হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7321)


7321 - عن علي بن أبي طالب قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن خاتم الذهب، وعن القَسيّ، وعن الميثرة، وعن الجعة.
حسن: رواه الترمذي (2808)، وأبو داود (4051)، والنسائي (8/ 165)، وابن ماجه (3654)، وابن أبي شيبة (8/ 110)، وأحمد (1102) كلهم من حديث أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، عن هبيرة، عن علي قال .. فذكره.

واللفظ للترمذي واختصر بعضهم.

وإسناده حسن من أحل هبيرة وهو ابن يريم مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح.

وأبو إسحاق هو السبيعي مدلس، ولكن رواه أيضا شعبة عند أبي داود وهو القائل: كفيتُكم تدليس أبي إسحاق.

وقوله:"الميثرة" - بكسر الميم وفتح المثلثة - وهو وطاء محشو يجعل فوق رحل البعير تحت الراكب، وهو دأب المتكبرين، ولكن إن قصد به استراحة الضعفاء فلا حرج في ذلك.

وقوله:"الجعة" بكسر الجيم وسكون العين هي النبيذ المتخذ من الشعير.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সোনার আংটি, কাসি (নামক রেশমী বস্ত্র), মাইসারা (উট বা ঘোড়ার পিঠে ব্যবহৃত নরম গদি), এবং জি‘আহ (যবের তৈরি মদ) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7322)


7322 - عن معقل بن يسار قال: حرمت الخمر ونحن نشرب الفضيخ، فجعلتُ أهريقُها وأقول هذا آخر العهد بالخمر.

حسن: رواه أحمد في الأشربة (184) والطبراني في الكبير (20/ 218) كلاهما من طريق جامع بن مطر الحبطي، ثنا معاوية بن قرة، قال: قال معقل بن يسار .. فذكره. واللفظ للطبراني.

ولفظ أحمد:"فجعلنا نشربها ونقول: هذا آخر العهد بالخمر".

وإسناده حسن من أجل جامع بن مطر الحبطي البصري فإنه حسن الحديث.

وقوله:"الفضيخ" هو شراب يتخذ من البسر من غير أن تمسه النار.




মা'কিল ইবনে ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, যখন মদ হারাম করা হলো, তখন আমরা 'ফাদীখ' পান করছিলাম। তখন আমি তা ঢেলে দিতে লাগলাম এবং বলতে লাগলাম: মদের সাথে এটাই শেষ অঙ্গীকার (বা সম্পর্ক)।









আল-জামি` আল-কামিল (7323)


7323 - عن أبي عبد الله الجسري قال: سألت معقل بن يسار عن الشراب فقال: كنا بالمدينة، وكانت كثيرة التمر، فحرّم علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم الفضيخ.

وأتاه رجلٌ فسأله عن أم له عجوز كبيرة: أيسقيها النبيذ، فإنها لا تأكل الطعام؟ فنهاه معقل.

صحيح: رواه أحمد (20299)، والطبراني في الكبير (20/ 217، 224) كلاهما من طريق المثنى بن عوف، ثنا أبو عبد الله الجسري به .. فذكره. وليس عند الطبراني قصة الرجل مع أمه العجوز.

وإسناده صحيح، وأبو عبد الله الجسري اسمه حميري - بلفظ النسب - بن بشير، مشهور بكنيته.




মা'কিল ইবন ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা মদীনায় ছিলাম। সেখানে প্রচুর খেজুর ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উপর ফাদীখ (খেজুর থেকে তৈরি এক ধরনের পানীয়) হারাম করে দিলেন।
আর (একবার) তাঁর কাছে একজন লোক এসে তার অতি বৃদ্ধা মায়ের ব্যাপারে জিজ্ঞেস করল: সে কি তাকে নাবীয (খেজুর ভিজিয়ে তৈরি পানীয়) পান করাতে পারবে? কারণ তিনি (মা) খাবার গ্রহণ করতে পারেন না। তখন মা'কিল তাকে নিষেধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7324)


7324 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم: أن ناسا من أهل اليمن قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فعلمهم الصلاة والسنن والفرائض قالوا: يا رسول الله إن لنا شرابا نصنعه من القمح والشعير فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم قال:"لا تطعموه" فلما كان بعد يومين
ذكروهما له أيضا فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم قال:"لا تطعموه" فلما أرادوا أن ينطلقوا سألوه عنه فقال:"الغبيراء؟" قالوا: نعم قال:"فلا تطعموه".

