হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7008)


7008 - عن صفية بنت شيبة قالت: أخبرتني امرأة من بني سُليم ولّدت عامةَ أهل دارنا: أرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى الله عليه وسلم إلى عثمان بن طلحة، وقال مرةً: إنها سألت عثمان بن طلحة: لمَ دعاك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم؟ قال:"إنِّي كنت رأيت قرْني الكبش حين دخلتُ البيت، فنسيتُ أن آمرك أن تخمِّرهما، فخمِّرهما فإنه لا ينبغي أن يكون في البيت شيء يشغل المصلي". قال سفيان:"لم تزل قرنا الكبش في البيت حتَّى احترق البيتُ فاحترقا".

صحيح: رواه أبو داود (2030)، وأحمد (16637) - والسياق له - من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، حَدَّثَنِي منصور، عن خاله مسافع، عن صفية بنت شيبة فذكرته.

وإسناده صحيح، منصور هو ابن عبد الرحمن بن طلحة بن الحارث العبدري الحجبي المكيّ، وهو ابن صفية بنت شيبة، ومسافع هو ابن عبد الله بن شيبة بن عثمان الحجبي المكي.




সফিয়্যাহ বিনতে শাইবাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে বনু সুলাইম গোত্রের একজন মহিলা, যিনি আমাদের পরিবারের অধিকাংশের জন্মদাত্রী, তিনি জানিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমান ইবনে তালহার নিকট (দূত) প্রেরণ করেন। (বর্ণনাকারী) একবার বলেছেন: ঐ মহিলা উসমান ইবনে তালহাকে জিজ্ঞেস করেছিলেন, "নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে কেন ডেকেছিলেন?" তিনি বললেন: "(রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:) আমি ঘরে (কা'বায়) প্রবেশ করার সময় মেষের শিং দুটি দেখেছিলাম, কিন্তু আমি তোমাকে সে দুটি ঢেকে রাখার নির্দেশ দিতে ভুলে গিয়েছিলাম। অতএব, তুমি সেগুলো ঢেকে দাও। কারণ, ঘরে এমন কিছু থাকা উচিত নয় যা মুসল্লিকে (নামাযীকে) অন্যমনস্ক করে তোলে।" (বর্ণনাকারী) সুফইয়ান বলেন: "মেষের শিং দুটি ঐ গৃহেই ছিল, এমনকি ঘরটি পুড়ে না যাওয়া পর্যন্ত সেগুলোও পুড়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7009)


7009 - عن أبي الطفيل قال: قلت لابن عباس: يزعم قومك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سعى بين الصفا والمروة وأن ذلك سنة؟ قال: صدقوا إن إبراهيم لما أُمِرَ بالمناسك عرض له الشّيطان عند المسعى فسابقه فسبقه إبراهيم، ثمّ ذهب به جبريل إلى جمرة العقبة فعرض له الشّيطان فرماه بسبع حصيات حتَّى ذهب، ثمّ عرض له عند الجمرة الوسطى فرماه بسبع حصيات، وثمَ تلَّه للجبين، وعلى إسماعيل قميص أبيض، فقال له: يا أبت، إنه ليس لي ثوب تكفنني فيه غيره، فاخلعه حتَّى تكفنني فيه، فعالجه ليخلعه فنودي من خلفه قد {قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا} [الصافات: 105] فالتفت إبراهيم فإذا هو بكبش أبيض أقرن أعين.
قال ابن عباس: لقد رأيتُنا نتبع ذلك الضرب من الكباش.

حسن: وهو جزء من حديث طويل رواه الإمام أحمد (2707)، وأبو داود الطيالسي (2820) من طريق حمّاد بن سلمة، عن أبي عاصم الغنويّ، عن أبي الطفيل فذكره، وقد سبق بتمامه في كتاب الحجّ.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু তুফাইল (রহ.) বলেন, আমি তাঁকে বললাম: আপনার কওমের লোকেরা দাবি করে যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফা ও মারওয়ার মাঝে সায়ী করেছেন এবং এটি সুন্নত?

তিনি বললেন: তারা সত্য বলেছে। ইবরাহীম (আঃ)-কে যখন মানাসিক (হজ্জের অনুষ্ঠানাদি) পালনের আদেশ করা হলো, তখন মাসআর (সায়ী করার স্থান) কাছে শয়তান তার সামনে এলো। ইবরাহীম (আঃ) তার সঙ্গে প্রতিযোগিতা করলেন এবং তাকে অতিক্রম করে গেলেন। অতঃপর জিবরীল (আঃ) তাঁকে নিয়ে জামরাতুল আকাবায় (বড় শয়তানের স্থানে) গেলেন। সেখানে শয়তান আবার তার সামনে এলো। তিনি তাকে সাতটি পাথর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে চলে গেল। অতঃপর জামরাতুল উসতার (মাঝের শয়তানের স্থানে) কাছে সে আবার তার সামনে এলো। তিনি সেখানেও তাকে সাতটি পাথর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি তাকে (ইসমাঈলকে) কাত করে কপালে শুইয়ে দিলেন। ইসমাঈল (আঃ)-এর পরিধানে একটি সাদা জামা ছিল। তিনি (ইসমাঈল) তাঁকে (ইবরাহীমকে) বললেন: হে আমার পিতা, এটি ছাড়া আমাকে কাফন দেওয়ার মতো আর কোনো কাপড় আমার নেই। অতএব, আপনি এটি খুলে ফেলুন, যাতে আপনি এটি দিয়েই আমাকে কাফন দিতে পারেন। ইবরাহীম (আঃ) যখন তা খোলার জন্য চেষ্টা করছিলেন, তখন পেছন থেকে ডাক এলো: {তুমি স্বপ্নকে সত্যে পরিণত করেছ।} [সূরা সাফফাত: ১০৫]। ইবরাহীম (আঃ) ফিরে তাকালেন এবং দেখতে পেলেন, একটি সাদা, শিংওয়ালা, সুদর্শন চোখবিশিষ্ট দুম্বা।

ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি দেখেছি, আমরা এই ধরনের দুম্বা অনুসরণ করতাম (অর্থাৎ কুরবানি দিতাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (7010)


7010 - عن عُبيد بن فيروز قال: سألت البراء بن عازب: ما لا يجوز في الأضاحي؟ فقال: قام فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصابعي أقصر من أصابعه، وأناملي أقصر من أنامله فقال:"أربع لا تجوز في الأضاحي: العَوْراء بيِّنٌ عورُها، والمريضة بيِّنٌ مرضُها، والعرجاء بيِّنٌ ظلعها، والكسير التي لا تنقى". قال: قلت: فإني أكره أن يكون في السِّنّ نقصٌ، قال:"ما كرهتَ فدعه، ولا تحرمه على أحد".

