হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6981)


6981 - عن ابن عباس قال: بينا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يخطب إذا هو برجل قائم، فأل عنه فقالوا: أبو إسرائيل نذر أن يقوم ولا يقعد، ولا يستظل، ولا يتكلم، ويصوم. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"مره فليتكلم وليستظل وليقعد، وليتمّ صومه".

صحيح: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6704)، عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا وهيب، حَدَّثَنَا أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وأبو إسرائيل هذا رجل من الأنصار، وقيل: اسمه يسير، كما ذكره ابن عبد البر في الاستيعاب.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন হঠাৎ তিনি এক ব্যক্তিকে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখলেন। তিনি তার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তারা বলল: এ হলো আবূ ইসরাঈল। সে মানত করেছে যে সে দাঁড়ানো অবস্থায় থাকবে, বসবে না, ছায়ায় থাকবে না, কথা বলবে না এবং সাওম পালন করবে। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে কথা বলে, ছায়ায় থাকে, বসে এবং তার সাওম পূর্ণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6982)


6982 - عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مر وهو يطوف بالكعبة بإنسان يقود إنسانًا بخزامة في أنفه. فقطعها النَّبِيّ بيده، ثمّ أمره أن يقوده بيده.

صحيح: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6703) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام أن ابن جريج أخبرهم قال: أخبرني سليمان الأحول أن طاوسا أخبره، عن ابن عباس فذكره.

والخزامة بكسر الخاء وهو ما يجعل في أنف البعير من شعر أو غيره ليقاد به.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কা'বা ঘর তাওয়াফ করছিলেন, তখন তিনি এমন এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যে আরেক ব্যক্তিকে তার নাকে রশি (খযামাহ) লাগিয়ে টেনে নিয়ে যাচ্ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সেটি কেটে দিলেন, অতঃপর তাকে নির্দেশ দিলেন যেন সে তাকে হাত ধরে নিয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (6983)


6983 - عن عقبة بن عامر أنه قال: نذرتْ أختي أن تمشي إلى بيت الله، وأمرتني أن أستفتي لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فاستفتيه، فقال:"لتمش ولتركب" وزاد في رواية: حافية.

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1866)، ومسلم في النذر (12: 1644) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني سعيد بن أبي أيوب، أن يزيد بن أبي حبيب أخبره، أن أبا الخير حدَّثه، عن عقبة بن عامر، فذكره.

والزيادة لمسلم من رواية عبد الله بن عَيَّاش، عن يزيد بن أبي حبيب.




উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বোন মানত করেছিল যে, সে হেঁটে আল্লাহর ঘরের (কাবা) দিকে যাবে। আর সে আমাকে আদেশ করেছিল যেন আমি তার জন্য নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে ফতোয়া চাই। সুতরাং আমি তাঁর কাছে ফতোয়া চাইলাম। তিনি বললেন: "সে হাঁটবে এবং আরোহণও করবে।" এবং এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: খালি পায়ে।









আল-জামি` আল-কামিল (6984)


6984 - عن أبي هريرة، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أدرك شيخًا يمشي بين ابنيه، يتوكأ عليهما، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما شأن هذا؟" قال ابناه: يا رسول الله، كان عليه نذر، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"اركب أيها الشّيخ، فإن الله غني عنك وعن نذرك".

صحيح: رواه مسلم في النذر (1643) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক বৃদ্ধ ব্যক্তিকে দেখতে পেলেন, যিনি তাঁর দুই সন্তানের মাঝখান দিয়ে হাঁটছিলেন এবং তাদের ওপর ভর করে চলছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এঁর কী অবস্থা?” তাঁর দুই পুত্র বলল: “ইয়া রাসূলাল্লাহ, তিনি মানত করেছিলেন।” তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে বৃদ্ধ, আপনি আরোহণ করুন (সওয়ার হোন), নিশ্চয়ই আল্লাহ আপনার এবং আপনার মানতের মুখাপেক্ষী নন।”









আল-জামি` আল-কামিল (6985)


6985 - عن جابر بن عبد الله أن رجلًا قام يوم الفتح. فقال: يا رسول الله! إني نذرت لله إن فتح عليك مكة أن أصلي في بيت المقدس ركعتين. فقال:"صل هاهنا" ثمّ أعاد عليه فقال:"صل هاهنا" ثمّ أعاد عليه. فقال:"شأنك إذًا".

صحيح: رواه أبو داود (3305) وأحمد (14919) والحاكم (4/ 304) والبيهقي (10/ 82 - 83) وابن الجارود (945) كلّهم من حديث حمّاد بن سلمة، عن حبيب المعلم، عن عطاء بن أبي
رباح، عن جابر بن عبد الله فذكره.

قال أبو داود:"رُوي نحوه عن عبد الرحمن بن عوف، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

قلت: إسناده صحيح.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".

والرجل المبهم هو الشريد كما جاء في رواية عطاء بن أبي رباح قال: جاء الشريد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني نذرت إن الله فتح عليك أن أصلي في بيت المقدس. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"هاهنا فصلّ" ثمّ عاد حتَّى قال مثل مقالته هذه ثلاث مرات، والنبي صلى الله عليه وسلم يقول:"هاهنا فصلّ" قال له في الرابعة:"اذهب، فوالذي نفسي بيده لو صليت هاهنا لأجزأ عنك، ثمّ قال: صلاة في هذا المسجد الحرام أفضل من مائة ألف صلاة" رواه عبد الرزّاق (15891) عن إبراهيم بن يزيد، عن عطاء إِلَّا أنه مرسل.

وأمّا حديث عبد الرحمن بن عوف الذي أشار إليه أبو داود ففيه رجال مجاهيل. رواه أبو داود (3306) مختصرًا، وعبد الرزّاق (15890) مطوَّلًا عن ابن جريج، قال: أخبرني يوسف بن الحكم بن أبي سفيان، أن حفص بن عمر بن عبد الرحمن بن عوف وعمرو بن حنّة أخبراه عن عمر بن عبد الرحمن بن عوف، عن رجال من الأنصار من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن رجلًا من الأنصار جاء النَّبِيّ في يوم الفتح فذكر نحو حديث جابر بن عبد الله وجاء فيه: وقال ابن جريج: أخبرت أن ذلك الرّجل: الشريد بن سويد من الصدف وهو ثقيف.

وفيه حفص بن عمر بن عبد الرحمن وعمرو بن حنّة، وشيخهما عمر بن عبد الرحمن بن عوف كلّهم" مقولون كما في التقريب. أي يقبلون عند المتابعة كما هو الحال لحفص بن عمر بن عبد الرحمن وعمرو بن حنة، فإن أحدهما تابع الآخر. ولم أقف على متابعة عمر بن عبد الرحمن بن عوف. والله أعلم.

