হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7628)


7628 - عن خُريم بن فاتك الأسدي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أنفق نفقة في سبيل الله كتبت له بسبع مائة ضعف".

حسن: رواه الترمذي (1625)، وأحمد (19036، 19038)، وابن أبي عاصم في الجهاد (71)، وصحّحه ابن حبان (4647)، والحاكم (2/ 87) كلهم من طرق عن زائدة (هو ابن قدامة) - ورواه أحمد (19035)، وابن حبان (6171) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النحوي - ورواه النسائي في المجتبى (3186)، وفي الكبرى (4395)، وابن أبي عاصم في الجهاد (72) من طريق سفيان (هو الثوري) - ثلاثتهم عن الركين بن الربيع، عن أبيه، عن عمه يُسير بن عميلة، عن خريم بن فاتك .. فذكره. ومنهم من رواه مطولا.

وقد اختلف في إسناده على الركين بن الربيع اختلافا كثيرًا إلا أن رواية شيبان ومن وافقه أصح كما قال البخاري في التاريخ الكبير (8/ 423).

وإسناده حسن من أجل يُسير بن عميلة، فقد وثقه العجلي، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 558 - 557)، وألزم الدارقطني في الإلزامات (ص 125) الشيخين إخراج حديث خُريم بن فاتك من رواية يُسير بن عميلة.

وقال الترمذي:"وهذا حديث حسن، إنما نعرفه من حديث الركين بن الربيع".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وقد احتج مسلم بالركين بن الربيع وهو كوفي عزيز الحديث، ويُسير بن عميلة عمه".




খুরাইম ইবনে ফাতিক আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো কিছু খরচ করে, তার জন্য সাত শত গুণ (সওয়াব) লেখা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7629)


7629 - عن صعصعة بن معاوية قال: لقيت أبا ذر قال: قلت: حدثني قال: نعم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من عبد مسلم ينفق من كل مال له زوجين في سبيل الله إلا استقبلته حجبة الجنة كلهم يدعوه إلى ما عنده"، قلت: وكيف ذلك؟ قال: إن كانت إبلا
فبعيرين، وإن كانت بقرًا فبقرتين".

صحيح: رواه النسائي (3185)، وأحمد (21413)، وصحّحه ابن حبان (4643)، والحاكم (2/ 86) من طرق عن الحسن، عن صعصعة بن معاوية .. فذكره. والسياق للنسائي.

وإسناده صحيح، وقد صرح الحسن بالتحديث عند أحمد وابن حبان.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد وصعصعة بن معاوية من مفاخر العرب".

وفي معناه ما روي عن علي بن أبي طالب، وأبي الدرداء، وأبي هريرة، وأبي أمامة الباهلي، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عمرو، وجابر بن عبد الله، وعمران بن الحصين كلهم يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من أرسل بنفقة في سبيل الله وأقام في بيته فله بكل درهم سبعمائة درهم.

ومن غزا بنفسه في سبيل الله، وأنفق في وجه ذلك فله بكل درهم سبعمائة ألف درهم" ثم تلا هذه الآية: {وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَنْ يَشَاءُ}.

رواه ابن ماجه (2761) عن هارون بن عبد الله الحمال، حدثنا ابن أبي فديك، عن الخليل بن عبد الله، عن الحسن، عن علي، وأبي الدرداء، وأبي هريرة، وأبي أمامة، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عمرو، وجابر، وعمران .. فذكروه. ورواه ابن أبي حاتم في تفسيره (2730) عن الخليل بن عبد الله، عن الحسن، عن عمران وحده.

وفي إسناده الخليل بن عبد الله وهو مجهول كما قال ابن حجر.

وقال المنذري في الترغيب (1960):"والحسن لم يسمع من عمران ولا من ابن عمر. وقال الحاكم أكثر مشايخنا على: أن الحسن سمع من عمران".

والجمهور على أنه لم يسمع من أبي هريرة أيضا، وقد سمع من غيرهم والله أعلم.

وأعله البوصيري أيضا بجهالة الخليل، ثم نقل كلام المنذري هذا.

وأما ما روي عن معاذ بن أنس مرفوعا:"إن الصلاة والصيام والذكر تُضاعف على النفقة في سبيل الله عز وجل بسبعمائة ضعف". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2498)، والحاكم (2/ 78)، وعنه البيهقي (9/ 172) من حديث زبّان بن فائد، عن سهل بن معاذ، عن أبيه .. فذكره.

وفي إسناده زبان بن فائد وهو ضعيف بل قال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا، وينفرد عن سهل بن معاذ بنسخة كأنها موضوعة لا يحتج به.

وأما الحاكم فقال:"صحيح الإسناد".




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'সাআহ ইবনু মু'আবিয়াহ বলেন, আমি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে বললাম, আমাকে একটি হাদীস বর্ণনা করুন। তিনি বললেন, হ্যাঁ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিম বান্দা তার প্রত্যেকটি সম্পদ থেকে আল্লাহর পথে জোড়ায় জোড়ায় (যুগল) খরচ করে, জান্নাতের প্রহরীগণ তাকে অভ্যর্থনা জানায়, তাদের প্রত্যেকে তাকে তার নিকট যা আছে সেদিকে আহ্বান করে।" [সা'সাআহ বলেন] আমি বললাম, তা কীভাবে? তিনি বললেন: "যদি তা উট হয়, তবে দুটি উট, আর যদি গরু হয়, তবে দুটি গরু (দান করবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (7630)


7630 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قفلة كغزوة".
صحيح: رواه أبو داود (2487)، وأحمد (6625) والحاكم (2/ 73)، والبيهقي (9/ 28) من طرق عن الليث بن سعد: حدثني حيوة بن شريح، عن ابن شُفي الأصبحي، عن أبيه شُفي بن ماتع، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.