حسن: رواه ابن حبان (5367) عن ابن قتيبة، ثنا يزيد بن مَوْهب، ثنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أن أبا السمح حدثه، أن عمر بن الحكم حدثه، عن أم حبيبة .. فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي السمح واسمه دراج بن سمعان المصري، وهو مختلف فيه غير أنه يُضعّف في أبي الهيثم ويحسّن في غيره.

وابن قتيبة: هو محمد بن الحسن بن قتيبة العسقلاني.

ويزيد بن موهب نُسب إلى جده الأعلى وهو يزيد بن خالد بن يزيد بن عبد الله بن موهب الهمداني الزاهد.

ورواه البيهقي (8/ 292) من وجه آخر عن ابن وهب، به مثله.

ورواه أحمد (27407)، وأبو يعلى (7147) والطبراني في الكبير (23/ 242، 246) من طريق ابن لهيعة، ثنا درّاج به بمثله، وزاد في آخره:"قالوا: فإنهم لا يدعونها" قال:"من لم يتركها، فاضربوا عنقه".

وهذه الزيادة شاذة أو منكرة تفرد بها ابن لهيعة وهو سيء الحفظ.

وقوله:"الغُبيراء": بضم الغين - وهو نوع من الخمر يتخذ من الذرة، وهي من خمر الحبشة.

قال مالك: سألت زيد بن أسلم عنه فقال: أسكركة، وفي لفظ هي: السكركة. الأشربة (10).




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়েমেনের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তখন তিনি তাদেরকে সালাত, সুন্নাত ও ফরযসমূহ শিক্ষা দিলেন। তারা বলল, 'ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা গম ও যব দিয়ে তৈরি এক প্রকার পানীয় পান করি।' তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, 'আল-গুবায়রাহ (Ghubayra)?' তারা বলল, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'তোমরা তা পান করবে না।' দুই দিন পর যখন তারা আবার তাঁর কাছে এটি উল্লেখ করল, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, 'আল-গুবায়রাহ?' তারা বলল, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'তোমরা তা পান করবে না।' যখন তারা চলে যেতে চাইল, তখন তারা আবার এ সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞাসা করল। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, 'আল-গুবায়রাহ?' তারা বলল, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'তোমরা তা পান করবে না।'









আল-জামি` আল-কামিল (7325)


7325 - عن ابن عباس قال: كانت خمرتنا يومئذ الفضيخ، وحُرمت يوم حُرمت وما هي إلا فضيخكم.

حسن: رواه الطبراني في الكير (11/ 351) عن موسى بن هارون، ثنا أحمد بن حنبل، ثنا يحيى بن سعيد، عن عثمان الشحّام، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عثمان الشحّام هو العدوي أبو سلمة البصري، فإنه لا بأس به كما في التقريب.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যেদিন মদ হারাম করা হয়েছিল, সেদিন আমাদের মদ ছিল আল-ফাযীখ (Fadikh)। যেদিন তা হারাম হয়, সেদিনই তা হারাম হয়ে গিয়েছিল। আর তা ছিল তোমাদের ফাযীখের মতোই।









আল-জামি` আল-কামিল (7326)


7326 - عن عبد الله بن أبي الهذيل قال: كان عبد الله يحلف بالله إن التي أمر بها رسول الله صلى الله عليه وسلم حين حُرمت الخمر أن تُكسر دنانُه، وأن تكفأ: لِمن التمر والزبيب.

