হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7608)


7608 - عن عقبة بن عامر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كل ميت يختم على عمله إلا المرابط في سبيل الله، فإنه يجرى له أجر عمله حتى يبعث، ويؤمن من فتان القبر".

حسن: رواه أحمد (17359) عن عبد الله بن يزيد، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا مشرح قال: سمعت عقبة بن عامر .. فذكر مثله.

وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة لأن الراوي عنه أحد العبادلة، وقد سبق الكلام عليه في الجنائز، باب الرباط في سبيل الله وقاية من عذاب القبر.




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: প্রত্যেক মৃত ব্যক্তির আমল বন্ধ হয়ে যায় (বা তার আমলের উপর মোহর মেরে দেওয়া হয়), তবে যারা আল্লাহর রাস্তায় সীমান্ত পাহারায় নিযুক্ত থাকে (মুরাবিত), তাদের জন্য তাদের আমলের সাওয়াব (মৃত্যুর পরেও) জারি থাকে যতক্ষণ না তাদের পুনরুত্থান করা হয়। এবং তারা কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে নিরাপদ থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (7609)


7609 - عن العرباض بن سارية قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل عمل ينقطع عن صاحبه إذا مات إلا المرابط في سبيل الله، فإنه يُنمى له عمله، ويجري عليه رزقه إلى يوم القيامة".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (18/ 256 - 257)، والفسوي في المعرفة والتاريخ (2/ 348)، وابن أبي عاصم في الجهاد (296) كلهم من طرق عن أبي مطيع معاوية بن يحيى الأطرابلسي، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن جبير بن نفير، وكثير بن مرة، وعمرو بن الأسود، عن العرباض بن سارية .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي مطيع معاوية بن يحيى الأطرابلسي فإنه حسن الحديث.

وقال المنذري في الترغيب والترهيب (1925):"رواه الطبراني في الكبير بالإسنادين، رواة أحدهما ثقات". وتبعه الهيثمي في مجمع الزوائد (5/ 290). والمرابطة في سبيل الله تعتبر من الصدقة الجارية.

وفي الباب عن عثمان بن عفان قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"رباط يوم في سبيل الله خير من ألف يوم فيما سواه من المنازل".

رواه الترمذي (1667)، والنسائي (3169، 3170)، وأحمد (442، 470، 558)، وصحّحه ابن حبان (4609)، والحاكم (2/ 68 و 2/ 143 - 144) كلهم من طرق عن زهرة بن معبد، عن أبي صالح مولى عثمان قال: سمعت عثمان - وهو على المنبر - يقول: إني كتمتكم حديثًا سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم كراهية تفرقكم عني ثم بدا لي أن أحدثكموه ليختار امرؤ لنفسه ما بدا له، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول .. فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

وقال الحاكم في الموضع الأول:"هذا حديث صحيح الإسناد على شرط البخاري ولم يخرجاه". وقال في الموضع الثاني:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه".

قلت: في إسناده أبو صالح مولى عثمان لم يخرج له مسلم، إنما روى له الترمذي والنسائي فقط، واسمه الحارث، ويقال: بُركان بالباء الموحدة.

قال العجلي في ثقاته (ص 501): روى عنه زهرة بن معبد وأهل مصر ثقة. وذكره ابن حبان في ثقاته (4/ 84)، لذا قال ابن حجر"مقبول" أي عند المتابعة.

وله متابع إلا أنه لا يفيد في التقوية وهو ما رواه أحمد (433، 463)، وابن أبي عاصم في الجهاد (151) من طرق عن كهمس بن الحسن، عن مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزبير، عن عثمان بلفظ:"حرس ليلة في سبيل الله أفضل من ألف ليلة يقام ليلها ويصام نهارها". إلا أن مصعب بن ثابت لين الحديث، ثم إنه لم يدرك عثمان؛ فإنه ولد بعد مقتل عثمان بنحو خمسين سنة.

ورواه بعضهم عن كهمس بن الحسن، عن مصعب بن ثابت، عن عبد الله بن الزبير، عن عثمان
ابن عفان. رواه ابن أبي عاصم في الجهاد (150)، والحاكم (2/ 81). وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

قلت: فيه علل منها:

1 - مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزبير لين الحديث.

2 - مصعب هذا لم يدرك جده عبد الله بن الزبير، فإن عبد الله بن الزبير قتل سنة ثلاث وسبعين، وولد مصعب بن ثابت سنة أربع وثمانين، وتوفي سنة سبع وخمسين ومائة وهو ابن ثلاث وسبعين سنة، ولذا جعل المزي روايته عن جده مرسلة.

3 - اختلف فيه على كهمس، وقد ساق الدارقطني الاختلاف على كهمس، وعلى الرواة عنه، ثم رجح الوجه الذي ليس فيه ذكر عبد الله بن الزبير وقال: وهو المحفوظ. انظر: علل الدارقطني (3/ 36 - 37) وهذا الوجه المحفوظ فيه علتان كما سبق بيانه.

ورواه ابن ماجه (2766) عن هشام بن عمار، عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن مصعب بن ثابت، عن عبد الله بن الزبير، عن عثمان فدكره. وعبد الرحمن بن زيد ضعيف.




