আল-জামি` আল-কামিল
7788 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الخيلُ في نواصيها الخيرُ إلى يوم القيامة".
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (44) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاري في الجهاد والسير (2849)، ومسلم في الإمارة (1871: 96) من طريق مالك به مثله.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "ঘোড়ার কপালে (নাসিয়াতে) কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ নিহিত রয়েছে।"
7789 - عن عروة البارقي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخيلُ معقودٌ في نواصيها الخيرُ إلى يوم القيامة، الأجرُ والمغنم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2852)، ومسلم في الإمارة (1873: 98) كلاهما من طريق زكريا، عن عامر الشعبي، عن عروة البارقي فذكره.
উরওয়াহ আল-বারিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার কপালে কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ (বা মঙ্গল) বাঁধা আছে, অর্থাৎ সওয়াব ও গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ)।"
7790 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"البركةُ في نواصي الخيل".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2851)، ومسلم في الإمارة (1874: 100) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد - وزاد مسلم: معاذ هو العنبري - عن شعبة، عن أبي التياح، عن أنس بن مالك. فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ঘোড়ার কপালের চুলে (বা অগ্রভাগে) বরকত (কল্যাণ) রয়েছে।”
7791 - عن جرير بن عبد الله قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يلوي ناصيةَ فرسٍ بإصبعيْه وهو يقول:"الخيل معقود بنواصيها الخيرُ إلى يوم القيامة: الأجر والغنيمة".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1872: 97) من طريق يزيد بن زُريع، حدثنا يونس بن عُبيد، عن عمرو بن سعيد، عن أبي زرعة بن عمرو بن جرير، عن جرير بن عبد الله .. فذكره.
জারীর ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম, তিনি তাঁর দু'আঙুল দ্বারা একটি ঘোড়ার কপালের কেশগুচ্ছ পেঁচাতে পেঁচাতে বলছিলেন: "কেয়ামত পর্যন্ত ঘোড়ার কপাল-দেশে কল্যাণ বা মঙ্গল বাঁধা আছে: (তা হলো) প্রতিদান ও গনীমত।"
7792 - عن سوادة بن الربيع الجرمي قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فأمر لي بذود وقال لي: عليك بالخيل فإن الخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة.
حسن: رواه الطبراني في الكبير (7/ 113 - 114)، والبزار (كشف الأستار 1688)، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2595) كلهم من طريق سلم الجرمي، عن سوادة بن الربيع فذكره.
وإسناده حسن، من أجل سلم وهو ابن عبد الرحمن الجرمي فإنه حسن الحديث.
وقد تحرف في الطبراني إلى"سليمان الجرمي" لذا قال الهيثمي في المجمع (5/ 260):"سليمان لم أعرفه، وبقية رجاله ثقات".
সুওয়াদা ইবনুর রাবী‘ আল-জারমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত হলাম। তিনি আমার জন্য কিছু উট দেওয়ার নির্দেশ দিলেন এবং আমাকে বললেন: তোমরা ঘোড়ার প্রতি যত্নবান হও, কেননা কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ ঘোড়ার কপালে (নাসিয়ায়) বাঁধা আছে।
7793 - عن أسماء بنت يزيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الخيل في نواصيها الخير معقود أبدًا إلى يوم القيامة، فمن ربطها عدة في سبيل الله، وأنفق عليها احتسابا في سبيل الله، فإنَّ شِبَعها وجوعها ورِيّها وظمأها وأرواثها وأبوالها فلاح في موازينه يوم القيامة، ومن ربطها رياءً وسمعةً وفرَحًا ومرَحًا فإنَّ شِبَعها وجوعها وريَّها وظمأها وأرواثها وأبوالها خسرانٌ في موازينه يوم القيامة".
حسن: رواه أحمد (27574، 27593)، وعبد بن حميد (1583) من طرق عن عبد الحميد بن بهرام، حدثني شهر بن حوشب، حدثتني أسماء بنت يزيد فذكرته.
وإسناده حسن من أجل شهر فإنه حسن الحديث إذا لم يخالف، ولم يأت بما ينكر عليه، ولا سيما إذا روى عنه عبد الحميد بن بهرام فقد احتمل غير واحد ما يرويه عبد الحميد عن شهر.
وقال المنذري:"رواه أحمد بإسناد حسن". الترغيب والترهيب (1973).
