আল-জামি` আল-কামিল
7161 - عن عمران بن حصين قال: شربنا ونحن أربعون رجلا عطاش من مزادة امرأة مشركة، وغسّلنا صاحبنا الجنب.
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3571)، ومسلم في المساجد (682) كلاهما من
حديث سلْم بن زرير، قال: سمعت أبا رجاء العُطاردي قال: حدثنا عمران بن حصين .. فذكر الحديث في حديث طويل سيأتي بتمامه في دلائل النبوة.
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা চল্লিশ জন পিপাসার্ত ব্যক্তি একজন মুশরিক মহিলার মশক (চামড়ার থলি) থেকে পান করলাম এবং আমাদের জুনুবী (নাপাক) সাথীকে গোসল করালাম।
7162 - عن أبي ثعلبة الخشني أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: إنا نجاورُ أهل الكتاب وهم يطبخون في قدورهم الخنزير، ويشربون في آنيتهم الخمر؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن وجدتم غيرها فكلوا فيها واشربوا، وإن لم تجدوا غيرها فارحضوها بالماء وكلوا واشربوا".
صحيح: رواه أبو داود (3839)، والطبراني في مسند الشاميين (783) كلاهما من طريق محمد بن شعيب، أخبرنا عبد الله بن العلاء بن زبر، عن أبي عبيد الله مسلم بن مشكم، عن أبي ثعلبة، فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه الترمذي (1797)، وأحمد (17750) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي اسماء الرحبي (هو عمرو بن مرثد)، عن أبي ثعلبة فذكر نحوه وفيه:"فارحضوها بالماء واطبخوا فيها"، واللفظ لأحمد. والرخْض: الغسل.
আবূ সা'লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: 'আমরা আহলে কিতাবের (গ্রন্থধারীদের) প্রতিবেশী। তারা তাদের হাঁড়িতে শূকরের মাংস রান্না করে এবং তাদের পাত্রে মদ পান করে?' রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'যদি তোমরা সেগুলো ছাড়া অন্য পাত্র পাও, তবে তোমরা সেগুলোতে খাও ও পান করো। আর যদি তোমরা অন্য কিছু না পাও, তবে সেগুলোকে পানি দ্বারা ভালোভাবে ধুয়ে নাও এবং সেগুলোতে খাও ও পান করো।'
7163 - عن عبد الله بن عمرو: أن أعرابيًّا يقال له: أبو ثعلبة قال: يا رسول الله إن لي كلابا مكلبة، فأفتني في صيدها فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن كان لك كلاب مكلبة فكل مما أمسكن عليك" قال: ذكيا أو غير ذكي؟ قال:"نعم" قال: وإن أكل منه قال:"وإن أكل منه" قال: يا رسول الله، أفتني في قوسي قال:"كل ما ردت عليك قوسُك" قال:"ذكيا وغير ذكي" قال: وإن تغيب عني؟ قال:"وإن تغيب عنك ما لم يصل، أو تجد فيه أثرًا غير سهمك" قال: أفتني في آنية المجوس إذا اضطررنا إليها؟ قال:"اغسلها وكل فيها".
حسن: رواه أبو داود (2857)، وأحمد (6725) كلاهما من طريق حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده، فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সা'লাবা নামক একজন বেদুঈন (আরব) এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার কিছু শিকারি কুকুর আছে, আপনি আমাকে তাদের শিকার সম্পর্কে ফতওয়া দিন।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যদি তোমার শিকারি কুকুর থাকে, তবে তারা তোমার জন্য যা ধরে আনে, তা ভক্ষণ করো।" সে বলল, "তা হালালভাবে জবাই করা হোক বা না হোক?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" সে বলল, "যদি সে (কুকুর) তা থেকে খেয়ে ফেলে?" তিনি বললেন, "যদি সে তা থেকে খেয়েও ফেলে।" সে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল, আমার ধনুক সম্পর্কে আমাকে ফতওয়া দিন।" তিনি বললেন, "তোমার ধনুক যা তোমার দিকে ফিরিয়ে আনে (শিকার করে), তা ভক্ষণ করো।" সে বলল, "তা হালালভাবে জবাই করা হোক বা না হোক?" সে বলল, "যদি তা (শিকার) আমার কাছ থেকে অদৃশ্য হয়ে যায়?" তিনি বললেন, "যদি তা তোমার কাছ থেকে অদৃশ্য হয়েও যায় (তবুও খাও), যতক্ষণ না তুমি তাতে পচন দেখতে পাও, অথবা তোমার তীর ছাড়া অন্য কোনো আঘাতের চিহ্ন খুঁজে পাও।" সে বলল, "যদি আমরা মজুসিদের (অগ্নি উপাসক) বাসনপত্র ব্যবহার করতে বাধ্য হই, তবে সে সম্পর্কে আমাকে ফতওয়া দিন।" তিনি বললেন, "তা ধুয়ে নাও এবং তাতে খাও।"
7164 - عن أبي هريرة قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في دعوة، فرفع إليه الذراع - وكانت تعجبه - فنهس منها نهسةً. الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الأنبياء (3340)، ومسلم في الإيمان (194) كلاهما من طريق أبي حيان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث بطوله في الشفاعة يوم الحشر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি দাওয়াতে ছিলাম। তখন তাঁর সামনে (পশুর) হাত (বাহু) পেশ করা হলো – আর এটি তাঁর কাছে খুব প্রিয় ছিল – ফলে তিনি তা থেকে এক কামড় নিলেন। (হাদীসটি দীর্ঘ)।
7165 - عن أبي هريرة أن شاة طبخت فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعطني الذراع" فناولها إياه،
فقال:"أعطني الذراع" فناولها إياه، ثم قال:"أعطني الذراع" فقال: يا رسول الله إنما للشاة ذراعان! قال:"أما إنك لو التمستها لوجدتها".
