হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7048)


7048 - عن أبي سعيد الخدريّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ذكاة الجنين ذكاة أمه".

حسن: رواه الإمام أحمد (11343) عن أبي عبيدة، حَدَّثَنَا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي الوداك جبر بن نوف، عن أبي سعيد فذكره.

وصحّحه ابن حبَّان من هذا الوجه (5889). وإسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق السبيعي فإنه حسن الحديث.

وللحديث طريق آخر رواه أبو داود (2827)، والتِّرمذيّ (1476) وابن ماجة (3199)، والإمام أحمد (11260، 11495) كلّهم عن مجالد، عن أبي الودّاك، عن أبي سعيد فذكره، وعند أبي داود وأحمد في أوله قصة وهي: قوله: قلنا: يا رسول الله، ننحر الناقة ونذبح البقرة والشاة، فنجد في بطنها الجنين، أنلقيه أم نأكله؟ قال:"كلوه إن شئتم؛ فإن ذكاته ذكاة أمه".

وقال الترمذيّ: حديث حسن، وقد رُوِي من غير هذا الوجه عن أبي سعيد.

قلت: وفي إسناده مجالد وهو ابن سعيد الهمْداني ليس بالقوي وقد تغير في آخر عمره كما في التقريب. وله طريق آخر رواه الإمام أحمد (11414) من حديث ابن أبي ليلى، عن عطية، عن أبي سعيد الخدريّ مثله.
وابن أبي ليلى هو محمد بن عبد الرحمن، وعطية هو ابن سعد العوفي ضُعِّفا لسوء حفظهما لكنهما يصلحان في المتابعات.

وبالجملة فالحديث رُوي من وجوه عن أبي سعيد الخدريّ كما قاله الترمذيّ يقوي بعضها بعضًا، وبعض طرقها حسن بذاته.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ভ্রূণের যবেহ হলো তার মায়ের যবেহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7049)


7049 - عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ذكاة الجنين ذكاة أمه".

حسن: رواه أبو داود (2828) عن محمد بن يحيى بن فارس، حَدَّثَنِي إسحاق بن إبراهيم بن راهويه، حَدَّثَنَا عتاب بن بشير، حَدَّثَنَا عبيد الله بن أبي زياد القداح المكيّ، عن أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.

ورواه الحاكم (4/ 114) من هذا الوجه، وصحّحه على شرط مسلم.

وهو ليس كما قال؛ فإن عتابا وابن أبي زياد لم يرو لهما مسلم شيئًا، وعتّاب روى له البخاريّ متابعة ومقرونا، وقد تُكلِّم في حفظهما لكنهما توبعا، فرواه الحاكم من طريق الحسن بن بشر بن سَلْم، ثنا زهير، عن أبي الزُّبير، به مثله.

وزهير بن معاوية أبو خيثمة الجعفيّ، ثقة مشهور، وأمّا الحسن بن بشر فمختلف فيه غير أنه لا بأس به في المتابعات.

وفي معناه ما رُوي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذكاة الجنين إذا أشعر ذكاة أمه، ولكنه يذبح حتَّى ينصاب ما فيه من الدم".

رواه الحاكم (4/ 114) عن أبي الوليد، ثنا الحسين (كذا والصواب: الحسن) ابن سفيان، ثنا وهب بن بقية، ثنا محمد بن الحسن الواسطيّ، عن محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

ورجاله ثقات حاشا محمد بن إسحاق فإنه مدلِّس وقد عنعن، وأبو الوليد شيخ الحاكم هو حسان بن محمد الفقيه ترجمه الذّهبيّ في السير (15/ 492) وأثنى عليه بقوله: الإمام الأوحد الحافظ المفتي شيخ خراسان ....".

وقد خالف ابن إسحاق من هو أوثق منه فرووه عن نافع موقوفًا على ابن عمر، رواه مالك في الذبائح (8) عن نافع، عن عبد الله بن عمر أنه كان يقول: إذا نُحرت الناقةُ، فذكاة ما في بطنها في ذكاتها إذا كان قد تمَّ خَلْقُه ونبت شعرُه، فإذا خرج من بطن أمه ذُبِحَ حتَّى يخرج الدم من جوفه.

ورواه البيهقيّ (9/ 335) من طريق مالك وعبد الله بن عمر (هو العمري) وغير واحد أن نافعا حدَّثهم أن عبد الله بن عمر كان يقول: فذكره.

وفيه: وإذا خرج من بطنها حيا ذُبح.