صحيح: رواه الدارقطني (4652)، وأحمد بن منيع في مسنده - كما في المطالب العالية (1825) - من طريق حسين بن محمد، ثنا شيبان، عن أشعث بن أبي الشعثاء، عن عبد الله بن أبي الهذيل .. فذكره.

وإسناده صحيح. عبد الله هو ابن مسعود رضي الله عنه. وشيبان هو ابن عبد الرحمن النحوي البصري.
وحسين بن محمد هو المروزي.

وقوله:"دِنانه" جمع الدن وهو وعاء كبير.

قال أبو عبيد:"جاءت في الأشربة آثار كثيرة بأسماء مختلفة عن النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه، وكلٌّ له تفسير.

فأولها: الخمر وهي ما غلي من عصير العنب واشتد، فهذا ما لا خلاف في تحريمه بين المسلمين، وإنما الاختلاف في غيره.

ومنها: السكر وهو نقيع التمر الذي لم تمسه النار، أو هو النيئ من ماء الرطب إذا غلى واشتد، وقذف بالزبد. وفيه يروي عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه أنه قال:"السكر خمر".

ومنها: البتع وهو نبيذ العسل.

ومنها: الجعة وهو نبيذ الشعير.

ومنها: المزر وهو من الذرة.

ومنها: الفضيخ وهو ما افتضخ من البسر من غير أن تمسه النار.

وقال: فإن كان مع البسر تمر، فهو الذي يسمى الخليطين، وكذلك إن كان زبيبا وتمرا فهو مثله.

ومن الأشربة: المنصف وهو أن يطبخ عصير العنب قبل أن يغلي حتى يذهب نصفه وقد بلغني أنه يسكر، فإن كان يسكر فهو حرام، وإن طبخ حتى يذهب ثلثاه ويبقى ثلثه فهو الطلاء، وإنما سمي بذلك؛ لأنه شبه بطلاء الإبل في ثخنه وسواده، وبعض العرب يجعل الطلاء الخمر بعينها، يروى أن عبيد بن الأبرص قال في مثل له:

هي الخمر تكنى الطلاء كما الذئب يكنى أبا جعدة.

قال: وكذلك الباذق، وقد يسمى به الخمر، والمطبوخ، وهو الذي يروى فيه الحديث عن ابن عباس أنه سئل عن الباذق فقال:"سبق محمد الباذق وما أسكر فهو حرام". وإنما قال ابن عباس ذلك؛ لأن الباذق كلمة فارسية عربي فلم يعرفها. ثم قال: وهذه الأشربة المسماة عندي كلها كناية عن اسم الخمر، ولا أحسبها إلا داخلة في حديث النبي صلى الله عليه وسلم:"إن ناسا من أمتي يشربون الخمر باسم يسمونها به". قال: ومما يبينه قول عمر بن الخطاب رضي الله عنه:"الخمر ما خامر العقل". انظر: السنن الكبرى (8/ 295).

ومن الأشربة: نقيع الزبيب وهو اسم للنيئ من ماء الزبيب المنقوع في الماء حتى خرجت حلاوته من غير طبخ واشتد وقذف بالزبد.

ومنها: الجهوري وهو الطلاء الذي يلقى فيه الماء حتى يرق ويعود إلى المقدار الذي كان في الأصل، ثم طبخ بأدنى طبخة وصار مسكرا.

فالمسكر كله حرام من أي نوع كان، فإنه هو الخمر المحرمة في القرآن والسنة والإجماع، وهو
مذهب أهل الحجاز من الصحابة التابعين، وذهب إليه من الفقهاء أئمة الفتوى بالأمصار: مالك والليث والشافعي وأحمد والأوزاعي وأبو ثور وإسحاق وداود وغيرهم. وهو الذي تشهد به الآثار الثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم وتشهد به اللغة في معنى الخمر، وهو الذي لم يعرف الصحابة غيره حين نزول القرآن بتحريمها. انظر للمزيد: المنة الكبرى (7/ 355 - 356).