صحيح: رواه أبو داود (2802)، والنسائي (4369)، وابن ماجة (3144)، وأحمد (18510)، وابن خزيمة (2912)، وابن حبَّان (5922)، والحاكم (1 - 467 - 468) كلّهم من طريق شعبة، قال: سمعت سليمان بن عبد الرحمن، قال: سمعت عُبيد بن فيروز، به، فذكره.

وإسناده صحيح، سليمان بن عبد الرحمن هو الدّمشقيّ.

وقال الحاكم:"حديث صحيح ولم يخرجاه، لقلة روايات سليمان بن عبد الرحمن، وقد أظهر عليّ بن المديني فضائله وإتقانه".

ورواه الترمذيّ (1497) من طريق يزيد بن أبي حبيب - وابن حبَّان (5919) من طريق ليث بن سعد - كلاهما عن سليمان بن عبد الرحمن الدّمشقيّ به، مثله، إِلَّا أنهما قالا:"والعجفاء التي لا تنقي" وزاد ابن حبَّان فقالوا للبراء: فإنما نكرَهُ النَّقصَ في السِّن والأُذن والذَّنَب قال: فاكرهوا ما شئتم، ولا تحرّموا على الناس.

وإسناده صحيح، قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه إِلَّا من حديث عُبيد بن فيروز عن البراء، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم".

ورواه النسائيّ (4371)، وابن حبَّان (5921) من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن سليمان بن عبد الرحمن، عن عيد بن فيروز، به. وإسناده صحيح.

تنبيه: رواه مالك في الضحايا (1) عن عمرو بن الحارث، عن عبيد بن فيروز، به، فأسقط من إسناده"سليمان بن عبد الرحمن". نبَّهَ على ذلك ابن حبَّان. وكذا قال أبو حاتم الرازي"العلل" (2/ 41).

وفي الباب ما رُوِيَ عن يزيد ذي مِصْر قال: أتيتُ عتبة بن عَبْدٍ السُّلميّ فقلتُ: يا أبا الوليد، إني خرجتُ ألتمسُ الضحايا فلم أجد شيئًا يعجبني غير ثَرْماء، فكرهتُها فما تقول؟ قال: أفلا جئتني
بها، قلت: سبحان الله! تجوز عنك ولا تجوز عني؟ قال: نعم إنك تشكُّ ولا أشكُّ. إنّما نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المصفَّرة، والمستأصلة، والبَخْقاء، والمُشَيَّعة، والكَسْراء.

والمصفرة: التي تُستأصل أذنُها حتَّى يبدو سماخُها، والمستأصلة: التي استؤصل قرنُها من أصله، والبخْقاء: التي تبخق عينها، والمشبعة: التي لا تتبع الغنم عجفا وضعفا، والكسراء: الكسيرة.

رواه أبو داود (2803)، وأحمد (17652) من طريق ثور بن يزيد، حَدَّثَنِي أبو حميد الرُّعينيّ، أخبرني يزيد ذو مصر به، فذكره.

ورواه الحاكم (4/ 225) من هذا الوجه وصحَّح إسناده، وفيه أبوحميد الرُّعينيّ، تفرّد عنه ثور بن يزيد، وقال الذّهبيّ في الميزان:"لا يُعْرَف" وقال الحافظ في التقريب:"مجهول".

وشيخه يزيد ذو مصر الشّاميّ لم يوثقه إِلَّا ابن حبَّان بذكره إياه في"الثّقات" لذا قال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يُتابع وإلَّا فليّن الحديث.

وقوله:"ثَرْماء" بمثلثة ومدّ، والثرم: سقوط الثنية من الأسنان.




বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাইদ ইবনু ফাইরূয (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রশ্ন করলাম: কুরবানীর জন্য কোন পশুগুলো জায়িয নয়? তিনি বললেন: আমাদের মাঝে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়িয়েছিলেন, (এবং তিনি যখন কথা বলছিলেন তখন) আমার আঙ্গুলগুলো তাঁর আঙ্গুলগুলোর চেয়ে ছোট এবং আমার আঙ্গুলের ডগাগুলো তাঁর আঙ্গুলের ডগাগুলোর চেয়ে ছোট (তবুও আমি সব শুনছিলাম)। তিনি বললেন: "চার প্রকারের পশু কুরবানীর জন্য জায়িয নয়: ১. কানা, যার কানাভাব সুস্পষ্ট; ২. রুগ্ন, যার রোগ সুস্পষ্ট; ৩. খোঁড়া, যার খোঁড়াভাব সুস্পষ্ট; এবং ৪. এমন দুর্বল বা জীর্ণশীর্ণ, যা নড়াচড়া করতে পারে না (বা যার অস্থি মজ্জায় কিছু নেই)।" উবাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি বললাম: আর দাঁতে কোনো খুঁত বা ত্রুটি থাকলে আমি তা অপছন্দ করি। তিনি (বারাআ) বললেন: "যা তুমি অপছন্দ করো তা ছেড়ে দাও, কিন্তু অন্য কারো জন্য তা হারাম করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7011)


7011 - عن عليّ بن أبي طالب قال: أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نستشرف العينَ والأذن.

حسن: رواه الترمذيّ (1503)، والنسائي (4376)، وابن ماجة (3143)، وأحمد (732، 734، 826، 1021) من طرق عن سلمة بن كهيل، عن حجية بن عديّ، عن عليٍّ، فذكره.

وزاد الترمذيّ وأحمد - إِلَّا في الموضع الأوّل - أن عليًّا سئل عن البقرة فقال:"عن سبعة". قال: القرن؟ قال: لا يضرُّك. قال: العرجاء؟ قال: إذا بلغت المنسك. وقال الترمذيّ:"حسن صحيح".

