আল-জামি` আল-কামিল
7508 - عن فضالة بن عبيد، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ثلاثة لا تسأل عنهم: رجل فارق الجماعة، وعصى إمامه، ومات عاصيا. وأمة أو عبد أبق فمات. وامرأة غاب عنها زوجها، قد كفاها مؤنة الدنيا فتبرجت بعده، فلا تسأل عنهم. وثلاثة لا تسأل
عنهم: رجل نازع الله رداءه، فإن رداءه الكبرياء وإزاره العزة. ورجل شك في أمر الله. والقانط من رحمة الله".
صحيح: رواه أحمد (23943)، وصحَّحه ابن حبان (4554)، والحاكم (1/ 119) كلهم من طريق أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حيوة، حدثنا أبو هانئ، أن أبا علي عمرو بن مالك الجنبي حدثه عن فضالة بن عبيد فذكره. واللفظ لابن حبان. واقتصر الحاكم على ذكر الثلاثة الأولين. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فقد احتجا بجميع رواته ولم يخرجاه ولا نعرف له علة".
قلت: عمرو بن مالك الجنبي لم يخرج له الشيخان في صحيحيهما، وإنما أخرج له البخاري في الأدب المفرد وأصحاب السنن، وهو ثقة.
ফাদালাহ ইবন উবায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তিন শ্রেণির লোক রয়েছে, তাদের ব্যাপারে তুমি প্রশ্ন করো না (অর্থাৎ তাদের পরিণাম নিশ্চিত): যে ব্যক্তি জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হয়েছে, তার শাসকের অবাধ্য হয়েছে এবং অবাধ্য অবস্থায় মারা গেছে। আর সে ক্রীতদাসী বা দাস যে পালিয়ে গেছে, অতঃপর মারা গেছে। আর সেই স্ত্রীলোক যার স্বামী বিদেশে রয়েছে এবং সে তার জন্য দুনিয়ার খরচাদির ব্যবস্থা করে গেছে, কিন্তু সে (স্বামীর অনুপস্থিতিতে) বেপর্দা হয়ে সৌন্দর্য প্রদর্শন করেছে— তাদের ব্যাপারে তুমি প্রশ্ন করো না (তাদের পরিণামও নিশ্চিত)। আর তিন শ্রেণির লোক রয়েছে, যাদের ব্যাপারে তুমি প্রশ্ন করো না: যে ব্যক্তি আল্লাহর চাদর নিয়ে টানাটানি করেছে। কেননা তাঁর চাদর হলো অহংকার (গরিমা) এবং তাঁর লুঙ্গি হলো মহিমা (ইজ্জত)। আর সে ব্যক্তি যে আল্লাহর নির্দেশের ব্যাপারে সন্দেহ পোষণ করে। আর সে ব্যক্তি যে আল্লাহর রহমত থেকে নিরাশ।
7509 - عن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر قال: قال أناس لابن عمر: إنا ندخل على سلطاننا فنقول لهم خلاف ما نتكلم إذا خرجنا من عندهم قال: كنا نعدها نفاقا.
وفي رواية: كنا نعد هذا نفاقا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاري في الأحكام (7178) عن أبي نعيم، حدثنا عاصم بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر، عن أبيه قال .. فذكره.
والرواية الأخرى رواها الطيالسي (2067) عن العمري، عن عاصم بن محمد بن زيد به. وزاد في آخره: قال العمري: فحدثني أخي أن ابن عمر قال: كنا نعد هذا نفاقا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم.
وإسناده ضعيف. العمري هو: عبد الله بن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب فيه ضعف، وأخوه عبيد الله لم يدرك ابن عمر، لكن لها طريق آخر.
فرواه ابن ماجه (3975)، وأحمد (5829) من طريق يعلى بن عبيد، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن أبي الشعثاء قال: قيل لابن عمر: إنا ندخل على أمرائنا فنقول القول، فإذا خرجنا قلنا غيره، قال: كنا نعد ذلك على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم النفاق.
وإسناده صحيح، أبو الشعثاء هو المحاربي واسمه سليم الأسود وإبراهيم هو النخعي.
আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিছু লোক তাঁকে জিজ্ঞেস করল: "আমরা যখন আমাদের শাসকদের কাছে প্রবেশ করি, তখন আমরা তাদের সামনে এমন কিছু কথা বলি যা তাদের কাছ থেকে বের হয়ে আসার পর আমাদের আলোচনার (বা বাস্তব বক্তব্যের) বিপরীত হয়।" তিনি বললেন: "আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ইহাকে মুনাফিকী (কপটতা) বলে গণ্য করতাম।"
7510 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لكعب بن عجرة:"أعانك الله من إمارة السفهاء" قال: وما إمارة السفهاء؟ قال:"أمراء يكونون بعدي لا يقتدون بهديي، ولا
يستنون بسنتي، فمن صدقهم بكذبهم وأعانهم على ظلمهم فأولئك ليسوا مني ولست منهم، ولا يردوا على حوضي. ومن لم يصدقهم بكذبهم، ولم يعنهم على ظلمهم فأولئك مني وأنا منهم، وسيردوا على حوضي. يا كعب بن عجرة، الصوم جنة والصدقة تطفئ الخطيئة والصلاة قربان - أو قال: برهان - يا كعب بن عجرة إنه لا يدخل الجنة لحم نبت من سحت، النار أولى به، يا كعب بن عجرة، الناس غاديان فمبتاع نفسه فمعتقها، وبائع نفسه فموبقها".
حسن: رواه أحمد (14441) عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن خثيم، عن عبد الرحمن بن سابط، عن جابر بن عبد الله فذكره. والحديث في مصنف عبد الرزاق (20719).
وأخرجه أيضا البزار (1609 - الكشف)، وأبو يعلى (1999)، وصححه ابن حبان (4514)، والحاكم (4/ 422) من هذا الوجه.
قلت: إسناده حسن لأجل ابن خُثيم وهو عبد الله بن عثمان بن خُثيم - مصغرا - القاري المكي قال فيه أبو حاتم: ما به بأس، وقال النسائي: ثقة. وذكره ابن حبان في الثقات وهو من رجال مسلم، غير أنه صدوق كما في التقريب.
জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কা'ব ইবন উজরাকে বললেন: "আল্লাহ তোমাকে নির্বোধদের শাসন থেকে রক্ষা করুন।" তিনি বললেন: নির্বোধদের শাসন কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা হলো আমার পরের এমন শাসকগোষ্ঠী, যারা আমার হেদায়েত অনুসরণ করবে না এবং আমার সুন্নাত পালন করবে না। যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে এবং তাদের যুলুমে তাদের সাহায্য করবে, তারা আমার কেউ নয় এবং আমিও তাদের কেউ নই। তারা আমার হাউজে (হাউজে কাওসার) আসতে পারবে না। আর যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে না এবং তাদের যুলুমে তাদের সাহায্য করবে না, তারা আমার লোক এবং আমি তাদের লোক। আর তারা আমার হাউজে আসতে পারবে। হে কা'ব ইবন উজরা, সিয়াম (রোজা) হলো ঢাল, আর সাদাকা (দান) ভুল-ত্রুটিকে নিভিয়ে দেয়, আর সালাত (নামাজ) হলো নৈকট্য—অথবা তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রমাণ। হে কা'ব ইবন উজরা, অবৈধভাবে উপার্জিত সম্পদ দ্বারা গঠিত কোনো গোশত জান্নাতে প্রবেশ করবে না, আগুনই তার জন্য অধিক উপযোগী। হে কা'ব ইবন উজরা, লোকেরা দুইভাবে আগমনকারী: একজন হলো সে, যে নিজের নাফসকে (সত্তাকে) ক্রয় করে তাকে মুক্ত করে, আর অন্যজন হলো সে, যে নিজের নাফসকে বিক্রি করে তাকে ধ্বংস করে ফেলে।"
7511 - عن كعب بن عجرة، قال: خرج إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن تسعة، خمسة، وأربعة، أحد العددين من العرب، والآخر من العجم، فقال:"اسمعوا، هل سمعتم أنه سيكون بعدي أمراءُ، فمن دخل عليهم فصدّقهم بكذبهم، وأعانهم على ظلمهم فليس مني ولستُ منه، وليس يرد علي الحوض. ومن لم يدخل عليهم ولم يُعنهم على ظلمهم ولم يصدقهم بكذبهم فهو مني وأنا منه، وهو واردٌ عليّ".
صحيح: رواه الترمذي (2259)، والنسائي (4207، 4208)، وأحمد (18126)، وصحّحه ابن حبان (282، 283، 285)، والحاكم (1/ 79) كلهم من طريق أبي حصين، (هو عثمان بن عاصم الأسدي)، عن الشّعبيّ، عن عاصم العدويّ، عن كعب بن عُجرة .. فذكره. وإسناده صحيح.
والكلام عليه مبسوط في كتاب الإيمان، باب صفة حوض النبي صلى الله عليه وسلم.
