হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7141)


7141 - عن وعن ابن عباس قال: مرَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بعَنْزٍ ميتة، فقال:"ما على أهلها لو انتفعوا بإهابها".

صحيح: رواه البخاري في الذبائح (5532) عن خطّاب بن عثمان، حدّثنا محمد بن حِمْيَر، عن ثابت بن عجلان، قال: سمعتُ سعيدَ بن جبير قال: سمعتُ ابن عباس، فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মৃত ছাগীর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন, "এর মালিকদের কী এমন ক্ষতি হতো যদি তারা এর চামড়া কাজে লাগাতো?"









আল-জামি` আল-কামিল (7142)


7142 - عن سودة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: ماتتْ لنا شاةٌ، فدبغْنا مَسْكها، ثم ما زلنا نَنْبِذُ فيه حتى صار شنًّا.

صحيح: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6686) عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد الله (هو
ابن المبارك)، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن سودة، فذكرته.

قولها:"مَسْكها" أي جلدها.

وقولها:"صار شنًّا" أي باليًا.




সওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের একটি ছাগল মারা গেল। তখন আমরা সেটির চামড়া পাকিয়ে নিলাম। এরপর আমরা অনবরত তাতে নাবীয (পানীয়) ভিজিয়ে রাখতাম, যতক্ষণ না তা পুরাতন (জীর্ণ) হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (7143)


7143 - عن ميمونة أن داجنةً كانت لبعض نساء رسول الله صلى الله عليه وسلم فماتتْ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أخذتم إهابها فاستمتعتم به".

صحيح: رواه مسلم (364) عن أحمد بن عثمان النوفلي، حدّثنا أبو عاصم، حدّثنا ابن جريج، أخبرني عمرو بن دينار، أخبرني عطاء منذ حين قال: أخبرني ابن عباس، أن ميمونة، أخبرته؛ فذكرته، و"الداجنة": هي الشاة التي تربي في البيت.




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্য থেকে কারো একটি গৃহপালিত পশু মারা গিয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা কেন এর চামড়াটি নিয়ে তা ব্যবহার করলে না?"









আল-জামি` আল-কামিল (7144)


7144 - عن ابن عباس قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا دُبغَ الإهاب فقد طهُرَ".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (366: 105) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم، أن عبد الرحمن بن وعلة أخبره، عن عبد الله بن عباس فذكره.

ورواه مالك في الصيد (17) عن زيد بن أسلم به مثله.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন কাঁচা চামড়া প্রক্রিয়াজাত (ডাবাগাত) করা হয়, তখন তা পবিত্র হয়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7145)


7145 - عن أبي الخير قال: رأيتُ على ابنِ وعلةَ السبئي فَرْوًا، فَمَسِسْتُه فقال: مالك تَمْسُّه؟ قد سألتُ عبد الله بن عباس، قلت: إنا نكونُ بالمغرب ومعنا البربر والمجوسُ، نُؤتى بالكبش قد ذبحوه، ونحن لا نأكل ذبائحهم، ويأتونا بالسقاء يجعلون فيه الودك، فقال ابن عباس: قد سألنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك؟ فقال:"دباغُه طهورُه".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (366: 106) من طريق عمرو بن الربيع، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن يزيد بن أبي حبيب، أن أبا الخير حدثه، فذكره.




আবু আল-খাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনু ওয়ালাহ আস-সাবঈ-এর গায়ে পশমের একটি পোশাক (ফারওয়া) দেখলাম। আমি সেটি স্পর্শ করলে সে বলল, তুমি এটা স্পর্শ করছো কেন? (সে বলল:) আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। আমি বললাম: আমরা মাগরিবের (পশ্চিমাঞ্চলে) বসবাস করি এবং আমাদের সাথে বারবার (বার্বার) ও অগ্নিপূজকরা (মাযূস) থাকে। তারা জবাই করা ভেড়া নিয়ে আসে, কিন্তু আমরা তাদের জবাই করা পশু খাই না। তারা আমাদের কাছে চামড়ার মশক নিয়ে আসে, যার মধ্যে তারা চর্বি (উদক) রাখে। তখন ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা এই বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: “এর প্রক্রিয়াজাতকরণ (দাবাগ) এটিকে পবিত্র করে তোলে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7146)


7146 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذكاة الميتةِ دباغُها".

صحيح: رواه النسائي في الصغري (4258)، وفي الكبرى (4554)، والطحاوي في شرح المعاني (1/ 470) كلهم من طريق أبي غسان مالك بن إسماعيل، ثنا إسرائيل، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرته.

وفي أحد لفظي الطحاوي:"دباغُ الميتةِ طهورُها".

وإسناده صحيح، إبراهيم هو ابن يزيد النخعي، والأسود هو ابن يزيد النخعي.

ورواه شريك عن الأعمش كما عند أحمد (25214) واختلف عليه فيه غير أن ما رواه إسرائيل عن الأعمش هو الصواب.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত পশুর পবিত্রতা হলো তা দাবাগাত করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (7147)


7147 - عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"طهور كل أديم دباغُه".
حسن: رواه الدارقطني (124)، والبيهقي (1/ 21) كلاهما من طريق إبراهيم بن الهيثم، حدّثنا علي بن عياش، حدّثنا محمد بن مطرف، حدّثنا زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عائشة فذكرته.

إسناده حسن من أجل الكلام في إبراهيم بن الهيثم غير أنه حسن الحديث، وقد حسّنه الدارقطني وقال البيهقي: رجاله ثقات.

وقال الذهبي في الميزان:"وثّقه الدارقطني والخطيب وذكره ابن عدي في الكامل وقال: حديثه مستقيم سوى حديث الفار فإنه كذبه فيه الناس وواجهوه، وأولهم البرديجي، وأحاديثه جيدة، قد فتشتُ حديثه الكثير فلم أجد له حديثا منكرا يكون من جهته". اهـ




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক চামড়ার পবিত্রতা হলো তার দাবাগাত (ট্যানিং) করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (7148)


7148 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيما إهاب دُبغَ فقد طهُرَ".

