আল-জামি` আল-কামিল
7068 - عن ثوبان قال: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم ضحيته ثمّ قال:"يا ثوبان، أصْلِحْ لحمَ هذه" فلم أزلْ أطعمه منها حتَّى قدم المدينة.
وزاد في رواية: في حجّة الوداع.
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (35: 1975) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا معن بن عيسى، حَدَّثَنَا معاوية بن صالح، عن أبي الزاهرية، عن جُبير بن نُفير، عن ثوبان فذكره.
والزيادة في رواية الزَّبيديّ، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه به.
থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কুরবানী যবেহ করলেন, অতঃপর তিনি বললেন, "হে থাওবান, এর গোশত প্রস্তুত করো।" এরপর আমি তাঁকে তা থেকে খাওয়াতে থাকলাম, যতক্ষণ না তিনি মদিনায় আগমন করলেন।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: বিদায় হজ্বের সময়।
7069 - عن نبيشة الهُذلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّا كنا نهيناكم عن لحومها أن تأكلوها فوق ثلاث لكي تسعكم، فقد جاء الله بالسَّعة، فكلوا وادَّخروا واتَّجروا ألا وإن هذه الأيام أيام أكْلٍ وشُرْبٍ وذكر الله عز وجل".
صحيح: رواه أبو داود (2813)، وابن ماجة (3160)، وأحمد (20723، 20729) كلّهم من طريق خالد الحذاء، عن أبي المليح بن أسامة، عن نُبيشة فذكره. والسياق لأبي داود.
واختصره ابن ماجة، وزاد أحمد في الموضع الأوّل حديث العتيرة والفرع من أوله، وفي الموضع الآخر من أخيره. وإسناده صحيح.
وأخرج مسلم في الصيام (1141) من هذا الوجه قوله:"أيام التشريق أيام أكل وشرب".
ثمّ رواه من طريق إسماعيل ابن علية، عن خالد الحذَّاء، حَدَّثَنِي أبو قلابة عن أبي المليح، عن نُبيشة. قال خالد: فلقيتُ أبا المليح فسألته فحدثني به.
নুবাইশা আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা তোমাদেরকে তার মাংস (কুরবানীর মাংস) তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছিলাম, যাতে তা তোমাদের মধ্যে (সবার জন্য) যথেষ্ট হয়। কিন্তু আল্লাহ এখন প্রশস্ততা এনে দিয়েছেন। সুতরাং তোমরা খাও, সঞ্চয় করে রাখো এবং ব্যবসা করো। জেনে রেখো, নিশ্চয়ই এই দিনগুলো হলো পানাহার এবং মহান আল্লাহ্র যিকির করার দিন।"
7070 - عن نبيشة قال: نادي رجل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: إنا كنا نعتِر عتيرة في الجاهليّة في رجب فما تأمرنا؟ قال:"اذبحوا الله في أي شهر كان، وبرُّوا الله عز وجل وأطعموا". قال: إنا كنا نُفرِع فرَعًا في الجاهليّة فما تأمرنا؟ قال:"في كل سائمة فرع تغذوه ماشيتُك حتَّى إذا استحمل للحجيج ذبحته فتصدقت بلحمه".
قال خالد: أحسبه قال:"على ابن السبيل؛ فإن ذلك خير".
قال خالد: قلت لأبي قلابة: كم السائمة؟ قال: مائة.
صحيح: رواه أبو داود (2830)، والنسائي (4231)، وابن ماجة (3167)، والإمام أحمد (20723)، والحاكم (4/ 235) من طرق عن خالد (هو ابن مهران الحذاء)، عن أبي المليح، عن نُبيشة
فذكره. والسياق لأبي داود، وزاد أحمد في آخره حديث الرخصة في أكل الأضاحي فوق ثلاث.
وفي رواية للنسائي (4232) عن خالد قال: حَدَّثَنِي أبو قلابة، عن أبي المليح، فلقيت أبا المليح فسألته فحدّثني عن نبيشة الهذلي. وأبو قلابة هو عبد الله بن زيد الجرمي. والحديث إسناده صحيح ونبيشة الهذلي صحابي مُقِلٌّ. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
নুবাইশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডেকে বললেন: আমরা জাহেলী যুগে রজব মাসে 'আতীরাহ' (বলিদান) করতাম, আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর জন্য যেকোনো মাসেই (পশু) যবেহ করো এবং আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লার প্রতি সদ্ব্যবহার করো ও (অন্যকে) খাওয়াও।" সে বলল: আমরা জাহেলী যুগে 'ফারাʿ' (প্রথম জন্ম নেওয়া উট বা ছাগলছানা উৎসর্গ) করতাম, আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "প্রত্যেক 'সাইমা'র (মুক্ত চারণভূমিতে বিচরণকারী পশুর) জন্য একটি 'ফারাʿ' রয়েছে, যাকে তোমার গবাদি পশুরা প্রতিপালন করবে যতক্ষণ না তা বোঝা বহনের (আরোহণের) উপযুক্ত হয়ে যায়, অতঃপর তুমি তা যবেহ করে তার গোশত সদকা করে দেবে।" খালিদ বললেন: আমার মনে হয়, তিনি (নবী) বলেছেন: "পথিকদের জন্য; কারণ তা উত্তম।" খালিদ বললেন: আমি আবূ কিলাবাহকে জিজ্ঞেস করলাম: 'সাইমা'র সংখ্যা কত? তিনি বললেন: এক শত।
7071 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قالوا: يا رسول الله، الفرع؟ قال:"حق، فإن تركته حتَّى يكون بكرًا فتحمل عليه في سبيل الله، أو تعطيَه أرملة خير من أن تذبحه فيلصَق لحمُه بوبره فتكفيء إناءك وتُوَلِّه ناقتَك" قالوا: يا رسول الله، فالعتيرة؟ قال:"العتيرة حق".
حسن: رواه أبو داود (3842)، والنسائي (4225)، والإمام أحمد (6713)، والحاكم (4/ 236) كلّهم من طريق أبي داود بن قيس قال: سمعت عمرو بن شعيب يحدث عن أبيه عن جده عبد الله بن عمرو فذكره. وسياق المتن للنسائي ونحوه للحاكم، ولكنه لم يذكر العتيرة، وزاد أبو داود وأحمد في أوله حديث العقيقة.