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর নামে শপথ করে বলতেন যে, যখন মদ হারাম করা হয়েছিল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা নির্দেশ দিয়েছিলেন, তা হলো মদের মটকাগুলো ভেঙে ফেলা এবং খেজুর ও কিশমিশের (তৈরি পানীয়ের) পাত্রগুলি উপুড় করে দেওয়া।









আল-জামি` আল-কামিল (7327)


7327 - عن عائشة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن البتْع؟ فقال:"كل شراب أسكر فهو حرام".

متفق عليه: رواه مالك في الأشربة (9) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.

ورواه البخاري في الأشربة (5585)، ومسلم في الأشربة (2001: 67) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه البخاري (5586) من طريق شعيب، عن الزهري به، وفيه: سئل رسول الله عن البتْع - وهو نبيذ العسل، وكان أهل اليمن يشربونه - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل شراب أسكر فهو حرام".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল-বিত’ (al-Bit’) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "প্রত্যেক পানীয় যা নেশা সৃষ্টি করে (বা, মাতাল করে), তা হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7328)


7328 - عن أبي موسى الأشعري قال: بعثني النبي صلى الله عليه وسلم أنا ومعاذ بن جبل إلى اليمن، فقلت: يا رسول الله إن شرابا يُصنع بأرضنا يقال له: المزرُ من الشعير، وشراب يقال له: البتع من العسل؟ فقال:"كل مسكر حرام".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4343)، ومسلم في الأشربة (1733: 70) كلاهما من طريق سعيد بن أبي بُردة، عن أبيه، عن أبي موسى، قال .. فذكره.

واللفظ لمسلم. ورواه أبو داود (3684) من طريق عاصم بن كليب، عن أبي بردة، به بلفظ: سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن شراب من العسل؟ فقال:"ذاك البتع"، قلت: ينتبذون من الشعير والذرة؟ فقال:"ذلك المزر"، ثم قال:"أخبرْ قومك: أن كل مسكر حرام".

وفيه عاصم بن كليب الجرمي صدوق، وبقية رجاله ثقات، لكن جعل تفسير البتْع والمزر من النبي صلى الله عليه وسلم مخالف لما في الصحيحين أنه من قول أبي موسى الأشعري.

ومما يدل على شذوذه ما رواه النسائي (5603)، وأحمد (19598) من طريق الأجلح، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن فقلت: يا رسول الله إن بها أشربة فما أشرب وما أدع قال:"وما هي؟" قلت: البتع والمزر قال:"وما البتع والمزر؟" قلت: أما البتع فنبيذ العسل، وأما المزر فنبيذ الذرة فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تشرب مسكرا، فإني حرمت كل مسكر".
وإسناده حسن من أجل الأجلح هو ابن عبد الله بن حُجيّة فإنه صدوق.




আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এবং মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়ামানের দিকে প্রেরণ করেন। আমি বললাম, “হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের ভূমিতে যব থেকে তৈরি এক প্রকার পানীয় প্রস্তুত করা হয়, যাকে 'আল-মিযর' বলা হয়, এবং মধু থেকে তৈরি আরেক প্রকার পানীয় প্রস্তুত করা হয়, যাকে 'আল-বিত্' বলা হয়?” তিনি বললেন, “প্রত্যেক নেশা উদ্রেককারী বস্তু হারাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (7329)


7329 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل مسكر خمر، كل مسكر حرام، ومن شرب الخمر في الدنيا فمات وهو يُدمنها لم يتُبْ لم يشربها في الآخرة".

متفق عليه: رواه مسلم في الأشربة (2003: 73) من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر قال .. فذكره.

ورواه البخاري في الأشربة (5575) من طريق مالك، عن نافع، به مقتصرا على الشطر الثاني بلفظ:"من شرب الخمر في الدنيا ثم لم يتب منها حُرمها في الآخرة". وهو في الموطأ في الأشربة (11).