حسن: رواه الدارقطني في السنن (1/ 48) وفي العلل (12/ 365) عن أبي بكر النيسابوري (واسمه عبد الله بن محمد بن زياد) -، وأبو الشيخ الأصبهاني في طبقات المحدثين بأصبهان (4/ 48) عن عبد الله بن الحسين بن زهير النيسابوري - كلاهما عن محمد بن عقيل بن خويلد الخزاعي، حدثنا حفص بن عبد الله، ثنا إبراهيم بن طهمان، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

قال الدارقطني في السنن:"إسناده حسن".

وهو كما قال فإن إبراهيم بن طهمان حسن الحديث.

وأيوب هو السختياني، وقد ذكره الدارقطني في كتابه الغرائب والأفراد كما في أطراف ابن القيسراني (3241) قال:"تفرد به حفص، عن إبراهيم بن طهمان، عن أيوب".

وكذلك أورده ابن حجر في إتحاف المهرة (9/ 29) تحت ترجمة أيوب السختياني، عن نافع، عن ابن عمر.

وقيل: هو أيوب بن خوط وهو متروك الحديث، ولو كان هذا صوابا لما احتاج الدارقطني إلى ذكر تفرد إبراهيم بن طهمان عن أيوب.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, "যে কোনো কাঁচা চর্ম বা চামড়া দাবাغت (ট্যানিং) করা হয়, তা পবিত্র হয়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7149)


7149 - عن سلمة بن المحبّق أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ ببيت بفنائه قربة معلقة، فاستقى فقيل: إنها ميتة. قال:"ذكاة الأديم دباغه".

حسن: رواه أبو داود (4125)، والنسائي (4243) وصحَّحه ابن حبان (4522) والحاكم (4/ 141) كلهم من حديث همام، عن قتادة، عن الحسن، عن جون بن قتادة، عن سلمة بن المحبق فذكره. وإسناده حسن، من أجل جون بن قتادة. وقد سئل الإمام أحمد عنه فقال: لا أعرفه، ولكن قال علي بن المديني: جون معروف، وجون لم يرو عنه غير الحسن، إلا أنه معروف.

وقال في موضع آخر: الذين روى عنهم الحسن من المجهولين: فذكرهم وذكر منهم: جون بن قتادة.

قلت: المقصود بقوله من المجهولين أي قليل الرواية، لا أنه غير معروف عنده حتى لا يتعارض قولاه.
فالخلاصة فيه أنه حسن الحديث. انظر أيضًا: التلخيص (1/ 49).

وفي معناه رُوِيَ عن العالية بنت سُبيع أنها قالت: كان لي غنمٌ بأحد، فوقعَ فيها الموتُ، فدخلتُ على ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر ذلك لها، فقالت لي ميمونة: لو أخذت جلودَها فانتفعتِ بها. قالت: فقلت: أو يحل ذلك؟ قالت: نعم. مر على رسول الله صلى الله عليه وسلم رجالٌ من قريش، يَجُرُّون شاةً لهم مثل الحمار فقال لهم رسول صلى الله عليه وسلم الله:"لو أخذتم إهابها". قالوا: إنها ميتة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يطهرها الماء والقرظُ".

رواه أبو داود (4412)، والنسائي (4259)، وأحمد (26833)، وصحَّحه ابن حبان (1219) كلهم من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن كثير بن فرقد، عن عبد الله بن مالك بن حُذافة حدثه عن أمه العالية بنت بيع، أنها قالت: فذكرته.

وفيه عبد الله بن مالك بن حذافة ذكره الذهبي في الميزان وقال: ما روي عنه سوى كثير بن فرقد، ففيه جهالة.

وقال الحافظ"مقبول" يعني حيث يُتابع، ولم أجد من تابعه.

وأمه العالية بنت سُبيع لم يرو عنها إلا ابنُها عبد الله بن مالك ولم يُؤثر توثيقها إلا عن العجلي فقال:"مدنية تابعية ثقة".

وأما الذهبي فذكرها في المجهولات من الميزان.

وفي معناه رُوي أيضًا عن سلمان قال: كان لبعض أمهات المؤمنين شاةٌ فماتتْ، فمرّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عليها فقال: ما ضرَّ أهل هذه لو انتفعوها بإهابها". رواه ابن ماجه (3611) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن ليث، عن شهر بن حوشب، عن سلمان فذكره.

وإسناده ضعيف، لضعف ليث وهو ابن أبي سُليم.

وبه أعلّه البوصيري في مصباح الزجاجة (4/ 153). وفيه شهر بن حوشب وفيه كلام معروف غير أنه حسن الحديث.

وأما ما رُويَ عن المغيرة بن شعبة قال: دعاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بماء، فأتيتُ خباءً فإذا فيه امرأة أعرابيةٌ، قال: فقلت: إن هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو يريد ماء يتوضأ، فهل عندك من ماء؟ قالت: بأبي وأمي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوالله ما تظلُّ السماءُ، ولا تقل الأرضُ روحًا أحب إليَّ من روحه، ولا أعزَّ، ولكن هذه القربة مَسْك ميتة، ولا أحبُّ أُنجس به رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرجعتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبرتُه، فقال:"ارجعْ إليها، فإنْ كانتْ دبغتْها، فهي طهورُها" قال: فرجعتُ إليها، فذكرتُ ذلك لها، فقالت: إي واللهِ، لقد دبغتُها، فأتيتُه بماءٍ منها، وعليه يومئذ جبةٌ شاميةٌ، وعليه خفان، وخمار. قال: فأدخل يديه من تحت الجبة، قال: من ضيق كُمَّيْها. قال: فتوضأ، فمسح على الخمار، والخفين. فهو ضعيف.
رواه أحمد (18225)، والطبراني في الكبير (20/ 368) كلاهما من طريق أبي المغيرة (هو عبد القدوس بن الحجاج)، حدّثنا معان بن رفاعة، حدثني علي بن يزيد، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة الباهلي، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.

واللفظ لأحمد ولم يذكر الطبراني القصة وهو عنده مختصر بلفظ:"عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال في جلد الميتة:"دباغُه طهوره".