وصحّحه أيضًا من هذا الوجه ابن خزيمة (2914، 2915)، وابن حبَّان (5920). ورواه الحاكم (4/ 224 - 225) من طريق أبي إسحاق، والثوريّ، وشعبة - فرّقهم - ثلاثتُهم عن سلمة بن كهيل به.

ثمّ قال:"هذه الأسانيد كلها صحيحة، ولم يحتجا بحجة بن عدي وهو من كبار أصحاب أمير المؤمنين عليّ. اهـ.

قلتُ: وحجية هذا مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، كما أنه لم ينفرد به فقد تابعه هُبَيْرة بن يريم وحديثه في زيادات عبد الله بن أحمد (1106) وهبيرة بن يريم قريب من حجية.

وتابعه أيضًا شريح بن النعمان وحديثه رواه أبو داود (2804)، والتِّرمذيّ (1498)، والنسائي (4372)، وابن ماجة (3142) وأحمد (851) والحاكم (4/ 224) وصحّح إسناده.

وشريح بن النعمان صدوق، والخلاصة أن الحديث حسن وإن كان خلاف بين أهل العلم في الوقف والرفع، والرفع زيادة.

وقوله:"نستشرف العين والأذن" أي نتأمل سلامتها من العيوب كالعور والجدع، والاستشراف
أن تضع يدك على حاجبك كالذي يستظل من الشّمس حتَّى يستبين الشيء.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে [কুরবানীর পশুর] চোখ ও কান ভালোভাবে পরীক্ষা করার নির্দেশ দিয়েছেন।

আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গরুর (কুরবানী) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "সাত জনের পক্ষ থেকে।" জিজ্ঞাসা করা হলো: শিং [ভাঙা]? তিনি বললেন: এতে তোমার কোনো ক্ষতি হবে না। জিজ্ঞাসা করা হলো: খোঁড়া? তিনি বললেন: যদি সে যবেহ করার স্থান পর্যন্ত পৌঁছাতে পারে।









আল-জামি` আল-কামিল (7012)


7012 - عن عليّ أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نهى أن يُضَحَّى بعضباء الأذن والقرن.

حسن: رواه أبو داود (2805)، والتِّرمذيّ (1504)، والنسائي (4377)، وابن ماجة (3145)، وأحمد (633، 1048)، من طرق عن قتادة، عن جُريّ بن كُليب، عن عليّ، فذكره. واللّفظ لأبي داود.

ولفظه عند الآخرين سوى أحمد في الموضع الأوّل: نهى أن يُضحي بأعضب القرن والأذن.

وزادوا إِلَّا ابن ماجة وأحمد في الموضع الأوّل: قال قتادة فذكرتُ ذلك لسعيد بن المسيب فقال:"العضْبُ ما بلغ النصف فما فوق ذلك".

وقول قتادة هذا رواه أبو داود (2806) عقب الحديث من طريق يحيى القطان، عن هشام الدستوائيّ، عن قتادة.

وقال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح".

ورواه الحاكم (4/ 224) من هذا الوجه وصحح إسناده.

قلت: وإسناده حسن من أجل جري بن كليب قال أبو داود عقب الحديث:"جُريٌّ سدوسي بصريٌّ لم يحدث عنه إِلَّا قتادة".

وقتادة إمام هذا الفن، وروايته عنه قوى أمره، وقول أبي داود يُشير إلى أنه كان معروفًا في بلده، ولو علم فيه جرحا لبيّنه، وقول عليّ بن المديني:"مجهول لا أعلم روى عنه غير قتادة". يعني قليل الرواية.

ووثَّقه العجليّ، وابن حبَّان، وحسّنه وصحّحه الترمذيّ والحاكم.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ قال: ابتعنا كَبْشًا نضحّي به، فأصاب الذئبُ من إليتيه أو أذنه، فسألنا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فأمرنا أن نضحّى به. فهو ضعيف جدًّا. رواه ابن ماجة (3146)، والإمام أحمد (11274) من طريق سفيان الثوريّ، عن جابر بن يزيد (هو الجعفي)، عن محمد بن قرظة الأنصاريّ، عن أبي سعيد، فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا، فيه الجعفي وهو متروك، ومحمد بن قرظة تفرّد عنه الجعفي فهو مجهول كما في التقريب.

قال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 54):"هذا إسناد ضعيف فيه جابر بن يزيد الجعفي وهو ضعيف وقد اتهم".




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন পশু দ্বারা কুরবানি করতে নিষেধ করেছেন, যার কান বা শিং মারাত্মকভাবে কাটা বা ভাঙ্গা।









আল-জামি` আল-কামিল (7013)


7013 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تذبحوا إِلَّا مسنّة، إِلَّا أن يَعسر عليكم فتذبحوا جذعةً من الضأن".
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (1963) عن أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا زهير، حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر، فذكره.

قال النوويّ:"وهذا تصريحٌ بأنه لا يجوز الجذع من غير الضأن في حال من الأحوال، وهذا مجمع عليه على ما نقله القاضي عياض، ونقل العبدري وغيره من أصحابنا عن الأوزاعي أنه قال: يجزئ الجذع من الإبل والبقر والمعز والضأن وحكي هذا عن عطاء". شرح صحيح مسلم (13/ 117).

قوله:"إِلَّا مسنة" المسنة: هي الثنية من كل شيء من الإبل والبقر والغنم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কেবল 'মুসিন্নাহ' (নির্দিষ্ট বয়সের পশু) ছাড়া যবেহ করো না। তবে যদি তোমাদের জন্য তা সংগ্রহ করা কঠিন হয়, তাহলে তোমরা ভেড়ার 'জাযাআহ' (ছয় মাস বয়সের ভেড়া) যবেহ করতে পারো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7014)


7014 - عن عقبة بن عامر قال: ضحّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بجذع من الضأن.

حسن: رواه النسائيّ (4382)، وابن حبَّان (5904)، وابن الجارود (905) من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكير بن عبد الله بن الأشجّ، حدَّثه أن معاذ بن عبد الله بن خبيب الجهني حدَّثه، عن عقبة بن عامر الجهنيّ، فذكره.

وإسناده حسن، من أجل معاذ بن عبد الله فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقوّى سنده الحافظ في الفتح (10/ 15).

