আল-জামি` আল-কামিল
7801 - عن سلمة بن نفيل الكندي قال: كنت جالسًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رجل: يا رسول الله، أذال الناس الخيل، ووضعوا السلاح، وقالوا: لا جهاد، قد وضعت الحرب أوزارها، فأقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم بوجهه، وقال:"كذبوا الآن، الآن جاء القتال، ولا يزال من أمتي أمة يقاتلون على الحق، ويزيغ الله لهم قلوب أقوام، ويرزقهم منهم حتَّى تقوم الساعة، وحتى يأتي وعد الله، والخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة، وهو يوحي إلي أني مقبوض غير ملبث، وأنتم تتبعوني أفنادا، يضرب بعضكم رقاب بعض، وعقر دار المؤمنين الشام".
صحيح: رواه النسائيّ (3561)، وأحمد (16965) من طريقين عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن جبير بن نفير، عن سلمة بن نفيل فذكره. واللّفظ للنسائي. وإسناده صحيح.
সালামা ইবনু নুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম। তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! লোকেরা ঘোড়া ছেড়ে দিয়েছে, অস্ত্র রেখে দিয়েছে, আর তারা বলছে যে, কোনো জিহাদ নেই, যুদ্ধ তার বোঝা নামিয়ে দিয়েছে (অর্থাৎ যুদ্ধ শেষ হয়ে গেছে)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চেহারা মুবারাক ঘুরিয়ে বললেন: “তারা মিথ্যা বলেছে। এখনই, এখনই যুদ্ধ এসেছে। আমার উম্মতের মধ্যে একটি দল সর্বদা সত্যের ওপর যুদ্ধ করতে থাকবে। আল্লাহ কিছু লোকের অন্তরকে তাদের জন্য বাঁকা করে দেবেন (অর্থাৎ তাদের বিরুদ্ধাচরণ করাবেন), এবং আল্লাহ তাদের (যোদ্ধাদের) তাদের (শত্রুদের) মাধ্যমে জীবিকা দান করবেন—কেয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত এবং আল্লাহর প্রতিশ্রুত সময় আসা পর্যন্ত। আর ঘোড়ার কপালে কেয়ামত পর্যন্ত কল্যাণ বাঁধা আছে। এবং আমার নিকট ওহী করা হয়েছে যে, আমি অল্প সময়ের মধ্যেই কবজ (মৃত্যুবরণ) হয়ে যাবো, আর তোমরা আমার পরে দলে দলে বিভক্ত হয়ে যাবে; তোমরা একে অপরের ঘাড় কাটবে (হত্যা করবে)। আর মুমিনদের স্থায়ী নিবাস (প্রধান কেন্দ্র) হলো শাম (সিরিয়া)।”
7802 - عن أبي عامر الهوزنيّ، عن أبي كبشة الأنماري أنه أتاه فقال: أطرقني من فرسك، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أطرق فعقب له الفرس كان له كأجر سبعين فرسا حمل عليه في سبيل الله، وإن لم تعقب كان له كأجر فرس حُمل عليه في
سبيل الله".
صحيح: رواه أحمد (18032)، وصحّحه ابن حبَّان (4679) كلاهما من طريق محمد بن حرب، حَدَّثَنَا الزبيديّ، عن راشد بن سعد، عن أبي عامر الهوزني عن أبي كبشة الأنماري فذكره. واللّفظ لابن حبَّان وليس عند أحمد:"وإن لم تُعقب …". وإسناده صحيح، والزبيدي هو محمد بن الوليد، ومحمد بن حرب هو الأبرش الخولاني.
وفي الباب عن أنس قال:"لم يكن شيء أحب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد النساء من الخيل". رواه النسائيّ (3564)، والطَّبرانيّ في الأوسط (1729) من طريق أحمد بن حفص، حَدَّثَنِي أبيّ، حَدَّثَنِي إبراهيم بن طهمان، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس. فذكره.
وقال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن سعيد إِلَّا إبراهيم.