আল-ইরবাদ ইবনে সারিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক আমলই তার সম্পাদনকারী মারা গেলে বন্ধ হয়ে যায়, আল্লাহর রাস্তায় (সীমান্তে) প্রহরায় নিয়োজিত ব্যক্তি ছাড়া; কেননা তার আমল (নেককারিতা) বৃদ্ধি পেতে থাকে এবং তার জন্য কিয়ামত পর্যন্ত রিযিক (প্রতিদান) জারি থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7610)


7610 - عن مجاهد عن أبي هريرة: أنه كان في الرباط، ففزعوا إلى الساحل، ثم قيل: لا بأس، فانصرف الناس، وأبو هريرة واقف، فمرَّ به إنسان، فقال: ما يوقفك يا أبا هريرة؟ فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"موقف ساعة في سبيل الله خير من قيام ليلة القدر عند الحجر الأسود".

صحيح: رواه ابن حبان (4603)، والبيهقي في شعب الايمان (4286) كلاهما من طريق عباس بن عبد الله الترقفي، حدثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن مجاهد، عن أبي هريرة قال .. فذكره.

وإسناده صحيح، ومجاهد سمع من أبي هريرة كما بين ذلك ابن حبان عقب الحديث المذكور.

وفي معناه ما روي عن ابن عمر مرفوعا:"ألا أنبئكم بليلة أفضل من ليلة القدر: حارس حرس في أرض خوف لعله لا يرجع إلى أهله".

رواه النسائي في الكبرى (8817)، والحاكم (2/ 81 - 82)، وعنه البيهقي (9/ 149) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد القطان، حدثنا ثور بن يزيد، عن عبد الرحمن بن عائذ، عن مجاهد بن رباح، عن ابن عمر .. فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط البخاري ولم يخرجاه".

وقد أوقفه وكيع بن الجراح عن ثور. وفي يحيى بن سعيد قدوة.

قلت: في إسناده مجاهد بن رباح لم يخرج له أحد من أصحاب الكتب إلا النسائي في الكبرى هذا الحديث الوحيد، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته.
ثم إن الحديث قد اختلف في رفعه ووقفه فكان يحيى بن سعيد أحيانا يرفعه، وأحيانا يُوقفه. قال محمد بن بشار: كان يحيى إذا حدّث به على رؤوس الملأ لا يرفعه، وإذا حدث به في خلوته وخاصته رفعه.

وقد ساق الدارقطني في العلل (12/ 415) الاختلاف على ثور بن يزيد، وعلى يحيى بن سعيد القطان وجزم بأن الموقوف هو الصواب.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার সীমান্ত পাহারায় (রিবাত-এ) ছিলেন। তখন লোকেরা ভয় পেয়ে উপকূলের দিকে ছুটল। এরপর বলা হলো যে, কোনো বিপদ নেই, ফলে লোকেরা ফিরে গেল। কিন্তু আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্থির দাঁড়িয়ে রইলেন। একজন লোক তাঁর পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় জিজ্ঞেস করল, হে আবূ হুরায়রা! আপনি কেন দাঁড়িয়ে আছেন? তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'আল্লাহর পথে এক মুহূর্তের জন্য দাঁড়িয়ে থাকা হাজরে আসওয়াদের কাছে কদরের রাত জেগে ইবাদত করার চেয়েও উত্তম।'









আল-জামি` আল-কামিল (7611)


7611 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تعس عبد الدينار، وعبد الدرهم وعبد الخميصة، إن أعطي رضي، وإن لم يعط سخط، تعس وانتكس، وإذا شيك فلا انتقش. طوبى لعبد آخذ بعنان فرسه في سبيل الله أشعث رأسه مغبرة قدماه إن كان في الحراسة كان في الحراسة، وإن كان في الساقة كان في الساقة، إن استأذن لم يؤذن له، وإن شفع لم يشفع".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2887) عن عمرو (هو أبن مرزوق)، أخبرنا عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبيه، عن أبي صالح، عن أبي هريرة .. فذكره.

وقوله:"إذا شيك فلا انتقش" أي إذا أصابته الشوكة فلا وجد من يخرج منها بالمنقاش.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধ্বংস হোক দীনারের গোলাম, ধ্বংস হোক দিরহামের গোলাম এবং ধ্বংস হোক জাঁকজমকপূর্ণ (খামীসা) কাপড়ের গোলাম। যদি তাকে কিছু দেওয়া হয় তবে সে সন্তুষ্ট হয়, আর যদি না দেওয়া হয় তবে সে অসন্তুষ্ট হয়। সে ধ্বংস হোক এবং উল্টো পথে চলুক। যখন তার গায়ে কাঁটা বিদ্ধ হয়, তখন সে যেন তা উঠাতে না পারে। শুভ সংবাদ সেই বান্দার জন্য, যে আল্লাহর পথে তার ঘোড়ার লাগাম ধরে রাখে; যার মাথা এলোমেলো, আর দু’পা ধূলিধূসরিত। যদি তাকে পাহারার দায়িত্ব দেওয়া হয়, সে পাহারাতেই থাকে, আর যদি তাকে কাফেলার পিছনে (সাকাহতে) থাকার দায়িত্ব দেওয়া হয়, তবে সে তাতেই থাকে। যদি সে (কারো কাছে প্রবেশের) অনুমতি চায়, তাকে অনুমতি দেওয়া হয় না, আর যদি সে সুপারিশ করে, তবে তার সুপারিশ গ্রহণ করা হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7612)


7612 - عن ابن عباس قال: سمحت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"عينان لا تمسهما النار، عين بكت من خشية الله، وعين باتت لحرس في سبيل الله".