إلا أنه ليس في المستدرك:"عن أبيه".

وقد رواه أبو داود (2487) من الوجه الذي عند الحاكم بذكر"عن أبيه" فالظاهر أنه سقط من النساخ، ولذا لم يذكره ابن حجر في إتحاف المهرة (9/ 672). وإسناده صحيح، وابن شُفي هو الحسين.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

قلت: حسين بن شفي لم يخرج له مسلم، وكذا أبوه وهما ثقتان.

قال الخطابي في معالم السنن (3/ 358) معلقا على الحديث المذكور:"هذا يحتمل وجهين:

أحدهما: أن يكون أراد به القفول عن الغزو والرجوع إلى الوطن يقول: إن أجر المجاهد في انصرافه إلى أهله كأجره في إقباله إلى الجهاد؛ وذلك لأن تجهيز الغازي يضر بأهله وفي قفوله إليهم إزالة الضرر عنهم واستجمام للنفس واستعداد بالقوة للعود.

والوجه الآخر أن يكون أراد بذلك التعقيب وهو رجوعه ثانيا في الوجه الذي جاء منه منصرفا وإن لم يلق عدوًّا ولم يشهد قتالا وقد يفعل ذلك الجيش إذا انصرفوا من مغزاتهم وذلك لأحد أمرين:

أحدهما أن العدو إذا رأوهم قد انصرفوا عن ساحتهم أمنوهم فخرجوا من مكامنهم فإذا قفل الجيش إلى دار العدو نالوا الفرصة منهم فأغاروا عليهم.

والوجه الآخر أنهم إذا انصرفوا من مغزاتهم ظاهرين لم يأمنوا أن يقفو العدو أثرهم فيوقعوا بهم وهم غارون فربما استظهر الجيش أو بعضهم بالرجوع على أدراجهم ينفضون الطريق فإن كان من العدو طلب كانوا مستعدين للقائهم وإلا فقد سلموا وأحرزوا ما معهم من الغنيمة" اهـ.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যাবর্তন (জিহাদ থেকে ফিরে আসা) একটি যুদ্ধের (গাযওয়ার) সমতুল্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (7631)


7631 - عن أم حرام بنت ملحان قالت: نام النبي صلى الله عليه وسلم يوما قريبا مني، ثم استيقظ يتبسم، فقلت: ما أضحكك؟ قال:"أناس من أمتي عرضوا علي، يركبون هذا البحر الأخضر كالملوك على الأسِرّة"، قالت: فادع الله أن يجعلني منهم فدعا لها، ثم نام الثانية، ففعل مثلها، فقالت مثل قولها فأجابها مثلها، فقالت: ادع الله أن يجعلني منهم، شقال:"أنتِ من الأولين"، فخرجت مع زوجها عبادة بن الصامت غازيا أول ما ركب المسلمون البحر مع معاوية، فلما انصرفوا من غزوهم قافلين، فنزلوا الشام فقربت إليها دابة
لتركبها، فصرعتها، فماتت.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2799، 2800)، ومسلم في الإمارة (1912: 161) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن أنس بن مالك عن خالته أم حرام بنت ملحان .. فذكرته.

قال أبو داود عقب الحديث (2491) ماتت بنت ملحان بقبرص.




উম্মে হারাম বিনতে মিলহান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকটেই ঘুমালেন। এরপর তিনি মুচকি হাসতে হাসতে জেগে উঠলেন। আমি বললাম, কী আপনাকে হাসালো? তিনি বললেন, "আমার উম্মতের কিছু লোককে আমার সামনে পেশ করা হলো, যারা সিংহাসনে উপবিষ্ট বাদশাহদের মতো এই সবুজ সমুদ্রের ওপর আরোহণ করছে।" তিনি বললেন, আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন। অতঃপর তিনি তার জন্য দু'আ করলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার ঘুমালেন এবং আগের মতোই করলেন। তিনিও (উম্মে হারাম) আগের মতোই বললেন এবং তিনি (নবী) একই রকম উত্তর দিলেন। তিনি বললেন, দু'আ করুন যেন আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত হই। তিনি বললেন, "তুমি প্রথম দলভুক্ত হবে।"

এরপর তিনি তাঁর স্বামী উবাদা ইবনু সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে গাযী (যোদ্ধা) হিসেবে বের হলেন, যখন সর্বপ্রথম মুসলিমরা মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সমুদ্রে আরোহণ করলেন। যখন তারা তাদের যুদ্ধ থেকে প্রত্যাবর্তন করে শাম দেশে অবতরণ করলেন, তখন তাঁর আরোহণের জন্য একটি পশু তাঁর কাছে আনা হলো, কিন্তু সেটি তাঁকে আছাড় মারল, ফলে তিনি মারা গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7632)


7632 - عن أم حرام، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"المائد في البحر الذي يصيبه القيء له أجر شهيد، والغرِق له أجر شهيدين".

حسن: رواه أبو داود (2494)، وابن أبي عاصم في الجهاد (285 - 286) من طرق عن مروان بن معاوية، حدثنا هلال بن ميمون الرملي، عن أبي ثابت يعلى بن شداد، عن أم حرام .. فذكرته.

