আল-জামি` আল-কামিল
7621 - عن بريدة بن الحصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حرمة نساء المجاهدين على القاعدين كحرمة أمهاتهم، وما من رجل من القاعدين يخلف رجلا من المجاهدين في أهله، فيخونه فيهم إلا وقف له يوم القيامة، فيأخذ من عمله ما شاء، فما ظنكم؟ !".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1897: 139) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن علقمة بن مرثد، من سليمان بن بريدة، عن أبيه .. فذكره.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "(জিহাদ থেকে) পশ্চাতে অবস্থানকারীদের জন্য মুজাহিদদের স্ত্রীদের সম্মান তাদের নিজ নিজ মায়েদের সম্মানের অনুরূপ। আর যখনই কোনো ব্যক্তি পশ্চাতে অবস্থান করে কোনো মুজাহিদের অনুপস্থিতিতে তার পরিবারের দেখাশোনা করে, অতঃপর সে তাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করে, তখন কিয়ামতের দিন মুজাহিদ তার সামনে দাঁড়াবে এবং তার (বিশ্বাসঘাতকের) নেক আমল থেকে যা ইচ্ছা গ্রহণ করে নেবে। সুতরাং, তোমাদের কী ধারণা (এই বিষয়ে)?!"
7622 - عن عمرو بن عبسة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من شاب شيبة في سبيل الله كانت له نورًا يوم القيامة".
صحيح: رواه الترمذي (1635) عن إسحاق بن منصور المروزي، أخبرنا حيوة بن شُريح الحمصي، عن بقية، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن عمرو بن عبسة .. فذكره.
وقال: هذا حديث حسن صحيح غريب.
قلت: إسناده حسن من أجل بقية بن الوليد؛ فإنه حسن الحديث إذا صرّح بالتحديث وقد صرح به كما في مسند أحمد (194440).
وسبق الكلام عليه في كتاب الصلاة، باب فضل بناء المساجد، وصحَّ بإسناد آخر عن أبي نجيح عمرو بن عبسة السلمي كما سيأتي في باب فضل الرمي.
আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে দ্বীনের কাজে) তার একটি চুল সাদা করলো (পাকালো), তা কিয়ামতের দিন তার জন্য আলো হবে।"
7623 - عن فضالة بن عبيد أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من شاب شيبة في سبيل الله كانت له نورا يوم القيامة"، فقال رجل عند ذلك: فإن رجالا ينتفون الشيب فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم فلينتف نوره.
وفي لفظ:"من شاء أن ينتف شيبة - أو قال: نوره -".
حسن: رواه ابن أبي عاصم في الجهاد (168)، والطبراني في الكبير (18/ 304) من طرق عن وهب بن جرير بن حازم، حدثنا أبي، سمعت يحيى بن أيوب يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد العزيز بن أبي الصعبة، عن حنش (وهو الصنعاني)، عن فضالة بن عبيد .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد العزيز بن أبي الصَّعْبة فإنه لا بأس به، ويحيى بن أيوب هو الغافقي صدوق وقد توبع.
رواه أحمد (23952) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب به. وابن لهيعة فيه كلام معروف، لكن رواية قتيبة بن سعيد عنه أصح كرواية العبادلة عنه. والله أعلم.
ফযালাহ ইবন উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (জিহাদের কারণে) একটি চুলও সাদা করেছে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূর (আলো) হবে।' তখন এক ব্যক্তি বলল: 'নিশ্চয়ই কিছু লোক তাদের পাকা চুল তুলে ফেলে।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'সে যেন তার নূরই তুলে ফেলে।'
অন্য এক বর্ণনায় আছে: 'যে ব্যক্তি পাকা চুল—অথবা তিনি বললেন: তার নূর—তুলে ফেলতে চায় (সে যেন তা করে)।'
7624 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أنفق زوجين في سبيل الله دعاه خزنة الجنة - كل خزنة باب - أي فُلُ هلُمَّ"، قال أبو بكر: يا رسول الله ذاك الذي لا توى عليه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إني لأرجو أن تكون منهم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2841)، ومسلم في الزكاة (1027: 86) كلاهما من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سمع أبا هريرة .. فذكره.
قوله:"زوجين" أي شيئين من أي نوع كان مما ينفق، والزوج يطلق على الواحد وعلى الاثنين، والمراد هنا الواحد كما في الفتح (6/ 49).
وقوله:"أي فُلْ" ترخيم من فلان.