حسن: رواه الترمذي (1639)، وابن أبي عاصم في الجهاد (146) من طريق شعيب بن رزيق أبو شيبة قال: حدثنا عطاء الخراساني، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس .. فذكره.

وقال الترمذي:"حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث شعيب بن رزيق".

قلت: وهو كما قال: فإن شعيب بن رزيق وعطاء الخراساني مختلف فيهما غير أنهما حسنا الحديث، وقد حسّنه أيضا الحافظ ابن حجر في الفتح (6/ 83).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "দু’টি চোখকে আগুন কখনও স্পর্শ করবে না: একটি চোখ যা আল্লাহর ভয়ে কাঁদে এবং একটি চোখ যা আল্লাহর পথে প্রহরায় রাত অতিবাহিত করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7613)


7613 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عينان لا تمسهما النار: عين باتت تكلأ المسلمين في سبيل الله، وعين بكت في خلاء من خشية الله".

حسن: رواه أبو يعلى (4346) - ومن طريقه الضياء في المختارة (2198)، وابن أبي عاصم في الجهاد (147) كلاهما عن عمرو بن الضحاك بن مخلد، حدثنا أبي الضحاك بن مخلد، أخبرنا شبيب بن بشر، عن أنس بن مالك، .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل شبيب بن بشر فإنه حسن الحديث.

وفي الباب عن أبي ريحانة قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة، فأتينا ذات ليلة إلى شرف،
فبتنا عليه، فأصابنا برد شديد، حتى رأيت من يحفر في الأرض حفرة يدخل فيها، يلقي عليه الحجفة يعني الترس، فلما رأى ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم من الناس، نادى:"من يحرسنا في هذه الليلة؟ ، وأدعو له بدعاء يكون فيه فضل" فقال رجل من الأنصار: أنا يا رسول الله، فقال:"ادنه" فدنا فقال:"من أنت؟" فتسمى له الأنصاري، ففتح رسول الله صلى الله عليه وسلم بالدعاء، فأكثر منه قال أبو ريحانة: فلما سمعت ما دعا به رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت:"أنا رجل آخر"، فقال:"ادنه" فدنوت فقال:"من أنت؟" قال: فقلت: أنا أبو ريحانة فدعا بدعاء هو دون ما دعا للأنصاري ثم قال:"حرمت النار على عين دمعت أو بكت من خشية الله، وحرمت النار على عين سهرت في سبيل الله" وقال:"حرمت النار على عين أخرى ثالثة" لم يسمعها محمد بن سمير".

رواه أحمد (17213) - والسياق له - والنسائي (3117)، وصحّحه الحاكم (2/ 83)، وعنه البيهقي (9/ 149) من طرق عن عبد الرحمن بن شريح، عن محمد بن سُمير الرعيني، عن أبي علي الجنبي - وقيل: التجيبي - عن أبي ريحانة .. فذكره. ورواية النسائي مختصرة جدًّا. وزاد الحاكم والبيهقي: قال أبو شريح - وهو عبد الرحمن بن شريح - وسمعت بعد أنه قال:"حرمت النار على عين رغضت عن محارم الله، أو عين فُقئت في سبيل الله".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

قلت: في إسناده محمد بن سُمير ويقال: شمير بالشين المعجمة لم يرو عنه سوى عبد الرحمن بن شريح كما قال الذهبي في الميزان (3/ 580 - 581)، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (7/ 398) ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا. وأبو علي الجنبي هو عمرو بن مالك الهمداني ثقة.

وأما ما روي عن عقبة بن عامر الجهني مرفوعا:"رحم الله حارس الحرس". فضعيف. رواه ابن ماجه (2769)، والدارمي (2445) كلاهما من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن محمد بن زائدة، عن عمر بن عبد العزيز، عن عقبة بن عامر الجهني .. فذكره.

قال الدارمي عقبه: عمر بن عبد العزيز لم يلق عقبة بن عامر.

وقال البوصيري:"هذا إسناد ضعيف"، صالح بن محمد ضعفه ابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والبخاري، وأبو داود، والنسائي، وابن عدي، وغيرهم". مصباح الزجاجة (3/ 157).

ورواه الحاكم (2/ 86) من طريق محمد بن صالح بن قيس الأزرق، عن صالح بن محمد بن زائدة، عن عمر بن عبد العزيز، عن أبيه، عن عقبة بن عامر .. فذكره. وقال: صحيح الإسناد.