কা'ব ইবনে উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন যখন আমরা নয়জন ছিলাম—পাঁচজন ও চারজন। এই দুই সংখ্যার একটি ছিল আরবদের থেকে এবং অন্যটি ছিল অনারবদের থেকে। অতঃপর তিনি বললেন: "শোনো! তোমরা কি শুনেছ যে, আমার পরে শাসকগোষ্ঠী বা প্রশাসক আসবে? সুতরাং যে ব্যক্তি তাদের নিকট প্রবেশ করবে এবং তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে এবং তাদের অন্যায়ের ওপর তাদের সাহায্য করবে, সে আমার কেউ নয় এবং আমি তার কেউ নই। সে আমার হাউজে (কাউসারে) আসতে পারবে না। আর যে ব্যক্তি তাদের নিকট প্রবেশ করবে না, তাদের অন্যায়ের ওপর তাদের সাহায্য করবে না এবং তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে না, সে আমার এবং আমি তার। সে আমার নিকট (হাউজে) উপস্থিত হবে।"
7512 - عن حذيفة بن اليمان يقول: كان الناس يسألون رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الخير وكنت أسأله عن الشر مخافة أن يدركني فقلت: يا رسول الله إنا كنا في جاهلية وشر فجاءنا الله بهذا الخير فهل بعد هذا الخير من شر؟ قال:"نعم" قلت: وهل بعد ذلك الشر من خير؟ قال: نعم وفيه دخن" قلت: وما دخنه؟ قال:"قوم يهدون بغير هديي تعرف
منهم وتنكر" قلت: فهل بعد ذلك الخير من شر؟ قال: نعم دعاة على أبواب جهنم من أجابهم إليها قذفوه فيها" قلت: يا رسول الله صِفْهم لنا قال:"هم من جلدتنا ويتكلمون بألسنتنا" قلت: فما تأمرني إن أدركني ذلك قال:"تلزم جماعة المسلمين وإمامهم" قلت: فإن لم يكن لهم جماعة ولا إمام قال:"فاعتزل تلك الفرق كلها، ولو أن تعض بأصل شجرة حتى يدركك الموت، وأنت على ذلك".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7084)، ومسلم في الإمارة (1847) كلاهما عن محمد بن المثنى، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا ابن جابر، حدثني بسر بن عبيد الله الحضرمي، أنه سمع أبا إدريس الخولاني، أنه سمع حذيفة بن اليمان يقول .. فذكره.
ورواه مسلم عقبه من وجه آخر عن حذيفة قال: قلت: يا رسول الله إنا كنا بشر، فجاء الله بخير فنحن فيه، فهل من وراء هذا الخبر شر؟ قال:"نعم" قلت: هل وراء ذلك الشر خير؟ قال:" نعم" قلت: فهل وراء ذلك الخير شر؟ قال:"نعم" قلت: كيف؟ قال: ايكون بعدي أئمة لا يهتدون بهداي، ولا يستنون بسنتي وسيقوم فيهم رجال، قلوبهم قلوب الشياطين في جثمان إنس" قال: قلت: كيف أصنع يا رسول الله إن أدركت ذلك؟ قال:"تسمع وتطيع للأمير وإن ضرب ظهرك، وأخذ مالك فاسمع وأطع".
ولكن في إسناده انقطاع؛ لأن أبا سلام واسمه ممطور الحبشي لم يسمع من حذيفة بن اليمان رضي الله عنه. قال الدارقطني في التتبع (ص 226):"وهذا عندي مرسل، أبو سلام لم يسمع من حذيفة ولا من نظرائه الذين نزلوا العراق: لأن حذيفة توفي بعد قتل عثمان رضي الله عنه بليال وقد قال فيه: حذيفة، فهذا يدل على إرساله".
وقال الحافظ في ترجمة ممطور أبي سلام من التهذيب (10/ 296):"أرسل عن حذيفة وأبي ذر وغيرهما".
وقوله في الحديث:"تلزم جماعة المسلمين"قال الطبري: أي الذين في طاعة من اجتمعوا على تأميره، فمن نكث بيعته خرج عن الجماعة. قال: وفي الحديث أنه متى لم يكن للناس إمام فافترق الناس أحزابا فلا يتبع أحدًا في الفرقة ويعتزل الجميع إن استطاع ذلك خشية من الوقوع في الشر". انظر: فتح الباري (10/ 37).
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কল্যাণ (ভাল) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করত, আর আমি তাঁকে অকল্যাণ (খারাপ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম এই ভয়ে যে, তা যেন আমাকে পেয়ে না বসে। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা জাহেলিয়াত ও অকল্যাণের মধ্যে ছিলাম, অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে এই কল্যাণ দান করেছেন। এই কল্যাণের পর কি আবার কোনো অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম, সেই অকল্যাণের পর কি আবার কোনো কল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তবে তাতে ধোঁয়া বা আবিলতা থাকবে।" আমি বললাম, সেই আবিলতা কী? তিনি বললেন: "এমন একদল লোক, যারা আমার দেখানো পথের বাইরে অন্য পথে পরিচালিত হবে। তুমি তাদের ভালো কাজও দেখতে পাবে এবং খারাপ কাজও দেখতে পাবে।" আমি বললাম, সেই কল্যাণের পরেও কি কোনো অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, জাহান্নামের দরজার দিকে আহ্বানকারী কিছু লোক থাকবে। যে তাদের ডাকে সাড়া দেবে, তারা তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করবে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! তাদের বৈশিষ্ট্য আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। তিনি বললেন: "তারা আমাদেরই (আরব) গোত্রভুক্ত হবে এবং আমাদের ভাষাতেই কথা বলবে।" আমি বললাম, যদি আমি সেই অবস্থা লাভ করি, তবে আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি বললেন: "তোমরা মুসলিমদের জামাআত (দল) ও তাদের ইমামকে আঁকড়ে ধরে থাকবে।" আমি বললাম, যদি তাদের কোনো জামাআত বা ইমাম না থাকে? তিনি বললেন: "তাহলে তুমি সেই সব দল থেকে দূরে থাকবে, যদিও তোমাকে গাছের শিকড় কামড়ে ধরে থাকতে হয়, যতক্ষণ না মৃত্যু তোমাকে এই অবস্থায় পেয়ে যায়।"
7513 - عن تميم الداري أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الدين النصيحة" قلنا: لمن؟ قال:"لله
ولكتابه ولرسوله ولائمة المسلمين وعامتهم".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (55) عن محمد بن عباد المكي، حدثنا سفيان قال: قلت لسهيل: إن عمرًا حدثنا عن القعقاع، عن أبيك. قال: ورجوت أن يسقط عني رجلا قال: فقال: سمعته من الذي سمعه منه أبي كان صديقا له بالشام - ثم حدثنا سفيان، عن سهيل، عن عطاء بن يزيد، عن تميم الداري .. فذكره.
ورُوي عن أبي هريرة مثله كما عند الترمذي (1926)، والنسائي (4199، 200)، وأحمد (7954) وهو وهم، والصواب حديث تميم كما قال محمد بن نصر المروزي في تعظيم قدر الصلاة (2/ 684 - 685)، والدارقطني في العلل (10/ 115 - 118) بل قال البخاري في التاريخ الصغير (2/ 26):"مدار هذا الحديث كله على تميم، ولم يصح عن أحد غير تميم".
ومعنى نصيحة لله سبحانه: صحة الاعتقاد في وحدانيته وإخلاص النية في عبادته. والنصيحة الكتاب الله: الإيمان به والعمل بما فيه، والنصيحة لرسوله: التصديق بنبوته، وبذل الطاعة له فيما أمر به ونهى عنه، والنصيحة الأئمة المؤمنين: أن يطيعهم في الحق، وأن لا يرى الخروج عليهم بالسيف إذا جاروا، والنصيحة لعامة المسلمين: إرشادهم إلى مصالحهم. ذكره الخطابي في معالم السنن.
তামিম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "দ্বীন হলো নসিহত (উপদেশ/শুভেচ্ছা)।" আমরা বললাম: "কার জন্য?" তিনি বললেন: "আল্লাহর জন্য, তাঁর কিতাবের জন্য, তাঁর রাসূলের জন্য, মুসলিম নেতৃবৃন্দের জন্য এবং সাধারণ মুসলিমদের জন্য।"
7514 - عن زيد بن ثابت قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ثلاث خصال لا يغل عليهن قلب مسلم أبدا: إخلاص العمل لله، ومناصحة ولاة الأمر، ولزوم الجماعة، فإن دعوتهم تحيط من ورائهم".
صحيح: رواه أحمد (21590)، وصحّحه ابن حبان (67) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا عمر بن سليمان من ولد عمر بن الخطاب، عن عبد الرحمن بن أبان بن عثمان، عن أبيه، عن زيد بن ثابت فذكره. وإسناده صحيح
وبمعناه عن ابن مسعود وجبير بن مطعم وغيرهما وكلها مخرج في كتاب العلم.
যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তিনটি বৈশিষ্ট্য এমন রয়েছে যার ওপর কোনো মুসলিমের অন্তর কখনও বিদ্বেষপূর্ণ বা বিশ্বাসঘাতক হয় না: আল্লাহর জন্য আমলকে একনিষ্ঠ করা, শাসকদের প্রতি শুভকামনা করা/উপদেশ দেওয়া, এবং মুসলিম জামাআতকে (ঐক্যবদ্ধ সমাজকে) আঁকড়ে ধরা। কারণ তাদের দাওয়াত (বা সুরক্ষা) তাদের পেছনের দিক থেকে বেষ্টন করে রাখে।"
7515 - عن شريح بن عبيد الحضرمي، وغيره، قال: جلد عياض بن غنم صاحب دارا حين فُتحتْ، فأغلظ له هشام بن حكيم القول حتى غضب عياض، ثم مكث ليالي، فأتاه هشام بن حكيم فاعتذر إليه، ثم قال هشام لعياض: ألم تسمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن من أشد الناس عذابا أشدهم عذابا في الدنيا للناس"؟ فقال عياض بن غنم: يا هشام بن حكيم، قد سمعنا ما سمعتَ، ورأينا ما رأيتَ، أو لم تسمع رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أراد أن ينصح لسلطان بأمر، فلا يبد له علانية، ولكن ليأخذ بيده، فيخلو به، فإن قبل منه فذاك، وإلا كان قد أدى الذي عليه له"، وإنك يا هشام لأنت الجريء، إذ
تجترئ على سلطان الله، فهلا خشيت أن يقتلك السلطان، فتكون قتيل سلطان الله تبارك وتعالى.
حسن: رواه أحمد (15333) عن أبي المغيرة، حدثنا صفوان، حدثنا شريح بن عبيد الحضرمي وغيره .. فذكروه.
قال الهيثمي في المجمع (5/ 229):"رواه أحمد ورجاله ثقات، إلا أني لم أجد لشريح من عياش وهشام سماعا وإن كان تابعيا".
قلت: ذكر ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (6/ 407) عن أبيه في ترجمة عياض بن غنم أنه ممن روى عنه شريح بن عبيد. ولم يعرف شريح بالتدليس، فمثله يُحمل على الاتصال.
وقد روي أن الواسطة بين شريح وعياض بن غنم جبير بن نفير وفي إسناده مقال. وللحديث طرق أخرى في السنة لابن أبي عاصم (1132)، والمستدرك (3/ 290)، والبيهقي (8/ 164) وهي لا تخلو من مقال، لكن بعضد بعضها بعضا وهذا رسم الحديث الحسن.
ومنهج أهل السنة والجماعة مناصحة ولاة الأمراء سرا ولا يكون ذلك على المنابر والمجامع.
فقد كان الصحابة ينصحون الولاة سرا، وقد قيل لأسامة بن زيد: ما يمنعك أن تدخل على عثمان، فتكلمه فيما يصنع؟ ، فقال أسامة: إنكم لترون أني لا أكلمه إلا أسمعكم، إني أكلمه في السر دون أن أفتح بابا لا أكون أول من فتحه. رواه البخاري (3267)، ومسلم (2989).
وقال سعيد بن جُمهان لعبد الله بن أبي أوفى: إن السلطان يظلم الناس، ويفعل بهم. قال سعيد: فتناول يدي فغمزها بيده غمزة شديدة ثم قال: ويحك يا ابن جُمهان عليك بالسواد الأعظم، عليك بالسواد الأعظم - يعني جماعة المسلمين - إنْ كان السلطان يسمع منك فأْته في بيته، فأخبره بما تعلم. فإن قبل منك وإلا فدَعْهُ فإنك لست بأعلم منه. رواه أحمد (19415) بإسناد حسن.
قال سماحة الشيخ عبد العزيز بن باز رحمه الله تعالى:"ليس من منهج السلف التشهير بعيوب الولاة، وذكر ذلك على المنابر؛ لأن ذلك يفضي إلى الانقلابات، وعدم السمع والطاعة في المعروف، ويفضي إلى الخروج الذي يضر ولا ينفع، ولكن الطريقة المتبعة عند السلف النصيحة فيما بينهم وبين السلطان، والكتابة إليه، أو الاتصال بالعلماء الذين يتصلون به حتى يوجه إلى الخير.
وإنكار المنكر يكون من دون ذكر الفاعل، فينكر الزنى وينكر الخمر وينكر الربا من دون ذكر من فعله، ويكفي إنكار المعاصي والتحذير منها من غير ذلك أن فلانا يفعلها لا حاكم ولا غير حاكم.
ولما وقعت الفتنة في عهد عثمان قال بعض الناس لأسامة بن زيد رضي الله عنه ألا تنكر على عثمان؟ ، قال: أُنكر عليه عند الناس؟ لكن أنكر عليه بيني وبينه، ولا أفتح باب شر على الناس.
ولما فتحوا الشر في زمن عثمان رضي الله عنه وأنكروا على عثمان جهرة تمت الفتنة والقتال والفساد الذي لا يزال الناس في آثاره إلى اليوم، حتى حصلت الفتنة بين علي ومعاوية، وقتل عثمان وعلي
بأسباب ذلك، وقتل جمٌّ كثير من الصحابة وغيرهم بأسباب الإنكار العلني وذكر العيوب علنًا، حتى أبغض الناس ولي أمرهم، وحتى قتلوه نسأل الله العافية". اهـ حقوق الراعي والرعية (ص 27 - 28) فتوى الشيخ في آخر الرسالة المذكورة.
শুরাইহ ইবনে উবাইদ আল-হাদরামি এবং অন্যান্য থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: যখন দারা বিজয় হয়েছিল, তখন ইয়াদ ইবনে গানম একজন প্রশাসককে বেত্রাঘাত করলেন। এতে হিশাম ইবনে হাকিম তাঁর প্রতি কঠোর কথা বললেন, ফলে ইয়াদ রাগান্বিত হলেন। এরপর কয়েক রাত অতিবাহিত হলে হিশাম ইবনে হাকিম তাঁর কাছে এসে ক্ষমা চাইলেন। এরপর হিশাম ইয়াদকে বললেন: আপনি কি নবী করিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোনেননি যে, "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সেই ব্যক্তিই সবচেয়ে কঠিন শাস্তির সম্মুখীন হবে, যে দুনিয়াতে মানুষকে সবচেয়ে কঠোর শাস্তি দেয়"?
ইয়াদ ইবনে গানম বললেন: হে হিশাম ইবনে হাকিম! আপনি যা শুনেছেন, আমরাও তা শুনেছি। আপনি যা দেখেছেন, আমরাও তা দেখেছি। কিন্তু আপনি কি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোনেননি যে, "যে ব্যক্তি কোনো বিষয়ে শাসকের কল্যাণ কামনা করতে চায়, সে যেন তাকে প্রকাশ্যে তা না জানায়। বরং সে যেন তার হাত ধরে নির্জনে নিয়ে যায়। যদি তিনি তার উপদেশ গ্রহণ করেন, তবে তো ভালো; নতুবা সে (উপদেশ প্রদানকারী) তার ওপর অর্পিত দায়িত্ব পালন করেছে"? আর হে হিশাম, আপনি তো সত্যিই খুব দুঃসাহসী, কারণ আপনি আল্লাহর (নিযুক্ত) শাসকের ওপর বাড়াবাড়ি করছেন। আপনি কেন ভয় পেলেন না যে, শাসক আপনাকে হত্যা করে ফেলতে পারেন? ফলে আপনি হবেন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলার শাসকের হাতে নিহত ব্যক্তি।
7516 - عن عرفجة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنه ستكون هنات وهنات فمن أراد أن يفرق أمر هذه الأمة، وهي جميع، فاضربوه بالسيف كائنا من كان".
وفي لفظ: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم على المنبر يخطب الناس، فقال:"إنه سيكون بعدي هنات وهنات، فمن رأيتموه فارق الجماعة، أو يريد يفرق أمر أمة محمد صلى الله عليه وسلم كائنا من كان، فاقتلوه؛ فإن يد الله على الجماعة، فإن الشيطان مع من فارق الجماعة يركض".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1852) من طريق غندر، حدثنا شعبة، عن زياد بن علاقة قال: سمعت عرفجة قال .. فذكره.
واللفظ الثاني رواه النسائي (4020)، وصححه ابن حبان (4577) من طريقين آخرين عن زياد بن علاقة به. وإسناده صحيح.
وقوله:"هنات وهنات" الهنات جمع هنة وتطلق على كل شيء والمراد بها الفتن والأمور الحادثة.
আরফাজাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই এমন ঘটনা এবং বহুবিধ বিপদ আপতিত হবে। অতঃপর যে ব্যক্তি এই উম্মতের ঐক্যবদ্ধ বিষয়ে বিভেদ সৃষ্টি করতে চায়, সে যেই হোক না কেন, তোমরা তাকে তরবারি দ্বারা আঘাত করো (হত্যা করো)।"
অন্য এক বর্ণনায় (আরফাজাহ বলেন): আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বারে লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতে দেখেছি। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমার পরে ফিতনা ও বিপদ আপতিত হবে। তোমরা যখন দেখবে যে কেউ জামাআত (ঐক্য) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়েছে, অথবা উম্মতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিষয়ে বিভেদ সৃষ্টি করতে চায়, সে যেই হোক না কেন, তোমরা তাকে হত্যা করো। কেননা, আল্লাহর হাত জামাআতের উপর রয়েছে। আর যে ব্যক্তি জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হয়, শয়তান তার সাথে দৌড়ায়।"
7517 - عن عبد الرحمن بن عبد رب الكعبة قال: دخلت المسجد فإذا عبد الله بن عمرو بن العاص جالس في ظل الكعبة، والناس مجتمعون عليه، فأتيتهم، فجلست إليه فقال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فنزلنا منزلا، فمنا من يصلح خباءه، ومنا من ينتضل، ومنا من هو في جشره، إذ نادى منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم: الصلاة جامعة. فاجتمعنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنه لم يكن نبي قبلي إلا كان حقا عليه أن يدل أمته على خير ما يعلمه لهم وينذرهم شر ما يعلمه لهم، وإن أمتكم هذه جعل عافيتها في أولها، وسيصيب آخرها بلاء، وأمور تنكرونها وتجيء فتنة، فيرقق بعضها بعضا، وتجيء الفتنة، فيقول المؤمن هذه مهلكتي، ثم تنكشف وتجيء الفتنة، فيقول المؤمن: هذه هذه فمن أحب أن يزحزح عن النار، ويدخل الجنة فلتأته منيته، وهو يؤمن بالله واليوم الآخر، وليأت إلى الناس الذي يحب أن يؤتى إليه، ومن بايع إماما، فأعطاه صفقة يده، وثمرة قلبه، فليطعه إن استطاع، فإن جاء آخر ينازعه فاضربوا عنق الآخر".
فدنوت منه، فقلت له: أنشدك الله أنت سمعت هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم فأهوى إلى
أذنيه وقلبه بيديه وقال: سمعته أذناي ووعاه قلبي فقلت له: هذا ابن عمك معاوية يأمرنا أن نأكل أموالنا بيننا بالباطل ونقتل أنفسنا والله يقول: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا} [النساء: 29] قال: فسكت ساعة ثم قال: أطعه في طاعة الله، واعصه في معصية الله.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1844: 46) من طريق جرير، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، عن عبد الرحمن بن عبد رب الكعبة قال .. فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুর রহমান ইবনু আব্দি রাব্বিল কা'বাহ বলেন, আমি মসজিদে প্রবেশ করে দেখলাম আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কা'বার ছায়ায় বসে আছেন এবং লোকেরা তাঁর চারপাশে জড়ো হয়ে আছে। আমি তাঁদের কাছে এসে তাঁর পাশে বসলাম। তিনি বললেন:
আমরা এক সফরে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমরা এক স্থানে অবতরণ করলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তাঁবু মেরামত করছিল, কেউ তীর নিক্ষেপের প্রতিযোগিতা করছিল, আর কেউ তার পশুপাল চরাতে ব্যস্ত ছিল। হঠাৎ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আহ্বানকারী ঘোষণা করলেন: "আস-সালাতু জামি'আহ (সালাতের জন্য সমবেত হোন)।" আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সমবেত হলাম। তিনি বললেন:
"আমার পূর্বে এমন কোনো নবী আসেননি, যাঁর ওপর তাঁর উম্মাতকে তিনি যা কল্যাণকর জানেন তার প্রতি পথনির্দেশ করা এবং তিনি যা ক্ষতিকর জানেন তা থেকে সতর্ক করা কর্তব্য ছিল না। আর তোমাদের এই উম্মাতের শান্তি ও কল্যাণ তাদের প্রথম যুগে রাখা হয়েছে। কিন্তু এর শেষ যুগে বালা-মুসীবত (বিপদাপদ) এবং এমন সব বিষয় আসবে যা তোমরা অপছন্দ করবে। ফিতনা (বিদ্রোহ বা বিপর্যয়) আসবে, যার একটি অপরটিকে হালকা করে দেবে। ফিতনা আসবে, তখন মু'মিন বলবে: এটিই আমার ধ্বংসের কারণ! তারপর তা দূর হয়ে যাবে। আবার ফিতনা আসবে, তখন মু'মিন বলবে: এই সেই (ভয়ঙ্কর ফিতনা)! সুতরাং যে ব্যক্তি জাহান্নামের আগুন থেকে দূরে থাকতে এবং জান্নাতে প্রবেশ করতে ভালোবাসে, তার মৃত্যু যেন এমন অবস্থায় আসে যে, সে আল্লাহ ও আখিরাতের দিনের প্রতি ঈমান রাখে এবং মানুষের সাথে সেই আচরণ করে যা সে নিজের জন্য পেতে পছন্দ করে। আর যে ব্যক্তি কোনো ইমামের (নেতার) হাতে বাই'আত (আনুগত্যের শপথ) করল এবং তাকে তার হাতের স্পর্শ ও অন্তরের ফল (অর্থাৎ আন্তরিকতা) দিল, সে যেন যথাসম্ভব তার আনুগত্য করে। অতঃপর যদি অন্য কেউ এসে তার সাথে ঝগড়া করে (নেতৃত্ব ছিনিয়ে নিতে চায়), তবে তোমরা দ্বিতীয় লোকটির গর্দান উড়িয়ে দাও।"
আমি তাঁর কাছে ঘেঁষে গিয়ে বললাম: আমি আপনাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি এই কথা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছেন? তিনি তাঁর দুই কান ও হৃদয়ের দিকে নিজের হাত দিয়ে ইঙ্গিত করে বললেন: আমার দুই কান তা শুনেছে এবং আমার হৃদয় তা সংরক্ষণ করেছে।
আমি তাঁকে বললাম: আপনার চাচাতো ভাই মু'আবিয়াহ্ আমাদেরকে আদেশ করছেন যে আমরা যেন একে অপরের সম্পদ অন্যায়ভাবে ভক্ষণ করি এবং একে অপরের জীবন কেড়ে নিই, অথচ আল্লাহ তা'আলা বলেন: "হে মু'মিনগণ! তোমরা তোমাদের পরস্পরের ধন-সম্পদ অন্যায়ভাবে গ্রাস করো না; তবে তোমাদের পারস্পরিক সন্তুষ্টির ভিত্তিতে ব্যবসার মাধ্যমে হলে (তাতে দোষ নেই)। আর তোমরা নিজেরা নিজেদের হত্যা করো না। নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের প্রতি পরম দয়ালু।" [সূরা আন-নিসা: ২৯]
তিনি কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন। অতঃপর বললেন: আল্লাহর আনুগত্যের ক্ষেত্রে তাঁর আনুগত্য কর এবং আল্লাহর অবাধ্যতার ক্ষেত্রে তাঁর অবাধ্যতা কর।
7518 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا بويع لخليفتين فاقتلوا الآخر منهما".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1853) عن وهب بن بقية الواسطي حدثنا خالد بن عبد الله عن الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন দুই খলিফার হাতে বাইয়াত নেওয়া হয়, তখন তাদের মধ্যে যে পরে আসবে, তাকে হত্যা করো।"
7519 - عن علي بن أبي طالب قال: إذا حدثتكم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثا فوالله لأن أخر من السماء أحب إلي من أن أكذب عليه وإذا حدثتكم فيما بيني وبينكم فإن الحرب خدعة وإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"سيخرج قوم في آخر الزمان أحداث الأسنان سفهاء الأحلام يقولون من خير قول البرية لا يجاوز إيمانهم حناجرهم، يمرقون من الدين كما يمرق السهم من الرمية، فأينما لقيتموهم فاقتلوهم، فإن في قتلهم أجرًا لمن قتلهم يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاري في استتابة المرتدين (6930)، ومسلم في الزكاة (1066: 154) كلاهما من طريق الأعمش، حدثنا خيثمة، حدثنا سويد بن غفلة، قال: قال علي رضي الله عنه .. فذكره.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যখন তোমাদেরকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পক্ষ থেকে কোনো হাদীস বর্ণনা করি, তখন আল্লাহর কসম! তাঁর প্রতি মিথ্যা আরোপ করার চেয়ে আকাশ থেকে পড়ে যাওয়া আমার কাছে অধিক প্রিয়। আর যখন আমি তোমাদেরকে আমার ও তোমাদের মধ্যকার কোনো বিষয়ে কিছু বলি, তখন মনে রেখো, যুদ্ধ হলো প্রতারণা। আর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "শেষ যামানায় এমন এক সম্প্রদায়ের আবির্ভাব ঘটবে যারা হবে বয়সে নবীন ও জ্ঞানে অপরিপক্ব (মূর্খ)। তারা সৃষ্টির সেরা বাক্যসমূহ (কুরআন-হাদীস) উচ্চারণ করবে। তাদের ঈমান তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তারা দীন থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন তীর শিকারের বস্তু থেকে বেরিয়ে যায়। সুতরাং তোমরা যেখানেই তাদের দেখা পাবে, সেখানেই তাদের হত্যা করো। কারণ যারা তাদের হত্যা করবে, তাদের জন্য কিয়ামতের দিন পুরস্কার (সাওয়াব) রয়েছে।"
7520 - عن أبي سعيد الخدري قال: بينا النبي صلى الله عليه وسلم يقسم جاء عبد الله بن ذي الخويصرة التميمي فقال: . اعدل يا رسول الله فقال:"ويلك ومن يعدل إذا لم أعدل؟ قال عمر بن الخطاب: دعني أضرب عنقه قال: دعه فإن له أصحابا يحقر أحدُكم صلاتَه مع صلاته وصيامه مع صيامه، يمرقون من الدين كما يمرق السهم من الرمية، ينظر في قذذه، فلا يوجد فيه شيء، ثم ينظر في نصله، فلا يوجد فيه شيء، ثم ينظر في رصافه فلا يوجد فيه شيء، ثم ينظر في نضيه، فلا يوجد فيه شيء، قد سبق الفرْث والدم، آيتهم رجلّ إحدى يديه - أو قال: ثدييه - مثل ثدي المرأة - أو قال: مثل البضعة
تدردر يخرجون على حين فرقة من الناس".