وفيه علي بن يزيد الألهاني ضعيف باتفاق أهل العلم، والراوي عنه معان بن رفاعة مختلف فيه، والغالب عليه الضعف.

وكذلك لا يصحُّ ما رُوي عن ثابت قال: كنت جالسًا مع عبد الرحمن بن أبي ليلى في المسجد فأتى رجل ضخم فقال: يا أبا عيسى قال: نعم. قال: حدِّثْنا ما سمعت في الفراء، فقال: سمعتُ أبي يقول: كنتُ جالسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم فأتى رجلٌ فقال: يا رسول الله، أصلّي في الفِراء؟ قال:"فأين الدباغ؟" فلما ولّى قلتُ: من هذا؟ قال: هذا سويدُ بن غفلة.

رواه أحمد (19060) وابنه عبد الله كلاهما عن عبد الله بن محمد بن أبي شيبة، حدّثنا علي بن هاشم، عن ابن أبي ليلى، عن ثابت فذكره.

وفيه ابن أبي ليلى وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى ضعيف.

وقوله:"فلما ولّى قلت … الخ" القائل هو ثابت البناني يسأل عن ذلك الرجل الضخم.

وفي الباب أيضًا عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر أن يُستمتع بجلود الميتة إذا دُبغتْ. رواه مالك في الصيد (18) عن يزيد بن عبد الله بن قُسيط، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أمه، عن عائشة فذكرته.

ومن طريق مالك رواه أبو داود (4124)، والنسائي (4263)، وابن ماجه (3612)، وأحمد (24447)، وصحَّحه ابن حبان (1286).

وأم محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان لم يرو عنها سوى ابنها محمد، ولم يُوثِّقْها سوى ابن حبان؛ ولذا قال الحافظ:"مقبولة" يعني حيث تتابع وإلا فليّنة الحديث. ولم أجد من تابعها على هذا الإسناد.

وبها أعلّه الإمام أحمد. قال عبد الله بن أحمد في كتاب العلل (4827) ما تقول في هذا الحديث؟ قال: فيه أمه، مَن أمه؟ كأنه أنكره من أجل أمه.

وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال: أراد النبي صلى الله عليه وسلم أن يتوضّأ من سقاء، فقيل له: إنه ميتة. قال:"دباغه يُذهبُ خبثَه أو رجسَه أو نجسَه".

رواه أحمد (2878)، وابن خزيمة (114)، والحاكم (1/ 161)، والبيهقي (1/ 17) كلهم من طريق مسعر بن كدام، عن عمرو بن مرة، عن سالم بن أبي الجعد، عن أخيه، عن ابن عباس، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح ولا أعرف له علة".

وقال البيهقي:"وهذا إسناد صحيح، وسألت أحمد بن علي الأصبهاني عن أخي سالم هذا فقال: اسمه عبد الله بن أبي الجعد.

وأقرّها الحافظ في التلخيص. إلا أنَّ في إسناده أخي سالم بن أبي الجعد لم يسم، فإن كان هو عبد الله بن أبي الجعد فلم يوثقه غير ابن حبان فإنه قد ذكره في كتابه الثقات، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول".

وقال ابن القطان الفاسي في بيان الوهم (4/ 396):"لا يعرف حاله". وقال الذهبي في الميزان (2/ 400):"وعبد الله هذا وإن قد وثق ففيه جهالة".

وفي الباب أيضًا عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم استوهب وَضوءًا، فقيل له: لم نجد ذلك إلا في مسك ميتة. قال:"أدبغتموه؟" قالوا: نعم، قال:"فهلُمَّ فإن ذلك طهورُه".

رواه الطبراني في الأوسط (9215) عن مفضل، ثنا أبو حُمَة، ثنا أبو قرة، عن ابن جريج، أخبرني أبو قزعة، عن أنس بن مالك فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (1/ 217):"إسناده حسن".

قلتُ: فيه أبو حمة واسمه محمد بن يوسف الزبيدي لم يوثقه إلا ابن حبان بذكره إياه في الثقات، فقال: من أهل اليمن يروي عن ابن عيينة، وكان راويًا لأبي قرة، حدّثنا عنه المفضل بن محمد الجندي وغيره، ربما أخطأ وأغرب، كنيته أبو يوسف وأبو حمة لقب. وقال ابن القطان:"لا أعرف حاله". وله إسناد آخر أضعف منه.

وأما ما روي عن أم سليم الأشجعية أن النبي صلى الله عليه وسلم أتاها وهي في قبة فقال:"ما أحسنها إن لم يكن فيها ميتة". قالت: فجعلتُ أتتبعُها. فهو ضعيف.

رواه أحمد (27465)، والطبراني في الكبير (25/ 156) كلاهما من طريق سفيان (هو الثوري)، عن حبيب بن أبي ثابت، عن رجل، عن أم سلمة فذكرته.

وإسناده ضعيف فيه رجل لم يُسمّ. وبه أعلّه الهيثمي في المجمع (1/
والزيادة عند ابن حبان (1277)، والطبراني في الأوسط (7642) من طريق أبان بن تغلب، عن الحكم بن عتيبة به. وأبان بن تغلب ثقة.

ورواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2575)، والطبراني في الأوسط (4526)، والطحاوي (1/ 464) والبيهقي في السنن الكبرى (1/ 25) من طرق عن صدقة بن خالد، ثنا يزيد ابن أبي مريم، عن القاسم بن مخيمرة، عن عبد الله بن عُكيم الجهني قال: حدّثنا مشيخة لنا من جهينة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كتب إليهم: أن لا تستمتعوا من الميتة بشيء.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن، ويُروى عن عبد الله بن عكيم، عن أشياخ لهم هذا الحديث، وليس العمل على هذا عند أكثر أهل العلم، وقد روي هذا الحديث عن عبد الله بن عكيم أنه قال: أتانا كتاب النبي صلى الله عليه وسلم قبل وفاته بشهرين.