ثمّ قال البيهقيّ عقبه:"هذا هو الصَّحيح موقوف"، ثمّ رواه مرفوعًا من وجه آخر هو، والدارقطني (4/ 271) من طريق عصام بن يوسف، ثنا المبارك بن مجاهد، عن عبد الله بن عمر،
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في الجنين:"ذكاته ذكاة أمه أشعر أو لم يشعر" وزاد الدَّارقطنيّ: قال عبد الله:"ولكنه إذا خرج من بطن أمه يُؤمر بذبحه، حتَّى يخرج الدمُ من جوفه".

فقوله:"أو لم يشعر" مخالف لحديث ابن إسحاق السابق، وفي إسناده إضافة إلى علة الوقف المشار إليها، المبارك بن مجاهد وهو أبو الأزهر الخراساني المروزيّ، قال أبو حاتم - كما في الجرح والتعديل -:"ما أرى بحديثه بأسا، وكان قُتَيبة بن سعيد ضعَّفه جدًّا وقال:"كان قدريا" وذكره ابن حبَّان في المجروحين وقال:"منكر الحديث ممن ينفرد عن الثّقات بما لا يشبه حديث الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد" اهـ.

وقال أبو أحمد الحاكم:"ليس بالقوي عندهم" وذكره في جملة الضعفاء ابن الجارود، والدولابيّ، والعقيليّ، كما في لسان الميزان.

والصواب أنه موقوف على ابن عمر كما سبق.

مذاهب العلماء في ذكاة الجنين:

قال الترمذيّ عقب حديث أبي سعيد الخدريّ:"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم وهو قول سفيان الثوري وابن المبارك والشافعي وأحمد وإسحاق" انتهى.

وشرط مالك الإشعار لقول ابن عمر.

وقال أبو حنيفة: لا يحل أكل الجنين إِلَّا إذا خرج حيا وذكي كالأم. وقد فصّلتُ القول في هذه المسألة مع الأدلة في المنة الكبرى (8/ 333 - 334).




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "গর্ভস্থ সন্তানের যবেহ (হালাল হওয়ার শর্ত) তার মায়ের যবেহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7050)


7050 - عن أنس بن مالك قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم النحر:"من ذبح قبل الصّلاة فليُعِد"، فقام رجل فقال: يا رسول الله، إن هذا يوم يشتهى فيه اللحم - وذكر جيرانه - وعندي جذعة خيرٌ من شاتي لحم. فرخَّص له في ذلك، فلا أدري أبلغت الرخصة مَنْ سِواه أم لا. ثمّ انكفأ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى كبشين فذبحهما، وقام الناس إلى غُنَيمة فتوزَّعوها أو قال: فتَجزَّعوها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (4549)، ومسلم في الأضاحي (10: 1962) كلاهما
من طريق إبراهيم ابن علية، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أنس، فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানির দিন বললেন: "যে ব্যক্তি সালাতের পূর্বে যবেহ করবে, সে যেন পুনরায় যবেহ করে।" তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! এই দিনটিতে গোশতের চাহিদা থাকে" — সে তার প্রতিবেশীদের কথা উল্লেখ করল— "এবং আমার কাছে একটি জাযআহ (নির্দিষ্ট বয়সের মেষ) আছে, যা গোশতের দিক দিয়ে আমার দুটি ছাগলের চেয়ে উত্তম।" তখন তিনি তাকে সেটির (কোরবানি করার) অনুমতি দিলেন। (বর্ণনাকারী বলেন,) আমি জানি না এই অনুমতি তার ব্যতীত অন্যদের কাছে পৌঁছেছিল কি না। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি মেষের দিকে মনোযোগ দিলেন এবং তা যবেহ করলেন। আর লোকেরাও ছোট পশুর পালের দিকে গেল এবং সেগুলোকে ভাগ করে নিল, অথবা বর্ণনাকারী বললেন: তারা সেগুলোকে টুকরা করে নিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7051)


7051 - عن عائشة أنهم ذبحوا شاة فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: ما بقي منها؟ قالت: ما بقي منها إِلَّا كتُفها. قال:"بقِيَ كلُّها غير كتفها".