قلت: فيه صالح بن محمد بن زائدة، وهو ضعيف كما تقدم، ثم إن العقيلي ذكر في ترجمة يحيى بن راشد السماك الاختلاف في إسناده، وقال بأولوية رواية من روى بدون ذكر أبيه بين عمر بن عبد العزيز وعقبة بن عامر، وذكر ابن حجر في ترجمة قيس بن الحارث من بني تميم من
الإصابة (9/ 91 - 92) أن في مسند عمر بن عبد العزيز للباغندي دون ذكر"عن أبيه" ثم قال: وهو المحفوظ.

وللاختلاف في إسناد هذا الحديث صور أخرى، وقال ابن حجر في القسم الثالث من حرف القاف في ترجمة قيس بن الحارث التابعي (9/ 223):"مداره على صالح بن محمد، وهو أبو واقد المدني أحد الضعفاء".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুটি চোখকে জাহান্নামের আগুন স্পর্শ করবে না: একটি চোখ যা আল্লাহর পথে মুসলমানদের পাহারা দিয়ে রাত কাটিয়েছে, এবং একটি চোখ যা আল্লাহর ভয়ে নির্জনে কাঁদেছে।"

এই বিষয়ে আবু রায়হানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি যুদ্ধে ছিলাম। এক রাতে আমরা একটি উঁচু জায়গায় পৌঁছলাম এবং সেখানে রাত কাটালাম। প্রচণ্ড ঠাণ্ডা অনুভূত হচ্ছিল, এমনকি আমি দেখলাম কেউ কেউ মাটিতে গর্ত খুঁড়ে তার মধ্যে ঢুকে পড়ছে এবং নিজেদের উপর ঢাল চাপা দিচ্ছে। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষের এই অবস্থা দেখলেন, তখন তিনি ঘোষণা দিলেন: "আজ রাতে কে আমাদের পাহারা দেবে? আমি তার জন্য এমন দোয়া করব, যাতে বিশেষ ফযীলত থাকবে।" আনসারদের মধ্য থেকে একজন লোক বললেন: "আমি, ইয়া রাসূলুল্লাহ!" তিনি বললেন: "সামনে এসো।" সে এগিয়ে গেল। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কে?" আনসারী লোকটি নিজের নাম বললেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য দোয়া করা শুরু করলেন এবং প্রচুর পরিমাণে দোয়া করলেন। আবু রায়হানা বলেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই দোয়া শুনলাম, তখন আমি বললাম: "আমিও অন্য আরেকজন লোক।" তিনি বললেন: "সামনে এসো।" আমি এগিয়ে গেলাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কে?" আমি বললাম: "আমি আবু রায়হানা।" তিনি তার জন্য দোয়া করলেন, তবে তা আনসারী লোকটির জন্য করা দোয়ার চেয়ে কম ছিল। এরপর তিনি বললেন: "যে চোখ আল্লাহর ভয়ে অশ্রুসিক্ত হয়েছে বা কেঁদেছে, তার উপর জাহান্নামের আগুন হারাম করা হয়েছে। এবং যে চোখ আল্লাহর পথে পাহারা দিতে জেগে ছিল, তার উপরও জাহান্নামের আগুন হারাম করা হয়েছে।" তিনি আরও বললেন: "তৃতীয় আরেকটি চোখের উপরও জাহান্নামের আগুন হারাম করা হয়েছে।" (মুহাম্মাদ ইবনে সুমাইর এই অংশটুকু শুনতে পাননি)। আব্দুল রহমান ইবনে শুরাইহ বলেন, আমি পরে শুনেছি যে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে চোখ আল্লাহর হারামকৃত বিষয়াবলী থেকে বিরত থাকার কারণে চোখ ফিরিয়ে নিয়েছে, এবং যে চোখ আল্লাহর পথে অন্ধ হয়ে গেছে, তার উপর জাহান্নামের আগুন হারাম করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7614)


7614 - عن زيد بن خالد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من جهّز غازيا في سبيل الله فقد غزا، ومن خلف غازيا في سبيل الله بخير فقد غزا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2843)، ومسلم في الإمارة (1895: 136) كلاهما من طريق حسين المعلم، حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن، حدثني بُسر بن سعيد، حدثني زيد بن خالد .. فذكره.




যায়দ ইবনু খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো মুজাহিদকে (যুদ্ধের সাজ-সরঞ্জাম দিয়ে) প্রস্তুত করে দেয়, সে যেন জিহাদই করল। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে জিহাদকারী ব্যক্তির অনুপস্থিতিতে তার পরিবারের উত্তমভাবে দেখাশোনা করে, সেও যেন জিহাদই করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (7615)


7615 - عن أبي سعيد الخدري: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث إلى بني لحيان:"ليخرج من كل رجلين رجل"، ثم قال للقاعد:"أيكم خلف الخارج في أهله وماله بخير، كان له مثل نصف أجر الخارج".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1896: 138) عن سعيد بن منصور، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن يزيد بن أبي سعيد مولى المهري، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু লাহ্ইয়ান গোত্রের নিকট (অভিযান) প্রেরণ করলেন (এই নির্দেশে যে): “প্রত্যেক দু’জনের মধ্য থেকে একজন যেন (জিহাদের জন্য) বের হয়।” এরপর তিনি পেছনে থাকা (জিহাদে অংশ না নেওয়া) ব্যক্তিদেরকে বললেন: “তোমাদের মধ্যে যে কেউ জিহাদকারীর অনুপস্থিতিতে তার পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদের উত্তম দেখাশোনা করবে, সে জিহাদকারীর অর্ধেকের সমপরিমাণ পুরস্কার পাবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7616)


7616 - عن أبي مسعود الأنصاري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني أُبدع بي فاحملني، فقال:"ما عندي. فقال رجل: يا رسول الله، أنا أدله على من يحمله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من دلَّ على خير فله مثل أجر فاعله".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1893: 133) من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي عمرو الشيباني، عن أبي مسعود الأنصاري قال .. فذكره.

