আল-জামি` আল-কামিল
7641 - عن أبي موسى الأشعري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: الرجل يقاتل للمغنم، والرجل يقاتل للذكر، والرجل يقاتل ليرى مكانه فمن في سبيل الله؟ قال:"من قاتل لتكون كلمة الله هي العليا فهو في سبيل الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2810)، ومسلم في الإمارة (1904: 149) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة قال: سمعت أبا وائل قال: حدثنا أبو موسى الأشعري فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: একজন লোক যুদ্ধ করে গনীমতের জন্য, আরেকজন লোক যুদ্ধ করে খ্যাতির জন্য, আরেকজন লোক যুদ্ধ করে তার বীরত্ব দেখানোর জন্য। তাহলে কে আল্লাহর পথে (জিহাদকারী)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর বাণীকে সমুন্নত করার জন্য যুদ্ধ করে, সে-ই আল্লাহর পথে (জিহাদকারী)।"
7642 - عن أبي موسى الأشعري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، ما القتال في سبيل الله؟ فإن أحدنا يقاتل غضبا، ويقاتل حمية، فرفع إليه رأسه، قال: - وما رفع إليه رأسه إلا أنه كان قائما - فقال:"من قاتل لتكون كلمة الله هي العليا، فهو في سبيل الله عز وجل".
وفي رواية:"يقاتل شجاعةً، ويقاتل حمية، ويقاتل رياءً".
متفق عليه: رواه البخاري في العلم (123)، ومسلم في الإمارة (1904: 151) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن أبي موسى .. فذكره.
والرواية الأخرى للبخاري في التوحيد (7458)، ومسلم في الإمارة (1904: 150) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي وائل شقيق به.
وقد ذكر هذه الروايات الحافظ في الفتح (6/ 28) فقال:"فالحاصل من رواياتهم أن القتال يقع بسبب خمسة أشياء: طلب المغنم، وإظهار الشجاعة، والرياء، والحمية، والغضب".
আবু মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে জিজ্ঞেস করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর পথে (ফি সাবিলিল্লাহ) যুদ্ধ কাকে বলে? কারণ আমাদের কেউ রাগের বশে যুদ্ধ করে এবং কেউ গোত্রীয় অহমিকার কারণে যুদ্ধ করে। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে মাথা উঠালেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর বাণীকে সমুন্নত করার উদ্দেশ্যে যুদ্ধ করে, সে-ই আল্লাহ তা'আলার পথে রয়েছে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "কেউ সাহসিকতা দেখানোর জন্য যুদ্ধ করে, কেউ গোত্রীয় অহমিকার জন্য যুদ্ধ করে এবং কেউ বা লোক দেখানোর জন্য যুদ্ধ করে।"
7643 - عن سليمان بن يسار قال: تفرّق الناسُ عن أبي هريرة، فقال له ناتلُ أهل الشام: أيها الشيخ حدِّثْنا حديثا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أول الناس يقضى يوم القيامة عليه رجلٌ استشهد، فأتي به، فعرّفه نعمه، فعرفها، قال: فما عملتَ فيها؟ قال: قاتلتُ فيك حتى استشهدت، قال: كذبت، ولكنك قاتلت لأن يقال: جريء، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه، حتى
ألقي في النار. ورجلٌ تعلّم العلم، وعلمه، وقرأ القرآن، فأتي به، فعرّفه نعمه فعرفها، قال: فما عملت فيها؟ قال: تعلمت العلم وعلمته، وقرأت فيك القرآن، قال: كذبت ولكنك تعلمت العلم ليقال: عالم، وقرأت القرآن، ليقال: هو قارئ، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه حتى ألقي في النار. ورجلٌ وسَّع الله عليه، وأعطاه من أصناف المال كله فأتي به، فعرفه نعمه فعرفها، قال: فما عملتَ فيها؟ قال: ما تركت من سبيل تحب أن ينفق فيها إلا أنفقتُ فيها لك، قال: كذبت، ولكنك فعلت ليقال: هو جواد، فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه، ثم ألقي في النار".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1905: 152) عن يحيى بن حبيب الحارثي، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا ابن جريج، حدثني يونس بن يوسف، عن سليمان بن يسار .. فذكره.