صحيح: رواه الترمذيّ (2470)، وأحمد (24240) من طريق يحيى (هو ابن سعيد القطان)، عن سفيان (هو الثوري)، عن أبي إسحاق (هو السبيعي)، عن أبي ميسرة (هو عمرو بن شرحبيل الهمداني)، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده صحيح، قال الترمذيّ:"حديث صحيح"، وصحّحه الحاكم (4/ 136) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق به نحوه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা একটি বকরী যবেহ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এর থেকে কী বাকি আছে? তিনি বললেন: এর কাঁধ ছাড়া আর কিছুই বাকি নেই। তিনি (নবী) বললেন: কাঁধ বাদে এর সবকিছুই বাকি আছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7052)


7052 - عن عبد الله بن زيد، أنه شهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عند المنحر - وهو رجل من الأنصار فقسم رسول الله صلى الله عليه وسلم ضحايا، فلم يُصِبْه ولا صاحبه شيء، وحلق رأسه في ثوبه، فأعطاه وقسم منه على رجال، وقلَّم أظفاره فأعطاه صاحبَه، فإن شعرَه عندنا لمخضوب بالحِنّاء والكتم.

صحيح: رواه الإمام أحمد (16475)، والبيهقي (1/ 25) من طريق أبان العطّار، عن يحيى بن أبي كثير، أن أبا سلمة حدَّثه أن محمد بن عبد الله بن زيد أخبره، عن أبيه، فذكره.

وإسناده صحيح، أبو سلمة هو ابن عبد الرحمن بن عوف الزهري.

قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 19):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح".

وأمّا ما رُوِي عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا ضحّى أحدكم فليأكل من أضحيته" فهو ضعيف. رواه أحمد (9078) عن أسود بن عامر، ثنا الحسن بن صالح، عن ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل ابن أبي ليلى وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى الأنصاري القاضي فإنه سيء الحفظ.

وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (4/ 25):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح" فهو وهم لأن ابن أبي ليلى على ضعَّفه فليس من رجال الصَّحيح، ولعله ظنه والده عبد الرحمن بن أبي ليلى أحد ثقات التابعين وحديثه في الصحيحين.

كان عبد الله بن عمر يذهب إلى تثليث الأضحية، يأكل هو الثلث، ويُطعم من أراد الثلث، ويتصدق على المساكين بالثلث. وبه قال الإمام أحمد، وهو أحد قولي الشافعي.

والقول الآخر: يجعلها نصفين، يأكل نصفا، ويتصدق بنصف. لقوله تعالى: {فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْبَائِسَ الْفَقِيرَ}.
وذهب أبو حنيفة وأصحابه إلى كلما كثر من الصّدقة فهو أفضل.

قال ابن قدامة: والأمر في هذا واسع، فلو تصدق بها كلها أو أكثر جاز، وإنْ أكلها كلها إِلَّا أوقية تصدق بها جاز. المغني (13/ 380).




আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কুরবানির স্থানে (মানহার) দেখেছেন—আর তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ) ছিলেন আনসারদের একজন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানির পশু (মাংস) ভাগ করে দিলেন, কিন্তু তিনি এবং তাঁর সঙ্গী কেউই কোনো অংশ পেলেন না। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পোশাকের মধ্যে মাথা মুণ্ডন করলেন এবং তা তাঁকে দিলেন এবং এর কিছু অংশ অন্যদের মাঝে বণ্টন করে দিলেন। আর তিনি তাঁর নখ কাটলেন এবং তা তাঁর সঙ্গীকে দিলেন। কারণ তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) চুল যা আমাদের কাছে রয়েছে, তা মেহেদি (হেনা) এবং কাতাম দ্বারা রঞ্জিত ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7053)


7053 - عن أبي عبيد مولى ابن أزهر أنه شهِد العيدَ مع عمر بن الخطّاب قال: ثمّ صليت مع عليّ بن أبي طالب قال: فصلى لنا قبل الخطبة، ثمّ خطب الناس فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد نهاكم أن تأكلوا لحوم نسككم فوق ثلاث ليال فلا تأكلوا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5573)، ومسلم في الأضاحي (25: 1969) كلاهما من طريق يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، عن ابن شهاب، حَدَّثَنِي أبو عبيد مولى ابن أزهر فذكره واللّفظ لمسلم.

وقد جاء عن عليّ مرفوعًا الرخصة في أكل الذبيحة أكثر من ثلاثة أيام، فلعله تذكر بعد ذلك، فروى الرخصة كما سيأتي.




আবূ উবাইদ, ইবনু আযহারের আযাদকৃত গোলাম, থেকে বর্ণিত। তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে ঈদ উদযাপন করেছেন। তিনি বলেন: এরপর আমি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সালাত আদায় করলাম। তিনি আমাদের নিয়ে খুতবার পূর্বে সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে তোমাদের কুরবানীর গোশত তিন রাতের অধিক খেতে নিষেধ করেছেন। সুতরাং তোমরা তা খেয়ো না।









আল-জামি` আল-কামিল (7054)


7054 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن تؤكل لحوم الأضاحي بعد ثلاث. قال سالم: فكان ابن عمر لا يأكل لحوم الأضاحي فوق ثلاث.