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নেশা উদ্রেককারী বস্তু 'খামর' (মদ), আর প্রত্যেক নেশা উদ্রেককারী বস্তুই হারাম। যে ব্যক্তি দুনিয়ায় মদ পান করল এবং সে তাতে আসক্ত থাকা অবস্থায় তওবা না করে মৃত্যুবরণ করল, সে আখেরাতে (জান্নাতে) তা পান করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7330)


7330 - عن بريدة بن الحصيب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نهيتُكم عن الظروف، وإن الظروف - أو ظرفا - لا يُحلُّ شيئا ولا يحرمه، وكل مسكر حرام".

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (977: 64) عن حجاج بن الشاعر، حدثنا ضحاك بن مخلد، عن سفيان، عن علقمة بن مرثد، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে (নির্দিষ্ট কিছু) পাত্র ব্যবহার করতে নিষেধ করেছিলাম। নিশ্চয়ই পাত্রসমূহ – অথবা একটি পাত্র – কোনো কিছুকে হালালও করে না এবং হারামও করে না। আর প্রতিটি নেশা সৃষ্টিকারী বস্তুই হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7331)


7331 - عن سئل ابن عباس عن الباذق فقال: سبق محمد صلى الله عليه وسلم الباذق، فما أسكر فهو حرام. قال: الشراب الحلال الطيب. قال: ليس بعد الحلال الطيب إلا الحرام الخبيث.

صحيح: رواه البخاري في الأشربة (5598) عن محمد بن كثير، أخبرنا سفيان، عن أبي الجويرية قال: سألت ابن عباس عن الباذق فقال .. فذكره.

والباذق هو: إذا طبخ عصير العنب حتى يصير مثل طلاء الإبل فيكون مسكرا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বাযিক সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাযিকের বিধান আগেই দিয়ে গেছেন, সুতরাং যা কিছু নেশা সৃষ্টি করে তাই হারাম। (প্রশ্নকারী) বলল: হালাল ও পবিত্র পানীয় কোনটি? তিনি বললেন: হালাল ও পবিত্রের পরে হারাম ও অপবিত্র ছাড়া আর কিছু নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (7332)


7332 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُنبذ في النقير، والمزفت، والدبّاء، والحنتمة، وقال:"كل مسكر حرام".

حسن: رواه النسائي (5588، 5589)، وابن ماجه (3401)، وأحمد (9539، 10510)، وصحّحه ابن حبان (5408) كلهم من طرق عن محمد بن عمرو، ثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

واقتصر النسائي وأحمد في الموضع الأول على قوله:"كل مسكر حرام".

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو هو: ابن علقمة بن وقاص الليثي فإنه حسن الحديث.

وأبو سلمة هو: ابن عبد الرحمن بن عوف.




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাকীর (কাঠের পাত্র), মুযাফফাত (আলকাতরা মাখানো পাত্র), দুব্বা (কুমড়ার খোল) এবং হানতামা (সবুজ মাটির পাত্র)-তে নাবীয তৈরি করতে নিষেধ করেছেন। আর তিনি বলেছেন: "প্রত্যেক নেশা সৃষ্টিকারী বস্তু হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7333)


7333 - عن ابن عمر قال سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"كل مسكر حرام، وكل مسكر خمر".

حسن: رواه الترمذي (1864)، والنسائي (5587)، وابن ماجه (3390)، وأحمد (4644)، وصحّحه ابن حبان (5369) كلهم من طرق عن محمد بن عمرو، ثنا أبو سلمة، عن ابن عمر قال .. فذكره.

واقتصر الترمذي وأحمد على الجملة الأولى منه. وإسناده حسن كسابقه.
وهذا الإسناد والذي قبله كلاهما محفوظ عن محمد بن عمرو. انظر: علل الدارقطني (9/ 290).




ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক নেশা সৃষ্টিকারী বস্তু হারাম, এবং প্রত্যেক নেশা সৃষ্টিকারী বস্তুই হচ্ছে মদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7334)


7334 - عن ابن عمر قال: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر آية الخمر، فقال رجل: أرأيت المزر؟ قال:"وما المزر؟" قال: حبّة تُصنع باليمن، فقال:"تسكر؟" قال: نعم قال:"كل مسكر حرام".