وقوله:"ناتل أهل الشام" وهو ناتل بن قيس الخزاعي، ومكان كبير قومه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সুলাইমান ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে লোকেরা বিচ্ছিন্ন হয়ে গেলে শামের অধিবাসী নাতিল তাকে বললেন, "হে শায়খ, আমাদেরকে একটি হাদীস বর্ণনা করুন যা আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছেন।" তিনি বললেন, "হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'কিয়ামতের দিন সর্বপ্রথম যাদের বিরুদ্ধে ফয়সালা করা হবে, তারা হলো—
একজন লোক যে শহীদ হয়েছিল। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আমি আপনার সন্তুষ্টির জন্য যুদ্ধ করেছি এবং শেষ পর্যন্ত শহীদ হয়েছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি যুদ্ধ করেছিলে, যেন লোকে তোমাকে ‘বীর’ বা ‘সাহসী’ বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।
আরেকজন লোক যে জ্ঞান শিক্ষা করেছে, তা শিক্ষা দিয়েছে এবং কুরআন তিলাওয়াত করেছে। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আমি আপনার সন্তুষ্টির জন্য জ্ঞান অর্জন করেছি, তা শিক্ষা দিয়েছি এবং আপনার জন্য কুরআন তিলাওয়াত করেছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি এই জন্য জ্ঞান অর্জন করেছিলে যেন লোকে তোমাকে ‘আলেম’ বলে এবং কুরআন তিলাওয়াত করেছিলে যেন লোকে তোমাকে ‘কারী’ (পাঠক) বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।
আরেকজন লোক, যাকে আল্লাহ স্বচ্ছলতা দান করেছেন এবং সকল প্রকার সম্পদ দিয়েছেন। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতগুলো চেনাবেন। সে তা চিনতে পারবে। আল্লাহ বলবেন, তুমি এই নিয়ামতগুলোর বিনিময়ে কী আমল করেছো? সে বলবে, আপনার পছন্দনীয় এমন কোনো পথ আমি পরিত্যাগ করিনি যেখানে আপনি ব্যয় করা ভালোবাসেন, বরং আমি আপনারই জন্য তাতে খরচ করেছি। আল্লাহ বলবেন, তুমি মিথ্যা বলছো। বরং তুমি এই জন্য ব্যয় করেছো যেন লোকে তোমাকে ‘দানশীল’ (জাওয়াদ) বলে। আর তা বলা হয়েছেও। অতঃপর নির্দেশ দেওয়া হবে এবং তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।'"
7644 - عن معاذ بن جبل، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"الغزو غزوان: فأما من ابتغى وجه الله، وأطاع الإمام، وأنفق الكريمة، وياسر الشريك، واجتنب الفساد، فإن نومه ونبهه أجر كله. وأما من غزا فخرًا ورياءً وسمعةً، وعصى الإمام، وأفسد في الأرض، فإنه لم يرجع بالكفاف".
حسن: رواه أبو داود (2515)، والنسائي (3188، 4195)، والحاكم (2/ 85)، والبيهقي (9/ 168) كلهم من طرق عن بقية بن الوليد قال: حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي بحرية، عن معاذ بن جبل .. فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل بقية بن الوليد.
وأبو بحرية هو عبد الله بن قيس الكندي. وقد اختلف في إسناده فمنهم من ذكر أبا بحرية، ومنهم من أسقطه، والصواب ذكره كما في الرواية المذكورة. انظر: علل الدارقطني (6/ 84 - 85).
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
وقوله:"ياسر الشريك" من المياسرة بِمعنى المساهلة أي ساهل الرفيق وعامله باليسر.
وقوله:"لم يرجع" أي لم يرجع لا له ولا عليه من ثواب تلك الغزوة وعقابها، بل يرجع وقد لزمه الإثم؛ لأن الطاعات إذا لم تقع بصلاح سريره انقلبت معاصي، والعاصي آثم قاله صاحب العون.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জিহাদ দুই প্রকার। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে জিহাদ করে, ইমামের (নেতার) আনুগত্য করে, উত্তম সম্পদ খরচ করে, সঙ্গীর সাথে উদার ব্যবহার করে এবং ফাসাদ (বিশৃঙ্খলা) থেকে বিরত থাকে, নিশ্চয়ই তার নিদ্রা ও জাগরণ—সবকিছুই সওয়াব বলে গণ্য হয়। আর যে ব্যক্তি অহংকার, লোক দেখানো (রিয়া) ও সুখ্যাতির জন্য জিহাদ করে, ইমামের (নেতার) অবাধ্য হয় এবং পৃথিবীতে বিপর্যয় সৃষ্টি করে, সে (আল্লাহর কাছে) কোনো প্রতিদান নিয়ে ফিরে আসতে পারে না।"
7645 - عن أبي أمامة الباهلي قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: أرأيت رجلا غزا يلتمس الأجر والذكر ما له؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شيء له" فأعادها ثلاث مرات، يقول له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شيء له"، ثم قال:"إن الله لا يقبل من العمل إلا ما كان
له خالصا وابتغي به وجهه".
حسن: رواه النسائي (3140) عن عيسى بن هلال الحمصي قال: حدثنا محمد بن حمير، حدثنا معاوية بن سلام، عن عكرمة، عن شداد أبي عمار، عن أبي أمامة الباهلي .. فذكره.
وإسناده حسن من أجل عيسى بن هلال الحمصي ومحمد بن حمير وعكرمة بن عمار، فإن كلا منهم حسن الحديث.
وقد حسّن إسناده العراقي في المغني عن حمل الأسفار، وجوّده ابن حجر في الفتح (6/ 28).
وفي الباب ما روي عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من غزا في سبيل الله، ولم ينوِ إلا عقالا فله ما نوى".
رواه النسائي (3138، 3139)، وأحمد (22692)، والحاكم (2/ 109) من طريق حماد بن سلمة، عن جبلة بن عطية، عن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن جده عبادة بن الصامت .. فذكره.
وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد.
قلت: في إسناده يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، لم يعرف له راو غير جبلة بن عطية، ولم يؤثر توثيقه عن أحد إلا أن أبن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا.
وفي الباب ما روي عن عبد الله بن عمرو قال: جاء أعرابي علوي جريء جافٍ فقال: يا رسول الله، أخبرنا عن الهجرة، أهي إليك حيث كنت؟ أم إلى آرض معروفة؟ أم لقوم خاصة؟ أم إذا مت انقطعت؟ قال: فسكت عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال:"أين السائل؟" قال: ها أنا ذا يا رسول الله، قال:"الهجرة أن تهجر الفواحش ما ظهر منها وما بطن، ثم أنت مهاجر وإن مت في الحضر".