قال ابن المسيب: من نذر أن يعتكف في مسجد إيلياء فاعتكف في مسجد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالمدينة، أجزأ عنه، ومن نذر أن يعتكف في مسجد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالمدينة فاعتكف في المسجد الحرام أجزأ عنه. ومن نذر أن يعتكف على رؤوس الجبال فإنه لا ينبغي له ذلك. ليعتكفْ في مسجد جماعة" رواه عبد الرزّاق (15889) عن معمر، عن عبد الكريم الجزريّ، عن ابن المسيب فذكره.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মক্কা বিজয়ের দিন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আমি আল্লাহর কাছে মানত করেছি যে, যদি আপনি মক্কা বিজয় করেন, তাহলে আমি বায়তুল মাকদিসে (জেরুজালেম) গিয়ে দুই রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করব। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি এখানেই সালাত আদায় কর।" লোকটি আবার তার কথাটি বলল। তিনি বললেন, "তুমি এখানেই সালাত আদায় কর।" লোকটি পুনরায় তার কথা বলল। তখন তিনি বললেন, "তবে তোমার যা ইচ্ছা তাই কর।"









আল-জামি` আল-কামিল (6986)


6986 - عن ابن عباس أن رجلين اختصما إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الطالب البينة. فلم تكن له بينة. فاستحلف المطلوب. فحلف بالله الذي لا إله إِلَّا هو. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بلى قد فعلت، ولكن قد غفر لك بإخلاص قول لا إله إِلَّا الله.

قال أبو داود: يراد من هذا الحديث أنه لم يأمره بالكفارة.

صحيح: رواه أبو داود (3275) وأحمد (2280) والبيهقي (10/ 37) كلّهم من حديث حمّاد
ابن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن أبي يحيى، عن ابن عباس فذكره.

ورواه النسائيّ في الكبرى (6006) من طريق سفيان الثوري عن عطاء بن السائب ولفظه:"ادفع حقه، وستكفر عنك لا إله إِلَّا الله ما صنعت".

وعطاء بن السائب اختلط بآخره، فمن سمع منه قديمًا فحديثه صحيح كما قال أحمد وغيره. وشعبة وسفيان وحماد بن سلمة سمعوا منه قديمًا فحديثهم صحيح. نص على ذلك أحمد بن حنبل وابن معين وغيرهما.

استدل بهذه الأحاديث من قال: من نذر نذر معصية فلا يعصه، وليس عليه الكفارة. وهو مذهب مالك والشافعي وأبي ثور وغيرهم، لأن نذر المعصية لا ينعقد فلا كفارة عليه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দুজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচারপ্রার্থী হয়ে আসল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাদীকে প্রমাণ (বিনা) পেশ করতে বললেন। কিন্তু তার কাছে কোনো প্রমাণ ছিল না। ফলে তিনি বিবাদীকে কসম করতে বললেন। তখন সে সেই আল্লাহর নামে কসম করল যিনি ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘হ্যাঁ, তুমি অবশ্যই (দোষটি) করেছ। কিন্তু লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ বলার আন্তরিকতার কারণে তোমাকে ক্ষমা করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6987)


6987 - عن عقبة بن عامر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كفارة النذر كفارة اليمين".

صحيح: رواه مسلم في النذر (1645) من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن شماسة، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر، فذكره.

من قال في المعصية كفارة أخذ بهذا الحديث المطلق.

ورواه الترمذيّ (1528) من وجه آخر عن أبي بكر بن عباس قال: حَدَّثَنِي محمد مولى المغيرة بن شعبة، قال: حَدَّثَنِي كعب بن علقمة، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كفارة النذر إذا لم يسمّ كفارة اليمين".

وفيه محمد مولى المغيرة هو محمد بن يزيد بن أبي زياد الثقفي"مجهول" ومن طريقه رواه أيضًا أبو داود (3323) وليس فيه:"إذا لم يسمّ".

ورواه ابن ماجة (2127) من وجه آخر عن إسماعيل بن رافع، عن خالد بن يزيد، عن عقبة بن عامر وذكر فيه:"لم يسمّه".

وإسماعيل بن رافع الأنصاري المدني ضعيف الحفظ كما في التقريب.

ومعنى قوله:"إذا لم يسمّ" أي أن كفارة اليمين إنّما تجب فيما كان من النذروات غير مسمى. وحملوا هذا المقيد على المطلق الذي في حديث عقبة بن عامر عند مسلم.

قال النوويّ معلقًا على قوله:"كفارة النذر كفارة اليمين":"اختلف العلماء في المراد به. فحمله جمهور أصحابنا على نذر اللجاج، وهو أن يقول إنسان يريد الامتناع من كلام زيد مثلا: إن كلمت زيدًا مثلا فلله عليّ حجّة أو غيرها. فيكلمه. فهو بالخيار بين كفارة بيمين، وبين ما التزمه. هذا هو الصَّحيح في مذهبنا.

وقال: وحمله مالك وكثيرون أو الأكثرون على النذر المطلق كقوله: عليَّ نذر. وحمله أحمد
وبعض أصحابنا على نذر المعصية كمن نذر أن يشرب الخمر. وحمله جماعة من فقهاء أصحاب الحديث على جميع أنواع النذر. وقالوا: هو مخير في جميع النذورات بين الوفاء بما التزم وبين كفارة يمين". انتهى.




উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মানতের কাফফারা হল কসমের (শপথের) কাফফারা।"

সহীহ: এটি মুসলিম 'আন-নাযর' (মানত) অধ্যায়ে (হা/১৬৪৫) ইবনু ওয়াহাবের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাকে আমর ইবনুল হারিস বলেছেন, তিনি কা'ব ইবনু আলক্বামা থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু শুমা'সাহ থেকে, তিনি আবুল খায়ের থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।

যারা মানতের মাধ্যমে কৃত পাপের ক্ষেত্রে কাফফারার কথা বলেন, তারা এই মুত্বলাক (সাধারণ) হাদীস দ্বারা দলিল গ্রহণ করেছেন।

আর এটি তিরমিযীও (হা/১৫২৮) ভিন্ন সূত্রে আবূ বকর ইবনু আব্বাস থেকে বর্ণনা করেছেন, যিনি বলেন: আমাকে মুহাম্মাদ, মুগীরাহ ইবনু শু'বার আযাদকৃত গোলাম বলেছেন, তিনি বলেন: আমাকে কা'ব ইবনু আলক্বামা বলেছেন, তিনি আবুল খায়ের থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে মানতে কিছুর নাম উল্লেখ করা হয়নি, তার কাফফারা হল কসমের কাফফারা।"

এই সনদে মুহাম্মাদ, মুগীরাহ-এর আযাদকৃত গোলাম (মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ আস-সাকাফী) হলেন 'মাজহূল' (অজ্ঞাত)। আবূ দাউদও (হা/৩৩২৩) তার সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন, তবে তাতে "যদি সে নাম উল্লেখ না করে" ("إذا لم يسمّ") কথাটি নেই।

আর ইবনু মাজাহ (হা/২১২৭) এটিকে অন্য সূত্রে ইসমাঈল ইবনু রাফি' থেকে, তিনি খালিদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে "সে এর নাম উল্লেখ করেনি" ("لم يسمّه") কথাটি উল্লেখ আছে।