قال: وسمعتُ أحمد بن الحسن يقول: كان أحمد بن حنبل يذهب إلى هذا الحديث لما ذكر فيه قبل وفاته بشهرين، وكان يقول كان هذا آخر أمر النبي صلى الله عليه وسلم، ثم ترك أحمد بن حنبل هذا الحديث لما اضطربوا في إسناده حيث روى بعضهم فقال: عن عبد الله بن حكيم عن أشياخ لهم من جهينة، وأخذ بحديث ابن عباس. انظر: المنة الكبرى (1/ 293).

وأما ما رُويَ عن جابر بن عبد الله قال: بينا أنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاءه ناسٌ، فقالوا: يا رسول الله، إن سفينةً لنا انكسرتْ، وإنا وجدنا فاقةً سمينة مبينة، فأردنا أن ندّهنَ بها سفينتَنا، وإنما هي عود، وهي على الماء؟ ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنتفعوا بشيء من الميتة". فهو ضعيف.

رواه الطحاوي في شرح معاني الآثار (1/ 468) من طريق ابن وهب قال: حدثني زمعة بن صالح، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وهو في مسند ابن وهب كما في تنقيح التحقيق (1/ 107)، ورواه أيضًا ابن شاهين في ناسخ الحديث ومنسوخه (158)، وابن حيان الأصبهاني في طبقاته (268) كلاهما من طريق زمعة بن صالح به. بلفظ:"لا يُنتفع من الميتة بشيء". وليس عند ابن شاهين ذكر القصة.

وزمعة بن صالح الجندي ضعيف.

فقه الباب:

لا خلاف بين أهل العلم في نجاسة إهاب الميتة قبل دباغه إلا ما رويَ عن الزّهريّ أنه ينتفعُ بجلود الميتة وإن لم تُدبغ، تمسكًا بعموم قوله صلى الله عليه وسلم في حديث ميمونة:"إنما حرم من الميتة أكلُها". واختلفوا في طهارته بعد الدباغ.

فقال شيخ الإسلام ابن تيمية:"أما طهارة جلود الميتة بالدباغ ففيها قولان مشهوران للعلماء في الجملة:

أحدهما: أنها تطهر بالدباغ. وهو قول أكثر العلماء كأبي حنيفة والشافعي وأحمد في إحدى الروايتين.
والثاني: لا تطهر، وهو المشهور في مذهب مالك، وهو أشهر الروايتين عن أحمد أيضا، اختارها أكثر أصحابه، لكن الرواية الأولى هي آخر الروايتين عنه كما نقله الترمذي عن أحمد بن الحسن الترمذي عنه أنه كان يذهب إلى حديث ابن عكيم ثم ترك ذلك بأخرة" اهـ. مجموع الفتاوي (21/ 90 - 91).

وذهب بعض أهل العلم إلى الجمع بين حديث ابن عباس وحديث ابن عُكيم منهم الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى فقال:"وطائفة عملت بالأحاديث كلها، ورأت أنه لا تعارض بينها، فحديث ابن عكيم إنما فيه النهي عن الانتفاع بإهاب الميتة. - والإهاب: هو الجلد الذي لم يدبغ، كما قاله النضر بن شميل، وقال الجوهري: الإهاب الجلد ما لم يدبغ، والجمع: أُهُب - وأحاديث الدباغ: تدل على الاستمتاع بها بعد الدباغ، فلا ننافي بينها، وبهذه الطريقة تأتلف السنن، وتستقر كل سنة منها في مستقرها، وبالله التوفيق". تهذيب السنن (6/ 67 - 68).




সালামাহ ইবনুল মুহাব্বাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ঘরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যার আঙিনায় একটি ঝুলন্ত মশক (পানির পাত্র) ছিল। তিনি পানি চাইলেন। তখন বলা হলো: এটি মৃত প্রাণীর চামড়ার (তৈরি)। তিনি বললেন: "চামড়ার পবিত্রতা হলো তাকে প্রক্রিয়াজাত (দাবাগাত) করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (7150)


7150 - عن أبي المليح بن أسامة، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن جلود السباع. وزاد في رواية: أن تفترش.

صحيح: رواه أبو داود (4132)، والترمذي (1770)، والنسائي (4264)، وأحمد (20706)، والحاكم (1/ 141)، والضياء في المختارة (1379) كلهم من طرق عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أبي المليح فذكره.

قال الحاكم:"هذا الإسناد صحيح، فإن أبا المليح اسمه عامر بن أسامة، وأبوه أسامة بن عمير صحابي من بني لحيان مخرج حديثه في المسانيد".

وهو كما قال، وإن كان سعيد بن أبي عروبة قد اختلط فهو من أعلم الناس بحديث قتادة. وقد رواه عنه جمعٌ منهم أئمة كبار كابن المبارك، وابن علية، ويحيى القطان وغيرهم.

ولكن رواه الترمذي أيضا (1771) من طريق شعبة، عن يزيد الرّشك، عن أبي المليح، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره. ثم قال:"وهذا أصح" يعني المرسل.

وقال قبله:"ولا نعلم أحدًا قال: عن أبي المليح، عن أبيه غير سعيد بن أبي عروبة. كذا قال.

تنبيه:

وقد جاء في الإتحاف لابن حجر (1/ 335) قوله:"رواه أحمد عن محمد بن جعفر وإسماعيل، عن سعيد -. وعن بهز، عن همام - كلاهما عن قتادة به". وكذا في أطراف المسند (1/ 252).

قلت: رواية بهز لم أقف عليها في مسند أسامة بن عمير من"المسند" نعم يوجد بهذا الإسناد حديث الشَّقيص مرسلا (20710)، وحديث الصلاة في الرحال (20711)، فإن ثبت هذا الإسناد عند الإمام أحمد، فيكون همام متابعا لسعيد بن أبي عروبة، وأنه لم يتفرد به كما ذكره الترمذي والله أعلم.
ثم إن مما يقوي الموصول أن شعبة نفسه قد رواه عن قتادة به موصولا بلفظ: أن النبي صلى الله عليه وسلم نهي أن تفترش جلود السباع.

رواه الطبراني في الكبير (1/ 159) من طريق ابن المبارك، عن شعبة به. ويؤيده أيضًا أن معمرًا رواه عن يزيد الرشك، عن أبي المليح - أراه - عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله. رواه الطبراني أيضًا. وبهذا صحَّ الموصول والحمد لله.




