আল-জামি` আল-কামিল
721 - عن أبي ذرّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُتيتُ خمسًا لم يؤتهنّ نبيٌّ كان قبلي: نُصرتُ بالرّعب؛ فيرعب مني العدو مسيرة شهر، وجُعلت لي الأرض مسجدًا وطهورًا، وأحلت لي الغنائم ولم تُحل لأحد كان قبلي، وبُعثتُ إلى الأحمر والأسود، وقيل لي: سلْ تُعطه، فاختبأتُهَا شفاعةً لأمّتي، وهي نائلة منكم -إن شاء
اللَّه- من لقي اللَّه لا يشرك به شيئًا".
صحيح: رواه الإمام أحمد (21299) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدّثني سليمان الأعمش، عن مجاهد بن جبر أبي الحجّاج، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلس إلّا أنه صرّح بالتحديث كما أنه توبع.
فقد أخرجه الحاكم (2/ 434) من وجه آخر عن أبي أسامة وقد سئل عن قوله تعالى: {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا} [سورة سبأ: 28] فقال: حدّثنا الأعمش، بإسناده، فذكر مثله.
قال مجاهد في تفسير الأحمر والأسود: الإنس والجنّ.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه بهذه السياقة، إنّما أخرجاه ألفاظًا من الحديث متفرقة".
ورواه أبو داود (489) من وجه آخر عن جرير، عن الأعمش، بإسناده مختصرًا بلفظ:"جُعلتْ لي الأرضُ طهورًا ومسجدًا".
وفي الباب عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطيتُ خمسًا لم يُعطها أحدٌ قبلي من الأنبياء، جعلت لي الأرض طهورًا ومسجدًا، ولم يكن من الأنبياء يصلي حتى يبلغ محرابه، ونُصرت بالرّعب مسيرة شهر يكون بين يديّ إلى المشركين، فيقذف اللَّه الرّعبَ في قلوبهم، وكان النبيُّ يُبعث إلى خاصة قومه، وبُعثتُ أنا إلى الجنّ والإنس".
رواه البزار -كشف الأستار (2366) - عن محمد، ثنا عبيد اللَّه، عن سالم أبي حماد، عن السديّ، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (8/ 258):"رواه البزار وفيه من لم أعرفهم".
وروي بمعناه بزيادة:"وأحلت لي الغنائم، وأعطيت الشفاعة، فأخرتها لأمتي فهي لمن لا يشرك باللَّه شيئًا".
رواه أحمد (2742)، وفيه يزيد بن أبي زياد الهاشمي مولاهم ضعيف باتفاق أهل العلم.
আবূ যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি: আমাকে ভয়ভীতি দ্বারা সাহায্য করা হয়েছে; ফলে এক মাসের দূরত্ব থেকে আমার শত্রুরা ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে যায়। আর আমার জন্য যমীনকে সালাতের স্থান (মসজিদ) ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম বানানো হয়েছে। আর আমার জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করা হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কারো জন্য হালাল করা হয়নি। আর আমাকে লাল ও কালো সকলের কাছে প্রেরণ করা হয়েছে। আর আমাকে বলা হয়েছিল: তুমি চাও, তোমাকে দেওয়া হবে। কিন্তু আমি সেই সুযোগটি আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফা‘আত) হিসেবে তুলে রেখেছি, আর ইন শা আল্লাহ! তা তোমাদের মধ্য থেকে এমন ব্যক্তি অবশ্যই লাভ করবে, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে তাঁর সাথে মিলিত হবে।
722 - عن أبي هريرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ما من الأنبياء نبيٌّ إلّا أُعطي ما مثلُه آمن عليه البشر، وإنّما الذي أوتيت وحْيًا، أوحاه اللَّه إليَّ، فأرجو أن أكون أكثرهم تابعًا يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4981)، ومسلم في الإيمان (152) كلاهما من حديث اللّيث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো নবী প্রেরিত হননি, যাকে এমন মুজিযা (নিদর্শন) দেওয়া হয়নি যার অনুরূপ দেখে মানুষ তার প্রতি ঈমান এনেছে। আর আমাকে যা দেওয়া হয়েছে, তা হলো ওহী (আল্লাহর বাণী), যা আল্লাহ আমার প্রতি নাযিল করেছেন। সুতরাং আমি আশা করি যে কিয়ামতের দিন আমার অনুসারীর সংখ্যা তাদের (অন্যান্য নবীদের) চেয়ে বেশি হবে।"
723 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسُ محمّدٍ بيده لا يسمعُ بي
أحدٌ من هذه الأمّة يهوديٌّ ولا نصرانيّ، ثم يموت ولم يؤمن بالذي أرسلت به إلّا كان من أصحاب النّار".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (153) عن يونس بن عبد الأعلى، أخبرنا ابن وهب، قال: وأخبرني عمرو، أن أبا يونس حدّثه عن أبي هريرة، فذكر مثله.
وفي معناه رُوي عن أبي موسى الأشعريّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من سمع بي من أمّتي أو يهوديّ أو نصرانيّ، فلم يؤمن بي لم يدخل الجنة". إلا أن فيه انقطاعا، رواه الإمام أحمد (19536، 19562)، والبزّار - كشف الأستار (16)، وابن حبان في صحيحه (4880) كلّهم من حديث شعبة، عن أبي بشر، قال: سمعت سعيد بن جبير، عن أبي موسى الأشعريّ، مثله.
وإسناده ضعيف من أجل الانقطاع، فإن سعيد بن جبير لم يسمع من أبي موسى، لأنه ولد سنة (46 هـ)، وتوفي أبو موسى نحو الخمسين.
وقال البزّار:"لا نعلم أحدًا رواه عن النبي صلى الله عليه وسلم إلّا أبو موسى بهذا الإسناد، ولا أحسب سمع سعيد من أبي موسى".
قلت: وقد مضى حديث أبي هريرة، وهو في الصّحيح.
وأمّا قول الهيثمي في"المجمع" (8/ 261):"رواه الطبرانيّ وأحمد بنحوه في الروايتين، ورجال أحمد رجال الصّحيح، والبزار أيضًا باختصار".
