হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7748)


7748 - عن الصعب بن جثامة قال: مر بي النبي صلى الله عليه وسلم بالأبواء، أو بودان وسئل عن أهل الدار يبيتون من المشركين، فيصاب من نسائهم وذراريهم، قال:"هم منهم" وسمعته يقول:"لا حمى إلا لله ولرسوله صلى الله عليه وسلم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (3012)، ومسلم في الجهاد والسير (1745: 26) من طريق سفيان بن عيينة، حدثنا الزهري، عن عبيد الله، عن ابن عباس، عن الصعب بن جثامة .. فذكره.

وكان عمرو بن دينار يقول في روايته:"هم من آبائهم".

ورواه أبو داود (2672) من طريق سفيان، عن الزهري به وزاد: قال الزهري: ثم نهى النبي صلى الله عليه وسلم بعد ذلك عن قتل النساء والولدان.




সা'ব ইবনু জাস্সামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল-আবওয়া অথবা ওয়াদ্দান নামক স্থানে আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। এ সময় তাঁকে মুশরিকদের এমন বসতি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো যাদেরকে রাতের আঁধারে আক্রমণ করা হয়, ফলে তাদের নারী ও শিশুদের ক্ষতি হয়। তিনি বললেন: ‘‘তারা (নারী ও শিশুরা) তাদেরই (মুশরিকদের) অন্তর্ভুক্ত।” আমি আরও তাঁকে বলতে শুনেছি: ‘‘আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত অন্য কারো জন্য সংরক্ষিত চারণভূমি (হিমা) নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (7749)


7749 - عن أبي هريرة قال: بعثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعث، فقال: إن وجدتم فلانا وفلانا فأحرقوهما بالنار، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم حين أردنا الخروج:"إني أمرتكم أن تحرقوا فلانا وفلانا، وإن النار لا يعذب بها إلا الله، فإن وجدتموهما فاقتلوهما".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (3016) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن بكير، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة .. فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে একটি অভিযানে (সৈন্যদল) পাঠালেন, অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা যদি অমুক ও অমুক ব্যক্তিকে পাও, তাহলে তাদেরকে আগুন দিয়ে পুড়িয়ে ফেলবে। এরপর যখন আমরা বের হতে চাইলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলাম যে, তোমরা অমুক ও অমুককে পুড়িয়ে ফেলবে, কিন্তু আগুন দিয়ে শাস্তি দেওয়ার অধিকার একমাত্র আল্লাহ ছাড়া আর কারো নেই। সুতরাং, তোমরা যদি তাদের পাও, তবে তাদের হত্যা করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7750)


7750 - عن عكرمة: أن عليا رضي الله عنه حرّق قوما، فبلغ ابن عباس، فقال: لو كنت أنا لم أحرقهم؛ لأن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تعذبوا بعذاب الله" ولقتلتُهم كما قال النبي صلى الله عليه وسلم:"من بدّل دينه فاقتلوه".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (3017) عن علي بن عبد الله، حدثنا سفيان، عن أيوب، عن عكرمة .. فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদল লোককে আগুনে পুড়িয়ে দিলেন। এ সংবাদ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: আমি যদি হতাম, তবে আমি তাদেরকে আগুনে পুড়াতাম না। কারণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর আযাব (আগুন) দিয়ে শাস্তি দিও না।" বরং আমি তাদেরকে হত্যা করতাম, যেমন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ধর্ম পরিবর্তন করে, তাকে হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7751)


7751 - عن حمزة بن عمرو الأسلمي صاحب النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه ورهطا معه إلى رجل من عُذرة فقال:"إن قدرتم على فلان فأحرقوه بالنار" فانطلقوا حتى إذا تواروا منه ناداهم أو أرسل في أثرهم، فردّوهم، ثم قال:"إن أنتم قدرتم عليه فاقتلوه، ولا تحرقوه بالنار، فإنما يعذب بالنار ربُّ النار".

صحيح: رواه أحمد (16035، 16036) من طرق عن ابن جريج قال: أخبرني زياد بن سعد أن أبا الزناد قال: أخبرني حنظلة بن علي، عن حمزة بن عمرو الأسلمي .. فذكره. وإسناده صحيح. قال البخاري:"حديث حمزة بن عمرو الأسلمي في هذا الحديث أصح" علل الترمذي الكبير (2/ 675).