حسن: رواه الإمام أحمد (10706)، وابن حبان (6484) كلاهما من حديث ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن عجلان - وهو محمد - وأبيه فإنهما حسنا الحديث.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে একটি বকরী রান্না করা হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমার কাছে বাহুর গোশত দাও।" লোকটি তা তাঁকে দিলেন। তিনি আবার বললেন, "আমার কাছে বাহুর গোশত দাও।" লোকটি তা তাঁকে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "আমার কাছে বাহুর গোশত দাও।" তখন লোকটি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল, একটি বকরীর তো কেবল দুটি বাহুই থাকে! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সাবধান! তুমি যদি তা খুঁজতে, তবে অবশ্যই পেয়ে যেতে।"
7166 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان أحب العُراق إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الذراع ذراع الشاة - وقد كان سُمَّ فيها، وكان يرى أن اليهود سّموه.
حسن: رواه أبو داود الطيالسي (388) عن زهير، عن أبي إسحاق، عن سعد بن عياض، عن عبد الله فذكره. ومن طريقه رواه أبو داود (3780 - 3781)، والترمذي في الشمائل (170)، والنسائي في الكبرى (6620)، وأحمد (3733). واقتصر النسائي على الشطر الأول منه.
وإسناده حسن من أجل سعد بن عياض الثمالي اختلف في صحبته، والصحيح أنه تابعي روي عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا. قال ابن سعد: كان قليل الحديث، ووثقه ابن حبان وفي التقريب"صدوق". وزهير هو ابن معاوية وإن كان سماعه من أبي إسحاق بأخرة إلا أنه توبع على الشطر الثاني من الحديث.
فرواه أحمد (3778) عن أسود، ثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق به، بلفظ:"إن من البيان سحرا، قال: وكنا نرى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سُمَّ في ذراع شاة، سمّته اليهود".
وأما ما رويَ عن عائشة قالت: ما كان الذراع أحب اللحم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ولكن كان لا يجد اللحم إلا غبًّا، فكان يُعجل إليه لأنه أعجلُها نضجًا. فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1838) عن الحسن بن محمد الزعفراني، ثنا يحيى بن عباد أبو عباد، ثنا فليح بن سليمان، عن عبد الوهاب بن يحيى - من ولد عباد بن عبد الله بن الزبير - عن عبد الله بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.
وقال الترمذي:"حديث حسن لا نعرفه إلا من هذا الوجه".
وفي نسخة:"حديث غريب لا نعرفه …". وهذا الحكم أقرب إلى الصواب لأن فليح بن سليمان فيه ضعف من قبل حفظه، ولم يُتابع عليه.
وشيخه عبد الوهاب بن يحيى لم يوثقه غير ابن حبان، وقال أبو حاتم:"شيخ" وهو عند الحافظ"مقبول" يعني حيث يُتابع وإلا فلين الحديث.
وكذلك لا يصح ما روي عن عبد الله بن جعفر أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: والقوم يُلقون الرسول الله صلى الله عليه وسلم اللحمَ يقول:"أطيب اللحم لحم الظهر".
رواه ابن ماجه (3308)، وأحمد (1744)، والنسائي في الكبرى (6623)، والحاكم (4/
111) من طرق عن يحيى بن سعيد، ثنا مسعر، عن رجل من فَهْمٍ، عن عبد الله بن جعفر، فذكره.
ثم رواه الحاكم من طريق جرير، عن رقبة بن مصقلة، عن رجل من بني فهم، عن عبد الله بن جعفر، فذكره. وقال:"قد صحَّ الخبر بالإسنادين".
قلت: وليس كما قال؛ لأن مداره على الرجل الفهمي، قال مسعر في رواية أحمد:"محمد بن عبد الرحمن قال: وأظنه حجازيا".