وفي رواية: وكان عبد الله يأكل بالزيت حين ينفر من منى من أجل لحوم الهدي.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5574) من طريق ابن أخي ابن شهاب -، ومسلم في الأضاحي (27: 1970) من طريق معمر - كلاهما عن الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر. واللّفظ المسلم. والرّواية الأخرى للبخاريّ.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুরবানীর গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছেন। সালেম বলেন, এ কারণে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খেতেন না।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় অবস্থান ত্যাগের সময় হাদীর (কুরবানীর) গোশতের কারণে (তার বদলে) তেল দিয়ে খাবার গ্রহণ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7055)


7055 - عن عائشة قالت: الضَّحِيَّةُ كُنَّا نُمَلِّحُ مِنْهُ، فَنَقْدَمُ بِهِ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِالْمَدِينَةِ، فَقَالَ:"لا تأْكُلوا إِلَّا ثلاثةَ أيام" وليْست بعزيمةٍ ولكن أراد أن نُطْعِمَ منه، والله أعلم.

صحيح: رواه البخاريّ في الأضاحي (5570) عن إسماعيل بن عبد الله قال: حَدَّثَنِي أخي، عن سليمان، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরবানীর গোশত আমরা লবণ দিয়ে সংরক্ষণ করতাম এবং তা নিয়ে মদীনাতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পেশ করতাম। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা তিন দিনের বেশি তা থেকে খেও না।" আর এটি কোনো বাধ্যতামূলক নির্দেশ ছিল না; বরং তিনি চেয়েছিলেন যে আমরা যেন তা থেকে অন্যদেরকে খাওয়াই। আর আল্লাহই ভালো জানেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7056)


7056 - عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يأكل أحدٌ من لحْم أضحيته فوق ثلاثة أيام".

صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (26: 1970) من طريق اللّيث (هو ابن سعد) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ যেন তার কুরবানির গোশত তিন দিনের বেশি না খায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7057)


7057 - عن سلمة بن الأكوع قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من ضحّى منكم فلا يُصْبحَنَّ بعد ثالثة
وفي بيته منه شيء". فلمّا كان العام المقبل قالوا: يا رسول الله! نفعل كما فعلنا عام الماضي؟ قال:"كُلُوا وأطْعِموا وادّخِروا، فإنَّ ذلك العامَ كانَ بِالنَّاس جهْدٌ فأردتُ أن تُعينُوا فيها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأضاحي (5569)، ومسلم في الأضاحي (34: 1974) كلاهما من طريق أبي عاصم، عن يزيد بن أبي عُبيد، عن سلمة بن الأكوع فذكره.




সালামাহ ইবনুল আকওয়া‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে কুরবানী করে, সে যেন তিন দিন অতিবাহিত হওয়ার পর তার ঘরে কুরবানীর গোশত থেকে কিছুই অবশিষ্ট না রাখে।" যখন পরবর্তী বছর আসলো, তখন সাহাবীগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি গত বছরের মতো করব? তিনি বললেন: "তোমরা খাও, অপরকে খাওয়াও এবং জমা করে রাখো (সংরক্ষণ করো)। কারণ, সেই বছর লোকদের মধ্যে অভাব ছিল। তাই আমি চেয়েছিলাম যেন তোমরা তাতে (গরীবদের) সাহায্য কর।"









আল-জামি` আল-কামিল (7058)


7058 - عن جابر قال: كنا لا نأكلُ من لحوم بُدْننا فوقَ ثلاثٍ مِنًى، فأرخص لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"كلوا وتزوَّدوا". قلتُ لعطاء: قال جابر: حتَّى جئنا المدينة؟ قال:"نعم". وفي رواية:"لا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1719)، ومسلم في الأضاحي (30: 1972) كلاهما من يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، حَدَّثَنَا عطاء قال: سمعتُ جابر بن عبد الله يقول فذكره. والسياق لمسلم. والرّواية الأخرى للبخاريّ.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মিনার মধ্যে আমাদের কুরবানীর পশুর (বদন) গোশত তিন দিনের বেশি খেতাম না। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে অনুমতি দিলেন এবং বললেন: "তোমরা খাও এবং সাথে নিয়ে যাও (সংরক্ষণ করো)।" (রাবী বলেন) আমি আত্বাকে জিজ্ঞাসা করলাম, জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কি বলেছিলেন, 'যতক্ষণ না আমরা মদীনায় ফিরে আসি?' তিনি (আত্বা) বললেন, "হ্যাঁ।" আর অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, "না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7059)