صحيح: رواه النسائي (5605) عن أبي بكر بن علي، ثنا نصر بن علي، أخبرني أبي، ثنا إبراهيم بن نافع، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عمر قال فذكره. وإسناده صحيح، ورجاله كلهم ثقات، أبو نصر بن علي هو: علي بن نصر بن علي الجهضمي. وابن طاوس هو عبد الله.

غير أن أبا حاتم الرازي استنكره فقال: هذا حديث منكر، لا يحتمل عندي أن يكون من حديث ابن عمر، ويعبد الله بن عمرو أشبه".

قلت: والاختلاف في صحابي الحديث ليست بعلة قادحة، وقد سبق أيضا مثله من حديث أبي موسى الأشعري.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন (অথবা খুতবা দিলেন) এবং তখন তিনি মদের (নিষিদ্ধতার) আয়াত উল্লেখ করলেন। একজন লোক জিজ্ঞাসা করল: 'মাযর' (এক প্রকার পানীয়) সম্পর্কে আপনি কী বলেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মাযর কী?" সে বলল: এটা এক প্রকার শস্য (বা দানা) যা ইয়ামেনে তৈরি করা হয়। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা কি নেশা সৃষ্টি করে?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রত্যেক নেশা সৃষ্টিকারী বস্তুই হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7335)


7335 - عن أبي موسى الأشعري قال: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنا ومعاذًا إلى اليمن، فقال معاذ: إنك تبعثنا إلى أرض كثير شراب أهلها، فما أشربُ؟ قال:"اشربْ ولا تشرب مسكرًا".

صحيح: رواه النسائي (5596) عن أحمد بن عبد الله بن علي، ثنا عبد الرحمن، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي بردة، عن أبيه قال .. فذكره. وإسناده صحيح، وعبد الرحمن هو ابن مهدي.




আবূ মূসা আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এবং মু'আযকে ইয়ামানে পাঠালেন। তখন মু'আয বললেন, আপনি আমাদের এমন এক দেশে পাঠাচ্ছেন, যেখানকার লোকেরা প্রচুর পানীয় পান করে, তবে আমি কী পান করব? তিনি বললেন, তুমি পান করো, তবে নেশাজাতীয় কোনো কিছু পান করো না।









আল-জামি` আল-কামিল (7336)


7336 - عن أنس بن مالك: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن شراب باليمن، يقال له: البِتْع والمزرُ؟ فقال:"ما أسكر فهو حرام".

حسن: رواه أبو يعلى (3971) عن محمد بن إسماعيل بن أبي سمينة البصري، ثنا عبد الله بن إدريس، عن المختار بن فُلفُل، عن أنس بن مالك، قال .. فذكره. وسيأتي مفصلا في باب ترخيص النبي صلى الله عليه وسلم في الأوعية.

وإسناده حسن من أجل المختار بن فلفل فإنه حسن الحديث.

وعزاه الهيثمي في المجمع (5/ 56) لأبي يعلى وقال: رجاله رجال الصحيح.

ورواه بمعناه أيضا (3589) عن القواريري، ثنا عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن أنس بن مالك قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عما يصنع في الظروف والمزفتة، وعن الدباء وقال:"كل مسكر حرام". ورجاله ثقات غير ابن إسحاق فهو مدلس وقد عنعن، ولكنه لا بأس به في المتابعات.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে ইয়ামানের দুটি পানীয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল, যার একটিকে 'আল-বিত্' এবং অন্যটিকে 'আল-মিযর' বলা হতো? তিনি বললেন: "যা নেশা সৃষ্টি করে তাই হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7337)


7337 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل مسكر حرام".