قال عبد الله بن عمرو: فقال رجل: يا رسول الله، أخبرنا عن ثياب أهل الجنة، أخلْق تخلق، أم نسْج تنسج؟ فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وضحك بعض القوم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مم تضحكون؟" أمن جاهل يسأل عالما؟ ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أين السائل؟" قال: ها أنا ذا يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بل تتشقق عنها ثمر الجنة، بل تتشقق عنها ثمر الجنة مرتين"، فقلتُ: يا رسول الله، وما تقول في الهجرة والجهاد؟ فقال:"يا عبد الله، ابدأ بنفسك فاغزها، وأبدأ بنفسك فجاهدها، فإنك إن قُتِلت فارًّا بعثك الله فارًّا، وإن قتلت مرائيا بعثك الله مرائيا، وإن قتلت صابرًا محتسبا بعثك الله صابرًا محتسبا".
رواه أبو داود الطيالسي (2391) عن محمد بن مسلم بن أبي الوضاح، عن العلاء بن عبد الله بن رافع، عن حنان بن خارجة، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.
ورواه أبو داود السجستاني (2519)، والحاكم (2/ 85 - 86) من طريق عبد الرحمن بن مهدي،
عن محمد بن الوضاح به، الشطر الأخير فحسب، ولفظه: قال عبد الله بن عمرو: يا رسول الله أخبرني عن الجهاد والغزو. فقال:"يا عبد الله بن عمرو، إن قاتلت صابرا محتسبًا بعثك الله صابرًا محتسبًا وإن قاتلت مرائيا مكاثرًا بعثك الله مرائيًا مكاثرًا، يا عبد الله بن عمرو، على أي حال قاتلت أو قتلت بعثك الله على تلك الحال".
ورواه أحمد (7095) عن ابن مهدي به مطولا إلا أنه ليس فيه الشطر الأخير.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، ومحمد بن أبي الوضاح المؤدب ثقة مأمون".
قلت: في إسناده حنان بن خارجة قال الذهبي في الميزان (1/ 618):"لا يعرف، تفرد عنه العلاء بن عبد الله بن رافع، أشار ابن القطان إلى تضعيفه للجهل بحاله".
قلت: وذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا، وأما ما وقع عند أحمد (6890) أن الراوي عن عبد الله بن عمرو: الفرزدق بن حنان، فهو وهم، والصواب أن الحديث لحنان بن خارجة لا شك فيه، كما قال ابن حجر في النكت الظراف (6/ 287).
وأما ما روي عن أبي هريرة: أن رجلا قال: يا رسول الله، رجل يريد الجهاد في سبيل الله وهو يبتغي عرضا من عرض الدنيا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا أجر له". فأعظم ذلك الناس، وقالوا للرجل: عُد لرسول الله صلى الله عليه وسلم فلعلك لم تفهمه. فقال: يا رسول الله رجل يريد الجهاد في سبيل الله، وهو يبتغي عرضا من عرض الدنيا. فقال:"لا أجر له". فقالوا للرجل: عد لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له: الثالثة، فقال له:"لا أجر له". فلا يصح إسناده.
رواه أبو داود (2516)، وأحمد (7900، 8793) وصحّحه ابن حبان (4637)، والحاكم (2/ 85)، والبيهقي (9/ 169) كلهم من طرق عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن عبد الله الأشج، عن ابن مكرز - رجل من الشام - عن أبي هريرة .. فذكره.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: هذا إسناد ضعيف من أجل ابن مكرز، وقد جاء اسمه عند أحمد (8793) يزيد بن مكرز، وهو مجهول كما قال ابن المديني. انظر: ترجمة أيوب بن عبد الله بن مكرز في تهذيب الكمال.
ووقع اسمه في المستدرك:"أيوب بن مكرز" وفي صحيح ابن حبان"مكرز" دون كلمة"ابن" مع أن الحديث عندهما من طريق ابن المبارك، وهو عنده في الجهاد (227) وفيه"ابن مكرز" ومن طريق ابن المبارك أخرجه أيضا أبو داود، وفيه أيضا"ابن مكرز" إذًا فالصواب في رواية ابن المبارك:"ابن مكرز، ورواه حسين بن محمد، عن ابن أبي ذئب به. فسماه (يزيد بن مكرز) كما
عند أحمد (8793).
قال المزي في ترجمة أيوب بن عبد الله بن مكرز في تهذيب الكمال (1/ 320) بعد ما أشار إلى رواية أحمد المذكورة:"فتبين بذلك أن ابن مكرز الذي روى له أبو داود رجل مجهول، كما قال ابن المديني، وأنه ليس بأيوب بن مكرز هذا. والله أعلم".
وعلى فرض أنه أيوب بن عبد الله بن مكرز فهو مجهول أيضا. وقد قال الحافظ في التقريب:"مستور".
আবু উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: আপনি এমন ব্যক্তি সম্পর্কে কী বলেন, যে পুরস্কার (সওয়াব) ও খ্যাতি উভয়টি চাওয়ার উদ্দেশ্যে যুদ্ধে যায়? তার জন্য কী আছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য কিছুই নেই।" সে লোকটি তিনবার কথাটি পুনরাবৃত্তি করল, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তার জন্য কিছুই নেই।" অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা সেই আমল ছাড়া অন্য কিছু কবুল করেন না যা একান্তভাবে তাঁর জন্য করা হয় এবং যার দ্বারা কেবল তাঁর সন্তুষ্টি চাওয়া হয়।"
7646 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"وإذا استنفرتم فانفروا".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3077)، ومسلم في الإمارة (1353: 85) كلاهما من حديث منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس .. فذكره.
