আল-জামি` আল-কামিল
7528 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"الناس تبع لقريش في الخير والشر".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1819) عن يحيى بن حبيب الحارثي، حدثنا روح، حدثنا ابن جريج، حدثني أبو الزبير، عن جابر قال .. فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ ভালো ও মন্দ উভয় ক্ষেত্রে কুরাইশদের অনুগামী (অনুসারী) হবে।"
7529 - عن جابر بن سمرة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يزال أمر الناس ماضيا ما وليهم اثنا عشر رجلا" ثم تكلم النبي صلى الله عليه وسلم بكلمة خفيت علي فسألت أبي ماذا قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"كلهم من قريش".
متفق عليه: رواه البخاري في الأحكام (722، 7223)، ومسلم في الإمارة (1821: 6) كلاهما من حديث عبد الملك بن عمير، عن جابر بن سمرة قال: فذكره. والسياق لمسلم.
ورواه مسلم في الإمارة (1821: 9) من طريق الشعبي، عن جابر بن سمرة بلفظ:"لا يزال هذا الدين عزيزا منيعا إلى اثني عشر خليفة".
ورواه أبو داود (4281) من طريق الأسود بن سعيد الهمداني عن جابر بن سمرة وزاد: فلما رجع إلى منزله أتته فريش فقالوا: ثم يكون ماذا؟ قال:"ثم يكون الهرج، إلا أن الأسود بن سعيد لم يوثقه غير ابن حبان، وقال ابن القطان: مجهول الحال. وقول الحافظ فيه:"صدوق" لا يتمشى مع قواعده. والهرج هو القتل.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "মানুষের দ্বীনি ও পার্থিব বিষয়াদি ততক্ষণ পর্যন্ত চলতে থাকবে, যতক্ষণ পর্যন্ত বারোজন পুরুষ তাদের নেতৃত্ব দেবে।" অতঃপর নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন একটি কথা বললেন যা আমার কাছে অস্পষ্ট রয়ে গেল। তখন আমি আমার পিতাকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কী বলেছেন? তিনি বললেন: "তাঁরা সকলেই কুরাইশ বংশের হবেন।"
7530 - عن عامر بن سعد بن أبي وقاص قال: كتبت إلى جابر بن سمرة مع غلامي نافع أن أخبرني بشيء سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فكتب إلي: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم جمعة عشية رجم الأسلمي يقول:"لا يزال الدين قائما حتى تقوم الساعة أو يكون
عليكم اثنا عشر خليفة كلهم من قريش".
وسمعته يقول:"عصيبة من المسلمين يفتتحون البيت الأبيض بيت كسرى أو آل كسرىىى".
وسمعته يقول:"إن بين يدي الساعة كذابين فاحذروهم".
وسمعته يقول:"إذا أعطى الله أحدكم خيرا فليبدأ بنفسه وأهل بيته".
وسمعته يقول:"أنا الفرط على الحوض".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1822: 10) من طريق حاتم بن إسماعيل عن المهاجر بن مسمار، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص قال .. فذكره.
জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। 'আমির ইবনু সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস বলেন, আমি আমার গোলাম নাফি'র মাধ্যমে জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট লিখে পাঠালাম যে, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে যা শুনেছেন, তা আমাকে জানান। তিনি আমাকে জবাবে লিখলেন: আসলামী গোত্রের ব্যক্তিকে পাথর মেরে হত্যা করার পরের জুমু'আর দিন সন্ধ্যায় আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত অথবা তোমাদের উপর বনু কুরাইশ বংশের বারোজন খলিফা না হওয়া পর্যন্ত দীন (ইসলাম) প্রতিষ্ঠিত থাকবে।"
আমি তাঁকে আরও বলতে শুনেছি: "মুসলিমদের একটি ছোট দল কিসরার প্রাসাদ, অর্থাৎ কিসরা বা কিসরার বংশের সাদা প্রাসাদ জয় করবে।"
আমি তাঁকে আরও বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় কিয়ামতের আগে বহু মিথ্যাবাদী আসবে। অতএব তোমরা তাদের থেকে সাবধান থাকো।"
আমি তাঁকে আরও বলতে শুনেছি: "আল্লাহ যখন তোমাদের কাউকে কোনো উত্তম বস্তু দান করেন, তখন সে যেন প্রথমে নিজের ও তার পরিবারের সদস্যদের থেকে শুরু করে।"
আমি তাঁকে আরও বলতে শুনেছি: "আমি হাউযের (কাওসার) নিকট তোমাদের অগ্রগামী (প্রস্তুতকারী) হিসেবে থাকব।"
7531 - عن النعمان بن بشير قال: كنا قعودا في المسجد مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وكان بشير رجلا يكف حديثه، فجاء أبو ثعلبة الخشني فقال: يا بشير بن سعد أتحفظ حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأمراء؟ فقال حذيفة: أنا أحفظ خطبته، فجلس أبو ثعلبة فقال حذيفة: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تكون النبوة فيكم ما شاء الله أن تكون ثم يرفعها إذا شاء أن يرفعها، ثم تكون خلافة على منهاج النبوة، فتكون ما شاء الله أن تكون ثم يرفعها إذا شاء الله أن يرفعها، ثم تكون ملكا عاضا فيكون ما شاء الله أن يكون ثم يرفعها إذا شاء أن يرفعها، ثم تكون ملكا جبرية فتكون ما شاء الله أن تكون، ثم يرفعها إذا شاء أن يرفعها، ثم تكون خلافة على منهاج النبوة" ثم سكت.
قال حبيب: فلما قام عمر بن عبد العزيز، وكان يزيد بن النعمان بن بشير في صحابته، فكتبت إليه بهذا الحديث أذكره إياه، فقلت له: إني أرجو أن يكون أمير المؤمنين - يعني: عمر - بعد الملك العاض والجبرية فأدخل كتابي على عمر بن عبد العزيز، فسر به، وأعجبه".
حسن: رواه أحمد (18406) عن سليمان بن داود الطيالسي حدثني داود بن إبراهيم الواسطي، حدثني حبيب بن سالم، عن النعمان بن بشير .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل حبيب بن سالم فإنه حسن الحديث. إلا قوله:"ثم تكون خلافة على منهاج النبوة". فهو شاذ والأحاديث الصحيحة ليس فيها ذكر الخلافة على منهاج النبوة بعد ذهاب الخلافة، وإتيان الملك.
নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মসজিদে উপবিষ্ট ছিলাম। বাশীর ছিলেন এমন ব্যক্তি যিনি (অপ্রয়োজনীয়) কথা কম বলতেন। এমন সময় আবূ সা'লাবা আল-খুশানী এসে বললেন, হে বাশীর ইবনু সা'দ! আপনি কি আমীর বা শাসকদের ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস মুখস্থ রেখেছেন? তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাঁর খুতবাটি মুখস্থ রেখেছি। অতঃপর আবূ সা'লাবা বসে গেলেন। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে নবুওয়াত বিদ্যমান থাকবে, যতকাল আল্লাহ্ চান তা থাকবে। অতঃপর যখন তিনি চান, তখন তিনি তা উঠিয়ে নিবেন। অতঃপর নবুওয়াতের পদ্ধতির উপর (প্রতিষ্ঠিত) খিলাফত হবে, যতকাল আল্লাহ্ চান তা থাকবে। অতঃপর যখন আল্লাহ্ চান, তখন তিনি তা উঠিয়ে নিবেন। অতঃপর যুলুমপূর্ণ শাসন (শক্ত কামড়ে ধরে থাকা রাজত্ব) হবে, যতকাল আল্লাহ্ চান তা থাকবে। অতঃপর যখন আল্লাহ্ চান, তখন তিনি তা উঠিয়ে নিবেন। অতঃপর স্বৈরশাসন (জবরদস্তিমূলক রাজত্ব) হবে, যতকাল আল্লাহ্ চান তা থাকবে। অতঃপর যখন তিনি চান, তখন তিনি তা উঠিয়ে নিবেন। অতঃপর নবুওয়াতের পদ্ধতির উপর (প্রতিষ্ঠিত) খিলাফত হবে।" অতঃপর তিনি নীরব হলেন।
হাবীব বলেন: যখন উমার ইবনু আব্দুল আযীয (খিলাফতের দায়িত্ব) নিলেন, তখন ইয়াযীদ ইবনু নু'মান ইবনু বাশীর তাঁর সহচরদের মধ্যে ছিলেন। আমি এই হাদীসটি স্মরণ করিয়ে দেওয়ার জন্য তাঁর কাছে লিখলাম। আমি তাঁকে বললাম: আমি আশা করি যে, আমীরুল মু'মিনীন—অর্থাৎ উমার (ইবনু আব্দুল আযীয)—তিনি যুলুমপূর্ণ শাসন ও স্বৈরশাসনের পরে (আসা খলীফা)। অতঃপর আমার চিঠিটি উমার ইবনু আব্দুল আযীযের কাছে প্রবেশ করানো হলো। তিনি তাতে খুশি হলেন এবং বিস্মিত হলেন।
7532 - عن أبي برزة يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الأئمة من قريش إذا استرحموا رحموا، وإذا عاهدوا وفوا، وإذا حكموا عدلوا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة الله
والملائكة والناس أجمعين".
حسن: رواه أحمد (19777) عن سليمان بن داود - هو الطيالسي - حدثنا سكين، حدثنا سيار بن سلامة سمع أبا برزة يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال .. فذكره.
ورواه أحمد (19805)، وأبو يعلى (3645) كلاهما من وجهين آخرين عن سكين بن عبد العزيز، عن سيار بن سلامة أبي المنهال الرياحي قال: دخلت مع أبي على أبي برزة الأسلمي وإن في أذني يومئذ لقرطين قال وإني لغلام قال فقال أبو برزة: إني أحمد الله أني أصبحت لائما لهذا الحي من قريش، فلان هاهنا يقاتل على الدنيا، وفلان هاهنا يقاتل على الدنيا - يعني عبد الملك بن مروان - قال: حتى ذكر ابن الأزرق قال: ثم قال: إن أحب الناس إلى لهذه العصابةُ الملبدة الخميصة بطونهم من أموال المسلمين والخفيفة ظهورهم من دمائهم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأمراء من قريش، الأمراء من قريش، الأمراء من قريش، لي عليهم حق ولهم عليكم حق ما فعلوا ثلاثا: ما حكموا فعدلوا، واستُرحِموا فرحموا، وعاهدوا فوفوا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين".
وإسناده حسن من أجل سكين بن عبد العزيز العبدي العطار البصري فإنه مختلف فيه وثّقه وكيع، وابن معين، والنسائي. وقال ابن خزيمة: لا أعرفه ولا أعرف أباه وقال في موضع آخر:"أنا بريء من عهدته، ومن عهدة أبيه".
قلت: وقد عرفه تلميذه ابن حبان كما عرفه من قبلهما ووثقوه أو ضعّفوه وقد يكون الضعف ممن روى عنه كما قال ابن عدي، وإلا فهو لا بأس به.
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নেতৃবৃন্দ (বা ইমামগণ) কুরাইশদের মধ্য থেকে হবে। যখন তাদের কাছে দয়া চাওয়া হবে, তখন তারা দয়া করবে। যখন তারা চুক্তি করবে, তখন তা পূর্ণ করবে। আর যখন তারা বিচার করবে, তখন ন্যায়বিচার করবে। তাদের মধ্যে যে তা (এই কাজগুলো) করবে না, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতাগণ এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ।"
7533 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأمراء من قريش ما عملوا فيكم بثلاث: ما رحموا إذا استُرحموا، وأقسطوا إذا قسموا، وعدَلوا إذا حكموا".
حسن: رواه الحاكم (4/ 501) واليهقي (8/ 144) كلاهما من حديث الصعق بن حزن، ثنا علي بن الحكم البناني، عن أنس بن مالك رضي الله عنه قال .. فذكره.
هذا لفظ الحاكم وفي لفظ البيهقي:"الأمراء من قريش الأمراء من قريش الأمراء من قريش، ولي عليهم حق ولكم عليهم حق ما عملوا فيكم بثلاث" .. فذكر الحديث.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
وإسناده حسن من أجل الصعق بن حزن البكري ثم العيشي فإنه مختلف فيه، فضعّفه الدارقطني، ومشّاه الآخرون وهو حسن الحديث.
ولحديث أنس طرق أخرى:
منها: ما رواه أبو داود الطيالسي (2247)، وأبو يعلى (3644) والبزار (كشف الأستار 1578)، والبيهقي (8/ 144) كلهم من طرق عن إبراهيم بن سعد عن أبيه، عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم -
قال:"الأئمة من قريش، إذا حكموا عدلوا، وإذا عاهدوا وفوا، وإن استرحموا رحموا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منهم صرف ولا عدل".
وفيه انقطاع؛ فإن والد إبراهيم - وهو سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف الزهري - لم يدرك أنسا.
قال ابن المديني: لم يلق سعد بن إبراهيم أحدًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وقال البزار: لا نعلم أسند سعد عن أنس إلا هذا.
ومنها: ما رواه بكير بن وهب الجزري قال: قال لي أنس بن مالك: أحدثك حديثا ما أحدثه كل أحد: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على باب البيت ونحن فيه فقال:"الأئمة من قريش، إن لهم عليكم حقا، ولكم عليهم حقا مثل ذلك ما إن استرحموا فرحموا، وإن عاهدوا وفوا، وإن حكموا عدلوا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين".
رواه أحمد (12307) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن سهل أبي الأسد قال: حدثني بكير بن وهب الجزري .. فذكره.
كذا قال شعبة:"علي أبو الأسد" وقال الأعمش ومسعر:"سهل أبو سعد" قال البيهقي (8/ 144):"الصحيح ما رواه الأعمش ومسعر وهو سهل القراري من بني قرار يكنى أبا أسد".
وفي الإسناد: بكير بن وهب الجزري قال الأزدي: ليس بالقوي. وذكره ابن حبان في ثقاته، والصحيح أنه مجهول.
وله أسانيد أخرى، وقد ذكرت أصحها، والخلاصة فيه أنه حديث حسن لمجيئه من طرق ليس فيها متهم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শাসকগণ কুরাইশ বংশের হবে, যতক্ষণ তারা তোমাদের মাঝে তিনটি কাজ করবে: যখন তাদের কাছে দয়া প্রার্থনা করা হবে, তখন তারা দয়া করবে; যখন তারা বণ্টন করবে, তখন ন্যায়পরায়ণতা প্রতিষ্ঠা করবে; আর যখন তারা বিচার করবে, তখন ইনসাফ করবে।"
7534 - عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الأئمة من قريش".