উসামা ইবনে উমায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হিংস্র পশুর চামড়া ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন। এবং একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: যেন তা বিছানা হিসেবে ব্যবহার না করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (7151)


7151 - عن معاوية بن أبي سفيان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تركبوا الخزَّ والنمارَ".

قال: وكان معاوية لا يُتّهم في الحديث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه أبو داود (4129)، وابن ماجه (3256) وأحمد (16840) كلهم من طريق وكيع، حدّثنا أبو المعتمر، عن ابن سيرين، عن معاوية فذكره، واللفظ لأبي داود ومثله لفظ أحمد.

ولفظ ابن ماجه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن ركوب النمور.

وإسناده صحيح، وأبو المعتمر قال أبو داود: اسمه يزيد بن طهمان، كان ينزل الحيرة". وهو ثقة أيضًا.




মু'আবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা খাজ (খাজ্জ) ও নিমারের (বাঘ বা চিতাবাঘের চামড়ার) উপর আরোহণ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7152)


7152 - عن أبي شيخ الهنائي قال: كنتُ في ملأ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عند معاوية، فقال معاوية: أنشدكم الله، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن لبس الحرير؟ قالوا: اللهم نعم. قال: وأنا أشهد، قال: أنشدكم الله، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لبس الذهب إلا مقطعا؟ قالوا: اللهم نعم، قال: وأنا أشهد، قال: أنشدكم الله، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن ركوب النمور؟ قالوا: اللهم نعم، قال: وأنا أشهد، قال: أنشدكم الله، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الشرب في آنية الفضة؟ قالوا: اللهم نعم، قال: وأنا أشهد، قال: أنشدكم الله، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن جمع بين حج وعمرة؟ قالوا: أما هذا، فلا، قال: أما إنها معهن.

حسن: رواه أبو داود (1794)، والنسائي (5161)، وأحمد (16833) كلهم من طريق قتادة، عن أبي شيخ الهنائي به. والسياق لأحمد. واختصره أبو داود والنسائي.

وإسناده حسن من أجل أبي شيخ الهُنائي واسمه خيوان وقيل: حيوان بن خلدة، وقيل: ابن خالد - البصري أحد قراء البصرة، وثّقه ابن سعد، والعجلي، وذكره ابن حبان في الثقات، واعتمد قولهم هذا ابن حجر في التقريب فقال:"ثقة"، وتكلم فيه بعضهم وقال: لا يعرف حاله إلا أنه لا ينزل عن درجة الحسن، إلا قوله: أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يقرن بين الحج والعمرة ففيه نكارة كما سبق التنبيه عليه في كتاب الحج.

وأما ما رُوِيَ عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا تصحب الملائكة رفقة فيها جلد نمر فهو شاذ.
رواه أبو داود (4130) عن محمد بن بشار، حدّثنا أبو داود، حدّثنا عمران، عن قتادة، عن زرارة، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه عمران وهو ابن داوَر القطان البصري وهو حسن الحديث إذا لم يخالف، ولكنه خولف في متن هذا الحديث فرواه الإمام أحمد (8998)، والنسائي في الكبرى (8759)، وإسحاق بن راهويه في مسنده - مسند أبي هريرة - (280) كلهم من طريق معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة، فذكر بلفظ: لا تصحب الملائكة رفقة فيها جرس.

وهشام هو ابن أبي عبد الله الدستوائي من أثبت الناس في قتادة حتى قال شعبة: هشام الدستوائي أعلم بحديث قتادة مني وأكثر مجالسة له مني".

وقال ابن معين:"أوثق الناس في قتادة: سعيد (يعني ابن أبي عروبة)، وشعبة، وهشام".

وقد توبع عمران القطان على لفظ الحديث، لكن خولف في إسناده فيما رواه الطبراني في مسند الشاميين (2721) من طريق الوليد بن مسلم، ثنا سعيد بن بشير، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعيد بن هشام، عن عائشة فذكرته بمثل لفظ أبي داود.

فجعله من مسند عائشة وفيه سعيد بن بشير الدمشقي فهو مع ضعفه قد خالف الثقة.

ومما يدل على أن المحفوظ في حديث أبي هريرة ذكر"الجرس" لا"جلد النمر" ما رواه مسلم في كتاب اللباس (2115) من طريق سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: لا تصحب الملائكة رفقة فيها كلب ولا جرس.




আবু শাইখ আল-হিনায়ী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীদের একটি দলের সাথে মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রেশম পরিধান করতে নিষেধ করেছেন? তারা বললেন, হে আল্লাহ, হ্যাঁ (আমরা জানি)। তিনি বললেন, আমিও সাক্ষী দিচ্ছি। তিনি বললেন, আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম স্বর্ণের টুকরা ব্যতীত (অন্যান্য স্বর্ণালংকার) পরিধান করতে নিষেধ করেছেন? তারা বললেন, হে আল্লাহ, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আমিও সাক্ষী দিচ্ছি। তিনি বললেন, আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বাঘের (চামড়ার) উপর আরোহণ করতে নিষেধ করেছেন? তারা বললেন, হে আল্লাহ, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আমিও সাক্ষী দিচ্ছি। তিনি বললেন, আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রূপার পাত্রে পান করতে নিষেধ করেছেন? তারা বললেন, হে আল্লাহ, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আমিও সাক্ষী দিচ্ছি। তিনি বললেন, আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হজ্জ ও উমরাকে একসাথে জমা করতে (ক্বিরান হজ্জ করতে) নিষেধ করেছেন? তারা বললেন, এটি সম্পর্কে, না (আমরা জানি না)। তিনি বললেন, তবে এটিও তাদের সাথে (নিষেধাজ্ঞার অন্তর্ভুক্ত)।









আল-জামি` আল-কামিল (7153)


7153 - عن المقدام بن معديكرب قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحرير، والذهب، ومياثر النمور.

حسن: رواه النسائي في الصغرى (4265)، وفي الكبرى (4566)، وأحمد (17185) من طريق بقية، عن بحير (هو ابن سعد) عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معديكرب.