আর ইসমাঈল ইবনু রাফি' আল-আনসারী আল-মাদানী, যেমন 'আত-তাকরীব' গ্রন্থে উল্লেখ আছে, তিনি দুর্বল হাফেযাশক্তি সম্পন্ন।

তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাণী: "যদি সে নাম উল্লেখ না করে" ("إذا لم يسمّ") এর অর্থ হল: মানতের মধ্যে যা অনির্দিষ্ট (নাম উল্লেখ করা হয়নি), কেবল সেগুলির ক্ষেত্রেই কসমের কাফফারা ওয়াজিব হয়। এবং বিদ্বানগণ মুসলিমের সংকলিত উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের মুত্বলাক (সাধারণ) অংশটিকে এই মুকাইয়্যাদ (শর্তযুক্ত) অংশের ওপর প্রয়োগ করেছেন।

ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর বাণী: "মানতের কাফফারা হল কসমের কাফফারা" এর ওপর মন্তব্য করতে গিয়ে বলেন: "বিদ্বানগণ এর উদ্দেশ্য নিয়ে মতভেদ করেছেন। আমাদের (শাফি'ঈ) সাথীদের সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশ এটিকে 'নাযরে লাজাজ' (বিতর্কিত বা জোরের মানত) এর উপর প্রয়োগ করেছেন। যেমন, যদি কোনো ব্যক্তি যায়েদের সাথে কথা বলা থেকে বিরত থাকতে চায় এবং বলে: 'যদি আমি যায়েদের সাথে কথা বলি, তবে আমার উপর আল্লাহর জন্য হজ্ব অথবা অন্য কিছু ওয়াজিব।' এরপর সে কথা বলল। এক্ষেত্রে সে যা ওয়াজিব করেছে, তা পালন করা অথবা কসমের কাফফারা দেওয়া—উভয়ের মধ্যে সে স্বাধীন। আমাদের মাযহাবে এটিই বিশুদ্ধ মত।

তিনি (ইমাম নববী) আরও বলেন: আর ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) ও অনেকের বা বেশিরভাগের মতে, এটিকে 'নাযরে মুত্বলাক' (অনির্দিষ্ট মানত)—যেমন কেউ বলল: 'আমার উপর মানত রয়েছে'—এর ওপর প্রয়োগ করা হয়েছে। ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) এবং আমাদের কিছু সাথী এটিকে 'নাযরে মা'সিয়াহ্' (পাপের মানত)—যেমন কেউ মদ পান করার মানত করল—এর ওপর প্রয়োগ করেছেন। আর আহলে হাদীসের ফকীহদের একটি দল এটিকে সকল প্রকার মানতের ওপর প্রয়োগ করেছেন। তাঁরা বলেছেন: সকল প্রকার মানতের ক্ষেত্রে সে যা ওয়াজিব করেছে তা পূরণ করা অথবা কসমের কাফফারা দেওয়া—উভয়ের মধ্যে সে স্বাধীন।" সমাপ্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (6988)


6988 - عن ابن عباس أن أخت عقبة بن عامر نذرت أن تمشي إلى البيت. فأمرها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن تركب وتُهدي هديا.

صحيح: رواه أبو داود (3296)، وأحمد (2134) والحاكم (4/ 302) والبيهقي (10/ 79) والدارمي (2335) والطحاوي في مشكله (2151) من طرق عن همام بن يحيى، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره وإسناده صحيح.

وفي رواية: تهدي بدنة، وهي من زيادة الثقة، وفي الروايات التي لم تذكر الهدي والبدنة تحمل على هذا، فمن نذر أن يحج ماشيا فلم يقدر على ذلك فعليه أن يقدم بدنة.

وقد رواه هشام قال: حَدَّثَنَا قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بلغه أن أخت عقبة بن عامر نذرت أن تحج ماشيا، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن الله عز وجل عن نذرها غني فمرها فلتركب".

رواه الطحاويّ في مشكله (2135) وقال: وهشام أحفظ من همام، فكيف قبلتم زيادة همام عن قتادة عليه.

قال: كان جوابنا له في ذلك بتوفيق الله وعونه أنا قبلناها إذ كان همام لو روى حديثًا، فانفرد به كان مقبولًا منه، فكذلك زيادته في الحديث الذي ذكرت مقبولة منه، لا سيما وقد وافقه على ذلك مطر عن عكرمة". انتهى.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উকবাহ ইবনু আমেরের এক বোন বায়তুল্লাহ (কাবা)-এর দিকে হেঁটে যাওয়ার মান্নত করেছিলেন। অতঃপর নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আরোহণ করতে এবং একটি হাদঈ (কুরবানীর পশু) পেশ করতে আদেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6989)


6989 - عن عقبة بن عامر قال: قلت: يا رسول الله، إن أختي نذرت أن تمشي إلى البيت حافية غير مختمرة. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن الله لا يصنع بشقاء أختك شيئًا، فلتركب، ولتختمر، ولتصم ثلاثة أيام".

حسن: رواه أبو داود (3294)، والتِّرمذيّ (1544) والنسائي (3815) وابن ماجة (2134) والبيهقي (10/ 80) كلّهم من حديث عبيد الله بن زحر، عن أبي سعيد الرُّعينيّ، عن عبد الله بن مالك اليحصُبيّ، عن عقبة بن عامر فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".

قلت: فيه عبيد الله بن زحر ضعيف، ولكنه توبع.

رواه الإمام أحمد (17330) عن حسن، ثنا ابن لهيعة، ثنا بكر بن سوادة، عن أبي سعيد به.

وبكر بن سوادة ثقة فقيه، ولكن الراوي عنه ابن لهيعة سيء الحفظ.

ورواه الطحاويّ في مشكله (2150) من طريق عبد الرزّاق قال: أخبرنا ابن جريج، قال:
حَدَّثَنِي سعيد بن أبي أيوب، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكر الحديث مثله. وبمجموع هذه الطرق يكون الحديث حسنًا.

قال الترمذيّ:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وهو قول أحمد وإسحاق".

وقوله:"ولتصم ثلاثة أيام" زيادة، وهي ليست بمخالفة لما أطلق في حديث عقبة بن عامر، ثمّ لعلّه أمرها أولا أن تُهدي بدنة، فإن لم تستطع فتصوم ثلاثة أيام. جمعا بين الروايتين، إِلَّا أن الراوي اختصره فأوهم القارئ.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عقبة بن عامر يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّما النذر يمين، كفارتها كفارة اليمين".

رواه الإمام أحمد (17340) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، قال: حَدَّثَنَا ابن لهيعة، قال حَدَّثَنَا كعب بن علقمة، قال: سمعت عبد الرحمن بن شماسة يقول: أتينا أبا الخير فقال: سمعت عقبة بن عامر يقول: فذكر الحديث.

وابن لهيعة سيء الحفظ، ولكنه لا بأس به في الشواهد.