حسن: رواه الطبراني في الصغير (425)، والحاكم (4/ 75 - 76)، والبيهقي (8/ 143) كلهم من حديث فيض بن الفضل البجلي، حدثنا مسعر بن كدام، عن سلمة بن كهيل، عن أبي صادق، عن ربيعة بن ناجد، عن علي بن أبي طالب .. فذكره. قال الطبراني:"لم يروه عن مسعر إلا فيض".
قلت: فيض بن الفضل هو البجلي كوفي أبو محمد روي عن جمع، وروى عنه أبو حاتم الرازي، وعباس بن محمد الدوري وغيرهما.
ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (7/ 88) وقال: سمعت أبي يقول: كتبت عنه سنة مائتين وأربع عشرة. وقال: روى عنه جماعة ذكرهم ومنهم أبوه فمثله لا بأس به في الشواهد.
وأما مسعر بن كدام فهو ثقة ثبت.
واعلم أن حديث"الأئمة من قريش" حديث متواتر يقول الحافظ ابن حجر في الفتح (7/ 32):"وقد جمعت طرقه عن نحو أربعين صحابيا لما بلغني أن بعض فضلاء العصر ذكر أنه لم يرو إلا
عن أبي بكر الصديق".
قلت: هو يقصد به ما روي في معناه كما في أحاديث الصحيحين التي ليس فيها التصريح، ولكن فيها تلميح ولذا لم يخرج أحد من الشيخين بلفظ:"الأئمة من قريش" لأنه ليس على شرطهما.
وأما ما روي عن عبد الله بن أبي الهذيل قال: كان ناس من ربيعة عند عمرو بن العاص فقال رجل من بكر بن وائل: لتنتهين قريش أو ليجعلن الله هذا الأمر في جمهور من العرب غيرهم فقال عمرو بن العاص: كذبت، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"قريش ولاة الناس في الخير والشر إلى يوم القيامة".
فإسناده قوي غير أن قوله:"إلى يوم القيامة" غير محفوظ.
رواه الترمذي (2227)، وأحمد (17808) كلاهما من طريق شعبة، عن حبيب بن الزبير، قال: سمعت عبد الله بن أبي الهذيل قال .. فذكره. وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب".
وكذلك لا يصح ما روي عن عتبة بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الخلافة في قريش، والحكم في الأنصار، والدعوة في الحبشة، والهجرة في المسلمين والمهاجرين بعد".
رواه أحمد (17654)، وابن أبي عاصم في السنة (1148)، والطبراني في الكبير (17/ 121) كلهم من طرق عن إسماعيل بن عياش، ثنا ضمضم بن زرعة - هو الحمصي - عن شريح بن عبيد، عن كثير بن مرة، عن عتبة بن عبد قال .. فذكره.
وفيه إسماعيل بن عياش روايته عن أهل بلده مستقيمة وهذه منها، ولكنه تفرد بهذا السياق من المتن ولم يتابع عليه كما أن في السند شيخه ضمضم بن زرعة مختلف فيه فضعفه أبو حاتم وغيره، ولعل هذه الرواية من أوهامه. والله أعلم.
وبمعناه روي أيضا عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الملك في قريش والقضاء في الأنصار، والأذان في الحبشة، والأمانة في الأزد يعني اليمن". إلا أنه مرسل.
رواه الترمذي (3936)، وابن أبي شيبة (33062)، وأحمد (8761) كلهم من حديث زيد بن حباب، ثنا معاوية بن صالح، ثنا أبو مريم الأنصاري، عن أبي هريرة قال .. فذكره مرفوعا.
وهذا لفظ الترمذي، وعند ابن أبي شيبة:"والسرعة في اليمن" بدل"والأمانة في الأزد". وعند أحمد الجمع بينهما:"والأذان في الحبشة، والسرعة في اليمن" وقال زيد مرة يحفظه:"والأمانة في الأزد" والحديث هكذا رواه زيد بن حباب مرفوعا من مسند أبي هريرة.
وخالفه عبد الرحمن بن مهدي: فرواه عن معاوية بن صالح، عن أبي مريم الأنصاري عن أبي هريرة نحوه ولم يرفعه. أخرج حديثه الترمذي (3936/ م) وقال:"هذا أصح من حديث زيد بن حباب".
قلت: وهو كذلك فعبد الرحمن بن مهدي أحفظ وأتقن من زيد بن حباب فروايته أرجع. والله أعلم.
وفي الباب ما روي عن مسروق قال: كنا جلوسا عند عبد الله بن مسعود وهو يقرئنا القرآن فقال له رجل: يا أبا عبد الرحمن هل سألتم رسول الله صلى الله عليه وسلم كم تملك هذه الأمة من خليفة؟ فقال عبد الله بن مسعود: ما سألني عنها أحد منذ قدمت العراق قبلك ثم قال نعم، ولقد سألنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"اثنا عشر كعدة نقباء بني إسرائيل".
رواه أحمد (3781)، والبزار (كشف الأستار 1857)، والحاكم (4/ 501) من طريق حماد بن زيد، عن المجالد، عن الشعبي، عن مسروق .. فذكره.
وفي إسناده مجالد وهو ابن سعيد الهمداني ضعبف باتفاق أهل العلم.
وقال البزار: لا نعلم له إسنادا عن عبد الله أحسن من هذا على أن مجالدًا تكلم فيه أهل العلم.
আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ইমামগণ (বা শাসকবৃন্দ) কুরাইশদের মধ্য থেকে হবে।"
7535 - عن الحارث بن أبي الحارث، وكثير بن مرة، وعمرو بن الأسود، وأبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن خيار أئمة قريش خيار أئمة الناس".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (8/ 128)، والبخاري في التاريخ الكبير (2/ 262) كلاهما من حديث إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن الحارث بن الحارث، وكثير بن مرة، وعمرو بن الأسود وأبي أمامة .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فإنه صدوق في روايته عن أهل الشام وضمضم منهم وهو حسن الحديث.
والحديث موصول من جهة الحارث بن الحارث وأبي أمامة، ومرسل من جهة كثير بن مرة وعمرو بن الأسود.
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (5/ 195):"رواه الطبراني، وإسناده حسن.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই কুরাইশদের উত্তম নেতৃবৃন্দই হলেন মানুষদের উত্তম নেতৃবৃন্দ।"
7536 - عن سعيد بن جمهان، عن سفينة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خلافة النبوة ثلاثون سنة، ثم يؤتي الله الملك أو ملكه من يشاء".
قال سعيد: قال لي سفينة: أمسك عليك: أبو بكر سنتين، وعمر عشرًا، وعثمان اثنتي عشر، وعلي كذا.
قال سعيد: قلت لسفينة: إن هولاء يزعمون أن عليا لم يكن بخليفة قال: كذبت أستاه بني الزرقاء - يعني بني مروان. هذا لفظ أبي داود.
ولفظ أحمد: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخلافة ثلاثون عاما، ثم يكون بعد ذلك
الملك".
قال سفينة: أمسك خلافة أبي بكر سنتين، وخلافة عمر عشر سنين، وخلافة عثمان اثنتي عشرة سنة، وخلافة علي ست سنين.
حسن: رواه أبو داود (4646، 4647)، والترمذي (2226)، وأحمد (21919، 21923، 21928)، وصححه ابن حبان (6943)، والحاكم (3/ 71، 145) كلهم من طرق عن سعيد بن جمهان - عن سفينة فذكره. ومنهم من ذكر المرفوع فقط.
وإسناده حسن من أجل سعيد بن جمهان؛ فإنه حسن الحديث، وفي حديثه عجائب كما قال البخاري.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن قد رواه غير واحد عن سعيد بن جمهان، ولا نعلمه إلا من حديثه".
