আল-জামি` আল-কামিল
7468 - عن علي قال: بعث النبي صلى الله عليه وسلم سرية، وأمّر عليهم رجلا من الأنصار، وأمرهم أن يطيعوه، فغضب عليهم، وقال: أليس قد أمر النبي صلى الله عليه وسلم أن تطيعوني؟ قالوا: بلى قال: قد عزمت عليكم لما جمعتم حطبا، وأوقدتم نارا، ثم دخلتم فيها فجمعوا حطبا، فأوقدوا نارًا، فلما هموا بالدخول، فقام ينظر بعضهم إلى بعض، قال بعضهم: إنما تبعنا النبي صلى الله عليه وسلم فرارا من النار أفندخلها؟ فبينما هم كذلك إذ خمدت النار وسكن غضبه فذكر للنبي صلى الله عليه وسلم لغة فقال:"لو دخلوها ما خرجوا منها أبدًا، إنما الطاعة في المعروف".
وفي رواية:"لا طاعة في معصية الله، إنما الطاعة في المعروف".
متفق عليه: رواه البخاري في الأحكام (7145)، ومسلم في الإمارة (1840: 40) من طريق
الأعمش، حدثنا سعد بن عبيدة عن أبي عبد الرحمن عن علي .. فذكره.
والرواية الأخرى لمسلم من طريق شعبة، عن سعد بن عبيدة به.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি বাহিনী প্রেরণ করলেন এবং তাদের উপর একজন আনসারী ব্যক্তিকে নেতা নিযুক্ত করলেন। তিনি তাদের নির্দেশ দিলেন যেন তারা তার আনুগত্য করে। (একবার) তিনি তাদের উপর রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি তোমাদের আমাকে মানতে আদেশ দেননি? তারা বলল: অবশ্যই দিয়েছেন। তিনি বললেন: আমি তোমাদের দৃঢ়ভাবে আদেশ দিচ্ছি যে তোমরা কাঠ সংগ্রহ করো, আগুন জ্বালাও এবং তারপর তাতে প্রবেশ করো। অতঃপর তারা কাঠ সংগ্রহ করল এবং আগুন জ্বালাল। যখন তারা তাতে প্রবেশ করতে উদ্যত হলো, তখন তারা একে অপরের দিকে তাকাতে লাগল। তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলল: আমরা তো নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে অনুসরণ করেছি জাহান্নামের আগুন থেকে বাঁচার জন্য, এখন কি আমরা তাতে (এই আগুনে) প্রবেশ করব? তারা যখন এই অবস্থায় ছিল, তখনই আগুন নিভে গেল এবং তাঁর (নেতার) ক্রোধ শান্ত হলো। এরপর ঘটনাটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: "যদি তারা তাতে প্রবেশ করত, তবে তারা কখনোই তা থেকে বের হতে পারত না। আনুগত্য কেবল ন্যায়সঙ্গত (ভালো) বিষয়েই।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "আল্লাহর নাফরমানি হয় এমন বিষয়ে কোনো আনুগত্য নেই। আনুগত্য কেবল ন্যায়সঙ্গত (ভালো) বিষয়েই।"
7469 - عن عمران بن حصين أنه قال للحكم بن عمرو الغفاري: أسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا طاعة لأحد في معصية الله تبارك وتعالى" قال: نعم فقال عمران: لله الحمد أو الله أكبر.
صحيح: رواه أحمد (20654) عن بهز، حدثنا سليمان بن المغيرة، حدثنا حميد - يعني ابن هلال - عن عبد الله بن الصامت قال: أراد زياد أن يبعث عمران بن حصين علي خراسان فأبى عليهم فقال له أصحابه: أتركت خراسان أن تكون عليها قال: فقال: إني والله ما يسرني أن أُصلى بحرِّها وتصلون ببردها، إني أخاف إذا كنت في نحور العدو أن يأتيني كتاب من زياد، فإن أنا مضيتُ هلكتُ، وإن رجعت ضربت عنقي. قال: فأراد الحكمَ بن عمرو الغفاري عليها، قال: فانقاد لأمره قال: فقال عمران: ألا أحد يدعو لي الحكم؟ قال فانطلق الرسول، قال: فأقبل الحكم إليه، قال: فدخل عليه قال: فقال عمران للحكم .. فذكره.
ورواه الحارث بن أبي أسامة كما في البغية (603) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، عن سليمان به نحوه مختصرا. وإسناده صحيح.
ورواه أحمد (20659)، والحاكم (3/ 443) من طرق عن الحسن أن زيادًا استعمل الحكم الغفاري على جيش، فأتاه عمران بن حصين، فلقيه بين الناس فقال: أتدري لم جئتك؟ فقال له: لم؟ قال: هل تذكر قول رسول الله صلى الله عليه وسلم للرجل الذي قال له أميره قَعْ في النار، فأدرك، فاحتبس، فأخبر بذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"لو وقع فيها لدخلا النار جميعا، لا طاعة في معصية الله تبارك وتعالى" قال: نعم قال: إنما أردت أن أذكّرك هذا الحديث.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه.