قال أبو سعيد: أشهد سمعت من النبي صلى الله عليه وسلم وأشهد أن عليًّا قتلهم وأنا معه جيء بالرجل على النعت الذي نعته النبي صلى الله عليه وسلم قال فنزلت فيه: {وَمِنْهُمْ مَنْ يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ} [التوبة: 58].
متفق عليه: رواه البخاري في استابة المرتدين (6933)، ومسلم في الزكاة (1064: 148) كلاهما من حديث الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد .. فذكره. واللفظ للبخاري.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বণ্টন করছিলেন, তখন আবদুল্লাহ ইবনে যুল খুওয়াইসিরাহ আত-তামিমী এসে বলল: হে আল্লাহর রসূল! আপনি ইনসাফ করুন। তখন তিনি বললেন: "তোমার জন্য আফসোস! আমি যদি ইনসাফ না করি, তবে আর কে ইনসাফ করবে?"
উমর ইবনে খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমাকে অনুমতি দিন, আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও। কারণ, তার এমন সাথীরা হবে, যাদের সালাতের (নামাযের) তুলনায় তোমরা তোমাদের সালাতকে এবং তাদের সিয়ামের (রোজার) তুলনায় তোমাদের সিয়ামকে তুচ্ছ মনে করবে। তারা দ্বীন থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন তীর ধনুক থেকে বেরিয়ে যায়। তীরের পালকের দিকে দেখা হবে, তাতে কোনো কিছু পাওয়া যাবে না। তারপর তার ফলার দিকে দেখা হবে, তাতেও কিছু পাওয়া যাবে না। তারপর তার গাঁটের দিকে দেখা হবে, তাতেও কিছু পাওয়া যাবে না। তারপর তার কাঠির দিকে দেখা হবে, তাতেও কিছু পাওয়া যাবে না। তা গোবর ও রক্তকে অতিক্রম করে গেছে। তাদের নিদর্শন হবে একজন পুরুষ, যার একটি হাত—অথবা তিনি বললেন: স্তন—নারীর স্তনের মতো হবে। অথবা তিনি বললেন: তা হবে একটি মাংসপিণ্ডের মতো, যা নড়তে থাকবে। যখন মানুষে বিভক্ত হয়ে যাবে, তখন তারা বেরিয়ে আসবে।"
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে এটি শুনেছি। আমি আরো সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের (খাওয়ারিজদের) হত্যা করেছিলেন এবং আমি তাঁর সাথে ছিলাম। যে লোকটির বর্ণনা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দিয়েছিলেন, তাকে সেভাবেই আনা হয়েছিল। তিনি বলেন: আর এই লোকটির ব্যাপারেই আল্লাহ্র এই বাণীটি অবতীর্ণ হয়: "{وَمِنْهُمْ مَنْ يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ} - তাদের মধ্যে এমন লোকও আছে যারা সাদাকাত (দান) বণ্টনের ব্যাপারে তোমাকে দোষারোপ করে..." (সূরাহ তওবা: ৫৮)।
7521 - عن أبي سعيد الخدري قال: بعث علي رضي الله عنه إلى النبي صلى الله عليه وسلم بذهيبة، فقسمها بين الأربعة: الأقرع بن حابس الحنظلي ثم المجاشعي، وعيينة بن بدر الفزاري، وزيد الطائي ثم أحد بني نبهان، وعلقمة بن علاثة العامري ثم أحد بني كلاب، فغضبت قريش والأنصار قالوا: يعطي صناديد أهل نجد، ويدعنا قال:"إنما أتألفهم"، فأقبل رجل غائر العبين، مشرف الوجنتين، ناتئ الجين، كث اللحية، محلوق فقال: اتق الله يا محمد! فقال:"من يطع الله إذا عصيت؟ أيأمني الله على أهل الأرض فلا تأمنوني؟" فسأله رجلٌ قتله - أحسبه خالد بن الوليد - فمنعه فلما ولى قال:"إن من ضئضئ هذا أو في عقب هذا قوما يقرءون القرآن لا يجاوز حناجرهم، يمرقون من الدين مروق السهم من الرمية، يقتلون أهل الإسلام، ويدعون أهل الأوثان، لئن أنا أدركتهم لأقتلنهم قتل عاد".
متفق عليه: رواه البخاري في الأنبياء (4433)، ومسلم في الزكاة (1064: 143) كلاهما من طريق سعيد بن مسروق، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সামান্য কিছু সোনা পাঠালেন। তিনি তা চারজনের মধ্যে বণ্টন করে দিলেন: আল-আকরা‘ ইবনু হাবিস আল-হানযালী, অতঃপর আল-মুজাশি‘য়ী, উয়ায়না ইবনু বদর আল-ফাযারী, যায়দ আত্-ত্বাঈ, অতঃপর বানূ নাবহানের একজন এবং আলকামা ইবনু ‘উলাছা আল-‘আমিরী, অতঃপর বানূ কিলাবের একজন। এতে কুরাইশ এবং আনসারগণ রাগান্বিত হয়ে বললেন: তিনি নাজদবাসীদের সরদারদের দিচ্ছেন, আর আমাদের ছেড়ে দিচ্ছেন! তিনি বললেন: "আমি তো শুধু তাদের অন্তর জয় করার জন্য (দিয়েছি)।" অতঃপর (সে সময়) এক ব্যক্তি এলো যার চোখ ছিল কোটরাগত, গণ্ডদেশ ছিল উঁচু, কপাল ছিল স্ফীত, দাড়ি ছিল ঘন এবং মাথা ছিল ন্যাড়া। সে বলল: হে মুহাম্মাদ! আল্লাহ্কে ভয় করুন! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি যদি আল্লাহর অবাধ্য হই, তাহলে আর কে আল্লাহর আনুগত্য করবে? আল্লাহ্ আমাকে পৃথিবীর মানুষের উপর আমানতদার মনে করেন, আর তোমরা আমাকে আমানতদার মনে করছ না?" তখন এক ব্যক্তি তাকে হত্যা করার অনুমতি চাইল—আমার ধারণা, তিনি ছিলেন খালিদ ইবনু ওয়ালীদ। তিনি তাকে বারণ করলেন। যখন সে চলে গেল, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এর ঔরস থেকে অথবা এর বংশে এমন এক জাতি জন্ম নেবে যারা কুরআন পাঠ করবে কিন্তু তা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তারা দীন থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেভাবে তীর ধনুক থেকে বেরিয়ে যায়। তারা মুসলিমদের হত্যা করবে এবং মূর্তিপূজারীদের ছেড়ে দেবে। আমি যদি তাদেরকে পাই, তবে ‘আদ জাতির মতো তাদের হত্যা করব।"
7522 - عن زيد بن وهب الجهني: أنه كان في الجيش الذين كانوا مع علي رضي الله عنه الذين ساروا إلى الخوارج، فقال علي رضي الله عنه: أيها الناس إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسل - يقول:"يخرج قوم من أمتي يقرؤون القرآن، ليس قراءتكم إلى قراءتهم بشيء، ولا صلاتكم إلى صلاتهم بشيء، ولا صيامكم إلى صيامهم بشيء، يقرؤون القرآن يحسبون أنه لهم وهو عليهم، لا تجاوز صلاتهم تراقيهم، يمرقون من الإسلام كما يمرق السهم من الرمية".
لو يعلم الجيش الذين يصيبونهم ما قضي لهم على لسان نبيهم صلى الله عليه وسلم لاتّكلوا عن العمل، وآية ذلك أن فيهم رجلا له عضد، وليس له ذراع على رأس عضده مثل حلمة الثدي، عليه شعرات بيض، فتذهبون إلى معاوية وأهل الشام، وتتركون هؤلاء
يخلفونكم في ذراريكم وأموالكم، والله إني لأرجو أن يكونوا هؤلاء القوم، فإنهم قد سفكوا الدم الحرام، وأغاروا في سرح الناس، فسيروا على اسم الله.