وقال الخلال في السنة (636):"سمعت أبا بكر بن صدقة يقول: سمعت غير واحد من أصحابنا وأبا القاسم بن الجبلي غير مرة أنهم حضروا أبا عبد الله سئل عن حديث سفينة فصحّحه، فقال رجل: سعيد بن جمهان كأنه يضعفه. فقال أبو عبد الله: يا صالح خذ بيده أراه قال: أخرجه هذا يريد الطعن في حديث سفينة" اهـ.
সফিনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবুওয়াতের খিলাফত ত্রিশ বছর। এরপর আল্লাহ যাকে ইচ্ছা রাজত্ব (বা তাঁর রাজত্ব) দান করেন।"
সাঈদ (ইবনু জুমহান) বলেন, সফিনা আমাকে বললেন: তুমি হিসাব করো: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দুই বছর, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দশ বছর, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বারো বছর, এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এতো (সময়)।
সাঈদ বলেন, আমি সফিনাকে বললাম: নিশ্চয়ই এরা (কেউ কেউ) দাবি করে যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা ছিলেন না। তিনি (সফিনা) বললেন: বানু যারকার পিছনের অংশ মিথ্যা বলেছে—অর্থাৎ বানী মারওয়ান। এটি আবূ দাউদের শব্দ।
আর আহমাদ (ইবনু হাম্বাল)-এর শব্দে (বর্ণনা): রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খিলাফত হবে ত্রিশ বছর। এরপর এর পরে রাজত্ব (বাদশাহী) হবে।"
সফিনা বললেন: তুমি হিসাব করো: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত দুই বছর, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত দশ বছর, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত বারো বছর এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত ছয় বছর।
7537 - عن عبد الله بن عمر قال: قيل لعمر: ألا تستخلف؟ قال: إن أستخلف فقد استخلف من هو خير مني أبو بكر، وإن أترك فقد ترك من هو خير مني رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأثنوا عليه فقال: راغب راهب، وددت أني نجوتُ منها كفافا لا لي ولا علي، لا أتحملها حيا ولا ميتا.
متفق عليه: رواه البخاري في الأحكام (7218)، ومسلم في الإمارة (1823: 11) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি আপনার স্থলাভিষিক্ত (খলিফা) নিযুক্ত করবেন না? তিনি বললেন: যদি আমি স্থলাভিষিক্ত নিযুক্ত করি, তবে আমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তি (আবু বকর)ও তা করেছিলেন। আর যদি আমি (স্থলাভিষিক্ত না করে) ছেড়ে দিই, তবে আমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তি (আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)ও তা করেছিলেন। এরপর লোকেরা তাঁর প্রশংসা করলো। তখন তিনি বললেন: (আমি) আশান্বিতও নই, ভীতও নই। আমার আকাঙ্ক্ষা, আমি যেন এই দায়িত্ব থেকে সমান সমান (ক্যাফাফান) রক্ষা পাই—যেন আমার পক্ষেও কিছু না থাকে, আর বিপক্ষেও কিছু না থাকে। আমি জীবিত অবস্থায় বা মৃত অবস্থায় এর (দায়িত্বের) ভার বহন করতে চাই না।
7538 - عن ابن عمر قال: دخلتُ على حفصة، فقالت: أعلمتِ أن أباك غير مستخلف؟ قال: قلت: ما كان ليفعل، قالت: إنه فاعل قال: فحلفت أني أكلمه في ذلك فسكت، حتى غدوت، ولم أكلمه قال: فكنت كأنما أحمل بيميني جبلا حتى رجعت، فدخلت عليه، فسألني عن حال الناس، وأنا أخبره قال: ثم قلت له: إني سمعت الناس يقولون مقالة، فآليت أن أقولها لك، زعموا أنك غير مستخلف، وإنه لو كان لك راعي إيل أو راعي غنم ثم جاءك وتركها، رأيت أن قد ضيع، فرعاية الناس أشد
قال: فوافقه قولي، فوضع رأسه ساعة ثم رفعه إلي فقال: إن الله عز وجل يحفظ، وإني لئن لا أستخلف فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يستخلف، وإن أستخلف فإن أبا بكر قد استخلف قال: فوالله ما هو إلا أن ذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا بكر فعلمت أنه لم يكن ليعدل برسول الله صلى الله عليه وسلم أحدًا، وأنه غير مستخلف.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1823: 12) من طريق عبد الرزاق أخبرنا عن الزهري، أخبرني سالم، عن ابن عمر قال فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হাফসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট প্রবেশ করলাম। তখন তিনি বললেন: তুমি কি জানো, তোমার পিতা (উমার) কাউকে স্থলাভিষিক্ত করবেন না? আমি বললাম: তিনি এটা করবেন না। তিনি (হাফসা) বললেন: তিনি অবশ্যই এটা করবেন (অর্থাৎ কাউকে খলিফা নিযুক্ত করবেন না)।
আমি কসম করলাম যে, আমি এ বিষয়ে তাঁর সাথে কথা বলব। কিন্তু আমি চুপ করে থাকলাম এবং সকালে তাঁর কাছে গেলাম, তবুও আমি তাঁর সাথে কথা বললাম না। আমি এমন অনুভব করছিলাম যেন আমার ডান হাতে একটি পাহাড় বহন করছি। অবশেষে আমি (দুপুরের পর) ফিরে আসলাম এবং তাঁর নিকট প্রবেশ করলাম। তিনি আমাকে মানুষের অবস্থা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন, আর আমি তাঁকে সেই বিষয়ে জানালাম।
এরপর আমি তাঁকে বললাম: আমি মানুষের মুখে একটি কথা শুনেছি, আর আমি কসম করেছি যে আমি আপনাকে সেটা বলব। তারা মনে করে যে, আপনি কাউকে স্থলাভিষিক্ত করবেন না। যদি আপনার উট বা মেষের একজন রাখালও থাকত এবং সে এসে সেগুলোকে ছেড়ে দিত, তবে আপনি মনে করতেন যে সে (রাখাল) দায়িত্ব নষ্ট করেছে। অথচ মানুষের নেতৃত্ব (বাস্তবে) এর চেয়েও কঠিন।
তিনি (উমার) বললেন: আমার কথাটি তাঁর মনঃপূত হলো। তিনি কিছুক্ষণ মাথা নিচু করে রাখলেন, অতঃপর আমার দিকে মাথা তুলে বললেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা (দ্বীনকে) রক্ষা করেন। আর যদি আমি কাউকে স্থলাভিষিক্ত নাও করি, তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও কাউকে স্থলাভিষিক্ত করেননি। আর যদি আমি কাউকে স্থলাভিষিক্ত করি, তবে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্থলাভিষিক্ত করেছিলেন।
আল্লাহর কসম! তিনি যখনই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা উল্লেখ করলেন, তখনই আমি বুঝে গেলাম যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সমতুল্য কাউকে মনে করতেন না এবং তিনি কাউকে স্থলাভিষিক্ত করবেন না।
7539 - عن عمرو بن ميمون الأودي قال: رأيت عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: يا عبد الله بن عمر اذهب إلى أم المؤمنين عائشة رضي الله عنها فقل: يقرأ عمر بن الخطاب عليك السلام، ثم سلْها أن أدفن مع صاحبيَّ قالت: كنت أريده لنفسي، فلأوثرنه اليوم على نفسي، فلما أقبل قال له: ما لديك؟ قال: أذنت لك يا أمير المؤمنين قال: ما كان شيء أهم إلي من ذلك المضجع، فإذا قبضت فاحملوني، ثم سلموا، ثم قل: يستأذن عمر بن الخطاب فإن أذنت لي فادفنوني وإلا فردوني إلى مقابر المسلمين إني لا أعلم أحدًا أحق بهذا الأمر من هؤلاء النفر الذين توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو عنهم راض، فمن استخلفوا بعدي فهو الخليفة، فاسمعوا له وأطيعوا فسمي عثمان، وعليا، وطلحة، والزبير، وعبد الرحمن بن عوف، وسعد بن أبي وقاص، وولج عليه شاب من الأنصار فقال: أبشر يا أمير المؤمنين ببشرى الله كان لك من القدم في الإسلام ما قد علمت، ثم استخلفت فعدلت، ثم الشهادة بعد هذا كله فقال: ليتني يا ابن أخي وذلك كفافا لا علي ولا لي، أوصي الخليفة من بعدي بالمهاجرين الأولين خيرًا أن يعرف لهم حقهم، وأن يحفظ لهم حرمتهم، وأوصيه بالأنصار خيرًا {وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالْإِيمَانَ} [الحشر: 9] أن يقبل من محسنهم ويعفي عن مسيئهم. وأوصيه بذمة الله وذمة رسوله صلى الله عليه وسلم أن يوفي لهم بعهدهم، وأن يقاتل من ورائهم، وأن لا يكلفوا فوق طاقتهم".