ورواه أبو داود (2673)، وأحمد (16034) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن، عن أبي الزناد قال: حدثني محمد بن حمزة الأسلمي، عن أبيه فذكر نحوه.

فسمى المغيرة شيخ أبي الزناد: محمد بن حمزة الأسلمي، وزياد بن سعد سماه حنظلة بن علي، وزياد أوثق بكثير من المغيرة. ثم إن محمد بن حمزة الأسلمي روى عنه جمعٌ، ولكن لم ينص على توثيقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي عند المتابعة.

وقد توبع لكن ذلك من الاختلاف على أبي الزناد كما سبق ومع ذلك قال ابن حجر في الفتح (6/ 149): أخرجه أبو داود بإسناد صحيح.

فلعله يعني أن لأبي الزناد شيخين ولا يترجح أحدهما على الآخر. والله أعلم.




হামযাহ ইবনু আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে এবং তার সাথে একটি দলকে উযরা গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে পাঠালেন। অতঃপর বললেন: "যদি তোমরা অমুক ব্যক্তিকে কব্জা করতে পারো, তবে তাকে আগুন দিয়ে জ্বালিয়ে দেবে।" তখন তারা চলে গেলেন, কিন্তু যখন তারা তাঁর দৃষ্টির আড়ালে চলে গেলেন, তখন তিনি তাদেরকে ডাকলেন অথবা তাদের পিছনে লোক পাঠালেন, ফলে তারা ফিরে এলেন। এরপর তিনি বললেন: "যদি তোমরা তাকে কব্জা করতে পারো, তবে তাকে হত্যা করো, কিন্তু আগুন দিয়ে জ্বালিয়ে দিও না। কেননা, আগুন দিয়ে কেবল আগুনের রব (আল্লাহ)ই শাস্তি প্রদান করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (7752)


7752 - عن ابن عمر قال: حرّق رسول الله صلى الله عليه وسلم نخل بني النضير، وقطع - وهي البويرة - فنزلت: {مَا قَطَعْتُمْ مِنْ لِينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَائِمَةً عَلَى أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِقِينَ}.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4031)، ومسلم في الجهاد والسير (1746: 29)
كلاهما من طريق الليث، عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكره.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বনু নযীরের খেজুর গাছ পুড়িয়ে দেন এবং কেটে ফেলেন—আর সেটি ছিল আল-বুয়াইরাহ নামক স্থানে। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: {مَا قَطَعْتُمْ مِنْ لِينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَائِمَةً عَلَى أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِقِينَ} (অর্থ: তোমরা যে নরম খেজুর গাছগুলো কেটে ফেলেছ অথবা সেগুলোকে মূলের উপর সোজা দাঁড়ানো রেখে দিয়েছ, তা সবই আল্লাহর অনুমতিক্রমে এবং ফাসিকদেরকে লাঞ্ছিত করার জন্য।)









আল-জামি` আল-কামিল (7753)


7753 - عن سلمة بن الأكوع قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى خيبر، فسرنا ليلا - فذكر بعض قصة خيبر - ثم قال: فلما تصافَّ القومُ كان سيف عامر قصيرًا، فتناول به ساق يهودي ليضربه، ويرجع ذباب سيفه، فأصاب عين ركبة عامر فمات منه، قال: فلما قفلوا قال سلمة: رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو آخذ بيدي، قال:"ما لك؟" قلت له: فداك أبي وأمي زعموا أن عامرًا حبط عمله، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"كذب من قاله، إن له لأجرين، وجمع بين إصبعيه، إنه لجاهد مجاهد، قلّ عربي مشى بها مثله".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4196)، ومسلم في الجهاد والسير (1802: 123) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد مولى سلمة بن الأكوع، عن سلمة بن الأكوع فذكره.

وقوله:"مشى بها" أي بالأرض أو في الحرب.