قلت: ولا يعرف فيه توثيق فهو في عداد المجاهيل.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ছাগলের বাহু (কাঁধের গোশতসহ হাড়) ছিল সবচেয়ে প্রিয়। আর এটা বিষাক্ত করা হয়েছিল। তিনি মনে করতেন যে ইহুদিরাই তাতে বিষ প্রয়োগ করেছিল।
7167 - عن زهدم قال: كنا عند أبي موسى الأشعري - وكان بيننا وبين هذا الحي من جرم إخاء - فأتي بطعام فيه لحم دجاج، وفي القوم رجل جالس أحمر فلم يدن من طعامه، قال:"ادن فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يأكل منه، قال: إني رأيته يأكل شيئا فقذرته، فحلفتُ أن لا آكله، فقال: ادنُ أخبرك أو أحدثك إني أتيت النبي صلى الله عليه وسلم في نفر من الأشعريين، فوافقته وهو غضبان، وهو يقسم نعما من نعم الصدقة، فاستحملناه فحلف أن لا يحملنا، قال: ما عندي ما أحملكم عليه، ثم أني رسول الله صلى الله عليه وسلم بنهب من إبل، فقال: أين الأشعريون؟ أين الأشعريون؟ قال: فأعطانا خمس ذودٍ غُرّ الذُّرى، فلبثنا غير بعيد، فقلت لأصحابي: نسي رسول الله صلى الله عليه وسلم يمينه، فوالله لئن تغفلنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يمينه لا نُفلح أبدا، فرجعنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقلنا: يا رسول الله إنا استحملناك، فحلفت أن لا تحملنا، فظننا أنك نسيت يمينك، فقال: إن الله هو حملكم، إني والله - إن شاء الله - لا أحلف على يمين، فأرى غيرها خيرا منها إلا أتيت الذي هو خير، وتحللتها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الذبائح والصيد (5518)، ومسلم في الأيمان (1649: 9) كلاهما من حديث أيوب، عن القاسم (هو ابن عاصم)، عن زهدم الجرمي فذكره. والسياق للبخاري.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (যহদাম বলেন) আমরা আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। (আমাদের এবং জারম গোত্রের মধ্যে ভ্রাতৃত্বের সম্পর্ক ছিল।) তখন মুরগির মাংসযুক্ত খাবার আনা হলো। লোকজনের মধ্যে লাল বর্ণের একজন লোক বসে ছিলেন, কিন্তু তিনি খাবারের কাছে আসলেন না।
(আবূ মূসা তাঁকে) বললেন, "কাছে এসো, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে এটি খেতে দেখেছি।"
সে বলল, "আমি তাঁকে এমন কিছু খেতে দেখেছি, যা আমি ঘৃণা করতাম। তাই আমি কসম করেছি যে, আমি তা খাব না।"
আবূ মূসা বললেন, "কাছে এসো, আমি তোমাকে একটি ঘটনা বলি বা তোমাকে জানাই। আমি আশআরী গোত্রের কিছু লোকের সাথে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এসেছিলাম। আমরা যখন তাঁর কাছে পৌঁছলাম, তখন তিনি ক্রুদ্ধ অবস্থায় ছিলেন এবং তিনি সাদকার কিছু উট ভাগ করে দিচ্ছিলেন। আমরা তাঁর কাছে বাহনের জন্য উট চাইলাম, কিন্তু তিনি কসম করে বললেন যে, তিনি আমাদের কোনো বাহন দেবেন না।"
তিনি বললেন, "আমার কাছে এমন কিছু নেই যার উপর তোমাদেরকে বহন করতে পারি।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে কিছু যুদ্ধলব্ধ উট আনা হলো। তখন তিনি বললেন, "আশআরী গোত্রের লোকেরা কোথায়? আশআরী গোত্রের লোকেরা কোথায়?"
(আবূ মূসা) বললেন, তিনি আমাদেরকে পাঁচটি সাদা কুঁজবিশিষ্ট উট দিলেন। আমরা কিছুক্ষণ সেখানে থাকার পর আমি আমার সঙ্গীদেরকে বললাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কসমের কথা ভুলে গিয়েছেন। আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কসম ভুলে যাওয়ার বিষয়টি যদি আমরা এড়িয়ে যাই, তবে আমরা কখনোই সফল হব না।
তাই আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে ফিরে গেলাম এবং বললাম, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা আপনার কাছে বাহন চেয়েছিলাম, তখন আপনি কসম করে বলেছিলেন যে, আপনি আমাদের বাহন দেবেন না। আমরা ধারণা করছি যে, আপনি আপনার কসম ভুলে গিয়েছেন।"
তিনি বললেন, "আল্লাহই তোমাদেরকে বাহন দিয়েছেন। আল্লাহর কসম! আমি আল্লাহর ইচ্ছায় এমন কোনো বিষয়ে কসম খাই না, যার চেয়ে উত্তম অন্য কিছু দেখি, তবে আমি সেই উত্তম কাজটি করি এবং কসমের কাফফারা আদায় করে কসম ভঙ্গ করি।"
7168 - عن أبي موسى الأشعري قال:"رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يأكل دجاجا".
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5517) عن يحيى (هو ابن موسى البلخي)، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن زهدم الجرمي، عن أبي موسى فذكره.
وساق مسلم القصة السابقة من حديث حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي قلابة والقاسم كلاهما عن زهدم فذكره. والحديث المذكور مختصر من تلك القصة.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে মুরগি খেতে দেখেছি।"
7169 - عن أنس قال: أنفجنا أرنبا ونحن بمر الظهران، فسعى القوم فلغبوا فأخذتها فجئت بها إلى أبي طلحة، فذبحها فبعث بوركيها أو قال: بفخذيها إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقبلها.
وزاد في رواية: قلت: وأكل منه؟ قال: وأكل منه.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح (5535)، ومسلم في الصيد والذبائح (1953) كلاهما من طريق شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس بن مالك، فذكره.
والرواية الأخرى عن البخاري في الهبة (7572) من طريق شعبة به.
قوله:"أنفجنا" أي أثرنا يقال: نفج الأرنب إذا ثار وعدا، وانتفج كذلك، ويقال: إن الانتفاج الاقشعرار فكان المعني جعلناها بطلبنا لها تنتفج. كذا في الفتح (9/ 661).