ورواه أحمد (17380) عن وكيع، عن أسامة بن زيد، عن معاذ بن عبد الله بن خُبيب، عن ابن المسيب، عن عقبة بن عامر، قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الجذع؟ فقال:"ضحِّ به فلا بأس به".

فزاد في إسناده ابنَ المسيب، فيحتمل أن يكون معاذ بن عبد الله سمعه من سعيد بن المسيب أولًا ثمّ سمعه من عقبة بعد ذلك وإلَّا فرواية بكير الأشجّ أشبه بالصواب؛ فإنه أوثق وأحفظ من أسامة بن زيد الليثي بكثير.




উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ভেড়া জাতীয় (পশুর) 'জাযা' (কোরবানির জন্য উপযুক্ত) প্রাণী কুরবানী করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (7015)


7015 - عن كليب الجَرمي قال: كنا مع رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقال له: مُجَاشِع من بني سُليم، فعزّت الغنم، فأمر مناديًا فنادى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول:"إنَّ الجذع يُوفي مما يُوفِي منه الثَّنِي".

حسن: رواه أبو داود (2799)، وابن ماجة (3140)، والحاكم (4/ 226) من طريق عبد الرزّاق، أنبأنا الثوريّ، عن عاصم بن كليب، عن أبيه قال: فذكره.

ورواه النسائيّ (4384)، وأحمد (23123)، والحاكم (4/ 226) من طريق شعبة، عن عاصم بن كليب، قال سمعتُ أبي يحدِّث عن رجل، قال: كنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل الأضحي بيومين نُعْطي الجذَعتَين بالثنيّة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الجذعة تُجزيءُ ما تُجزئ منه الثنية".

ورواه النسائيّ (4383) من طريق أبي الأحوص، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، قال: فذكره بمثل رواية الثوريّ، وفي أوله قصة.

ورواه الحاكم أيضًا من طريق عبد الله بن إدريس، ثنا عاصم بن كليب به بنحو حديث الثوري. والحديث مداره على عاصم بن كليب وهو صدوق حسن الحديث، وقد صحَّحه الحاكم.
ورواه البيهقيّ (9/ 270 - 271) من طريق أبي حذيفة، ثنا سفيان به، بمثل رواية عبد الرزّاق غير أنه قال:"إن الجذع من الضأن".

وأبو حذيفة هو موسى بن مسعود النهدي البصريّ، صدوق سيء الحفظ وكان يصحِّف كما في التقريب.

وقد تكلموا في روايته عن سفيان الثوري فقال الإمام أحمد:"كأن سفيان الذي يحدث عنه أبو حذيفة ليس هو سفيان الثوري الذي يحدث عنه الناس".

وقال ابن محرز:"سألت يحيى عن أصحاب سفيان من هم"؟ قال:"المشهورون: وكيع، ويحيى، وعبد الرحمن، وابن المبارك، وأبو نعيم، هؤلاء ثقات. قيل له: فأبو عاصم، وعبد الرزّاق، وقبيصة، وأبو حذيفة؟ قال:"هؤلاء ضعفاء" يعني في الثوري.

والحاصل أن هذا الحديث والذي قبله دلا على جواز الأضحية بالجذع من الضأن مطلقًا سواء وجد الثني أم لم يوجد.

أما حديث جابر:"لا تذبحوا إِلَّا مسنة إِلَّا أن يعسر عليكم فتذبحوا جذعة" فهو محمول على الأفضلية جمعا بين النصوص أي يجوز ذبح الجذعة والأفضل المسنة.

أما ما رُوي عن أبي كباش قال: جلبت غنمًا جُذعانًا إلى المدينة فكسدت عليَّ، فلقيت أبا هريرة فسألته فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"نعم الأضحية الجذع من الضأن". قال: فانتهبه الناس، فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (1499)، والإمام أحمد (9739) من طريق وكيع، ثنا عثمان بن واقد، عن كِدام بن عبد الرحمن، عن أبي كباش، فذكره.

وإسناده ضعيف لجهالة أبي كباش والراوي عنه كدام بن عبد الرحمن ولذلك أعلّه الترمذيّ بقوله:"حديث غريب، وقد رُوي هذا عن أبي هريرة موقوفًا.

وأورده في العلل الكبير (2/ 646) وقال: سألت محمدًا - يعني البخاريّ - عن هذا الحديث فقال:"روى هذا الحديث عثمان بن واقد فرفعه إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ورُوي عن غير عثمان بن واقد عن أبي هريرة موقوفًا". اهـ.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أم بلال بنت هلال عن أبيها، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: يجوز الجذع من الضأن أضحيةً".

رواه ابن ماجة (3139)، والإمام أحمد (27073) من طريق أبي ضمرة أنس بن عياض، ثنا محمد بن أبي يحيى مولى الأسلمية، عن أمه قالت: حَدَّثَنِي أم بلال بنت هلال، عن أبيها، فذكرته.

وإسناده ضعيف لجهالة أم محمد بن أبي يحيى الأسلمي.

وأم بلال قال الذّهبيّ في الميزان:"لا تعرف، ولكن وثَّقها العجلي".

يقال لها صحبة كما في"التقريب".
ثمّ اختلف فيه على أبي ضمرة فرواه البيهقيّ (9/ 271) وفي المعرفة (14/ 29) من طريق إبراهيم بن المنذر الحزاميّ، ثنا أبو ضمرة به، وليس فيه"عن أبيها".

قال البيهقيّ في المعرفة:"وهو الصَّحيح".

قلت: كذلك رواه أيضًا يحيى بن سعيد القطان، عن محمد بن أبي يحيى به فيما رواه الإمام أحمد (27072)، والطَّبرانيّ في الكبير (25/ 164) بلفظ:"ضحوا بالجذع فإنه جائز".

ومداره على أم محمد بن أبي يحيى وهي علة الحديث.

وأمّا ما رُوي عن أبي زيد الأنصاري قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم بدار من دور الأنصار فوجد ريح قُتار، فقال:"من هذا الذي ذبح؟" فخرج رجل منا فقال: أنا يا رسول الله، ذبحت قبل أن أصلي لأطعم أهلي وجيراني، فأمره أن يعيد فقال: لا والله الذي لا إله إِلَّا هو، ما عندي إِلَّا جذع أو حمل من الضأن قال:"فاذبحها ولن تجزيء جذعة عن أحد بعدك". ففيه نكارة.