وقوله:"أبدع بي" أي هلكت دابتي وهي مركوبي.




আবূ মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: আমার বাহন (পথিমধ্যে) দুর্বল হয়ে থেমে গেছে (বা নষ্ট হয়ে গেছে), তাই আমাকে সওয়ারি দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমার কাছে (দেওয়ার মতো) কিছু নেই।" তখন এক ব্যক্তি বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তাকে এমন এক ব্যক্তির সন্ধান দিতে পারি, যে তাকে বাহন দেবে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো কল্যাণের পথ দেখায়, সে তার সম্পাদনকারীর অনুরূপ সওয়াব (পুরস্কার) পায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7617)


7617 - عن أنس بن مالك أن فتى من أسلم قال: يا رسول الله إني أريد الغزو، وليس معي ما أتجهز، قال:"ائت فلانا فإنه قد كان تجهز فمرض"، فأتاه، فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرئك السلام، ويقول: أعطني الذي تجهزت به، قال: يا فلانة أعطِيه الذي تجهزتُ به، ولا تحبسي عنه شيئا، فوالله لا تحبسي منه شيئا، فيبارك لكِ فيه".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1894: 134) من طريق حماد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن أنس بن مالك .. فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের একজন যুবক বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি যুদ্ধে (গাজওয়ায়) যেতে চাই, কিন্তু আমার কাছে জিহাদের সরঞ্জাম (প্রস্তুতি) কেনার মতো কিছু নেই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি অমুক ব্যক্তির কাছে যাও, কারণ সে যুদ্ধের জন্য প্রস্তুতি নিয়েছিল, কিন্তু সে অসুস্থ হয়ে পড়েছে।" এরপর সে তার কাছে গেল এবং বলল: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনাকে সালাম জানিয়েছেন এবং বলছেন যে, আপনি জিহাদের জন্য যে সরঞ্জাম প্রস্তুত করেছিলেন তা আমাকে দিন। লোকটি বলল: "হে অমুক (স্ত্রীলোক, তার স্ত্রীকে উদ্দেশ্য করে), তাকে সেই সরঞ্জাম দিয়ে দাও যা আমি প্রস্তুত করেছিলাম। আর তার থেকে কোনো কিছুই লুকিয়ে রেখো না। আল্লাহর কসম! তুমি যদি এর কোনো কিছু লুকিয়ে রাখো, তবে এর মধ্যে তোমার জন্য বরকত হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7618)


7618 - عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من لم يغزُ، أو يجهز غازيا، أو يخلف غازيا في أهله بخير أصابه الله سبحانه بقارعة قبل يوم القيامة".

حسن: رواه أبو داود (2503)، وابن ماجه (2762)، والدارمي (2462) من طرق عن الوليد بن مسلم، حدثنا يحيى بن الحارث الذماري، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن أبي أمامة .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم بن عبد الرحمن؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জিহাদে অংশগ্রহণ করে না, অথবা কোনো যোদ্ধাকে (জিহাদের জন্য) প্রস্তুত করে দেয় না, অথবা কোনো যোদ্ধার অনুপস্থিতিতে তার পরিবারের ভালোভাবে দেখাশোনা করে না, কিয়ামতের পূর্বে আল্লাহ তাআলা তাকে কোনো না কোনো মহাবিপদ বা মুসিবতে আক্রান্ত করবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (7619)


7619 - عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أظل رأس غاز أظله الله يوم القيامة، ومن جهز غازيا حتى يستقل كان له مثل أجره حتى يموت، أو يرجع، ومن بنى لله مسجدًا يذكر فيه اسم الله تعالى، بنى الله له به بيتا في الجنة".

صحيح: رواه أحمد (126)، وابن ماجه (735، 2758)، وابن أبي شيبة (19902)، والحاكم (2/ 89) من طرق عن ليث بن سعد، عن يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، عن الوليد بن أبي الوليد، عن عثمان بن عبد الله بن سراقة، عن عمر بن الخطاب .. فذكره. واللفظ لأحمد ومنهم من اختصره.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

قلت: وهو كما قال، والكلام على هذا الإسناد مبسوط في باب فضل بناء المسجد.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধার মাথায় ছায়া প্রদান করবে, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তাকে ছায়া দেবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধাকে সজ্জিত করে তাকে রওনা করিয়ে দেয়, তার (যোদ্ধার) মৃত্যুর পূর্ব পর্যন্ত বা ফিরে আসার পূর্ব পর্যন্ত সে তার সওয়াবের মতো সওয়াব পাবে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর জন্য একটি মসজিদ নির্মাণ করবে, যেখানে আল্লাহর নাম স্মরণ করা হয়, আল্লাহ এর বিনিময়ে জান্নাতে তার জন্য একটি ঘর তৈরি করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7620)


7620 - عن أبي أمامة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصدقات ظل فسطاط في سبيل الله، أو منيحة خادم في سبيل الله، أو طروقة فحل في سبيل الله".