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার বোন মানত করেছে যে সে খালি পায়ে, মাথা না ঢেকে (ওড়না ছাড়া) বায়তুল্লাহ পর্যন্ত হেঁটে যাবে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “নিশ্চয় আল্লাহ তোমার বোনের এই কষ্টকর কাজে কোনো কিছু গ্রহণ করেন না। অতএব সে যেন সাওয়ার হয়, মাথা ঢাকে (ওড়না পরিধান করে) এবং তিন দিন সাওম পালন করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6990)


6990 - عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"النذر نذران، فما كان الله فكفارته الوفاء، وما كان للشيطان فلا وفاء فيه، وعليه كفارة يمين".

حسن: رواه ابن الجارود في المنتقي (935) وعنه البيهقيّ (10/ 72) عن محمد بن يحيى، ثنا محمد بن موسى بن أيمن، ثنا خطاب، ثنا عبد الكريم، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل خطاب وهو ابن القاسم الحراني فإنه مختلف فيه. فوثقه ابن معين وأبو زرعة، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه. وقال أحمد بن حنبل:"لا بأس به ولكن قال البرذعي: سمعت أبا زرعة ذكر الخطّاب بن القاسم الحراني فقال:"منكر الحديث".

وقيل: إنه اختلط وتغير قبل موته.

والتوثيق المطلق من ابن معين وأبي زرعة يدل على أنه لا تأثير لاختلاطه، لأنه كان قبل موته، والغالب من سمع منه كان قبل ذلك فإسناده لا ينزل عن درجة الحسن.

ويؤيده فتوى ابن عباس نفسه كما رواه ابن أبي شيبة (12544) عن وكيع، عن شعبة، عن أبي جمرة الضبعي أن رجلًا من بني سليم نذر أن يزمّ أنفه، فقال ابن عباس:"النذر نذران. فما كان لله فيه الوفاء، وما كان للشيطان ففيه الكفارة، أطلق زمامك، كفّر عن يمينك.

وفي الباب ما رُوي عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر في معصية، وكفارته كفارة يمين".

رواه النسائيّ (3840) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن الزُّبير الحنظليّ، عن أبيه، عن عمران بن حصين فذكره.
قال النسائيّ: محمد بن الزُّبير ضعيف، لا يقوم بمثله حجّة، وقد اختلف عليه في هذا الحديث". ثمّ قال: وقيل: إن الزُّبير لم يسمع هذا الحديث من عمران بن حصين.

ثمّ رواه هو، وأحمد (19888) والبيهقي (10/ 70) وغيرهم فأدخلوا بين الزُّبير وعمران بن حصين رجلًا.

قال البيهقيّ: الزُّبير لم يسمع من عمران، وقد اختلف في هذا الحديث اختلافا كثيرًا كما هو في حديث عائشة الآتي.

وأمّا حديث عائشة فروي من وجهين:

الأوّل: ما رواه أبو داود (3290) والتِّرمذيّ (1524) والنسائي (3834) وابن ماجة (2125) وأحمد (26098) والطحاوي في مشكله (2158) والبيهقي (10/ 69) كلّهم من طرق عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر في معصية الله، وكفارته كفارة اليمين" وفي رواية عند النسائيّ (3838) عن ابن شهاب، قال: حَدَّثَنَا أبو سلمة، عن عائشة إِلَّا أن النسائيّ أعلّه بما يأتي.

قال أبو داود: سمعت أحمد بن شبويه يقول: قال ابن المبارك يعني في هذا الحديث: حدَّث أبو سلمة. فدلّ ذلك على أن الزهري لم يسمعه من أبي سلمة. وقال أحمد بن محمد:"وتصديق ذلك ما حَدَّثَنَا أيوب يعني ابن سليمان".

قال أبو داود:"سمعت أحمد بن حنبل يقول: أفسدوا علينا هذا الحديث. قيل له: وصحَّ إفساده عندك؟ وهل رواه غير ابن أبي أويس؟ ! قال: أيوب كان أمثل منه يعني أيوب بن سليمان بن بلال. وقد رواه أيوب". انتهى.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث لا يصح، لأن الزهري لم يسمع هذا الحديث من أبي سلمة.

وقال: سألت محمدًا يقول: روي غير واحد منهم: موسى بن عقبة، وابن أبي عتيق، عن الزّهريّ، عن سليمان بن أرقم، عن يحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة، عن عائشة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. قال محمد:"والحديث هو هذا".

ثمّ رواه الترمذيّ وأبو داود والبغوي في شرح السنة (2447) وغيرهم من حديث موسى بن عقبة وعبد الله بن أبي عتيق بإسناده كما ذكره البخاريّ. ثمّ قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب، وهو أصح من حديث أبي صفوان، عن يونس، وأبو صفوان هو مكي، واسمه عبد الله بن سعيد بن عبد الملك بن مروان. وقد روى عنه الحميدي وغير واحد من أجلة أهل الحديث.

وقال البغوي:"هذا حديث غريب".

وقال الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن (4/ 373):"هذا حديث مختلف في إسناده ومتنه، كما ذكرنا، ولا تقوم الحجة بأمثال ذلك".
قلت: وسليمان بن أرقم ضعيف باتفاق أهل العلم.

قال النسائيّ:"سليمان بن أرقم متروك الحديث. والله أعلم. خالفه غير واحد من أصحاب يحيى بن أبي كثير في هذا الحديث".

ثمّ ساقه من طرف عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن الزُّبير الحنظليّ، عن أبيه، عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر في معصية وكفارته كفارة يمين".

ثمّ قال النسائيّ: محمد بن الزُّبير ضعيف لا يقوم بمثله حجة، وقد اختلف عليه في هذا الحديث. ثمّ ساقه بلفظ:"ولا نذر في غضب، وكفارته كفارة اليمين"، وقال: وقيل: إن الزُّبير لم يسمع هذا الحديث من عمران بن حصين ثمّ ساق بإسناده عن محمد بن الزُّبير، عن أبيه، عن رجل من أهل البصرة قال: صحبت عمران بن حصين قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"النذر نذران، فما كان من نذر في طاعة الله فذلك لله وفيه الوفاء، وما كان من نذر في معصية الله فذلك للشيطان، ولا وفاء فيه، ويكفّره ما يكفر اليمين".

ورواه أيضًا عن محمد بن الزُّبير، عن الحسن، عن عمران بن حصين، قال فذكر مرفوعًا:"لا نذر في معصية ولا غضب، وكفارته كفارة اليمين" ورواه أيضًا بلفظ آخر:"لا نذر في المعصية، وكفارته كفارة اليمين" وقال: خالفه منصور بن زاذان في لفظه. وساقه عن منصور، عن الحسن، عن عمران بن حصين قال: قال - يعني النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا نذر لابن آدم فيما لا يملك، ولا في معصية الله عز وجل" وقال: وخالفه عليّ بن زيد فرواه عن الحسن، عن عبد الرحمن بن سمرة ثمّ ساقه عن عليّ بن زيد بن جدعان، عن الحسن، عن عبد الرحمن بن سمرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا نذر في معصية، ولا فيما لا يملك ابن آدم" قال النسائيّ:"عليّ بن زيد ضعيف، وهذا الحديث خطأ، والصواب عمران بن حصين. وقد روي هذا الحديث عن عمران بن حصين من وجه آخر. ثمّ ساقه عن أيوب قال: حَدَّثَنَا أبو قلابة، عن عمه، عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر في معصية، ولا فيما لا يملك ابن آدم" لقد أظهر النسائيّ علل هذا الحديث من اضطراب في الإسناد، وضعف في الرواة، وانقطاع في الإسناد، واختلاف في الألفاظ. وإن كان ظاهره السلامة. ولذا قال الحافظ في التلخيص (4/ 175):"إسناده صحيح إِلَّا أنه معلول. رواه أحمد وأصحاب السنن والبيهقي من رواية الزّهريّ، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، وهو منقطع، لم يسمعه الزهري من أبي سلمة". وقال الطحاويّ في مشكله (2158) هذا الحديث شاذ.