فهو كما قال، إلّا أنه لم يشر إلى الانقطاع، كما يفهم من قوله أن رجال الطبراني ليسوا من رجال الصّحيح.
تنبيه: تحرف الحديث في صحيح ابن حبان إلى"من سمَّع يهوديًّا أو نصرانيًا دخل النار". وبوَّب عليه بقوله: ذكر إيجاب دخول النّار لمن أسمع أهل الكتاب ما يكرهونه، وهذا فيه خطأ كبير نبَّه عليه الحافظ ابن حجر في"إتحاف المهرة" (10/ 24 - 25) فقال: بوَّب عليه: إيجاب دخول النّار لمن أسمع أهل الكتاب ما يكرهون، وهذا فيه نظر كبير وهو غلط نشأ عن تصحيف، وذلك أنّ لفظ هذا الحديث:"من سمع بي من أمّتي أو يهودي أو نصرانيّ فلم يؤمن بي دخل النّار".
هكذا ساقه أبو بكر بن أبي شيبة في"مسنده" عن عفّان، عن شعبة، ثنا أبو بشر، سمعت سعيد ابن جبير، يحدث عن أبي موسى، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، بهذا.
ورواه أحمد في"مسنده" عن محمد بن جعفر، وعن عفّان، عن شعبة، عن أبي بشر، به. فهذا هو الحديث، وكأنّ الرّواية التي وقعت لابن حبان مختصرة:"من سمع بي فلم يؤمن دخل النّار يهوديًّا أو نصرانيًّا". فتحرّف عليه وبوَّب هو على ما تحرّف، فوقع في خطأ كبير.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর শপথ! এই উম্মতের (যুগের) এমন কোনো ব্যক্তি, হোক সে ইহুদি অথবা খ্রিস্টান, যে আমার সম্পর্কে শুনবে, এরপর সে মৃত্যুবরণ করবে, অথচ আমি যা নিয়ে প্রেরিত হয়েছি, তার প্রতি ঈমান আনবে না, সে অবশ্যই জাহান্নামের অধিবাসী হবে।"
724 - عن ابن عباس قال: ما قرأ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على الجن وما رآهم، انطلق رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في طائفة من أصحابه عامدين إلى سوق عكاظ، وقد حيل بين الشياطين وبين خبر السماء. . . وفيه:"فانطلقوا يضربون مشارق الأرض ومغاربها، فمر النفر الذين أخذوا نحو تهامة -وهو بنخل- عامدين إلى سوق عكاظ -وهو يصلي بأصحابه صلاة الفجر- فلما سمعوا القرآن استمعوا له، وقالوا: هذا الذي حال بيننا وبين خبر السماء فرجعوا إلى قومهم فقالوا: يا قومنا إنا سمعنا قرآنا عجبا يهدي إلى الرشد فآمنا به ولن نشرك بربنا أحدا. . . الحديث.
متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الأذان (773) ومسلم في كتاب الصلاة (449 - 149) كلاهما من رواية أبي عوانة، عن أبي بشر جعفر بن أبي وحشية، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وسيأتي تفصيل الكلام على الحديث في كتاب بدء الخلق، باب وفد الجن.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জ্বিনদের কাছে (কুরআন) তিলাওয়াত করেননি এবং তাদের দেখেনওনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের একটি দলকে সঙ্গে নিয়ে উক্বায বাজারের উদ্দেশ্যে যাত্রা করলেন। ইতোমধ্যে শয়তানদেরকে আসমানের সংবাদ শোনা থেকে বাধা দেওয়া হয়েছিল। হাদীসে আরও আছে যে, তারা (জ্বিনেরা) পৃথিবীর পূর্ব ও পশ্চিম প্রান্তে (সমাধানের সন্ধানে) ছুটল। জ্বিনদের যে দলটি তিহামার দিকে গিয়েছিল—আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন নাখলা নামক স্থানে তাঁর সাহাবীদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করছিলেন—উক্বায বাজারের উদ্দেশ্যে যাওয়ার পথে তারা তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। যখন তারা কুরআন শুনতে পেল, তখন তারা মন দিয়ে তা শুনল এবং বলল, 'এটাই সেই জিনিস যা আমাদের এবং আসমানের সংবাদের মাঝে অন্তরায় সৃষ্টি করেছে।' অতঃপর তারা তাদের সম্প্রদায়ের কাছে ফিরে গিয়ে বলল, 'হে আমাদের কওম! আমরা এক অত্যাশ্চর্য কুরআন শুনেছি, যা সঠিক পথের দিশা দেয়। তাই আমরা এতে ঈমান এনেছি এবং আমরা আমাদের রবের সাথে আর কাউকে শরীক করব না।' ... হাদীসের শেষ পর্যন্ত।
725 - عن أبي هريرة أنه كان يحمل مع النبي صلى الله عليه وسلم إداوةً لوضوئه وحاجته. . . وفيه: فقلت: ما بالُ العظم والروثة؟ قال:"هما من طعام الجن، وإنه أتاني وفد جن نصيبين -ونعم الجن- فسألوني الزاد، فدعوت اللَّه لهم أن لا يمروا بعظمٍ ولا بروثةٍ إلا وجدوا عليها طعامًا. . .".
صحيح: رواه البخاريّ في كتاب مناقب الأنصار (3860) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا عمرو بن يحيى بن سعيد قال: أخبرني جدي، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আবু হুরায়রা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অযু এবং অন্যান্য প্রয়োজনের জন্য তাঁর সাথে একটি পানির পাত্র বহন করতেন। ... এরই মধ্যে (আলোচনায়), আমি (আবু হুরায়রা) বললাম, ‘হাড় ও গোবরের কী হবে?’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এগুলো হচ্ছে জিনদের খাদ্য। নাসীবীন নামক স্থানের জিনদের একটি প্রতিনিধি দল আমার কাছে এসেছিল—তারা ছিল উত্তম জিন—এবং তারা আমার কাছে পাথেয় চেয়েছিল। তাই আমি আল্লাহ্র কাছে তাদের জন্য দু‘আ করেছি যে, তারা যেন এমন কোনো হাড় বা গোবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম না করে, যার উপর তারা খাদ্য না পায়।"
726 - عن علقمة قال: سألت ابن مسعود فقلت: هل شهد أحد منكم مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا، . . . وفيه:"أتاني داعي الجن فذهبت معه، فقرأت عليهم
القرآن"، قال: فانطلق بنا فأرانا آثارهم وآثار نيرانهم. . . الحديث.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الصلاة (450) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الأعلى، عن داود، عن عامر قال: سألت علقمة: هل كان ابن مسعود شهد مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: فقال علقمة، فذكره.