وقوله:"بمر الظهران" اسم موضع على مرحلة من مكة.
وقوله:"فلغبوا" أي تعبوا وزنا ومعنا.
قال الترمذي عقب الحديث (1789):"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم لا يرون بأكل الأرنب بأسا، وقد كره بعض أهل العلم أكل الأرنب وقالوا: إنها تُدمي. أي تحيض.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মাররুয যাহরান নামক স্থানে একটি খরগোশকে তাড়িয়ে তুললাম। এরপর লোকেরা সেটিকে ধরার জন্য দৌঁড়াল, কিন্তু ক্লান্ত হয়ে গেল। তখন আমি সেটিকে ধরলাম এবং আবূ তালহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে নিয়ে আসলাম। তিনি সেটি যবেহ করলেন। অতঃপর তিনি তার দুটি কোমর—অথবা বললেন: তার দুটি উরু—নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠিয়ে দিলেন। তিনি তা গ্রহণ করলেন।
অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: (আমি জিজ্ঞাসা করলাম,) ‘আর তিনি কি তা খেলেন?’ তিনি বললেন, ‘তিনি তা খেলেন।’
7170 - عن محمد بن صفوان قال: اصّدتُّ أرنبين، فذبحتهما بمروةٍ، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عنهما، فأمرني بأكلهما.
صحيح: رواه أبو داود (2822)، والنسائي (4313)، وابن ماجه (3157)، وأحمد (15870)، وصحّحه ابن حبان (5887)، والحاكم (4/ 235) كلهم من طرق عن الشعبي، عن محمد بن صفوان، فذكره. وإسناده صحيح، قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم مع الاختلاف فيه على الشعبي ولم يخرجاه.
وفي الباب عن خالد بن الحويرث قال:"إن عبد الله بن عمرو كان بالصفاح - مكان بمكة - وإن رجلا جاء بأرنب قد صادها فقال: يا عبد الله بن عمرو ما تقول؟ قال: قد جيء بها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا جالس فلم يأكلها، ولم ينه عن أكلها، وزعم أنها تحيض".
رواه أبو داود (3792) ومن طريقه البيهقي (9/ 321) عن يحيى بن خلف، حدّثنا روح بن عبادة، حدّثنا محمد بن خالد، قال: سمعت أبي خالد بن الحويرث يقول فذكره.
وفي إسناده محمد بن خالد بن الحويرث المخزومي، لم يوثقه غير ابن حبان فذكره في الثقات (7/ 407) على عادته في توثيق المجاهيل، وقال الحافظ في التقريب:"مستور". وكذا والده خالد بن الحويرث، تفرد بتوثيقه ابن حبان، وقال عثمان بن سعيد الدارمي: سألت ابن معين عنه فقال:"لا أعرفه".
وقال ابن عدي: وخالد هذا كما قال ابن معين: لا يعرف وأنا لا أعرفه أيضًا، وعثمان بن سعيد كثيرًا ما سأل يحيى بن معين عن قوم فكان جوابه أن قال:"لا أعرفهم" وإذا كان يحيى لا يعرفه فلا تكون له شهرة، ولا يعرف". الكامل (3/ 40).
وفي الباب أيضًا عن ابن الحوتكية قال: قال عمر:"من حاضرنا يوم القاحة قال أبو ذر: أنا شهدت النبي صلى الله عليه وسلم أتي بأرنب، وقال مرة: جاء أعرابي بأرنب، فقال الذي جاء بها: إني رأيتها كأنها تدمي، فكان النبي صلى الله عليه وسلم يأكل منها فقال لهم: كلوا، فقال رجل: إني صائم قال: وما صومك؟ فأخبره قال: فأين أنت عن البيض الغر؟ قال: وما هن؟ قال: صيام ثلاثة أيام من كل شهر ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".
رواه ابن خزيمة (2127)، وأبو يعلى (185)، والبيهقي (9/ 321) كلهم من حديث موسى بن طلحة، عن ابن الحوتكية، فذكره. واللفظ لابن خزيمة.
وابن الحوتكية اختلف في اسمه فقيل: هو يزيد وهو الذي اعتمده الحافظ وقال: وأكثر ما يأتي غير المسمى ثم قال:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أقف على من تابعه فهو لين الحديث.
মুহাম্মদ বিন সাফওয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি দুটি খরগোশ শিকার করলাম এবং একটি পাথর (মারওয়াহ) দিয়ে সে দুটিকে যবেহ করলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সে দুটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, তখন তিনি আমাকে তা খেতে বললেন।
7171 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم يوم خيبر عن لحوم الحمر، ورخّص في لحوم الخيل.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5520)، ومسلم في الصيد والذبائح (1941: 36) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن علي، عن جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন গাধার গোশত খেতে নিষেধ করেছেন এবং ঘোড়ার গোশত খাওয়ার অনুমতি দিয়েছেন।
7172 - عن جابر بن عبد الله قال: أكلنا زمن خيبر الخيل وحمر الوحش، ونهانا النبي صلى الله عليه وسلم عن الحمار الأهلي.
صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1941: 37) عن محمد بن حاتم، حدثنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা খায়বারের যুদ্ধের সময় ঘোড়া ও বন্য গাধা ভক্ষণ করেছিলাম। আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের জন্য গৃহপালিত গাধা (খাওয়া) নিষেধ করেছিলেন।
7173 - عن جابر بن عبد الله قال: ذبحنا يوم خيبر الخيل والبغال والحمير، فنهانا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن البغال والحمير، ولم ينهنا عن الخيل.
صحيح: رواه أبو داود (3789)، وأحمد (14840) وصحّحه ابن حبان (5272)، والحاكم (4/ 235) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وزاد الحاكم في إسناده:"عن أبي الزبير وعمرو بن دينار".
وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه".
وفيما قاله بعض النظر، نعم لم يخرجاه بهذا السياق، ولكن أخرجاه - كما سبق - من طريق
عمرو بن دينار، عن محمد بن علي، عن جابر.
وأخرجه مسلم من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر - وفي كلا الطريقين النهي عن لحوم الحمر، والترخيص في لحوم الخيل، وليس عندهما ذكر"لحوم البغال".
وقد تبين من رواية الصحيحين أن عمرو بن دينار - كما في طريق الحاكم - لم يسمعه من جابر، وإنما بينهما واسطة.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা খায়বারের দিন ঘোড়া, খচ্চর এবং গাধা যবেহ করেছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে খচ্চর ও গাধা (খাওয়া) থেকে নিষেধ করলেন, কিন্তু তিনি আমাদেরকে ঘোড়া (খাওয়া) থেকে নিষেধ করেননি।
7174 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا نأكل لحوم الخيل.
قال عطاء: والبغال؟ قال: لا.
صحيح: رواه النسائي (4333)، وابن ماجه (3197) كلاهما من طريق عبد الكريم الجزري، عن عطاء، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح، وعطاء هو ابن أبي رباح.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ঘোড়ার গোশত খেতাম। আতা জিজ্ঞেস করলেন, আর খচ্চরের? তিনি (জাবির) বললেন, না।
7175 - عن أسماء قالت: نحرنا فرسا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فأكلناه.
وفي رواية قالت:"ذبحنا" وزاد"ونحن بالمدينة".
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5519)، ومسلم في الصيد والذبائح (1942) كلاهما من طريق هشام (هو ابن عروة)، عن فاطمة (هي بنت المنذر بن الزبير) عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته. والرواية الأخرى عند البخاري (5511) من طريق عبدة، عن هشام به.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে একটি ঘোড়া নহর করেছিলাম এবং আমরা তা খেয়েছিলাম।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন, "আমরা জবেহ করেছিলাম" এবং আরও বলেন, "আমরা তখন মদীনায় ছিলাম।"
7176 - عن ابن عباس قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن لحوم الحمر، وأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بلحوم الخيل أن يؤكل.
حسن: رواه الطبراني في المعجم الكبير (12/ 180)، والأوسط (5760)، والدارقطني (4782) من طريق محمد بن عبد الله بن سليمان الحضرمي، ثنا محمد بن عُبسد المحاربي، ثنا عمر بن عبيد، عن سماك بن حرب، عن جابر بن زيد، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سماك وكذا محمد بن عبد فهما حسنا الحديث، وبقية رجاله ثقات، وجابر بن زيد هو أبو الشعثاء، وعمر بن عيد هو الطنافسي.
وقال الحافظ:"سنده قوي". الفتح (9/ 650).
وأما ما روي عن جابر بن عبد الله قال: لما كان يوم خيبر، أصاب الناس مجاعة فأخذوا الحمر الأهلية، فذبحوها وأغلوا منها القدور فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم قال جابر: فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فكفأنا القدور، وقال: إن الله سيأتيكم برزق هو أحل لكم من هذا وأطيب من ذاك، قال: فكفأنا يومئذ القدور وهي تغلي قال: فحرم رسول الله صلى الله عليه وسلم لحوم الحمر الإنسية، ولحوم الخيل، والبغال، وكل ذي ناب من السباع، وكل ذي مخلب من الطير، وحرم المجثمة، والخلسة والنهبة". فهو معلول.
رواه الطبراني في الأوسط (3692) من طريق عصام بن علي - والبزار (الكشف 2857) من
طريق أبي النضر (هو هاشم بن القاسم) كلاهما عن عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر فذكره. والسباق للطبراني، وهو عند البزار مختصر.
وقال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير إلا عكرمة".
قلت: وعكرمة هو ابن عمار العجلي وإن كان صدوقا، ولكن روايته عن يحيى بن أبي كثير فيها اضطراب، قاله الإمام أحمد وعلي بن المديني والبخاري وأبو داود والنسائي وأبو حاتم وغيرهم وقد رواه الترمذي (1478)، وأحمد (14463)، وابن أبي شية (7/ 296) من طريق الهاشم بن القاسم مطولا ومختصرًا، وليس عندهم ذكر الخيل.
ثم قد خولف عكرمة في إسناده، خالفه محمد بن عمرو بن علقمة، فرواه عن أبي سلمة عن أبي هريرة بلفظ:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّمَ كل ذي ناب من السباع".
رواه الترمذي (1479) عن قتيبة، ثنا عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن عمرو به. وقال:"حديث حسن".