وإسناده حسن من أجل بقية هو ابن الوليد، وقد تقبل عنعنته مطلقا إذا روى عن بحير بن سعد فكيف إذا صرّح. كذا قاله ابن عبد الهادي.

انظر: تعليقة على العلل لابن أبي حاتم (ص 157).




মিকদাম ইবনু মা'দিকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রেশম, সোনা এবং বাঘের চামড়ার গদি ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7154)


7154 - عن المقدام بن معديكرب أنه قال لمعاوية: أنشدك بالله، هل تعلمُ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لبس جلود السباع والركوب عليها؟ قال: نعم.

حسن: رواه أبو داود (4131)، والنسائي (4266) كلاهما عن عمرو بن عثمان الحمصي، حدّثنا بقية، عن بحير، عن خالد (هو ابن معدان) فذكره.

واللفظ للنسائي، وهو عند أبي داود مطولا وفيه قصة.
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (20/ 269) مطولا، وفي مسند الشامين (1127) مختصرًا، والطحاوي في مشكل الآثار (3251) من طرق عن بقية به.

وإسناده حسن من أجل بقية؛ فإنه رواه عن بحير بن سعد.

وفي الباب عن أبي الحصين - يعني الهيثم بن شفي - قال: خرجت أنا وصاحبٌ لي يكنى أبا عامر - رجل من المعافر - لنصلي بإيلياء، وكان قاصهم رجلٌ من الأزد يقال له: أبو ريحانة من الصحابة. قال أبو الحصين: فسبقني صاحبي إلى المسجد، ثم ردفته، فجلست إلى جنبه، فسألني: هل أدركت قصص أبي ريحانة؟ قلت: لا. قال سمعته يقول: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن عشر: عن الوشر، والوشم، والتف، وعن مكامعة الرجل الرجل بغير شعار، وعن مكامعة المرأة المرأة بغير شعار، وأن يجعل الرجل في أسفل ثيابه حريرا مثل الأعاجم، أو يجعل على منكبيه حريرا مثل الأعاجم، وعن النُّهبَى، وركوب التمور، ولبوس الخاتم إلا لذي سلطان.

رواه أبو داود (4049)، والنسائي (5106)، وأحمد (17209) كلهم من طريق المفضل بن فضالة، عن عياش بن عباس القتباني، عن أبي الصين الهيثم بن شفي به، فذكره. وألفاظهم سواء.

ورواه ابن ماجه (3655)، وأحمد (17210) كلاهما من طريق زيد بن الحباب، حدّثنا يحيى بن أيوب، حدثني عياش بن عباس الحميري به. إلا أنه قال:"عامر الحجري" فذكره بنحو رواية الإمام أحمد، وهو مختصر عند ابن ماجه في النهي عن ركوب النمور.

ومداره على أبي عامر المعافري المصري واسمه عبد الله بن جابر وقيل: اسمه عامر قال ابن حجر:"مقبول" يعني حيث يتابع، ولم أجد من تابعه عليه فهو لين الحديث.

وأما ما روي عن عبد الله بن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الميثرة وهي جلود السباع. فهو ضعيف.

رواه الطحاوي في مشكل الآثار (3248)، وأحمد (5751) كلاهما من طريق الحسن بن سهيل بن عبد الرحمن بن عوف، عن عبد الله بن عمر، فذكره، واللفظ للطحاوي. وهو عند أحمد بأتم منه ولفظه:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المِيثرة، والقَسِّية، وحلقة الذهب، والمفدم.

قال يزيد: والمِيثرة: جلود السباع … وذكر تفسير القسية والمفْدم.

وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي زياد، وشيخه الحسن بن سُهيل تفرد عنه يزيد ولم يوثقه أحد غير ابن حبان ذكره في ثقاته على قاعدته؛ لذا قال ابن حجر:"مقبول" يعني حيث يتابع وإلا فلين الحديث، ولم أجد من تابعه على هذا الإسناد، وقد قال البخاري في تاريخه الكبير:"لا أدري سمع من ابن عمر أم لا".

وقد تبين من لفظ أحمد أن تفسير الميثر بجلود السباع هو من كلام يزيد بن أبي زياد. ولكن علقه البخاري في صحيحه (10/ 292 مع الفتح) فقال:"وقال جرير عن يزيد في حديثه: القسيَّة ثياب مضلعة يجاء بها من مصر، فيها الحرير. والمِيثرة: جلود السباع".
قال الحافظ:"هو طرف أيضًا من حديث وصله إبراهيم الحربي في"غريب الحديث" له عن عثمان بن أبي شيبة، عن جرير بن عبد الحميد، عن يزيد بن أبي زياد، عن الحسن بن سهيل قال: القسيَّة: ثياب مضلعة" اهـ.

قلت: فتبين بهذا أن التفسير الوارد في حديث ابن عمر هو من كلام الحسن بن سهيل شيخ يزيد بن أبي زياد.

وتفسيره الميثرة بجلود السباع تفسير مرجوح لم يوافقة عليه أحد. قال النووي كما في الفتح (10/ 293):"هو تفسير باطل مخالف لما أطبق عليه أهل الحديث". ولذا قال البخاري عقبه:"عاصم أكثر وأصح في المِيثرة".

يعني ما علقه عن عاصم، عن أبي بردة، عن علي رضي الله عنه في تفسيره الميثرة بقوله:"كانت النساء تضعه لبعولتهن مثل القطائف بصفونها".

وقال ابن الأثير:"الميثرة: بالكسر - مِفعلة من الوثارة، ويقال: وثر وثارة فهو وثير أي وطيء لين، وهي من مراكب العجم، تعمل من حرير أو ديباج".




মিক্বদাম ইবনে মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আমি আপনাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি জানেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিংস্র পশুর চামড়া পরিধান করতে এবং তার ওপর আরোহণ করতে নিষেধ করেছেন? তিনি (মু'আবিয়া) বললেন: হ্যাঁ।









আল-জামি` আল-কামিল (7155)


7155 - عن جابر قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فنصيبُ من آنية المشركين وأسقيتهم فنستمتع بها، فلا يعيب ذلك عليهم.