قلت: الحسن البصري لم يسمع من عمران بن حصين كما قال ابن المديني وأبو حاتم الرازي، وغيرهما. انظر: المراسيل لابن أبي حاتم (ص 38 - 39). ورواه أحمد (20656، 20658، 19880، 20653، 20661، 19824، 19832) من وجوه أخرى، وفيها كلام يسير.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাকাম ইবনে আমর আল-গিফারী-কে বললেন: "আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন যে, 'আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার অবাধ্যতায় (পাপ কাজে) কারো আনুগত্য করা যাবে না'?" তিনি (হাকাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তখন ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আলহামদু লিল্লাহ (আল্লাহর জন্যই সকল প্রশংসা)" অথবা (বললেন) "আল্লাহু আকবার (আল্লাহ মহান)।"
7470 - عن جرير قال: بايعت النبي صلى الله عليه وسلم على السمع والطاعة فلقنني:"فيما استطعت، والنصح لكل مسلم".
وفي لفظ: بايعت رسول الله صلى الله عليه وسلم على إقام الصلاة، وإيتاء الزكاة، والنصح لكل مسلم، وعلى فراق المشرك.
متفق عليه: رواه البخاري في الأحكام (7204)، ومسلم في الإيمان (56: 99) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقي - وزاد مسلم غيره - عن هشيم، أخبرنا سيّار، عن الشعبي، عن جرير بن عبد الله
فذكره.
واللفظ الثاني رواه النسائي (4175)، وأحمد (19162) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، عن سليمان (هو الأعمش) عن أبي وائل، عن جرير .. فذكره. وإسناده صحيح.
জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আনুগত্য ও বাধ্য থাকার শপথ (বাই‘আত) করি। তখন তিনি আমাকে শিক্ষা দিলেন: "যতক্ষণ তোমার সাধ্যে কুলায়, এবং প্রত্যেক মুসলিমের জন্য কল্যাণ কামনা করার (শপথের) উপর।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাই‘আত করি সালাত কায়েম করা, যাকাত প্রদান করা, প্রত্যেক মুসলিমের কল্যাণ কামনা করা এবং মুশরিকদের থেকে সম্পর্ক ছিন্ন করার উপর।
7471 - عن أبي أمامة يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب في حجة الوداع فقال:"اتقوا الله ربّكم، وصلّوا خمسكم، وصوموا شهركم، وأدوا زكاة أموالكم، وأطيعوا ذا أمركم، تدخلوا جنة ربكم".
صحيح: رواه الترمذي (616) عن موسى بن عبد الرحمن الكندي الكوفي، حدثنا زيد بن الحباب، أخبرنا معاوية بن صالح، حدثني سليم بن عامر، قال: سمعت أبا أمامة يقول: فذكره. قال: فقلت لأبي أمامة: منذ كم سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم هذا الحديث؟ قال: سمعته وأنا ابن ثلاثين سنة.
قال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح. ورواه أيضا الإمام أحمد (22161) عن زيد بن الحباب به مثله.
وقد صحّحه أيضا ابن حبان (4563)، والحاكم (1/ 473) وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم، ولا نعرف له علة. وهو كما قال. ورواه أيضا أبو داود (1955) مختصرًا من طريق الوليد بن مسلم، حدثنا ابن جابر (هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر) عن سُليم بن عامر الكلاعي سمعتُ أبا أمامة يقول: سمعت خطبة رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى يوم النحر. ولم يذكر نص الخطبة. وللحديث أسانيد أخرى غير أني ما ذكرته هو أصحّها.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বিদায় হজ্জে খুতবা দিতে শুনেছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের রব আল্লাহকে ভয় করো, তোমাদের পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করো, তোমাদের (রমযানের) সিয়াম পালন করো, তোমাদের সম্পদের যাকাত প্রদান করো এবং তোমাদের নেতার আনুগত্য করো, (তাহলে) তোমরা তোমাদের রবের জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
7472 - عن معاوية، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن السامع المطيع لا حجة عليه، وإن السامع العاصي لا حجة له".
صحيح: رواه ابن أبي عاصم في السنة (1090)، والطبراني في الكبير (19/ 366) كلاهما من حديث محمد بن عبد الرحيم صاعقة، حدثنا روح بن عبادة، حدثنا حماد بن سلمة، عن جبلة بن عطية، عن ابن محيريز، عن معاوية، .. فذكره. وإسناده صحيح.
মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই যে (আদেশ) শ্রবণকারী অনুগত, তার বিরুদ্ধে কোনো অভিযোগ নেই, আর যে (আদেশ) শ্রবণকারী অবাধ্য, তার পক্ষে কোনো যুক্তি বা প্রমাণ নেই।”
7473 - عن أبي سعيد الخدري: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث علقمة بن مجزز على بعث وأنا فيهم. فلما انتهى إلى رأس غزاته أو كان ببعض الطريق استأذنته طائفة من الجيش فأذن لهم وأمّر عليهم عبد الله بن حذافة بن قيس السهمي. فكنت فيمن غزا معه فلما كان ببعض الطريق أوقد القوم نارا ليصطلوا أو ليصنعوا عليها صنيعا. فقال عبد الله: - وكانت فيه دعابة - أليس لي عليكم السمع والطاعة؟ قالوا: بلى. قال: فما أنا بآمركم بشيء إلا صنعتموه؟ قالوا: نعم. قال: فإني أعزم عليكم إلا تواثبتم في هذه
النار، فقام نام فتحجزوا. فلما ظن أنهم واثبون قال: أمسكوا على أنفسكم. فإنما كنت أمزح معكم. فلما قدمنا ذكروا ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من أمركم منهم بمعصية الله فلا تطيعوه".
حسن: رواه ابن ماجه (2863)، وأحمد (11639)، وصحّحه ابن حبان (4558) كلهم من طريق محمد بن عمرو، عن عمر بن الحكم بن ثوبان، عن أبي سعيد الخدري … فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو (هو ابن علقمة) وعمر بن الحكم بن ثوبان فإنهما حسنا الحديث.
وصحّح أيضا البوصيري إسناده في مصباح الزجاجة.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলকামা ইবনু মুজাযযিযকে একটি অভিযানে পাঠালেন এবং আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম। যখন তিনি তার গন্তব্যের কাছাকাছি পৌঁছলেন অথবা পথের কিছু অংশ অতিক্রম করলেন, তখন সেনাবাহিনীর একটি দল তার কাছে (ফিরে আসার) অনুমতি চাইল। তিনি তাদের অনুমতি দিলেন এবং তাদের উপর আব্দুল্লাহ ইবনু হুযাফা ইবনু ক্বায়স আস-সাহমীকে আমীর নিযুক্ত করলেন। আমিও তাদের সাথে ছিলাম যারা অভিযানে গিয়েছিল। যখন আমরা পথের কিছু অংশে পৌঁছলাম, তখন লোকেরা আগুন জ্বালালো যাতে তারা উষ্ণতা নিতে পারে বা তার উপর কিছু তৈরি করতে পারে। তখন আব্দুল্লাহ বললেন—তাঁর মধ্যে কৌতুকপ্রিয়তা ছিল—"তোমাদের উপর কি আমার কথা শোনা ও মানার অধিকার নেই?" তারা বলল: "অবশ্যই।" তিনি বললেন: "আমি তোমাদেরকে যা কিছুরই নির্দেশ দেব, তোমরা কি তা করবে না?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আমি তোমাদের প্রতি দৃঢ়ভাবে নির্দেশ দিচ্ছি যে তোমরা এই আগুনে ঝাঁপ দাও।" লোকেরা দাঁড়াল এবং প্রস্তুতি নিল (ঝাঁপ দিতে)। যখন তিনি বুঝলেন যে তারা সত্যিই ঝাঁপ দিতে যাচ্ছে, তখন তিনি বললেন: "থামো! তোমরা নিজেদের রক্ষা করো। আমি তো শুধু তোমাদের সাথে ঠাট্টা করছিলাম।" যখন আমরা ফিরে এলাম, তারা ঘটনাটি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে কেউ আল্লাহর অবাধ্যতার নির্দেশ দেবে, তোমরা তার আনুগত্য করো না।"
7474 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"طاعة الإمام حق على المرء المسلم ما لم يأمر بمعصية الله، فإذا أمر بمعصية الله فلا طاعة له".
حسن: رواه تمام في فوائده (914 - الروض) عن الحسن بن حبيب، حدثنا بدر بن الهيثم، حدثنا سليمان بن عبد الرحمن، حدثنا عبد الرحمن بن المغراء، عن عبيد الله بن عمر، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن المغراء؛ فإنه صدوق، وتكلم في حديثه عن الأعمش، وليس هذا منها. وكذلك سليمان بن عبد الرحمن - وهو ابن بنت شرحبيل - حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিম ব্যক্তির উপর নেতার (ইমামের) আনুগত্য করা কর্তব্য, যতক্ষণ না সে আল্লাহর অবাধ্যতার (নাফরমানির) নির্দেশ দেয়। আর যখন সে আল্লাহর অবাধ্যতার নির্দেশ দেয়, তখন তার কোনো আনুগত্য নেই।
7475 - عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سيلي أموركم بعدي رجال يطفئون السنة، ويعملون بالبدعة، ويؤخرون الصلاة عن مواقيتها، فقلت: يا رسول الله إن أدركتهم كيف أفعل؟ قال:"تسألني يابن أم عبد كيف تفعل؟ لا طاعة لمن عصى الله".