وقوله:"ذاك الذي لا توى عليه" أي لا ضياع، ولا خسارة وهو من التوى: الهلاك. قاله ابن الأثير.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় দুটি জিনিস (যুগল) খরচ করবে, জান্নাতের রক্ষকরা তাকে ডাকবে—প্রত্যেক দরজার রক্ষকই (তাকে ডেকে) বলবে, ‘ওহে অমুক! চলে এসো!’” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! সে তো এমন ব্যক্তি, যার কোনো ক্ষতি বা বিনাশ হবে না!” তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “আমি আশা করি যে তুমি তাদের অন্তর্ভুক্ত হবে।”
7625 - عن أبي سعيد الخدري: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على المنبر، فقال:"إنما أخشى عليكم من بعدي ما يفتح عليكم من بركات الأرض"، ثم ذكر زهرة الدنيا، فبدأ بإحداهما وثنى بالأخرى، فقام رجل فقال: يا رسول الله، أويأتي الخير بالشر؟ فسكت عنه النبي صلى الله عليه وسلم، قلنا: يوحى إليه وسكت الناس كأن على رءوسهم الطير، ثم إنه مسح عن وجهه الرحضاء، فقال:"أين السائل آنفا؟ أو خير هو، - ثلاثا -، إدن الخير لا يأتي إلا بالخير، وإنه كلما ينبت الربيع ما يقتل حبطا أو يلم إلا آكلة الخضر كلما أكلت، حتى إذا امتلأت خاصرتاها استقبلت الشمس، فثلطت وبالت ثم رتعت، وإن هذا المال خضرة حلوة، ونعم صاحب المسلم لمن أخذه بحقه فجعله في سبيل الله واليتامى والمساكين وابن السبيل، ومن لم يأخذه بحقه فهو كالآكل الذي لا يشبع، ويكون عليه شهيدًا يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2842)، ومسلم في الزكاة (1052: 123) كلاهما من طريق هلال بن أبي ميمونة، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.
وقوله:"حبطا" الحبط أن تستكثر الماشية من المرعى حتى تنتفخ بطونها، وتربو فربما كان في ذلك هلاكها.
وقوله:"يلم" أي يقارب الهلاك.
قال الأزهري:"هذا الخبر إذا تدبر لم يكد يفهم، وفيه مثلان فضرب أحدهما للمفرط في جمع الدنيا ومنعها من حقها، وضرب الآخر للمقتصد في أخذها والانتفاع بها، فإن قوله: وإن مما ينبت الربيع ما يقتل حبطا" فهو مثل للمفرط الذي يأخذها بغير حق، وذلك أن الربيع ينبت أحرار البقول والعشب، فتستكثر منها الماشية حتى تنتفخ بطونها لما جاوزت حد الاحتمال، فتنشق أمعاؤها وتهلك، كذلك الذي يجمع الدنيا من غير حلها، ويمنع ذا الحق حقه يهلك في الآخرة بدخوله النار. وأما مثل المقتصد فقوله صلى الله عليه وسلم"إلا آكلة الخضر …" إلى آخره وذلك أن آكلة الخضر ليست من أحرار البقول التي ينبتها الربيع لكنها من الجنبة التي ترعاها المواشي بعد هيج البقول. فضرب النبي صلى الله عليه وسلم آكلة الخضر من المواشي مثلا أسمن يقتصد في أخذه الدنيا وجمعها، ولا يحمله الحرص على أخذها بغير حقها فهو ينجو من وبالها كما نجت آكلة الخضرة" الخ. انظر: الديباج للسيوطي.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিম্বরের উপর দাঁড়ালেন এবং বললেন: "আমার পরে আমি তোমাদের জন্য কেবল সেই জিনিসই আশঙ্কা করি যা পৃথিবীর বরকত (প্রাচুর্য) থেকে তোমাদের জন্য উন্মুক্ত করে দেওয়া হবে।" এরপর তিনি দুনিয়ার চাকচিক্য (সৌন্দর্য) সম্পর্কে আলোচনা করলেন। তিনি প্রথমটির (প্রাচুর্য) দ্বারা শুরু করলেন এবং দ্বিতীয়টি (চাকচিক্য) দ্বারা সমাপ্ত করলেন। তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! কল্যাণ কি অকল্যাণ নিয়ে আসে? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার কথার কোনো জবাব দিলেন না। আমরা (উপস্থিত লোকেরা) বলাবলি করছিলাম যে, তাঁর কাছে ওহী আসছে। লোকেরা এমন নীরব হয়ে গেল যেন তাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে। এরপর তিনি তাঁর মুখমণ্ডল থেকে ঘাম মুছলেন এবং বললেন: "এইমাত্র প্রশ্নকারী লোকটি কোথায়? অথবা (এভাবে বললেন): এটি কি কল্যাণ? (এই কথাটি) তিনি তিনবার বললেন। শোনো! কল্যাণ কেবল কল্যাণই নিয়ে আসে। আর বসন্তকালে যা কিছু জন্মায় (ঘাস/উদ্ভিদ), তা অবশ্যই এমনভাবে (পেট ফেটে) হত্যা করে অথবা মৃত্যুর কাছাকাছি নিয়ে যায়, যেমন (অতিরিক্ত খাওয়ার কারণে পশুর) পেট ফেটে যায়। তবে (ঐ পশু নয়), যে শুধু সবুজ তৃণলতা খায় (তা নিরাপদ)। যখন সে তা খায় এবং তার পাঁজর পরিপূর্ণ হয়ে যায়, তখন সে সূর্যের দিকে মুখ করে, মলত্যাগ করে এবং পেশাব করে, অতঃপর আবার চরে বেড়ায়। আর এই ধন-সম্পদ সুমিষ্ট সবুজ (তৃণলতার) মতো। সে মুসলিমের জন্য কত উত্তম সাথী যে তা ন্যায়ের সাথে গ্রহণ করে এবং আল্লাহর পথে, ইয়াতিমদের, মিসকিনদের এবং মুসাফিরদের জন্য ব্যয় করে। আর যে ব্যক্তি তা ন্যায়ের সাথে গ্রহণ করে না, সে এমন ভোজনকারীর মতো যে কখনও পরিতৃপ্ত হয় না। কিয়ামতের দিন তা তার বিরুদ্ধে সাক্ষী হয়ে থাকবে।
7626 - عن أبي مسعود الأنصاري قال: جاء رجل بناقة مخطومة فقال: هذه في سبيل الله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لك بها يوم القيامة سبعمائة ناقة، كلها مخطومة".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1892: 132) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أخبرنا جرير، عن الأعمش، عن أبي عمرو الشيباني، عن أبي مسعود الأنصاري .. فذكره.
আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি লাগামযুক্ত একটি উটনী নিয়ে আসলো এবং বলল: এটি আল্লাহর রাস্তায় (দান করা হলো)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “কিয়ামতের দিন এর বিনিময়ে তোমার জন্য সাতশো উটনী রয়েছে, যার সবক’টিই লাগামযুক্ত হবে।”
7627 - عن ثوبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل دينار يُنفقه الرجل: دينار يُنفقه على عياله، ودينار يُنفقه الرجل على دابته في سبيل الله، ودينار يُنفقه على أصحابه في سبيل الله".
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (994) من طريقين عن حماد بن زيد، حدثنا أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان .. فذكره.
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একজন ব্যক্তি যে দীনার (মুদ্রা) ব্যয় করে, তার মধ্যে শ্রেষ্ঠ দীনার হলো: যে দীনার সে তার পরিবার-পরিজনের জন্য ব্যয় করে, এবং যে দীনার সে আল্লাহর পথে তার সওয়ারীর (পশুর) জন্য ব্যয় করে, এবং যে দীনার সে আল্লাহর পথে তার সাথীদের জন্য ব্যয় করে।"
7628 - عن خُريم بن فاتك الأسدي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أنفق نفقة في سبيل الله كتبت له بسبع مائة ضعف".
حسن: رواه الترمذي (1625)، وأحمد (19036، 19038)، وابن أبي عاصم في الجهاد (71)، وصحّحه ابن حبان (4647)، والحاكم (2/ 87) كلهم من طرق عن زائدة (هو ابن قدامة) - ورواه أحمد (19035)، وابن حبان (6171) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النحوي - ورواه النسائي في المجتبى (3186)، وفي الكبرى (4395)، وابن أبي عاصم في الجهاد (72) من طريق سفيان (هو الثوري) - ثلاثتهم عن الركين بن الربيع، عن أبيه، عن عمه يُسير بن عميلة، عن خريم بن فاتك .. فذكره. ومنهم من رواه مطولا.
وقد اختلف في إسناده على الركين بن الربيع اختلافا كثيرًا إلا أن رواية شيبان ومن وافقه أصح كما قال البخاري في التاريخ الكبير (8/ 423).
وإسناده حسن من أجل يُسير بن عميلة، فقد وثقه العجلي، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 558 - 557)، وألزم الدارقطني في الإلزامات (ص 125) الشيخين إخراج حديث خُريم بن فاتك من رواية يُسير بن عميلة.
وقال الترمذي:"وهذا حديث حسن، إنما نعرفه من حديث الركين بن الربيع".
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وقد احتج مسلم بالركين بن الربيع وهو كوفي عزيز الحديث، ويُسير بن عميلة عمه".
খুরাইম ইবনে ফাতিক আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো কিছু খরচ করে, তার জন্য সাত শত গুণ (সওয়াব) লেখা হয়।"
7629 - عن صعصعة بن معاوية قال: لقيت أبا ذر قال: قلت: حدثني قال: نعم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من عبد مسلم ينفق من كل مال له زوجين في سبيل الله إلا استقبلته حجبة الجنة كلهم يدعوه إلى ما عنده"، قلت: وكيف ذلك؟ قال: إن كانت إبلا
فبعيرين، وإن كانت بقرًا فبقرتين".
صحيح: رواه النسائي (3185)، وأحمد (21413)، وصحّحه ابن حبان (4643)، والحاكم (2/ 86) من طرق عن الحسن، عن صعصعة بن معاوية .. فذكره. والسياق للنسائي.