আসমা বিনতে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার কপালে (পূর্বাংশে) চিরকালের জন্য, কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ (বরকত) বাঁধা আছে। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (জিহাদের) উপকরণ হিসেবে এটিকে বেঁধে রাখে এবং আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের আশায় এর জন্য খরচ করে, নিশ্চয়ই তার পেট ভরে খাওয়া, ক্ষুধার্ত থাকা, পেট ভরে পান করা, তৃষ্ণার্ত থাকা, তার গোবর ও তার পেশাব কিয়ামতের দিন তার (আমলের) পাল্লায় সফলতা বয়ে আনবে। আর যে ব্যক্তি তা (ঘোড়া) লোক দেখানোর জন্য, সুখ্যাতির জন্য, গর্ব ও অহংকারবশত বেঁধে রাখে, নিশ্চয়ই তার পেট ভরে খাওয়া, ক্ষুধার্ত থাকা, পেট ভরে পান করা, তৃষ্ণার্ত থাকা, তার গোবর ও তার পেশাব কিয়ামতের দিন তার (আমলের) পাল্লায় ক্ষতি (ক্ষতিগ্রস্ততা) বয়ে আনবে।"
7794 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخيلُ معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة، وأهلها معاونون عليها".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (20/ 431)، وأبو عوانة (7285)، والبخاري في التاريخ الكبير (2/ 224) كلهم من طرق عن إسماعيل بن سعيد الجُبيري قال: سمعتُ أبا سعيد بن عبيد الله يحدث عن زياد بن جبير، عن أبيه - وهو جبير بن مطعم - عن المغيرة بن شعبة. فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن سعيد ووالده فإنهما حسنا الحديث.
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার কপালে কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ বাঁধা আছে এবং এর আরোহীরা এর দ্বারা সাহায্যপ্রাপ্ত হবে।"
7795 - عن أبي كبشة الأنماري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"الخيلُ معقود في نواصيها الخير، وأهلها معاونون عليها، والمنفق عليها كالباسط يده بالصدقة".
صحيح: رواه الطبراني في الكبير (22/ 339)، وصحّحه ابن حبان (4674)، والحاكم (2/ 91) من طرق عن عبد الله بن وهب، أخبرني معاوية بن صالح (وهو ابن حدير الحضرمي)، حدثني نعيم بن زياد، أنه سمع أبا كبشة صاحب النبي صلى الله عليه وسلم يقول فذكره.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه الزيادة".
وقال الهيثمي:"رجاله ثقات". مجمع الزوائد (5/ 259).
আবূ কাবশাহ আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কল্যাণ ঘোড়ার কপালে বাঁধা রয়েছে। আর এর মালিকদেরকে সেগুলোর কারণে সাহায্য করা হয়। আর যে ব্যক্তি ঘোড়ার জন্য খরচ করে, সে এমন ব্যক্তির মতো, যে সর্বদা সদকা করার জন্য হাত প্রসারিত করে রাখে।"
7796 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الخيل لرجل أجر ولرجل ستر وعلى رجل وزر، فأما الذي هي له أجر فرجل ربطها في سبيل الله فأطال لها في مرج أو روضة، فما أصابت في طيلها ذلك من المرج أو الروضة كان له حسنات، ولو أنها قطعت طيلها ذلك فاستنت شرفا أو شرفين كانت آثارها وأرواثها حسنات له، ولو أنها مرت بنهر فشربت منه، ولم يرد أن يسقي به، كان ذلك له حسنات فهي له أجر، ورجل ربطها تغنّيا وتعففا ولم ينس حق الله في رقابها ولا في ظهورها فهي لذلك ستر، ورجل ربطها فخرًا ورياء ونواء لأهل الإسلام فهي على ذلك وزر". الحديث.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (3) عن زيد بن أسلم، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة. فذكره.
ورواه البخاري في الجهاد والسير (2860) من طريق مالك به مثله.
ورواه مسلم في الزكاة (987: 24) من طريق حفص بن ميسرة الصغاني، عن زيد بن أسلم به بسياق طويل. وفيه أيضا (987: 26): الخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ঘোড়া তিন প্রকারের লোকের জন্য: একজনের জন্য প্রতিদান (নেকি), একজনের জন্য পর্দা (রক্ষাকবচ), এবং আরেকজনের জন্য পাপের বোঝা।
যে ব্যক্তির জন্য তা প্রতিদান, সে হলো ঐ ব্যক্তি যে ঘোড়াটিকে আল্লাহর পথে (জিহাদের জন্য) প্রস্তুত করে রেখেছে এবং এটিকে কোনো চারণভূমি বা বাগানে লম্বা রশিতে বেঁধে চরাতে দিয়েছে। যখন সেই লম্বা রশিতে বাঁধা অবস্থায় ঘোড়াটি ওই চারণভূমি বা বাগান থেকে যা কিছু ভক্ষণ করে, তা তার জন্য নেকি হিসেবে পরিগণিত হয়। আর যদি ঘোড়াটি সেই রশি ছিঁড়ে এক বা দু'বার দৌঁড়ে যায়, তবে তার পদচিহ্ন এবং মল-মূত্রও তার জন্য নেকি হিসেবে লেখা হয়। এমনকি যদি এটি কোনো নদীর পাশ দিয়ে যায় এবং পানি পান করে, যদিও তার মালিকের উদ্দেশ্য তাকে পানি পান করানো ছিল না, তবুও এই কাজের জন্য তার নেকি রয়েছে। সুতরাং, এই ব্যক্তির জন্য তা হলো প্রতিদানস্বরূপ।
আর যে ব্যক্তি তা (ঘোড়ার প্রয়োজন থেকে) সচ্ছল হওয়ার জন্য এবং (মানুষের কাছে চাওয়া থেকে) পবিত্র থাকার উদ্দেশ্যে বাঁধল, আর সে সেটির গর্দান বা পিঠের ব্যাপারে আল্লাহর হক ভুলে যায়নি, তার জন্য তা হলো (দারিদ্র্য থেকে) রক্ষাকবচ।
আর যে ব্যক্তি তা গর্ব, লোক-দেখানো এবং মুসলমানদের প্রতি শত্রুতা পোষণ করে বাঁধল, তার জন্য তা হলো পাপের বোঝা।
7797 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"من احتبس فرسا في سبيل الله إيمانا بالله، وتصديقا بوعده؛ فإن شبعه وريّه وروثه وبوله في ميزانه يوم القيامة".