صحيح: رواه البخاري في الزكاة (1392) عن قتيبة، حدثنا جرير بن عبد الحميد حدثنا حصين بن عبد الرحمن، عن عمرو بن ميمون الأودي .. فذكره.
আমর ইবনে মাইমুন আল-আউদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম। তিনি বললেন, হে আবদুল্লাহ ইবনে উমর! তুমি উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাও এবং বলো: উমর ইবনুল খাত্তাব আপনাকে সালাম পৌঁছে দিচ্ছেন, তারপর তাঁর কাছে অনুমতি চাও যে, আমি যেন আমার দুই সঙ্গীর সাথে দাফন হতে পারি। তিনি (আয়িশা) বললেন: আমি তো ঐ স্থানটি নিজের জন্য চেয়েছিলাম। কিন্তু আজ আমি তাকে আমার নিজের উপর প্রাধান্য দেব। যখন সে (আব্দুল্লাহ ইবনে উমর) ফিরে আসল, তখন তিনি (উমর) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: তোমার জন্য কী খবর আছে? সে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন, তিনি আপনাকে অনুমতি দিয়েছেন। তিনি বললেন: ঐ শয়নস্থানের চেয়ে আমার কাছে অধিক গুরুত্বপূর্ণ আর কিছু ছিল না। যখন আমার রূহ কবজ করা হবে, তখন তোমরা আমাকে বহন করে নিয়ে যাবে, তারপর সালাম দেবে এবং বলবে: উমর ইবনুল খাত্তাব (দাফনের) অনুমতি চাচ্ছেন। যদি তিনি (আয়িশা) আমাকে অনুমতি দেন, তবে আমাকে সেখানে দাফন করবে। অন্যথায় আমাকে মুসলমানদের সাধারণ কবরস্থানে ফিরিয়ে নিয়ে যাবে।
তিনি আরো বললেন: আমি জানি না যে এই কাজের (খিলাফতের) জন্য ঐ সকল লোকদের চেয়ে আর কেউ বেশি উপযুক্ত আছে কিনা, যাদের থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সন্তুষ্ট থাকা অবস্থায় ইন্তিকাল করেছেন। আমার পরে তাঁরা যাদের খলীফা বানাবেন, তিনিই হবেন খলীফা। অতএব তোমরা তাঁর কথা শুনবে এবং তাঁকে মান্য করবে। অতঃপর তিনি উসমান, আলী, তালহা, যুবাইর, আবদুর রহমান ইবনে আওফ ও সা'দ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করলেন।
এ সময় আনসারদের মধ্য থেকে এক যুবক তাঁর নিকট প্রবেশ করল এবং বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! আল্লাহর পক্ষ থেকে সুসংবাদের জন্য আনন্দিত হোন। ইসলামে আপনার যে অগ্রগামিতা ছিল, তা আপনি জানেন। তারপর আপনি খলীফা হয়ে ইনসাফ প্রতিষ্ঠা করেছেন। আর এত কিছুর পর এই শাহাদাত লাভ করলেন। তিনি বললেন: হে ভাতিজা! যদি আমি এর বিনিময়ে বরাবর (বেঁচে) যাই—আমার উপরও না, আমার পক্ষেও না (অর্থাৎ, সমান সমান), তাহলেই যথেষ্ট।
আমি আমার পরের খলীফাকে প্রথম যুগের মুহাজিরদের প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি—যেন তিনি তাঁদের অধিকারকে স্বীকৃতি দেন এবং তাঁদের মর্যাদা রক্ষা করেন। আর আমি তাঁকে আনসারদের প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি— {এবং যারা তাদের পূর্বেই এ নগরী (মদীনা) ও ঈমানকে নিজেদের আবাসস্থল বানিয়ে নিয়েছে} [সূরা হাশর: ৯] যেন তিনি তাঁদের নেককারদের সৎকাজ কবুল করেন এবং তাঁদের মধ্যে যারা ভুল করবে, তাদের ক্ষমা করে দেন। আর আমি তাঁকে আল্লাহর যিম্মা ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যিম্মায় থাকা লোকজনের (অমুসলিম চুক্তিবদ্ধ নাগরিকদের) প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি—যেন তিনি তাদের সাথে করা অঙ্গীকার পূর্ণ করেন, তাদের পশ্চাতে থেকে তাদের জন্য লড়াই করেন এবং তাদের উপর যেন তাদের সাধ্যের অতিরিক্ত কিছু চাপিয়ে না দেওয়া হয়।
7540 - عن المسور بن مخرمة: أن الرهط الذين ولاهم عمر، اجتمعوا فتشاوروا، فقال لهم عبد الرحمن: لست بالذي أنافسكم على هذا الأمر، ولكنكم إن شئتم اخترت لكم منكم، فجعلوا ذلك إلى عبد الرحمن، فلما ولّوا عبد الرحمن أمرهم، فمال الناس على عبد الرحمن حتى ما أرى أحدًا من الناس يتبع أولئك الرهط، ولا يطأ عقبه ومال
الناس على عبد الرحمن يشاورونه تلك الليالي، حتى إذا كانت الليلة التي أصبحنا منها، فبايعنا عثمان.
قال المسور: طرقني عبد الرحمن بعد هجع من الليل، فضرب الباب حتى استيقظت فقال: أراك نائما، فوالله ما اكتحلت هذه الليلة بكبير نوم، انطلق، فادع الزبير وسعدًا فدعوتهما له فشاورهما، ثم دعاني فقال: ادع لي عليا، فدعوته، فناجاه حتى ابهار الليل، ثم قام على من عنده وهو على طمع، وقد كان عبد الرحمن يخشي من علي شيئًا، ثم قال: ادع لي عثمان، فدعوته، فناجاه حتى فرق بينهما المؤذن بالصبح، فلما صلى للناس الصبح، واجتمع أولئك الرهط عند المنبر، فأرسل إلى من كان حاضرًا من المهاجرين والأنصار، وأرسل إلى أمراء الأجناد، وكانوا وافوا تلك الحجة مع عمر، فلما اجتمعوا تشهّد عبد الرحمن، ثم قال: أما بعد! يا علي، إني قد نظرت في أمر الناس، فلم أرهم يعدلون بعثمان، فلا تجعلنَّ على نفسك سبيلا، فقال: أبايعك على سنة الله ورسوله، والخليفتين من بعده، فبايعه عبد الرحمن، وبايعه الناس المهاجرون، والأنصار، وأمراء الأجناد، والمسلمون".