وإسناده صحيح، وقد صرح الحسن بالتحديث عند أحمد وابن حبان.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد وصعصعة بن معاوية من مفاخر العرب".
وفي معناه ما روي عن علي بن أبي طالب، وأبي الدرداء، وأبي هريرة، وأبي أمامة الباهلي، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عمرو، وجابر بن عبد الله، وعمران بن الحصين كلهم يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من أرسل بنفقة في سبيل الله وأقام في بيته فله بكل درهم سبعمائة درهم.
ومن غزا بنفسه في سبيل الله، وأنفق في وجه ذلك فله بكل درهم سبعمائة ألف درهم" ثم تلا هذه الآية: {وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَنْ يَشَاءُ}.
رواه ابن ماجه (2761) عن هارون بن عبد الله الحمال، حدثنا ابن أبي فديك، عن الخليل بن عبد الله، عن الحسن، عن علي، وأبي الدرداء، وأبي هريرة، وأبي أمامة، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عمرو، وجابر، وعمران .. فذكروه. ورواه ابن أبي حاتم في تفسيره (2730) عن الخليل بن عبد الله، عن الحسن، عن عمران وحده.
وفي إسناده الخليل بن عبد الله وهو مجهول كما قال ابن حجر.
وقال المنذري في الترغيب (1960):"والحسن لم يسمع من عمران ولا من ابن عمر. وقال الحاكم أكثر مشايخنا على: أن الحسن سمع من عمران".
والجمهور على أنه لم يسمع من أبي هريرة أيضا، وقد سمع من غيرهم والله أعلم.
وأعله البوصيري أيضا بجهالة الخليل، ثم نقل كلام المنذري هذا.
وأما ما روي عن معاذ بن أنس مرفوعا:"إن الصلاة والصيام والذكر تُضاعف على النفقة في سبيل الله عز وجل بسبعمائة ضعف". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2498)، والحاكم (2/ 78)، وعنه البيهقي (9/ 172) من حديث زبّان بن فائد، عن سهل بن معاذ، عن أبيه .. فذكره.
وفي إسناده زبان بن فائد وهو ضعيف بل قال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا، وينفرد عن سهل بن معاذ بنسخة كأنها موضوعة لا يحتج به.
وأما الحاكم فقال:"صحيح الإسناد".
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'সাআহ ইবনু মু'আবিয়াহ বলেন, আমি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে বললাম, আমাকে একটি হাদীস বর্ণনা করুন। তিনি বললেন, হ্যাঁ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিম বান্দা তার প্রত্যেকটি সম্পদ থেকে আল্লাহর পথে জোড়ায় জোড়ায় (যুগল) খরচ করে, জান্নাতের প্রহরীগণ তাকে অভ্যর্থনা জানায়, তাদের প্রত্যেকে তাকে তার নিকট যা আছে সেদিকে আহ্বান করে।" [সা'সাআহ বলেন] আমি বললাম, তা কীভাবে? তিনি বললেন: "যদি তা উট হয়, তবে দুটি উট, আর যদি গরু হয়, তবে দুটি গরু (দান করবে)।"
7630 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قفلة كغزوة".
صحيح: رواه أبو داود (2487)، وأحمد (6625) والحاكم (2/ 73)، والبيهقي (9/ 28) من طرق عن الليث بن سعد: حدثني حيوة بن شريح، عن ابن شُفي الأصبحي، عن أبيه شُفي بن ماتع، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.
إلا أنه ليس في المستدرك:"عن أبيه".
وقد رواه أبو داود (2487) من الوجه الذي عند الحاكم بذكر"عن أبيه" فالظاهر أنه سقط من النساخ، ولذا لم يذكره ابن حجر في إتحاف المهرة (9/ 672). وإسناده صحيح، وابن شُفي هو الحسين.
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
قلت: حسين بن شفي لم يخرج له مسلم، وكذا أبوه وهما ثقتان.
قال الخطابي في معالم السنن (3/ 358) معلقا على الحديث المذكور:"هذا يحتمل وجهين:
أحدهما: أن يكون أراد به القفول عن الغزو والرجوع إلى الوطن يقول: إن أجر المجاهد في انصرافه إلى أهله كأجره في إقباله إلى الجهاد؛ وذلك لأن تجهيز الغازي يضر بأهله وفي قفوله إليهم إزالة الضرر عنهم واستجمام للنفس واستعداد بالقوة للعود.
والوجه الآخر أن يكون أراد بذلك التعقيب وهو رجوعه ثانيا في الوجه الذي جاء منه منصرفا وإن لم يلق عدوًّا ولم يشهد قتالا وقد يفعل ذلك الجيش إذا انصرفوا من مغزاتهم وذلك لأحد أمرين:
أحدهما أن العدو إذا رأوهم قد انصرفوا عن ساحتهم أمنوهم فخرجوا من مكامنهم فإذا قفل الجيش إلى دار العدو نالوا الفرصة منهم فأغاروا عليهم.