قال سلمة بن كهيل: فنزلني زيد بن وهب منزلا حتى قال: مررنا على قنطرة فلما التقينا، وعلى الخوارج يومئذ عبد الله بن وهب الراسبي فقال لهم: ألقوا الرماح، وسلوا سيوفكم من جفونها، فإني أخاف أن يناشدوكم كما ناشدوكم يوم حروراء فرجعوا، فوحشوا برماحهم وسلوا السيوف، وشجرهم الناس برماحهم قال: وقتل بعضهم على بعض، وما أصيب من الناس يومئذ إلا رجلان فقال علي رضي الله عنه: التمسوا فيهم المخدج فالتمسوه، فلم يجدوه فقام علي رضي الله عنه بنفسه حتى أتى ناسا قد قتل بعضهم على بعض قال: أخروهم، فوجدوه مما يلي الأرض فكبر ثم قال: صدق الله وبلغ رسوله قال: فقام إليه عبيدة السلماني فقال: يا أمير المؤمنين! الله الذي لا إله إلا هو لسمعت هذا الحديث من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: إي والله الذي لا إله إلا هو حتى استحلفه ثلاثا وهو يحلف له.
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1066: 156) عن عبد بن حميد: حدثنا عبد الرزاق بن همام: حدثنا عبد الملك بن أبي سليمان: حدثنا سلمة بن كهيل حدثني زيد بن وهب الجهني .. فذكره.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ ইবনে ওয়াহাব আল-জুহানী বলেন, তিনি সেই সেনাবাহিনীর অন্তর্ভুক্ত ছিলেন যারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে খারেজীদের দিকে যাত্রা করেছিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে লোক সকল, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমার উম্মতের মধ্য থেকে এমন একটি জাতি বেরিয়ে আসবে যারা কুরআন পাঠ করবে। তাদের পাঠের তুলনায় তোমাদের পাঠ কিছুই নয়, তাদের সালাতের তুলনায় তোমাদের সালাত কিছুই নয়, এবং তাদের সিয়ামের তুলনায় তোমাদের সিয়াম কিছুই নয়। তারা কুরআন পাঠ করবে এবং মনে করবে এটি তাদের পক্ষে, অথচ এটি তাদের বিপক্ষে যাবে। তাদের সালাত তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তারা ইসলাম থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন ধনুক থেকে তীর বেরিয়ে যায়। যদি সেই সেনাবাহিনী যারা এদের সাথে যুদ্ধ করবে, তারা তাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখে তাদের জন্য যা ফয়সালা করা হয়েছে (পুরস্কার) তা জানতে পারত, তবে তারা আমল করা ছেড়ে দিত। তাদের (খারেজীদের) আলামত এই যে, তাদের মধ্যে এমন একজন লোক থাকবে যার কাঁধের উপরিতল আছে, কিন্তু বাহু (কনুই থেকে নিচের অংশ) নেই, এবং তার কাঁধের অগ্রভাগে স্তনের বোঁটার মতো একটি পিণ্ড থাকবে, যার উপর কয়েকটি সাদা চুল থাকবে। তোমরা কি মু'আবিয়া ও সিরিয়াবাসীর দিকে যাবে, আর এদেরকে ছেড়ে যাবে, যারা তোমাদের সন্তানদের ও ধন-সম্পদের ক্ষেত্রে তোমাদের স্থলাভিষিক্ত হবে? আল্লাহর কসম, আমি আশা করি যে এরাই সেই লোক, কারণ তারা অবৈধ রক্তপাত করেছে এবং মানুষের চারণভূমিতে আক্রমণ করেছে। সুতরাং আল্লাহর নামে যাত্রা করো।"
সালামা ইবনে কুহাইল বললেন: যায়দ ইবনে ওয়াহাব আমাকে এমনভাবে বর্ণনা করলেন যে, তিনি বললেন: আমরা একটি পুল পার হলাম। যখন আমরা তাদের মুখোমুখি হলাম, তখন সেই দিন খারেজীদের নেতা ছিলেন আব্দুল্লাহ ইবনে ওয়াহাব আর-রাসিবি। সে তাদেরকে বলল: তোমরা বর্শা ফেলে দাও, এবং কোষ থেকে তোমাদের তরবারি বের কর। কারণ আমি ভয় পাচ্ছি যে, তারা তোমাদের সাথে (আপোষের) আবেদন করবে যেমনটি হারুরা'র দিনে করেছিল। অতঃপর তারা ফিরে গেল, তাদের বর্শা নিক্ষেপ করল এবং তরবারি বের করল। লোকেরা তাদের উপর বর্শা দিয়ে আঘাত হানল। যায়দ বললেন: তাদের কেউ কেউ একজনের উপর আরেকজন নিহত হল, আর সেদিন (আমাদের) পক্ষের মাত্র দুজন লোক আহত/নিহত হয়েছিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাদের মধ্যে তোমরা সেই বিকলাঙ্গ পুরুষটিকে (আল-মাখদাজ) খোঁজ করো। তারা তাকে খুঁজলেন, কিন্তু পেলেন না। অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজেই দাঁড়ালেন এবং এমন কিছু লোকের কাছে গেলেন যারা একে অপরের উপর নিহত হয়েছিল। তিনি বললেন: এদেরকে সরাও। তারা তাকে (মাটির) নিকটবর্তী স্থানে খুঁজে পেল। তিনি তাকবীর দিলেন এবং বললেন: আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৌঁছে দিয়েছেন।
তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: তখন উবাইদাহ আস-সালমানী তাঁর কাছে দাঁড়ালেন এবং বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আল্লাহর কসম, যিনি ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ নেই, আপনি কি এই হাদীসটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছেন? তিনি (আলী) বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম, যিনি ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ নেই। উবাইদাহ তাঁকে তিনবার কসম করালেন এবং তিনি (আলী) প্রতিবারই কসম করে বললেন।
7523 - عن محمد بن جبير بن مطعم أنه كان يحدث: أنه بلغ معاوية وهو عنده في وفد من قريش أن عبد الله بن عمرو يحدث أنه سيكون ملك من قحطان، فغضب، فقام فأثنى على الله بما هو أهله ثم قال: أما بعد فإنه بلغني أن رجالا منكم يحدثون أحاديث ليست في كتاب الله ولا توثر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وأولئك جهالكم فإياكم والأماني التي تضل أهلها فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن هذا الأمر في قريش لا يعاديهم أحد إلا كبه الله في النار على وجهه ما أقاموا الدين".
صحيح: رواه البخاري في الأحكام (7139) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: كان محمد بن جبير بن مطعم يحدث .. فذكره.
لا خلاف بين أهل العلم من أهل السنة والجماعة أن الإمام الأعظم أقصد به الحاكم على جميع الأمصار الإسلامية - يشترط أن يكون قرشيا، ولكن النصوص الشرعية دلت على أن ذلك التقديم الواجب لهم في الإمامة مشروط بإقامتهم الدين وإطاعتهم الله ورسوله. فإن خالفوا أمر الله فغيرهم ممن يطيع الله تعالى، ويُنفذ أوامره ويُقيم حدوده أولى منه.
والشاهد على ذلك قوله صلى الله عليه وسلم:"ما أقاموا الدين". لأن لفظة:"ما" مصدرية ظرفية مقيدة لقوله: إن هذا الأمر في قريش، وتقرير المعنى إن هذا الأمر يكون في قريش مدة إقامتهم الدين. مفهومه: أنهم إن لم يقيموا الدين لم يكن فيهم.
وقد روي عن ابن مسعود قال:"بينا نحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم في قريب من ثمانين رجلا من قريش ليس فيهم إلا قرشي لا والله ما رأيت صفحة وجوه رجال قط أحسن من وجوههم يومئذ فذكروا النساء، فتحدثوا فيهن، فتحدث معهم حتى أحببت أن يسكت قال ثم أتيته فتشهد ثم قال:"أما بعد يا معشر قريش فإنكم أهل هذا الأمر ما لم تعصوا الله، فإذا عصيتموه بعث إليكم من يلحاكم كما يلحى هذا القضيب" لقضيب في يده ثم لحا قضيبه، فإذا هو أبيض بصلد".
رواه أحمد (4380) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن صالح قال ابن شهاب: حدثني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة أن ابن مسعود قال .. فذكره.
ورواه أبو يعلى (5024) من طريق مصعب بن عبد الله الزبيري، عن إبراهيم بن سعد، عن صالح (وهو ابن كيسان) … فذكره. إلا أن فيه ثلاثين رجلا.
قال الحافظ في الفتح (13/ 116):"رجاله ثقات إلا أنه من رواية عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عم أبيه عبد الله بن مسعود ولم يدركه، وهذه رواية صالح بن كيسان عن عبيد الله. وخالفه حبيب بن أبي ثابت فرواه عن القاسم بن محمد بن عبد الرحمن عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عن أبي مسعود الأنصاري ولفظه:"لا يزال هذا الأمر فيكم وأنتم ولاته" الحديث أخرجه أحمد (17069) وفي سماع عبيد الله من أبي مسعود نظر مبني على الخلاف في سنة وفاته.
قال:"وله شاهد من مرسل عطاء بن يسار أخرجه الشافعي وعنه البيهقي (8/ 144) بسند صحيح إلى عطاء ولفظه قال لقريش:"أنتم أولى الناس بهذا الأمر ما كنتم على الحق إلا أن تعدلوا عنه فتلحون كما تلحى هذه الجريدة" اهـ.