حسن: رواه أبو داود (3838)، والبيهقي (1/ 32) وأحمد (15053) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى - وزاد أبو داود: وإسماعيل (هو ابن علية) - عن برد بن سنان، عن عطاء (هو ابن أبي رباح)، عن جابر فذكره.

وإسناده حسن من أجل برد بن سنان، فإنه حسن الحديث.

ورواه أحمد (14501)، والطحاوي (1/ 473) من طريق محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عطاء بن أبي رباح به نحوه، وزادا"وكلها ميتة"، وزاد الطحاوي:"فتنتفع بذلك".

وإسناده لا بأس به من أجل محمد بن راشد وشيخه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে যুদ্ধে যেতাম। তখন আমরা মুশরিকদের পাত্র ও তাদের পানির মশক পেতাম এবং তা ব্যবহার করতাম। তিনি তাতে কোনো আপত্তি করতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (7156)


7156 - عن * *




৭১৫৬ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (7157)


7157 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيها الناس إن الله طيب لا يقبل إلا طيبا، وإن الله أمر المؤمنين بما أمر به المرسلين فقال: {يَاأَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} وقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} ثم ذكر الرجل يطيل السفر أشعث أغبر، يمد يديه إلى السماء: يا ربِّ يا ربِّ، ومطعمه حرام، ومشربه حرام، وملبسه حرام، وغذي بالحرام فأنى يستجاب لذلك".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1015) عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدّثنا أبو أسامة، حدّثنا فضيل بن مرزوق، حدثني عديٌّ بن ثابت، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে লোক সকল! নিশ্চয় আল্লাহ পবিত্র, আর তিনি পবিত্র বস্তু ছাড়া আর কিছুই গ্রহণ করেন না। আর নিশ্চয় আল্লাহ মুমিনদের সেই নির্দেশই দিয়েছেন যা তিনি রাসূলদের নির্দেশ দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: {হে রাসূলগণ! পবিত্র বস্তুসমূহ থেকে আহার করো এবং সৎকর্ম করো। নিশ্চয় তোমরা যা করো সে সম্পর্কে আমি পরিজ্ঞাত।} এবং তিনি বলেছেন: {হে মুমিনগণ! আমি তোমাদের যে রিযিক দিয়েছি তা থেকে পবিত্র বস্তুসমূহ ভক্ষণ করো।} অতঃপর তিনি এমন এক ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন যে দীর্ঘ সফর করে, যার চুলগুলো এলোমেলো ও ধুলোমলিন, সে আকাশের দিকে দু’হাত তুলে ডাকতে থাকে: হে আমার রব! হে আমার রব! অথচ তার খাদ্য হারাম, পানীয় হারাম, পরিধেয় বস্ত্র হারাম এবং সে হারাম দ্বারা প্রতিপালিত। এমতাবস্থায় তার দোয়া কীভাবে কবুল হতে পারে?"









আল-জামি` আল-কামিল (7158)


7158 - عن ابن عباس قال: كان أهل الجاهلية يأكلون أشياء، ويتركون أشياء تقذرًا، فبعث الله تعالى نبيه، وأنزل كتابه، وأحل حلاله وحرم حرامه، فما أحل فهو حلال، وما حرم فهو حرام، وما سكت عنه فهو عفو وتلا: {قُلْ لَا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَى طَاعِمٍ يَطْعَمُهُ} إلي آخر الآية. [الأنعام: 143].

صحيح: رواه أبو داود (3800)، وابن أبي حاتم في تفسيره (8000)، والحاكم (4/ 115) كلهم من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، ثنا محمد بن شريك المكي، عن عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح، أبو الشعثاء هو جابر بن زيد البصري مشهور بكنيته. وصحّح إسناده الحاكم.

قلت: ظاهره موقوف ولكن فيه حكاية عن مجمل رسالة النبي صلى الله عليه وسلم في الحلال والحرام.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহেলিয়াতের যুগের লোকেরা ঘৃণার কারণে কিছু জিনিস খেত এবং কিছু জিনিস খাওয়া ছেড়ে দিত। অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাঁর নবীকে প্রেরণ করলেন এবং তাঁর কিতাব নাযিল করলেন। তিনি হালালকে হালাল করলেন এবং হারামকে হারাম করলেন। সুতরাং, তিনি যা হালাল করেছেন, তা হালাল; আর তিনি যা হারাম করেছেন, তা হারাম। আর যে বিষয়ে তিনি নীরবতা অবলম্বন করেছেন, তা ক্ষমার (বৈধতার) অন্তর্ভুক্ত। অতঃপর তিনি (ইবনে আব্বাস) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "বলো, আমার প্রতি যা অহী করা হয়েছে, তাতে আমি এমন কোনো খাদ্য পাই না যা কোনো আহারকারীকে আহার করতে হারাম করে দেওয়া হয়েছে..." (সূরা আন'আম: ১৪৩)।









আল-জামি` আল-কামিল (7159)


7159 - عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أحل الله في كتابه فهو حلال، وما حرّم فهو حرام، وما سكت عنه فهو عافية، فاقبلوا من الله عافيته، فإنَّ اللهَ لم يكن نسيًا، ثم تلا هذه الآية: {وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا}.

حسن: رواه الدارقطني (2066)، والحاكم (2/ 375)، وعنه البيهقي (10/ 12) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين - ورواه البزار في مسنده (4087)، والطبراني في مسند الشاميين (2102) من طريق إسماعيل بن عياش - كلاهما عن عاصم بن رجاء بن حيوة، عن أبيه، عن أبي الدرداء، فذكره. وإسناده حسن من أجل عاصم بن رجاء فإنه حسن الحديث.

قال البزار: إسناده صالح. وقال الحاكم: صحيح الإسناد. وعزاه الهيثمي في المجمع (1/ 171) للبزار والطبراني في الكبير وقال:"إسناده حسن ورجاله موثقون".