تنبيه: وقع إسناد النسائيّ في المطبوع هكذا قال: سمعت عمرو بن شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو عن أبيه، وزيد بن أسلم قالوا فذكره، وسقط منه"عن أبيه" الثانية، وهي مثبتة كما في تحفة الأشراف (6/ 313) والمراد به الصحابي عبد الله بن عمرو.
وأمّا من طريق زيد بن أسلم فهو مرسل.
وأمّا إسناد عبد الله بن عمرو فهو حسن لأجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقوله:"حتى يكون بكرا" البَكْر بالفتح: الفتي من الإبل بمنزلة الغلام من الناس. وزاد في لفظ أبي داود وأحمد:"حتى يكون بكْرا شغزبا ابن مخاض أو ابن لبون".
قال الخطّابي: هكذا رواه أبو داود وهو غلط والصواب:"حتَّى يكون بكرا زُخربا" وهو الغليظ، كذا رواه أبو داود وغيره.
قال: ويشبه أن يكون حرف الزاي قد أُبدل بالسين لقرب مخارجهما، وأبدل الخاء غينا لقرب مخرجهما فصار"سغربا" فصحَّفه بعض الرواة فقال:"شغزبا" اهـ.
وابن مخاض: ما أتى عليه عام ودخل في الثانية.
وابن لبون: ما أتى عليه سنتان ودخل في الثالثة.
وقوله:"فيلصق لحمه بوبره" أي: يلصق لحم الفرع أي ولد الناقة بوبره لكونه قليلًا غير سمين.
وقوله:"فتكفيء إناءك" أي: تكب إناءك لأنه لا يبقى لك لبن تحلبه فيه.
وقوله:"وتوله ناقتك" بتشديد اللام قال الخطّابي: أي تفجعها بولدها، وأصله من الوَلَه وهو
ذهاب العقل من فقدان الولد" اهـ.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! 'ফার' (নবজাতক উটের বাচ্চা কুরবানী করা) সম্পর্কে কী হুকুম? তিনি বললেন: "এটি (এর বিধান) সত্য। তবে তুমি যদি তাকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না সে যুবক উট হয় এবং তুমি তাকে আল্লাহর পথে (যুদ্ধাস্ত্র) বহনকারী হিসেবে ব্যবহার কর, অথবা কোনো বিধবাকে দান করে দাও—তাহলে তা জবেহ করার চেয়ে উত্তম। (তুমি তাকে জবেহ করলে) যখন তার গোশত তার পশমের সাথে লেগে থাকে (অর্থাৎ সে দুর্বল ও ক্ষীণকায়), আর (দুধের অভাবে) তুমি তোমার পাত্র উল্টে দাও এবং তোমার উটনীকে তার সন্তানের শোকে বিমর্ষ করে দাও।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আর 'আতীরাহ্' (রজব মাসের পশু কুরবানী) সম্পর্কে কী হুকুম? তিনি বললেন: "আতীরাহ্ (এর বিধান) সত্য।"
7072 - عن عائشة قالت: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نعُقَّ عن الجارية شاة، وعن الغلام شاتين، وأمرنا بالفرع من كل خمس شياه شاة.
حسن: رواه أحمد (25250)، وابن أبي شيبة (24789) كلاهما عن عفّان، عن حمّاد، حَدَّثَنَا عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن يوسف بن ماهك، عن حفصة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن خُثيم غير أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات. عفّان هو ابن مسلم الصفار، وحماد هو ابن سلمة، وحفصة بنت عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق.
لكن اختلف في قوله:"من كل خمس" على حمّاد، فرواه عنه عفّان هكذا، وتابعه أيضًا عبد الصمد بن عبد الوارث العنبري.
رواه عنه الإمام أحمد (26134)، وإسحاق بن راهويه (1032) وخالفهما موسى بن إسماعيل التبوذكي، فرواه عن حمّاد بإسناده فقال:"من كل خمسين".
أخرجه أبو داود (2833) مختصرًا بلفظ: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم من خمسين شاةً شاةٌ، ولم يذكر الفَرَع، ولا ذكر العقيقة.
وكذلك رواه ابن جريج عن ابن خُثيم واختلف عليه:
فرواه عبد الرزّاق (7997) ومن طريقه البيهقيّ (9/ 312) قال: أخبرنا ابن جريج، أخبرني عبد الله بن عثمان بن خُثيم بإسناده عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالفرعة من كل خمسين بواحدة.
قال البيهقيّ: كذا في كتابي، وفي رواية حجَّاج بن محمد وغيره عن ابن جريج:"في كل خمس واحدة".
قلت: هو لفظ إسحاق بن راهويه في مسنده (1034) عن عبد الرزّاق، نا ابن جريج به، ثمّ فسَّره إسحاق بقوله:"من كل خمس شياه واحدة".
وأمّا رواية حجَّاج بن محمد (هو المصيصي) فأخرجها الحاكم (4/ 235 - 236) وقال: صحيح الإسناد.
ورواه أبو يعلى الموصلي (4509) من طريق يحيى بن سُليم، عن ابن خُثيم بإسناده، عن عائشة: أنها سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر بالفَرَعة من الغنم من خمسة واحدة. ويحيى بن سليم هو الطائفي وإن كان في حفظه مقال إِلَّا أنه كان أتقن لحديث ابن خُثيم لأنها كانت عنده في كتاب، كما قال الإمام أحمد في العلل (3150).
فتبيّن بهذا أن الأكثر قالوا:"خمس" ومن قال:"خمسين" فيحتمل أن يكون تصحيفا من بعض الرواة أو النساخ. والله أعلم.
وفي الباب عن أبي رَزين لقيط بن عامر العقيلي قال: قلتُ: يا رسول الله، إنا كنا نذبح ذبائح
في الجاهلية في رجب فنأكل ونُطْعِم من جاءنا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا بأس به" قال وكيع بن عُدس: فلا أدعه.
رواه النسائي (4233)، وأحمد (16202)، وصحّحه ابن حبان (5891) من طريق أبي عوانة (هو الوضاح بن عبد الله اليشكري)، عن يعلى بن عطاء، عن وكيع بن عُدس، عن عمّه أبي رزين فذكره.
ورجاله ثقات سوي وكيع بن عُدس - ويقال: ابن حدس بالحاء - العقيلي الطائفي لم يوثقه أحد غير ابن حبان ذكره في الثقات على قاعدته، ولا يُعرف له راويا غير يعلى بن عطاء، فهو إلى الجهالة أقرب، وقد قال الذهبي في الميزان:"لا يعرف".
