবর তাকে বাইরে বের করে ফেলে দিয়েছে। এটি এমন একটি অস্বাভাবিক ঘটনা যা সবার কাছে প্রমাণ করে যে, এটি তার মন্তব্যের শাস্তি ছিল এবং সে ছিল একজন মিথ্যাবাদী। কারণ অধিকাংশ মৃত ব্যক্তির ক্ষেত্রে এমন ঘটে না, এবং এটি (রাসূলের প্রতি অপবাদ দেওয়া) শুধু মুরতাদ হওয়ার চেয়েও গুরুতর অপরাধ। কারণ সাধারণত মুরতাদরা মৃত্যুবরণ করে, কিন্তু তাদের ক্ষেত্রে এমন ঘটে না। আল্লাহ তাঁর রাসূলের উপর যারা আক্রমণ করে বা তাঁকে গালি দেয়, তাদের থেকে প্রতিশোধ গ্রহণকারী এবং তিনি তাঁর দ্বীন ও মিথ্যাবাদীর মিথ্যাচারকে প্রকাশকারী, যেহেতু মানুষ তার উপর হদ (শাস্তি) কার্যকর করতে পারেনি।

এরপর তিনি (রাহিমাহুল্লাহ) আরও বলেন: এর অনুরূপ ঘটনা যা আমাদের সময়ের সিরিয়ার উপকূলীয় অঞ্চলের দুর্গ ও শহরগুলো অবরোধ করার সময় বিশ্বস্ত, ফিকহ ও অভিজ্ঞতা সম্পন্ন বহু মুসলিম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, যখন মুসলিমরা সেখানে ইউরোপীয়দের (বনী আসফার) অবরোধ করেছিলেন। তারা বলেন: আমরা মাসখানেক বা তারও বেশি সময় ধরে কোনো দুর্গ বা শহর অবরোধ করে রাখতাম, যা আমাদের জন্য দুর্ভেদ্য থাকত। আমরা প্রায় হতাশ হয়ে পড়তাম। এমন সময় যখন এর অধিবাসীরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেওয়া শুরু করত এবং তাঁর সম্মানে আঘাত হানত, তখন দ্রুতই আমরা সেটি জয় করে ফেলতাম। এটি সহজ হয়ে যেত এবং এক বা দুই দিনের বেশি দেরি হতো না, এরপরই জোরপূর্বক সেই স্থান জয় হতো এবং সেখানে এক বিশাল যুদ্ধ সংঘটিত হতো। তারা বলেন: এমনও হয়েছে যে, তাদের গালি দেওয়ার কথা শোনা মাত্রই আমাদের হৃদয় ক্রোধে ভরে গেলেও আমরা দ্রুত বিজয়ের সুসংবাদ দিয়ে আনন্দ প্রকাশ করতাম।

এভাবেই আমার কিছু বিশ্বস্ত বন্ধু আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, পশ্চিমের মুসলিমদের অবস্থাও খ্রিস্টানদের সাথে একই রকম। আল্লাহর সুন্নাত হলো, তিনি কখনও তাঁর নিজের পক্ষ থেকে শাস্তি দ্বারা এবং কখনও তাঁর মুমিন বান্দাদের হাত দ্বারা তাঁর শত্রুদের শাস্তি দেন।

অনুরূপভাবে, আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সারহ যখন নবুওয়তের উপর আক্রমণ করল এবং তাঁর বিরুদ্ধে মিথ্যা অপবাদ দিল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের পর তাকে মৃত্যুদণ্ড দেন, যদিও মক্কার সকল লোক যারা তাঁর সাথে কঠিনতম যুদ্ধ করেছিল— তারা ঈমান এনেছিল। আর মুরতাদের ক্ষেত্রে সুন্নাত হলো, তাকে তওবার জন্য আহ্বান না করা পর্যন্ত হত্যা করা হয় না— চাই তা আবশ্যক হোক বা মুস্তাহাব।

ইনশাআল্লাহ আমরা উল্লেখ করব যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে বহু লোক মুরতাদ হয়েছিল, কিন্তু তাদের তওবার আহ্বান করা হয়েছিল এবং তারা তওবা করার পর তাদের তওবা গ্রহণ করা হয়েছিল।

এ থেকে প্রমাণিত হয় যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেওয়া বা তাঁর প্রতি আঘাত হানার অপরাধ একজন সাধারণ মুরতাদের অপরাধের চেয়েও গুরুতর। (আস-সারিমুল মাসলুল আলা শাতিমির রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম, পৃ. ১৪৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (6894)


6894 - عن * *




৬৮৯৪ - থেকে বর্ণিত * *









আল-জামি` আল-কামিল (6895)


6895 - عن أنس بن مالك قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تزال جهنم تقول: هل من مزيد حتى يضع رب العزة فيها قدمه، فتقول: قط قط وعزّتك، ويُزْوى بعضها إلى بعض".

متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6661) ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (37: 2848) كلاهما من طريق شيبان، عن قتادة، حدّثنا أنس بن مالك، فذكره.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম সবসময় বলতে থাকবে, 'আরও আছে কি?' যতক্ষণ না আল্লাহ্‌ রাব্বুল ইজ্জত তার মধ্যে তাঁর কদম রাখবেন। তখন সে বলবে, 'যথেষ্ট, যথেষ্ট, আপনার ইজ্জতের কসম!' এবং তার এক অংশ অপর অংশের সাথে সংকুচিত হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6896)


6896 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:" … ويبقى رجل مقبل بوجهه على النار، فيقول: يا رب قد نشبني ريحها وأحرقني ذكاؤها، فاصرف وجهي عن النار، فلا يزال يدعو الله، فيقول: لعلّك إن أعطيتك أن تسألني غيره؟ فيقول: لا وعزتك لا أسألك غيره .." الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6573) ومسلم في الإيمان (299: 182) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي هريرة. فذكر الحديث بطوله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "...এবং একজন লোক অবশিষ্ট থাকবে, যার মুখ আগুনের দিকে ফেরানো থাকবে। সে বলবে: হে আমার রব! এর (আগুনের) ধোঁয়া আমাকে ধরে ফেলেছে এবং এর তীব্র তাপ আমাকে জ্বালিয়ে দিয়েছে। সুতরাং আমার মুখ আগুন থেকে ফিরিয়ে দিন। সে অনবরত আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করতে থাকবে। (আল্লাহ) তখন বলবেন: সম্ভবত, আমি যদি তোমাকে এটা দিই, তাহলে তুমি এরপর অন্য কিছু চাইবে? সে বলবে: আপনার ইজ্জতের কসম! আমি আপনার কাছে আর অন্য কিছু চাইব না।" হাদীস।









আল-জামি` আল-কামিল (6897)


6897 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لما خلق الله الجنة والنار، أرسل جبريل عليه السلام إلى الجنة، فقال: انظر إليها، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فنظر
إليها، فرجع، فقال: وعزتك، لا يسمع بها أحد إلا دخلها، فأمر بها، فحفّت بالمكاره، فقال: اذهب إليها، فانظر إليها، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فإذا هي قد حفت بالمكاره، فقال: وعزتك، لقد خشيت أن لا يدخلها أحد، قال: اذهب فانظر إلى النار، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فنظر إليها، فإذا هي يركب بعضها بعضًا، فرجع، فقال: وعزتك، لا يدخلها أحد، فأمر بها، فحفّت بالشهوات، فقال: ارجع فانظر إليها، فنظر إليها، فإذا هي قد حفت بالشهوات، فرجع، وقال: وعزتك، لقد خشيت أن لا ينجو منها أحد إلا دخلها".

حسن: رواه النسائي (3763) والترمذي (2560) وأحمد (8398) كلهم من حديث محمد بن عمرو، حدثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة الليثي حسن الحديث.

وقال الترمذي:"حسن صحيح".




আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ যখন জান্নাত ও জাহান্নাম সৃষ্টি করলেন, তখন তিনি জিবরাইল (আঃ)-কে জান্নাতের দিকে পাঠালেন এবং বললেন, "এটিকে এবং এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তা দেখ।" তিনি সেদিকে তাকালেন। তারপর ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, যে কেউ এটির কথা শুনবে, সে অবশ্যই তাতে প্রবেশ করবে।" অতঃপর আল্লাহ এর চারপাশ অপছন্দনীয় বিষয়াবলী দ্বারা বেষ্টন করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "সেখানে যাও এবং এটিকে ও এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তা দেখ।" জিবরাইল (আঃ) গিয়ে দেখলেন, সেটিকে অপছন্দনীয় বিষয়াবলী দ্বারা বেষ্টন করা হয়েছে। তিনি বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, আমার আশঙ্কা হচ্ছে যে কেউই হয়তো তাতে প্রবেশ করতে পারবে না।" আল্লাহ বললেন, "যাও এবং জাহান্নামকে দেখ, আর এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তাও দেখ।" জিবরাইল (আঃ) সেটির দিকে তাকালেন। তিনি দেখলেন, সেটি (আগুন) একটার ওপর আরেকটা চড়ে আছে। তিনি ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, কেউই তাতে প্রবেশ করবে না।" অতঃপর আল্লাহ এর চারপাশ প্রবৃত্তি ও কামনাবাসনা দ্বারা বেষ্টন করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং এটিকে দেখ।" তিনি সেটির দিকে তাকালেন। তিনি দেখলেন, সেটি প্রবৃত্তি ও কামনাবাসনা দ্বারা বেষ্টন করা হয়েছে। তিনি ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, আমার আশঙ্কা হচ্ছে যে কেউই তা থেকে রক্ষা পাবে না, বরং সবাই তাতে প্রবেশ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (6898)


6898 - عن ابن عمر قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بعْثًا، وأمّر عليهم أسامة بن زيد، فطعن بعض الناس في إمْرته، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إن كنتم تطعنون في إمْرته، فقد كنتم تطعنون في إمرة أبيه من قبل، وأيم الله إن كان لخليقًا للإمارة، وإن كان لمن أحبّ الناس إليّ، وإنّ هذا لمن أحبّ الناس إليّ بعده".

متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6627) ومسلم في الفضائل (63: 2426) كلاهما من طريق إسماعيل بن جعفر، عن عبد الله بن دينار، أنه سمع ابن عمر يقول، فذكره.

ورواه مسلم من طريق سالم بن عمر عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال وهو على المنبر:"إن تطعنوا في إمارته - يريد أسامة بن زيد - فقد طعنتم في إمارة أبيه من قبله، وأيم الله إن كان لخليقًا لها، وأيم الله إن كان لأحبّ الناس إلي، وأيم الله إن هذا لها لخليق - يريد أسامة بن زيد -، وأيم الله إن كان لأحبّهم إليّ من بعده، فأوصيكم به فإنه من صالحيكم".




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সেনাবাহিনী প্রেরণ করলেন এবং উসামা ইবন যায়দকে তাদের সেনাপতি নিযুক্ত করলেন। তখন কিছু লোক তাঁর (উসামার) নেতৃত্বের বিষয়ে আপত্তি উত্থাপন করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন, "যদি তোমরা তার (উসামার) নেতৃত্বের বিষয়ে আপত্তি তোলো, তবে তোমরা ইতিপূর্বে তার পিতার (যায়দ ইবন হারিসার) নেতৃত্বের বিষয়েও আপত্তি তুলেছিলে। আল্লাহর কসম! নিশ্চয়ই তিনি (উসামার পিতা) নেতৃত্বের যোগ্য ছিলেন এবং নিশ্চয়ই তিনি আমার নিকট মানুষদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়জনদের অন্যতম ছিলেন। আর নিশ্চয়ই এ ব্যক্তি (উসামা) তাঁর (পিতার) পরে আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয়জনদের অন্যতম।"









আল-জামি` আল-কামিল (6899)


6899 - عن أبي هريرة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال سليمان: لأطوفنّ الليلة على تسعين امرأة، كلهنّ تأتي بفارس يجاهد في سبيل الله، فقال له صاحبه: قل: إن شاء الله، فلم يقل إن شاء الله، فطاف عليهنّ جميعًا فلم يحْمل منهن إلا امرأة واحدة، جاءت بشق رجل، وأيم الذي نفس محمد بيده، لو قال: إن شاء الله، لجاهدوا في سبيل الله
فرسانًا أجمعون".

متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6639) ومسلم في الأيمان والنذور (25: 1654) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن هرمز الأعرج عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সুলাইমান (আঃ) বললেন, "আমি আজ রাতে নব্বই জন স্ত্রীর কাছে অবশ্যই যাবো। তাদের প্রত্যেকেই এমন একজন অশ্বারোহী জন্ম দেবে, যে আল্লাহর পথে জিহাদ করবে।" তখন তাঁর সঙ্গী তাঁকে বললেন, "ইনশাআল্লাহ (আল্লাহ যদি চান) বলুন।" কিন্তু তিনি 'ইনশাআল্লাহ' বললেন না। অতঃপর তিনি তাদের সকলের কাছে গেলেন। কিন্তু তাদের মধ্যে একজন নারী ছাড়া আর কেউই গর্ভবতী হলো না। আর সে একটি অসম্পূর্ণ মানুষ জন্ম দিল। যার হাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবন, তাঁর কসম! যদি তিনি 'ইনশাআল্লাহ' বলতেন, তবে তারা সবাই আল্লাহর পথে অশ্বারোহী যোদ্ধা হিসেবে জিহাদ করত।









আল-জামি` আল-কামিল (6900)


6900 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن أهل الجنة ليتراءون أهل الغرف من فوقهم، كما تتراءون الكوكب الدّريّ الغابر من الأفق من المشرق أو المغرب، لتفاضل ما بينهم" قالوا: يا رسول الله، تلك منازل الأنبياء لا يبلغها غيرهم. قال:"بلى، والذي نفسي بيده رجال آمنوا بالله وصدَّقوا المرسلين".

متفق عليه: رواه البخاري في بدء الخلق (3256) ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2831) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن صفوان بن سُليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “জান্নাতবাসীরা তাদের ওপরের কক্ষসমূহের (উচ্চ মর্যাদার) অধিবাসীদেরকে এমনভাবে দেখতে পাবে, যেমন তোমরা দূর দিগন্তে পূর্ব বা পশ্চিম আকাশে উজ্জ্বল নক্ষত্র দেখতে পাও, তাদের মর্যাদার পার্থক্যের কারণে।” সাহাবীরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ঐগুলো তো নবীগণের স্থান, অন্য কেউ সেখানে পৌঁছতে পারবে না। তিনি বললেন: “হ্যাঁ, অবশ্যই! যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! তারা এমন লোক হবে যারা আল্লাহর প্রতি ঈমান এনেছে এবং রাসূলদেরকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে।”