وأما ما رُويَ عن أبي ثعلبة الخشني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله تعالى فرض فرائض فلا تضيّعوها، وحرّم حرمات فلا تنتهكوها، وحدّ حدودًا فلا تعتدوها، وسكت عن أشياء من غير نسيان فلا تبحثوا عنها". ففيه انقطاع.

رواه الدارقطني (4396)، والحاكم (4/ 115) وعنه البيهقي (10/ 12 - 13)، وابن أبي شية في مسنده - كما في المطالب العالية (2934) - ومن طريقه الطبراني في الكبير (22/ 221 - 222) من طرق عن داود بن أبي هند عن مكحول، عن أبي ثعلبة الخشني، فذكره.

وقال النووي في الحديث الثلاثين من الأربعين:"حديث حسن".

ولكن قال الحافظ في المطالب:"رجاله ثقات إلا أنه منقطع".

قلت: وهو كذلك لأن مكحولا لم يسمع من أبي ثعلبة الخشني كما قاله المزي في تحفة الأشراف (9/ 133).
وثمة خلاف آخر وهو رفعه ووقفه على أبي ثعلبة، فرواه بعضهم عن مكحول من قوله، ولكن الصحيح هو المرفوع عن أبي ثعلبة، وهو الذي رجحه أيضًا الدارقطني في علله (6/ 432).

وكذلك لا يصح ما روي عن سلمان الفارسي أنه قال:"سئل رسول الله عن السمن والجبن والفراء؟ فقال:"الحلال ما أحل الله في كتابه، وما سكت عنه فهو مما عفا عنه".

رواه الترمذي (1726)، وابن ماجه (3367)، والحاكم (4/ 115)، والبيهقي (10/ 12) من طرق عن سيف بن هارون البُرْجمي، عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان الفارسي، فذكره. وإسناده ضعيف من أجل سيف بن هارون فإنه ضعيف الحديث، ولما سكت عنه الحاكم، تعقبه الذهبي بقوله: ضعفه - يعني سيف بن هارون - جماعةٌ.

وقال الترمذي:"وهذا حديث غريب لا نعرفه مرفوعًا إلا من هذا الوجه، وروي سفيان (يعني ابن عينة) وغيره عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان، عن سلمان قوله، وكأن الحديث الموقوف أصحّ.

وسألت البخاري عن هذا الحديث فقال:"ما أُراه محفوظا، روي سفيان عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان، عن سلمان موقوفا".

قلتُ: والمرفوع مما أنكره العقيلي وابن عدي على سيف بن هارون حيث أخرجاه في ترجمته بإسناده السابق. وقال العقيلي في الضعفاء (2/ 174):"ولا يحفظ عنه إلا بهذا الإسناد".




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাঁর কিতাবে যা হালাল করেছেন, সেটাই হালাল; আর যা হারাম করেছেন, সেটাই হারাম। আর যে বিষয়ে তিনি নীরব থেকেছেন, তা হল অবকাশ (বা ক্ষমা)। সুতরাং তোমরা আল্লাহর পক্ষ থেকে সেই অবকাশ গ্রহণ করো। কেননা আল্লাহ ভুলকারী নন। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {আর তোমার রব ভুলকারী নন}।









আল-জামি` আল-কামিল (7160)


7160 - عن أبي ثعلبة الخشني قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله إنا بأرض قوم أهل الكتاب نأكل في آنيتهم، وأرض صيد، أصيد بقوسي، وأصيد بكلبي المعلم، والذي ليس معلما، فأخبرْني ما الذي يحل لنا من ذلك؟ فقال:"أما ما ذكرت أنك بأرض قوم أهل الكتاب تأكل في آنيتهم فإن وجدتم غير آنيتهم فلا تأكلوا فيها، وإن لم تجدوا فاغسلوها ثم كلوا فيها. وأما ما ذكرتَ أنك بأرض صيد، فما صدتَّ بقوسك فاذكر اسم الله، ثم كل، وما صدت بكلبك المعلم فاذكر اسم الله ثم كُلْ، وما صدت بكلبك الذي ليس معلما، فأدركتَ ذكاتَه فكُلْ".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5488)، ومسلم في الصيد والذبائح (1930) كلاهما من طريق ابن المبارك، عن حيوة بن شريح، قال: سمعت ربيعة بن يزيد، الدمشقي يقول: أخبرني أبو إدريس عائذ الله قال: سمعت أبا ثعلبة الخشني فذكره.




আবূ সা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা এমন এক এলাকায় আছি যেখানে আহলে কিতাব (ইয়াহূদী ও খ্রিষ্টান) সম্প্রদায় বসবাস করে। আমরা তাদের পাত্রে পানাহার করি। এটি শিকারের এলাকাও বটে। আমি আমার ধনুক দিয়ে শিকার করি, আমার প্রশিক্ষণপ্রাপ্ত কুকুর দিয়েও শিকার করি এবং প্রশিক্ষণহীন কুকুর দিয়েও শিকার করি। অতএব, এগুলোর মধ্যে কী আমাদের জন্য হালাল তা আমাকে বলে দিন। তিনি বললেন: তুমি যে উল্লেখ করেছ যে তোমরা আহলে কিতাবদের এলাকায় আছো এবং তাদের পাত্রে পানাহার করো—যদি তোমরা তাদের পাত্র ছাড়া অন্য কোনো পাত্র পাও, তবে তাতে পানাহার করো না। আর যদি অন্য পাত্র না পাও, তবে সেগুলোকে ধুয়ে নাও, অতঃপর তাতে পানাহার করো। আর তুমি যে উল্লেখ করেছ যে তোমরা শিকারের এলাকায় আছো—তুমি তোমার ধনুক দিয়ে যা শিকার করো, তাতে আল্লাহর নাম নাও (বিসমিল্লাহ বলো), অতঃপর তা খাও। আর তোমার প্রশিক্ষণপ্রাপ্ত কুকুর যা শিকার করে আনে, তাতেও আল্লাহর নাম নাও, অতঃপর তা খাও। কিন্তু তোমার প্রশিক্ষণহীন কুকুর যা শিকার করে আনে, তুমি যদি সেটিকে (জীবিত অবস্থায়) পেয়ে যবেহ করতে পারো, তবে তা খাও।