وفي الباب عن الحارث بن عمرو أنه لقي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، فقلت: بأبي أنت يا رسول الله، استغفر لي. قال:"غفر الله لكم". قال: وهو على ناقته العضباء. قال: فاشتددت له من الشّق الآخر أرجو أن يخصّني دون القوم. فقلت: استغفر لي. قال: غفر الله لكم. قال رجل: يا رسول الله، الفرائع والعتائر؟ قال:"من شاء فرَّع، ومن شاء لم يفرع، ومن شاء عتر، ومن شاء لم يعتر، في الغنم أضحية". ثم قال:"ألا إنّ دماءكم وأموالكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا".
رواه الإمام أحمد (15972) واللفظ له. ورواه النسائي (4226، 4227)، والطبراني في الكبير (3350)، والحاكم (4/ 236) مختصرًا - كلّهم من طرق عن يحيى بن زرارة بن كُريم بن الحارث بن عمرو الباهليّ، قال: سمعت أبي يذكر أنه سمع جدّه الحارث بن عمرو يحدِّث، فذكر الحديث.
ويحيى بن زرارة لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول". قلت: وهو كذلك لأنه توبع.
فقد رواه الطبرانيّ في الكبير (3351)، والحاكم (4/ 232)، والبيهقي (5/ 28) كلّهم من طريق عبد الوارث، عن عتبة بن عبد الملك السّهميّ، عن زرارة، بإسناده، نحوه.
وأخرجه الطبراني أيضًا (3352) من وجه آخر عن سهل بن حصين الباهلي، عن زرارة بن كُريم، عن الحارث بن عمرو السّهميّ أنه أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، وهو على ناقته العضباء، وكان الحارث رجلًا جسيمًا، فنزل إليه الحارث، فدنا منه حتى حاذي وجهه بركبة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأهوى نبي الله يمسح وجه الحارث، فما زالت نضرة على وجه الحارث حتى هلك. فقال له الحارث: يا نبي الله، ادعُ الله لي:"اللهم اغفر لنا" فذكر نحو حديث عبد الوارث" انتهى.
قال الحاكم:"حديث صحيح لم يخرجاه".
قلت: وفي الإسناد زرارة بن كُريم لم يوثقه غير ابن حبان وهو معروف في توثيق من لم يُعرف فيه جرح.
وقيل: إن له رؤية ولا يصح كما رجّح ابن حجر في الإصابة. وقال ابن حبان: من قال إن له
صحبة فقد وهم. انظر للمزيد: المنة الكبرى (4/ 550).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে আদেশ দিয়েছেন যেন আমরা বালিকার পক্ষ থেকে একটি ছাগল এবং বালকের পক্ষ থেকে দু’টি ছাগল দিয়ে আকীকা করি। আর তিনি আমাদেরকে প্রতি পাঁচটি ছাগলের বিনিময়ে একটি (ফারা’) কুরবানী করার নির্দেশ দিয়েছেন।
7073 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا فرع ولا عتيرة.
والفرع: أوّلُ النتاج كانوا يذبحونه لطواغيتهم، والعتيرة في رجب.
متفق عليه: رواه البخاري في العقيقة (5473)، ومسلم في الأضاحي (38: 1976) كلاهما من طريق معمر، أخبرنا الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
قوله:"والفرع: أول النتاج ...." الخ قال الخطابي: أحسب التفسير فيه من قول الزهري، وأيّده الحافظ في الفتح (9/ 597).
قلت: وفي تفسير الفرع نظر فإن أبا داود رواه بسند صحيح عن الزهري عن سعيد (هو ابن المسيب) قال: الفرع أول النتاج، كان يُنتج لهم فيذبحونه.
وفي رواية للنسائي (4223) من طريق شعبة، عن معمر وسفيان (هو ابن حسين) عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال أحدهما: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الفرع والعتيرة وقال الآخر:"لا فرع ولا عتيرة".
سبق أن معمرا رواه بلفظ:"لا فرع ولا عتيرة" وهذا يعني أن الذي رواه بلفظ:"نهى" هو سفيان بن الحسين الواسطي وإن كان ثقة إلا أنه ضُعّف في الزهري. قال ابن عدي:"هو في غير الزهري صالح الحديث، وفي الزهري يروي أشياء خالف الناس".
وعليه فالمحفوظ لفظ الصحيحين:"لا فرع ولا عتِيرة".
وقوله:"لا فرع" الفرع بالفاء والراء المفتوحتين وجمعها فراع، وفُسِّر كما جاء في آخر الحديث أنه أول نتاج الإبل أو الغنم، كان أهل الجاهلية يذبحونه لأصنامهم.
وقيل: كان الرجل في الجاهلية إذا تمّت إبلُه مائة قدّم بكرًا فنحره لصنمه.
وقوله:"ولا عتيرة" العَتيرة بفتح المهملة وكسر المثناة بوزن عظيمة وفسرت في الحديث بأنها الشاة تذبح في شهر رجب.
وقال أبو عبيد: العتيرة هي الرجبية ذبيحة كانوا يذبحونها في الجاهلية في رجب يتقربون بها لأصنامهم. وقال غيره: العتيرة نذر كانوا ينذرونه، من بلغ ماله كذا أن يذبح من كل عشرة منها رأسا في رجب.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ফার' নেই এবং কোনো 'আতী-রাহও নেই।"
আর ফার' হলো: প্রথম প্রসূত শাবক, যা তারা তাদের তাগুতদের (উপাস্যদের) জন্য যবেহ করত। আর 'আতী-রাহ হলো রজব মাসে (যবেহ করা পশু)।
7074 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا فرعةً ولا عتيرةً".
صحيح: رواه ابن ماجه (3169) عن محمد بن أبي عمر العدني، ثنا سفيان بن عيينة، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره. وقال ابن ماجه عقبه:"هذا من فرائد العدني".
قلت: وإسناده صحيح، وابن أبي عمر العدني شيخ ابن ماجه صاحب المسند مشهور بالرواية عن سفيان بن عيينة.
وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 59):"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات".
فقه الحديث:
اختلف أهل العلم في الجمع بين هذين الحديثين والأحاديث التي قبلهما القاضية بجواز العتيرة أو الأمر بهما.
فجمع بعضهم بحمل الأحاديث المذكورة على الندب، وحديث أبي هريرة وابن عمر على عدم الوجوب، فقوله:"لا فرع ولا عتيرة" أي لا فرع واجب ولا عتيرة واجبة، وإليه ذهب إسحاق بن راهويه فقال عقب روايته حديث عائشة: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالفرع من خمس واحدة" قال:"لا فرع ولا عتيرة" نقول:"لا واجب". اهـ.