حسن: رواه ابن ماجه (2865)، وأحمد (3790)، والبيهقي (3/ 124) من طرق عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن جده عبد الله بن مسعود .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن عثمان بن خثيم، فإنه حسن الحديث. وعبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود قد سمع من أبيه كما قال البخاري وأبو حاتم وغيرهما ونفى بعضهم سماعه منه، منهم: شعبة وابن معين وغيرهما، ثم هو اختصار لما رواه النسائي (779)، وابن ماجه (1255) كلاهما من طريق أبي بكر بن عياش، عن عاصم، عن زر، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلكم ستدركون أقواما يصلون الصلاة لغير وقتها، فإن أدركتوهم فصلوا في بيوتكم للوقت الذي تعرفون ثم صلوا معهم واجعلوها سبحة".
صحّحه ابن خزيمة (1640) من هذا الوجه.
فقوله:"لا طاعة لمن عصى الله" أي فيما يخالف أمر الله أي فيؤدي الصلاة في وقتها في بيته، ثم يصلي معهم حتى لا يكون عاصيا لهم أيضا؛ لأن وقت الصلاة موسع.
وروى مالك في البيعة (3) عن عبد الله بن دينار: أن عبد الله بن عمر كتب إلى عبد الملك بن مروان يبايعه، فكتب إليه: بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ أما بعد لعبد الله عبد الملك أمير المؤمنين، سلام عليك، فإني أحمد إليك الله الذي لا إله إلا هو، وأقر لك بالسمع والطاعة على سنة الله وسنة رسوله فيما استطعت.
ورواه البخاري في الأحكام (7203، 7205) من طريق يحيى (هو القطان) عن سفيان (هو ابن عيينة)، عن عبد الله بن دينار به، نحوه.
وعلى هذا المنهج سار أهل السنة والجماعة؛ فإنهم يرون طاعة ولي الأمر في المنشط والمكره.
قال الإمام أحمد:"أصول السنة عندنا … فذكر أمورا ثم قال: والسمع والطاعة للأئمة وأمير المؤمنين البَرِّ والفاجر، ومن ولي الخلافة فاجتمع الناس عليه ورضوا به، ومن غلبهم بالسيف حتى صار خليفة. وسمي أمير المؤمنين".
وقال:"ومن خرج على إمام المسلمين وقد كان الناس اجتمعوا عليه وأقروا له بالخلافة بأي وجه كان بالرضا أو بالغلبة فقد شق هذا الخارج عصا المسلمين وخالف الآثار عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإن مات الخارج عليه مات ميتة جاهلية ولا يحل قتال السلطان ولا الخروج عليه لأحد من الناس فمن فعل ذلك فهو مبتدع على غير السنة والطريق". انظر: شرح الاعتقاد للالكائي (1/ 160 - 161).
وقال أيضا:"والانقياد إلى من ولاه الله أمركم، لا تنزع يدًا من طاعته، ولا تخرج عليه بسيفك حتى يجعل الله لك فرجا ومخرجا، ولا تخرج على السلطان وتسمع وتطيع ولا تنكث بيعة فمن فعل ذلك فهو مبتدع مخالف مفارق للجماعة، وإن أمرك السلطان بأمر هو الله معصية فليس لك أن تطيعه البتة وليس لك أن تخرج عليه، ولا تمنعه حقه". انظر: طبقات الحنابلة لابن أبي يعلى (1/ 24 - 25).
قال الإمام البربهاري:"وإذا رأيت الرجل يدعو على السلطان فاعلم أنه صاحب هوى، وإذا سمعت الرجل يدعو للسلطان بالصلاح فاعلم أنه صاحب سنة إن شاء الله.
يقول فضيل بن عياض: لو كان لي دعوة ما جعلتها إلا في السلطان، فأمرنا أن ندعو لهم بالصلاح، ولم نؤمر أن ندعو عليهم، وإن جاروا وظلموا؛ لأن جورهم وظلمهم على أنفسهم وعلى المسلمين، وصلاحهم لأنفسهم وللمسلمين. انظر: طبقات الحنابلة لابن أبي يعلى (2/ 36).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পরে তোমাদের শাসনভার এমন লোকেরা গ্রহণ করবে, যারা সুন্নাতকে বিলীন করে দেবে, বিদ‘আত অনুযায়ী কাজ করবে এবং তারা সালাতকে তার নির্দিষ্ট সময় থেকে বিলম্বিত করবে।" তখন আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি যদি তাদের পাই, তবে কী করব?" তিনি বললেন, "হে উম্মু আবদের পুত্র! তুমি আমাকে জিজ্ঞাসা করছ যে তুমি কী করবে? যে আল্লাহর অবাধ্যতা করে, তার আনুগত্য নেই।"
7476 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنكم سترون بعدي أثرة وأمورًا تنكرونها" قالوا: فما تأمرنا يا رسول الله؟ قال:"أدوا إليهم حقهم، وسلوا الله
حقكم".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7052)، ومسلم في الإمارة (1843: 45) كلاهما من طريق الأعمش، حدثنا زيد بن وهب سمعت عبد الله قال .. فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বললেন: "নিশ্চয়ই তোমরা আমার পরে (শাসকদের মধ্যে) স্বজনপ্রীতি (আছারা) এবং এমন সব কাজ দেখতে পাবে যা তোমরা অপছন্দ করবে।" তারা (সাহাবীরা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! তখন আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন?' তিনি বললেন: "তাদের প্রাপ্য হক তোমরা আদায় করে দাও, আর তোমাদের প্রাপ্য হক আল্লাহর কাছে চাও।"
7477 - عن جنادة بن أبي أمية قال: دخلنا على عبادة بن الصامت، وهو مريض قلنا: أصلحك الله حدث بحديث - ينفعك الله به - سمعته من النبي صلى الله عليه وسلم قال: دعانا النبي صلى الله عليه وسلم فبايعناه فقال فيما أخذ علينا أن بايعنا: على السمع والطاعة في منشطنا ومكرهنا، وعسرنا ويسرنا وأثرة علينا، وأن لا ننازع الأمر أهله:"إلا أن تروا كفرا بواحا عندكم من الله فيه برهان".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7055)، ومسلم في الإمارة (1709: 42) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، حدثنا عمرو بن الحارث، حدثني بكير، عن بسر بن سعيد، عن جنادة بن أبي أمية قال .. فذكره.