ذهب ابن إسحاق إلى أن استماع الجن للقرآن كان ليلة انصرافه من الطائف إلى مكة، كما في سيرة ابن هشام (1/ 421 - 422)، والصحيح كان ذلك قبل خروجه إلى الطائف بسنين، كما قال به كثير من المحققين.
لقد ورد في القرآن ما يدل على أن الرسل كانوا يُبعَثون إلى قومهم من بني جنسهم ليكون أبلغ في الحجة، وأقطع للمعذرة، فهل كان الجن يرسل إليهم الرسل من أنفسهم، أم أنهم كانوا تبعًا لبني آدم؟ كما حكى غير واحد الإجماعَ على أن الجن لم يُرسَل إليهم الرسل من أنفسهم من الجن، وإنما كانوا تبعًا للإنس.
إلا ما حُكي عن الضحاك بن مزاحم أن الجن أرسل إليهم من أنفسهم مستدلًا بقوله تعالى: {يَامَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِنْكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آيَاتِي وَيُنْذِرُونَكُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَذَا قَالُوا شَهِدْنَا عَلَى أَنْفُسِنَا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَشَهِدُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ (130)} [سورة الأنعام: 130].
وأما قوله تعالى: {وَمَا مَنَعَ النَّاسَ أَنْ يُؤْمِنُوا إِذْ جَاءَهُمُ الْهُدَى إِلَّا أَنْ قَالُوا أَبَعَثَ اللَّهُ بَشَرًا رَسُولًا (94) قُلْ لَوْ كَانَ فِي الْأَرْضِ مَلَائِكَةٌ يَمْشُونَ مُطْمَئِنِّينَ لَنَزَّلْنَا عَلَيْهِمْ مِنَ السَّمَاءِ مَلَكًا رَسُولًا} [سورة الإسراء: 94 - 95] ففيه المقارنة بين من يعيش في الأرض وبين من يعيش في السماء، ومسكن الإنس والجن هو الأرض، فكفى أن يكون الرسول من البشر للاثنين.
আবদুল্লাহ ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলক্বামাহ (রহ.) বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমাদের কেউ কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জিনদের রাতের (ঘটনার) সাক্ষী ছিল? তিনি বললেন: না। ... (এই বর্ণনায় রয়েছে:) আমার কাছে জিনদের আহ্বানকারী এসেছিল, তাই আমি তার সাথে গেলাম এবং তাদের কাছে কুরআন পাঠ করলাম। তিনি (ইবন মাসউদ) বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে গেলেন এবং আমাদের তাদের পদচিহ্ন ও তাদের আগুনের চিহ্নগুলি দেখালেন।
727 - عن ميسرة الفجر قال: قلت: يا رسول اللَّه، متى كُتبتَ نبيًّا؟ قال:"وآدم بين الرّوح والجسد".
صحيح: رواه الإمام أحمد (20596)، والطبراني في الكبير (20/ 355)، وابن أبي عاصم في السنة (410) والآجري في الشريعة (943) كلهم من طريق عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا منصور بن سعد، عن بُديل، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن ميسرة الفجر، فذكر الحديث.
وفي بعض الروايات:"كنتُ". كما في الحلية (9/ 53). وكذلك هو في مستدرك الحاكم (2/ 608) رواه من طريق إبراهيم بن طهمان، عن بديل بإسناده وقال: صحيح الإسناد.
والأشهر:"كُتِبتُ" هكذا رواه منصور بن سعد، وإبراهيم بن طهمان، عن بديل وهو ابن ميسرة العقيلي مرفوعًا.
ورواه حماد بن سلمة، عن خالد الحذّاء، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن رجل، قال: قلت:"يا رسول اللَّه، مني بُعثت نبيًّا؟ قال: وآدم بين الروح والجسد".
رواه ابن أبي عاصم في السنة (411) عن هدبة بن خالد، ثنا حماد بن سلمة، فذكر مثله. والرجل المبهم هو ميسرة الفجر.
وهي متابعة قوية لرواية بديل المرفوعة.
إذا عرفت هذا فلا يضر مخالفة حماد بن زيد في روايته عن بديل، عن عبد اللَّه بن شقيق، مرسلًا. وإن كان الحافظ الدّارقطنيّ رجّح الإرسال، إلّا أن زيادة الثقة مقبولة عند جماهير المحدثين كما هو معروف في علم مصطلح الحديث.
والحديث الآتي يشهد لحديث ميسرة الفجر.
মাইসারাতুল ফাজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কখন নবী হিসাবে লিখিত হলেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন আদম (আঃ) রূহ এবং দেহের মাঝখানে ছিলেন।
728 - عن أبي هريرة قال: قالوا: يا رسول اللَّه، متى وجبت لك النبوة؟ قال:"وآدم بين الروح والجسد".
صحيح: رواه الترمذيّ (3609) عن أبي همام الوليد بن شجاع بن الوليد البغدادي، حدثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث مثله.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب من حديث أبي هريرة، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".
ومن هذا الوجه، أخرجه الآجري في الشريعة (946) وفيه"بين خلق آدم ونفخ الروح فيه" ورواه أيضًا من وجه آخر عن الوليد بن مسلم (946) وأخرجه الحاكم (2/ 609) من هذا الوجه شاهدا الحديث ميسرة الفجر.