رواه ابن ماجة (3154) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا عبد الأعلى، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي زيد فذكره.

قال أبو بكر: وقال غير عبد الأعلى، عن عمرو بن بُجدان، عن أبي زيد.

ورواه ابن ماجة، وأحمد (20734) من طريق عبد الوراث (هو ابن سعيد العنبري) عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن عمرو بن بجدان به فذكره.

وعمرو بن بجدان العامري البصري تفرّد عنه أبو قلابة، لا يُعرف حاله كما في"التقريب"، وكذا قال الإمام أحمد وابن القطان كما في التهذيب والميزان.




মুজাশে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কুলাইব আল-জারমি বলেন, আমরা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের একজন সাহাবীর সাথে ছিলাম, যাঁকে বনু সুলাইম গোত্রের মুজাশে‘ বলা হতো। (একবার) ভেড়ার মূল্য বেড়ে যাওয়ায় তিনি একজন ঘোষণাকারীকে নির্দেশ দিলেন। সে ঘোষণা করল যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: “নিশ্চয় ‘জাযআহ’ (মেষশাবক) সেই সকল (শর্ত) পূরণ করে, যা ‘সানিয়াহ’ (এক বছর বা তার বেশি বয়স্ক পশু) পূরণ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7016)


7016 - عن البراء بن عازب قال: ضحّى خال لي يقال له أبو بُردة قبل الصّلاة فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"شأتك شاة لحم" فقال: يا رسول الله، إن عندي داجنا جذعة من المعز؟ قال:"اذبحها ولن تصلح لغيرك" الحديث.

وفي رواية: إن عندي عناق لبن.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5556)، ومسلم في الأضاحي (4: 1961) كلاهما من طريق خالد بن عبد الله، عن مطرِّف، عن عامر (هو الشعبي)، عن البراء بن عازب، فذكره.

والرّواية الأخرى لمسلم (5: 1961) من طريق داود (هو ابن أبي هند)، عن الشعبيّ، به.

قوله:"إن عندي داجنًا" الداجن هي الشاة التي يعلفها الناسُ في منازلهم، وقد يقع على غير الشاة من كل ما يألف البيوت من الطير وغيرها.

وقوله:"جذعة" وهو وصف لسنٍّ معين من بهيمة الأنعام، فمن الضأن ما أكمل السنة وقيل:
دونها، ومن المعز ما دخل في السنة الثانية، ومن البقر ما أكمل الثالثة، ومن الإبل ما دخل في الخامسة.

وقوله:"عناق لبن" العناق: هي الأنثى من المعز إذا قويت ما لم تستكمل سنة وجمعها أعنُق وعنوق، وقوله:"عناق لبن" فمعناه صغيرة قريبة مما ترضع.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার এক মামা, যার নাম ছিল আবূ বুরদাহ, তিনি (ঈদের) সালাতের আগেই কুরবানি করে ফেলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার বকরিটি গোশতের বকরি হয়েছে (অর্থাৎ কুরবানি হিসেবে গণ্য হবে না)।" তখন তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে একটি গৃহপালিত 'জাযআ' (এক নির্দিষ্ট বয়সের ছাগল) রয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি ওটাকেই যবেহ করো, কিন্তু (এমন কাজটি) তোমার পরে অন্য কারো জন্য যথেষ্ট হবে না।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমার কাছে একটি দুগ্ধদানকারী 'আনা-ক্ব' (ছাগলের বাচ্চা) আছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7017)


7017 - عن البراء بن عازب قال: ذبح أبو بردة قبل الصّلاة، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أبدلْها" قال: ليس عندي إِلَّا جذعة قال شعبة: وأحسبه قال: هي خير من مُسِنّة - قال:"اجعلها مكانها، ولن تجزئ عن أحد بعدك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5557)، ومسلم في الأضاحي (9: 1961) كلاهما عن محمد بن بشار، ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن سلمة، عن أبي جُحيفة، عن البراء، فذكره.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বুরদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঈদের সালাতের আগেই কুরবানি করেছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: এটাকে পরিবর্তন করো। তিনি (আবূ বুরদাহ) বললেন: আমার কাছে একটি 'জাযআহ' (কুরবানির উপযুক্ত বয়সে পৌঁছেনি এমন ছাগল বা ছাগলের বাচ্চা) ছাড়া আর কিছু নেই। শু’বাহ (বর্ণনাকারী) বলেন: আমার ধারণা, তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: এটা (ঐ বয়সের পশু) মুসিন্না (কুরবানির জন্য উপযুক্ত বয়স্ক পশু) থেকেও উত্তম। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি এটাকে তার (আগের কুরবানির) স্থানে কুরবানি করো। কিন্তু তোমার পরে আর কারো জন্য এটা যথেষ্ট হবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (7018)


7018 - عن البراء عن خاله أبي بُردة أنه قال: يا رسول الله، إنا عجّلنا شاة لحم لنا، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَقبل الصّلاة؟" قلتُ: نعم. قال:"تلك شاة لحم". قال: يا رسول الله، إن عندنا عناقًا جذعة هي أحب إليّ من مسنة. قال:"تجزئ عنه ولا تجزئ عن أحد بعده".

صحيح: رواه الإمام أحمد (16485)، والطَّبرانيّ في الكبير (22/ 194) من طريق إسرائيل (هو ابن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق (هو السبيعي) عن البراء، به، فذكره. وإسناد صحيح.




বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মামা আবু বুরদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা আমাদের একটি মাংসের জন্য প্রস্তুত রাখা বকরী (কুরবানীর সময়ের) আগেই যবেহ করে ফেলেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা কি (ঈদের) সালাতের আগে?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "ওটা শুধু মাংসের বকরী (কুরবানী হিসেবে গণ্য হবে না)।" তিনি (আবু বুরদাহ) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের কাছে একটি 'আনা-ক্ব' (ছাগলের বাচ্চা) আছে, যা আমার কাছে একটি বয়স্ক (মুসিন্নাহ) পশুর চেয়েও বেশি প্রিয়। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেটি তোমার পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে, তবে তোমার পরে অন্য কারো জন্য যথেষ্ট হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7019)


7019 - عن أنس قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم النحر:"من ذبح قبل الصّلاة فليُعِد"، فقام رجل فقال: يا رسول الله، إن هذا يوم يشتهى فيه اللحم - وذكر جيرانه - وعندي جذعة خيرٌ من شاتيْ لحمٍ. فرخّص له في ذلك، فلا أدري أبلغت الرخصة مَنْ سِواه أم لا … الحديث.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (49)، ومسلم في الأضاحي (10: 1962) كلاهما من طريق إبراهيم ابن علية، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أنس، فذكره.