والوجه الآخر أنهم إذا انصرفوا من مغزاتهم ظاهرين لم يأمنوا أن يقفو العدو أثرهم فيوقعوا بهم وهم غارون فربما استظهر الجيش أو بعضهم بالرجوع على أدراجهم ينفضون الطريق فإن كان من العدو طلب كانوا مستعدين للقائهم وإلا فقد سلموا وأحرزوا ما معهم من الغنيمة" اهـ.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যাবর্তন (জিহাদ থেকে ফিরে আসা) একটি যুদ্ধের (গাযওয়ার) সমতুল্য।"
7631 - عن أم حرام بنت ملحان قالت: نام النبي صلى الله عليه وسلم يوما قريبا مني، ثم استيقظ يتبسم، فقلت: ما أضحكك؟ قال:"أناس من أمتي عرضوا علي، يركبون هذا البحر الأخضر كالملوك على الأسِرّة"، قالت: فادع الله أن يجعلني منهم فدعا لها، ثم نام الثانية، ففعل مثلها، فقالت مثل قولها فأجابها مثلها، فقالت: ادع الله أن يجعلني منهم، شقال:"أنتِ من الأولين"، فخرجت مع زوجها عبادة بن الصامت غازيا أول ما ركب المسلمون البحر مع معاوية، فلما انصرفوا من غزوهم قافلين، فنزلوا الشام فقربت إليها دابة
لتركبها، فصرعتها، فماتت.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2799، 2800)، ومسلم في الإمارة (1912: 161) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن أنس بن مالك عن خالته أم حرام بنت ملحان .. فذكرته.
قال أبو داود عقب الحديث (2491) ماتت بنت ملحان بقبرص.
উম্মে হারাম বিনতে মিলহান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকটেই ঘুমালেন। এরপর তিনি মুচকি হাসতে হাসতে জেগে উঠলেন। আমি বললাম, কী আপনাকে হাসালো? তিনি বললেন, "আমার উম্মতের কিছু লোককে আমার সামনে পেশ করা হলো, যারা সিংহাসনে উপবিষ্ট বাদশাহদের মতো এই সবুজ সমুদ্রের ওপর আরোহণ করছে।" তিনি বললেন, আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন। অতঃপর তিনি তার জন্য দু'আ করলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার ঘুমালেন এবং আগের মতোই করলেন। তিনিও (উম্মে হারাম) আগের মতোই বললেন এবং তিনি (নবী) একই রকম উত্তর দিলেন। তিনি বললেন, দু'আ করুন যেন আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত হই। তিনি বললেন, "তুমি প্রথম দলভুক্ত হবে।"
এরপর তিনি তাঁর স্বামী উবাদা ইবনু সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে গাযী (যোদ্ধা) হিসেবে বের হলেন, যখন সর্বপ্রথম মুসলিমরা মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সমুদ্রে আরোহণ করলেন। যখন তারা তাদের যুদ্ধ থেকে প্রত্যাবর্তন করে শাম দেশে অবতরণ করলেন, তখন তাঁর আরোহণের জন্য একটি পশু তাঁর কাছে আনা হলো, কিন্তু সেটি তাঁকে আছাড় মারল, ফলে তিনি মারা গেলেন।
7632 - عن أم حرام، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"المائد في البحر الذي يصيبه القيء له أجر شهيد، والغرِق له أجر شهيدين".
حسن: رواه أبو داود (2494)، وابن أبي عاصم في الجهاد (285 - 286) من طرق عن مروان بن معاوية، حدثنا هلال بن ميمون الرملي، عن أبي ثابت يعلى بن شداد، عن أم حرام .. فذكرته.
وإسناده حسن من أجل هلال بن ميمون الرملي؛ فإنه حسن الحديث.
وأما ما روي عن أبي الدرداء أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"غزوة في البحر مثل عشر غزوات في البر، والذي يسدر في البحر كالمتشحط في دمه في سبيل الله". فإسناده ضعيف.
رواه ابن ماجه (2777) عن هشام بن عمار، حدثنا بقية، عن معاوية بن يحيى، عن ليث بن أبي سليم، عن يحيى بن عباد، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، .. فذكره.
وإسناده ضعيف لضعف ليث، ومعاوية بن يحيى - وهو الصدفي - وعنعنة بقية بن الوليد؛ فإنه كان يدلس عن الضعفاء والمجهولين.
وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 159):"هذا إسناد ضعيف لضعف معاوية بن يحيى وشيخه ليث بن أبي سليم".