فلو جاء رجل من قريش وقال: إنه أحق بالإمامة من غيره وهو فاسق فلا نقبل إمامته. فمن شرط الإمامة عند الابتداء أن يكون عدلا. ولكن لو أن أحدًا تغلب على الناس بالقوة سواء كان قرشيا أو عبدا حبشيا كأن رأسه زبية كما جاء في الحديث وجبت طاعته، ففرق بين الاختيار وبين الاستيلاء على الناس بالقوة فنسمع ونطيع، ولا ننابذ إلا أن نرى كفرا بواحا لا تأويل له.
أما في غير الإمام الأعظم فلا أعرف أحدا اشترط فيه أن يكون قرشيا، بل الأمر موكول إلى من غلب، فتولى الحكم، واستب الأمن فهو الإمام، تجب بيعته وطاعته وتحرم منازعته ومعصيته.
قال شيخ الإسلام محمد بن عبد الوهاب رحمه الله تعالى:"الأئمة مجمعون من كل مذهب على أن من تغلب على بلد أو بلدان له حكم الإمام في جميع الأشياء، ولولا هذا ما استقامت الدنيا، لأن الناس من زمن طويل قبل الإمام أحمد إلى يومنا هذا، ما اجتمعوا على إمام واحد،
ولا يعرفون أحدًا من العلماء ذكر أن شيئا من الأحكام، لا يصح إلا بالإمام الأعظم". الدرر السنية في الأجوبة النجدية (12/ 5).
وقال الشوكاني رحمه الله تعالى:"وأما بعد انتشار الإسلام واتساع رقعته وتباعد أطرافه فمعلوم أنه قد صار في كل قطر أو أقطار الولايةُ إلى إمام أو سلطان وفي القطر الآخر أو الأقطار كذلك ولا ينفذ لبعضهم أمر ولا نهي في قطر الأخر وأقطاره التي رجعت إلى ولايته فلا بأس بتعدد الأئمة والسلاطين ويجب الطاعة لكل واحد منهم بعد البيعة له، على أهل القطر الذي ينفذ فيه أوامره ونواهيه وكذلك صاحب القطر الآخر فإذا قام من ينازعه في القطر الذي قد ثبتت فيه ولايته وبايعه أهله كان الحكم فيه أن يقتل إذا لم يتب". السيل الجرار المتدفق على حدائق الأزهار (1/ 941).
ولذا لم نجد من زمن بعيد أن أحدًا من العلماء اعترض على حكم المغول والغزنويين، والمماليك والفاطميين والعثمانيين بأنهم ليسوا من قريش، بل أطاعوهم وجاهدوا معهم الكفار، وتولوا مناصب حساسة كالقضاء ونظارة الأوقاف وإدارة التعليم وغيرها.
وأما ما قيل: إن اشتراط القرشية في الإمام الأعظم يتضمن العصبية، وقد حارب الإسلام العصبية الجاهلية فقد قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى في فتاواه (9/ 429 - 430):"هذا لا يعني - أي النهي عن العصبية - عدم التفضيل بين الأجناس، فإن جمهور العلماء على أن جنس قريش خير من غيرهم ولكن تفضيل الجملة لا يستلزم أن يكون كل فرد أفضل من كل فرد، فإن في غير العرب خلقا كثيرا خيرا من أكثر العرب، وفي غير قريش من المهاجرين والأنصار خير من قريش وهذا في أحكام الدنيا، وأما أحكام الآخرة من الثواب والعقاب والكرامة عند الله فهذا لا يؤثر فيه النسب، وإنما مرده إلى التقوى والعمل الصالح فحسب" اهـ.
মুহাম্মাদ ইবনু জুবাইর ইবনু মুত'ইম থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: [একবার] কুরাইশের এক প্রতিনিধিদলের মধ্যে মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থাকা অবস্থায় তাঁর কাছে খবর পৌঁছাল যে, আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাকি এই বলে হাদীস বর্ণনা করছেন যে, (ভবিষ্যতে) কাহতান গোত্রের একজন বাদশাহ হবেন। এতে মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হলেন। তিনি দাঁড়ালেন এবং আল্লাহর যথাযথ প্রশংসা করলেন। এরপর বললেন: 'আম্মা বা'দ (অতঃপর), আমার কাছে এই খবর পৌঁছেছে যে, তোমাদের কিছু লোক এমন হাদীস বর্ণনা করছে যা আল্লাহর কিতাবে নেই এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকেও প্রমাণিত নয়। তারা হলো তোমাদের মধ্যেকার অজ্ঞ ব্যক্তি। সুতরাং তোমরা সেই সব কাল্পনিক আশা থেকে সাবধান থাকো, যা এর অনুসারীদেরকে পথভ্রষ্ট করে। কেননা, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এই শাসনভার (খেলাফত/নেতৃত্ব) কুরাইশের হাতেই থাকবে। যে কেউ তাদের সাথে শত্রুতা করবে, আল্লাহ তাকে উপুড় করে জাহান্নামে নিক্ষেপ করবেন, যতক্ষণ না তারা দীন প্রতিষ্ঠা করবে।"
আহলুস সুন্নাহ ওয়াল জামা'আহর আলিমগণের মধ্যে এই বিষয়ে কোনো মতানৈক্য নেই যে, মুসলিম জনপদের সর্বোচ্চ শাসকের (আল-ইমামুল আ'যম) জন্য কুরাইশ বংশীয় হওয়া শর্ত। তবে শরীয়তের সুস্পষ্ট দলিল প্রমাণ করে যে, তাদের জন্য খেলাফতের এই অগ্রাধিকার শর্তযুক্ত—যা হচ্ছে তাদের দীন প্রতিষ্ঠা এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্যের উপর নির্ভরশীল। যদি তারা আল্লাহর আদেশ অমান্য করে, তবে তাদের চেয়ে অন্য কেউ, যে আল্লাহ তা'আলার অনুগত এবং তাঁর আদেশ বাস্তবায়ন করে ও তাঁর সীমারেখা কায়েম করে, সে-ই অধিকতর উপযুক্ত। এর প্রমাণ হিসেবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী "যতক্ষণ না তারা দীন প্রতিষ্ঠা করবে" উল্লেখ করা যায়। কারণ "মা" (ما) শব্দটি সময়কাল ও শর্তসূচক, যা এই উক্তিকে সীমিত করে দেয়: "এই শাসনভার কুরাইশের হাতে থাকবে"। এর অর্থ দাঁড়ায়: এই নেতৃত্ব কুরাইশের হাতে ততক্ষণই থাকবে, যতক্ষণ তারা দীন প্রতিষ্ঠা করবে। এর বিপরীত ধারণা হলো: যদি তারা দীন প্রতিষ্ঠা না করে, তবে তাদের হাতে নেতৃত্ব থাকবে না।
ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রায় আশি জন কুরাইশ লোকের সাথে ছিলাম। তাদের মধ্যে কেবল কুরাইশরাই ছিল। আল্লাহর কসম! আমি ঐ দিনের চেয়ে কোনো পুরুষের মুখের লাবণ্য এত সুন্দর দেখিনি। তারা মহিলাদের সম্পর্কে আলোচনা করছিল, তারা তাদের বিষয়ে কথা বলছিল। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)ও তাদের সাথে কথা বলছিলেন, এমনকি আমি চাইলাম যে তিনি যেন চুপ করেন। তিনি বলেন: এরপর আমি তাঁর কাছে আসলাম। তিনি শাহাদাত পাঠ করলেন, তারপর বললেন: "আম্মা বা'দ (অতঃপর), হে কুরাইশ সম্প্রদায়! তোমরা এই নেতৃত্বের (খেলাফতের) যোগ্য, যতক্ষণ না তোমরা আল্লাহর অবাধ্য হও। কিন্তু যখন তোমরা তাঁর অবাধ্য হবে, তখন তোমাদের উপর এমন কাউকে প্রেরণ করা হবে, যে তোমাদের চামড়া ছাড়িয়ে নেবে, যেমন এই ছড়িটির চামড়া ছাড়ানো হয়।" এ সময় তাঁর হাতে একটি ছড়ি ছিল। এরপর তিনি তাঁর ছড়িটির ছাল ছাড়ালেন, ফলে তা সাদা ও শক্ত হয়ে গেল।
সুতরাং যদি কুরাইশের কেউ এসে বলে যে, সে অন্যদের চেয়ে ইমামতের (নেতৃত্বের) বেশি হকদার, অথচ সে ফাসিক (পাপী), তবে আমরা তার ইমামত গ্রহণ করব না। কারণ শুরুতে ইমামতের শর্ত হলো ন্যায়পরায়ণ হওয়া। কিন্তু যদি কেউ শক্তি দ্বারা জনগণের উপর ক্ষমতা গ্রহণ করে—সে কুরাইশ হোক বা যার মাথা কিসমিসের মতো (যেমন হাদীসে এসেছে) এমন কোনো আবিসিনীয় গোলামই হোক—তবে তাকে মান্য করা ওয়াজিব। অতএব, নির্বাচনের মাধ্যমে ইমাম নির্ধারণ এবং শক্তির মাধ্যমে জনগণের উপর ক্ষমতা দখলের মধ্যে পার্থক্য রয়েছে। ক্ষমতা দখলের ক্ষেত্রেও আমরা শুনব এবং মান্য করব, যতক্ষণ না আমরা স্পষ্ট কুফর দেখি, যার কোনো ব্যাখ্যা (তা'বীল) নেই।