صحيح. رواه البخاري في الجهاد والسير (2853) عن علي بن حفص، حدثنا ابن المبارك، أخبرنا طلحة بن أبي أسيد قال: سمعت سعيدًا المقبري يحدّث أنه سمع أبا هريرة يقول فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি আল্লাহর প্রতি ঈমান এবং তাঁর প্রতিশ্রুতির সত্যায়নের উদ্দেশ্যে আল্লাহর পথে (জিহাদের জন্য) একটি ঘোড়াকে প্রস্তুত রাখে, তবে নিশ্চয় তার তৃপ্তিভোজ, তার পানীয়, এবং তার গোবর ও তার পেশাবও কিয়ামতের দিন তার (আমলের) পাল্লায় (নেকী হিসেবে) থাকবে।
7798 - عن تميم الداري قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ مسلم ينقي لفرسه شعيرا، ثم يعلّفه عليه إلا كتب له بكل حبة حسنة".
حسن: رواه أحمد (16955)، والطبراني في مسند الشاميين (553) من طريق إسماعيل بن عياش، حدثني شرحبيل بن مسلم الخولاني أن روح بن زنباع زار تميما الداري، فوجده ينقي شعيرا لفرسه وحوله أهله. فقال له: أما كان في هولاء من يكفيك؟ قال تميم: بلى، ولكني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول فذكره.
وهذا إسناد حسن فإن إسماعيل بن عياش صدوق فيما رواه عن أهل الشام وهذه منها، وشرحبيل بن مسلم شامي صدوق، وروح بن زنباع من أمراء التابعين، ومنهم من قال: له صحبة ولا يصح، روى عنه جمع. وذكره ابن حبان في الثقات، وقال: كان عابدا غزاء من سادات أهل الشام فمثله يحسن حديثه، إذا لم يعرف فيه جرح، مع شهرته، وهو من رجال التعجيل.
তামিম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি নেই যে তার ঘোড়ার জন্য যব পরিষ্কার করে, তারপর তাকে তা খাওয়ায়; তবে তার জন্য যবের প্রতিটি দানার বিনিময়ে একটি করে নেকি লেখা হয়।”
(হাদীসটির প্রেক্ষাপট হলো যে,) রূহ ইবনে যানবা'আহ (روح بن زنباع) একবার তামিম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করতে গেলেন এবং দেখলেন তিনি তাঁর ঘোড়ার জন্য যব পরিষ্কার করছেন, অথচ তাঁর পরিবারের সদস্যরা আশেপাশে উপস্থিত ছিল। তখন রূহ তাঁকে বললেন, 'এই লোকদের মধ্যে কি কেউ ছিল না যে আপনার এই কাজটি করে দিত?' তামিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হ্যাঁ, (লোকজন ছিল) কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি –' এরপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
7799 - عن رجل من الأنصار، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الخيل ثلاثة: فرس يربطه الرجل في سبيل الله عز وجل، فثمنه أجره، وركوبه أجره، وعاريته أجره، وعلفه أجره، وفرس
يغالق عليه الرّجل ويراهن، فثمنه وزر، وفرس للبطنة، فعسى أن يكون سدادًا من الفقر إن شاء الله تعالى".
صحيح: رواه أحمد (16645) عن معاوية بن عمرو، حَدَّثَنَا زائدة، حَدَّثَنَا الركين بن الربيع بن عميلة، عن أبي عمرو الشيبانيّ، عن رجل من الأنصار، فذكره.
وإسناده صحيح.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 260):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح".
وأمّا ما رواه ابن ماجة (2791) من طريق أحمد بن يزيد بن روح الداريّ، عن محمد بن عقبة القاضيّ، عن أبيه، عن جده، عن تميم الداري قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من ارتبط فرسا في سبيل الله، ثمّ عالج علفه بيده كان له بكل حبة حسنة". فلا يصح.
قال البوصيري في مصباح الزجاجة: هذا إسناد ضعيف محمد وأبوه عقبه وجده مجهولون، والجدُّ لم يُسمَّ.
قلت: وفيه أيضًا أحمد بن يزيد الداري لم يذكر في ترجمته من الرواة عنه إِلَّا واحد، ولم يوثقه أحد، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مستور".