قال ابن قدامة:"وأمر الجهاد موكول إلى الإمام واجتهاده، ويلزم الرعية طاعته فيما يراه من ذلك". المغني (13/ 16).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আর যখন তোমাদেরকে যুদ্ধে বের হওয়ার জন্য আহ্বান জানানো হয়, তখন তোমরা বের হয়ে যাও।"
7647 - عن عائشة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الهجرة؟ فقال:"لا هجرة بعد الفتح، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1864: 86) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، من عطاء، عن عائشة .. فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন, "মক্কা বিজয়ের পর আর কোনো হিজরত নেই, তবে রয়েছে জিহাদ ও (সৎ) নিয়ত। আর যখন তোমাদেরকে (অভিযানে) বের হতে আহ্বান করা হয়, তখন তোমরা বের হও।"
7648 - عن أبي بكر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما ترك قوم الجهاد إلا عمهم الله بالعذاب".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (2663 - مجمع البحرين) عن علي بن سعيد الرازي، حدثنا قبيصة بن عاقبة، حدثنا أبي، حدثنا مالك بن مغول، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن أبي بكر .. فذكره.
وقال الطبراني: لم يروه عن إسماعيل إلا مالك بن مغول، ولا عنه إلا قبيصة، تفرد به ابنه.
وإسناده حسن، من أجل عقبة بن قبيصة؛ فإنه صدوق ومن أجل علي بن سعيد الرازي، ففيه كلام يسير لا ينزل به حديثه عن مرتبة الحسن.
وحسّن إسناده المنذري في الترغيب والترهيب (2180).
وقوله:"ما ترك قوم الجهاد …" أي إذا دعا إليه الإمام فتقاعد.
আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে জাতি জিহাদ বর্জন করে, আল্লাহ তাদেরকে ব্যাপক আযাব দ্বারা ঘিরে ফেলেন।"
7649 - عن عروة البارقي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخيلُ معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة؛ الأجر والمغنم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2852)، ومسلم في الإمارة (1873: 98) كلاهما من طريق زكريا، عن عامر الشعبي، عن عروة البارقي .. فذكره.
قال الإمام أحمد: فقه هذا الحديث أن الجهاد مع كل إمام إلى يوم القيامة، ذكره الترمذي عنه عقب حديث عروة البارقي (1693) وبوب البخاري في صحيحه، باب الجهاد ماض مع البر والفاجر لقول النبي صلى الله عليه وسلم:"الخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة".
ووجه الاستدلال أنه ذكر بقاء الخير في نواصيها إلى يوم القيامة، وفسّره بالأجر والمغنم، والمغنم المقترن بالأجر إنما يكون من الخيل بالجهاد، ولم يقيد ذلك بما إذا كان الإمام عادلا، فدل على أن لا فرق في حصول هذا الفضل بين أن يكون الغزو مع الإمام العادل أو الجائر". قاله ابن حجر في الفتح (6/ 56).
وروي عن أبي هريرة مرفوعا:"الجهاد واجب عليكم مع كل أمير برًّا كان أو فاجرًا والصلاة واجبة عليكم خلف كل مسلم برًّا كان أو فاجرًا وإن عمل الكبائر، والصلاة واجبة على كل مسلم برًّا كان أو فاجرًا وإن عمل الكبائر".
رواه أبو داود (2533) عن أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، حدثني معاوية بن صالح، عن العلاء بن الحارث، عن مكحول، عن أبي هريرة .. فذكره.
ومكحول لم يسمع من أبي هريرة كما قال أبو زرعة، والدارقطني وغيرهما.
وبمعناه أحاديث أخرى كلها معلولة. انظر: العلل المتناهية (1/ 421 - 428)، ونصب الراية (2/ 27 - 28).
بهم من يأذن لهم ولي الأمر.
উরওয়াহ আল-বারিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার কপালে (অগ্রভাগে) কিয়ামত দিবস পর্যন্ত কল্যাণ বাঁধা রয়েছে; (তা হলো) সাওয়াব (প্রতিদান) ও গনীমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ)।”
7650 - عن ابن عباس قال: {إِلَّا تَنْفِرُوا يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا} {مَا كَانَ لِأَهْلِ الْمَدِينَةِ} إِلَى قَوْلِهِ: {يَعْمَلُونَ} نَسَخَتْهَا الْآيَةُ الَّتِي تَلِيهَا {وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَافَّةً}.
حسن: رواه أبو داود (2505)، - ومن طريقه البيهقي (9/ 47) - عن أحمد محمد المروزي، حدثني علي بن حسين، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس قال .. فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل علي بن حسين بن واقد وأبيه؛ فإنهما حسنا الحديث. ويزيد النحوي هو: يزيد بن أبي سعيد المروزي.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, (আল্লাহর বাণী): “যদি তোমরা (যুদ্ধে) বের না হও, তবে তিনি তোমাদেরকে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি দেবেন,” এবং তাঁর বাণী: “মাদীনাবাসী এবং তাদের আশপাশের মরুবাসীদের জন্য সঙ্গত নয়... থেকে ...তারা যা করে তা তিনি জানেন” পর্যন্ত (এই আয়াতগুলো) এর পরবর্তী আয়াত: “আর মুমিনদের সকলের একসাথে (জিহাদের জন্য) বের হয়ে যাওয়া উচিত নয়” দ্বারা রহিত (নাসখ) করা হয়েছে।
7651 - عن البراء قال: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم زيدًا، فجاء بكتف فكتبها، وشكا ابن أم مكتوم ضرارتَه، فنزلت: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ}".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2831)، ومسلم في الإمارة (1898: 141) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إسحاق (هو السبيعي) قال: سمعت البراء يقول .. فذكره.