وقول أنس رضي الله عنه:"فلا أدري أبلغت الرخصة من سواه أم لا".

قال النوويّ:"هذا الشك بالنسبة إلى علم أنس صلى الله عليه وسلم، وقد صرَّح النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حديث البراء بن عازب السابق بأنها لا يبلغ غيره ولا تجزئ أحدًا بعده اهـ. شرح صحيح مسلم (13: 116).

وقوله صلى الله عليه وسلم:"ولن تصلح لغيرك".

قال البيهقيّ:"وهذه كانت جذعة من المعز، ولذلك لم يجز عن أحد بعده". السنن الصغرى (4/ 497 - مع المنة الكبرى).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কুরবানীর দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি সালাতের পূর্বে যবেহ করেছে, সে যেন পুনরায় যবেহ করে।" তখন একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ, আজ এমন একটি দিন যখন মাংসের আকাঙ্ক্ষা সৃষ্টি হয় (মানুষ মাংস খেতে চায়)"—এবং সে তার প্রতিবেশীদের কথা উল্লেখ করল—"আর আমার কাছে একটি *জাযা‘আহ* (ছয় মাস বয়সী মেষশাবক বা এক বছর বয়সী ছাগল) আছে, যা গোশতের জন্য দুটি বকরী অপেক্ষা উত্তম।" তখন তিনি তাকে এর অনুমতি দিলেন। (আনাস বলেন) আমি জানি না, এই অনুমতি তার ছাড়া অন্য কারও জন্য প্রযোজ্য হয়েছিল কিনা।









আল-জামি` আল-কামিল (7020)


7020 - عن عقبة بن عامر الجهني قال: قسم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بين أصحابه ضحايا، فصارت العقبة جذعة، فقلت: يا رسول الله، صارتْ جذعة؟ قال:"ضحِّ بها".

وفي رواية: فبقِيَ عَتُودٌ فذكره صلى الله عليه وسلم فقال:"ضحِّ أنت به".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5547)، ومسلم في الأضاحي (16: 1965) من طريق هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن بعجة الجهنيّ، عن عقبة بن عامر الجهنيّ، فذكره.

والرّواية الأخرى للبخاريّ في الأضاحي (5555)، ومسلم (15: 1965) كلاهما من طريق اللّيث (هو ابن سعد)، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة، فذكره.

ورواه البيهقيّ (9/ 270) من وجه آخر عن اللّيث مثله وزاد:"ولا أرخصه لأحد فيها بعد".

قال البيهقيّ:"فهذه الزيادة إذا كانت محفوظة كانت رخصة له كما رخص لأبي بردة بن نيار.

وقوله:"فبقيَ عتود" قال النوويّ: قال أهل اللغة: العتود من أولاد المعز خاصة وهو ما رعي وقوي". شرح مسلم (13/ 118)، والفتح (10/ 11).




উকবাহ ইবনে আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের মধ্যে কুরবানীর পশু ভাগ করে দিলেন। (ভাগ করার পর) উকবাহর ভাগে একটি ‘জাযা‘আহ’ (পূর্ণ বয়স্ক হয়নি এমন ছাগল বা ভেড়ার বাচ্চা) পড়ল। আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রসূল! আমার ভাগে জাযা‘আহ পড়েছে?’ তিনি বললেন, “এটা দিয়েই তুমি কুরবানী কর।”

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, একটি ‘আতূদ’ (শক্তিশালী ছাগলের বাচ্চা) অবশিষ্ট ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা উল্লেখ করে বললেন, “তুমি এটা দিয়েই কুরবানী কর।”









আল-জামি` আল-কামিল (7021)


7021 - عن بُشير بن يسار أن أبا بُردة بن نيار ذبح ضحيّتَه قبل أن يذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الأضحى، فزعم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمره أن يعود بضحيةٍ أخرى. قال أبو بردة: لا أجد إِلَّا جذعا يا رسول الله. قال:"وإن لم تجد إِلَّا جذعا فأذبَحْ".

صحيح: رواه مالك في الضحايا (4) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) عن بُشير بن يسار، به، فذكره. وصحّحه ابن حبَّان (5905) من هذا الوجه.

وإسناده صحيح وإن كان أول الإسناد يوهم الإرسال غير أن قوله بعد ذلك، فزعم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمره" يدفع ذلك الإيهام، والمراد بالزعم هنا القول المحقَّق لا الظن والشك.

ورواه يحيى القطان فجوَّده.

فرواه النسائيّ (4397)، والإمام أحمد (15830) من طريق يحيى بن سعيد، عن بُشير بن يسار، عن أبي بردة بن نبار أنه ذبح قبل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فأمره النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يُعِيد، قال: عندي عناق جذعة هي أحبُّ إلي من مسنتين قال:"اذبحها" والسياق للنسائيّ، وهو عند أحمد مختصر.

وأمّا رُوي من طريق محمد بن إسحاق قال: حَدَّثَنِي بُشير بن يسار مولى بني حارثة، عن أبي بُردة بن نبار قال: شهدتُ العيدَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: خالفت امرأتي حيث غدوتُ إلى الصّلاة إلى أضحيتي فذبحتْها، وصنعت منها طعاما قال: فلمّا صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم وانصرفت إليها، جاءتني بطعام قد فُرغ منه، فقلت: أني هذا؟ قالت أضحيتك ذبحناها، وصنعنا لك منها طعاما لتغدى إذا جئت. قال: فقلت لها: والله لقد خشيت أن يكون هذا لا ينبغي. قال: فجئت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له فقال:"ليست بشيء، مَنْ ذبح قبل أن نفرغ من نسكنا فليس بشيء، فضحّ".