وقال: وجدناه فاسد الإسناد، ثمّ ساقه من طريق سليمان بن أرقم وقال: وسليمان بن أرقم ليس ممن يقبل أهل الإسناد حديثه". انتهى.

والوجه الثاني: هو ما رواه الطحاويّ في مشكله (1514، 2144) عن محمد بن عليّ بن داود البغداديّ، قال: حَدَّثَنَا سعيد بن سليمان الواسطيّ، قال: حَدَّثَنَا حفص بن غياث، عن عبيد الله بن
عمر، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من نذر أن يطيع الله عز وجل فليطعه، ومن نذر أن يعصي الله فلا يعصه".

قال حفص: وسمعت ابن محيريز وهو عند عبيد الله فذكره عن القاسم، عن عائشة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقال:"يكفّر عن يمينه".

قال الطحاويّ في الموضع الأوّل:"هذا الحديث في الحقيقة لم يسمعه عبيد الله بن عمر من القاسم، وإنما أخذه طلحة بن عبد الملك الأيليّ، عن القاسم، عن عائشة".

وقال في الموضع الثاني:"فتأملنا إسناد هذا الحديث فوجدنا حفص بن غياث حدّث به عن عبيد الله بن عمر، عن القاسم، وكان ظاهره سماع عبيد الله إياه من القاسم، فكشفنا ذلك، فوجدناه لم يسمعه منه، وإنما أخذه عن غيره". انتهى كلامه.

ونقل الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (4/ 175) عن ابن القطان قوله:"عندي شك في رفع هذه الزيادة". والله تعالى أعلم.

رُوي عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من نذر نذرًا لم يسمه فكفارته كفارة يمين، ومن نذر نذرًا في معصية فكفارته كفارة يمين، ومن نذر نذرًا لا يطيقه فكفارته كفارة يمين، ومن نذر نذرًا أطاقه فليف به".

رواه أبو داود (3322) وعنه البيهقيّ (10/ 45) عن جعفر بن مسافر التنيسيّ، حَدَّثَنَا ابن أبي فُديك، قال: أخبرني طلحة بن يحيى الأنصاريّ، عن عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن بُكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن كريب، عن ابن عباس فذكره.

قال أبو داود:"روى هذا الحديث وكيع وغيره عن عبد الله بن سعيد بن أبي هند أوقفوه على ابن عباس".

قلت: الموقوف هو الصَّحيح لأن طلحة بن يحيى الأنصاري لا يُقبل مخالفته لوكيع ومن معه ولكن قال البيهقيّ بعد نقل كلام أبي داود:"وقد رُوي عن غيره عن عبد الله كذلك مرفوعًا.

قلتُ: وقد رواه ابن ماجة (2182) من وجه آخر عن عبد الملك بن محمد الصنعانيّ، قال: حَدَّثَنَا خارجة بن مصعب، عن بكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن كريب، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: فذكر مثله إِلَّا أنه لم يذكر فيه:"من نذر نذرًا في معصية فكفارته كفارة يمين" وفيه خارجة بن مصعب بن خارجة السرخسي ضعيف باتفاق أهل العلم مع التدليس. ولعل المقصود من قول البيهقيّ:"ورُوي من وجه آخر غير قوي عن بكير بن الأشجّ" هو هذا الطريق.

فالصواب أنه من قول ابن عباس، وكذلك ذكره البغوي في شرح السنة (10/ 35) من قول ابن عباس وقال: ورواه بعضهم مرفوعًا.

تمسك بهذه الأحاديث والآثار من قال: من نذر نذر معصية فلا يعصه، وعليه كفارة يمين. قال
به جابر بن عبد الله وابن عباس وابن مسعود. وإليه ذهب أبو حنيفة وأحمد.

قال ابن القيم:"قال الموجبون للكفارة في نذر المعصية: هذه الآثار فد تعددتْ طرقُها، ورواها ثقات، وحديث عائشة احتج به الإمام أحمد وإسحاق بن راهويه، وإن كان الزهري لم يسمعه من أبي سلمة فإن له شواهد تقويه. رواه عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سوي عائشة: جابر وعمران بن حصين وعبد الله بن عمر قاله الترمذيّ". انتهى.

قلت: لا خلاف بين أهل العلم أن من قال: إن شفى الله مريضي من علته، أو قدم غائبي، وما أشبه ذلك فعلي من الصوم كذا، ومن الصّلاة كذا، ومن الصّدقة كذا، فكان عليه الوفاء بنذره إن كان مقدورًا عليه، فإن لم يكن مقدوا عليه فالظاهر عليه الكفارة كفارة اليمين.

وقد قيل: لم يأت ذكر الكفارة في الأحاديث التي ذكرت في الباب الذي قبل هذا. فقال ابن قدامة:"ولكن جاء ذكرها في أحاديثنا. المغني (13/ 626).

وقال:"فإن فعل ما نذره من المعصية فلا كفارة عليه. كما لو حلف ليفعلنَّ معصية ففعلها، ويحتمل أن تلزمه الكفارة حتما، لأن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عين فيه الكفارة، ونهى عن فعل المعصية". انتهى.

مثل أن ينذر أنه يقف في الشّمس ثلاث ساعات وهي معصية، ولكنه وقف في الشّمس ثلاث ساعات فلا كفارة عليه بالاتفاق. وإن لم يقف فعليه الكفارة كما قال الإمام أحمد وغيره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানত দুই প্রকার। যা আল্লাহর জন্য (করা হয়), তার কাফফারা হলো তা পূরণ করা। আর যা শয়তানের জন্য (অর্থাৎ গুনাহের উদ্দেশ্যে), তা পূরণ করা যাবে না এবং তার উপর কসমের কাফফারা ওয়াজিব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6991)


6991 - عن ثابت بن الضَّحَّاك أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس على رجل نذر فيما لا يملك".

متفق عليه: رواه مسلم في الأيمان (110 - 176) واللّفظ له، والبخاري في الأدب (6047) كلاهما من حديث يحيى بن أبي كثير، عن أبي قلابة، أن ثابت بن الضَّحَّاك وكان من أصحاب الشجرة حدث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث بطوله. إِلَّا أن البخاريّ لم يذكر:"ليس على رجل نذر فيما لا يملك".

وقوله:"فيما لا يملك" أي لا ينعقد نذره أصلًا.