وأما ما روي عن أبي إسحاق عن زيد بن أرقم فهو خطأ كما قال أبو زرعة. انظر: علل الحديث (1/ 374).
বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন (এই আয়াত) নাযিল হলো: "মুমিনদের মধ্যে যারা বসে থাকে, তারা সমান নয়", তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দকে (ইবনে সাবেতকে) ডাকলেন। তিনি একটি পশুর কাঁধের হাড় নিয়ে আসলেন এবং তিনি (নবী) তাতে তা লিপিবদ্ধ করলেন। ইবনে উম্মে মাকতুম তাঁর শারীরিক অক্ষমতা (অন্ধত্ব) নিয়ে অভিযোগ করলেন। ফলে (পরিশেষে) এই আয়াতটি নাযিল হলো: "মুমিনদের মধ্যে যারা বসে থাকে, তারা সমান নয়—তবে যারা শারীরিক দুর্বলতাগ্রস্ত বা অক্ষম তারা ছাড়া।"
7652 - عن سهل بن سعد الساعدي أنه قال: رأيت مروان بن الحكم جالسا في المسجد، فأقبلت حتى جلست إلى جنبه، فأخبرنا أن زيد بن ثابت أخبره: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أملى عليه: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} {وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ} قال: فجاءه ابن أم مكتوم وهو يملها علي، فقال: يا رسول الله، لو أستطيع الجهاد لجاهدتُ، وكان رجلا أعمى، فأنزل الله تبارك وتعالى على رسوله صلى الله عليه وسلم، وفخذه على فخذي، فثقلت علي حتى خفت أن ترض فخذي، ثم سُرِّيَ عنه، فأنزل الله عز وجل: {غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ}".
صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2832) عن عبد العزيز بن عبد الله، حدثنا إبراهيم بن سعد الزهري، حدثني صالح بن كيسان، عن ابن شهاب، عن سهل بن سعد قال .. فذكره.
وقوله:"يملّه" بتشديد اللام من الإملال يقال: أمللتُ الكتاب، وأمليته إذا ألقيته على الكاتب ليكتبه.
وقوله:"سُرّي عنه" أي كُشفَ ..
সাহল ইবনু সা'দ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মারওয়ান ইবনু হাকামকে মাসজিদে বসা অবস্থায় দেখলাম। আমি তার কাছে এসে তার পাশে বসলাম। অতঃপর তিনি আমাদের জানান যে, যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জানিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে এই আয়াতটি মুখে মুখে লিখিয়েছিলেন: “মুমিনদের মধ্যে যারা (যুদ্ধ হতে) বসে থাকে এবং যারা আল্লাহর রাস্তায় জিহাদ করে তারা সমান নয়।”
তিনি (যায়দ ইবনু সাবিত) বলেন: তখন ইবনু উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার উপর আয়াতটি ইমলা (মুখে মুখে লিখিয়ে) করছিলেন। তিনি বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! যদি আমি জিহাদ করতে সামর্থ্যবান হতাম, তবে আমি অবশ্যই জিহাদ করতাম।” তিনি ছিলেন একজন অন্ধ ব্যক্তি।
তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা তাঁর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর ওহী নাযিল করলেন, আর তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) উরু আমার উরুর উপর ছিল। ফলে তা আমার উপর এত ভারি হয়ে গেল যে, আমি ভয় পেলাম আমার উরু বোধহয় পিষ্ট হয়ে যাবে। এরপর তাঁর থেকে (ওহীর অবস্থা) দূরীভূত হলো। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: “অক্ষম বা ক্ষতিগ্রস্তরা ব্যতীত” (غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ)।
7653 - عن زيد بن ثابت قال: كنتُ إلى جنب رسول الله صلى الله عليه وسلم فغشيته السكينة، فوقعت فخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم على فخذي، فما وجدت ثقل شيء أثقل من فخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم سري عنه فقال:"اكتب". فكتبت في كتف: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} {وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ} إلى آخر الآية. فقام ابن أم مكتوم، - وكان رجلا أعمى - لما سمع فضيلة المجاهدين فقال: يا رسول الله فكيف بمن لا يستطيع الجهاد من المؤمنين، فلما قضى كلامه غشيت رسول الله صلى الله عليه وسلم السكينة، فوقعت فخذه على فخذي، ووجدت من ثقلها في المرة الثانية كما وجدت في المرة الأولى، ثم سري عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"اقرأ يا زيد". فقرأت: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم {غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ} الآية كلها. قال زيد: فأنزلها الله وحدها، فألحقتها، والذي نفسي بيده، لكأني أنظر إلى ملحقها عند صدع في كتف.
حسن: رواه أبو داود (2507)، والحاكم (2/ 81) كلاهما من طريق سعيد بن منصور (وهو في سننه 2314) قال: حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه زيد بن ثابت قال .. فذكره.
ورواه أحمد (21664 - 21665) عن سليمان بن داود الهاشمي، وسريج بن النعمان كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي الزناد به.
وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، لا سيما وقد روى عنه هذا الحديث سليمان بن داود، وقد قال ابن المديني: وقد نظرت فيما روى عنه سليمان بن داود الهاشمي فرأيتها مقاربة.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
যায়িদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পাশে ছিলাম। তখন তাঁকে (আল্লাহর পক্ষ থেকে) প্রশান্তি আচ্ছন্ন করে ফেলল। ফলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উরু আমার উরুর ওপর পড়ল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উরুর চেয়ে ভারী কোনো জিনিসের ভার আমি কখনো অনুভব করিনি। এরপর সেই অবস্থা তাঁর থেকে কেটে গেল। তিনি বললেন, "লেখো।" আমি তখন একটি (পশুর) কাঁধের হাড়ে লিখলাম: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} {وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ} (অর্থাৎ, মু’মিনদের মধ্যে যারা (ঘরে) বসে থাকে এবং যারা আল্লাহর পথে জিহাদ করে, তারা সমান নয়)—আয়াতের শেষ পর্যন্ত।
(এরপর) ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তিনি ছিলেন একজন অন্ধ ব্যক্তি—যখন মুজাহিদদের শ্রেষ্ঠত্বের কথা শুনলেন, তখন দাঁড়িয়ে বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! মু’মিনদের মধ্যে যারা জিহাদ করতে সক্ষম নয়, তাদের কী হবে? যখন তাঁর কথা শেষ হলো, তখন পুনরায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে (আল্লাহর) প্রশান্তি আচ্ছন্ন করে ফেলল। তাঁর উরু আমার উরুর ওপর পড়ল। আর দ্বিতীয়বার আমি তাঁর উরুর যে ভার অনুভব করলাম, তা প্রথমবার যেমন করেছিলাম ঠিক তেমনই ছিল।
অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সেই অবস্থা কেটে গেল। তিনি বললেন, "হে যায়িদ, পাঠ করো।" আমি পাঠ করলাম: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ}। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, {غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ} (অর্থাৎ, অক্ষম ব্যক্তিগণ ব্যতীত)—এরপর পুরো আয়াতটি (নাজিল হলো)।
যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ তাআলা সেই অংশটুকু একাই নাযিল করলেন। তখন আমি সেটি মূল আয়াতের সাথে জুড়ে দিলাম। যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! আমি যেন এখনো সেই জোড়া অংশটিকে কাঁধের হাড়ের ফাটলের কাছে দেখতে পাচ্ছি।
7654 - عن الفلتان بن عاصم قال: كنا قعودًا مع النبي صلى الله عليه وسلم فأنزل عليه، وكان إذا نزل عليه ذاب بصره مفتوحة عيناه وفرغ سمعه وقلبه لما جاء من الله، فلما فرغ قال لكاتب: اكتب {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} {غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ} الآيه، فقام الأعمى فقال: ما ذنبنا فأنزل عليه فقلنا للأعمى إن رسول الله؟ صلى الله عليه وسلم ينزل عليه، فبقي
قائما يقول: أتوب إلى الله، فلما فرغ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اكتب {غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ}.
حسن: رواه البزار (كشف الأستار 2203)، وابن حبان (4712)، والطبراني في الكبير (18/ 334) من طرق عن عبد الواحد بن زياد، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن الفلتان بن عاصم قال .. فذكره. والسياق للطبراني.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن كليب، وأبيه فإنهما حسنا الحديث.
ফালতান ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বসা ছিলাম, তখন তাঁর উপর অহী নাযিল হলো। যখন তাঁর উপর অহী নাযিল হতো, তখন তাঁর চোখ দুটি উন্মুক্ত হয়ে যেত, দৃষ্টি স্থির হয়ে যেত এবং তাঁর কান ও হৃদয় আল্লাহর পক্ষ থেকে যা আসত তার প্রতি নিবদ্ধ হয়ে যেত। যখন তিনি [অহী নাযিল হওয়া থেকে] ফারেগ হলেন, তখন একজন লেখককে বললেন: লেখো, "মুমিনদের মধ্যে যারা (জিহাদ থেকে) বসে থাকে—যারা অসুস্থতাজনিত অক্ষম নয়..." [পূর্ণ আয়াত]। তখন এক অন্ধ ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বললেন: আমাদের কী দোষ? অতঃপর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর অহী নাযিল হলো। আমরা অন্ধ লোকটিকে বললাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর অহী নাযিল হচ্ছে। সে তখন দাঁড়িয়ে বলল: আমি আল্লাহর কাছে তওবা করছি। যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফারেগ হলেন, তখন বললেন: লেখো, "যারা অসুস্থতাজনিত অক্ষম নয়।"
7655 - عن ابن عباس في قول الله عز وجل: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ} وقال: هم قوم كانوا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يغزون معه لأسقام، وأمراض، وأوجاع، وآخرون أصحاء لا يغزون معه، وكان المرضى في عذر من الأصحاء".
صحيح: رواه الطبراني في الكبير (12/ 165)، والبيهقي (9/ 24) كلاهما من طرق عن أبي عقيل الدورقي (هو بشير بن عقبة الناجي)، عن أبي نضرة، (هو المنذر بن مالك العبدي) عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.
وقال الهيثمي: رواه الطبراني من طريقين، ورجال أحدهما ثقات. مجمع الزوائد (7/ 9).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা‘আলার এই বাণী সম্পর্কে: {মুমিনদের মধ্যে যারা অক্ষম নয় অথচ ঘরে বসে থাকে, তারা সমান নয়}। তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: তারা ছিল একদল লোক, যারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে অসুস্থতা, রোগ ও ব্যথার কারণে তাঁর সাথে যুদ্ধে শরীক হতে পারত না। কিন্তু অন্য একদল সুস্থ লোকও ছিল যারা যুদ্ধে শরীক হতো না। (এই কারণে) অসুস্থরা সুস্থদের তুলনায় (যুদ্ধে অংশগ্রহণ না করার জন্য) ওযর বা ছাড় পেত।
7656 - عن عائشة أنها قالت: يا رسول الله نرى الجهاد أفضل الأعمال، أفلا نجاهد؟ قال:"لا، لكن أفضل الجهاد حج مبرور".