7059 - عن عبد الرحمن بن عابس، عن أبيه، قال: قلت لعائشة: أَنَهى النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أن تؤكل لحومُ الأضاحي فوقَ ثلاثٍ؟ قالت: ما فعله إِلَّا في عامٍ جاعَ النَّاسُ فيه، فأراد أن يُطعمَ الغنيُّ الفقيرَ، وإنْ كُنَّا لنرفع الكُراعَ بعد خمس عشرة! ، قيل: ما اضطركم إليه؟ فضحكتْ قالت: ما شبع آل محمد صلى الله عليه وسلم من خبز بُرٍّ مأدومٍ ثلاثة أيام حتَّى لحق بالله.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5423)، ومسلم في الزهد والرقائق (23: 2970) من طريق سفيان (هو الثوري)، عن عبد الرحمن بن عابس، عن أبيه (هو عابس بن ربيعة النخعي الكوفي) به، فذكره. والسياق للبخاريّ، واقتصر مسلم على قولها:"ما شبع آل محمد صلى الله عليه وسلم …" الخ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'আব্দের পিতা বলেন, আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি কুরবানির গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছিলেন? তিনি বললেন: তিনি এমনটি শুধুমাত্র সেই বছরেই করেছিলেন, যখন মানুষ অনাহারে ছিল। তিনি চেয়েছিলেন যেন ধনীরা দরিদ্রদের আহার করায়। আর আমরা তো পনেরো দিন পরও (কুরবানির পশুর) পা সংরক্ষণ করে রাখতাম! জিজ্ঞাসা করা হলো: কিসের কারণে আপনারা এমন করতে বাধ্য হতেন? তিনি হেসে বললেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবার আল্লাহ্‌র সাথে মিলিত হওয়ার (মৃত্যুর) পূর্ব পর্যন্ত একটানা তিন দিন তরকারিসহ গমের রুটি পেট ভরে খায়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (7060)


7060 - عن عبد الله بن واقد أنه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أكل لحوم الضحايا بعد ثلاثة أيام، قَال عبد الله بْن أَبي بكْر: فذكرت ذلك لِعَمْرة بِنْت عبد الرحمن فقالتْ: صَدَقَ. سمعت عَائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تَقُولُ دَفَّ نَاسٌ مِنْ أَهْلِ الْبَادِيَةِ حَضْرَةَ الْأَضْحَى فِي زَمَانِ رَسولِ الله صلى الله عليه وسلم. فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"ادَّخِرُوا لِثَلَاثٍ. وَتَصَدَّقُوا بِمَا بَقِيَ". قالت: فلمّا كانَ بعد ذلِك قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: لقد كان النَّاسُ يَنْتَفِعُونَ بِضَحَايَاهُمْ، وَيَجْمُلُونَ مِنْهَا الْوَدَكَ، وَيَتَّخِذُونَ مِنْهَا الْأَسْقِيَةَ. فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"وَمَا ذَاكَ"؟ أَوْ كَمَا قَالَ. قَالُوا: نَهَيْتَ عَنْ لُحُومِ الضَّحَايَا بَعْدَ ثَلَاثٍ. فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّمَا نَهَيْتُكُمْ مِنْ أَجْلِ الدَّافَّةِ الَّتِي دَفَّتْ عَلَيْكُمْ. فَكُلُوا، وَتَصَدَّقُوا وَادَّخِرُوا".

صحيح: رواه مالك في الضحايا (7) عن عبد الله بن أبي بكر، عن عبد الله بن واقد فذكره.
ورواه مسلم في الأضاحي (28: 1971) من طريق مالك به مثله.

وقولها:"دف الناس" الدف: سير سريع يقارب فيه بين الخطو وأرادت أن أهل البادية أقدمتهم المجاعة إلى المدينة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়াকিদ বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন দিনের পর কুরবানির গোশত খেতে নিষেধ করেছিলেন। আব্দুল্লাহ ইবনু আবী বকর বলেন, আমি বিষয়টি আমরা বিনতে আবদুর রহমানকে জানালে তিনি বললেন: "সে (ওয়াকিদ) সত্য বলেছে। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একবার কুরবানির ঈদের সময় গ্রামাঞ্চলের (দুর্ভিক্ষপীড়িত) কিছু লোক দ্রুতগতিতে (সাহায্যের আশায়) আগমন করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তিন দিনের জন্য (গোশত) জমা করে রাখো এবং যা বাকি থাকে তা সাদকা করে দাও।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো: "লোকেরা তাদের কুরবানির গোশত থেকে উপকৃত হচ্ছে, তারা চর্বি গলিয়ে জমা করছে এবং চামড়া দিয়ে মশক তৈরি করছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাতে কী হয়েছে?" অথবা (রাবী বললেন) এ জাতীয় কিছু বললেন। তারা বললো: "আপনি তো তিন দিনের পর কুরবানির গোশত খেতে নিষেধ করেছেন।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তো শুধু ওই আগত লোকগুলোর কারণে তোমাদের নিষেধ করেছিলাম, যারা তোমাদের কাছে এসেছিল। অতএব, এখন তোমরা খাও, সাদকা করো এবং জমা করে রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7061)