সাবেত ইবনুয যাহ্হাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘এমন বিষয়ে কোনো ব্যক্তির জন্য মানত (নযর) নেই, যার ওপর তার মালিকানা নেই।’









আল-জামি` আল-কামিল (6992)


6992 - عن عمران بن حصين قال: كانت ثقيف حلفاء لبني عقيل. فأسرتْ ثقيفُ رجلين من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأسر أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا من بني عقيل. وأصابوا معه العضباء، فأتى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في الوثاق. قال: يا محمد! فأتاه. فقال:"ما شأنك؟" فقال: بم أخذتني؟ وبم أخذت سابقة الحاج؟ فقال:"إعظامًا لذلك أخذتك بجريرة حلفائك ثقيفَ" ثمّ انصرف عنه فناداه: فقال: يا محمد! يا محمد! وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم رحيمًا رقيقًا. فرجع إليه فقال:"ما شأنك؟" قال: إني مسلم. قال:"لو قلتها وأنت تملك أمرك، أفلحت كل الفلاح" ثمّ انصرف فناداه،
فقال: يا محمد! يا محمد! فأتاه فقال:"ما شأنك؟" قال: إني جائع فأطعمني. وظمآن فأسقني. قال:"هذه حاجتك" ففُدي بالرجلين. قال: وأُسرتْ امرأةٌ من الأنصار. وأصيبت العضباءُ. فكانت المرأةُ في الوثاق. وكان القوم يريحون نعمَهم بين يدي بيوتهم. فانفلتتْ ذات ليلةٍ من الوثاق فأتت الإبل. فجعلت إذا دنتْ من البعير رغا فتركهـ. حتَّى تنتهي إلى العضباء. فلم ترغ. قال: وناقة منوّقة. فقعدت في عجزها ثمّ زجرتْها فانطلقت. ونذروا بها فطلبوها فأعجزتْهم قال: ونذرت لله، إن نجّاها الله عليها لتنحرنَّها، فلمّا قدمت المدينة رآها الناس، فقالوا: العضباء، ناقة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنها نذرتْ، إن نجاها الله عليها لتنحرنها، فأتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكروا ذلك له، فقال:"سبحان الله! بئسما جزتْها، نذرت لله إن نجاها الله عليها لتنحرنها، لا وفاء في معصية، ولا فيما لا يملك العبد".

وفي رواية:"لا نذر في معصية الله".

صحيح: رواه مسلم في النذر (1641) من طرق عن إسماعيل بن إبراهيم، حَدَّثَنَا أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلب، عن عمران بن حصين فذكره.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাকীফ গোত্র বনী উকাইলের মিত্র ছিল। সাকীফ গোত্র রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুইজন সাহাবীকে বন্দী করল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ বনী উকাইল গোত্রের একজনকে বন্দী করলেন এবং তার সাথে 'আল-আদবা' (নামের উটনীটিও) পেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন, যখন সে শিকলে বাঁধা ছিল। সে বলল: "হে মুহাম্মাদ!" তিনি তার কাছে এলেন এবং বললেন, "তোমার কী ব্যাপার?" সে বলল: আপনি কেন আমাকে বন্দী করলেন? আর কেনই বা হাজ্জের দ্রুতগামী উটনীটিকে (আল-আদবাকে) নিলেন? তিনি বললেন: "আমি এটা (অর্থাৎ উটনী) তোমার মিত্র সাকীফ গোত্রের অপরাধের জন্য নিয়েছি।"

এরপর তিনি তার কাছ থেকে চলে গেলেন। তখন সে ডাকল: "হে মুহাম্মাদ! হে মুহাম্মাদ!" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন অত্যন্ত দয়ালু ও কোমল হৃদয়ের। তিনি তার কাছে ফিরে এসে বললেন: "তোমার কী ব্যাপার?" সে বলল: আমি তো মুসলিম। তিনি বললেন: "যদি তুমি এই কথা বলতে যখন তুমি তোমার (নিজের) অবস্থার নিয়ন্ত্রণ করতে পারতে (অর্থাৎ বন্দী হওয়ার আগে), তবে তুমি পরিপূর্ণ সফলতা লাভ করতে।" এরপর তিনি চলে গেলেন। তখন সে আবার ডাকল, সে বলল: "হে মুহাম্মাদ! হে মুহাম্মাদ!" তিনি তার কাছে এলেন এবং বললেন: "তোমার কী ব্যাপার?" সে বলল: আমি ক্ষুধার্ত, তাই আমাকে খাবার দিন। আমি তৃষ্ণার্ত, তাই আমাকে পানি পান করান। তিনি বললেন: "এই হল তোমার প্রয়োজন।" এরপর তাকে (ঐ) দুইজন সাহাবীর বিনিময়ে মুক্তি দেওয়া হলো।

(ইমরান ইবনে হুসাইন) বলেন: (অন্য এক সময়) আনসারী একজন মহিলাকে বন্দী করা হলো এবং (উটনী) আল-আদবাও হাতছাড়া হয়ে গেল। মহিলাটি শিকলে বাঁধা ছিল। আর লোকেরা তাদের গবাদি পশুকে তাদের ঘরের সামনে আরামের জন্য বেঁধে রাখত। এক রাতে সে শিকল থেকে মুক্ত হয়ে গেল এবং উটগুলোর কাছে এলো। সে যখনই কোনো উটের কাছাকাছি যেত, উটটি চিৎকার করত, তাই সে সেটিকে ছেড়ে দিত। এভাবে সে আল-আদবা উটনীটির কাছে পৌঁছল। কিন্তু সেটি কোনো শব্দ করল না।

(বর্ণনাকারী) বলেন, সেটি ছিল প্রশিক্ষণপ্রাপ্ত উটনী। সে সেটির পিঠে উঠে বসল এবং সেটিকে হাঁকালো, ফলে সেটি চলতে শুরু করল। তারা বিষয়টি টের পেয়ে তাকে খুঁজতে শুরু করল, কিন্তু সে তাদের নাগালের বাইরে চলে গেল। তিনি বলেন: (মহিলাটি) আল্লাহর নামে মানত করল যে, যদি আল্লাহ তাকে এর উপর আরোহণ করে মুক্তি দেন, তবে সে এটিকে কুরবানি করবে। যখন সে মদীনায় পৌঁছল, লোকেরা তাকে দেখে বলল, এ তো আল-আদবা, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটনী। সে বলল: সে মানত করেছে যে, যদি আল্লাহ তাকে এর উপর চড়ে মুক্তি দেন, তবে সেটিকে কুরবানি করবে। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাকে বিষয়টি জানাল। তিনি বললেন: "সুবহানাল্লাহ! এর প্রতি সে কী নিকৃষ্ট প্রতিদান দিয়েছে! সে আল্লাহর নামে মানত করেছে যে, যদি আল্লাহ এর উপর চড়ে তাকে মুক্তি দেন, তবে সে এটিকে কুরবানি করবে। আল্লাহর অবাধ্যতার ক্ষেত্রে কোনো মানত পূরণ করা বৈধ নয়, আর যে বস্তুর মালিকানা বান্দার নেই, সে বিষয়েও (মানত পূরণ করা বৈধ নয়)।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আল্লাহর অবাধ্যতামূলক কাজে কোনো মানত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (6993)


6993 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر، ولا يمين فيما لا يملك ابن آدم، في معصية الله، ولا في قطيعة رحم، ومن حلف على يمين فرأى غيرها خيرًا منها فلْيدعها، وليأت الذي هو خير، فإن تركها كفارتها".