আনসারী এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
ঘোড়া তিন প্রকার: এক প্রকার ঘোড়া হলো— যা কোনো ব্যক্তি আল্লাহর পথে (জিহাদের জন্য) বেঁধে রাখে। এর মূল্য তার জন্য সওয়াব, একে আরোহণ করা সওয়াব, একে ধার দেওয়া সওয়াব এবং এর খাবার-দানা সওয়াব। দ্বিতীয় প্রকার হলো— যা নিয়ে কোনো ব্যক্তি দৌড় প্রতিযোগিতা করে এবং বাজি ধরে (জুয়া খেলে)। এর মূল্য তার জন্য গুনাহ। আর তৃতীয় প্রকার ঘোড়া হলো— যা জীবিকা নির্বাহের জন্য রাখা হয়। আশা করা যায় যে, আল্লাহর ইচ্ছায় তা দারিদ্র্য থেকে রক্ষাকারী হবে।
7800 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخيلُ معقود في نواصيها الخير والنيل إلى يوم القيامة، وأهلُها معاونون عليها، فامسحوا بنواصيها، وادعوا لها بالبركة، وقلدوها ولا تقلدوها بالأوتار".
حسن: رواه أحمد (14791)، والطحاوي في شرح المشكل (323) من طرق عن ابن المبارك، عن عتبة بن أبي حكيم، حَدَّثَنِي حصين بن حرملة، عن أبي مصبّح، عن جابر. فذكره.
وفي إسناده حصين بن حرملة لم يُذكر له راو غير عتبة بن أبي حكيم، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته (6/ 213)، وهو من رجال التعجيل.
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (5/ 261):"رجال أحمد ثقات" فاعتماد منه على توثيق ابن حبَّان لحصين بن حرملة.
ولكن رُوي من طريق آخر، وهو ما رواه أبو يعلى في معجمه (195)، وأبو الشّيخ في طبقات المحدثين (3/ 473) من طريق سليمان بن عمر بن خالد الأقطع أبي أيوب الرقيّ، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد الأمويّ، عن مجالد، عن الشعبيّ، عن جابر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الخيل معقود في نواصيها الخير" قالوا: يا رسول الله، وما ذلك الخير؟ قال:"الأجر والغنيمة".
وسليمان بن عمرو الرقي ترجم له ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 131) وقال: كتب عنه أبي بالرقة، وذكره ابن حبَّان في ثقاته (8/ 280).
ومجالد هو ابن سعيد ضعيف عند جمهور أهل العلم إِلَّا أن البخاريّ كان حسن الرأي فيه. وبمجموع هذين الطريقين يصل الحديث إلى درجة الحسن إن شاء الله إِلَّا أن في رواية حصين بن حرملة زيادات لم ترد في طريقي مجالد ولكن لها ما يشهده.
فقوله:"وأهلها معاونون عليها" ثبت مثله من حديث أبي كبشة الأنماريّ، والمغيرة بن شعبة كما تقدّم.
وقوله:"وقلدوها ولا تقلدوها الأوتار" جاء مثله من مرسل مكحول عند سعيد بن منصور (2429، 2433) وابن أبي شيبة (12/ 484)، ومن قول أبي أمامة عند ابن أبي شيبة (12/ 484).
وقوله:"فامسحوا بنواصيها" فقد جاء عند مسلم من حديث جرير بن عبد الله أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يلوي ناصية فرس بأصبعه.
وقوله:"وادعوا لها بالبركة" ففي الحديث المتفق عليه عن أنس مرفوعًا:"البركة في نواصي الخيل" والله تعالى أعلم.
وأمّا ما رُوي عن أبي وهب الجُشمي - وكانت له صحبة - قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تسموا بأسماء الأنبياء، وأحب الأسماء إلى الله عز وجل: عبد الله، وعبد الرحمن. وأصدقها. حارث وهمام، وأقبحها: حرب ومُرّة، وارتبطوا الخيل، وامسحوا بنواصيها وأعجازِها، - أو قال: وأكفالها - وقلدوها، ولا تقلدوها الأوتار، وعليكم بكل كُميتٍ أغر محجل، أو أشقر أغر محجل، أو أدهم أغرّ محجل". فمعلول.
رواه النسائيّ (3565)، وأبوداود (4950، 2553، 2543) مفرقا، وأحمد (19032) - ومن طريقه البخاريّ في الأدب المفرد (814) - من طرق عن هشام بن سعيد الطالقانيّ، حَدَّثَنَا محمد بن المهاجر الأنصاريّ، عن عَقيل بن شبيب، عن أبي وهب الجشمى - وكانت له صحبة - قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره. والسياق حمد.
ورواه أحمد (19033)، وأبودا ود (2544) من طريق أبي المغيرة (وهو عبد القدوس بن الحجاج الخولاني) عن عقيل بن شبيب، عن أبي وهب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره. ولم يقل: له صحبة. ونسب في رواية أحمد بأنه كلاعي.