ومعنى هذا الحديث إن اللَّه قدَّر نبوة محمد صلى الله عليه وسلم قبل أن يخلق آدم قضاءً، ثم ولد ولادة طبيعية من بطن أمه، وبعد أن بلغ أربعين سنة نُبّئ، فمن زعم أنه خلق قبل آدم، أو كان نبيا عند ولادته فقد خالف النصوص الصريحة الصحيحة.
وقد رُوي أيضًا عن ابن عباس إلا أنه ضعيف ولفظه:
قيل: يا رسول اللَّه متى كُتبت نبيا؟ قال:"وآدم بين الروح والجسد".
رواه البزار - كشف الأستار (2364) عن محمد بن عُمارة بن صبيح، ثنا نصر بن مزاحم، ثنا قيس، عن جابر، عن الشعبي، عن ابن عباس قال: فذكر الحديث.
وفيه جابر وهو ابن يزيد الجعفي كذبوه، وفي التقريب:"ضعيف رافضي"، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (8/ 223).
وأما ما روي:"وكنت نبيا وآدم بين الماء والطين" فهو حديث موضوع. قال شيخ الإسلام ابن تيمية:"هذا باطل نقلا وعقلا، فإن آدم ليس بين الماء والطين، بل الطين ماء وتراب، ولكن كان
بين الروح والجسد. فهذا ونحوه فيه علم اللَّه بالأشياء قبل كونها. وكتابته إياه، وإخباره بها". مجموع فتاواه (18/ 399) وأورد الحافظ ابن القيم في إعلام الموقعين (4/ 274) وقال: العوام يروونه: بين الماء والطين. قال شيخنا: هذا باطل وفي الباب أيضًا حديث العرباض بن سارية:"إني عند اللَّه لخاتم النبيين، وإن آدم عليه السلام لمنجدل في طينته" وسيأتي في باب وجوب الإيمان بأن النبي صلى الله عليه وسلم لخاتم النبيين.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনার জন্য কখন নবুয়ত নির্ধারিত হয়েছিল?’ তিনি বললেন: ‘যখন আদম (আঃ) রূহ ও দেহের মাঝে ছিলেন।’
729 - عن أنس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يؤمنُ أحدُكم حتّى أكونَ أحبَّ إليه من والده وولده والنّاس أجمعين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (15)، ومسلم في الإيمان (44) كلاهما من حديث عبد العزيز بن صهيب، عن أنس، فذكره، واللّفظ للبخاريّ.
وفي لفظ مسلم:"حتى أكون أحبَّ إليه من أهله وماله والنّاس أجمعين".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ ততক্ষণ পর্যন্ত ঈমানদার হতে পারে না, যতক্ষণ না আমি তার কাছে তার পিতা, তার সন্তান এবং সকল মানুষের চেয়ে প্রিয় হই।"
730 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لا يؤمن أحدكم حتى أكونَ أحبَّ إليه من والده وولده".
صحيح: رواه البخاريّ في الإيمان (14) عن أبي اليمان، قال: أخبرنا شعيب، قال: حدّثنا أبو الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! তোমাদের কেউ ততক্ষণ পর্যন্ত (পূর্ণ) মুমিন হতে পারবে না, যতক্ষণ না আমি তার কাছে তার পিতা ও তার সন্তান অপেক্ষা অধিক প্রিয় হই।"
731 - عن عبد اللَّه بن هشام، قال: كنّا مع النّبيّ صلى الله عليه وسلم، وهو آخذ بيد عمر بن الخطّاب، فقال له عمر: يا رسول اللَّه لأنت أحبُّ إليَّ من كلَّ شيء إلّا من نفسي، فقال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا والذي نفسي بيده، حتى أكونَ أحبَّ إليك من نفسك". فقال له عمر: فإنّه الآن، واللَّهِ، لأنت أحبُّ إليَّ من نفسي. فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"الآن يا عمر".
صحيح: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6632) عن يحيى بن سليمان، قال: حدّثني ابن وهب، قال: أخبرني حيوةُ، قال: حدّثني أبو عقيل زهرة بن معبد، أنه سمع جدَّه عبد اللَّه بن هشام، فذكره.
قال الخطّابيّ:"لم يرد به حُبَّ الطَّبْع، بل أراد به حبَّ الاختيار، لأنّ حبَّ الإنسان نفسه طبعٌ. ولا سبيل إلى قلبه، فمعناه: لا تصْدُق فيّ حتّى تفدِيَ في طاعتي نفسك، وتؤثر رضاي على هواك، وإن كان فيه هلاكك".
আব্দুল্লাহ ইবন হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। তখন তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার জীবন ব্যতীত অন্য সব কিছুর চেয়ে আপনি আমার নিকট অধিক প্রিয়। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! আমি তোমার নিকট তোমার নিজের জীবনের চেয়েও অধিক প্রিয় না হওয়া পর্যন্ত (তোমার ঈমান পূর্ণ হবে না)।" তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আল্লাহর কসম, এখন থেকে অবশ্যই আপনি আমার নিকট আমার নিজের জীবনের চেয়েও অধিক প্রিয়। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এখন (ঠিক হয়েছে), হে উমার!"
732 - عن العباس بن عبد المطلب أنّه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يقول"ذاق طَعْم الإيمان من رضي باللَّه ربًّا، وبالإسلام دينًا، وبمحمّد رسولًا".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (34) من طرق عن عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ، عن يزيد
ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن عامر بن سعد، عن العباس بن عبد المطلب، فذكره.
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দ্বীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাসূল হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে মেনে নিয়েছে, সে ঈমানের স্বাদ পেয়েছে।"
733 - عن أنس بن مالك، أنّ أعرابيًّا قال لرسول صلى الله عليه وسلم: متى السّاعة؟ فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما أعددتَ لها؟". قال: حبّ اللَّه ورسوله. قال:"أنت مع مَنْ أحببتَ".
متفق عليه: رواه مسلم في البرّ والصّلة (2639) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدّثنا مالك، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أنس، فذكره.
لم أجده في الموطأ ولم يذكره الجوهريّ في مسند الموطأ.