حسن: رواه أبو داود (3274) والنسائي (3792) وأحمد (6990) والبيهقي (10/ 33) كلّهم من حديث عبيد الله بن الأخنس، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. ورواه ابن ماجة (2111) من وجه آخر عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. إِلَّا أن النسائيّ لم يذكر من قوله: ومن حلف على يمين … فإن تركها كفارتها".

فإن قوله:"فإن تركها كفارتها" مخالف للأحاديث الصحيحة التي توجب الكفارة في الحنث ففي أقل التقدير إنها شاذة.

وقد قال أبو داود عقبه: الأحاديث كلها عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: وليكفر عن يمينه، وهي الصحاح، إِلَّا فيما لا يعبأ به. قال أبو داود:"قلت لأحمد: روي يحيى بن سعيد، عن يحيى بن عبد الله فقال: تركهـ بعد ذلك، وكان أهلا لذلك. قال أحمد:"أحاديثه مناكير، وأبوه لا يعرف". انتهى.

وحديث يحيى بن عبيد الله هو ما رواه البيهقيّ (10/ 34) من طريقه عنه، عن أبيه، عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: من حلف على يمين فرأى غيرها خيرًا منها فأتي الذي هو خير، وهو كفارته".

ويحيى بن عبيد الله بن عبد الله بن موهب ضعيف جدًّا. وفي معناه روي أيضًا عن ابن عباس
وأبي سعيد الخدريّ وعائشة بأسانيد ضعيفة.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এমন কোনো বিষয়ে মানত (নযর) নেই এবং শপথও (ইয়ামিন) নেই, যা আদম সন্তান (মানুষ) অধিকার করে না, কিংবা আল্লাহর অবাধ্যতার ক্ষেত্রে, অথবা আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করার ক্ষেত্রে। আর যে ব্যক্তি কোনো বিষয়ে শপথ করল, অতঃপর সে তা থেকে উত্তম কিছু দেখতে পেল, সে যেন তা পরিত্যাগ করে, এবং যা উত্তম তাই যেন করে। কারণ তার তা পরিত্যাগ করাই হলো তার কাফফারা।”









আল-জামি` আল-কামিল (6994)


6994 - عن سعيد بن المسيب أن أخوين من الأنصار كان بينهما ميراث. فسأل أحدهما صاحبة القسمة، فقال: لئن عدْت تسألني القسمة لن أكلمك أبدًا. وكل مالٍ لي في رتاج الكعبة. فقال عمر بن الخطّاب: إن الكعبة الغنيّة عن مالك. كفّر عن يمينك، وكلم أخاك، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يمين عليك، ولا نذر في معصية، ولا في قطيعة رحم، ولا فيما لا تملك".

حسن: رواه أبو داود (3272) وابن حبَّان (4355) والحاكم (4/ 300) والبيهقي (10/ 33) كلّهم من طريق يزيد بن زريع، حَدَّثَنَا خبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن المسيب فذكره. قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.

وعن عائشة أنها قالت: من قال: مالي في رتاج الكعبة، فإنما كفارته يمين.

رواه مالك في النذور والأيمان (20) عن أيوب بن موسى، عن منصور بن عبد الرحمن الحجيّ، عن أمه، عن عائشة فذكرته.

وأصل الرتاج: الباب. من ذكر هذا لا يريد به نفس الباب، إنّما يريد به أن يكون ماله هديا إلى الكعبة، فيضعه منها حيث نواه وأراده.

وإنما يلزمه كفارة اليمين إذا التزم على وجه الغضب. انظر شرح السنة (10/ 36).




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব থেকে বর্ণিত, আনসারদের দুই ভাইয়ের মধ্যে মীরাস (উত্তরাধিকার) সংক্রান্ত বিষয় ছিল। তাদের একজন তার সঙ্গীর কাছে মীরাসের বন্টন চাইল। তখন অপরজন বলল: যদি তুমি আবার আমার কাছে বন্টন চাইতে আসো, তবে আমি তোমার সাথে আর কখনোই কথা বলব না। আর আমার সমস্ত সম্পদ কা'বার 'রতাজ' (দরজা)-এর জন্য উৎসর্গীকৃত।

তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নিশ্চয়ই কা'বা তোমার সম্পদ থেকে মুখাপেক্ষীহীন। তুমি তোমার কসমের কাফফারা দাও এবং তোমার ভাইয়ের সাথে কথা বলো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কোনো পাপকর্মে, আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার ব্যাপারে, অথবা তোমার মালিকানাধীন নয় এমন কোনো বিষয়ে কোনো কসম (শপথ) নেই এবং কোনো মানতও নেই।"

আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বলেছেন: যে ব্যক্তি বলে, আমার মাল কা'বার 'রতাজ'-এর জন্য, তার কাফফারা হলো কসমের কাফফারা। 'রতাজ'-এর মূল অর্থ হলো দরজা। যে ব্যক্তি এটি উল্লেখ করে, সে সরাসরি দরজাকে বোঝায় না, বরং এর দ্বারা বোঝায় যে তার সম্পদ কা'বার জন্য হাদিয়া হিসেবে উৎসর্গীকৃত হবে। আর যখন কেউ রাগের বশে এই ধরনের বাধ্যবাধকতা গ্রহণ করে, তখন কেবল কসমের কাফফারা আবশ্যক হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6995)


6995 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نذر إِلَّا فيما ابتُغي به وجه الله عز وجل، ولا يمين في قطيعة رحم".

حسن: رواه أبو داود (2373) وأحمد (6732) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن الحارث، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو فإنه حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন বিষয়ে কোনো মানত (শপথ) নেই, যা দ্বারা মহান আল্লাহ তা'আলার সন্তুষ্টি অন্বেষণ করা হয় না। আর আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার বিষয়ে কোনো কসম নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (6996)


6996 - عن أنس بن مالك أنه سئل: هل غزوت مع نبي الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، غزوت معه يوم حنين، فخرج المشركون بكثرة، فحملوا علينا، حتَّى رأينا خيلنا وراء ظهورنا، وفي المشركين رجل يحمل علينا، فيدقّنا ويحطمنا، فلمّا رأى ذلك نبي الله صلى الله عليه وسلم نزل فهزمهم الله فولوا، فقام نبي الله حين رأى الفتح، فجعل يجاء بهم أساري رجلًا
رجلًا، فيبايعونه على الإسلام، فقال رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن عليّ نذرًا لئن جيء بالرجل الذي كان منذر اليوم يحطمنا لأضربنّ عنقه. قال: فسكت نبي الله صلى الله عليه وسلم، وجيء بالرجل، فلمّا رأى نبي الله، قال: يا نبي الله، تبت إلى الله، يا نبي الله تبت إلى الله. قال: فأمسك نبي الله صلى الله عليه وسلم، فلم يبايعه ليوفي الآخر نذره، قال: فجعل ينظر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ليأمره بقتله، وجعل يهاب نبي الله صلى الله عليه وسلم أن يقتله، فلمّا رأى نبي الله صلى الله عليه وسلم أنه لا يصنع شيئًا بايعه. فقال: يا نبي الله نذري؟ قال:"لم أمسك عنه منذ اليوم إِلَّا لتوافي نذرك" فقال: يا نبي الله! ألا أوْمضت إليَّ؟ فقال:"إنه ليس لنبي أن يُومض".