وإسناده حسن من أجل هلال بن ميمون الرملي؛ فإنه حسن الحديث.

وأما ما روي عن أبي الدرداء أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"غزوة في البحر مثل عشر غزوات في البر، والذي يسدر في البحر كالمتشحط في دمه في سبيل الله". فإسناده ضعيف.

رواه ابن ماجه (2777) عن هشام بن عمار، حدثنا بقية، عن معاوية بن يحيى، عن ليث بن أبي سليم، عن يحيى بن عباد، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، .. فذكره.

وإسناده ضعيف لضعف ليث، ومعاوية بن يحيى - وهو الصدفي - وعنعنة بقية بن الوليد؛ فإنه كان يدلس عن الضعفاء والمجهولين.

وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 159):"هذا إسناد ضعيف لضعف معاوية بن يحيى وشيخه ليث بن أبي سليم".

وقوله:"يسدر" من السدر بالتحريك، كالدوار وهو كثيرًا ما يعرض لراكب البحر.

وكذلك لا يصح ما روي عن أبي أمامة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"شهيد البحر مثل شهيدي البر، والمائدُ في البحر كالمتشحط في دمه في البر. وما بين الموجتين كقاطع الدنيا في طاعة الله. وإن الله عز وجل وكل ملك الموت بقبض الأرواح إلا شهيد البحر، فإنه يتولى قبض أرواحهم. ويغفر لشهيد البر الذنوب كلها إلا الدين، ولشهيد البحر الذنوب والدين".

رواه ابن ماجه (2778)، والطبراني في الكبير (8/ 200) من طريق قيس بن محمد الكندي، حدثنا عفير بن معدان الشامي، عن سليم بن عامر قال: سمعت أبا أمامة يقول .. فذكره.

وفي هذا الإسناد عُفير بن معدان ضعيف، بل قال فيه أبو حاتم: ضعيف الحديث، يكثر الرواية عن سُليم بن عامر، عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم بالمناكير ما لا أصل له لا يشتغل بروايته. الجرح والتعديل (7/ 36).

وبه أعله أيضا البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 159).
وقيس بن محمد هو ابن عمران الكندي لم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (9/ 15) وقال: يعتبر حديثه من غير روايته عن عفير بن معدان".

وكذلك لا يصح ما روي عن عبد الله بن عمرو مرفوعا:"لا يركب البحر إلا حاج، أو معتمر، أو غاز في سبيل الله فإن تحت البحر نارًا وتحت النار بحرًا".

رواه أبو داود (2489) عن سعيد بن منصور (وهو في سننه 2393) قال: حدثنا إسماعيل بن زكريا، عن مطرف، عن بشر أبي عبد الله، عن بشير بن مسلم، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.

وفي إسناده بشر أبو عبد الله وبشير بن مسلم مجهولان، وقد اختلف في إسناده، فمنهم من رواه هكذا، ومنهم من أسقط بشرًا أبا عبد الله، ومنهم من أسقط بشير بن مسلم، ومنهم من رواه على غير هذه الوجوه، ساق الاختلاف فيه البخاري في التاريخ الكبير (2/ 104 - 105)، والخطيب في تلخيص المتشابه (1/ 156 - 158)، والمزي في تحفة الأشراف (6/ 282).

وضعّف هذا الحديث غير واحد من أهل العلم.

قال البخاري في ترجمة مسلم بن بشير الكندي من التاريخ الكبير (2/ 104 - 105) بعد ما ساق الاختلاف في إسناد الحديث المذكور:"لم يصح حديثه".

وقال ابن عبد البر في التمهيد (1/ 240):"هو حديث ضعيف مظلم الإسناد لا يصحّحه أهل العلم بالحديث؛ لأن رواته مجهولون لا يُعرفون …".

وفيه مخالفة لبعض الأحاديث الصحيحة قال ابن حجر في التلخيص (2/ 221) بعد ما ساق أقوال الأئمة في تضعيف هذا الحديث قال:"هذا الحديث يعارضه حديث أبي هريرة … في سؤال الصيادين، إنا نركب البحر، ونحمل معنا القليل من الماء ولم ينكر عليهم" اهـ.

لكن ثبت ذلك موقوفا من قول عبد الله بن عمرو بن العاص، فقد روى البيهقي (4/ 334) من طريق شعبة وهمام عن قتادة، عن أبي أيوب - وهو المراغي - عن عبد الله بن عمرو أنه قال:"ماء البحر لا يجزئ من وضوء، ولا من جنابة، إن تحت البحر نارًا، ثم ماءًا ثم نارًا حتى عد سبعة أبحر وسبعة أنيار".

وإسناده صحيح.




উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: সমুদ্রে (ভ্রমণকালে) যে ব্যক্তি অসুস্থ হয়ে বমি করে, তার জন্য রয়েছে একজন শহীদের সওয়াব। আর যে ডুবে যায়, তার জন্য রয়েছে দুইজন শহীদের সওয়াব।









আল-জামি` আল-কামিল (7633)


7633 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من مات ولم يغز، ولم يحدث به نفسه مات على شعبة من نفاق".

قال عبد الله بن المبارك: فنرى أن ذلك كان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1910: 158) عن محمد بن عبد الرحمن بن سهم الأنطاكي،
أخبرنا عبد الله بن المبارك، عن وهيب المكي، عن عمر بن محمد بن المنكدر، عن سمي، عن أبي صالح، عن أبي هريرة .. فذكره.

وما قاله عبد الله بن المبارك متجه؛ لأن الزمان كان زمان الجهاد، ولم يكن عندهم جنود خاصة للغزو.