ونقل ابن أبي حاتم في العلل (2/ 312 - 313) عن أبيه في إعلال الحديث المذكور كلاما طويلًا حاصله: أن أبا وهب المذكور في الإسناد هو الكلاعي صاحب مكحول، واسمه عبيد الله بن عبيد، وهو دون التابعين ثمّ قال: قلت لأبي:"هو عقيل بن سعيد، أو عقيل بن شبيب؟ قال: مجهول، ولا أعرفه". اهـ
وقال الذّهبيّ في ترجمة عقيل بن شبيب من الميزان (3/ 88):"لا يعرف هو ولا الصحابي إِلَّا بهذا الحديث، تفرّد به محمد بن المهاجر عنه". اهـ
قوله:"قَلِّدُوا الخيلَ ولا تُقَلِّدوها الأوتار" أي قَلِّدُوها طلبَ إعلاء الدين والدفاع عن المسلمين، ولا تُقَلِّدوها طَلَب أوتار الجاهليَّة وذُحُولَها التي كانت بينكم.
والأوتار: جمع وِتْر بالكسر وهو الدَّمُ وطَلَبُ الثأر، يُرِيد اجْعلوا ذلك لازِمًا لها في أعناقها لُزوم القَلائد للأعناق.
وقيل: أراد بالأوتار: جَمْع وَتَر القَوْس أي لا تَجْعلوا في أعْناقها الأوتار فَتَخْتنِقَ لأنَّ الخيلَ ربما رعَت الأشجار، فنَشِبَت الأوتار ببعض شُعَبها فتخنقها.
وقيل: إنّما نَهاهم عنها؛ لأنهم كانوا يَعْتقِدون أن تَقْليد الخيل بالأوتار يَدْفع عنها العين والأذَى فتكون كالعُوذة لها فنهاهم وأعْلَمَهم أنها لا تَدْفع ضَرَرًا ولا تَصرف حَذَرًا. والمعنى الأخير صحّحه ابن القيم في الفروسية.
وقوله:"كميت" قال الجوهري:"الكميت من الخيل، يستويَ فيه المذكر والمؤنث، ولونه الكُمتة، وهي حمرة يدخلها قنوء - أي سواد غير خالص - قال: والفرق بين الكميت والأشقر بالعرف والذنب، فإن كانا أحمرين فهو أشقر فإن كانا أسودين فهو كميت". الصحاح (1/ 263).
وقوله:"أغر" الذي في وجهه بياض.
وقوله:"محجل" قال في النهاية هو: الذي يرتفع البياض في قوائمه إلى موضع القيد ويجاوز الأرساغ ولا يجاوز الركبتين؛ لأنهما مواضع الأحجال، وهي الخلاخيل والقيود ولا يكون التحجيل باليد واليدين ما لم يكن معها رجل أو رجلان".
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার কপালে কিয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ ও সফলতা বাঁধা আছে। আর এর মালিকরা (আল্লাহর পক্ষ থেকে) সাহায্যপ্রাপ্ত হয়। সুতরাং তোমরা তাদের কপালে হাত বুলাও, তাদের জন্য বরকতের দু‘আ করো, আর তাদেরকে (সাজসজ্জা দ্বারা) সজ্জিত করো, কিন্তু তাদেরকে ধনুকের রশি দ্বারা সজ্জিত করো না।"
7801 - عن سلمة بن نفيل الكندي قال: كنت جالسًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رجل: يا رسول الله، أذال الناس الخيل، ووضعوا السلاح، وقالوا: لا جهاد، قد وضعت الحرب أوزارها، فأقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم بوجهه، وقال:"كذبوا الآن، الآن جاء القتال، ولا يزال من أمتي أمة يقاتلون على الحق، ويزيغ الله لهم قلوب أقوام، ويرزقهم منهم حتَّى تقوم الساعة، وحتى يأتي وعد الله، والخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة، وهو يوحي إلي أني مقبوض غير ملبث، وأنتم تتبعوني أفنادا، يضرب بعضكم رقاب بعض، وعقر دار المؤمنين الشام".
صحيح: رواه النسائيّ (3561)، وأحمد (16965) من طريقين عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن جبير بن نفير، عن سلمة بن نفيل فذكره. واللّفظ للنسائي. وإسناده صحيح.
সালামা ইবনু নুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম। তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! লোকেরা ঘোড়া ছেড়ে দিয়েছে, অস্ত্র রেখে দিয়েছে, আর তারা বলছে যে, কোনো জিহাদ নেই, যুদ্ধ তার বোঝা নামিয়ে দিয়েছে (অর্থাৎ যুদ্ধ শেষ হয়ে গেছে)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চেহারা মুবারাক ঘুরিয়ে বললেন: “তারা মিথ্যা বলেছে। এখনই, এখনই যুদ্ধ এসেছে। আমার উম্মতের মধ্যে একটি দল সর্বদা সত্যের ওপর যুদ্ধ করতে থাকবে। আল্লাহ কিছু লোকের অন্তরকে তাদের জন্য বাঁকা করে দেবেন (অর্থাৎ তাদের বিরুদ্ধাচরণ করাবেন), এবং আল্লাহ তাদের (যোদ্ধাদের) তাদের (শত্রুদের) মাধ্যমে জীবিকা দান করবেন—কেয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত এবং আল্লাহর প্রতিশ্রুত সময় আসা পর্যন্ত। আর ঘোড়ার কপালে কেয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ বাঁধা আছে। এবং আমার নিকট ওহী করা হয়েছে যে, আমি অল্প সময়ের মধ্যেই কবজ (মৃত্যুবরণ) হয়ে যাবো, আর তোমরা আমার পরে দলে দলে বিভক্ত হয়ে যাবে; তোমরা একে অপরের ঘাড় কাটবে (হত্যা করবে)। আর মুমিনদের স্থায়ী নিবাস (প্রধান কেন্দ্র) হলো শাম (সিরিয়া)।”
7802 - عن أبي عامر الهوزنيّ، عن أبي كبشة الأنماري أنه أتاه فقال: أطرقني من فرسك، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أطرق فعقب له الفرس كان له كأجر سبعين فرسا حمل عليه في سبيل الله، وإن لم تعقب كان له كأجر فرس حُمل عليه في
سبيل الله".