صحيح: رواه أبو داود (3194) وأحمد (12529) والطحاوي في شرحه (1513) كلّهم من حديث عبد الوارث بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا أبو غالب الباهليّ، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: আপনি কি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কোনো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি তাঁর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি। তখন মুশরিকরা বিপুল সংখ্যায় বেরিয়ে এলো এবং আমাদের উপর আক্রমণ চালাল, এমনকি আমরা আমাদের ঘোড়াগুলোকে আমাদের পিছনে দেখতে পেলাম (অর্থাৎ পিছু হটতে বাধ্য হলাম)। আর মুশরিকদের মধ্যে একজন লোক ছিল, যে আমাদের উপর আক্রমণ করত এবং আমাদের ছিন্নভিন্ন করে দিত। আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তা দেখলেন, তখন তিনি (সওয়ারী থেকে) অবতরণ করলেন। অতঃপর আল্লাহ তাদেরকে পরাজিত করলেন এবং তারা পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পালিয়ে গেল। আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বিজয় দেখলেন, তখন তিনি দাঁড়ালেন। এরপর বন্দীদেরকে এক এক করে আনা হচ্ছিল এবং তারা ইসলামের উপর তাঁর হাতে বাইআত করছিল।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্য থেকে একজন লোক বললেন: আমার উপর একটি মানত (শপথ) রয়েছে, যদি ঐ লোকটিকে আনা হয়, যে আজ আমাদের আক্রমণ করে ছিন্নভিন্ন করছিল, তাহলে আমি অবশ্যই তার গর্দান উড়িয়ে দেব। তিনি বললেন: তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চুপ থাকলেন। অতঃপর ঐ লোকটিকে আনা হলো। যখন সে আল্লাহর নবীকে দেখল, তখন বলল: হে আল্লাহর নবী! আমি আল্লাহর কাছে তওবা করছি, হে আল্লাহর নবী! আমি আল্লাহর কাছে তওবা করছি।

তিনি (আনাস) বললেন: তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে থামিয়ে রাখলেন (বাইআত গ্রহণ করলেন না), যাতে অন্য লোকটি তার মানত পূর্ণ করতে পারে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকটিকে হত্যার নির্দেশ দেওয়ার জন্য (মানতকারীর দিকে) তাকাতে লাগলেন, কিন্তু আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপস্থিতির কারণে সে (মানতকারী সাহাবী) তাকে হত্যা করতে ভয় পাচ্ছিল। যখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখলেন যে সে (মানতকারী) কিছুই করছে না, তখন তিনি তাকে বাইআত করালেন।

তখন সে (মানতকারী সাহাবী) বলল: হে আল্লাহর নবী! আমার মানতের কী হবে? তিনি বললেন: "আমি আজকের দিনে তাকে তোমার কাছ থেকে কেবল এই জন্যই থামিয়ে রেখেছিলাম যাতে তুমি তোমার মানত পূর্ণ করতে পারো।" তখন সে বলল: হে আল্লাহর নবী! আপনি কি আমাকে ইশারা করে দেননি? তিনি বললেন: "কোনো নবীর জন্য ইশারা করা উচিত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6997)


6997 - عن * *




৬৯৯৭ - থেকে ** **









আল-জামি` আল-কামিল (6998)


6998 - عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ما العمل في أيام العشر أفضل من العمل في هذه" قالوا: ولا الجهاد؟ وقال:"ولا الجهاد، إِلَّا رجل خرج يخاطر بنفسه وماله فلم يرجع بشيء.

صحيح: رواه البخاريّ في العيدين (969) عن محمد بن عرعرة، قال: حَدَّثَنَا شعبة، عن سليمان، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وفي معناه أحاديث أخرى، وهي مخرجة في مواضعها.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এই দশ দিনের (যিলহাজ্জের প্রথম দশক) আমলের চেয়ে উত্তম কোনো আমল নেই।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, জিহাদও কি নয়? তিনি বললেন: "জিহাদও নয়। তবে সেই ব্যক্তি (এর ব্যতিক্রম), যে তার জান ও মাল নিয়ে (আল্লাহর পথে) বেরিয়ে যায় এবং কোনো কিছু নিয়েই ফিরে আসে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6999)


6999 - عن البراء بن عازب قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: إن أول ما نبدأ به في يومنا هذا نصلي، ثمّ نرجع فننحر، من فعله فقد أصاب سنتنا" الحديث.

وفي رواية:"وأصاب سنة المسلمين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5545)، ومسلم في الأضاحي (7: 1961) كلاهما من طريق محمد بن بشار - وزاد مسلم: ومحمد بن المثي - حَدَّثَنَا محمد بن جعفر (غندر)، حَدَّثَنَا شعبة، عن زُبَيْد الإِيَاميّ، عن الشعبيّ، عن البراء بن عازب فذكره.

والرّواية الثانية للبخاريّ (5556)، ومسلم (4: 1961) كلاهما من طريق خالد بن عبد الله، عن مطرف، عن عامر الشعبي به.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমাদের এই দিনে আমরা প্রথম যে কাজটি শুরু করব, তা হলো সালাত (নামাজ) আদায় করা। এরপর আমরা ফিরে আসব এবং কুরবানি করব। যে ব্যক্তি এমন করবে, সে আমাদের সুন্নাত (পদ্ধতি) অনুসরণ করল।" অন্য এক বর্ণনায় আছে: "এবং সে মুসলমানদের সুন্নাত অনুসরণ করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (7000)


7000 - عن أنس بن مالك قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من ذبح قبل الصّلاة فإنما ذبح لنفسه، ومن ذبح بعد الصّلاة فقد تم نسكُه، وأصاب سنة المسلمين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5546) عن مسدد، حَدَّثَنَا إسماعيل، عن أيوب، عن محمد (هو ابن سيرين) عن أنس فذكره.

ورواه مسلم في الأضاحي (10: 1962) من طرق عن إسماعيل بن إبراهيم (هو ابن علية) به مطوَّلًا بغير هذا اللّفظ.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের পূর্বে যবেহ করল, সে কেবল নিজের জন্যই যবেহ করল। আর যে ব্যক্তি সালাতের পরে যবেহ করল, তার কুরবানী পূর্ণ হলো, এবং সে মুসলমানদের সুন্নাত (পদ্ধতি) অবলম্বন করল।"