وأما ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"من لقي الله بغير أثر جهاد، لقي الله وفيه ثلمة" فإسناده ضعيف.

رواه الترمذي (1666) وابن ماجه (2763)، والحاكم (2/ 79) من طرق عن الوليد بن مسلم، عن إسماعيل بن رافع، عن سُمي مولى أبي بكر، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم .. فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من حديث الوليد بن مسلم، عن إسماعيل بن رافع. وإسماعيل بن رافع قد ضعّفه بعض أصحاب الحديث. وسمعت محمدًا يقول: هو ثقة مقارب الحديث، وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم".

قلت: إسماعيل بن رافع ضعيف ضعّفه جمهور أهل العلم منهم: أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، والنسائي، والفسوي، وابن عدي، والدارقطني، ولذا لم يستحسن الذهبي في الميزان (1/ 227) قول الترمذي هذا".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জিহাদ না করে মারা যায় এবং এর (জিহাদের) সংকল্পও তার মনে জাগেনি, সে মুনাফিকির একটি শাখার উপর মারা যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7634)


7634 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في غزاة فقال:"إن أقواما بالمدينة خلفنا، ما سلكنا شعبا ولا واديا إلا وهم معنا فيه حبسهم العذر".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2839) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن حميد، عن أنس .. فذكره.

ورواه ابن ماجه (2764) من طريق ابن أبي عدي، عن حميد به. وفيه:"لما رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوة تبوك فدنا من المدينة قال .. فذكر نحوه.

ورواه أبو داود (2508) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن حميد، عن موسى بن أنس بن مالك، عن أبيه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لقد تركتم بالمدينة أقواما ما سرتم مسيرًا، ولا أنفقتم من نفقة، ولا قطعتم من واد إلا وهم معكم فيه" قالوا: يا رسول الله، وكيف يكونون معنا وهم بالمدينة؟ قال:"حبسهم العذر".

قال ابن حجر في تغليق التعليق (3/ 435): هذا عندي حديث صحيح لحسن سياقه وجودة رجاله".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন একটি যুদ্ধে (গাজওয়ায়) ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মদীনায় কিছু লোক আমাদের পেছনে রয়ে গেছে। আমরা এমন কোনো গিরিপথ বা উপত্যকা অতিক্রম করিনি, যেখানে তারা আমাদের সাথে ছিল না। ওজর (বৈধ অপারগতা) তাদের বিরত রেখেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7635)


7635 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في غزاة فقال:"إن بالمدينة لرجالا ما سرتم مسيرًا ولا قطعتم واديًا إلا كانوا معكم حبسهم المرضُ".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1911: 159) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر .. فذكره.

ورواه من طريق وكيع عن الأعمش به وفيه:"إلا شركوكم في الأجر".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মদীনায় এমন কিছু লোক রয়েছে, তোমরা এমন কোনো দূরত্ব অতিক্রম করোনি কিংবা কোনো উপত্যকা পার হওনি, যেখানে তারা তোমাদের সাথে ছিল না। অসুস্থতাই তাদের আটকে রেখেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7636)


7636 - عن أم حرام أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"أول جيش من أمتي يغزون البحر قد أوجبوا"، قالت أم حرام: قلت: يا رسول الله، أنا فيهم؟ قال:"أنتِ فيهم"، ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أول جيش من أمتي يغزون مدينة قيصر مغفور لهم"، فقلت: أنا فيهم يا رسول الله؟ قال:"لا".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2924)، عن إسحاق بن يزيد الدمشقي، حدثنا يحيى بن حمزة، حدثني ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، أن عمير بن الأسود العنسي حدثه أنه أتى عبادة بن الصامت وهو نازل في ساحة حمص، وهو في بناء له ومعه أم حرام، قال عمير: فحدثتنا أم حرام فذكرته.

قوله:"مدينة قيصر" يعني القسطنطنية، وكان أول من غزاها يزيد بن معاوية في سنة (52 هـ)، وقيل: مدينة قيصر هي حمص والصواب الأول. راجع الفتح (6/




উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার উম্মতের যে প্রথম বাহিনী সমুদ্রে যুদ্ধযাত্রা করবে, তারা (জান্নাত) নিশ্চিত করে নিয়েছে।" উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি তাদের মধ্যে থাকব? তিনি বললেন: "তুমি তাদের মধ্যে থাকবে।" এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার উম্মতের যে প্রথম বাহিনী কায়সারের শহর আক্রমণ করবে, তাদের ক্ষমা করে দেওয়া হবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি তাদের মধ্যে থাকব? তিনি বললেন: "না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7637)


7637 - عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن رسول الله قال:"عصابتان من أمتي أحرزهما الله من النار: عصابة تغزو الهند، وعصابة تكون مع عيسى بن مريم".

حسن: رواه النسائي (3175) عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحيم، قال: حدثنا أسد بن موسى قال: حدثنا بقية قال: حدثني أبو بكر الزبيدي، عن أخيه محمد بن الوليد، عن لقمان بن عامر، عن عبد الأعلى بن عدي البهراني، عن ثوبان .. فذكره.

وفي الإسناد بقية - وهو ابن الوليد - مدلس، ولكنه صرح بالتحديث كما أنه لم ينفرد به وشيخه أبو بكر - وهو ابن الوليد الزبيدي - مجهول. ولكنه لم ينفرد به أيضا.