وهو مذهب الشافعي وبعض أصحابه قال النووي في شرح مسلم (13/ 137):"والصحيح عند أصحابنا وهو نص الشافعي استحباب الفرع والعتيرة، وأجابوا عن حديث"لا فرع ولا عتيرة" بثلاثة أوجه:
أحدها: جواب الشافعي السابق أن المراد نفي الوجوب.
والثاني: أن المراد نفي ما كانوا يذبحون لأصنامهم.
والثالث: أنهما ليسا كالأضحية في الاستحباب، أو في ثواب إراقة الدم، فأما تفرقة اللحم على المساكين فبر وصدقة، وقد نص الشافعي في سنن حرملة أنها إن تيسرت كل شهر كان حسنا هذا تلخيص حكمها في مذهبنا" اهـ.
وذهب جمهور العلماء إلى إبطال الفرع والعتيرة، وأن الأحاديث الواردة في مشروعيتها قد نسخت بحديث أبي هريرة في النهي عنهما، وإن لم يعلم التاريخ غير أن قواعد الترجيح تقتضي ذلك؛ لأن النهي لا يكون إلا عن شيء كان يفعل، ولم يقل أحد إنه نهى عنهما ثم أذن في فعلهما، وإنما كان آخر الأمرين النهي عن فعلهما. وقد حكى القاضي عياض عن جماهير العلماء نسخ الأمر بالفرع والعتيرة نقله عنه النووي في شرح مسلم (13/ 137).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কোনো ফার‘আ নেই এবং কোনো ‘আতীরাও নেই।”
7075 - عن سمرة بن جندب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل غلام رَهينة بعقيقته، تذبح عنه يوم سابعه، ويحلق ويسمّى".
صحيح: رواه أبو داود (2838)، والترمذي (1522)، والنسائي (4220)، وابن ماجه (3165) والإمام أحمد (20083) كلهم من طرق عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
وإسناده صحيح، والحسن هو البصري، قد سمع عن سمرة بن جندب هذا الحديث لما رواه البخاري في صحيحه عقب حديث أبي هريرة (5472) عن عبد الله بن أبي الأسود، حدثنا قريش بن أنس، عن حبيب بن الشهيد قال:"أمرني ابنُ سيرين أن أسأل الحسن ممن سمع حديث العقيقة فقال: من سمرة بن جندب.
ولأجل هذا ذهب البخاري وشيخه علي بن المديني إلى أن رواية الحسن عن سمرة كلها محمولة على الاتصال.
وقوله:"يسمى" وقيل:"يُدمى" والصحيح"يسمى" كما قال أبو داود وغيره. انظر للمزيد: المنة الكبرى (4/ 525).
ظاهر الحديث يدل على أن يوم الولادة يحب، وعلى هذا فيذبح في اليوم السادس مما بعده.
وقال بعض أهل العلم: لا يحسب يوم الولادة فتذبح في اليوم السابع مما بعده. هكذا قال مالك
إلا أن يولد قبل الفجر من ليلة ذلك اليوم. ومن أخّر عن اليوم السابع فلأبويه أن يعق عنه متى شاءا.
ورُويَ عن عائشة: يعق عنه في الأسبوع الثاني أو الثالث. وبه قال الشافعي، وأحمد ولم يزدْ مالك على الأسبوع الثاني. وقال غيرهم: من فاته اليوم السابع فليذبح متى ما تيسر.
وأما ما رُوِيَ عن بريدة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"العقيقة تُذبح لسبع، أو أربع عشرة، أو إحدى وعشرين" فهو ضعيف. رواه الطبراني في الأوسط (4879)، وفي الصغير (723)، والبيهقي (9/ 303) كلهم من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، عن إسماعيل بن مسلم، عن قتادة، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال الطبراني عقبه:"لم يرو هذا الحديث عن قتادة إلا إسماعيل بن مسلم" وزاد في الصغير:"تفرد به الخفاف".
قلت: وإسماعيل بن مسلم هو المكي متفق على ضعفه.
وبه أعله الهيثمي في المجمع (4/ 59).
قلت: وفي معناه أحاديث أخرى ولا يصح منها شيء.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রতিটি শিশু তার আকীকার বিনিময়ে বন্ধক থাকে। তার পক্ষ থেকে সপ্তম দিনে তা জবাই করা হবে, এবং তার চুল মুণ্ডন করা হবে ও নাম রাখা হবে।
7076 - عن سلمان بن عامر الضبي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"مع الغلام عقيقةٌ، فأهريقوا عنه دمًا، وأميطوا عنه الأذى".
صحيح: رواه البخاري في كتاب العقيقة (5471) عن أبي النعمان، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن محمد، عن سلمان بن عامر قال:"مع الغلام عقيقة".
هكذا رواه موقوفا على سلمان بن عامر، ثم رواه معلقا بصيغة الجزم (5472) فقال: قال أصبغ: أخبرني ابن وهب، عن جرير بن حازم، عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، ثنا سلمان بن عامر الضبي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: مع الغلام عقيقة، فأهريقوا عنه دما وأميطوا عنه الأذى".
وقول البخاري: قال: أصبغ: يشير إلى أنه لم يسمع منه مع أنه من شيوخه فاختلف العلماء هل هو موصول أم مقطوع؟ :
فذهب ابن الصلاح وغيره إلى أنه موصول.
وذهب ابن حزم إلى أنه منقطع. فمن قال: أخرجه البخاري اعتمد على رأي ابن الصلاح، ومن قال: أخرجه معلقا اعتمد على رأي ابن حزم.
وللحديث طرق أخرى ذكرتها في المنة الكبرى (4/ 516).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن مع الغلام عقيقة فأهريقوا عنه دما، وأميطوا عنه الأذى" فهو خطأ، والصواب أنه عن سلمان بن عامر الضبي كما مضى.
رواه البزار - كشف الأستار - (1236) من طريق إسرائيل - والحاكم (4/ 238) من طريق جرير بن حازم - كلاهما عن عبد الله بن المختار، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره. ولفظهما سواء، وزاد الحاكم: قال جرير: سئل الحسن عن الأذى فقال: هو الشعر.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وعزاه الهيثمي في المجمع (4/ 58) للبزار وقال:"رجاله رجال الصحيح".