7061 - عن أم سليمان قالت: دخلتُ على عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسألها عن لحوم الأضاحي؟ فقالت: قد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عنها ثمّ رخَّص فيها، قدِمَ عليُّ بن أبي طالب من سفر فأتتْه فاطمةُ بلحمٍ من ضحاياها فقال: أولم ينه عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: إنه قد رخص فيها. قالت: فدخل عليٌّ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله عن ذلك فقال له:"كُلْها من ذي الحجة إلى ذي الحجة".

حسن: رواه الإمام أحمد (26415) عن يعقوب (هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري)، ثني أبي، عن محمد بن إسحاق قال: حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن سليمان بن أبي سليمان، عن أمه أم سليمان موكلاهما كان ثقة - قالت فذكرته.

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، وبقية رجاله ثقات غير سليمان بن أبي سليمان وأمه فقد وُثّقا كما في هذا الإسناد.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 27)، رواه أحمد والطَّبرانيّ في الأوسط وقال: لم ترو أم سليمان غير هذا الحديث قلت: وُثِّقَتْ كما نقل في المسند وبقية رجال أحمد ثقات" اهـ.

قلت: ورواه الإمام أحمد أيضًا (25218)، والطحاوي في شرح المعاني (4/ 187) من طريق اللّيث (هو ابن سعد)، ثني الحارث بن يعقوب الأنصاريّ، عن يزيد بن أبي يزيد الأنصاريّ، عن امرأته أنها سألت عائشة عن لحوم الأضاحي …" الحديث بنحوه.

صحَّحه ابن حبَّان (5933) من وجه آخر عن عمرو بن الحارث، عن أبيه، عن يزيد مولى سلمة بن الأكوع أن امرأته أم سليم.

ورجاله ثقات غير يزيد بن أبي يزيد وهو مولى سلمة بن الأكوع كما في إسناد ابن حبَّان، وذكره في ثقاته (5/ 535) لكنه قال:"يزيد بن أبي عبيد مولى سلمة بن الأكوع روى عنه يحيى القطان والناس.

وعمرو بن الحارث ووالده الحارث بن يعقوب المصري كلاهما ثقة فاضل، وأم سليم هي امرأة سليمان بن أبي سليمان السابقة وقد وُثِّقت، فهذا الإسناد لا بأس به في المتابعات ويزيد الإسناد السابق قُوة.




উম্মু সুলাইমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে কুরবানীর গোশত সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগুলো (কুরবানীর গোশত জমা করে রাখা) থেকে নিষেধ করতেন, অতঃপর তিনি সে বিষয়ে অনুমতি দিয়েছেন। (একবার) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সফর থেকে ফিরলেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কুরবানীর কিছু গোশত নিয়ে তাঁর কাছে আসলেন। তিনি (আলী) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এগুলো থেকে নিষেধ করেননি? তিনি (ফাতিমা) বললেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো এতে অনুমতি দিয়েছেন। তিনি (উম্মু সুলাইমান) বলেন: এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যিলহাজ্জ মাস থেকে পরবর্তী যিলহাজ্জ মাস পর্যন্ত তা খাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7062)


7062 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل لحوم الضحايا بعد ثلاثة أيام ثمّ قال بعد:"كلوا وتصدَّقوا وتزودوا وادخروا".

صحيح: رواه مالك في الضحايا (6) عن أبي الزُّبير المكيّ، عن جابر بن عبد الله فذكره. رواه
مسلم في الأضاحي (29: 1972) من طريق مالك به.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর গোশত তিন দিনের পরে খাওয়া থেকে বারণ করেছিলেন। এরপর তিনি বললেন: "তোমরা খাও, সাদাকা করো, পাথেয়স্বরূপ রাখো এবং জমা করে রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7063)


7063 - عن ابن خباب أن أبا سعيد بن مالك الخدريّ قدم من سفر، فقدّم إليه أهله من لحوم الضحايا، فقال: ما أنا بآكله حتَّى أسأل، فانطلق إلى أخيه لأمه وكان بدريا - قتادة بن النعمان، فسأله فقال: إنه حدث بعدك أمرٌ نقضٌ لما كانوا يُنهون عنه من أكل لحوم الأضحى بعد ثلاثة أيام.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (3997) عن عبد الله بن يوسف، ثنا اللّيث، حَدَّثَنِي يحيى بن سعد، عن القاسم بن محمد، عن ابن خباب (واسمه عبد الله) فذكره.