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুনাদা ইবনু আবী উমায়্যা বলেন: আমরা উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি অসুস্থ ছিলেন। আমরা বললাম, আল্লাহ আপনাকে সুস্থ রাখুন! এমন একটি হাদীস আমাদের বলুন—যা দ্বারা আল্লাহ আপনাকে উপকৃত করবেন—যা আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট শুনেছেন। তিনি বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের আহ্বান করলেন এবং আমরা তাঁর হাতে বাইআত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণ করলাম। তিনি আমাদের থেকে যে সব বিষয়ে বাইআত গ্রহণ করেছিলেন, তন্মধ্যে ছিল: আমরা যেন আমাদের আগ্রহ-অনাগ্রহ, কষ্ট-স্বাচ্ছন্দ্য এবং আমাদের উপর (অন্যের) প্রাধান্য দেওয়া হলেও (নেতার) কথা শুনি ও আনুগত্য করি। আর আমরা যেন ক্ষমতার অধিকারী ব্যক্তিদের সাথে ক্ষমতা নিয়ে প্রতিদ্বন্দ্বিতা না করি, 'তবে যদি তোমরা প্রকাশ্যে এমন কুফরি দেখতে পাও, যার ব্যাপারে আল্লাহর পক্ষ থেকে তোমাদের নিকট স্পষ্ট প্রমাণ রয়েছে।'
7478 - عن عبد الله بن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من رأى من أميره شيئا يكرهه فليصبر عليه، فإنه من فارق الجماعة شبرًا فمات إلا مات ميتة جاهلية".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7054)، ومسلم في الإمارة (1849: 55) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن الجعد أبي عثمان، حدثني أبو رجاء العطاردي قال: سمعت ابن عباس .. فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার আমীরের (নেতার) পক্ষ থেকে এমন কিছু দেখল যা সে অপছন্দ করে, সে যেন তাতে ধৈর্য ধারণ করে। কারণ, যে ব্যক্তি জামাআত (ঐক্যবদ্ধ মুসলিম সমাজ) থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হলো এবং মারা গেল, সে কেবল জাহিলিয়াতের (ইসলাম-পূর্ব যুগের) মৃত্যুই বরণ করল।"
7479 - عن أسيد بن حضير أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله استعملت فلانا ولم تستعملني؟ قال:"إنكم سترون بعدي أثرة فاصبروا حتى تلقوني".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7057)، ومسلم في الإمارة (1845: 48) كلاهما من طريق شعبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك، عن أسيد بن حضير .. فذكره.
উসাইদ ইবনে হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি অমুককে নিয়োগ দিলেন কিন্তু আমাকে নিয়োগ দিলেন না?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তোমরা আমার পরে স্বজনপ্রীতি (বা পক্ষপাতিত্ব) দেখতে পাবে। অতএব, তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না তোমরা আমার সাথে মিলিত হও।"
7480 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عليك السمع والطاعة في عسرك ويسرك ومنشطك ومكرهك وأثرة عليك".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1836) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن، عن أبي حازم، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة .. فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমার উপর কর্তব্য হলো শোনা এবং মানা, তোমার কষ্টে ও তোমার স্বাচ্ছন্দ্যে, তোমার আগ্রহে ও তোমার অপছন্দে, এমনকি যখন তোমার উপর অন্যকে অগ্রাধিকার দেওয়া হয় (তখনও)।
7481 - عن وائل بن حجر قال: سأل سلمة بن يزيد الجعفي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا نبي الله، أرأيت إن قامت علينا أمراء يسألونا حقهم ويمنعونا حقنا فما تأمرنا؟ فأعرض عنه، ثم سأله، فأعرض عنه، ثم سأله في الثانية أو في الثالثة فجذبه الأشعث بن قيس وقال:
"اسمعوا وأطيعوا فإنما عليهم ما حملوا وعليكم ما حملتم".