فرواه الإمام أحمد (22396) من طريق بقية قال: حدثنا عبد الله بن سالم وأبو بكر بن الوليد الزبيدي به.

ورواه الطبراني في الأوسط (6737)، وفي مسند الشاميين (1851) من طريق آخر عن الجراح
ابن مليح البهراني، عن محمد بن الوليد الزبيدي بإسناده. وبهذه المتابعات صار الإسناد حسنا.

تنبيه: وقع في نسخة مطبوعة للطبراني خلط في الإسناد فتنبه.

قال الطبراني:"لا يُروى هذا الحديث عن ثوبان إلا بهذا الإسناد، تفرد به الزبيدي" أي محمد بن الوليد. قلت: وهو ليس كما قال، فقد روي أيضا من غير محمد بن الوليد الزبيدي كما رأيت.




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের দুটি দলকে আল্লাহ তাআলা জাহান্নাম থেকে রক্ষা করবেন: এক দল যারা ভারত আক্রমণ করবে (ভারতের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবে), এবং অন্য দল যারা ঈসা ইবনে মারইয়াম (আঃ)-এর সাথে থাকবে।









আল-জামি` আল-কামিল (7638)


7638 - عن أبي هريرة قال: وعدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة الهند، فإن أدركتها أنفق فيها نفسي ومالي، فإن أقتل كنت من أفضل الشهداء، وإن أرجع فأنا أبو هريرة المحرر.

حسن: رواه النسائي (3173، 3174)، وأحمد (7128)، والحاكم (3/ 514) كلهم من طريق سيار، عن جبر بن عبيدة، عن أبي هريرة .. فذكره.

وفي إسناده جبر بن عبيدة لا يُذكر له راوٍ غير سيار أبي الحكم، ولم ينقل توثيقه عن أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته. ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة وقد توبع.

فقد رواه ابن أبي عاصم في الجهاد (291) من طريق هاشم بن سعيد، عن كنانة بن نبيه مولى صفية، عن أبي هريرة .. فذكره.

وفي إسناده كنانة بن نبيه روى عنه جمع، ولم ينقل توثيقه عن أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التتريب:"مقبول" أي عند المتابعة.

وفيه أيضا هاشم بن سعيد وهو ضعيف.

ورواه أحمد (8823) عن يحيى بن إسحاق، أخبرنا البراء، عن الحسن، عن أبي هريرة قال: حدثني خليلي الصادق المصدوق أنه قال: يكون في هذه الأمة بعثٌ إلى الهند والسند ثم ذكر قول أبي هريرة نحوه.

والبراء، وهو ابن عبد الله الغنوي ضعيف.

وفي سماع الحسن من أبي هريرة خلاف، والصحيح أنه لم يسمع منه.

وبمجموع هذه الطرق والأسانيد يصير الحديث حسنا.

وقد وقعت كما قال النبي صلى الله عليه وسلم؛ فإن المسلمين بدؤوا في غزوة الهند في زمن معاوية سنة 44 هـ

ثم تتابعت الغزوات على يد محمد بن القاسم ومحمود بن سبكتكين وغيرهما. حتى صارت الهند من دار الإسلام وبقيت ثمانية قرون تحت حكم المسلمين حتى استولى عليها الاستعمار البريطاني في عام 1858 م، في عهد آخر ملوك الهند وهو بهادر شاه ظفر وُلِدَ عام 1757 م، وتوفي عام 1862 م في منفاه"رانغون" عاصمة بورما.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে ভারত আক্রমণের (গাযওয়াতুল হিন্দ) প্রতিশ্রুতি করেছিলেন। যদি আমি তা উপলব্ধি করতে পারি (বা তাতে শরীক হতে পারি), তবে আমি আমার জীবন ও সম্পদ তাতে ব্যয় করব। যদি আমি নিহত হই, তবে আমি শ্রেষ্ঠ শহীদদের অন্তর্ভুক্ত হব। আর যদি আমি ফিরে আসি, তবে আমি হব আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যিনি (জাহান্নামের আগুন থেকে) মুক্তিপ্রাপ্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (7639)


7639 - عن أبي أمامة أن رجلا قال: يا رسول الله ائذن لي بالسياحة، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن سياحة أمتي الجهاد في سبيل الله".

حسن: رواه أبو داود (2486)، والحاكم (2/ 73)، والبيهقي (9/ 161) من طريق محمد بن عثمان التنوخي أبي الجماهر، حدثنا الهيثم بن حميد، أخبرني العلاء بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم أبي عبد الرحمن، فإنه مختلف فيه، والأقرب أنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললো, “হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাকে পর্যটনের (সন্ন্যাসীসুলভ ভ্রমণের) অনুমতি দিন।” নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয় আমার উম্মতের পর্যটন হলো আল্লাহর পথে জিহাদ।”









আল-জামি` আল-কামিল (7640)


7640 - عن * *




৭৬৪০ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (7641)


7641 - عن أبي موسى الأشعري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: الرجل يقاتل للمغنم، والرجل يقاتل للذكر، والرجل يقاتل ليرى مكانه فمن في سبيل الله؟ قال:"من قاتل لتكون كلمة الله هي العليا فهو في سبيل الله".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2810)، ومسلم في الإمارة (1904: 149) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة قال: سمعت أبا وائل قال: حدثنا أبو موسى الأشعري فذكره.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: একজন লোক যুদ্ধ করে গনীমতের জন্য, আরেকজন লোক যুদ্ধ করে খ্যাতির জন্য, আরেকজন লোক যুদ্ধ করে তার বীরত্ব দেখানোর জন্য। তাহলে কে আল্লাহর পথে (জিহাদকারী)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর বাণীকে সমুন্নত করার জন্য যুদ্ধ করে, সে-ই আল্লাহর পথে (জিহাদকারী)।"









আল-জামি` আল-কামিল (7642)


7642 - عن أبي موسى الأشعري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، ما القتال في سبيل الله؟ فإن أحدنا يقاتل غضبا، ويقاتل حمية، فرفع إليه رأسه، قال: - وما رفع إليه رأسه إلا أنه كان قائما - فقال:"من قاتل لتكون كلمة الله هي العليا، فهو في سبيل الله عز وجل".