صحيح: رواه البخاري في الأحكام (7207) عن عبد الله بن محمد بن أسماء حدثنا جويرية، عن مالك، عن الزهري، أن حميد بن عبد الرحمن، أخبره أن المسور بن مخرمة أخبره .. فذكره.
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাদেরকে দায়িত্ব দিয়েছিলেন, সেই দলটি একত্রিত হলো এবং পরামর্শ করলো। তখন আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে বললেন: আমি তোমাদের সাথে এই বিষয়ে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করব না, তবে তোমরা যদি চাও, আমি তোমাদের মধ্য থেকে তোমাদের জন্য একজনকে নির্বাচন করব। তখন তারা এই বিষয়টি আবদুর রহমানের ওপর ছেড়ে দিল। যখন তারা আবদুর রহমানের উপর তাদের দায়িত্বভার অর্পণ করল, তখন লোকেরা আবদুর রহমানের দিকে ঝুঁকে পড়ল। এমনকি আমি দেখলাম যে, ওই দলের কাউকে কেউ অনুসরণ করছে না এবং তাদের পদচিহ্নও মাড়াচ্ছে না। লোকেরা আবদুর রহমানের দিকে ঝুঁকতে লাগল এবং ওই রাতগুলোতে তারা তাঁর সাথে পরামর্শ করতে থাকল, যতক্ষণ না সেই রাত এলো, যার সকালে আমরা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে বাইআত (আনুগত্যের শপথ) করলাম।
মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাতের কিছু অংশ অতিবাহিত হওয়ার পর আবদুর রহমান আমার কাছে এলেন এবং দরজায় আঘাত করলেন যতক্ষণ না আমি জেগে উঠলাম। তিনি বললেন: আমি দেখছি তুমি ঘুমাচ্ছো। আল্লাহর কসম! এই রাতে আমি সামান্য পরিমাণ ঘুমও চোখে দিতে পারিনি। যাও, যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনো। আমি তাদের দু’জনকে তাঁর কাছে ডেকে আনলাম। তিনি তাদের দুজনের সাথে পরামর্শ করলেন। এরপর তিনি আমাকে ডেকে বললেন: আমার জন্য ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনো। আমি তাঁকে ডেকে আনলাম। তিনি তাঁর সাথে চুপিচুপি কথা বললেন, যতক্ষণ না রাত প্রায় শেষ হয়ে গেল। এরপর ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চলে গেলেন, অথচ তিনি খিলাফতের আকাঙ্ক্ষা করছিলেন (এবং আবদুর রহমান তাঁকে নিয়ে কিছু বিষয়ে চিন্তিত ছিলেন)। এরপর তিনি (আবদুর রহমান) বললেন: আমার জন্য ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনো। আমি তাঁকে ডেকে আনলাম। তিনি তাঁর সাথেও চুপিচুপি কথা বললেন, যতক্ষণ না ফজরের মুয়াজ্জিন তাদের দুজনের মাঝে ব্যবধান তৈরি করলেন (অর্থাৎ আযান দিলেন)।
এরপর যখন তিনি (আবদুর রহমান) লোকদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন এবং সেই দলটি মিম্বরের কাছে একত্রিত হলো, তখন তিনি উপস্থিত সকল মুহাজির ও আনসারকে ডাকলেন এবং বিভিন্ন সেনাদলের আমিরদেরও ডাকলেন—যারা সেই বছর হাজ্জের জন্য উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে এসেছিলেন। যখন সবাই একত্রিত হলো, তখন আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত (তাশাহহুদ) পাঠ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: 'আম্মা বা‘দ! হে ‘আলী! আমি মানুষের বিষয়ে গভীরভাবে লক্ষ্য করেছি এবং দেখেছি যে, তারা ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমকক্ষ আর কাউকে মনে করে না। সুতরাং তুমি নিজের উপর (বিদ্রোহের) পথ তৈরি করো না। তখন ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত এবং তাঁর পরবর্তী দুই খলীফার (অর্থাৎ আবূ বকর ও উমরের) সুন্নাত অনুযায়ী আপনার হাতে বাইআত করছি। তখন আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাতে বাইআত করলেন এবং অতঃপর জনগণ—মুহাজির, আনসার, সেনাদলের আমিরগণ ও অন্যান্য সকল মুসলিম—তাঁর হাতে বাইআত করল।
7541 - عن عمرو بن ميمون قال: فلما قبض - يعني عمر بن الخطاب - خرجنا به، فانطلقنا نمشي، فسلم عبد الله بن عمر قال: يستأذن عمر بن الخطاب قالت: أدخلوه، فأدخل، فوضع هنالك مع صاحبيه، فلما فرغ من دفنه اجتمع هؤلاء الرهط فقال عبد الرحمن: اجعلوا أمركم إلى ثلاثة منكم، فقال الزبير: قد جعلت أمري إلى علي، فقال طلحة: قد جعلت أمري إلى عثمان، وقال سعد: قد جعلت أمري إلى عبد الرحمن بن عوف فقال عبد الرحمن: أيكما تبرأ من هذا الأمر، فنجعله إليه، والله عليه والإسلام، لينظرن أفضلهم في نفسه، فأسكت الشيخان، فقال عبد الرحمن: أفتجعلونه إلي، والله على أن لا آل عن أفضلكم؟ قالا: نعم فأخذ بيد أحدهما، فقال: لك قرابة من رسول الله صلى الله عليه وسلم، والقدم في الإسلام ما قد علمت، فالله عليك لئن أمرتك لتعدلن، ولئن أمرت عثمان، لتسمعن ولتطيعن، ثم خلا بالآخر، فقال له: مثل ذلك، فلما أخذ الميثاق قال: ارفع يدك يا عثمان، فبايعه فبايع له علي، وولج أهل الدار فبايعوه.
صحيح: رواه البخاري في فضائل أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم (3700) عن موسى بن إسماعيل حدثنا أبو عوانة، عن حصين، عن عمرو بن ميمون قال .. فذكر الحديث بطوله، وفيه قصة مقتل عمر رضي الله عنه.