قلت: وتصحيح الحاكم له بناءًا على ظاهر السند ولكن أصحاب ابن سيرين الثقات كأيوب، وحبيب بن الشهيد، ويونس بن عبيد، وقتادة وغيرهم كلهم رروه عن محمد بن سيرين، عن سلمان بن عامر الضبي كما مضى.
ولذلك قال الدارقطني في الغرائب كما في أطراف الغرائب والأفراد للمقدسي (5405):"تفرد به عبد الله بن المختار عنه، عن أبي هريرة، والمحفوظ عن سلمان بن عامر الضبي" اهـ.
تنبيه: وقع في إسناد طبعة المستدرك سقط، وهو مثبت في"إتحاف المهرة لابن حجر" (15/ 541).
সালমান ইবন আমির আদ-দাব্বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "শিশুপুত্রের পক্ষ থেকে আকীকা (কুরবানি) রয়েছে। সুতরাং তোমরা তার পক্ষ থেকে রক্ত প্রবাহিত করো এবং তার থেকে কষ্টদায়ক জিনিস দূর করো।"
7077 - عن عبد الله بن عمرو قال: سُئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن العقيقة فقال:"لا يحب الله عز وجل العقوقَ" وكأنه كره الاسم. قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إنما نسألك أحدُنا يُولد له؟ قال:"من أحب أن ينسك عن وَلَده فلينسكْ عنه؛ عن الغلام شاتان مُكافأتان، وعن الجارية شاة".
قال أبو داود: سألت زيد بن أسلم عن المكافأتان؟ قال: الشاتان المشبهتان تُذبحان جميعا.
حسن: رواه أبو داود (2842)، والنسائي (4212)، والإمام أحمد (6713، 6822)، والحاكم (4/ 238) من طرق عن داود بن قيس الفرّاء، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده فذكره. واللفظ للنسائي، وهو عند أبي داود وأحمد في الموضع الأول فيه السؤال عن الفرع والعتيرة. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وأما ما روي عن رجل من بني ضمرة، عن أبيه أنه قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن العقيقة؟ فقال:"لا أحب العقوق" - وكأنه إنما كره الاسم -. وقال:"مَنْ وُلِد له ولدٌ، فأحب أن ينسُكَ عن ولده فليفعلْ". ففيه جهالة الرجل الذي من بني ضمرة، وأبوه الظاهر أنه صحابي فلا تضر جهالته.
رواه مالك في العقيقة (1) عن زيد بن أسلم، عن رجل من بني ضمرة به.
ومن طريق مالك رواه أحمد (23134)، والبيهقي (9/ 300) ثم قال البيهقي على إثره:"وهذا إذا انضمّ إلى الأول (يعني حديث عبد الله بن عمرو السابق) قَوِيَا".
وقوله صلى الله عليه وسلم:"لا أحب العقوق" اختلف أهل العلم في توجيهه، فقيل: إنما كره الاسم فقط لا مشروعية العقيقة؛ لاشتراك العقوق، والعقيقة في أصل العقّ، وقد ورد هذا التفسير في الحديث نفسه.
قال الخطابي في معالم السنن: قوله:"لا يحب الله العقوق" ليس فيه توهين لأمر العقيقة، ولا إسقاط وجوبها، وإنما استبشع الاسم، وأحب أن يسميه بأحسن منه، فليسمِّها: النسِكة أو الذبيحة". وقيل غير ذلك انظر: تحفة المودود ص (99).
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আকীকা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলা 'আল-উকুক' (পিতামাতার অবাধ্যতা/সম্পর্ক ছিন্ন করা) পছন্দ করেন না।" যেন তিনি (আকীকা) নামটি অপছন্দ করলেন। (উপস্থিত সাহাবীগণ/জিজ্ঞাসাকারী) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বললেন: "আমরা তো আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি—যদি আমাদের কারো সন্তান জন্ম নেয় (তখন করণীয় কী)?" তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি তার সন্তানের পক্ষ থেকে যবেহ (নুসুক) করতে পছন্দ করে, সে যেন তার পক্ষ থেকে তা করে নেয়; ছেলের পক্ষ থেকে দুটি 'মুকআফ্আতান' (পরস্পর সমজাতীয়) ছাগল, আর মেয়ের পক্ষ থেকে একটি ছাগল।"
আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি যায়েদ ইবনে আসলামকে ‘আল-মুকআফ্আতান’ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: (এর অর্থ) দুটি সদৃশ (পরস্পর অনুরূপ) ছাগল, যা একত্রে যবেহ করা হবে।
7078 - عن عائشة قالت: كانوا في الجاهلية إذا عقّوا عن الصبي خضبوا قُطْنةً بدم
العقيقة، فإذا حلقوا رأس الصبي وضعوها على رأسه فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اجعلوا مكان الدم خلوقًا".
صحيح: رواه ابن حبان (5308) من طريق حجاج (هو ابن محمد المصيصي الأعور) - ، والبزار - كشف الأستار (1239) من طريق روح بن عبادة - كلاهما عن ابن جريج، أخبرني يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن عمرة (هي بنت عبد الرحمن)، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহিলিয়াতের যুগে তারা যখন কোনো শিশুর পক্ষ থেকে আকীকা করত, তখন তারা আকীকার রক্ত দ্বারা তুলা রঞ্জিত করত। অতঃপর যখন তারা শিশুর মাথা মুণ্ডন করত, তখন তারা ঐ তুলা তার মাথার উপর রেখে দিত। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "রক্তের পরিবর্তে খলূক (সুগন্ধি) ব্যবহার করো।"
7079 - عن بريدة بن الحصيب قال: كنا في الجاهلية إذا وُلِد لأحدنا غلام ذبح شاةً ولطخ رأسه بدمها، فلما جاء الله بالإسلام كنا نذبح شاة ونحلق رأسه ونلطخه بزعفران.
حسن: رواه أبو داود (2843) - ومن طريقه البيهقي (9/ 302 - 303) - والحاكم (4/ 238) كلهم من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسين بن واقد وهو المروزي القاضي حسن الحديث، وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين.
وأما ما روي عن يزيد بن عبْد المزني أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يُعَقُّ عن الغلام، ولا يُمسُّ رأسُه بدَمٍ". فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (3166) عن يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدثنا عبد الله بن وهب، قال: حدثني عمرو بن الحارث، عن أيوب بن موسى أنه حدثه أن يزيد بن عبد المزني حدّثه، فذكره.
ورجاله ثقات غير يزيد بن عبْد المزني، فلم يرو عنه إلا أيوب بن موسى القرشي الأموي، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين (5/ 543) على قاعدته في توثيق المجاهيل.