ورواه البخاريّ في الأحكام (7153)، ومسلم كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، حدّثنا أنس بن مالك، قال: بينما أنا والنّبيّ صلى الله عليه وسلم خارجان من المسجد، فلقينا رجل عند سدّة المسجد، فقال: يا رسول اللَّه، متى السّاعة؟ قال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"ما أعددتَ لها؟" فكأنّ الرّجلَ استكان، ثم قال: يا رسول اللَّه: ما أعددتُ لها كبير صيام ولا صلاة ولا صدقة، ولكنّي أحبُّ اللَّهَ ورسولَه. قال:"أنت مع منْ أحببتَ".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদ থেকে বের হচ্ছিলাম, তখন মাসজিদের দরজার কাছে এক ব্যক্তির সাথে আমাদের দেখা হলো। সে বলল: হে আল্লাহর রসূল! কিয়ামত কবে হবে? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তার জন্য কী তৈরি করেছ?" লোকটি যেন কিছুটা সংকুচিত হয়ে গেল, তারপর বলল: হে আল্লাহর রসূল! আমি তার জন্য অধিক পরিমাণে রোযা, সালাত বা সাদাকা তৈরি করিনি, কিন্তু আমি আল্লাহ ও তাঁর রসূলকে ভালবাসি। তিনি বললেন: "তুমি যাকে ভালোবাসো, তার সাথেই থাকবে।"
734 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أشدّ أمتي حُبًّا ناسٌ يكونون بعدي، يودُّ أحدُهم لو رآني بأهله وماله".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الجنّة (2832) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب بن عبد الرحمن، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
قوله:"من أشدّ أمتي لي حبًّا". أي بعد الصّحابة رضي الله عنهم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের মধ্যে আমার প্রতি সবচেয়ে বেশি ভালোবাসা পোষণকারী হবে এমন কিছু লোক, যারা আমার পরে আসবে। তাদের মধ্যে একজন তার পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদের বিনিময়ে হলেও আমাকে দেখতে চাইবে।
735 - عن أبي عبد الرّحمن الجُهني، قال: بينا نحن عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم طَلَعَ رَكبان، فلمّا رآهما قال:"كِنْدِيَّان مَذْحِجِيَّان" حتّى أتياه، فإذا رجالٌ من مَذْحِج، قال: فدنا إليه أحدُهما ليُبايعه، قال: فلمّا أخذ بيده، قال: يا رسولَ اللَّه، أرأيتَ مَن رآك فآمنَ بك وصدَّقك واتَّبعك، ماذا له؟ قال:"طُوبى له". قال: فمسحَ على يده فانصرف، ثم أقبل الآخرُ حتّى أخذ بيده ليُبايعه، قال: يا رسول اللَّه، أرأيتَ من آمَنَ بك وصدَّقك واتَّبعك ولم يرَك؟ قال:"طوبى له، ثم طُوبى له، ثمّ طوبى له". قال: فمسح على يدِه، فانصرف".
حسن: رواه أحمد (17388)، والطبرانيّ في الكبير (22/ 289)، والبزّار -كشف الأستار (3769) -
كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، حدّثني يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد اللَّه اليزنيّ، عن أبي عبد الرحمن الجهنيّ، فذكر مثله، واللّفظ لأحمد.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنّه مدلّس إلّا أنّه صرَّح بالتحديث.
আবূ আবদির রহমান আল-জুহানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন দুজন আরোহী আগমন করল। যখন তিনি তাদের দেখলেন, তখন বললেন: "তারা কিন্দীয়ান অথবা মাযহিজীয়ান।" যখন তারা তাঁর কাছে আসল, দেখা গেল তারা মাযহিজ গোত্রের লোক।
তিনি বলেন, তাদের মধ্যে একজন তাঁর কাছে এগিয়ে গেল তাঁর হাতে বাইআত করার জন্য। যখন সে তাঁর হাত ধরল, তখন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মনে করেন যে, যে ব্যক্তি আপনাকে দেখেছে, আপনার প্রতি ঈমান এনেছে, আপনাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে এবং আপনাকে অনুসরণ করেছে—তার জন্য কী রয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য রয়েছে তুবা (জান্নাতের বৃক্ষ/সৌভাগ্য)।"
তিনি বলেন, অতঃপর সে তাঁর হাত থেকে হাত সরিয়ে নিল এবং ফিরে গেল। তারপর অন্যজন এগিয়ে আসল এবং তাঁর হাতে বাইআত করার জন্য হাত ধরল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মনে করেন যে, যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান এনেছে, আপনাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে এবং আপনাকে অনুসরণ করেছে, কিন্তু আপনাকে দেখেনি—তার জন্য কী রয়েছে?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য রয়েছে তুবা, তারপর তার জন্য রয়েছে তুবা, তারপর তার জন্য রয়েছে তুবা।" তিনি বলেন, অতঃপর সে তাঁর হাত থেকে হাত সরিয়ে নিল এবং ফিরে গেল।
736 - عن أبي جمعة حبيب بن سباع قال: تغدينا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا أبو عبيدة ابن الجراح قال: فقال: يا رسول اللَّه هل أحد خير منا؟ أسلمنا معك وجاهدنا معك، قال:"نعم، قوم يكونون من بعدكم يؤمنون بي ولم يروني".
حسن: رواه الإمام أحمد (16976) والطبراني في الكبير (3537) وأبو يعلى (1559) وصحّحه الحاكم (4/ 85) كلهم من حديث الأوزاعيّ قال: حدثني أسيد بن عبد الرحمن، قال: حدثني صالح بن جبير، قال: حدثني أبو جمعة، فذكره.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
وإسناده حسن من أجل صالح بن جبير الصُّدائي أبو محمد الشامي الطبراني، ويقال: الفلسطيني الأردني، كان كاتب عمر بن عبد العزيز على الخراج والجند، فقال له مرة: ولينا صالح ابن جبير فوجدناه كاسمه، ووثقه ابن معين، وذكره ابن حبان في الثقات وفي التقريب: صدوق، وروى له عدد كبير.