وسعيد بن أبي عروبة اختلط، ولم يتميز أن إبراهيم روى عنه قبل الاختلاط أو بعده.
وقد اختلف فيه على قتادة. قال الدَّارقطنيّ في العلل (14/ 54):"يرويه أبو هلال الراسبي عن قتادة، عن معقل. ومن قال فيه: عن الحسن، عن معقل فقد وهِمَ. وخالفه إبراهيم بن طهمان فرواه عن سعيد بن أبي عروبة عن قتادة، عن أنس. وكلاهما غير محفوظ". اهـ
قلت: وقتادة عن معقل مرسل كما قال أبو زرعة أي أنه لم يسمع منه.
وقد ثبت عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قوله:"حببت إليَّ النساء والطيب، وجعل قرة عيني في الصّلاة". رواه النسائيّ وغيره، ولم يذكر فيه الخيل.
وأمّا ما رُوي عن أبي ذرّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من فرس عربي إِلَّا يؤذن له عند كل سحر بدعوتين، اللهم خولتني من خولتني من بني آدم، وجعلتني له، فاجعلني أحب أهله وماله إليه، أو من أحب أهله وماله إليه". فالصواب أنه موقوف.
رواه النسائيّ (3579)، وأحمد (21497)، والحاكم (2/ 144) من طريق يحيى بن سعيد، عن عبد الحميد بن جعفر، حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن سويد بن قيس، عن معاوية بن خديج، عن أبي ذرّ، فذكره مرفوعًا.
وخالف عبد الحميد بن جعفر الليثُ بن سعد، وعمرو بن الحارث فروياه عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شماسة، عن معاوية بن خديج أنه مرَّ على أبي ذرّ وهو قائم … فذكر نحوه موقوفًا.
أخرج روايتهما أحمد (21442)، وابن عبد الحكم في فتوح مصر (ص 143). ورواية اللّيث وعمرو بن الحارث أشبه بالصواب.
وقد جزم الدَّارقطنيّ في العلل (6/ 266 - 267) بأن الموقوف هو المحفوظ.
وكذلك لا يصبح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إياكم والخيل المنفَّلَة فإنها إن تلق تفر، وإن
تغنم تغلُل".
رواه أحمد (2911) من طريق ابن المبارك - و (8676) من طريق إسحاق بن عيسى، ويحيى بن إسحاق، وابن عبد الحكم في فتوح مصر (ص 187) من طريق عبد الله بن وهب - أربعتهم عن ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن لهيعة بن عقبة، عن أبي داود، عن أبي هريرة فذكره.
وفي إسناده لهيعة بن عقبة روى عنه جمع، ولم يوثقه أحد إِلَّا ابن حبَّان ذكره في ثقاته، وقال الأزدي: حديثه ليس بالقائم، وقال ابن القطان: مجهول الحال.
وأمّا ابن لهيعة فقد روى عنه هذا الحديث جماعة، منهم: ابن المبارك، وابن وهب ورواية العبادلة عنه مقبولة.
وخالف هولاء الجماعةَ زيدُ بن الحباب فرواه عن ابن لهيعة بهذا الإسناد إِلَّا أنه لم يذكر أبا هريرة، روايته عند ابن أبي شيبة في مسنده (547). ورواية الجماعة أشبه بالصواب، لا سيما أن فيهم ابن المبارك وابن وهب.
وروى ابن ماجة (2829) عن أبي بكر بن أبي شيبة به موقوفًا، والظاهر أنه خطأ؛ فإن الحديث مرفوع في مسند ابن أبي شيبة، وكذا رواه مرفوعًا عبد الله بن محمد البغوي عن ابن أبي شيبة، وروايته عند ابن قانع في مُعْجَمُ الصّحابة (2/ 187).
وقوله:"الخيل المنفلة" أي أصحاب الخيل المنفلة على حذف المضاف، ويدل على ذلك لفظ ابن ماجة:"إياكم والسرية".
و"المنفلة" كأنه من النفل: الغنيمة أي الذين قصدهم من الغزو الغنيمة والمال دون غيره" قاله ابن الأثير في النهاية (5/ 100).