وقال في العلل الكبير (2/ 631):"سألت محمدا عن هذا الحديث؟ فقال: حديث أبي سلمة، عن أبي هريرة أشبه، وعكرمة بن عمار يغلط الكثير في أحاديث يحيى بن أبي كثير". اهـ.
وكذلك لا يصح ما روي عن خالد بن الوليد، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل لحوم الخيل والبغال والحمير. وزاد في رواية:"وكل ذي ناب من السباع".
رواه أبو داود (3790)، والنسائي (4331)، وابن ماجه (3198) وأحمد (16817) من طرق عن بقية بن الوليد حدثني ثور بن يزيد، عن صالح بن يحيى بن المقدام بن معديكرب، عن أبيه، عن جده، عن خالد بن الوليد، فذكره. والزيادة المذكورة عند أبي داود والنسائي.
وإسناده ضعيف من أجل صالح بن يحيى بن المقدام بن معديكرب، وأبيه يحيي فهما لا يعرفان.
قال البخاري عن صالح بن يحيى: فيه نظر. وذكر الذهبي في ديوان الضعفاء فقال: صالح بن يحيى بن مقدام، عن أبيه، عن جده:"مجهولون". ولكن لو قال: مجهولان لكان صحيحا، لأن جده معديكرب صحابي مشهور.
وهكذا نُقل أيضًا عن موسى بن هارون الحافظ بقوله: لا يعرف صالح، ولا أبوه، ولا جده.
ونقل النووي في شرح مسلم عنه على الصواب وهو قوله: ولا يُعرف صالح بن يحيى ولا أبوه.
وقال الخطابي: في إسناده نظر، قال: وصالح بن يحيى، عن أبيه، عن جده لا يعرف سماع بعضهم من بعض.
ورواه الإمام أحمد (16818) مطولا من طريق أبي سلمة الحمصي، عن صالح بن يحيى بن المقدام، عن ابن المقدام، عن جده المقدام بن معديكرب قال: غزوت مع خالد بن الوليد الصائفة …" فذكره بطوله وفيه:"أيها الناس ما بالكم أسرعتم في حظائر لليهود؟ ألا لا تحل
أموال المعاهدين إلا بحقها، وحرام عليكم حُمُر الأهلية والإنسية وخيلها وبغالها، وكل ذي ناب من السبع، وكل ذي مخلب من الطير". وفي إسناده ما سبق، وابن المقدام لعله يحيى بن المقدام، وفي متنه نكارة وهي قول خالد بن الوليد: غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة خيبر".
لأن خالدا إنما أسلم بعد خيبر وقبل الفتح على الصحيح. وأعله البيهقي بالاضطراب وبمخالفته الحديث الثقات، السنن الكبري (9/ 328).
قال أبو داود عقب الحديث:"وهو قول مالك" يعني في النهي عن لحوم الخيل.
ثم قال أبو داود:"وهذا منسوخ، قد أكل لحوم الخيل جماعة من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم: ابن الزبير، وفضالة بن عبيد، وأنس بن مالك، وأسماء بنت أبي بكر، وسويد بن غفلة، وعلقمة، وكانت قريش في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم تذبحها".
وقال ابن عبد البر:"أما أهل العلم بالحديث، فحديث الإباحة في لحوم الخيل أصح عندهم وأثبت، من النهي عن أكلها".
وممن كره أكل لحوم الخيل أيضًا ابن عباس، وهو مذهب أبي حنيفة، واحتجوا بقوله تعالى: {وَالْخَيْلَ وَالْبِغَالَ وَالْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةً وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ} [سورة النحل: 8].
ولم يذكر فيه الأكل، وذكر الأكل من الأنعام في الآية التي قبلها، وأجاب الجمهور بأن عدم ذكر الأكل لا يستلزم تحريم الأكل، فإن الآية خصت بالذكر الركوب والزينة لأنها معظم المقصود من الخيل، ثم إن السنة جاءت بيان إباحة أكله أيضا.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গাধার মাংস খেতে নিষেধ করেছেন এবং ঘোড়ার মাংস খাওয়ার আদেশ দিয়েছেন।
7177 - عن جابر بن عبد الله قال: أكلنا زمن خيبر الخيلَ وحمرَ الوحش، ونهانا النبي صلى الله عليه وسلم عن الحمار الأهلي.
صحيح: رواه مسلم (1941: 37) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা খায়বারের সময় ঘোড়া ও বন্য গাধা খেয়েছিলাম, কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে গৃহপালিত গাধা খেতে নিষেধ করেছিলেন।
7178 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: غزونا مع النبي صلى الله عليه وسلم سبع غزوات أو ستا، كنا نأكل معه الجراد. وفي رواية:"سبع غزوات" بالجزم.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5495)، ومسلم في الصيد والذبائح (1952) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي يعفور، قال: سمعت ابن أبي أوفى فذكره. واللفظ للبخاري.
وفي صحيح مسلم:"وسبع غزوات" يعني من غير شك.
وأما ما روي عن سلمان الفارسي قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن الجراد فقال: أكثر جنود الله، لا
أكله ولا أحرمه" فهو معلول.
رواه أبو داود (3813) عن محمد بن الفرج البغدادي، ثنا ابن الزبرقان، ثنا سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان فذكره.
ورجاله ثقات غير ابن الزبرقان وهو محمد بن الزبرقان أبو همام الأهوازي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد خالف هنا الثقات، فقد رواه الثقات عن سليمان التيمي مرسلا. أي: لم يذكروا سلمان.