وفي رواية: فجذبه الأشعث بن قيس فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اسمعوا وأطيعوا …" الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1846: 49) من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن سماك بن حرب، عن علقمة بن وائل الحضرمي، عن أبيه قال .. فذكره. والرواية الأخرى من طريق شبابة، حدثنا شعبة، به.
ওয়াইল ইবনে হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালামা ইবনে ইয়াযিদ আল-জু’ফি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন: “হে আল্লাহর নবী, আপনার কী মত, যদি আমাদের ওপর এমন শাসকরা ক্ষমতা গ্রহণ করে যারা আমাদের কাছ থেকে তাদের হক আদায় করে নেবে, কিন্তু আমাদের হক থেকে আমাদের বঞ্চিত করবে, তখন আপনি আমাদের কী করতে আদেশ করেন?” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর সে আবার জিজ্ঞাসা করল, তখনো তিনি মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর সে দ্বিতীয় বা তৃতীয়বার জিজ্ঞাসা করল। তখন আশআছ ইবনে কায়স তাকে টেনে ধরলেন এবং বললেন: “তোমরা শোনো এবং মান্য করো। নিশ্চয়ই তাদের ওপর রয়েছে তাদের বোঝা, আর তোমাদের ওপর রয়েছে তোমাদের বোঝা।” অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, আশআছ ইবনে কায়স তাকে টেনে ধরলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তোমরা শোনো এবং মান্য করো...” (সম্পূর্ণ হাদিস)।
7482 - عن عوف بن مالك الأشجعي يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"خيار أئمتكم الذين تحبونهم ويحبونكم، وتصلون عليهم ويصلون عليكم، وشرار أئمتكم الذين تبغضونهم ويبغضونكم، وتلعنونهم ويلعنونكم" قالوا: قلنا: يا رسول الله أفلا ننابذهم عند ذلك؟ قال:"لا ما أقاموا فيكم الصلاة، لا ما أقاموا فيكم الصلاة، ألا من ولي عليه وال، فرآه يأتي شيئا من معصية الله فليكره ما يأتي من معصية الله، ولا ينزعن يدًا من طاعة".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1855: 66) عن داود بن رشيد: حدثنا الوليد يعني بن مسلم، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، أخبرني مولى بني فزارة وهو رزيق بن حيان أنه سمع مسلم بن قرظة ابن عم عوف بن مالك الأشجعي يقول: سمعت عوف بن مالك الأشجعي يقول .. فذكره.
আউফ ইবনু মালিক আল-আশজা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের ইমামদের (নেতাদের) মধ্যে সর্বোত্তম তারা, যাদেরকে তোমরা ভালোবাস এবং তারাও তোমাদের ভালোবাসে, আর তোমরা তাদের জন্য দু'আ করো এবং তারাও তোমাদের জন্য দু'আ করে। আর তোমাদের ইমামদের মধ্যে নিকৃষ্টতম তারা, যাদেরকে তোমরা ঘৃণা করো এবং তারাও তোমাদের ঘৃণা করে, আর তোমরা তাদের অভিশাপ দাও এবং তারাও তোমাদের অভিশাপ দেয়।" তারা বলল, আমরা বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! এমন অবস্থায় কি আমরা তাদের বিরুদ্ধে অস্ত্রধারণ করব না?" তিনি বললেন: "না, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা তোমাদের মাঝে সালাত (নামায) প্রতিষ্ঠা করে, না, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা তোমাদের মাঝে সালাত প্রতিষ্ঠা করে।" সাবধান! যার ওপর কোনো শাসক নিযুক্ত হয় এবং সে শাসককে আল্লাহর অবাধ্যতামূলক কোনো কাজ করতে দেখে, সে যেন আল্লাহর সেই অবাধ্যতাকে ঘৃণা করে, কিন্তু আনুগত্যের হাত যেন গুটিয়ে না নেয়।
7483 - عن أم سلمة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ستكون أمراء، فتعرفون وتنكرون، فمن عرف برئ، ومن أنكر سلم، ولكن من رضي وتابع" قالوا: أفلا نقاتلهم؟ قال:"لا ما صلّوا".
وفي رواية:"فمن كره فقد برئ، ومن أنكر فقد سلم". أي من كره بقلبه وأنكر بقلبه.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1854: 62) عن هدّاب بن خالد الأزدي، حدثنا همام بن يحيى، حدثنا قتادة، عن الحسن، عن ضبة بن محصن، عن أم سلمة .. فذكرته.