صحيح: رواه أحمد (18032)، وصحّحه ابن حبَّان (4679) كلاهما من طريق محمد بن حرب، حَدَّثَنَا الزبيديّ، عن راشد بن سعد، عن أبي عامر الهوزني عن أبي كبشة الأنماري فذكره. واللّفظ لابن حبَّان وليس عند أحمد:"وإن لم تُعقب …". وإسناده صحيح، والزبيدي هو محمد بن الوليد، ومحمد بن حرب هو الأبرش الخولاني.
وفي الباب عن أنس قال:"لم يكن شيء أحب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد النساء من الخيل". رواه النسائيّ (3564)، والطَّبرانيّ في الأوسط (1729) من طريق أحمد بن حفص، حَدَّثَنِي أبيّ، حَدَّثَنِي إبراهيم بن طهمان، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس. فذكره.
وقال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن سعيد إِلَّا إبراهيم.
وسعيد بن أبي عروبة اختلط، ولم يتميز أن إبراهيم روى عنه قبل الاختلاط أو بعده.
وقد اختلف فيه على قتادة. قال الدَّارقطنيّ في العلل (14/ 54):"يرويه أبو هلال الراسبي عن قتادة، عن معقل. ومن قال فيه: عن الحسن، عن معقل فقد وهِمَ. وخالفه إبراهيم بن طهمان فرواه عن سعيد بن أبي عروبة عن قتادة، عن أنس. وكلاهما غير محفوظ". اهـ
قلت: وقتادة عن معقل مرسل كما قال أبو زرعة أي أنه لم يسمع منه.
وقد ثبت عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قوله:"حببت إليَّ النساء والطيب، وجعل قرة عيني في الصّلاة". رواه النسائيّ وغيره، ولم يذكر فيه الخيل.
وأمّا ما رُوي عن أبي ذرّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من فرس عربي إِلَّا يؤذن له عند كل سحر بدعوتين، اللهم خولتني من خولتني من بني آدم، وجعلتني له، فاجعلني أحب أهله وماله إليه، أو من أحب أهله وماله إليه". فالصواب أنه موقوف.
رواه النسائيّ (3579)، وأحمد (21497)، والحاكم (2/ 144) من طريق يحيى بن سعيد، عن عبد الحميد بن جعفر، حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن سويد بن قيس، عن معاوية بن خديج، عن أبي ذرّ، فذكره مرفوعًا.
وخالف عبد الحميد بن جعفر الليثُ بن سعد، وعمرو بن الحارث فروياه عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شماسة، عن معاوية بن خديج أنه مرَّ على أبي ذرّ وهو قائم … فذكر نحوه موقوفًا.
أخرج روايتهما أحمد (21442)، وابن عبد الحكم في فتوح مصر (ص 143). ورواية اللّيث وعمرو بن الحارث أشبه بالصواب.
وقد جزم الدَّارقطنيّ في العلل (6/ 266 - 267) بأن الموقوف هو المحفوظ.
وكذلك لا يصبح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إياكم والخيل المنفَّلَة فإنها إن تلق تفر، وإن
تغنم تغلُل".
رواه أحمد (2911) من طريق ابن المبارك - و (8676) من طريق إسحاق بن عيسى، ويحيى بن إسحاق، وابن عبد الحكم في فتوح مصر (ص 187) من طريق عبد الله بن وهب - أربعتهم عن ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن لهيعة بن عقبة، عن أبي داود، عن أبي هريرة فذكره.
وفي إسناده لهيعة بن عقبة روى عنه جمع، ولم يوثقه أحد إِلَّا ابن حبَّان ذكره في ثقاته، وقال الأزدي: حديثه ليس بالقائم، وقال ابن القطان: مجهول الحال.
وأمّا ابن لهيعة فقد روى عنه هذا الحديث جماعة، منهم: ابن المبارك، وابن وهب ورواية العبادلة عنه مقبولة.
وخالف هولاء الجماعةَ زيدُ بن الحباب فرواه عن ابن لهيعة بهذا الإسناد إِلَّا أنه لم يذكر أبا هريرة، روايته عند ابن أبي شيبة في مسنده (547). ورواية الجماعة أشبه بالصواب، لا سيما أن فيهم ابن المبارك وابن وهب.