ولكن قال أبو حاتم: شيخ مجهول فلعله يقصد به قليل الحديث، لأن أبا حاتم يطلق كلمة"مجهول" على قليلي الحديث كما ذكرت بالتفصيل في كتابي: دراسات في الجرح والتعديل.
ورواه البخاري في خلق أفعال العباد (390) عن عبد اللَّه بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن ابن جبير قال: قدم علينا أبو جمعة الأنصاري قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا معاذ بن جبل عاشر عشرة، فقلنا: يا رسول اللَّه! هل من أحد أعظم منا أجرًا؟ آمنا بك واتبعناك، قال:"وما يمنعكم من ذلك ورسول اللَّه بين أظهركم يأتيكم بالوحي من السماء؟ بل قوم يأتون من بعدكم يأتيهم كتاب بين لوحين فيؤمنون به ويعملون بما فيه، أولئك أعظم منكم أجرًا"، وفيه متابعة لأسيد بن عبد الرحمن وهو وإن كان ثقة، وثقه يعقوب بن سفيان وغيره.
وصالح بن جبير له متابعة أيضًا، رواه الإمام أحمد (16977) من طريق الأوزاعي نفسه قال: حدثني أسيد بن عبد الرحمن، عن خالد بن دُريك، عن ابن محيريز قال: قلتُ لأبي جمعة رجل من الصحابة: حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: أحدثكم حديثًا جيدًا، تغدينا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا عبيدة بن الجراح. . . فذكر الحديث مثله.
وفي الباب ما روي عن عمر بن الخطاب قال: كنت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالسا فقال:"أنبئوني بأفضل أهل الإيمان إيمانا؟"، قالوا: يا رسول اللَّه، الملائكة، قال:"هم كذلك، ويحق لهم ذلك، وما يمنعهم وقد أنزلهم اللَّه المنزلة التي أنزلهم بها، بل غيرهم" قالوا: يا رسول اللَّه الأنبياء
الذين أكرمهم اللَّه برسالته والنبوة، قال:"هم كذلك ويحق لهم وما يمنعهم وقد أنزلهم اللَّه المنزلة التي أنزلهم بها؟ بل غيرهم" قالوا: يا رسول اللَّه، الشهداء الذين استشهدوا مع الأنبياء، قال:"هم كذلك ويحق لهم وما يمنعهم وقد أكرمهم اللَّه بالشهادة مع الأنبياء؟ بل غيرهم" قالوا: فمن يا رسول اللَّه؟ قال:"أقوام في أصلاب الرجال يأتون من بعدي، يؤمنون بي ولم يروني، ويصدقون بي ولم يروني، يجدون الورق المعلق فيعملون بما فيه فهؤلاء أفضل أهل الإيمان إيمانا".
رواه أبو يعلى (160) عن مصعب بن عبد اللَّه، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن أبي حميد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه عن عمر بن الخطاب، فذكره.
وأخرجه الحاكم (4/ 85، 86)، والخطيب في شرف أصحاب الحديث (62)، كلاهما من طريق محمد بن أبي حميد، وقال الحاكم: صحيح الإسناد ولم يخرجاه.
وتعقبه الذهبي فقال:"بل محمد ضعَّفوه".
قلت: وهو كما قال، فإن محمد بن أبي حُميد -واسمه: إبراهيم الأنصاري الزرقي- أبو إبراهيم المدني، الملقب حماد، ضعيفٌ جدَّا، عند جماهير أهل العلم، فقال أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن معين: ضعيفٌ ليس حديثُه بشيء، وقال البخاري: منكر الحديث، وقال النسائي: ليس بثقة، وقال أبو حاتم: كان رجلًا ضريرًا، منكر الحديث، ضعيف الحديث، وضعّفه أيضًا أبو داود والدارقطني وابن حبان والعقيلي وغيرهم.
فلا يلتفت إلى ما ذكره ابن شاهين في"الثقات" (1206) عن أحمد بن صالح أنه قال: ثقة لا شك فيه، حسن الحديث، روى عنه أهل المدينة، يقولون: حماد، وغيرهم يقولون: محمد بن أبي حميد.
وفيه كلام آخر، راجع"التهذيب".
ورواه العقيلي في الضعفاء (1832) في ترجمة المنهال بن بحر قال: حدثنا هشام بن أبي عبد اللَّه، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن أسلم، عن أبيه عن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتدرون أي الخلق أعجب إيمانًا؟" فذكر الحديث.
وهذه المتابعة لا تفيد شيئًا فإن منهال بن بحر قال فيه العقيلي: في حديثه نظر، وقال:"وهذا الحديث إنما يُعرف لمحمد بن أبي حُميد، عن زيد بن أسلم، وليس بمحفوظ من حديث يحيى بن أبي كثير، ولا يُتابع منهالًا عليه أحد"، انتهى.
قلت: المنهال بن بحر هذا ذكره الذهبي في"الميزان" ونقل قول العقيلي،"في حديثه نظر" وقال: حدث عنه أبو حاتم وقال: ثقة، وذكره ابن عدي في"كامله" وأشار إلى تلبينه.
وفي الإسناد أيضًا يحيى بن أبي كثير ذكره العقيلي في الضعفاء (2051) وقال:"ذُكر بالتدليس"، وفي التقريب:"ثقة ثبت، لكنه يدلس ويرسل".
قلت: وقد رواه معنعنًا فلا يؤمن أن يكون قد دلَّسه في هذا الإسناد، فأسقط رجلًا من الإسناد،
أو سمع من ابن أبي حميد نفسه، فأسقطه لضعفه.
ثم هذا الحديث الذي أشار إليه العقيلي هو حديث آخر رواه الحسن بن عرفة، ومن طريقه الخطيب في"شرف أصحاب الحديث" (61) قال: حدثنا إسماعيل بن عياش الحمصي، عن المغيرة بن قيس التميمي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أي الخلق أعجب إليكم إيمانًا؟" قالوا: الملائكة، قال:"وما لهم لا يؤمنون وهم عند ربهم!" قالوا: فالنبيون؟ ، قال:"وما لهم لا يؤمنون والوحي ينزل عليهم!" قالوا: نحن، قال:"وما لكم لا تؤمنون وأنا بين أظهركم!"، قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن أعجب الخلق إليَّ إيمانًا، لَقَومٌ يكونون من بعدكُم، يجدونَ صُحُفًا، فيها كتابٌ، يؤمنون بما فيها".