وقد زاد بعضهم بعد يزيد بن عبد"عن أبيه".
كذلك رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1108)، والطحاوي في مشكله (1052) ومداره على يزيد بن عبد وهو مجهول، وكذلك لم تثبت صحية لأبيه كما في الإصابة (9488) في القسم الرابع، فهو مجهول أيضا إذ لم يرو عنه إلا ابنه.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা জাহেলিয়াতের যুগে ছিলাম, যখন আমাদের কারো ছেলে সন্তান জন্ম নিত, তখন আমরা একটি বকরী যবেহ করতাম এবং সেটির রক্ত দিয়ে বাচ্চার মাথা মাখিয়ে দিতাম। অতঃপর যখন আল্লাহ তাআলা ইসলাম নিয়ে আসলেন, তখন আমরা একটি বকরী যবেহ করতাম, তার মাথা মুণ্ডন করতাম এবং তা জাফরান দ্বারা মাখিয়ে দিতাম।
7080 - عن ابن أبي مُلَيْكة قال: نُفِس لعبد الرحمن بن أبي بكر غلامٌ، فقيل لعائشة: يا أم المؤمنين، عُقِّي عنه جَزورًا، فقالت: معاذ الله، ولكن ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"شاتان مكافأتان".
حسن: رواه الطحاوي في شرح المشكل (1042)، والبيهقي (9/ 301) من طريق عبد الجبار بن ورْد المكي قال: سمعت ابن أبي مليكة قال فذكره.
وإسناده حسن؛ من أجل عبد الجبار بن الورْد فإنه صدوق حسن الحديث.
وروى عبد الرزاق في مصنفه (7956) عن ابن جريج، قال: أخبرنا يوسف بن ماهك قال: دخلتُ أنا وابنُ مليكة (كذا) على حفصة بنت عبد الرحمن بن أبي بكر، وولدت للمنذر بن الزبير غلاما، فقلتُ: هلّا عققتِ جزورا على ابنك؟ فقالت: معاذ الله كانت عمتي عائشة تقول: على الغلام شاتان، وعلى الجارية شاة. وإسناده صحيح.
قال ابن القيم في تحفة المودود ص (136 - 137): وقد اختلف الفقهاء هل يقوم غير الغنم مقامها في العقيقة؟ .
قال ابن المنذر: واختلفوا في العقيقة بغير الغنم، فروينا عن أنس بن مالك: أنه كان يعق عن ولده الجزور.
وعن أبي بكرة أنه نحر عن ابنه عبد الرحمن جزورا، فأطعم أهل البصرة. ثم ساق عن الحسن قال: كان أنس بن مالك يعق عن ولده الجزور، ثم ذكر من حديث يحيى بن يحيى: أنبأنا هشيم، عن عيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه: أن أبا بكرة وُلِد له ابنه عبد الرحمن، وكان أول مولود وُلد في البصرة، فنحر عنه جزورا، فأطعم أهل البصرة، وأنكر بعضهم ذلك، وقال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بشاتين عن الغلام، وعن الجارية بشاة. ولا يجوز أن يعق بغير ذلك … قال ابن المنذر: ولعل حجة من رأى أن العقيقة تجزئ بالإبل والبقر قول النبي صلى الله عليه وسلم:"مع الغلام عقيقته فأهريقوا عنه دما"، ولم يذكر دما دون دم فما ذُبحَ عن المولود على ظاهر هذا الخبر يجزئ.
قال: ويجوز أن يقول قائل: إنَّ هذا مجمل وقول النبي صلى الله عليه وسلم:"عن الغلام شاتان وعن الجارية شاة مُفَسَّرٌ، والمفسَّر أولى من المجمل.
وقال مالك: الضأنُ في العقيقة أحبُّ إليّ من البقر، والغنمُ أحبُّ إلي من الإبل، والبقرُ والإبلُ في الهدي أحبُّ إلي من الغنم، والإبلُ في الهدي أحبُّ إلي من البقرِ.
قلت: ثمة ملاحظة أخرى في تفضيل الغنم على الإبل وبالعكس، وهي مصلحة الطاعمين، فإذا كانوا كثيرين فالجزور أفضل، وإذا كانوا قليلين فالشاة أفضل مع مراعاة رغبتهم في نوع اللحوم.
ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবদুর রহমান ইবনু আবী বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি পুত্রসন্তান জন্ম গ্রহণ করল। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলা হলো: হে উম্মুল মু'মিনীন, আপনি তার পক্ষ থেকে একটি উট আক্বীকা করে দিন। তিনি বললেন: আল্লাহ্ আশ্রয় দিন! বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা বলেছেন (তা হলো): "দুটি সমমানের ছাগল।"
7081 - عن ابن عباس قال: عقَّ رسول الله عن الحسن والحسين رضي الله عنهما بكبشين كبشين.
صحيح: رواه النسائي (4219) عن أحمد بن حفص بن عبد الله قال: حدثني أبي قال: حدثني إبراهيم هو ابن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه أبو داود (2841) ومن طريقه البيهقي (9/ 299)، وابن الجارود (911) وغيرهم عن عبد الوارث، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره نحوه.
ولكن قال ابن الجارود عقبه:"رواه الثوري وابن عيينة وحماد بن زيد وغيرهم عن أيوب لم يجاوزا به عكرمة". وكذا أعله أيضا أبو حاتم بالإرسال وقال:"والمرسل أصح". العلل (2/ 49).
قلت: متابعة أيوب مع الاختلاف عليه لقتادة تشعر بصحة وصله فلعل أيوب مرة وصله وأخرى أرسله، والعمدة فيه حديث قتادة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে দুটি দুটি করে দুম্বা দ্বারা আকীকা করেছিলেন।
7082 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم عقَّ عن الحسن والحسين.
حسن: رواه أبو بكر بن أبي شيبة (24714) وعنه أبو يعلى (1933)، والطبراني في الكبير (2573) من طريق شبابة بن سوار، عن المغيرة بن مسلم، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل المغيرة بن مسلم فإنه صدوق حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات.
وقال البوصيري في مختصر الإتحاف:"رواه أبو بكر بن أبي شيبة وعنه أبو يعلى بإسناد حسن".
وقال الهيثمي في المجمع (4/ 57):"رواه أبو يعلى ورجاله ثقات".