وروى ابن ماجة (2829) عن أبي بكر بن أبي شيبة به موقوفًا، والظاهر أنه خطأ؛ فإن الحديث مرفوع في مسند ابن أبي شيبة، وكذا رواه مرفوعًا عبد الله بن محمد البغوي عن ابن أبي شيبة، وروايته عند ابن قانع في مُعْجَمُ الصّحابة (2/ 187).
وقوله:"الخيل المنفلة" أي أصحاب الخيل المنفلة على حذف المضاف، ويدل على ذلك لفظ ابن ماجة:"إياكم والسرية".
و"المنفلة" كأنه من النفل: الغنيمة أي الذين قصدهم من الغزو الغنيمة والمال دون غيره" قاله ابن الأثير في النهاية (5/ 100).
আবূ কাবশাহ আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর কাছে এসে বললেন: "আমাকে আপনার ঘোড়াটি ধার দিন (অর্থাৎ চড়ে যাওয়ার সুযোগ দিন)। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'যে ব্যক্তি (কাউকে) ঘোড়া ধার দেয় এবং ঘোড়াটি তার জন্য বাচ্চা প্রসব করে, তবে সে আল্লাহর পথে ব্যবহৃত সত্তরটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সওয়াব পাবে। আর যদি সে বাচ্চা প্রসব না-ও করে, তবুও সে আল্লাহর পথে ব্যবহৃত একটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সওয়াব পাবে।'"
7803 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: يُمنُ الخيل في الشقر".
حسن: رواه أبو داود (2545)، والتِّرمذيّ (1695)، وأحمد (2454) من طرق عن شيبان بن عبد الرحمن، حَدَّثَنَا عيسى بن عليّ بن عبد الله بن عباس، عن أبيه، عن ابن عباس .. فذكره.
وهو كما قال، فإن عيسى بن عليّ بن عبد الله بن عباس أبو العباس يقال: أبو موسى المدني ثمّ البغدادي.
قال ابن معين: لم يكن به بأس، كان له مذهب جميل، كان معتزلا للسلطان وروى هذا الحديث وهو غريب. يعني به الحديث المذكور.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه من حديث شيبان".
وكذا ذكر ابن أبي حاتم عن أبيه تصحيح هذا الحديث. انظر: علل الحديث (978).
"واليُمن": البركة.
"والشقر": بضم فسكون جمع أشقر جاء تفسيره في باب فضل الخيل.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ঘোড়ার শুভ লক্ষণ (বরকত) তার লালচে (সোনালী) রঙের মধ্যে রয়েছে।
7804 - عن أبي قتادة الأنصاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خير الخيل الأدهم الأقرح المحجل الأرثم، طلق اليد اليُمنى، فإن لم يكن أدهم فكُميت على هذه الشية".
حسن: رواه ابن ماجة (2789) - واللّفظ له - والتِّرمذيّ (1697)، والحاكم (2/ 92) من طريقين عن وهب بن جرير، حَدَّثَنَا أبي قال: سمعت يحيى بن أيوب يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عُلي بن رباح، عن أبي قتادة الأنصاري. فذكره.
وإسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب الغافقي فإنه حسن الحديث وقد توبع.
تابعه ابن لهيعة: رواه أحمد (22561) عن حسن بن موسى ويحيى بن إسحاق - والترمذى (1696) من طريق عبد الله بن المبارك - كلّهم عن ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب به.
وعبد الله بن المبارك ممن سمع ابن لهيعة قبل اختلاطه.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح غريب".
وقال الحاكم:"هذا حديث غريب صحيح، وقد احتجا الشيخان بجميع رواته ولم يخرجاه".
قلت: في إسناده عليّ بن رباح لم يخرج له البخاريّ في صحيحه، وإنما أخرج له في الأدب المفرد، وخلق أفعال العباد وهو ثقة.
قوله:"الأدهم" أي الأسود.
قوله:"الأقرح" هو ما كان في جبهته قُرحة - بالضم - وهو بياض يشير دون الغرة.
قوله:"الأرثم" براء ومثلة: هو الذي أنفه أبيض وكذلك شفته العليا.
قوله:"مطلق اليمين" أي ليس فيها تحجيل.
قوله:"على هذه الشيّة" بكسر الشين: هو اللون المخالف لغالب اللون.
وفيه ألفاظ أخرى غريبة انظر شرحها في باب ما جاء في فضل الخيل.
وأمّا ما رُوي عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أردت أن تغزو فاشترِ فرسا أدهم أغر محجلا، مطلق يد اليُمنى، فإنك تغنم وتسلم" فهو ضعيف.
رواه الطبرانيّ في الكبير (17/ 293 - 294)، والحاكم (2/ 92) وعنه البيهقيّ (6/ 330) من طريق عبيد بن الصباح، عن موسى بن عليّ بن رباح، عن أبيه، عن عقبة بن عامر، فذكره.
قال البيهقيّ: كذا قال: عقبة بن عامر.