وفي الباب عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: أغرنا على حي من جهينة فطلب رجل من المسلمين رجلا منهم فضربه فأخطأه وأصاب نفسه بالسيف، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أخوكم يا معشر المسلمين". فابتدره الناس فوجدوه قد مات فلفه رسول الله صلى الله عليه وسلم بثيابه ودمائه وصلى عليه ودفنه فقالوا: يا رسول الله، أشهيد هو؟ قال:"نعم وأنا له شهيد".

رواه أبو داود (2539) - ومن طريقه البيهقي (8/ 110) - قال: حدثنا هشام بن خالد الدمشقي، حدثنا الوليد، عن معاوية بن أبي سلام، عن أبيه، عن جده أبي سلام، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.

وفي إسناده الوليد بن مسلم وهو مدلس وقد عنعن.

ووالد معاوية هو سلام بن أبي سلام، قال أبو حاتم: سلام بن أبي سلام الحبشي والد معاوية بن سلام، لا أعلم أحدًا روى عنه، إنما الناس يروون عن معاوية بن سلام، عن جده، وعن معاوية بن سلام، عن أخيه، فأما معاوية بن سلام عن أبيه فلا".

وقد قال أبو داود عقب الحديث المذكور:"إنما هو عن معاوية، عن أخيه، عن جده". نقله عنه المزي في تحفة الأشراف (11/ 258).

ولذا قال المزي في ترجمة سلام بن أبي سلام من تهذيب الكمال بعد ما أشار إلى رواية أبي داود هذه من طريق معاوية بن سلام، عن أبيه، عن جده قال:"إن كان ذلك محفوظا".

ثم إن سلام بن أبي سلام هذا لم يوثقه أحد، لذا قال الحافظ ابن حجر: مجهول.




সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা খায়বার (অভিযানে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে বের হলাম। আমরা রাতে পথ চলছিলাম। (তিনি খায়বার যুদ্ধের কিছু ঘটনা উল্লেখ করলেন)। তারপর বললেন: যখন দু'দল পরস্পর মুখোমুখি হলো, তখন 'আমির-এর তরবারি ছিল খাটো। তিনি একজন ইয়াহুদীর পায়ে আঘাত করার জন্য তরবারি চালালেন, কিন্তু তাঁর তরবারির ধারালো অংশ ঘুরে এসে 'আমির-এর হাঁটুর রগে লেগে গেল এবং তিনি এতেই মারা গেলেন।

সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, যখন আমরা ফিরছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখলেন এবং আমার হাত ধরলেন, অতঃপর বললেন, "তোমার কী হয়েছে?" আমি তাঁকে বললাম: আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক! তারা ধারণা করছে যে 'আমির-এর আমল বিনষ্ট হয়ে গেছে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে এটা বলেছে, সে মিথ্যা বলেছে। নিশ্চিত তার জন্য দ্বিগুণ সাওয়াব রয়েছে।" এই বলে তিনি তাঁর দুই আঙ্গুল একত্রিত করলেন। "(মৃত্যুর আগ পর্যন্ত) সে ছিল কঠোর পরিশ্রমী মুজাহিদ। খুব কম আরবই তার মতো পথ চলেছে (বা এমন যুদ্ধে হেঁটেছে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (7754)


7754 - عن أبي طلحة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه كان إذا ظهر على قوم أقام بالعرصة ثلاث ليال.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3065) عن محمد بن عبد الرحيم، حدثنا روح بن عبادة، حدثنا سعيد، عن قتادة قال: ذكر لنا أنس بن مالك، عن أبي طلحة فذكره. ورواه في المغازي (3976) عن عبد الله بن محمد، عن روح، به مطولا.

ورواه مسلم في الجنة (2875) عن محمد بن حاتم، عن روح به.

ومن طريق عبد الأعلى، عن سعيد به، إلا أنه ساق جزءًا من الحديث ثم قال"وساق الحديث بمعنى حديث ثابت عن أنس". اهـ وليس فيه اللفظ المذكور في الباب.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সম্প্রদায়কে পরাজিত করে তাদের উপর বিজয়ী হতেন, তখন তিনি খোলা ময়দানে তিন রাত অবস্থান করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7755)


7755 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل بدر فلما كان بِحرّة الوبرة أدركه رجلٌ، قد كان يذكر منه جرأة ونجدة، ففرح أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم حين رأوه، فلما أدركه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم جئت لأتبعك، وأصيب معك، قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تؤمن بالله ورسوله؟" قال: لا. قال:"فارجعْ، فلن أستعين بمشرك".