حسن: رواه الترمذي (1627) عن زياد بن أيوب، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الوليد بن جميل، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم أبي عبد الرحمن، وهو ابن عبد الرحمن الدمشقي، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، والوليد بن جميل هو الفلسطيني قال ابن المديني: تشبه أحاديثه أحاديث القاسم أبي عبد الرحمن، ورضيه.

وقال الترمذي: حديث حسن صحيح غريب، وسيأتي قوله بتمامه.

وحسّنه ابن القطان الفاسي في بيان الوهم (5/ 162، 743).

وروي عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن عدي بن حاتم، رواه الترمذي (1626)، وصحّحه الحاكم (2/ 90 - 91) من طريق معاوية بن صالح، عن كثير بن الحارث، عن القاسم عنه، والصواب أنه مرسل، وقد قيل: لم يسمع القاسم من أحد من الصحابة سوى أبي أمامة. انظر:
تحفة التحصيل (ص 260).

قال الترمذي عقبه:"وقد روي عن معاوية بن صالح هذا الحديث مرسلا وخولف زيد في بعض إسناده، وروى الوليد بن جميل هذا الحديث عن القاسم أبي عبد الرحمن عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم". وساقه ثم قال: هذا حديث - أي حديث أبي أمامة - حديث حسن غريب، وهو أصح عندي من حديث معاوية بن صالح".

وقال أيضا في العلل (2/ 700) بعد ما ساق رواية معاوية بن صالح قال:"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: رواه عبد الله بن صالح عن معاوية بن صالح عن كثير بن الحارث عن القاسم بن عبد الرحمن أن عدي بن حاتم سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم مرسل، ورواه الوليد بن جميل الفلسطيني عن القاسم أبي عبد الرحمن عن أبي أمامة، قال محمد: ولا أعرف أحدًا روى عن الوليد بن جميل غير يزيد بن هارون وهاشم بن القاسم، والوليد بن جميل مقارب الحديث".

وقوله: ظل فسطاط" بضم الفاء وتكسر أي أن يعطى خيمة في سبيل الله يستظل بها المجاهدون، أو يضرب خيمة، ويجمع المجاهدين في ظله.

وقوله:"أو منيحة خادم في سبيل الله" أي هبة خادم للمجاهد ليخدمه.

وقوله:"أو طروقة فحل" بفتح الطاء وهي الناقة التي صلحت لطرق الفحل، ومعناه أن يعطي الغازي ناقة هذه صفتها ليركبها.




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উত্তম সদকা হলো আল্লাহর পথে একটি তাঁবুর ছায়া দান করা, অথবা আল্লাহর পথে একজন খাদেম (সেবার জন্য) দান করা, অথবা আল্লাহর পথে একটি উটনী (যা আরোহণ বা প্রজননের উপযুক্ত) দান করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (7621)


7621 - عن بريدة بن الحصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حرمة نساء المجاهدين على القاعدين كحرمة أمهاتهم، وما من رجل من القاعدين يخلف رجلا من المجاهدين في أهله، فيخونه فيهم إلا وقف له يوم القيامة، فيأخذ من عمله ما شاء، فما ظنكم؟ !".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1897: 139) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن علقمة بن مرثد، من سليمان بن بريدة، عن أبيه .. فذكره.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "(জিহাদ থেকে) পশ্চাতে অবস্থানকারীদের জন্য মুজাহিদদের স্ত্রীদের সম্মান তাদের নিজ নিজ মায়েদের সম্মানের অনুরূপ। আর যখনই কোনো ব্যক্তি পশ্চাতে অবস্থান করে কোনো মুজাহিদের অনুপস্থিতিতে তার পরিবারের দেখাশোনা করে, অতঃপর সে তাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করে, তখন কিয়ামতের দিন মুজাহিদ তার সামনে দাঁড়াবে এবং তার (বিশ্বাসঘাতকের) নেক আমল থেকে যা ইচ্ছা গ্রহণ করে নেবে। সুতরাং, তোমাদের কী ধারণা (এই বিষয়ে)?!"









আল-জামি` আল-কামিল (7622)


7622 - عن عمرو بن عبسة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من شاب شيبة في سبيل الله كانت له نورًا يوم القيامة".

صحيح: رواه الترمذي (1635) عن إسحاق بن منصور المروزي، أخبرنا حيوة بن شُريح الحمصي، عن بقية، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن عمرو بن عبسة .. فذكره.

وقال: هذا حديث حسن صحيح غريب.
قلت: إسناده حسن من أجل بقية بن الوليد؛ فإنه حسن الحديث إذا صرّح بالتحديث وقد صرح به كما في مسند أحمد (194440).

وسبق الكلام عليه في كتاب الصلاة، باب فضل بناء المساجد، وصحَّ بإسناد آخر عن أبي نجيح عمرو بن عبسة السلمي كما سيأتي في باب فضل الرمي.




আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে দ্বীনের কাজে) তার একটি চুল সাদা করলো (পাকালো), তা কিয়ামতের দিন তার জন্য আলো হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7623)


7623 - عن فضالة بن عبيد أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من شاب شيبة في سبيل الله كانت له نورا يوم القيامة"، فقال رجل عند ذلك: فإن رجالا ينتفون الشيب فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم فلينتف نوره.

وفي لفظ:"من شاء أن ينتف شيبة - أو قال: نوره -".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في الجهاد (168)، والطبراني في الكبير (18/ 304) من طرق عن وهب بن جرير بن حازم، حدثنا أبي، سمعت يحيى بن أيوب يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد العزيز بن أبي الصعبة، عن حنش (وهو الصنعاني)، عن فضالة بن عبيد .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد العزيز بن أبي الصَّعْبة فإنه لا بأس به، ويحيى بن أيوب هو الغافقي صدوق وقد توبع.

رواه أحمد (23952) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب به. وابن لهيعة فيه كلام معروف، لكن رواية قتيبة بن سعيد عنه أصح كرواية العبادلة عنه. والله أعلم.




ফযালাহ ইবন উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (জিহাদের কারণে) একটি চুলও সাদা করেছে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূর (আলো) হবে।' তখন এক ব্যক্তি বলল: 'নিশ্চয়ই কিছু লোক তাদের পাকা চুল তুলে ফেলে।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'সে যেন তার নূরই তুলে ফেলে।'

অন্য এক বর্ণনায় আছে: 'যে ব্যক্তি পাকা চুল—অথবা তিনি বললেন: তার নূর—তুলে ফেলতে চায় (সে যেন তা করে)।'









আল-জামি` আল-কামিল (7624)


7624 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أنفق زوجين في سبيل الله دعاه خزنة الجنة - كل خزنة باب - أي فُلُ هلُمَّ"، قال أبو بكر: يا رسول الله ذاك الذي لا توى عليه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إني لأرجو أن تكون منهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2841)، ومسلم في الزكاة (1027: 86) كلاهما من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سمع أبا هريرة .. فذكره.

قوله:"زوجين" أي شيئين من أي نوع كان مما ينفق، والزوج يطلق على الواحد وعلى الاثنين، والمراد هنا الواحد كما في الفتح (6/ 49).
وقوله:"أي فُلْ" ترخيم من فلان.

وقوله:"ذاك الذي لا توى عليه" أي لا ضياع، ولا خسارة وهو من التوى: الهلاك. قاله ابن الأثير.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় দুটি জিনিস (যুগল) খরচ করবে, জান্নাতের রক্ষকরা তাকে ডাকবে—প্রত্যেক দরজার রক্ষকই (তাকে ডেকে) বলবে, ‘ওহে অমুক! চলে এসো!’” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! সে তো এমন ব্যক্তি, যার কোনো ক্ষতি বা বিনাশ হবে না!” তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “আমি আশা করি যে তুমি তাদের অন্তর্ভুক্ত হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7625)


7625 - عن أبي سعيد الخدري: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على المنبر، فقال:"إنما أخشى عليكم من بعدي ما يفتح عليكم من بركات الأرض"، ثم ذكر زهرة الدنيا، فبدأ بإحداهما وثنى بالأخرى، فقام رجل فقال: يا رسول الله، أويأتي الخير بالشر؟ فسكت عنه النبي صلى الله عليه وسلم، قلنا: يوحى إليه وسكت الناس كأن على رءوسهم الطير، ثم إنه مسح عن وجهه الرحضاء، فقال:"أين السائل آنفا؟ أو خير هو، - ثلاثا -، إدن الخير لا يأتي إلا بالخير، وإنه كلما ينبت الربيع ما يقتل حبطا أو يلم إلا آكلة الخضر كلما أكلت، حتى إذا امتلأت خاصرتاها استقبلت الشمس، فثلطت وبالت ثم رتعت، وإن هذا المال خضرة حلوة، ونعم صاحب المسلم لمن أخذه بحقه فجعله في سبيل الله واليتامى والمساكين وابن السبيل، ومن لم يأخذه بحقه فهو كالآكل الذي لا يشبع، ويكون عليه شهيدًا يوم القيامة".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2842)، ومسلم في الزكاة (1052: 123) كلاهما من طريق هلال بن أبي ميمونة، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.

وقوله:"حبطا" الحبط أن تستكثر الماشية من المرعى حتى تنتفخ بطونها، وتربو فربما كان في ذلك هلاكها.

وقوله:"يلم" أي يقارب الهلاك.