قلت: كأنه يشير إلى أن جعل الحديثِ من مسند عقبة بن عامر خطأ والله أعلم.
وأمّا الحاكم فقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه".
قلت: عبيد بن الصباح ليس من رجال الكتب الستة وهو ضعيف الحديث كما قال أبو حاتم.
وهو مترجم في لسان الميزان (4/ 119). وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (5/ 262)، والذّهبيّ في المهذب (5/ 2501).
আবূ ক্বাতাদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার মধ্যে সর্বোত্তম হলো কালো (الأدهم), যার কপালে ছোট সাদা দাগ আছে (الأقرح), যার পায়ে সাদা চিহ্ন আছে (المحجل), যার নাক ও উপরের ঠোঁট সাদা (الأرثم) এবং যার ডান সামনের পা সাদা চিহ্নমুক্ত (طلق اليد اليُمنى)। যদি সে কালো না হয়, তবে এই বৈশিষ্ট্যগুলো বিদ্যমান থাকলে কুমাঈত (লালচে-কালো মিশ্রিত) রঙের ঘোড়াও উত্তম।"
7805 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يكره الشِّكال من الخيل.
وزاد في رواية: والشكال أن يكون الفرس في رجله اليُمنى بياض وفي يده اليُسرى، أو في يده اليُمنى ورجله اليُسرى.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1875: 101) من طرق عن سفيان (هو الثوري)، عن سلْم بن عبد الرحمن، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره.
والزيادة في رواية عبد الرزّاق عن سفيان، به.
والظاهر أن هذا التفسير من الصحابي أو ممن هو دونه، وفي تفسير الشكال أقوال أخرى ذكرها النوويّ في شرح مسلم (13/ 18) قال: وقال العلماء: إنّما كرهه لأنه على صورة المشكول. وقيل: يحتمل أن يكون قد جرب ذلك الجنس فلم يكن فيه نجابة. اهـ
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঘোড়ার মধ্যে ‘শিকাল’ অপছন্দ করতেন।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করা হয়েছে: আর ‘শিকাল’ হলো যখন ঘোড়ার ডান পেছনের পায়ে সাদা রঙ থাকে এবং তার বাম সামনের পায়েও (সাদা রঙ থাকে), অথবা তার ডান সামনের পায়ে এবং বাম পেছনের পায়েও (সাদা রঙ থাকে)।
7806 - عن عتبة بن عبد السلمي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقصوا نواصي الخيل، فإن فيها البركة، ولا تجزوا أعرافها؛ فإنها أدفاؤُها، ولا تقصوا أذنابها، فإنها مذابها".
حسن: رواه أحمد (17643) عن عليّ بن بحر، حَدَّثَنَا بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي نصر بن علقمة، حَدَّثَنِي رجال من بني سليم، عن عتبة بن عبد السلمي. فدكره.
وهذا إسناد حسن من أجل نصر بن علقمة - وهو الحضرمي الحمصي - فإنه حسن الحديث، فقد روى عنه جمع، ووثَّقه دحيم، وذكره ابن حبَّان في الثّقات. ورجال من بني سليم مبهومون إِلَّا أنهم يحتملون لكونهم جماعة. وبقية بن الوليد صرَّح بالتحديث.
ورواه ثور بن يزيد، عن نصر، عن رجل من بني سليم، عن عتبة بن عيد السلميّ، واختلف على ثور اختلافا كثيرًا. روايته عند أبي داود (4252)، وأحمد (17638، 17640) وغيرهما.
لكن لا يُعلُّ هذا الطريق الأوّل لاختلاف مخرجهما. والله أعلم.
وقوله:"أعرافها" جمع العرُف وهو شعر عنق الفرس.
وقوله:"أدفاؤها" جمع دفء الذي يدفئك أي يدفع البرد عنك.
وقوله:"مذابُّها" جمع مذبّة وهي ما يذبّ به الذباب.
উতবাহ ইবনে আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ঘোড়ার কপালের চুল (নাসিয়া) কর্তন করো না, কারণ তাতে বরকত রয়েছে। আর তোমরা তাদের ঘাড়ের কেশর (আ’রাফ) ছেঁটে ফেলো না, কারণ তা তাদের উষ্ণতা (বা আবরণ)। আর তোমরা তাদের লেজও কেটে ফেলো না, কারণ তা তাদের মশা-মাছি তাড়ানোর উপকরণ।"
7807 - عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يسمي الأنثى من الخيل فرسا.
صحيح: رواه أبو داود (2546)، وصحّحه ابن حبَّان (4680)، والحاكم (2/ 144) من طرق عن مروان بن معاوية، عن أبي حيان التيميّ، حَدَّثَنَا أبو زرعة، عن أبي هريرة. فذكره.
وهذا إسناده صحيح، وأبو حيان هو يحيى بن سعيد بن حيان التيمي.
وقال الحاكم: حديث صحيح على شرط الشّيخين.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘোড়ার স্ত্রী-লিঙ্গকে ‘ফারাস’ (ঘোড়া) নামে অভিহিত করতেন।