قلت: وله طريق آخر؛ رواه الطبراني في الأوسط (6704)، والصغير (891)، وابن عدي في الكامل (3/ 1074 - 1075) - وعنه البيهقي (8/ 324)، كلهم من طريق محمد بن أبي السري، عن الوليد بن مسلم، عن زهير بن محمد، عن محمد بن المنكدر، عن جابر به، فذكره بمثله وزاد:"وختنهما لسبعة أيام".
وهي زيادة شاذة أو منكرة؛ لأن زهير بن محمد الخراساني المروزي ثم المكي وإن كان ثقة غير أنه ضُعِّف في رواية الشاميين عنه وهذا منها. نصَّ على ذلك البخاري وغيره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে আকীকা করেছেন।
7083 - عن بريدة بن الحصيب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عقَّ عن الحسن والحسين.
حسن: رواه النسائي (4213)، وأحمد (23001) من طريق حسين بن واقد، حدثني عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره. وإسناده حسن من أجل حسين بن واقد المروزي فإنه حسن الحديث.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে আকীকা করেছিলেন।
7084 - عن عائشة قالت: عق رسول الله صلى الله عليه وسلم عن حسن وحُسين يوم السابع، وسمّاهما، وأمر أن يُماط عن رؤوسهما الأذى.
حسن: رواه ابن حبان (5311)، والحاكم (4/ 237)، والبيهقي (9/ 299 - 300) كلهم من طريق عبد الله بن وهب، أخبرني محمد بن عمرو، عن ابن جريج، عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) عن عمرة، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو اليافعي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه، وهو في هذا الحديث لم ينفرد به عن ابن جريج، بل توبع عليه، تابعه عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي روّاد، وموسى بن طارق أبو قرة.
فرواه أبو يعلى (4521)، والبيهقي (9/ 303 - 304) من طريق عبد المجيد بن عبد العزيز بن
أبي رواد، عن ابن جريج بإسناده عن عائشة قالت: يُعَقُّ عن الغلام شاتان مكافئتان، وعن الجارية شاة. قالت عائشة: فعق رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحسن والحسين ثاتين شاتين يوم السابع، وأمر أن يُماط عن رأسه الأذي وقال:"اذبحوا على اسمه وقولوا: بسم الله، الله أكبر، اللهم منك ولك هذه عقيقةُ فلانٍ. قال: وكانوا في الجاهلية تؤخذ قُطْنةٌ تُجعَل في دم العقيقة، ثم توضع على رأسه فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجعلوا مكان الدم خلوقا.
ورواه البيهقي من طريق أبي قرة، عن ابن جريج به وفيه: عن الحسن شاتين، وعن الحسين شاتين ذبحهما يوم السابع وسماهما.
وأبو قرة اسمه موسى بن طارق الزبيدي القاضي، هو ثقة يغرب.
وقوله في حديث ابن أبي رواد:"اذبحوا على اسمه … هذه عقيقة فلان". زيادة شاذة أو منكرة، تفرد بها عبد المجيد بن أبي رواد، وهو مختلف فيه فوثقه بعضهم وتكلم بعضهم فيه من قبل حفظه، فمثله لا يحتمل أن يتفرد بهذه الزيادة.
وأما التسمية والتكبير على الذبيحة فصحّت من حديث أنس وغيره كما سبق في كتاب الذبائح وكتاب الأضاحي.
وأما قوله:"وكانوا في الجاهلية ...." الخ فقد تابعه عليه حجاج بن محمد المصيصي الأعور عند ابن حبان (5308)، وفيه تصريح ابن جريج بالإخبار عن يحيى بن سعيد، فانتفت شبهة تدليسه.
وبالجملة فحديث عائشة بهذه المتابعات صحيح إن شاء الله، وقد صحّ إسناده الحاكم وغيره.
وفي الباب عن أنس بن مالك قال: عقَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن حسن وحسين بكشبين.
رواه ابن حبان (5309)، وأبو يعلى (2945)، والبزار - كشف الأستار - (1235)، والبيهقي (9/ 99) كلهم من طريق ابن وهب، عن جرير بن حازم، عن قتادة، عن أنس فذكره. وليس عند أبي يعلى:"بكبشين".
فصحّحه ابن حبان، وعبد الحق الإشبيلي في الأحكام الوسطى (4/ 124)، وكذا الحافظ البوصيري فعزاه في مختصر الإتحاف لأبي يعلى والبزار وقال:"بإسناد صحيح".
وهذا الحكم منهم بناء على ظاهر الإسناد، لكن فيه علة خفية أشار إليها أبو حاتم الرازي رحمه الله فقال:"أخطأ جرير في هذا الحديث إنما هو قتادة عن عكرمة قال:"عق رسول الله صلى الله عليه وسلم" مرسل. العلل (2/ 50).
وقال البزار عقب الحديث:"لا نعلم أحدا تابع جريرا عليه".
قلت: وقد تكلم الأئمة في رواية جرير عن قتادة خاصة، فنقل الأثرم عن الإمام أحمد أنه قال:"كان يحدث بالتوهم أشياء عن قتادة يسندها بواطيل". شرح العلل لابن رجب (2/ 509).
وفي الباب أيضا ما روي عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم عقَّ عن الحسن
والحسين عن كل واحد منهما كبشين اثنين مثلين مكافئتين.
رواه الحاكم (4/ 237) من طريق سوار أبي حمزة، عن عمرو بن شعيب به فذكره. وسكت عليه الحاكم، وتعقبه الذهبي في تلخيصه بقوله قلت:"سوار ضعيف".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সপ্তম দিনে হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে আকীকা করলেন, এবং তাঁদের নাম রাখলেন, আর তিনি নির্দেশ দিলেন যেন তাঁদের মাথা থেকে অপবিত্রতা দূর করা হয়।
7085 - عن أم كُرْزٍ قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عن الغلام شاتان، وعن الجارية شاة".
صحيح: رواه أبو داود (2836)، وأحمد (27143) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن عبيد الله بن أبي يزيد، عن سباع بن ثابت، عن أم كُرْز، فذكرته.
ورجاله كلهم ثقات إلا سباع بن ثابت، فقد ذكره ابن حبان في ثقات التابعين (4/ 348) وقال ابن سعد:"روي عن عمر بن الخطاب وكان قليل الحديث". وقال الذهبي:"لا يكاد يعرف".