আমর ইবনু মাইমুন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তাঁকে (অর্থাৎ উমার ইবনুল খাত্তাবকে) দাফনের জন্য তুলে নেওয়া হলো, আমরা তাঁকে নিয়ে চললাম এবং হেঁটে অগ্রসর হতে লাগলাম। অতঃপর আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (উম্মুল মুমিনীন হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে সালাম দিলেন এবং বললেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (داخل হওয়ার) অনুমতি চাচ্ছেন। তিনি (উম্মুল মুমিনীন) বললেন: তাঁকে প্রবেশ করাও। অতঃপর তাঁকে প্রবেশ করানো হলো এবং সেখানে তাঁর দুই সঙ্গীর (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) পাশে রাখা হলো।
যখন তাঁর দাফন সম্পন্ন হলো, তখন এই দলটি (শূরার সদস্যগণ) একত্রিত হলেন। আবদুর রহমান (ইবনু আওফ) বললেন: তোমরা তোমাদের বিষয়টি তোমাদের মধ্য থেকে তিনজনের হাতে অর্পণ করো। তখন যুবাইর বললেন: আমি আমার বিষয়টি আলীর হাতে অর্পণ করলাম। তালহা বললেন: আমি আমার বিষয়টি উসমানের হাতে অর্পণ করলাম। আর সা‘দ বললেন: আমি আমার বিষয়টি আবদুর রহমান ইবনু আওফের হাতে অর্পণ করলাম।
অতঃপর আবদুর রহমান বললেন: তোমাদের দুজনের মধ্যে কে এই দায়িত্ব থেকে অব্যাহতি চাও, যাতে আমরা বিষয়টি তার কাছে অর্পণ করতে পারি? আল্লাহ তার ওপর এবং ইসলামের ওপর আছেন (সাক্ষী হিসেবে), যে সে যেন তাদের মধ্যে নিজ দৃষ্টিতে সর্বোত্তম, তার দিকে দৃষ্টি রাখে। কিন্তু সেই দুজন (উসমান ও আলী) চুপ থাকলেন। তখন আবদুর রহমান বললেন: তোমরা কি বিষয়টি আমার ওপর ন্যস্ত করবে? আর আল্লাহ আমার ওপর সাক্ষী যে আমি তোমাদের মধ্যে সর্বোত্তম ব্যক্তিকে নির্বাচন করতে কোনো ত্রুটি করব না? তারা দুজন বললেন: হ্যাঁ।
অতঃপর তিনি তাদের দুজনের একজনের হাত ধরলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আপনার যে আত্মীয়তা এবং ইসলামের ক্ষেত্রে আপনার যে অগ্রগামিতা, তা আপনি অবগত। আল্লাহ আপনার ওপর (সাক্ষী), আমি যদি আপনাকে আমীর নিযুক্ত করি, তবে আপনি অবশ্যই ইনসাফ প্রতিষ্ঠা করবেন। আর যদি উসমানকে আমীর নিযুক্ত করি, তবে আপনি অবশ্যই শুনবেন এবং আনুগত্য করবেন। অতঃপর তিনি অপরজনের সাথে একান্তে আলোচনা করলেন এবং তাকেও অনুরূপ কথা বললেন।
যখন তিনি অঙ্গীকার নিলেন, তখন বললেন: হে উসমান, আপনার হাত তুলুন। অতঃপর তিনি (আবদুর রহমান) তাঁকে বাইআত করলেন। আর আলীও তাঁর পক্ষে বাইআত করলেন। এরপর ঘরের সবাই ভেতরে প্রবেশ করে তাঁকে বাইআত করল।
7542 - عن معدان بن أبي طلحة: أن عمر بن الخطاب خطب يوم الجمعة فذكر نبي الله صلى الله عليه وسلم، وذكر أبا بكر، قال: إني رأيت كأن ديكانقرني ثلاث نقرات، وإني لا أراه إلا حضور أجلي، وإن أقوامًا يأمرونني أن أستخلف، وإن الله لم يكن ليضيع دينه ولا خلافته، ولا الذي بعث به نبيه صلى الله عليه وسلم، فإن عجل بي أمر، فالخلافة شورى بين هؤلاء الستة الذين توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو عنهم راض، وإني قد علمت أن أقواما يطعنون في هذا الأمر، أنا ضربتهم بيدي هذه على الإسلام، فإن فعلوا ذلك فأولئك أعداء الله الكفرة الضلال.
صحيح: رواه مسلم في المساجد ومواضع الصلاة (567: 78) عن محمد بن المثنى حدثنا يحيى بن سعيد حدثنا هشام حدثنا قتادة عن سالم بن أبي الجعد عن معدان بن أبي طلحة .. فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জুমার দিন খুতবা দিলেন। তাতে তিনি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা উল্লেখ করলেন। অতঃপর বললেন: আমি স্বপ্নে দেখেছি, যেন একটি মোরগ আমাকে তিনবার ঠোকর মেরেছে। আমার মনে হয়, এটা আমার মৃত্যুর সময় আসন্ন হওয়া ছাড়া আর কিছু নয়। নিশ্চয় কিছু লোক আমাকে খলিফা নিয়োগ করতে বলছে, কিন্তু আল্লাহ তাঁর দীনকে, তাঁর খিলাফতকে এবং যা দিয়ে তিনি তাঁর নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরণ করেছেন, তাকে নষ্ট করবেন না। যদি আমার ব্যাপারটি দ্রুত ঘটে যায় (অর্থাৎ মৃত্যু হয়), তবে খিলাফত সেই ছয়জনের মধ্যে শূরা (পরামর্শ) দ্বারা নির্ধারিত হবে, যাদের ওপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকালের সময় সন্তুষ্ট ছিলেন। আমি নিশ্চিতভাবে জানি যে কিছু লোক এই বিষয়ে সমালোচনা করবে (বা আপত্তি জানাবে)। ইসলাম গ্রহণের জন্য আমি নিজ হাতে তাদেরকে আঘাত করেছিলাম। যদি তারা এরূপ করে, তবে তারা আল্লাহর শত্রু, পথভ্রষ্ট কাফির।
7543 - عن ابن عباس قال: قدم مسيلمة الكذاب على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعل يقول: إن جعل لي محمد الأمر من بعده تبعته، وقدمها في بشر كثير من قومه، فأقبل إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومعه ثابت بن قيس بن شماس، وفي يد رسول الله صلى الله عليه وسلم قطعة جريد، حتى وقف على مسيلمة في أصحابه، فقال:"لو سألتني هذه القطعة ما أعطيتكها، ولن تعدو أمر الله فيك، ولئن أدبرت ليعقرنك الله، وإني لأراك الذي أريت فيك ما رأيت".
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3620)، ومسلم في الرؤيا (2273: 21) كلاهما من طريق أبي اليمان، أخبرنا شعيب عن عبد الله بن أبي حسين، حدثنا نافع بن جبير، عن ابن عباس رضي الله عنهما قال .. فذكره.
ورواه البخاري (4378) عن ثلاثة من التابعين، وهم صالح بن كيسان، وعبد الله بن عبيدة، وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود مرسلًا:"أن مسيلمة لما قدم المدينة في دار بنت الحارث، وكان تحته بنت الحارث بن كريز، وهي أم عبد الله بن عامر فأتاه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومعه ثابت بن قيس بن شماس، وهو الذي يقال له: خطيب رسول الله صلى الله عليه وسلم" .. فذكر بقية الحديث مثله.
قوله:"إن جعل لي محمد الأمر من بعده" أي الخلافة.
وقول النبي صلى الله عليه وسلم:"إني لأراك الذي أريت فيك" يشير إلى الرؤيا التي رآها، وهي كما قال عبيد الله بن عبد الله: سألت عبد الله بن عباس عن رؤيا رسول الله صلى الله عليه وسلم التي ذكرها، فقال ابن عباس: ذكر
لي رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: بينا أنا نائم أريت أنه وضع في يدي سواران من ذهب ففظعتهما وكرهتهما فأذن لي فنفختهما فطارا، فأولتهما كذابين يخرجان" فقال عبيد الله: أحدهما العنسي الذي قتله فيروز باليمن، والآخر مسيلمة الكذاب. ذكره البخاري (4379).