قالت: ثم مضى حتى إذا كنا بالشجرة أدركه الرجل فقال له كما قال أول مرة، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم كما قال أول مرة، قال:"فارجعْ فلن أستعين بمشرك"، قال: تم رجع فأدركه بالبيداء، فقال له كما قال أول مرة:"تؤمن بالله ورسوله؟" قال: نعم. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فانطلقْ".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1817) من طريق مالك بن أنس، عن الفضيل بن أبي عبد الله، عن عبد الله بن نيار الأسلمي، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.

قوله:"فارجع فلن أستعين بمشرك" وقد جاء في الحديث الآخر: أن النبي صلى الله عليه وسلم استعان بصفوان بن أمية قبل إسلامه، فأخذ طائفة من العلماء بالحديث الأول على إطلاقه، وقال الشافعي وآخرون إن كان الكافر حسن الرأي في المسلمين ودعت الحاجة إلى الاستعانة به أُسْتعينَ به، وإلا فيكره، وحمل الحديثين على هذين الحالين، وإذا حضر الكافر بالإذن رضخ له ولا يسهم له، هذا مذهب مالك والشافعي وأبي حنيفة والجمهور، وقال الزهري والأوزاعي: يسهم له. انظر: شرح مسلم للنووي.

وفي الباب عن خبيب بن عبد الرحمن عن أبيه عن جده قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يريد غزوا أنا ورجل من قومي ولم نُسلم فقلنا: إنا نستحيي أن يشهد قومنا مشهدًا لا نشهده معهم قال:"أو أسلمتما؟" قلنا: لا قال:"فإنا لا نستعين بالمشركين على المشركين" قال: فأسلمنا، وشهدنا معه، فقتلت رجلا، وضربني ضربة، وتزوجت بابنته بعد ذلك، فكانت تقول: لا عدمت رجلا
وشحك هذا الوشاح فأقول: لا عدمتِ رجلا عجل أباك إلى النار.

رواه أحمد (15762)، والطبراني في الكبير (4/ 264)، والحاكم (2/ 121 - 122) كلهم من طريق يزيد بن هارون، أنبأنا المستلم بن سعيد الثقفي، عن خبيب بن عبد الرحمن به. ووالد خبيب هو عبد الرحمن بن أساف لا يعرف فيه جرح ولاتعديل فهو في عداد المجهولين.

وأما الحاكم فقال: صحيح الإسناد، وخبيب بن عبد الرحمن بن الأسود بن حارثة جده صحابي معروف.

وقوله:"لا نستعين بمشرك" قال أهل العلم: وذلك عند الاستغناء عنه، وأما عند الحاجة فلا بأس بذلك.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের আগে বের হলেন। যখন তিনি হাররাত আল-ওয়াবারা নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন তাঁর সাথে একজন লোক এসে মিলিত হল, যার মধ্যে সাহস ও বীরত্বের কথা আলোচিত ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাকে দেখে খুশি হলেন। সে যখন তাঁর সাথে মিলিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আমি আপনার অনুসরণ করতে এবং আপনার সাথে লাভবান হতে এসেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের উপর ঈমান আনো?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তবে ফিরে যাও, কারণ আমি কোনো মুশরিকের সাহায্য নেব না।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে এগিয়ে গেলেন। আমরা যখন আশ-শাজারা নামক স্থানে পৌঁছালাম, তখন লোকটি তাঁর সাথে মিলিত হলো এবং প্রথমবারের মতো একই কথা বলল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও তাকে প্রথমবারের মতো একই উত্তর দিলেন এবং বললেন: "তবে ফিরে যাও, কারণ আমি কোনো মুশরিকের সাহায্য নেব না।" তিনি বলেন: এরপর সে ফিরে গেল এবং আল-বাইদা নামক স্থানে এসে তাঁর সাথে মিলিত হলো। সে তাঁকে প্রথমবারের মতো একই কথা বলল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের উপর ঈমান আনো?" সে বলল: হ্যাঁ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তাহলে চলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7756)


7756 - عن بريدة بن الحصيب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أمر أميرا على جيش أو سرية، أوصاه في خاصته بتقوى الله ومن معه من المسلمين خيرًا، ثم قال:" … وإذا حاصرتَ أهل حصن فأرادوك أن تنزلهم على حكم الله، فلا تنزلهم على حكم الله، ولكن أنزلهم على حكمك، فإنك لا تدري أتصيب حكم الله فيهم أم لا".

صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1731: 2، 3) من طريق سفيان (هو الثوري)، عن علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه فذكره.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সেনাবাহিনী বা সামরিক দলের (সারিয়াহর) উপর কোনো নেতাকে (আমীর) নিযুক্ত করতেন, তখন তিনি বিশেষভাবে তাকে আল্লাহভীতির উপদেশ দিতেন এবং তার সাথে থাকা মুসলিমদের প্রতি ভালো আচরণের জন্য উপদেশ দিতেন, অতঃপর তিনি বলতেন: "...আর যখন তুমি কোনো দুর্গের অধিবাসীদের অবরোধ করবে এবং তারা চাইবে যে তুমি তাদেরকে আল্লাহর হুকুম অনুযায়ী আত্মসমর্পণ করাও, তবে তুমি তাদেরকে আল্লাহর হুকুম অনুযায়ী আত্মসমর্পণ করাবে না, বরং তাদেরকে তোমার হুকুম অনুযায়ী আত্মসমর্পণ করাবে। কারণ তুমি জানো না যে তুমি তাদের ব্যাপারে আল্লাহর হুকুম যথাযথভাবে প্রয়োগ করতে পারবে কি না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7757)


7757 - عن عبد الله بن كعب بن مالك الأنصاري: أن جيشا من الأنصار كانوا بأرض فارس مع أميرهم، وكان عمر يعقب الجيوش في كل عام فشغل عنهم عمر، فلما مرَّ الأجل قفل أهل ذلك الثغر، فاشتد عليهم وتواعدهم، وهم أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا عمر إنك غفلت عنا، وتركت فينا الذي أمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم من إعقاب
بعض الغزية بعضا.

صحيح: رواه أبو داود (2960)، وابن الجارود (1095) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، عن عبد الله بن كعب فذكره. واللفظ لأبي داود. وإسناده صحيح.

قال الخطابي:"الإعقاب أن يبعث الإمام في أثر المقيمين في الثغر جيشا يقيمون مكانهم، وينصرف أولئك، فإنه إذا طالت عليهم الغيبة والعزبة تضرروا به، وأضر ذلك بأهليهم".




আব্দুল্লাহ ইবনে কা'ব ইবনে মালিক আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, আনসারদের একটি বাহিনী তাদের আমীরের সাথে পারস্যের ভূমিতে ছিল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি বছর সৈন্যদের রদবদল (এক দলকে আরেক দলের স্থলাভিষিক্ত) করতেন। কিন্তু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ব্যাপারে ব্যস্ত হয়ে পড়লেন। যখন (নির্ধারিত) সময় পার হয়ে গেল, তখন সেই সীমান্তের রক্ষীরা ফিরে আসলেন। [এ কারণে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)] তাদের প্রতি কঠোরতা দেখালেন এবং তাদের ধমকালেন, অথচ তারা ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী। তখন তারা বলল: হে উমার! আপনি আমাদের ব্যাপারে অমনোযোগী ছিলেন এবং আমাদের মাঝে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে নির্দেশ দিয়েছিলেন—একদল যোদ্ধার পর অন্য দলকে স্থলাভিষিক্ত করার—সেই বিষয়টি ছেড়ে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7758)


7758 - عن نعيم بن مسعود الأشجعي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول للرسولين حين قرآكتاب مسيلمة الكذاب:"فما تقولان أنتما؟" قالا: نقول كما قال. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما والله لولا أن الرسل لا تقتل لضربت أعناقكما".

حسن: رواه أبو داود (2761)، وأحمد (15989)، والترمذي في العلل الكبير (2/ 953)، والحاكم (3/ 52 - 53، و 2/ 142 - 143) كلهم من طرق عن محمد بن إسحاق قال: حدثني سعد بن طارق الأشجعي، عن سلمة بن نعيم بن مسعود الأشجعي، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرّح.