لكن قال الحافظ في التهذيب (3/ 452):"ذكره أبو القاسم البغوي، وابن قانع في الصحابة وأخرجا له حديثه: أدركتُ من الجاهلية أنهم كانوا يطوفون بين الصفا والمروة" الحديث. لكنه موقوف، فيكون من المخضرمين بل من الصحابة لمعنى ذكرته في كتابي في الصحابة" اهـ.
قلت: ترجم له في القسم الأول من الإصابة (2/ 13) وأورد له الأثر المذكور ثم قال:"ووجه الدلالة من هذا على صحبته ما تقدم من أنه لم يق بمكة قرشيٌّ إلا شهد حجة الوداع مع النبي صلى الله عليه وسلم وهذا قرشي أدرك الجاهلية وبقي بعد ذلك حتى سمع منه عبيد الله بن أبي يزيد وهو من صغار التابعين" اهـ. وعليه فإن ثبتت صحبته فالإسناد صحيح، وإلا فقد توبع.
رواه أبو داود (2834)، والنسائي (4216)، والإمام أحمد (27142) من طرق عن سفيان بن عينة، عن عمرو بن دينار، عن عطاء (هو ابن أبي رباح)، عن حبيبة بنت ميسرة، عن أم كرز الكعبية قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"عن الغلام شاتان مكافئتان، وعن الجارية شاة".
ورواه ابن حبان (5313) من طريق عبد الرزاق - وهو في مصنفه (7953) - عن ابن جريج أخبرني عطاء به مثله، وزاد فقلت له - يعني عطاء -: ما المكافئتان؟ قال: مِثْلان، ذُكْرانُها أحبُّ إليه من إناثها".
ورجاله ثقات غير حبيبة بنت ميسرة تفرد عنها عطاء، ولم يوثقها غير ابن حبان بذكره إياها في الثقات (4/ 194)؛ ولذلك قال الحافظ:"مقبولة" يعني حيث تتابع، وقد توبعت، نابعها سباع بن ثابت كما سبق.
تنبيه: حديث سباع بن ثابت عن أم كُرْز رواه أيضا سفيان بن عيينة لكنه زاد في إسناده رجلا.
وهو ما رواه أبو داود (2835)، وابن ماجه (3162)، والإمام أحمد (27139)، وصححه ابن حبان (5312)، والحاكم (4/ 237 - 238) كلهم من طرق عن سفيان بن عيينة، عن عبيد الله بن أبي يزيد، عن أبيه، عن سباع بن ثابت، به مثله. وزادوا إلا ابن ماجه:"لا يضركم أذُكْرانا كنَّ أمْ إناثًا".
وزاد أبو داود، وأحمد، والحاكم حديثا آخر وهو قوله صلى الله عليه وسلم:"أقرُّوا الطير على مكانتها". وقال الحاكم: صحيح الإسناد. إلا أن الأئمة حكموا على رواية سفيان هذه بالوهم.
فقد قال الإمام أحمد في مسنده عقب حديث هذا - وكان قد ساق له حديثين آخرين بالإسناد نفسه - قال:"سفيان يهِمُ في هذه الأحاديث، عبيد الله سمعها من سباع بن ثابت".
وكذلك قال أبو داود السجستاني عقب حديث حماد بن زيد:"هذا هو الحديث، وحديث سفيان وهمٌ". وفي نسخة الحافظ المزي كما في تحفة الأشراف (13/ 99) قال:"هذا الحديث هو الصحيح، وحديث سفيان خطأ". انظر مزيدا من التخريج في المنة الكبرى (4/ 525).
উম্মে কুরয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ছেলের পক্ষ থেকে দুটি বকরী এবং মেয়ের পক্ষ থেকে একটি বকরী।
7086 - عن أسماء بنت يزيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"العقيقة عن الغلام شاتان مكافئتان، وعن الجارية شاة".
حسن: رواه الإمام أحمد (27582)، والطبراني (24/ 461) من طريق إسماعيل بن عياش، عن ثابت بن عجلان، عن مجاهد، عن أسماء فذكرته.
ورواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (3353) من طريق إسماعيل بن عياش به بلفظ:"العقيقة حقٌّ عن الغلام …".
وإسناده حسن من أجل ثابت بن عجلان الحمصي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف. ومن أجل إسماعيل بن عياش أيضا فهو صدوق إذا حدث عن أهل بلده وهذه منها.
আসমা বিনত ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ছেলের আকীকা হলো দুটি সমমানের বকরী, আর মেয়ের জন্য একটি বকরী।"
7087 - عن عائشة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرهم عن الغلام شاتان مكافئتان، وعن الجارية شاة.
حسن: رواه الترمذي (1513)، وابن ماجه (3163)، وأحمد (24028) وصححه ابن حبان (5310) كلهم من طريق عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن يوسف بن ماهك أنهم دخلوا على حفصة بنت عبد الرحمن فسألوها عن العقيقة فأخبرتهم أن عائشة أخبرتها فذكرته.
وإسناده حسن من أجل ابن خثيم فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.
وقوله:"مكافئتان" أي متساويان في السنّ، وقيل: متقاربتان، وسبق في إحدى طرق حديث أم كرز أن عطاء فسّره بالمِثْلَين.
وفي هذه الأحاديث حجة للجمهور في التفرقة بين الغلام والجارية.
وقال مالك في الموطأ (2/ 502):"الأمر عندنا في العقيقة أن من عقَّ فإنما يعق عن ولده بشاةٍ شاةٍ الذكور والإناث". وروي مثل ذلك من فعل ابن عمر، وعروة بن الزبير.
والصواب ما عليه جمهور العلماء في المفاضلة بين الذكور والإناث في العقيقة.
قال الحافظ ابن القيم في تحفة المودود ص (115):"وهذه قاعدة الشريعة فإن الله تعالى
سبحانه فاضل بين الذكر والأنثى، وجعل الأنثى على النصف من الذكر في المواريث، والديات والشهادات والعتق … فجرت المفاضلة في العقيقة هذا المجرى لو لم يكن فيها سنة، كيف والسنن الثابتة صريحة بالتفضيل". اهـ.
ودلت هذه الأحاديث على استحباب العقيقة على الإناث أيضا وهو قول جمهور أهل العلم من الصحابة والتابعين ومن بعدهم، وكان الحسن وقتادة لا يريان عن الجارية عقيقة، حكي ذلك عنهما أبو بكر بن المنذر كما في المصدر السابق ص (112).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যে, ছেলে সন্তানের পক্ষ থেকে দুটি সমতুল্য ছাগল এবং কন্যা সন্তানের পক্ষ থেকে একটি ছাগল (আকিকা দিতে হবে)।