আর ইমামুল আ'যম (সর্বোচ্চ শাসক/খলিফা) ছাড়া অন্য কোনো ক্ষেত্রে আমি এমন কাউকে জানি না, যে শাসকের জন্য কুরাইশ হওয়া শর্ত করেছে। বরং বিষয়টি তার উপর ন্যস্ত, যে ক্ষমতায় জয়ী হয়, শাসনভার গ্রহণ করে এবং নিরাপত্তা প্রতিষ্ঠা করে। সে-ই ইমাম, যার বাইয়াত ও আনুগত্য করা আবশ্যক এবং তার সাথে বিবাদ করা ও তার অবাধ্য হওয়া হারাম।
শাইখুল ইসলাম মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল ওয়াহহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "সকল মাযহাবের ইমামগণ এই বিষয়ে একমত যে, যে ব্যক্তি কোনো দেশ বা একাধিক দেশ দখল করে, সকল বিষয়ে তার জন্য ইমামের হুকুম প্রযোজ্য। এটা না হলে পৃথিবী টিকে থাকত না। কারণ ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সময়কালের বহু আগে থেকে শুরু করে আজ পর্যন্ত মানুষ কখনো একজন ইমামের উপর ঐক্যবদ্ধ হয়নি। আর আমি এমন কোনো আলিমকে চিনি না যিনি বলেছেন যে, ইমামুল আ'যম ছাড়া শরীয়তের কোনো বিধানই সহীহ হবে না।" (আদ-দুরারুস সানিয়্যাহ, ১২/৫)।
শওকানি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "ইসলাম ছড়িয়ে পড়ার পর, তার পরিধি প্রশস্ত হওয়ার এবং দূর-দূরান্তের অঞ্চলে বিস্তৃত হওয়ার পর, এটা স্পষ্ট যে, প্রতিটি অঞ্চলে বা অঞ্চলসমূহে একজন ইমাম বা সুলতানের অধীনে শাসনব্যবস্থা প্রতিষ্ঠিত হয়েছে। আর এক অঞ্চলের ইমামের আদেশ বা নিষেধাজ্ঞা অন্য অঞ্চলের উপর কার্যকর হয় না। সুতরাং একাধিক ইমাম ও সুলতানের উপস্থিতিতে কোনো সমস্যা নেই। প্রত্যেককে তার কর্তৃত্বাধীন অঞ্চলের অধিবাসীদের জন্য বাইয়াত করার পর তার আনুগত্য করা আবশ্যক। যদি কেউ সেই অঞ্চলে তার সাথে বিবাদে লিপ্ত হয়, যেখানে তার শাসন প্রতিষ্ঠিত হয়েছে এবং যার অধিবাসীরা তাকে বাইয়াত করেছে, তবে যদি সে তাওবা না করে, তবে তাকে হত্যা করাই হবে তার বিধান।" (আস-সাইবুল জাররার আল-মুতাদ্দাফিক্ব 'আলা হাদাইকিল আযহার, ১/৯৪১)।
এই কারণেই আমরা দীর্ঘকাল ধরে এমন কোনো আলিমকে খুঁজে পাইনি যিনি মোঙ্গল, গজনভী, মামলুক, ফাতেমীয় এবং উসমানী শাসকদের কুরাইশ না হওয়ার কারণে তাদের শাসনের বিরোধিতা করেছেন। বরং তারা তাদের আনুগত্য করেছেন, তাদের সাথে কাফিরদের বিরুদ্ধে জিহাদ করেছেন এবং বিচারক, ওয়াকফ তত্ত্বাবধায়ক ও শিক্ষা পরিচালকসহ সংবেদনশীল পদ গ্রহণ করেছেন।
আর এ বিষয়ে যে বলা হয় যে, ইমামুল আ'যমের জন্য কুরাইশ হওয়ার শর্তারোপ করা 'আসাবিয়াহ (বংশীয় গোঁড়ামি) ধারণ করে, অথচ ইসলাম জাহিলী আসাবিয়াহকে প্রতিহত করেছে—এই প্রসঙ্গে শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ফাতাওয়ায় (৯/৪২৯-৪৩0) বলেছেন: "এর অর্থ (আসাবিয়াহর নিষেধাজ্ঞা) এই নয় যে, বিভিন্ন গোত্রের মধ্যে কোনো শ্রেষ্ঠত্ব নেই। অধিকাংশ আলিম এই মত পোষণ করেন যে, কুরাইশ গোত্র অন্যদের চেয়ে শ্রেষ্ঠ। তবে সামগ্রিকভাবে শ্রেষ্ঠত্ব থাকার অর্থ এই নয় যে, প্রতিটি ব্যক্তি অন্য প্রতিটি ব্যক্তির চেয়ে শ্রেষ্ঠ। কারণ অনারবদের মধ্যে বহু মানুষ আছে যারা অধিকাংশ আরবদের চেয়ে উত্তম। আর কুরাইশ ছাড়া অন্যান্য মুহাজির ও আনসারদের মধ্যেও এমন ব্যক্তিরা আছেন যারা কুরাইশদের চেয়েও উত্তম। এটি হলো দুনিয়াবী বিধানের ক্ষেত্রে। তবে আখিরাতের বিধান, যেমন প্রতিদান, শাস্তি ও আল্লাহর কাছে সম্মান, সে ক্ষেত্রে বংশ কোনো প্রভাব ফেলে না। বরং এর ভিত্তি হলো কেবল তাকওয়া ও সৎকর্ম।"
7524 - عن معاوية قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الناس تبع لقريش في هذا الأمر، خيارهم في الجاهلية خيارهم في الإسلام إذا فقهوا، والله لولا أن تبطر قريش لأخبرتها ما لخيارها عند الله عز وجل".
صحيح: رواه أحمد (16927)، وابن أبي شيبة (33054) كلاهما عن أبي نعيم الفضل بن دكين، حدثنا عبد الله بن مبشر مولى أم حبيبة، عن زيد بن أبي عتاب، عن معاوية .. فذكره. وعند ابن أبي شيبة: قام معاوية على المنبر فقال .. فذكره. وإسناده صحيح.
وقال الهيثمي في المجمع: (4/ 217): ورجاله ثقات".
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই বিষয়ে (নেতৃত্বে) মানুষ কুরাইশের অনুসারী। তাদের মধ্যে যারা জাহিলিয়াতের যুগে উত্তম ছিল, তারা ইসলামেও উত্তম, যদি তারা দ্বীনের জ্ঞান অর্জন করে। আল্লাহর কসম! কুরাইশরা অহংকারী হয়ে যাওয়ার ভয় না থাকলে, আমি তাদের জানিয়ে দিতাম, তাদের মধ্যে যারা উত্তম, পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর কাছে তাদের জন্য কী মর্যাদা রয়েছে।"
7525 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الناس تبع لقريش في هذا الشأن، مسلمهم تبعٌ لمسلمهم، وكافرهم تبعٌ لكافرهم.
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3495)، ومسلم في الإمارة (1818) كلاهما من طريق قتيبة بن سعيد، حدثنا المغيرة الحزامي، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة .. فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই বিষয়ে (নেতৃত্বের ক্ষেত্রে) মানুষ কুরাইশের অনুগামী। তাদের মুসলিমরা কুরাইশের মুসলিমদের অনুগামী এবং তাদের কাফিররা কুরাইশের কাফিরদের অনুগামী।"
7526 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن لي على قريش حقا وإن لقريش عليكم حقا ما حكموا فعدلوا، وأتمنوا فأدوا، واسترحموا فرحموا، فمن لم يفعل ذلك فعليه لعنة الله".
صحيح: رواه أحمد (7653) عن عبد الرزاق - وهو في مصنفه (19902) واللفظ له - وصحّحه ابن حبان (4581) عن معمر، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة .. فذكره.
ولم يذكر أحمد قوله:"فمن لم يفعل ذلك فعليه لعنة الله". وإسناده صحيح.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় কুরাইশদের উপর আমার অধিকার রয়েছে, আর তোমাদের উপরও কুরাইশদের অধিকার রয়েছে— যতক্ষণ তারা শাসন করে এবং ন্যায়বিচার করে, যখন তাদের কাছে আমানত রাখা হয়, তখন তারা তা আদায় করে, এবং যখন তাদের কাছে দয়া চাওয়া হয়, তখন তারা দয়া করে। আর যে ব্যক্তি তা করবে না, তার উপর আল্লাহর অভিশাপ।
7527 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يزال هذا الأمر في قريش ما بقي منهم اثنان".
متفق عليه: رواه البخاري في الأحكام (7140)، ومسلم في الإمارة (1820) كلاهما عن أحمد بن عبد الله بن يونس حدثنا عاصم بن محمد بن زيد، سمعت أبي يقول: قال ابن عمر .. فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: এই নেতৃত্ব কুরাইশদের মধ্যেই থাকবে, যতক্ষণ তাদের দুইজনও অবশিষ্ট থাকে।