قال: فالتمست مسنة فلم أجدها، قال: فجئتُه فقلتْ: والله يا رسول الله، لقد التمست مسنةً فما وجدتُها. قال:"فالتمسْ جذعا من الضأن، فضحِّ به" قال: فرخص له رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجذع من الضأن، فضحي به حين لم يجد المسنة.

رواه أحمد (16490) عن يعقوب بن إبراهيم، ثنا أبي، عن ابن إسحاق به.
ومحمد بن إسحاق وإن كان حسن الحديث إذا صرَّح بالتحديث ولم يخالف، لكنه هنا خالف الثقة في هذا الحديث، وخالف الثّقات الأثبات في الأحاديث الصحيحة الأخرى، والمخالفة في قوله: فرخَّص له رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجذع من الضأن. وقال يحيى بن سعيد الأنصاري عن بُشير بن يسار"عندي عناق جذعة" والعناق - كما سبق - من ولد المعز. وعليه فرواية ابن إسحاق هذه تكون شاذة.




আবূ বুরদাহ ইবনু নিয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কুরবানীর দিনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কুরবানী করার পূর্বে তার কুরবানী যবেহ করে ফেলেন। তিনি উল্লেখ করেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে আরেকটি কুরবানী করার আদেশ দেন। আবূ বুরদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো ‘জাযআ’ (ছয় মাসের ভেড়ার বাচ্চা বা এক বছরের অন্য পশুর বাচ্চা) ছাড়া অন্য কিছু পাচ্ছি না। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যদি তুমি ‘জাযআ’ ছাড়া অন্য কিছু না পাও, তাহলে তুমি সেটিই যবেহ কর।”









আল-জামি` আল-কামিল (7022)


7022 - عن زيد بن خالد الجهني قال: قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم في أصحابه ضحايا، فأعطاني عَتودًا جذعًا، قال: فرجعتُ به إليه، فقلت له: إنه جذع، قال:"ضحِّ به" فضحيتُ به.

حسن: رواه أبو داود (2798)، والإمام أحمد (21690) وصحّحه ابن حبَّان (5899) من طرق عن ابن إسحاق، حَدَّثَنِي عُمارة بن عبد الله بن طُعمة، عن سعيد بن المسيب، عن زيد بن خالد الجهنيّ، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، وشيخه ابن عُمارة ذكره ابن حبَّان في الثّقات وهو مدنيّ، وقد روى عنه جمعٌ من الثّقات منهم الإمام مالك، ومعروف أن مالكا كان ينتقي الرجال ولا يحدث إِلَّا عن ثقة عنده ولا سيما أهل المدينة كما قال ابن حبَّان في كتابه الثّقات (7/ 459):"وكان مالك رحمه الله أول من انتقى الرجال من الفقهاء بالمدينة، وأعرض عمن ليس بثقة في الحديث، ولم يكن يروي إِلَّا ما صحَّ ولا يحدث إِلَّا عن ثقة".

وقال الإمام أحمد:"لا تبال أن تسأل عن رجل روى عنه مالك بن أنس ولا سيما مدني" كما في تقدمة الجرح والتعديل ص (17).

وقال النوويّ في شرح مسلم (13/ 169): رواه أبو داود بإسناد جيد حسن وليس في رواية أبي داود"من المعز" ولكنه من قوله"عتود" اهـ.




যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবাদের মধ্যে কুরবানীর পশু বন্টন করলেন। তিনি আমাকে একটি অল্প বয়স্ক ছাগলছানা (আতূদ) দিলেন। তিনি বলেন: আমি সেটি নিয়ে তাঁর কাছে ফিরে গেলাম এবং তাঁকে বললাম: এটি তো নাবালক ('জাযা')। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এটিই কুরবানী কর।" অতঃপর আমি সেটি দিয়েই কুরবানী করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (7023)


7023 - عن أبي جُحيفة أن رجلًا ذبح قبل أن يُصَلِّي رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم النحر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يجزئ عنك" فقال: يا رسول الله، إن عندي جذعة؟ قال:"تجزي عنك ولا تجزي بعدك".

حسن: رواه أبو يعلى (897)، والطَّبرانيّ في الكبير (22/ 108) كلاهما من طريق عبيد الله بن موسى، ثنا عبد الجبار بن العباس، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الجبار بن العباس الكوفي فإنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وعبيد الله بن موسى هو ابن أبي المختار أبو محمد الكوفي.

وعزاه الهيثميّ في"المجمع" (4/ 24) لأبي يعلى والطَّبرانيّ وقال:"ورجاله الجميع ثقات".




আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরবানির দিন এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত আদায়ের পূর্বেই যবেহ করে ফেলেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা তোমার পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে না।" সে লোকটি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে একটি 'জাযআ' (এক বছরের মেষ বা ছাগলের বাচ্চা) আছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি তোমার জন্য যথেষ্ট হবে, তবে তোমার পরে আর কারো জন্য যথেষ্ট হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7024)


7024 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أمرت يوم الأضحى عيدًا
جعله الله عز وجل لهذه الأمة" قال الرّجل أرأيتَ إن لم أجد إِلَّا منيحة أنثى أفأضحي بها؟ قال:"لا، ولكن تأخذ من شعرك وأظفارك، وتقص شاربك، وتحلق عانتك، فتلك تمام أضحيتك عند الله عز وجل".

حسن: رواه أبو داود (2789)، والنسائي (4365)، والإمام أحمد (6575)، وابن حبَّان (914)، والحاكم (4/ 223) من طريق سعيد بن أبي أيوب، حَدَّثَنِي عَيَّاش بن عباس القتبانيّ، عن عيسى بن هلال الصدفيّ، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عيسى بن هلال، فقد روى عنه جماعة وذكره ابن حبَّان في الثّقات (5/ 213)، وكذا ذكره الفسوي في تاريخه (2/ 515) في ثقات التابعين من أهل مصر، وبقية رجاله ثقات. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

والمنيحة: هي الشاة الحلوب تعار لينتفع بلبنها ثمّ تعاد إلى صاحبها.

كذا وقع عند أبي داود والنسائي وابن حبَّان والحاكم:"منيحة أنثى" وفيه دليل لمن يقول إن المنيحة قد تكون ذكرا، ويكون الانتفاع بها حينئذ بصوفها ووبرها.