وقوله:"يسدر" من السدر بالتحريك، كالدوار وهو كثيرًا ما يعرض لراكب البحر.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي أمامة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"شهيد البحر مثل شهيدي البر، والمائدُ في البحر كالمتشحط في دمه في البر. وما بين الموجتين كقاطع الدنيا في طاعة الله. وإن الله عز وجل وكل ملك الموت بقبض الأرواح إلا شهيد البحر، فإنه يتولى قبض أرواحهم. ويغفر لشهيد البر الذنوب كلها إلا الدين، ولشهيد البحر الذنوب والدين".
رواه ابن ماجه (2778)، والطبراني في الكبير (8/ 200) من طريق قيس بن محمد الكندي، حدثنا عفير بن معدان الشامي، عن سليم بن عامر قال: سمعت أبا أمامة يقول .. فذكره.
وفي هذا الإسناد عُفير بن معدان ضعيف، بل قال فيه أبو حاتم: ضعيف الحديث، يكثر الرواية عن سُليم بن عامر، عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم بالمناكير ما لا أصل له لا يشتغل بروايته. الجرح والتعديل (7/ 36).
وبه أعله أيضا البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 159).
وقيس بن محمد هو ابن عمران الكندي لم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (9/ 15) وقال: يعتبر حديثه من غير روايته عن عفير بن معدان".
وكذلك لا يصح ما روي عن عبد الله بن عمرو مرفوعا:"لا يركب البحر إلا حاج، أو معتمر، أو غاز في سبيل الله فإن تحت البحر نارًا وتحت النار بحرًا".
رواه أبو داود (2489) عن سعيد بن منصور (وهو في سننه 2393) قال: حدثنا إسماعيل بن زكريا، عن مطرف، عن بشر أبي عبد الله، عن بشير بن مسلم، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.
وفي إسناده بشر أبو عبد الله وبشير بن مسلم مجهولان، وقد اختلف في إسناده، فمنهم من رواه هكذا، ومنهم من أسقط بشرًا أبا عبد الله، ومنهم من أسقط بشير بن مسلم، ومنهم من رواه على غير هذه الوجوه، ساق الاختلاف فيه البخاري في التاريخ الكبير (2/ 104 - 105)، والخطيب في تلخيص المتشابه (1/ 156 - 158)، والمزي في تحفة الأشراف (6/ 282).
وضعّف هذا الحديث غير واحد من أهل العلم.
قال البخاري في ترجمة مسلم بن بشير الكندي من التاريخ الكبير (2/ 104 - 105) بعد ما ساق الاختلاف في إسناد الحديث المذكور:"لم يصح حديثه".
وقال ابن عبد البر في التمهيد (1/ 240):"هو حديث ضعيف مظلم الإسناد لا يصحّحه أهل العلم بالحديث؛ لأن رواته مجهولون لا يُعرفون …".
وفيه مخالفة لبعض الأحاديث الصحيحة قال ابن حجر في التلخيص (2/ 221) بعد ما ساق أقوال الأئمة في تضعيف هذا الحديث قال:"هذا الحديث يعارضه حديث أبي هريرة … في سؤال الصيادين، إنا نركب البحر، ونحمل معنا القليل من الماء ولم ينكر عليهم" اهـ.
لكن ثبت ذلك موقوفا من قول عبد الله بن عمرو بن العاص، فقد روى البيهقي (4/ 334) من طريق شعبة وهمام عن قتادة، عن أبي أيوب - وهو المراغي - عن عبد الله بن عمرو أنه قال:"ماء البحر لا يجزئ من وضوء، ولا من جنابة، إن تحت البحر نارًا، ثم ماءًا ثم نارًا حتى عد سبعة أبحر وسبعة أنيار".
وإسناده صحيح.
উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: সমুদ্রে (ভ্রমণকালে) যে ব্যক্তি অসুস্থ হয়ে বমি করে, তার জন্য রয়েছে একজন শহীদের সওয়াব। আর যে ডুবে যায়, তার জন্য রয়েছে দুইজন শহীদের সওয়াব।
7633 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من مات ولم يغز، ولم يحدث به نفسه مات على شعبة من نفاق".
قال عبد الله بن المبارك: فنرى أن ذلك كان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1910: 158) عن محمد بن عبد الرحمن بن سهم الأنطاكي،
أخبرنا عبد الله بن المبارك، عن وهيب المكي، عن عمر بن محمد بن المنكدر، عن سمي، عن أبي صالح، عن أبي هريرة .. فذكره.
وما قاله عبد الله بن المبارك متجه؛ لأن الزمان كان زمان الجهاد، ولم يكن عندهم جنود خاصة للغزو.
وأما ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"من لقي الله بغير أثر جهاد، لقي الله وفيه ثلمة" فإسناده ضعيف.