وإسماعيل بن عياش ضعيفٌ في روايته عن غير الشاميين، وشيخه المغيرة بن قيس التميمي البصري ليس من الشاميين، ثم هو ضعيفٌ أيضًا.
قال أبو حاتم:"منكر الحديث"، الجرح والتعديل (8/ 227، 228).
وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي سعيد الخدريّ، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أنّ رجلًا قال له: يا رسول اللَّه، طوبى لمن رآك وآمن بك. قال:"طوبى لمن رآني وآمن بي، ثم طوبى ثم طوبى ثم طوبى لمن آمن بي ولم يرني". قال له رجل: وما طوبى؟ قال:"شجرة في الجنّة مسيرة مائة عام، ثياب أهل الجنة تخرج من أكمامها".
رواه الإمام أحمد (11673)، وأبو يعلى (1374) وصحّحه ابنُ حبان (7230، 7413) كلّهم من طرق عن درّاج أبي السّمح، أنّ أبا الهيثم حدّثه عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر مثله.
ودرّاج أبو السّمح يضعّف في روايته عن أبي الهيثم، ولكن رواه ابنُ أبي عاصم في السنة (1487) من وجه آخر عن وكيع، حدّثنا إبراهيم أبو إسحاق، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا مختصرًا بلفظ:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني". وهذه متابعة جيدة، إلّا أنّ إبراهيم أبا إسحاق ضعيف أيضًا.
ومنها: عن أنس بن مالك مرفوعًا:"طوبى لمن آمن بي ورآني مرة، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني" سبع مرار.
رواه الإمام أحمد (12578) عن هاشم بن القاسم، قال: حدّثنا جَسْرٌ، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
وجسر هو ابن فرقد القصّاب أبو جعفر، بصريّ، قال البخاريّ: ليس بذاك عندهم. وقال ابن معين -من وجوه عنه-: ليس بشيء. وقال النسائي: ضعيف. ترجمه الذّهبي في الميزان (1/ 398).
إلّا أنّه توبع فقد رواه أبو يعلى (3391) من طريق أبي عبيدة الحداد، عن محتسب بن عبد الرحمن، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
ومحتسب بن عبد الرحمن أبو عائذ، قال فيه ابنُ عدي: يروي عن ثابت أحاديث ليست
بمحفوظة، ومنها الحديث المذكور. انظر"الميزان" (3/ 442).
ومنها: جاء رجلٌ إلى ابن عمر فقال: يا أبا عبد الرحمن، أنتم نظرتم إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بأعينكم؟ قال: نعم. قال: وكلّمتموه بألسنتكم هذه؟ قال: نعم. قال: وبايعتُموه بأيمانكم هذه؟ قال: نعم. قال: طوبى لكم يا أبا عبد الرحمن. قال: أفلا أخبرك عن شيءٍ سمعته منه؟ سمعتُ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن لم يرني وآمَنَ بي". ثلاثًا.
رواه أبو داود الطّيالسّي في"مسنده" (1956) عن طلحة، عن نافع قال: جاء رجلٌ إلى ابن عمر، فذكره.
وأخرجه أيضًا ابنُ أبي عاصم في السنة (1529 - تحقيق: باسم) من طريق طلحة بن عمرو مختصرًا.
وإسناده ضعيف جدًا فإنّ طلحة بن عمرو الحضرميّ متروك. قال البوصيريّ في"إتحافه":"وقد أجمعوا على ضعفه". وأورده ابن الجوزيّ في"العلل المتناهية" (1/ 302) وقال:"هذا حديث لا يصح عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم".
وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني - سبع مرار".
رواه الإمام أحمد (22138)، والطّبرانيّ في الكبير (8/ 310)، وأبو داود الطّيالسيّ (1228)، وصحّحه ابنُ حبان (7233) كلّهم من طريق همّام، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي أمامة، فذكره.
وهمّام هو: ابن يحيى العوذيّ.
أيمن هو ابن مالك الأشعريّ كما قال ابن حبان وذكره في الثقات (4/ 48)، وترجمة الحافظ في"التعجيل" وقال:"وثّقه ابنُ حبان".
وفي الباب أيضًا عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبي -سبع مرّات- لمن آمن بي ولم يرني".
رواه ابن حبان في صحيحه (7232) من طريق أبي عامر العقديّ، حدّثنا همّام ابن يحيى، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي هريرة، فذكره.
قال ابن حبان:"سمع هذا الخبر أيمن عن أبي هريرة وأبي أمامة معًا، وأيمن هذا هو أيمن بن مالك الأشعريّ".
আবু জুমআ হাবীব ইবনে সিবআ’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দুপুরের খাবার খাচ্ছিলাম, আর আমাদের সাথে আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের চেয়ে কি উত্তম কেউ আছে? আমরা আপনার সাথে ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং আপনার সাথে জিহাদ করেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এমন কিছু লোক থাকবে যারা তোমাদের পরে আসবে, তারা আমার প্রতি ঈমান আনবে, অথচ আমাকে দেখেনি।"
737 - عن فضالة بن عبيد، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اللهمّ من آمن بك، وشهد أنّي رسولُك فحبِّبْ إليه لقاءك، وسهِّلْ عليه قضاءك، وأقْلل له من الدّنيا، ومن لم يؤمن بك، ولم يشهد أنّي رسولُك، فلا تُحبِّبْ إليه لقاءك، ولا تُسهِّل عليه قضاءك، وأكثرْ
له من الدُّنيا".
صحيح: رواه الطبرانيّ في الكبير (18/ 313) من طريق ابن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، عن أبي هانئ، عن عمرو بن مالك، عن فضالة بن عبيد، فذكره.