ووقع عند أحمد"منيحة ابني" وفي بعض المصادر:"منيحة أبي"،"شاة ابني وأهلي ومنيحتهم".




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে ঈদুল আযহার দিনকে ঈদ হিসেবে পালন করার আদেশ দেওয়া হয়েছে, যাকে আল্লাহ তাআলা এই উম্মতের জন্য নির্ধারণ করেছেন।" লোকটি বলল: আপনি কি মনে করেন, যদি আমি শুধুমাত্র একটি মালীহাতুন আনছা (লোন নেওয়া মাদী দুগ্ধবতী পশু) ছাড়া অন্য কিছু না পাই, তবে কি আমি তা দিয়ে কুরবানী করব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। বরং তুমি তোমার চুল ও নখ কাটবে, তোমার গোঁফ ছাঁটবে এবং তোমার লজ্জাস্থানের লোম পরিষ্কার করবে। এটাই তোমার জন্য আল্লাহ তাআলার কাছে তোমার কুরবানীর পূর্ণতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (7025)


7025 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها وحاضت بسرف قبل أن تدخل مكة وهي تبكي فقال:"ما لكِ أنَفستِ؟" قالت: نعم قال:"إنَّ هذا أمر كتبه الله على بنات آدم، فاقضي ما يقضي الحاج، غير أن لا تطوفي بالبيت" فلمّا كنا بمنى أُتيتُ بلحم بقر فقلتُ: ما هذا؟ قالوا: ضحّى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أزواجه بالبقر.

وفي رواية: أهدى رسول الله صلى الله عليه وسلم على نسائه البقر.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5548)، ومسلم في الحجّ (119: 1211) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. والرّواية الأخرى لمسلم (120: 1211) من طريق عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الرحمن بن القاسم به.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, যখন তিনি মক্কায় প্রবেশের পূর্বে সারফ (নামক স্থানে) পৌঁছে ঋতুমতী হয়েছিলেন এবং কাঁদছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কী হয়েছে? তুমি কি ঋতুমতী হয়েছো?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "এটি এমন একটি বিষয় যা আল্লাহ তা'আলা আদম-কন্যাদের জন্য লিখে দিয়েছেন। সুতরাং হাজিগণ যা করে, তুমিও তাই করো, তবে বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করবে না।" যখন আমরা মিনায় ছিলাম, তখন আমার কাছে গরুর গোশত আনা হলো। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "এটা কী?" তারা বললো: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে গরু কুরবানী করেছেন।" অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে গরু হাদিয়া (বলি) করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7026)


7026 - عن جابر بن عبد الله أنه قال: نحرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الحديبية البدنة عن سبعة، والبقرةَ عن سبعة.

صحيح: رواه مالك في الضحايا (9) عن أبي الزُّبير المكيّ، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

ورواه مسلم في الحجّ (350: 1318) من طريق مالك به مثله.
ورواه مسلم (351) من طريق زهير، حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مُهِلّين بالحج، فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نشترك في الإبل والبقر، كلُّ سبعة منا في بدنة.




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদায়বিয়ার বছরে আমরা আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে একটি উট সাতজনের পক্ষ থেকে এবং একটি গরু সাতজনের পক্ষ থেকে নহর (কুরবানি) করেছিলাম।

(অন্য এক বর্ণনায়) জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে হজ্বের ইহরাম বেঁধে বের হলাম। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নির্দেশ দিলেন যেন আমরা উট ও গরুতে শরীক হই, আমাদের মধ্যে প্রতি সাতজন একটি বদনায় (উটে) শরীক হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (7027)


7027 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا نتمتع مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعمرة فنذبح البقرة عن سبعة نشترك فيها.

صحيح: رواه مسلم (355: 1318) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا هُشيم، عن عبد الملك (هو ابن أبي سليمان)، عن عطاء (هو ابن أبي رباح) عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس قال: كنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في سفر، فحضر الأضحى، فاشتركنا في البقرة سبعة، وفي الجزور عشرة. فهو شاذ.

رواه الترمذيّ (905)، والنسائي (4932)، وابن ماجة (3131)، والإمام أحمد (2484)، وابن خزيمة (2908)، وابن حبَّان (4007) كلّهم من طريق الفضل بن موسى، عن حسين بن واقد، عن علباء بن أحمر، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وقال الترمذيّ:"حديث حسن غريب، وهو حديث حسين بن واقد".

ورواه الحاكم (4/ 230) من طريق عليّ بن الحسن بن شقيق، ثنا الحسين بن واقد عن عكرمة به. وقال:"صحيح على شرط البخاريّ".

قلت: وفيه نظر، لأن بين الحسين بن واقد وعكرمة رجلًا وهو علباء بن أحمر كما في الإسناد السابق. وقد قال أبو يعلى الخليلي:"الحسين بن واقد يدلّس عن عكرمة مولى ابن عباس ولم يلقه".

ثمّ على مقتضى منهج الحاكم ينبغي أن يكون على شرط الشّيخين؛ لأن مسلما ممن روى عنه، وأمّا البخاريّ فإنما روي له على سبيل الاستشهاد لا الاحتجاج.

والحسين بن واقد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يخالف أو يقع في حديثه نكارة وقوله في الحديث:"وفي الجزور عشرة" مخالف لحديث جابر السابق:"البدنة عن سبعة"، ولذا قال البيهقيّ عقب حديث ابن عباس:"حديث أبي الزُّبير أصح من ذلك، وقد شهد الحديبية وشهد الحجّ والعمرة، وأخبرنا بأن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أمرهم باشتراك سبعة في بدنة، فهو أولى بالقبول. اهـ."السنن الكبرى (5/ 236).

وقال الترمذيّ:"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم يرون الجَزور عن سبعة، والبقرة عن سبعة. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد. ورُوي عن ابن عباس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أن البقرة عن سبعة والجزور عن عشرة وهو قول إسحاق واحتج بهذا الحديث" اهـ.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সাথে উমরার জন্য (হাদী হিসেবে) সাতজনের পক্ষ থেকে একটি গরুকে যবেহ করতাম এবং তাতে অংশীদার হতাম।