قال الأزهري:"هذا الخبر إذا تدبر لم يكد يفهم، وفيه مثلان فضرب أحدهما للمفرط في جمع الدنيا ومنعها من حقها، وضرب الآخر للمقتصد في أخذها والانتفاع بها، فإن قوله: وإن مما ينبت الربيع ما يقتل حبطا" فهو مثل للمفرط الذي يأخذها بغير حق، وذلك أن الربيع ينبت أحرار البقول والعشب، فتستكثر منها الماشية حتى تنتفخ بطونها لما جاوزت حد الاحتمال، فتنشق أمعاؤها وتهلك، كذلك الذي يجمع الدنيا من غير حلها، ويمنع ذا الحق حقه يهلك في الآخرة بدخوله النار. وأما مثل المقتصد فقوله صلى الله عليه وسلم"إلا آكلة الخضر …" إلى آخره وذلك أن آكلة الخضر ليست من أحرار البقول التي ينبتها الربيع لكنها من الجنبة التي ترعاها المواشي بعد هيج البقول. فضرب النبي صلى الله عليه وسلم آكلة الخضر من المواشي مثلا أسمن يقتصد في أخذه الدنيا وجمعها، ولا يحمله الحرص على أخذها بغير حقها فهو ينجو من وبالها كما نجت آكلة الخضرة" الخ. انظر: الديباج للسيوطي.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিম্বরের উপর দাঁড়ালেন এবং বললেন: "আমার পরে আমি তোমাদের জন্য কেবল সেই জিনিসই আশঙ্কা করি যা পৃথিবীর বরকত (প্রাচুর্য) থেকে তোমাদের জন্য উন্মুক্ত করে দেওয়া হবে।" এরপর তিনি দুনিয়ার চাকচিক্য (সৌন্দর্য) সম্পর্কে আলোচনা করলেন। তিনি প্রথমটির (প্রাচুর্য) দ্বারা শুরু করলেন এবং দ্বিতীয়টি (চাকচিক্য) দ্বারা সমাপ্ত করলেন। তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! কল্যাণ কি অকল্যাণ নিয়ে আসে? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার কথার কোনো জবাব দিলেন না। আমরা (উপস্থিত লোকেরা) বলাবলি করছিলাম যে, তাঁর কাছে ওহী আসছে। লোকেরা এমন নীরব হয়ে গেল যেন তাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে। এরপর তিনি তাঁর মুখমণ্ডল থেকে ঘাম মুছলেন এবং বললেন: "এইমাত্র প্রশ্নকারী লোকটি কোথায়? অথবা (এভাবে বললেন): এটি কি কল্যাণ? (এই কথাটি) তিনি তিনবার বললেন। শোনো! কল্যাণ কেবল কল্যাণই নিয়ে আসে। আর বসন্তকালে যা কিছু জন্মায় (ঘাস/উদ্ভিদ), তা অবশ্যই এমনভাবে (পেট ফেটে) হত্যা করে অথবা মৃত্যুর কাছাকাছি নিয়ে যায়, যেমন (অতিরিক্ত খাওয়ার কারণে পশুর) পেট ফেটে যায়। তবে (ঐ পশু নয়), যে শুধু সবুজ তৃণলতা খায় (তা নিরাপদ)। যখন সে তা খায় এবং তার পাঁজর পরিপূর্ণ হয়ে যায়, তখন সে সূর্যের দিকে মুখ করে, মলত্যাগ করে এবং পেশাব করে, অতঃপর আবার চরে বেড়ায়। আর এই ধন-সম্পদ সুমিষ্ট সবুজ (তৃণলতার) মতো। সে মুসলিমের জন্য কত উত্তম সাথী যে তা ন্যায়ের সাথে গ্রহণ করে এবং আল্লাহর পথে, ইয়াতিমদের, মিসকিনদের এবং মুসাফিরদের জন্য ব্যয় করে। আর যে ব্যক্তি তা ন্যায়ের সাথে গ্রহণ করে না, সে এমন ভোজনকারীর মতো যে কখনও পরিতৃপ্ত হয় না। কিয়ামতের দিন তা তার বিরুদ্ধে সাক্ষী হয়ে থাকবে।









আল-জামি` আল-কামিল (7626)


7626 - عن أبي مسعود الأنصاري قال: جاء رجل بناقة مخطومة فقال: هذه في سبيل الله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لك بها يوم القيامة سبعمائة ناقة، كلها مخطومة".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1892: 132) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أخبرنا جرير، عن الأعمش، عن أبي عمرو الشيباني، عن أبي مسعود الأنصاري .. فذكره.




আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি লাগামযুক্ত একটি উটনী নিয়ে আসলো এবং বলল: এটি আল্লাহর রাস্তায় (দান করা হলো)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “কিয়ামতের দিন এর বিনিময়ে তোমার জন্য সাতশো উটনী রয়েছে, যার সবক’টিই লাগামযুক্ত হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7627)


7627 - عن ثوبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل دينار يُنفقه الرجل: دينار يُنفقه على عياله، ودينار يُنفقه الرجل على دابته في سبيل الله، ودينار يُنفقه على أصحابه في سبيل الله".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (994) من طريقين عن حماد بن زيد، حدثنا أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان .. فذكره.




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একজন ব্যক্তি যে দীনার (মুদ্রা) ব্যয় করে, তার মধ্যে শ্রেষ্ঠ দীনার হলো: যে দীনার সে তার পরিবার-পরিজনের জন্য ব্যয় করে, এবং যে দীনার সে আল্লাহর পথে তার সওয়ারীর (পশুর) জন্য ব্যয় করে, এবং যে দীনার সে আল্লাহর পথে তার সাথীদের জন্য ব্যয় করে।"