رواه الترمذي (1666) وابن ماجه (2763)، والحاكم (2/ 79) من طرق عن الوليد بن مسلم، عن إسماعيل بن رافع، عن سُمي مولى أبي بكر، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم .. فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب من حديث الوليد بن مسلم، عن إسماعيل بن رافع. وإسماعيل بن رافع قد ضعّفه بعض أصحاب الحديث. وسمعت محمدًا يقول: هو ثقة مقارب الحديث، وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: إسماعيل بن رافع ضعيف ضعّفه جمهور أهل العلم منهم: أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، والنسائي، والفسوي، وابن عدي، والدارقطني، ولذا لم يستحسن الذهبي في الميزان (1/ 227) قول الترمذي هذا".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জিহাদ না করে মারা যায় এবং এর (জিহাদের) সংকল্পও তার মনে জাগেনি, সে মুনাফিকির একটি শাখার উপর মারা যায়।"
7634 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في غزاة فقال:"إن أقواما بالمدينة خلفنا، ما سلكنا شعبا ولا واديا إلا وهم معنا فيه حبسهم العذر".
صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2839) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن حميد، عن أنس .. فذكره.
ورواه ابن ماجه (2764) من طريق ابن أبي عدي، عن حميد به. وفيه:"لما رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوة تبوك فدنا من المدينة قال .. فذكر نحوه.
ورواه أبو داود (2508) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن حميد، عن موسى بن أنس بن مالك، عن أبيه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لقد تركتم بالمدينة أقواما ما سرتم مسيرًا، ولا أنفقتم من نفقة، ولا قطعتم من واد إلا وهم معكم فيه" قالوا: يا رسول الله، وكيف يكونون معنا وهم بالمدينة؟ قال:"حبسهم العذر".
قال ابن حجر في تغليق التعليق (3/ 435): هذا عندي حديث صحيح لحسن سياقه وجودة رجاله".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন একটি যুদ্ধে (গাজওয়ায়) ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মদীনায় কিছু লোক আমাদের পেছনে রয়ে গেছে। আমরা এমন কোনো গিরিপথ বা উপত্যকা অতিক্রম করিনি, যেখানে তারা আমাদের সাথে ছিল না। ওজর (বৈধ অপারগতা) তাদের বিরত রেখেছে।"
7635 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في غزاة فقال:"إن بالمدينة لرجالا ما سرتم مسيرًا ولا قطعتم واديًا إلا كانوا معكم حبسهم المرضُ".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1911: 159) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر .. فذكره.
ورواه من طريق وكيع عن الأعمش به وفيه:"إلا شركوكم في الأجر".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মদীনায় এমন কিছু লোক রয়েছে, তোমরা এমন কোনো দূরত্ব অতিক্রম করোনি কিংবা কোনো উপত্যকা পার হওনি, যেখানে তারা তোমাদের সাথে ছিল না। অসুস্থতাই তাদের আটকে রেখেছে।"
7636 - عن أم حرام أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"أول جيش من أمتي يغزون البحر قد أوجبوا"، قالت أم حرام: قلت: يا رسول الله، أنا فيهم؟ قال:"أنتِ فيهم"، ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أول جيش من أمتي يغزون مدينة قيصر مغفور لهم"، فقلت: أنا فيهم يا رسول الله؟ قال:"لا".
صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2924)، عن إسحاق بن يزيد الدمشقي، حدثنا يحيى بن حمزة، حدثني ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، أن عمير بن الأسود العنسي حدثه أنه أتى عبادة بن الصامت وهو نازل في ساحة حمص، وهو في بناء له ومعه أم حرام، قال عمير: فحدثتنا أم حرام فذكرته.
قوله:"مدينة قيصر" يعني القسطنطنية، وكان أول من غزاها يزيد بن معاوية في سنة (52 هـ)، وقيل: مدينة قيصر هي حمص والصواب الأول. راجع الفتح (6/
উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার উম্মতের যে প্রথম বাহিনী সমুদ্রে যুদ্ধযাত্রা করবে, তারা (জান্নাত) নিশ্চিত করে নিয়েছে।" উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি তাদের মধ্যে থাকব? তিনি বললেন: "তুমি তাদের মধ্যে থাকবে।" এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার উম্মতের যে প্রথম বাহিনী কায়সারের শহর আক্রমণ করবে, তাদের ক্ষমা করে দেওয়া হবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি তাদের মধ্যে থাকব? তিনি বললেন: "না।"
7637 - عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن رسول الله قال:"عصابتان من أمتي أحرزهما الله من النار: عصابة تغزو الهند، وعصابة تكون مع عيسى بن مريم".
حسن: رواه النسائي (3175) عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحيم، قال: حدثنا أسد بن موسى قال: حدثنا بقية قال: حدثني أبو بكر الزبيدي، عن أخيه محمد بن الوليد، عن لقمان بن عامر، عن عبد الأعلى بن عدي البهراني، عن ثوبان .. فذكره.
وفي الإسناد بقية - وهو ابن الوليد - مدلس، ولكنه صرح بالتحديث كما أنه لم ينفرد به وشيخه أبو بكر - وهو ابن الوليد الزبيدي - مجهول. ولكنه لم ينفرد به أيضا.