حسن: رواه أحمد (6738) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، حدثنا أبان بن عبد الله، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল 'আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নেশা সৃষ্টিকারী বস্তু হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7338)


7338 - عن عبد الله بن الشخير قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الأشربة فقيل: إنه لا بد منها فقال:"اشربوا ما لا يسفّه أحلامَكم، ولا يُذهب أموالكم".

حسن: رواه الطبراني ومن طريق الضياء في المختارة (9/ رقم 642) عن عبدان بن أحمد، ثنا الحسين بن مهدي، ثنا عبد الرزاق، عن الثوري، عن الجريري، عن يزيد بن عبد الله، عن أبيه قال فذكره.

وإسناده حسن من أجل الحسين بن مهدي البصري قال فيه أبو حاتم:"صدوق" وبقية رجاله ثقات. يزيد بن عبد الله هو ابن الشخير.

والجريري هو: سعيد بن إياس وإن كان اختلط فسماع سفيان الثوري عنه كان قبل اختلاطه، كما نص على ذلك ابن معين والعجلي وغيرهما.

وقال الهيثمي في المجمع (5/ 66):"رواه الطبراني، ورجاله رجال الصحيح خلا الحسين بن مهدي وهو ثقة".




আবদুল্লাহ ইবনে আশ-শিখখীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (বিশেষ ধরনের) পানীয়সমূহ থেকে নিষেধ করলেন। তখন বলা হলো: এগুলোর তো প্রয়োজন রয়েছে (এগুলো ছাড়া চলে না)। তিনি বললেন: "তোমরা এমন পানীয় পান করো যা তোমাদের বিবেককে নষ্ট না করে এবং তোমাদের সম্পদকে ধ্বংস না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7339)


7339 - عن أم سلمة قالت: نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن كل مسكر ومُفْتر.

حسن: رواه أبو داود (3686)، وأحمد (26634) كلاهما من طريق الحكم بن عتيبة، عن شهر بن حوشب قال: سمعت أم سلمة فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب إلا قوله"مفتر" فإنه شاذ انفرد به. وحسّنه الحافظ في الفتح (10/ 44).

وقوله:"ومفتر" اسم فاعل من أفتر، وهو الذي إذا شُرب أحمي الجسد وصار فيه فتور وهو ضعف وانكسار.

وفي الباب عن معاوية قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كل مسكر حرام على كل مؤمن".

رواه ابن ماجه (3389)، وصحَّحه ابن حبان (5374) كلاهما من طريق علي بن ميمون الرقي العطار، ثنا خالد بن حيان، عن سلمان بن عبد الله بن الزبرقان، عن يعلى بن شدّاد بن أوس، سمعت معاوية يقول .. فذكره.

وفيه سليمان بن عبد الله بن الزبرقان تفرد ابن حبان بتوثيقه، وقال ابن حجر:"لين الحديث" ومع ذلك قال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 106):"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات".
وفي الباب أيضا عن عائشة أنها سئلت عن الأشربة، فقالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن كل مسكر.

رواه النسائي (5682) عن إسماعيل بن مسعود، ثنا خالد، ثنا أبان بن صمعة، حدثتني والدتي، عن عائشة قالت فذكرته.

وفيه والدة أبان بن صمعة"مقبولة"كما في التقريب. يعني حيث تتابع، وإلا تكون لينة الحديث.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সকল প্রকার নেশাযুক্ত (মুসকির) এবং অবসাদ সৃষ্টিকারী (মুফতির) বস্তু থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7340)


7340 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أسكر كثيره فقليله حرام".

حسن: رواه أبو داود (3681)، والترمذي (1865)، وابن ماجه (3393)، وأحمد (14703)، وصححه ابن حبان (5382) كلهم من طريق داود بن بكر بن أبي الفرات، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال فذكره.

وإسناده حسن من أجل داود بن بكر فإنه حسن الحديث. وقال الترمذي: حسن غريب.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে বস্তুর অধিক পরিমাণ নেশা সৃষ্টি করে, তার অল্প পরিমাণও হারাম।"