وقد أشار أبو داود إلى هذه العلة حيث قال عقب الحديث:"رواه المعتمر، عن أبيه، عن أبي عثمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم، لم يذكر سلمان". اهـ
قلت: ورواية المعتمر بن سليمان التيمي أخرجها عبد الرزاق (8757) عنه، عن أبيه، عن أبي عثمان النهدي، قال:"سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن الجراد فقال: جند من جنود الله، ليس جند أعظم منه لا أكله ولا أحرمه، وكان يقول: ما لم يحرّم فهو حلال".
وتابعه أيضا يزيد بن هارون عند ابن أبي شيبة (5/ 145 - طبعة الحوت) ومحمد بن عبد الله الأنصاري عند البيهقي (9/ 257) كلاهما عن التيمي به مرسلًا.
ورواه أبو داود أيضًا (3814)، وابن ماجه (3219) من طريق زكريا بن يحيى بن عمارة، عن أبي العوام الجزّاز، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل فقال: مثله. قال أبو داود عقبه:"رواه حماد بن سلمة، عن أبي العوام، عن أبي عثمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم. لم يذكر سلمان". اهـ
ورواية حماد بن سلمة أولى بالصواب لأنه أوثق.
سئل أبو حاتم عن رواية أبي العوّام هذه الموصولة فقال:"هذا خطأ، الصحيح مرسل ليس فيه سلمان". اهـ. العلل (1495).
والخلاصة أن الحديث ضعيف لإرساله، وإن صحّ فليس فيه دليل على التحريم بل فيه دليل على الحل، ولذا قال البيهقي عقب الحديث:"إن صمم هذا ففيه دلالة على الاباحة، فإنه لم يحرمه فقد أحله، وإنما لم يأكله تقذرًا". اهـ
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাত বা ছয়টি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি। আমরা তাঁর সাথে টিড্ডি (পঙ্গপাল) খেতাম। অন্য এক বর্ণনায় নিশ্চিতভাবে 'সাতটি যুদ্ধ' বলা হয়েছে।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘আয-যাবাইহ ওয়াছ-ছাইদ’ (জীবজন্তুর যবেহ ও শিকার) অধ্যায়ে (নং ৫৪৯৫) এবং ইমাম মুসলিম এটি ‘আছ-ছাইদ ওয়ায-যাবাইহ’ অধ্যায়ে (নং ১৯৫২) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই শু’বাহ-এর সূত্রে, তিনি আবু ইয়া’ফুর থেকে, যিনি বলেন: আমি ইবনে আবী আওফাকে এটি বলতে শুনেছি। শব্দগুলো ইমাম বুখারীর। আর সহীহ মুসলিমে আছে: "এবং সাতটি যুদ্ধ," অর্থাৎ কোনো সন্দেহ ছাড়া।
কিন্তু সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে টিড্ডি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: "এগুলো আল্লাহর সৈন্যদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি। আমি তা খাইও না, আবার হারামও করি না"—এই হাদীসটি ত্রুটিযুক্ত (মা'লুল)।
ইমাম আবু দাউদ (৩৮১৩) এটি বর্ণনা করেছেন মুহাম্মদ ইবনুল ফারাজ আল-বাগদাদী থেকে, তিনি ইবনুয-যুবরকান থেকে, তিনি সুলাইমান আত-তাইমী থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে, তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যিনি তা উল্লেখ করেছেন। এর বর্ণনাকারীগণ সকলে বিশ্বস্ত, ইবনুয-যুবরকান ব্যতীত, আর তিনি হলেন মুহাম্মদ ইবনুয-যুবরকান আবু হাম্মাম আল-আহওয়াযী, যার ব্যাপারে মতভেদ আছে। তবে যখন তিনি বিশ্বস্তদের বিরোধিতা না করেন, তখন তার হাদীস হাসান (উত্তম) হয়। কিন্তু এখানে তিনি বিশ্বস্তদের বিরোধিতা করেছেন। কারণ বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীগণ সুলাইমান আত-তাইমী থেকে এটি মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। অর্থাৎ তারা সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি। ইমাম আবু দাউদ হাদীসের শেষে এই ত্রুটির প্রতি ইঙ্গিত করেছেন। তিনি বলেন: "মু'তামির এটি তার পিতা থেকে, তিনি আবু উসমান থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি।"
আমি (গ্রন্থকার) বলছি: মু'তামার ইবনু সুলাইমান আত-তাইমীর বর্ণনাটি আব্দুর রাজ্জাক (৮৭৫৭) তার থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে টিড্ডি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: এগুলো আল্লাহর সৈন্যদের মধ্যে একটি সৈন্য, এর চেয়ে বড় কোনো সৈন্য নেই। আমি তা খাইও না, আবার হারামও করি না।" তিনি (নবী) বলতেন: "যা হারাম করা হয়নি, তা হালাল।" ইয়াজিদ ইবনু হারুনও তার অনুসরণ করেছেন ইবনু আবী শাইবাতে (৫/১৪৫ - হাউত সংস্করণ) এবং মুহাম্মদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী বায়হাকীর কাছে (৯/২৫৭)। উভয়ই তাইমী থেকে মুরসাল হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন।