وفي رواية:"يقاتل شجاعةً، ويقاتل حمية، ويقاتل رياءً".

متفق عليه: رواه البخاري في العلم (123)، ومسلم في الإمارة (1904: 151) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن أبي موسى .. فذكره.

والرواية الأخرى للبخاري في التوحيد (7458)، ومسلم في الإمارة (1904: 150) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي وائل شقيق به.

وقد ذكر هذه الروايات الحافظ في الفتح (6/ 28) فقال:"فالحاصل من رواياتهم أن القتال يقع بسبب خمسة أشياء: طلب المغنم، وإظهار الشجاعة، والرياء، والحمية، والغضب".




আবু মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে জিজ্ঞেস করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর পথে (ফি সাবিলিল্লাহ) যুদ্ধ কাকে বলে? কারণ আমাদের কেউ রাগের বশে যুদ্ধ করে এবং কেউ গোত্রীয় অহমিকার কারণে যুদ্ধ করে। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে মাথা উঠালেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর বাণীকে সমুন্নত করার উদ্দেশ্যে যুদ্ধ করে, সে-ই আল্লাহ তা'আলার পথে রয়েছে।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "কেউ সাহসিকতা দেখানোর জন্য যুদ্ধ করে, কেউ গোত্রীয় অহমিকার জন্য যুদ্ধ করে এবং কেউ বা লোক দেখানোর জন্য যুদ্ধ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7643)


7643 - عن سليمان بن يسار قال: تفرّق الناسُ عن أبي هريرة، فقال له ناتلُ أهل الشام: أيها الشيخ حدِّثْنا حديثا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أول الناس يقضى يوم القيامة عليه رجلٌ استشهد، فأتي به، فعرّفه نعمه، فعرفها، قال: فما عملتَ فيها؟ قال: قاتلتُ فيك حتى استشهدت، قال: كذبت، ولكنك قاتلت لأن يقال: جريء، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه، حتى
ألقي في النار. ورجلٌ تعلّم العلم، وعلمه، وقرأ القرآن، فأتي به، فعرّفه نعمه فعرفها، قال: فما عملت فيها؟ قال: تعلمت العلم وعلمته، وقرأت فيك القرآن، قال: كذبت ولكنك تعلمت العلم ليقال: عالم، وقرأت القرآن، ليقال: هو قارئ، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه حتى ألقي في النار. ورجلٌ وسَّع الله عليه، وأعطاه من أصناف المال كله فأتي به، فعرفه نعمه فعرفها، قال: فما عملتَ فيها؟ قال: ما تركت من سبيل تحب أن ينفق فيها إلا أنفقتُ فيها لك، قال: كذبت، ولكنك فعلت ليقال: هو جواد، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه، ثم ألقي في النار".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1905: 152) عن يحيى بن حبيب الحارثي، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا ابن جريج، حدثني يونس بن يوسف، عن سليمان بن يسار .. فذكره.

وقوله:"ناتل أهل الشام" وهو ناتل بن قيس الخزاعي، ومكان كبير قومه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সুলাইমান ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে লোকেরা বিচ্ছিন্ন হয়ে গেলে শামের অধিবাসী নাতিল তাকে বললেন, "হে শায়খ, আমাদেরকে একটি হাদীস বর্ণনা করুন যা আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছেন।" তিনি বললেন, "হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'কিয়ামতের দিন সর্বপ্রথম যাদের বিরুদ্ধে ফয়সালা করা হবে, তারা হলো—

একজন লোক যে শহীদ হয়েছিল। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আমি আপনার সন্তুষ্টির জন্য যুদ্ধ করেছি এবং শেষ পর্যন্ত শহীদ হয়েছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি যুদ্ধ করেছিলে, যেন লোকে তোমাকে ‘বীর’ বা ‘সাহসী’ বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।

আরেকজন লোক যে জ্ঞান শিক্ষা করেছে, তা শিক্ষা দিয়েছে এবং কুরআন তিলাওয়াত করেছে। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আমি আপনার সন্তুষ্টির জন্য জ্ঞান অর্জন করেছি, তা শিক্ষা দিয়েছি এবং আপনার জন্য কুরআন তিলাওয়াত করেছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি এই জন্য জ্ঞান অর্জন করেছিলে যেন লোকে তোমাকে ‘আলেম’ বলে এবং কুরআন তিলাওয়াত করেছিলে যেন লোকে তোমাকে ‘কারী’ (পাঠক) বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।

আরেকজন লোক, যাকে আল্লাহ স্বচ্ছলতা দান করেছেন এবং সকল প্রকার সম্পদ দিয়েছেন। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আপনার পছন্দনীয় এমন কোনো পথ আমি পরিত্যাগ করিনি যেখানে আপনি ব্যয় করা ভালোবাসেন, বরং আমি আপনারই জন্য তাতে খরচ করেছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি এই জন্য ব্যয় করেছো যেন লোকে তোমাকে ‘দানশীল’ (জাওয়াদ) বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।'"









আল-জামি` আল-কামিল (7644)


7644 - عن معاذ بن جبل، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"الغزو غزوان: فأما من ابتغى وجه الله، وأطاع الإمام، وأنفق الكريمة، وياسر الشريك، واجتنب الفساد، فإن نومه ونبهه أجر كله. وأما من غزا فخرًا ورياءً وسمعةً، وعصى الإمام، وأفسد في الأرض، فإنه لم يرجع بالكفاف".