ورواه في الأضاحي (5568) من وجه آخر عن يحيى بن سعيد به نحوه.

تنبيه: رُوي الحديث من وجه آخر عن أبي سعيد وفيه قلب في المتن، وهو ما رواه النسائيّ (4428)، والإمام أحمد (11176)، وصحّحه ابن حبَّان (5926) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد (هو القطان)، عن سعد بن إسحاق قال: حدثتني زينب، عن أبي سعيد الخدريّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لحوم الأضاحي فوق ثلاثة أيام، فقدم قتادة بن النعمان - وكان أخا لأبي سعيد لأمه وكان بدريا - فقدموا إليه فقال: أليس قد نهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال أبو سعيد: إنه قد حدث فيه أمرٌ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا أن نأكله فوق ثلاثة أيام ثمّ رخص لنا أن نأكله وندّخره.

ورجاله ثقات غير زينب وهي ابنة كعب بن عجرة زوج أبي سعيد الخدريّ وهي مقبولة كما في التقريب يعني حيث تتابع، وقد تربعت على أصل القصة، لكن وقع في حديثها قلب في المتن؛ حيث جعل راوي الحديث أبا سعيد، والممتنع من الأكل قتادة بن النعمان وهو مخالف لما في الصَّحيح. ولعل ذلك يعود إلى زينب بنت كعب.

قلت: ويؤيد ما في الصَّحيح الرواية الآتية:




আবু সাঈদ ইবনে মালিক আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক সফর থেকে ফিরে এলেন। তখন তার পরিবার তার সামনে কুরবানীর গোশত পেশ করল। তিনি বললেন: আমি প্রশ্ন না করা পর্যন্ত এটি খাব না। অতঃপর তিনি তার বৈমাত্রেয় ভাই—যিনি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী ছিলেন—কাতাদাহ ইবনুন নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন এবং তাকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি (কাতাদাহ) বললেন: আপনার অনুপস্থিতিতে একটি নতুন নির্দেশ এসেছে, যা কুরবানীর গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করার পূর্ববর্তী নির্দেশটিকে রহিত করেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7064)


7064 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد نهانا أن نأكل لحوم نسكنا فوق ثلاث، قال: فخرجتُ في سفرٍ، ثمّ قدمتُ على أهليّ، وذلك بعد الأضحى بأيام، قال: فأتتني صاحبتي بسِلْقٍ قد جعلت فيه قَدِيدًا، فقلتُ لها: أنِّى لكِ هذا القديد؟ فقالت: من ضحايانا. قال: فقلتُ لها: أولَمْ ينهنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أن نأكلها فوق ثلاث؟ قال: فقالت: إنه قد رخَّص للناس بعد ذلك. قال: فلم أُصَدِّقْها حتَّى بَعثتُ إلى أخي قتادة بن النعمان - وكان بدريا - أسأله عن ذلك، قال: فبعث إليَّ أنْ كُلْ طعامَك فقد صدقتْ، قد أرخص رسول الله صلى الله عليه وسلم للمسلمين في ذلك.

حسن: رواه أحمد (16214) عن يعقوب (هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري)، ثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي محمد بن عليّ بن حسين أبو جعفر، وأبي إسحاقُ بنُ يسار، عن
عبد الله بن خبَّاب مولى بني عدي بن النجار، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.

وإسناده حسن لأجل تصريح محمد بن إسحاق.

قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 26):"رواه أحمد ورجاله ثقات" وقال:"حديث أبي سعيد في الصَّحيح، وإنما أخرجته لحديث امرأته".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আমাদের কুরবানীর পশুর গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছিলেন। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি সফরে বের হলাম এবং (ঈদুল) আযহার কয়েক দিন পর আমার পরিবারের কাছে ফিরে আসলাম। তিনি বলেন: তখন আমার স্ত্রী আমাকে এক থালা 'সিল্ক' (শাকবিশেষ) নিয়ে আসলেন, যার মধ্যে সে কিছু শুটকি গোশত (কাদীদ) রেখেছিল। আমি তাকে বললাম: এই শুটকি গোশত তুমি কোথা থেকে পেলে? সে বলল: আমাদের কুরবানী থেকে। তিনি বললেন: আমি তাকে বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আমাদেরকে তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেননি? তিনি বলেন: তখন সে বলল: এরপরে তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের জন্য অনুমতি (রুখসত) দিয়েছেন। তিনি বললেন: আমি তাকে বিশ্বাস করলাম না, যতক্ষণ না আমি আমার ভাই কাতাদাহ ইবনু নু’মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে—যিনি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী ছিলেন—লোক পাঠালাম। আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (কাতাদাহ) আমার কাছে খবর পাঠালেন যে, তুমি তোমার খাবার খাও। সে (তোমার স্ত্রী) সত্য বলেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের জন্য এ বিষয়ে অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7065)


7065 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أهل المدينة، لا تأكلوا لحوم الأضاحي فوق ثلاث" فشكوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لهم عيالًا وحَشَمًا وخدمًا فقال:"كلوا وأطْعموا واحبِسوا - أو ادّخِروا -".

صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (33: 1973) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عبد الأعلى، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.

وعن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا عبد الأعلى، حَدَّثَنَا سعيد (هو الجريري)، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.

فزاد في إسناد ابن المثنى رجلًا، وهو قتادة، ولم يذكر في بعض روايات الصَّحيح، كما نبه على ذلك الجيّاني في التقيد (3/ 892).

ورواه النسائيّ (4434) من وجه آخر عن ابن سيرين، عن أبي سعيد الخدريّ بلفظ: نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن إمساك الأضحية فوق ثلاثة أيام ثمّ قال:"كلوا وأطعموا" وإسناده صحيح إنْ سمعه ابن سيرين من أبي سعيد فقد أرسل عن جماعة من الصّحابة.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে মদীনার অধিবাসীরা, তোমরা কুরবানীর মাংস তিন দিনের বেশি খাবে না।" অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করল যে তাদের পরিবার-পরিজন, চাকর-নওকর ও খাদেম রয়েছে। তখন তিনি বললেন: "তোমরা খাও, অন্যকে খাওয়াও এবং সংরক্ষণ করো - অথবা সঞ্চয় করো -।"









আল-জামি` আল-কামিল (7066)


7066 - عن بُريدة بن حصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نهيتكم عن زيارة القبور فزوروها، ونهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فأمسكوا ما بدا لكم، ونهيتُكم عن النبيذ إِلَّا في سقاء، فاشربوا في الأسقية كلِّها، ولا تشربوا مسكرًا".

صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (37: 1977) من طريق محمد بن فضيل، عن أبي سنان ضرار بن مُرّة، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.




বুরয়দা ইবনু হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। আর আমি তোমাদেরকে তিন দিনের অধিক কুরবানীর গোশত রাখতে নিষেধ করেছিলাম, এখন যতদিন তোমাদের ইচ্ছা হয় তোমরা তা জমা করে রাখতে পারো। আর আমি তোমাদেরকে শুধুমাত্র মশক (চামড়ার থলে) ছাড়া অন্য পাত্রে নবীয (খেজুর ভিজানো পানীয়) খেতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা সব ধরনের পাত্রেই পান করতে পারো, কিন্তু নেশাকর কোনো পানীয় পান করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7067)


7067 - عن بريدة بن الحصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كنتُ نهيتُكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث ليتسع ذو الطَّوْل على من لا طَوْل له، فكلوا ما بدا لكم وأطعِمُوا وادّخروا".

صحيح: رواه الترمذيّ (1510) من طريق أبي عاصم النبيل (هو الضَّحَّاك بن مخلد) -، والإمام أحمد (23016) عن مؤمّل - كلاهما عن سفيان الثوريّ، عن علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه فذكره. والسياق للترمذيّ، وهو عند أحمد مطوَّلًا بذكر زيارة القبور، والأوعية أيضًا، ووقع عنده"عن ابن بريدة" غير مسمى.
رواه مسلم أيضًا عقب حديث أبي سنان السابق لكنه لم يسق متنه وقال:"فذكر بمعني حديث أبي سنان ووقع عنده:"عن ابن بريدة".




বুরীদাহ ইবনুল হুসায়েব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কুরবানীর গোশত তিন দিনের বেশি (জমিয়ে রাখতে) নিষেধ করেছিলাম, যাতে সচ্ছল ব্যক্তিরা অসচ্ছলদের জন্য প্রশস্ততা সৃষ্টি করতে পারে। অতএব, এখন তোমরা যা খুশি খাও, অন্যদের খাওয়াও এবং সঞ্চয়ও করো।"