ইমাম আবু দাউদ (৩৮১৪) এবং ইবনু মাজাহ (৩২১৯) এটি যাকারিয়া ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু আম্মারা-এর সূত্রে, তিনি আবুল আওয়াম আল-জায্যাজ থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে, তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি অনুরূপ উত্তর দেন। আবু দাউদ হাদীসের শেষে বলেন: "হাম্মাদ ইবনু সালামা এটি আবুল আওয়াম থেকে, তিনি আবু উসমান থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি।" হাম্মাদ ইবনু সালামা-এর বর্ণনাটি অধিকতর সঠিক, কারণ তিনি অধিক বিশ্বস্ত। আবুল আওয়ামের এই মাওসূল বর্ণনা সম্পর্কে আবু হাতেমকে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেন: "এটি ভুল। সহীহ হল মুরসাল, এতে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নেই।" (আল-ইলাল, ১৪৯৫)।
উপসংহার হলো, হাদীসটি মুরসাল হওয়ার কারণে যঈফ (দুর্বল)। আর যদি এটি সহীহ প্রমাণিত হয়ও, তবুও এতে হারাম হওয়ার কোনো প্রমাণ নেই, বরং হালাল হওয়ার প্রমাণ রয়েছে। আর একারণেই ইমাম বায়হাকী হাদীসের শেষে বলেন: "যদি এটি দৃঢ় হয়, তবে এতে হালাল হওয়ার প্রমাণ রয়েছে। কারণ তিনি এটিকে হারাম করেননি, ফলে এটি হালাল। আর তিনি এটি কেবল ঘৃণা করে খাননি।"
7179 - عن أبي عمار قال: قلت لجابر: الضبع صيد هي؟ قال: نعم، قال: قلت: أكلها؟ قال: نعم، قال: قلت له: أقاله رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم.
صحيح: رواه الترمذي (1791)، والنسائي (2836، 4323)، وصحّحه ابن خزيمة (2645)، وابن حبان (3695)، والحاكم (1/ 452) كلهم من طرق عن ابن جريج قال: أخبرني عبد الله بن
عيد بن عمير، عن ابن أبي عمار قال فذكره.
وإسناده صحيح، وابن أبي عمار اسمه عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمار المكي ثقة.
وقال الترمذي:"حديث حسن صحيح".
وقال في العلل الكبير (2/ 757):"سألت محمدا يعني البخاري عن هذا الحديث فقال: هو حديث صحيح". وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين. كذا قالا وابن أبي عمار من رجال مسلم وحده.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আম্মার তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হায়েনা কি শিকারের অন্তর্ভুক্ত? তিনি বললেন: হ্যাঁ। (আবূ আম্মার) বললেন: আমি আবার জিজ্ঞেস করলাম, তা কি খাওয়া যাবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আবূ আম্মার বলেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: এই কথা কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
7180 - عن جابر بن عبد الله قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع؟ فقال:"هو صيد، ويُجعل فيه كبش إذا صاده المحرم.
صحيح: رواه أبو داود (3801)، وابن ماجه (3085)، وصححه ابن خزيمة (2646)، وابن حبان (3964)، والحاكم (1/ 452 - 453) كلهم من طرق عن جرير بن حازم، عن عبد الله بن عبيد، عن عبد الرحمن بن أبي عمار، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
وفي حديث الباب دليل على جواز أكل الضبع وإليه ذهب الشافعي وأحمد. قال الشافعي: ما زال الناس يأكلونها ويبيعونها بين الصفا والمروة من غير نكير، ولأن العرب تستطيبه وتمدحه.
ولا يعارض هذا الحديث:"كل ذي ناب من السباع" لأنه عام، وهذا خاص وقد قيل: إن الضبع ليس لها ناب.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে হায়েনা (الضبع) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "তা শিকার, এবং যদি ইহরামকারী (ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তি) তা শিকার করে, তবে তাকে তাতে একটি মেষ ফিদইয়া দিতে হবে।"
সহীহ: এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ (৩৮০১), ইবনু মাজাহ (৩০৮৫), এবং সহীহ বলেছেন ইবনু খুযাইমাহ (২৬৪৬), ইবনু হিব্বান (৩৯৬৪), ও হাকিম (১/৪৫২-৪৫৩)। তারা সকলেই জারীর ইবনু হাযিম হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদ হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবি আম্মার হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ।
এই হাদীসটি হায়েনা খাওয়া বৈধ হওয়ার প্রমাণ বহন করে। ইমাম শাফিঈ ও ইমাম আহমাদ এই মত দিয়েছেন। ইমাম শাফিঈ (রহ.) বলেছেন: 'মানুষ সর্বদা সাফ্ফা ও মারওয়ার মাঝে কোনো আপত্তি ছাড়াই এটি খেত ও বিক্রি করত, কারণ আরবরা এটিকে উত্তম মনে করে এবং এর প্রশংসা করে।'
"হিংস্র প্রাণীর মধ্যে দাঁতবিশিষ্ট যা কিছু আছে" (তা হারাম) শীর্ষক হাদীসটি এর বিরোধী নয়, কারণ সেটি সাধারণ (আম), আর এটি বিশেষ (খাস)। এছাড়াও বলা হয়েছে যে, হায়েনার তীক্ষ্ণ দাঁত (ناب) নেই।