فرواه الإمام أحمد (22396) من طريق بقية قال: حدثنا عبد الله بن سالم وأبو بكر بن الوليد الزبيدي به.
ورواه الطبراني في الأوسط (6737)، وفي مسند الشاميين (1851) من طريق آخر عن الجراح
ابن مليح البهراني، عن محمد بن الوليد الزبيدي بإسناده. وبهذه المتابعات صار الإسناد حسنا.
تنبيه: وقع في نسخة مطبوعة للطبراني خلط في الإسناد فتنبه.
قال الطبراني:"لا يُروى هذا الحديث عن ثوبان إلا بهذا الإسناد، تفرد به الزبيدي" أي محمد بن الوليد. قلت: وهو ليس كما قال، فقد روي أيضا من غير محمد بن الوليد الزبيدي كما رأيت.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের দুটি দলকে আল্লাহ তাআলা জাহান্নাম থেকে রক্ষা করবেন: এক দল যারা ভারত আক্রমণ করবে (ভারতের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবে), এবং অন্য দল যারা ঈসা ইবনে মারইয়াম (আঃ)-এর সাথে থাকবে।
7638 - عن أبي هريرة قال: وعدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة الهند، فإن أدركتها أنفق فيها نفسي ومالي، فإن أقتل كنت من أفضل الشهداء، وإن أرجع فأنا أبو هريرة المحرر.
حسن: رواه النسائي (3173، 3174)، وأحمد (7128)، والحاكم (3/ 514) كلهم من طريق سيار، عن جبر بن عبيدة، عن أبي هريرة .. فذكره.
وفي إسناده جبر بن عبيدة لا يُذكر له راوٍ غير سيار أبي الحكم، ولم ينقل توثيقه عن أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته. ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة وقد توبع.
فقد رواه ابن أبي عاصم في الجهاد (291) من طريق هاشم بن سعيد، عن كنانة بن نبيه مولى صفية، عن أبي هريرة .. فذكره.
وفي إسناده كنانة بن نبيه روى عنه جمع، ولم ينقل توثيقه عن أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التتريب:"مقبول" أي عند المتابعة.
وفيه أيضا هاشم بن سعيد وهو ضعيف.
ورواه أحمد (8823) عن يحيى بن إسحاق، أخبرنا البراء، عن الحسن، عن أبي هريرة قال: حدثني خليلي الصادق المصدوق أنه قال: يكون في هذه الأمة بعثٌ إلى الهند والسند ثم ذكر قول أبي هريرة نحوه.
والبراء، وهو ابن عبد الله الغنوي ضعيف.
وفي سماع الحسن من أبي هريرة خلاف، والصحيح أنه لم يسمع منه.
وبمجموع هذه الطرق والأسانيد يصير الحديث حسنا.
وقد وقعت كما قال النبي صلى الله عليه وسلم؛ فإن المسلمين بدؤوا في غزوة الهند في زمن معاوية سنة 44 هـ
ثم تتابعت الغزوات على يد محمد بن القاسم ومحمود بن سبكتكين وغيرهما. حتى صارت الهند من دار الإسلام وبقيت ثمانية قرون تحت حكم المسلمين حتى استولى عليها الاستعمار البريطاني في عام 1858 م، في عهد آخر ملوك الهند وهو بهادر شاه ظفر وُلِدَ عام 1757 م، وتوفي عام 1862 م في منفاه"رانغون" عاصمة بورما.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে ভারত আক্রমণের (গাযওয়াতুল হিন্দ) প্রতিশ্রুতি করেছিলেন। যদি আমি তা উপলব্ধি করতে পারি (বা তাতে শরীক হতে পারি), তবে আমি আমার জীবন ও সম্পদ তাতে ব্যয় করব। যদি আমি নিহত হই, তবে আমি শ্রেষ্ঠ শহীদদের অন্তর্ভুক্ত হব। আর যদি আমি ফিরে আসি, তবে আমি হব আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যিনি (জাহান্নামের আগুন থেকে) মুক্তিপ্রাপ্ত।
7639 - عن أبي أمامة أن رجلا قال: يا رسول الله ائذن لي بالسياحة، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن سياحة أمتي الجهاد في سبيل الله".
حسن: رواه أبو داود (2486)، والحاكم (2/ 73)، والبيهقي (9/ 161) من طريق محمد بن عثمان التنوخي أبي الجماهر، حدثنا الهيثم بن حميد، أخبرني العلاء بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل القاسم أبي عبد الرحمن، فإنه مختلف فيه، والأقرب أنه حسن الحديث.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললো, “হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাকে পর্যটনের (সন্ন্যাসীসুলভ ভ্রমণের) অনুমতি দিন।” নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয় আমার উম্মতের পর্যটন হলো আল্লাহর পথে জিহাদ।”
7640 - عن * *
৭৬৪০ - থেকে * *