حسن: رواه أبو داود (2515)، والنسائي (3188، 4195)، والحاكم (2/ 85)، والبيهقي (9/ 168) كلهم من طرق عن بقية بن الوليد قال: حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي بحرية، عن معاذ بن جبل .. فذكره.

وهذا إسناد حسن من أجل بقية بن الوليد.

وأبو بحرية هو عبد الله بن قيس الكندي. وقد اختلف في إسناده فمنهم من ذكر أبا بحرية، ومنهم من أسقطه، والصواب ذكره كما في الرواية المذكورة. انظر: علل الدارقطني (6/ 84 - 85).

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

وقوله:"ياسر الشريك" من المياسرة بِمعنى المساهلة أي ساهل الرفيق وعامله باليسر.

وقوله:"لم يرجع" أي لم يرجع لا له ولا عليه من ثواب تلك الغزوة وعقابها، بل يرجع وقد لزمه الإثم؛ لأن الطاعات إذا لم تقع بصلاح سريره انقلبت معاصي، والعاصي آثم قاله صاحب العون.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জিহাদ দুই প্রকার। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে জিহাদ করে, ইমামের (নেতার) আনুগত্য করে, উত্তম সম্পদ খরচ করে, সঙ্গীর সাথে উদার ব্যবহার করে এবং ফাসাদ (বিশৃঙ্খলা) থেকে বিরত থাকে, নিশ্চয়ই তার নিদ্রা ও জাগরণ—সবকিছুই সওয়াব বলে গণ্য হয়। আর যে ব্যক্তি অহংকার, লোক দেখানো (রিয়া) ও সুখ্যাতির জন্য জিহাদ করে, ইমামের (নেতার) অবাধ্য হয় এবং পৃথিবীতে বিপর্যয় সৃষ্টি করে, সে (আল্লাহর কাছে) কোনো প্রতিদান নিয়ে ফিরে আসতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7645)


7645 - عن أبي أمامة الباهلي قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: أرأيت رجلا غزا يلتمس الأجر والذكر ما له؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شيء له" فأعادها ثلاث مرات، يقول له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شيء له"، ثم قال:"إن الله لا يقبل من العمل إلا ما كان
له خالصا وابتغي به وجهه".

حسن: رواه النسائي (3140) عن عيسى بن هلال الحمصي قال: حدثنا محمد بن حمير، حدثنا معاوية بن سلام، عن عكرمة، عن شداد أبي عمار، عن أبي أمامة الباهلي .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل عيسى بن هلال الحمصي ومحمد بن حمير وعكرمة بن عمار، فإن كلا منهم حسن الحديث.

وقد حسّن إسناده العراقي في المغني عن حمل الأسفار، وجوّده ابن حجر في الفتح (6/ 28).

وفي الباب ما روي عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من غزا في سبيل الله، ولم ينوِ إلا عقالا فله ما نوى".

رواه النسائي (3138، 3139)، وأحمد (22692)، والحاكم (2/ 109) من طريق حماد بن سلمة، عن جبلة بن عطية، عن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن جده عبادة بن الصامت .. فذكره.

وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد.

قلت: في إسناده يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، لم يعرف له راو غير جبلة بن عطية، ولم يؤثر توثيقه عن أحد إلا أن أبن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا.

وفي الباب ما روي عن عبد الله بن عمرو قال: جاء أعرابي علوي جريء جافٍ فقال: يا رسول الله، أخبرنا عن الهجرة، أهي إليك حيث كنت؟ أم إلى آرض معروفة؟ أم لقوم خاصة؟ أم إذا مت انقطعت؟ قال: فسكت عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال:"أين السائل؟" قال: ها أنا ذا يا رسول الله، قال:"الهجرة أن تهجر الفواحش ما ظهر منها وما بطن، ثم أنت مهاجر وإن مت في الحضر".

قال عبد الله بن عمرو: فقال رجل: يا رسول الله، أخبرنا عن ثياب أهل الجنة، أخلْق تخلق، أم نسْج تنسج؟ فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وضحك بعض القوم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مم تضحكون؟" أمن جاهل يسأل عالما؟ ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أين السائل؟" قال: ها أنا ذا يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بل تتشقق عنها ثمر الجنة، بل تتشقق عنها ثمر الجنة مرتين"، فقلتُ: يا رسول الله، وما تقول في الهجرة والجهاد؟ فقال:"يا عبد الله، ابدأ بنفسك فاغزها، وأبدأ بنفسك فجاهدها، فإنك إن قُتِلت فارًّا بعثك الله فارًّا، وإن قتلت مرائيا بعثك الله مرائيا، وإن قتلت صابرًا محتسبا بعثك الله صابرًا محتسبا".

رواه أبو داود الطيالسي (2391) عن محمد بن مسلم بن أبي الوضاح، عن العلاء بن عبد الله بن رافع، عن حنان بن خارجة، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.