وقوله:"من رضي وتابع" أي الإثم والعقوبة على من رضي وتابع، وفيه دليل على أن من عجز عن إزالة المنكر لا يأثم بمجرد السكوت بل إنما يأثم بالرضى به أو بأن لا يكرهه بقلبه أو بالمتابعة عليه. أفاده النووي.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খুব শীঘ্রই শাসক (আমীর) আসবে। তোমরা (তাদের কাজকর্মে) কিছু বিষয় চিনতে পারবে এবং কিছু বিষয় অস্বীকার করবে। সুতরাং যে ব্যক্তি (মন্দটি) চিনল, সে মুক্তি পেল; আর যে ব্যক্তি অস্বীকার করল, সে রক্ষা পেল। কিন্তু (ধ্বংস) তার জন্য, যে সন্তুষ্ট হলো এবং অনুসরণ করল।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, আমরা কি তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করব না? তিনি বললেন, "না, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা সালাত আদায় করবে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "সুতরাং যে ব্যক্তি (মন্দ কাজ) ঘৃণা করল, সে মুক্ত হলো, আর যে ব্যক্তি অস্বীকার করল, সে রক্ষা পেল।" অর্থাৎ, যে ব্যক্তি তার অন্তরে ঘৃণা করল এবং অন্তরে অস্বীকার করল।
7484 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سيكون من بعدي خلفاء يعملون بما يعلمون، ويفعلون ما يؤمرون، وسيكون من بعدهم خلفاء يعملون بما لا يعلمون، ويفعلون، ما لا يؤمرون، فمن أنكر برئ، ومن أمسك سلم، ولكن من رضي وتابع".
حسن: رواه ابن حبان (6659)، والبخاري في التاريخ الكبير (1/ 329) كلاهما من طرق عن الأوزاعي، عن إبراهيم بن مرة، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة .. فذكره.
ورواه أبو يعلى (5902)، وابن حبان (6658، 6660)، والبيهقي (8/ 157 - 158) كلهم من طرق عن الأوزاعي، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، .. فذكره. أي لم يذكر الواسطة بين الأوزاعي والزهري.
وقد رجح البخاري في التاريخ الكبير (1/ 329)، والدارقطني في العلل (8/ 44 - 245) الطريق الأول الذي فيه الواسطة وهو إبراهيم بن مرة الشامي. ومن أجله يكون إسناده حسنا.
وأما ابن حبان فقال:"سمع هذا الخبر الأوزاعي عن الزهري، وسمعه من إبراهيم بن مرة، عن الزهري، فالطريقان جميعا محفوظان".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার পরে এমন খলীফাগণ আসবেন, যারা যা জানেন তদনুযায়ী কাজ করবেন এবং যা করতে আদিষ্ট হন তা করবেন। আর তাদের পরে এমন খলীফাগণ আসবেন, যারা যা জানেন না তদনুযায়ী কাজ করবেন এবং যা করতে আদিষ্ট হন না তা করবেন। অতএব, যে ব্যক্তি (তাদের মন্দ কাজ) অস্বীকার করবে, সে মুক্ত হয়ে যাবে। আর যে ব্যক্তি নীরব থাকবে, সে নিরাপদ থাকবে। কিন্তু যে ব্যক্তি সন্তুষ্ট হবে এবং অনুসরণ করবে (সে মুক্ত হবে না)।"
7485 - عن سلمة بن الأكوع - في حديث طويل - قال: ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعانا للبيعة في أصل الشجرة قال: فبايعته أول الناس ثم بايع، وبايع حتى إذا كان في وسط من الناس قال:"بايعْ يا سلمة" قال: قلت: قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس قال:"وأيضا" قال: ورآني رسول الله صلى الله عليه وسلم عزلا يعني ليس معه سلاح قال: فأعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم حجفة أو درقة، ثم بايع حتى إذا كان في آخر الناس قال:"ألا تبايعني يا سلمة" قال: قلت: قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس وفي أوسط الناس قال:"وأيضا" قال: فبايعته الثالثة.
متفق عليه: رواه مسلم في الجهاد والسير (1806: 131) عن قتيبة بن سعيد حدثنا حاتم يعني ابن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد قال: سمعت سلمة بن الأكوع يقول .. فذكره.
ورواه البخاري في الأحكام (7208) عن أبي عاصم، عن يزيد بن أبي عبيد عن سلمة به مختصرًا. ولفظه: قال: بايعنا النبي صلى الله عليه وسلم تحت الشجرة فقال لي:"يا سلمة ألا تبايع؟" قلت: يا رسول الله قد بايعت في الأول قال:"وفي الثاني".
সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ হিসেবে তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গাছের মূলে আমাদের বাইয়াত (শপথ) গ্রহণের জন্য ডাকলেন। তিনি বলেন, আমিই প্রথম ব্যক্তি হিসেবে তাঁর কাছে বাইয়াত করলাম। এরপর বাইয়াত চলছিলো এবং মানুষজন বাইয়াত দিতে থাকল। এমনকি যখন তিনি মানুষের মধ্যভাগে বাইয়াত নিচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "হে সালামা, বাইয়াত করো।" তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি তো প্রথম ব্যক্তি হিসেবেই আপনার কাছে বাইয়াত করেছি। তিনি বললেন: "আরো একবার।" তিনি (সালামা) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে নিরস্ত্র অবস্থায় দেখতে পেলেন। তিনি বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে একটি ছোট বা বড় ঢাল (হুজফাহ বা দারকাহ) দিলেন। এরপর তিনি বাইয়াত গ্রহণ করতে থাকলেন, এমনকি যখন শেষ পর্যায়ে মানুষজন বাইয়াত দিতে আসলো, তখন তিনি বললেন: "হে সালামা, তুমি কি আমার কাছে বাইয়াত গ্রহণ করবে না?" তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি তো প্রথম ব্যক্তি হিসেবে এবং মধ্যবর্তী লোকজনের মধ্যেও আপনার কাছে বাইয়াত করেছি। তিনি বললেন: "আরো একবার।" তিনি বলেন, এরপর আমি তৃতীয়বার তাঁর কাছে বাইয়াত গ্রহণ করলাম।
7486 - عن عوف بن مالك الأشجعي قال: كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم تسعة أو ثمانية أو سبعة فقال:"ألا تبايعون رسول الله؟" وكنا حديث عهد ببيعة فقلنا قد بايعناك يا رسول الله ثم قال:"ألا تبايعون رسول الله؟" فقلنا: قد بايعناك يا رسول الله، ثم قال:"ألا تبايعون رسول الله؟ قال: فبسطنا أيدينا وقلنا: قد بايعناك يا رسول الله، فعلام نبايعك؟ قال:"على أن تعبدوا الله، ولا تشركوا به شيئا، والصلوات الخمس، وتطيعوا وأسر كلمة خفية - ولا تسألوا الناس شيئا".
فلقد رأيت بعض أولئك النفر يسقط سوط أحدهم فما يسأل أحدًا يناوله إياه.
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1043) من طريقين عن مروان (وهو ابن محمد الدمشقي)، حدثنا سعيد (هو ابن عبد العزيز)، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي مسلم الخولاني قال: حدثني الحبيب الأمين عوف بن مالك الأشجعي .. فذكره.
আওফ ইবনে মালিক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট নয়, আট অথবা সাতজন ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমরা কি রাসূলুল্লাহর হাতে বাইয়াত করবে না?" আমরা সদ্য বাইয়াত (অঙ্গীকার) করেছিলাম। তাই আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তো আপনার নিকট বাইয়াত করেছি। এরপর তিনি আবার বললেন: "তোমরা কি রাসূলুল্লাহর হাতে বাইয়াত করবে না?" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তো আপনার নিকট বাইয়াত করেছি। এরপর তিনি আবার বললেন: "তোমরা কি রাসূলুল্লাহর হাতে বাইয়াত করবে না?" তিনি বলেন, তখন আমরা আমাদের হাত বাড়িয়ে দিলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তো বাইয়াত করেছি, তাহলে আর কিসের উপর বাইয়াত করব? তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে অংশীদার করবে না, আর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করবে, এবং আনুগত্য করবে।" (বর্ণনাকারী বলেন, তিনি) একটি গোপন কথা চুপি চুপি বললেন – "আর তোমরা মানুষের কাছে কোনো কিছু চাইবে না।" আমি ঐ লোকদের মধ্যে কাউকে কাউকে এমন দেখেছি যে, তাদের কারো চাবুক নিচে পড়ে গেলেও সে কাউকে তা তুলে দেওয়ার জন্য অনুরোধ করত না।
7487 - عن عائشة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يمتحن من هاجر إليه من المؤمنات بهذه الآية بقول الله: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ} إلى قوله {غَفُورٌ رَحِيمٌ}.
قال عروة: قالت عائشة: فمن أقر بهذا الشرط من المؤمنات قال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: لقد بايعتك كلاما"، ولا والله ما مست يده يد امرأة قط في المبايعة ما يبايعهن إلا بقوله:"قد بايعتك على ذلك".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4891)، ومسلم في الإمارة (1866: 88) كلاهما من طريق ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزبير، أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أخبرته .. فذكرته. والسياق للبخاري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট হিজরত করে আসা মু'মিন নারীদের এই আয়াত দ্বারা পরীক্ষা করতেন, যেখানে আল্লাহ বলেছেন: "হে নবী! যখন মু'মিন নারীগণ আপনার নিকট বাইআত (শপথ) করতে আসে..." (সূরা মুমতাহিনার অংশ) আল্লাহর বাণী "ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু" পর্যন্ত।
উরওয়া (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: মু'মিন নারীদের মধ্যে যে এই শর্তগুলো স্বীকার করত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলতেন: "আমি তোমাকে মৌখিকভাবে বাইআত দিলাম।" আল্লাহর কসম! বাইআতের সময় তাঁর হাত কখনো কোনো নারীর হাত স্পর্শ করেনি। তিনি শুধুমাত্র এই কথা বলে বাইআত নিতেন: "আমি তোমাকে এর ওপর বাইআত দিলাম।"