صحيح: رواه البخاري في الحج (1520) عن عبد الرحمن بن المبارك، حدثنا خالد، أخبرنا حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت أبي طلحة، عن عائشة أم المؤمنين .. فذكرته.
ورواه البخاري في الجهاد والسير (2875) من طريق معاوية بن إسحاق وعن حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت طلحة به عن النبي صلى الله عليه وسلم سأله نساؤه عن الجهاد فقال:"نعم الجهاد الحج".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা মনে করি জিহাদ সর্বোত্তম আমল, তাই আমরা কি জিহাদ করব না? তিনি বললেন, "না, কিন্তু সর্বোত্তম জিহাদ হলো মাবরূর হজ (কবুলযোগ্য হজ)।"
7657 - عن ابن عمر قال: عرضني رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أحد في القتال، وأنا ابن أربع عشرة سنة، فلم يجزني، وعرضني يوم الخندق، وأنا ابن خمس عشرة سنة، فأجازني. قال نافع: فقدمت على عمر بن عبد العزيز وهو يومئذ خليفة، فحدثته هذا الحديث، فقال: إن هذا لحدٌّ بين الصغير والكبير، فكتب إلى عماله أن يفرضوا لمن كان ابن خمس عشرة سنة ومن كان دون ذلك فاجعلوه في العيال.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2664)، ومسلم في الإمارة (1868: 91) كلاهما من طريق عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر. والسياق لمسلم.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের যুদ্ধের দিন আমি যখন চৌদ্দ বছরের বালক ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে যুদ্ধের জন্য (তাঁর সামনে) পেশ করেছিলেন। কিন্তু তিনি আমাকে (যুদ্ধের অনুমতি দিয়ে) মঞ্জুর করেননি। আর খন্দকের যুদ্ধের দিন আমি যখন পনেরো বছরের বালক ছিলাম, তখন তিনি আমাকে (তাঁর সামনে) পেশ করেন এবং তিনি আমাকে মঞ্জুর করেন (যুদ্ধের অনুমতি দেন)।
নাফি‘ (রাহঃ) বলেন: আমি উমার ইবন আব্দুল আযীযের নিকট উপস্থিত হলাম, তখন তিনি ছিলেন খলীফা। আমি তাঁকে এই হাদীসটি শোনালাম। তিনি বললেন: নিশ্চয়ই এই ঘটনাটি হলো ছোট ও বড়র (প্রাপ্তবয়স্কের) মধ্যে পার্থক্য করার মাপকাঠি। এরপর তিনি তাঁর গভর্নরদের নিকট চিঠি লিখলেন যে, যারা পনেরো বছর বয়স্ক, তাদের জন্য ভাতা (বা দায়িত্ব) নির্ধারণ করো এবং এর চেয়ে কম বয়সীদেরকে পরিবার-পরিজনের (নির্ভরশীলদের) অন্তর্ভুক্ত করো।
7658 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذهب إلى قباء يدخل على أم حرام بنت ملحان، فتطعمه، وكانت أم حرام تحت عبادة بن الصامت، فدخل عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم يوما فأطعمته، وجلست تفلي في رأسه، فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم يوما ثم استيقظ وهو يضحك، قالت: فقلت: ما يضحكك يا رسول الله؟ قال:"ناس من أمتي عرضوا علي غزاة في سبيل الله، يركبون ثبج هذا البحر ملوكا على الأسرة، أو مثل الملوك على الأسرة" - يشك إسحق - قالت: فقلت له: يا رسول الله، ادع الله أن يجعلني منهم، فدعا لها، ثم وضع رأسه، فنام ثم استيقظ يضحك، قالت: فقلت له: يا رسول الله ما يضحكك؟ قال:"ناس من أمتي عرضوا علي غزاة في سبيل الله ملوكا على الأسرة أو مثل الملوك على الأسرة" كما قال في الأولى قالت: فقلت: يا رسول الله ادع الله أن يجعلني منهم فقال:"أنتِ من الأولين"، قال: فركبت البحر في زمان معاوية، فصرعت عن دابتها حين خرجت من البحر، فهلكت.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (39) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك. فذكره. ورواه البخاري في الجهاد والسير (2788، 2789)، ومسلم في الإمارة (1912: 160) كلاهما من طريق مالك به، مثله.