وقال الترمذي:"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: قد رواه ابن أبي زائدة أيضا عن سعد بن طارق، ورآه حديثا حسنا".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".




নু'আইম ইবনে মাসঊদ আল-আশজা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দুইজন দূতকে বলতে শুনেছি, যখন তারা মুসাইলামা কাজ্জাবের (মিথ্যুকের) চিঠি পাঠ করল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা দু'জন কী বলো?" তারা বলল, "সে যা বলেছে আমরাও তাই বলি।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আল্লাহর কসম! যদি না এই নিয়ম থাকত যে, দূতদের হত্যা করা হয় না, তবে আমি অবশ্যই তোমাদের দু'জনের গর্দান উড়িয়ে দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7759)


7759 - عن حارثة بن مضرب أنه أتى عبد الله فقال: ما بيني وبين أحد من العرب حنّة، وإني مررت بمسجد لبني حنيفة، فإذا هم بؤمنون بمسيلمة. فأرسل إليهم عبد الله، فجيئ بهم فاستتابهم غير ابن النواحة، قال له: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لولا أنك رسول لضربت عنقك". فأنت اليوم لست برسول، فأمر قرظة بن كعب فضرب عنقه في السوق، ثم قال: من أراد أن ينظر إلى ابن النواحة قتيلا بالسوق.

صحيح: رواه أبو داود (2762)، وصحّحه ابن حبان (4879)، كلاهما من طريق محمد بن كثير العبدي، حدثنا سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب فذكره. وإسناده صحيح، وسفيان الثوري سمع من أبي إسحاق قبل الاختلاط. وللحديث طرق أخرى.

وقوله:"حنة" وفي صحيح ابن حبان:"إحنة" بالهمز وهو الأفصح والمعنى: الضعن.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হারিছা ইবনে মুদাররিব তাঁর নিকট এসে বললেন: আমার এবং আরবের কোনো ব্যক্তির মধ্যে কোনো বিদ্বেষ নেই, আর আমি বনু হানিফার এক মসজিদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, দেখলাম তারা মুসাইলামাকে বিশ্বাস করছে। তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে লোক পাঠালেন। তাদের ধরে আনা হলো এবং ইবনুন্-নাওয়াহাহ ছাড়া বাকি সকলকে তিনি তওবা করতে বললেন। তিনি (আব্দুল্লাহ) ইবনুন্-নাওয়াহাহকে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, ‘যদি তুমি দূত না হতে, তবে আমি তোমার গর্দান উড়িয়ে দিতাম।’ আর তুমি তো আজ আর দূত নও। অতঃপর তিনি ক্বারযাহ ইবনু কা'বকে নির্দেশ দিলেন এবং তিনি তাকে বাজারের মধ্যে শিরশ্ছেদ করলেন। এরপর তিনি বললেন: যে ব্যক্তি ইবনুন্-নাওয়াহাকে বাজারে নিহত অবস্থায় দেখতে চায়, সে যেন দেখে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (7760)


7760 - عن جرير بن عبد الله قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا تريحني من ذي
الخلصة"، وكان بيتا فيه خثعم يسمى كعبة اليمانية، فانطلقت في خمسين ومائة من أحمس، وكانوا أصحاب خيل، فأخبرت النبي صلى الله عليه وسلم أني لا أثبت على الخيل، فضرب في صدري حتى رأيت أثر أصابعه في صدري، فقال:"اللهم ثبته واجعله هاديا مهديا"، فانطلق إليها، فكسرها، وحرّقها فأرسل إلى النبي صلى الله عليه وسلم يبشره، فقال رسول جرير لرسول الله: يا رسول الله، والذي بعثك بالحق ما جئتك حتى تركتها كأنها جمل أجرب، فبارك على خيل أحمس ورجالها خمس مرات.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (3076)، ومسلم في فضائل الصحابة (2476: 137) كلاهما من حديث إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن جرير بن عبد الله البجلي فذكره.




জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "তুমি কি আমাকে যুল-খালাসা থেকে মুক্তি (বা স্বস্তি) দেবে না?" যুল-খালাসা ছিল খাশ'আম গোত্রের একটি উপাসনালয়, যাকে ইয়ামানিয়াহ্ কা'বা (ইয়ামানের কা'বা) বলা হতো। অতঃপর আমি আহমাস গোত্রের দেড়শত অশ্বারোহী নিয়ে সেদিকে রওনা হলাম। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানালাম যে, আমি ঘোড়ার পিঠে স্থির থাকতে পারি না (বা ঘোড়সওয়ারিতে খুব পটু নই)। তখন তিনি আমার বুকে আঘাত করলেন, এমনকি আমি তাঁর আঙুলের ছাপ আমার বুকে দেখতে পেলাম। অতঃপর তিনি বললেন, "হে আল্লাহ! তাকে স্থিরতা দান করো এবং তাকে পথপ্রদর্শক ও সুপথপ্রাপ্ত বানাও।" এরপর আমি সেদিকে গেলাম, সেটিকে ভেঙ্গে দিলাম এবং জ্বালিয়ে দিলাম। অতঃপর তিনি (জারীর) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সুসংবাদ দিয়ে লোক পাঠালেন। জারীরের প্রেরিত দূত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! যাঁর শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন, আমি আপনার কাছে আসিনি যতক্ষণ না আমি সেটিকে (ধ্বংস করে) এমনভাবে রেখে এসেছি যেন তা একটি খোসপাঁচড়াযুক্ত উট।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহমাস গোত্রের অশ্ব এবং পুরুষদের জন্য পাঁচবার বরকতের (কল্যাণের) দু‘আ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7761)


7761 - عن ابن أبي مليكة قال: قال ابن الزبير لابن جعفر: أتذكر إذْ تلقينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أنا وأنت وابن عباس؟ قال: نعم، فحملنا وتركك.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (3082)، ومسلم في فضائل الصحابة (2427: 65) كلاهما من حديث حبيب بن الشهيد، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره. واللفظ للبخاري. ووقع عند مسلم:"قال عبد الله بن جعفر لابن الزبير" هكذا مقلوبا. والله أعلم.




ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনে জাফরকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনার কি মনে আছে, যখন আমি, আপনি এবং ইবনে আব্বাস রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করেছিলাম? তিনি (ইবনে জাফর) বললেন: হ্যাঁ, মনে আছে। তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দু’জনকে (সওয়ারীতে) উঠিয়ে নিলেন এবং আপনাকে ছেড়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7762)


7762 - عن السائب بن يزيد قال: ذهبنا تنلقى رسول الله صلى الله عليه وسلم مع الصبيان إلى ثنية الوداع.

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (3083) عن مالك بن إسماعيل، حدثنا ابن عيينة، عن الزهري، قال: قال السائب بن يزيد فذكره.

ورواه في المغازي (4427) عن عبد الله بن محمد، عن سفيان به. وزاد:"مقدمه من غزوة تبوك".




সায়িব ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা বালকদের সাথে নিয়ে সানিয়াতুল ওয়াদা (নামক স্থানে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাতের জন্য গিয়েছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (7763)


7763 - عن السائب بن يزيد قال: صحبتُ طلحة بن عبيد الله، وسعدًا والمقداد بن الأسود، وعبد الرحمن بن عوف رضي الله عنهم، فما سمعتُ أحدًا منهم يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا أني سمعتُ طلحة يحدث عن يوم أحد.

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2824) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا حاتم، عن محمد بن يوسف، عن السائب بن يزيد فذكره.




সায়িব ইবনে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তালহা ইবনে উবায়দুল্লাহ, সাদ, মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ এবং আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাহচর্য গ্রহণ করেছি। কিন্তু আমি তাদের কাউকেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে কোনো হাদীস বর্ণনা করতে শুনিনি, তবে আমি তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উহুদ যুদ্ধের দিনের ঘটনা বর্ণনা করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (7764)


7764 - عن عبد الله بن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يسافر بالقرآن إلى أرض العدو. وزاد في رواية: مخافة أن يناله العدو.

متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (7) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ورواه البخاري في الجهاد والسير (2990)، ومسلم في الإمارة (1869: 92) كلاهما من طريق مالك، به مثله. والزيادة في رواية لمسلم عقبها.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কুরআন নিয়ে শত্রুর দেশে ভ্রমণ করতে নিষেধ করেছেন। অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: এই আশঙ্কায় যে, শত্রুরা যেন তা লাভ করতে না পারে।









আল-জামি` আল-কামিল (7765)


7765 - عن سلمة بن الأكوع قال: كان علي رضي الله عنه تخلف عن النبي صلى الله عليه وسلم في خيبر، وكان به رمد، فقال: أنا أتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم! فخرج علي فلحق بالنبي صلى الله عليه وسلم، فلما كان مساء الليلة التي فتحها في صباحها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأعطين الراية - أو قال: ليأخذن - غدا رجل يحبه الله ورسوله - أو قال: يحب الله ورسوله - يفتح الله عليه"، فإذا نحن بعلي وما نرجوه، فقالوا: هذا علي، فأعطاه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ففتح الله عليه.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2975)، ومسلم في فضائل الصحابة (2407: 35) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع قال فذكره.




সালামা ইবনুল আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খায়বারের অভিযানে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যেতে পারেননি, কারণ তাঁর চোখ উঠেছিল (বা, চোখ লাল হয়েছিল)। তখন তিনি বললেন, আমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথ থেকে পেছনে পড়ে থাকব? অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিলিত হলেন। যখন সেই রাতের সন্ধ্যা হলো, যার পরের দিন সকালে তিনি (খায়বার) জয় করেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আগামীকাল আমি এমন এক ব্যক্তিকে পতাকা দেব—অথবা তিনি বলেছেন: এমন এক ব্যক্তি পতাকা গ্রহণ করবে—যাকে আল্লাহ ও তাঁর রাসূল ভালবাসেন—অথবা তিনি বলেছেন: যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালবাসে—আর আল্লাহ তার মাধ্যমে বিজয় দান করবেন।” হঠাৎ আমরা আলীকে দেখতে পেলাম, অথচ আমরা তার (আগমন) আশা করিনি। সাহাবীরা বললেন, এই তো আলী। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আলীকে) পতাকা দিলেন এবং আল্লাহ তাঁর (আলীর) মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7766)


7766 - عن نافع بن جبير قال: سمعت العباس يقول للزبير: ها هنا أمرك النبي صلى الله عليه وسلم أن تركز الراية.

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2976) عن محمد بن العلاء، حدثنا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن نافع بن جبير فذكره. وهو جزء من حديث طويل في غزوة الفتح.




নাফি' ইবনু জুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনাকে এখানেই পতাকা স্থাপন করতে নির্দেশ দিয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7767)


7767 - عن أنس بن مالك قال: خطب النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"أخذ الراية زيد فأصيب، ثم أخذها جعفر فأصيب، ثم أخذها عبد الله بن رواحة فأصيب، ثم أخذها خالد بن الوليد عن غير إمرة ففتح له"، وقال:"ما يسرنا أنهم عندنا" - قال أيوب أو قال:"ما يسرهم أنهم عندنا" - وعيناه تذرفان.

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2798) عن يوسف بن يعقوب الصفار، حدثنا إسماعيل ابن علية، عن أيوب، عن حميد بن هلال، عن أنس بن مالك فذكره.

قوله:"ما يسرهم أنهم عندنا" أي لما رأوا من الكرامة بالشهادة فلا يعجبهم أن يعودوا إلى الدنيا كما كانوا. الفتح (6/ 17).




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবা দিলেন এবং বললেন: "যায়িদ ঝান্ডা ধরলেন এবং শহীদ হলেন। অতঃপর জা’ফর তা ধরলেন এবং শহীদ হলেন। অতঃপর আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা তা ধরলেন এবং শহীদ হলেন। এরপর খালিদ ইবনে ওয়ালীদ তা গ্রহণ করলেন—যদিও তাকে সেনাপতির দায়িত্ব দেওয়া হয়নি—আর আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।" তিনি বললেন: "আমরা চাই না যে তারা আমাদের কাছে ফিরে আসুক।"—আইয়ুব (রাবী) বললেন, অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা চায় না যে তারা আমাদের কাছে ফিরে আসুক"—আর তাঁর দুই চোখ থেকে অশ্রু ঝরছিল।