وقوله:"في دار بنت الحارث، وأن تحته ابنة الحارث بن كريز" تحته أي تحت مسيلمة الكذاب قبل أن تتزوج بغيره، ولذا نزل مسيلمة مع قومه عندها. وكان عددهم سبعة عشر نفرًا. كما ذكره الواقدي.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মুসায়লামা কাযযাব (মিথ্যাবাদী) আগমন করে। সে বলতে শুরু করল: যদি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর পরে ক্ষমতা দেন, তবে আমি তাঁকে অনুসরণ করব। সে তার গোত্রের বহু লোককে সাথে নিয়ে এসেছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে এগিয়ে গেলেন, তাঁর সাথে ছিলেন সাবেত ইবনু ক্বায়স ইবনু শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে ছিল খেজুর গাছের ডালের একটি টুকরা। তিনি মুসায়লামা ও তার সঙ্গীদের কাছে গিয়ে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "তুমি যদি আমার কাছে এই টুকরাটিও চাইতে, তবে আমি তোমাকে দিতাম না। তোমার ব্যাপারে আল্লাহর ফয়সালার বাইরে তুমি যেতে পারবে না। আর যদি তুমি ফিরে যাও, তবে আল্লাহ তোমাকে অবশ্যই ধ্বংস করবেন। আমি তো তোমাকে সেই ব্যক্তিই মনে করছি, যাকে তোমার সম্পর্কে স্বপ্নে দেখানো হয়েছিল।"
7544 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما بعث الله من نبي ولا استخلف من خليفة إلا كانت له بطانتان: بطانة تأمره بالمعروف، وتحضه عليه، وبطانة تأمره بالشر، وتحضه عليه، فالمعصوم من عصم الله تعالى".
صحيح: رواه البخاري في الأحكام (7198) عن أصبغ، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.
وقال البخاري عقبه: وقال سليمان: عن يحيى، أخبرني ابن شهاب بهذا.
وعن ابن أبي عتيق، وموسى عن ابن شهاب مثله.
وقال شعيب: عن الزهري، حدثني أبو سلمة، عن أبي سعيد قوله.
وقال الأوزاعي ومعاوية بن سلام: حدثني الزهري، حدثني أبو سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وقال ابن أبي حسين وسعيد بن زياد: عن أبي سلمة، عن أبي سعيد قوله.
وقال عبيد الله بن أبي جعفر: حدثني صفوان، عن أبي سلمة، عن أبي أيوب قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ্ এমন কোনো নবী প্রেরণ করেননি বা কোনো খলীফাকে (শাসককে) স্থলাভিষিক্ত করেননি, যার জন্য দুটি ঘনিষ্ঠ উপদেষ্টা দল ছিল না: একটি উপদেষ্টা দল যা তাকে ভালো কাজের (নেক কাজের) নির্দেশ দেয় এবং তাতে উৎসাহিত করে, এবং অন্য একটি উপদেষ্টা দল যা তাকে খারাপ কাজের (মন্দ কাজের) নির্দেশ দেয় এবং তাতে উৎসাহিত করে। অতএব, (ঐ সময়ে) নিষ্পাপ (সুরক্ষিত) কেবল সেই, যাকে আল্লাহ তা‘আলা সুরক্ষা দান করেন।
7545 - عن أبي أيوب أنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما بعث من نبي ولا كان بعده من خليفة إلا وله بطانتان: بطانة تأمره بالمعروف وتنهاه عن المنكر، وبطانة لا تألوه خبالا، فمن وقي بطانة السوء فقد وقي".
صحيح: رواه النسائي (4203)، والطحاوي في شرح المشكل (2112)، والطبراني في الكبير (4/ 156) من طرق عن الليث - هو ابن سعد - عن عبيد الله بن أبي جعفر عن صفوان - هو ابن سُليم عن أبي سلمة، عن أبي أيوب .. فذكره.
وإسناده صحيح. وقد اختلف فيه على أبي سلمة، فرواه بعضهم عنه عن أبي أيوب. وبعضهم عنه عن أبي هريرة، وبعضهم عنه عن أبي سعيد. وقد قال الدارقطني في العلل (6/ 117 - 118)
بعد ذكر الاختلاف:"ولا يدفع حديث صفوان لجواز أن يكون أبو سلمة حفظه عن أبي أيوب، وعن أبي سعيد، وعن أبي هريرة والله أعلم".
আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো নবী প্রেরিত হননি এবং তাঁর পরে এমন কোনো খলিফা (শাসক) আসেননি, যার দু’টি অন্তরঙ্গ দল (বাটানাহ) ছিল না। একটি দল তাঁকে সৎকাজের আদেশ করে এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করে, আর অপর একটি দল তাঁকে দুর্নীতিগ্রস্ত করতে বিন্দুমাত্রও কসুর করে না। সুতরাং যে ব্যক্তি মন্দ অন্তরঙ্গ দল থেকে সুরক্ষিত থাকে, সে-ই প্রকৃত সুরক্ষিত।"
7546 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من وال إلا وله بطانتان: بطانة تأمره بالمعروف، وتنهاه عن المنكر، وبطانة لا تألوه خبالا، فمن وقي شرها فقد وقي، وهو من التي تغلب عليه منهما".
صحيح: رواه النسائي (4201)، وأحمد (7239)، وصحَّحه ابن حبان (6191) كلهم من حديث الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، .. فذكره. وإسناده صحيح.
وأخرجه ضمن حديث طويل البخاري في الأدب المفرد (256)، والترمذي (2369)، والحاكم (4/ 131) من طريق عبد الملك بن عمير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة .. فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح غريب.
وقال الحاكم: حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো শাসক নেই যার দুজন ঘনিষ্ঠ পরামর্শদাতা (বা অন্তরঙ্গ বন্ধু) থাকে না। এক পক্ষ তাকে ভালো কাজের আদেশ দেয় এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করে। আর অপর পক্ষ তার ক্ষতি সাধনে সামান্যও কসুর করে না। সুতরাং যে ব্যক্তি এর (খারাপ পক্ষের) অনিষ্ট থেকে রক্ষা পেল, সে-ই রক্ষা পেল। এবং সে (শাসক) তাদের দুজনের মধ্যে যার প্রভাব তার উপর বেশি থাকে, তারই অন্তর্ভুক্ত হয়।
7547 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أراد الله بالأمير خيرًا جعل له وزير صدق إن نسي ذكره، وإن ذكر أعانه، وإذا أراد الله به غير ذلك جعل له وزير سوء، إن نسي لم يذكره، وإن ذكر لم يعنه".
صحيح: رواه أبو داود (2932) واللفظ له، والنسائي (4204)، وأحمد (24414)، وابن حبان (4494)، والبيهقي (10/ 111 - 112) كلهم من طرق عن القاسم بن محمد، عن عائشة .. فذكرته.
وفي بعض طرقه ضعف يسير يتقوى بمجيئه من طرق أخرى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো শাসকের (আমীরের) জন্য কল্যাণ চান, তখন তিনি তার জন্য একজন সৎ ও সত্যবাদী উযির (উপদেষ্টা) নির্ধারণ করে দেন। যদি সে ভুলে যায়, তবে সে (উযির) তাকে স্মরণ করিয়ে দেয়, আর যদি সে স্মরণ করে, তবে সে তাকে সাহায্য করে। আর আল্লাহ যখন তার জন্য এর বিপরীত (অকল্যাণ) চান, তখন তিনি তার জন্য একজন খারাপ উযির নির্ধারণ করে দেন। যদি সে ভুলে যায়, তবে সে তাকে স্মরণ করিয়ে দেয় না, আর যদি সে স্মরণ করে, তবে সে তাকে সাহায্য করে না।"