ورواه أبو داود السجستاني (2519)، والحاكم (2/ 85 - 86) من طريق عبد الرحمن بن مهدي،
عن محمد بن الوضاح به، الشطر الأخير فحسب، ولفظه: قال عبد الله بن عمرو: يا رسول الله أخبرني عن الجهاد والغزو. فقال:"يا عبد الله بن عمرو، إن قاتلت صابرا محتسبًا بعثك الله صابرًا محتسبًا وإن قاتلت مرائيا مكاثرًا بعثك الله مرائيًا مكاثرًا، يا عبد الله بن عمرو، على أي حال قاتلت أو قتلت بعثك الله على تلك الحال".

ورواه أحمد (7095) عن ابن مهدي به مطولا إلا أنه ليس فيه الشطر الأخير.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، ومحمد بن أبي الوضاح المؤدب ثقة مأمون".

قلت: في إسناده حنان بن خارجة قال الذهبي في الميزان (1/ 618):"لا يعرف، تفرد عنه العلاء بن عبد الله بن رافع، أشار ابن القطان إلى تضعيفه للجهل بحاله".

قلت: وذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا، وأما ما وقع عند أحمد (6890) أن الراوي عن عبد الله بن عمرو: الفرزدق بن حنان، فهو وهم، والصواب أن الحديث لحنان بن خارجة لا شك فيه، كما قال ابن حجر في النكت الظراف (6/ 287).

وأما ما روي عن أبي هريرة: أن رجلا قال: يا رسول الله، رجل يريد الجهاد في سبيل الله وهو يبتغي عرضا من عرض الدنيا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا أجر له". فأعظم ذلك الناس، وقالوا للرجل: عُد لرسول الله صلى الله عليه وسلم فلعلك لم تفهمه. فقال: يا رسول الله رجل يريد الجهاد في سبيل الله، وهو يبتغي عرضا من عرض الدنيا. فقال:"لا أجر له". فقالوا للرجل: عد لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له: الثالثة، فقال له:"لا أجر له". فلا يصح إسناده.

رواه أبو داود (2516)، وأحمد (7900، 8793) وصحّحه ابن حبان (4637)، والحاكم (2/ 85)، والبيهقي (9/ 169) كلهم من طرق عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن عبد الله الأشج، عن ابن مكرز - رجل من الشام - عن أبي هريرة .. فذكره.

قال الحاكم: صحيح الإسناد.

قلت: هذا إسناد ضعيف من أجل ابن مكرز، وقد جاء اسمه عند أحمد (8793) يزيد بن مكرز، وهو مجهول كما قال ابن المديني. انظر: ترجمة أيوب بن عبد الله بن مكرز في تهذيب الكمال.

ووقع اسمه في المستدرك:"أيوب بن مكرز" وفي صحيح ابن حبان"مكرز" دون كلمة"ابن" مع أن الحديث عندهما من طريق ابن المبارك، وهو عنده في الجهاد (227) وفيه"ابن مكرز" ومن طريق ابن المبارك أخرجه أيضا أبو داود، وفيه أيضا"ابن مكرز" إذًا فالصواب في رواية ابن المبارك:"ابن مكرز، ورواه حسين بن محمد، عن ابن أبي ذئب به. فسماه (يزيد بن مكرز) كما
عند أحمد (8793).

قال المزي في ترجمة أيوب بن عبد الله بن مكرز في تهذيب الكمال (1/ 320) بعد ما أشار إلى رواية أحمد المذكورة:"فتبين بذلك أن ابن مكرز الذي روى له أبو داود رجل مجهول، كما قال ابن المديني، وأنه ليس بأيوب بن مكرز هذا. والله أعلم".

وعلى فرض أنه أيوب بن عبد الله بن مكرز فهو مجهول أيضا. وقد قال الحافظ في التقريب:"مستور".




আবু উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: আপনি এমন ব্যক্তি সম্পর্কে কী বলেন, যে পুরস্কার (সওয়াব) ও খ্যাতি উভয়টি চাওয়ার উদ্দেশ্যে যুদ্ধে যায়? তার জন্য কী আছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য কিছুই নেই।" সে লোকটি তিনবার কথাটি পুনরাবৃত্তি করল, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তার জন্য কিছুই নেই।" অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা সেই আমল ছাড়া অন্য কিছু কবুল করেন না যা একান্তভাবে তাঁর জন্য করা হয় এবং যার দ্বারা কেবল তাঁর সন্তুষ্টি চাওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7646)


7646 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"وإذا استنفرتم فانفروا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3077)، ومسلم في الإمارة (1353: 85) كلاهما من حديث منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس .. فذكره.

قال ابن قدامة:"وأمر الجهاد موكول إلى الإمام واجتهاده، ويلزم الرعية طاعته فيما يراه من ذلك". المغني (13/ 16).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আর যখন তোমাদেরকে যুদ্ধে বের হওয়ার জন্য আহ্বান জানানো হয়, তখন তোমরা বের হয়ে যাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7647)


7647 - عن عائشة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الهجرة؟ فقال:"لا هجرة بعد الفتح، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1864: 86) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، من عطاء، عن عائشة .. فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন, "মক্কা বিজয়ের পর আর কোনো হিজরত নেই, তবে রয়েছে জিহাদ ও (সৎ) নিয়ত। আর যখন তোমাদেরকে (অভিযানে) বের হতে আহ্বান করা হয়, তখন তোমরা বের হও।"