وزاد مسلم من وجه آخر بعد قوله:"أنت من الأولين" قال:"فتزوجها عبادة بن الصامت بعدُ، فغزا في البحر فحملها معه، فلما أن جاءت قربت لها بغلة فركبتها فصرعتْها فاندقت عنقها".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কুবায় যেতেন, তখন উম্মু হারাম বিনতে মিলহান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করতেন। তিনি তাঁকে খাবার খাওয়াতেন। উম্মু হারাম ছিলেন উবাদা ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী। একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে গেলেন এবং তিনি তাঁকে খাবার খাওয়ালেন। অতঃপর তিনি বসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথায় উকুন দেখছিলেন (মাথার পরিচর্যা করছিলেন)। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমিয়ে গেলেন। কিছুক্ষণ পর তিনি হাসতে হাসতে জেগে উঠলেন। উম্মু হারাম বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম: হে আল্লাহর রাসূল! কিসে আপনাকে হাসাচ্ছে? তিনি বললেন: "আমার উম্মতের কিছু লোককে আমার কাছে পেশ করা হলো, যারা আল্লাহর পথে জিহাদ করছে, তারা এই সমুদ্রের মধ্যভাগ দিয়ে যাত্রা করছে, যেন তারা পালঙ্কের উপর আসীন বাদশাহদের মতো, অথবা সিংহাসনে আসীন বাদশাহদের ন্যায়।" (ইসহাক সন্দেহ প্রকাশ করেছেন।) তিনি (উম্মু হারাম) বলেন, আমি তাঁকে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! দু'আ করুন যেন আল্লাহ আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন। অতঃপর তিনি তাঁর জন্য দু'আ করলেন। এরপর তিনি মাথা রাখলেন এবং ঘুমিয়ে পড়লেন। কিছুক্ষণ পর হাসতে হাসতে জেগে উঠলেন। তিনি বলেন, আমি তাঁকে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! কিসে আপনাকে হাসাচ্ছে? তিনি বললেন: "আমার উম্মতের কিছু লোককে আমার কাছে পেশ করা হলো, যারা আল্লাহর পথে জিহাদ করছে, তারা পালঙ্কের উপর আসীন বাদশাহদের মতো, অথবা সিংহাসনে আসীন বাদশাহদের ন্যায়," যেমন তিনি প্রথমবার বলেছিলেন। তিনি বলেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! দু'আ করুন যেন আল্লাহ আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত করেন। তিনি বললেন: "তুমি তো প্রথম দলের অন্তর্ভুক্ত হবে।" (আনাস) বলেন, অতঃপর তিনি (উম্মু হারাম) মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে সমুদ্রে আরোহণ করলেন। যখন তিনি সমুদ্র থেকে (ডাঙায়) বের হলেন, তখন তাঁর আরোহণ করা বাহন থেকে পড়ে গেলেন এবং ইন্তিকাল করলেন।
[মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এটি কিতাবুল জিহাদে (৩৯) ইসহাক ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবী তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) কিতাবুল জিহাদ ওয়াস সীয়ারে (২৭৮৮, ২৭৮৯) এবং ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) কিতাবুল ইমারতে (১৯১২: ১৬০) উভয়েই মালিক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) অন্য সূত্রে "তুমি প্রথম দলের অন্তর্ভুক্ত হবে" বলার পর অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "অতঃপর উবাদা ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিবাহ করলেন এবং সমুদ্রযুদ্ধে রওনা হলেন। তিনি তাঁকে সঙ্গে নিলেন। যখন তিনি (ডাঙার) কাছে পৌঁছলেন, তখন তাঁর জন্য একটি খচ্চর আনা হলো এবং তিনি তাতে আরোহণ করলেন। কিন্তু খচ্চরটি তাঁকে আছাড় মারল, ফলে তাঁর ঘাড় ভেঙে গেল।"]
7659 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يخرج أقرع بين نسائه فأيتهن يخرج سهمها خرج بها النبي صلى الله عليه وسلم، فأقرع بيننا في غزوة غزاها فخرج فيها سهمي، فخرجت مع النبي صلى الله عليه وسلم بعد ما أُنزلَ الحجاب.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2879)، ومسلم في التوبة (2770: 56) كلاهما من طريق يونس بن يزيد الأيلي - وزاد مسلم معمرا - عن الزهري قال: سمعت عروة بن الزبير، وسعيد بن المسيب وعلقمة بن وقاص وعبيد الله بن عبد الله عن حديث عائشة كلٌّ حدثني طائفة من الحديث قالت. فذكرته.
والسياق للبخاري، وساقه مسلم بتمامه، وهو في قصة الإفك.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোথাও বের হওয়ার ইচ্ছা করতেন, তখন তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে লটারি করতেন। যার নাম লটারিতে উঠতো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকেই সাথে নিয়ে যেতেন। তিনি একবার একটি অভিযানে আমাদের মধ্যে লটারি করলেন। তাতে আমার অংশ (লটারি) বের হলো। অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম, যখন পর্দার (হিজাবের) বিধান নাযিল হয়ে গিয়েছিল।
7660 - عن أنس بن مالك قال: لما كان يوم أحد انهزم الناس عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: ولقد رأيت عائشة بنت أبي بكر وأم سليم، وإنهما لمشمرتان أرى خدم سوقهما، تنقزان
القرب - وقال غيره: تنقلان القرب - على متونهما ثم تفرغانه في أفواه القوم، ثم ترجعان فتملآنها، ثم تجيئان فتفرغانها في أفواه القوم.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2880)، ومسلم في الجهاد (1811: 136) كلاهما من طريق أبي معمر (وهو عبيد الله بن عمرو المنقري) حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز بن صهيب، عن أنس .. فذكره. والسياق للبخاري.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদের দিন এলো, লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ছেড়ে পিছু হটে গেল। তিনি বলেন: আমি অবশ্যই আয়েশা বিনতে আবি বকর এবং উম্মে সুলাইমকে দেখেছি, আর তারা দু'জনই (পোশাক) গুটিয়ে নিয়েছিলেন, আমি তাদের পায়ের গোছার অলঙ্কার দেখতে পাচ্ছিলাম। তারা তাদের পিঠের উপর পানির মশক বহন করে নিয়ে যাচ্ছিলেন (অন্য এক বর্ণনাকারী বলেছেন: লাফিয়ে লাফিয়ে বহন করছিলেন)। অতঃপর তারা সেই পানি লোকেদের মুখে ঢেলে দিচ্ছিলেন, এরপর ফিরে যেতেন এবং মশক পূর্ণ করতেন। পুনরায় আসতেন এবং লোকেদের মুখে তা ঢেলে দিতেন।