إسناده صحيح، وصحّحه ابنُ حبان (208)، ورواه من هذا الوجه.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 208) وقال:"رواه الطبرانيّ، ورجاله ثقات".
ফাদালাহ ইবনে উবায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে আল্লাহ! যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান এনেছে এবং সাক্ষ্য দিয়েছে যে আমি আপনার রাসূল, তার জন্য আপনার সাক্ষাতকে প্রিয় করে দিন, তার জন্য আপনার ফয়সালা সহজ করে দিন এবং তার জন্য দুনিয়া সীমিত করে দিন। আর যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান আনেনি এবং সাক্ষ্য দেয়নি যে আমি আপনার রাসূল, তার জন্য আপনার সাক্ষাতকে প্রিয় করবেন না, তার জন্য আপনার ফয়সালা সহজ করবেন না এবং তার জন্য দুনিয়া বাড়িয়ে দিন।”
738 - عن جبير بن مطعم، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لي خمسةُ أسماء: أنا محمد، وأنا أحمد، وأنا الماحي الذي يمحو اللَّه بي الكفر، وأنا الحاشر الذي يُحشر الناس على قدمي، وأنا العاقب".
متفق عليه: رواه مالك في أسماء النّبيّ صلى الله عليه وسلم (1) عن ابن شهاب، عن محمد بن جبير بن مطعم، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).
هكذا في موطأ يحيى بن يحيى اللّيثيّ مرسلًا بدون ذكر"أبيه".
قال ابن عبد البر في"التمهيد" (9/ 151):"هكذا رواه يحيى مرسلًا، ولم يقل فيه"عن أبيه". وتابعه على ذلك أكثر الرّواة للموطأ. . . ورواه معن بن عيسى وغيره عن مالك موصولًا بذكر أبيه. ومن طريقه رواه البخاريّ في المناقب (3532).
وأمّا مسلم فرواه في الفضائل (2354) من طرف -غير مالك- عن الزّهريّ موصولًا وزاد تفسير العاقب بقوله:"والعاقب الذي ليس بعده نبي". وفي تفسير آخر:"ليس بعده أحد".
ورواه بإسناد آخر من طريق عُقَيْل وقال: وفي حديث عُقيل قال: قلت للزّهريّ:"وما العاقب؟ قال: الذي ليس بعده نبيٌّ".
وكذلك قال معمر للزّهريّ:"ما العاقب؟ قال: الذي ليس بعده نبيٌّ".
رواه عبد الرزّاق عنه في مصنفه (19657)، ومن طريقه مسلم إلّا أنّه لم يذكر سؤال معمر للزهريّ.
ولكن رواه الترمذيّ (2840) عن سعيد بن عبد الرحمن المخزوميّ، عن سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، بإسناده وفيه:"وأنا العاقب الذي ليس بعدي نبيٌّ". قال الترمذيّ"حسن صحيح". فجعل التّفسير مرفوعًا.
وسعيد بن عبد الرحمن المخزوميّ ثقة، وثّقه النسائيّ وقال مسلمة في كتاب"الصّلة":"هو ثقة في ابن عيينة، فلا يمكن ترجيح الوقف على الرّفع وإن كان الذين أوقفوه أكثر". ولذا قال الحافظ
في"الفتح" (6/ 557):"هو محتمل للرّفع والوقف".
জুবাইর ইবনু মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পাঁচটি নাম আছে: আমি মুহাম্মাদ, আমি আহমাদ, আমি আল-মাহী (যাকে দিয়ে আল্লাহ কুফরকে মিটিয়ে দেবেন), আমি আল-হাশির (যার পদতলে/পরে মানুষকে সমবেত করা হবে) এবং আমি আল-আকিব।"
739 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كانت بنو إسرائيل تسوسُهم الأنبياء، كلّما هلك نبيٌّ خلفه نبيٌّ، وأنّه لا نبي بعدي، وسيكون خلفاء فيكثرون". قالوا: فما تأمرنا؟ قال:"فوا ببيعة الأوّل فالأوّل، أعطوهم حقَّهم، فإنّ اللَّه سائلُهم عمّا اسْترعَاهُم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3455)، ومسلم في الإمارة (1842) كلاهما عن محمد بن بشّار، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن فُرات القزاز، قال: سمعت أبا حازم، قال: قاعدتُ أبا هريرة خمس سنين، فسمعتُه يحدّث عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال: فذكر مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বনী ইসরাঈলদেরকে নবীগণ নেতৃত্ব দিতেন (বা শাসন করতেন)। যখনই কোনো নবী মারা যেতেন, তখনই তাঁর স্থলাভিষিক্ত হতেন আরেকজন নবী। আর নিশ্চয়ই আমার পরে কোনো নবী নেই। (আমার পরে) খলীফাগণ হবেন এবং তারা সংখ্যায় অনেক হবে। সাহাবীগণ বললেন, আপনি আমাদেরকে কী আদেশ করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তোমরা প্রথমজনের পর প্রথমজনের (ধারাবাহিকভাবে) বাইয়াত পূর্ণ করবে। তোমরা তাদেরকে তাদের প্রাপ্য অধিকার দেবে। কেননা আল্লাহ তাদের ওপর অর্পিত দায়িত্ব সম্পর্কে তাদের কাছে কৈফিয়ত চাইবেন।
740 - عن أبي هريرة، قال: فذكر حديث الشّفاعة بطوله وجاء فيه:
"فيقولون: يا محمد أنت رسول اللَّه وخاتم الأنبياء، وغفر اللَّه لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر اشفع لنا إلى ربِّك. . . .".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4712)، ومسلم في الإيمان (194) كلاهما من حديث أبي حيان التيميّ، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره بطوله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি শাফা’আত সংক্রান্ত দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং তাতে এসেছে:
"তারা বলবে: হে মুহাম্মাদ! আপনি আল্লাহর রাসূল এবং নবীগণের শেষ (খাতামুল আম্বিয়া)। আল্লাহ আপনার পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন। আপনি আমাদের জন্য আপনার রবের নিকট সুপারিশ করুন...।"