আবূ কাবশাহ আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর কাছে এসে বললেন: "আমাকে আপনার ঘোড়াটি ধার দিন (অর্থাৎ চড়ে যাওয়ার সুযোগ দিন)। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'যে ব্যক্তি (কাউকে) ঘোড়া ধার দেয় এবং ঘোড়াটি তার জন্য বাচ্চা প্রসব করে, তবে সে আল্লাহর পথে ব্যবহৃত সত্তরটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সওয়াব পাবে। আর যদি সে বাচ্চা প্রসব না-ও করে, তবুও সে আল্লাহর পথে ব্যবহৃত একটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সওয়াব পাবে।'"
7803 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: يُمنُ الخيل في الشقر".
حسن: رواه أبو داود (2545)، والتِّرمذيّ (1695)، وأحمد (2454) من طرق عن شيبان بن عبد الرحمن، حَدَّثَنَا عيسى بن عليّ بن عبد الله بن عباس، عن أبيه، عن ابن عباس .. فذكره.
وهو كما قال، فإن عيسى بن عليّ بن عبد الله بن عباس أبو العباس يقال: أبو موسى المدني ثمّ البغدادي.
قال ابن معين: لم يكن به بأس، كان له مذهب جميل، كان معتزلا للسلطان وروى هذا الحديث وهو غريب. يعني به الحديث المذكور.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه من حديث شيبان".
وكذا ذكر ابن أبي حاتم عن أبيه تصحيح هذا الحديث. انظر: علل الحديث (978).
"واليُمن": البركة.
"والشقر": بضم فسكون جمع أشقر جاء تفسيره في باب فضل الخيل.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ঘোড়ার শুভ লক্ষণ (বরকত) তার লালচে (সোনালী) রঙের মধ্যে রয়েছে।
7804 - عن أبي قتادة الأنصاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خير الخيل الأدهم الأقرح المحجل الأرثم، طلق اليد اليُمنى، فإن لم يكن أدهم فكُميت على هذه الشية".
حسن: رواه ابن ماجة (2789) - واللّفظ له - والتِّرمذيّ (1697)، والحاكم (2/ 92) من طريقين عن وهب بن جرير، حَدَّثَنَا أبي قال: سمعت يحيى بن أيوب يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عُلي بن رباح، عن أبي قتادة الأنصاري. فذكره.
وإسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب الغافقي فإنه حسن الحديث وقد توبع.
تابعه ابن لهيعة: رواه أحمد (22561) عن حسن بن موسى ويحيى بن إسحاق - والترمذى (1696) من طريق عبد الله بن المبارك - كلّهم عن ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب به.
وعبد الله بن المبارك ممن سمع ابن لهيعة قبل اختلاطه.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح غريب".
وقال الحاكم:"هذا حديث غريب صحيح، وقد احتجا الشيخان بجميع رواته ولم يخرجاه".
قلت: في إسناده عليّ بن رباح لم يخرج له البخاريّ في صحيحه، وإنما أخرج له في الأدب المفرد، وخلق أفعال العباد وهو ثقة.
قوله:"الأدهم" أي الأسود.
قوله:"الأقرح" هو ما كان في جبهته قُرحة - بالضم - وهو بياض يشير دون الغرة.
قوله:"الأرثم" براء ومثلة: هو الذي أنفه أبيض وكذلك شفته العليا.
قوله:"مطلق اليمين" أي ليس فيها تحجيل.
قوله:"على هذه الشيّة" بكسر الشين: هو اللون المخالف لغالب اللون.
وفيه ألفاظ أخرى غريبة انظر شرحها في باب ما جاء في فضل الخيل.
وأمّا ما رُوي عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أردت أن تغزو فاشترِ فرسا أدهم أغر محجلا، مطلق يد اليُمنى، فإنك تغنم وتسلم" فهو ضعيف.
رواه الطبرانيّ في الكبير (17/ 293 - 294)، والحاكم (2/ 92) وعنه البيهقيّ (6/ 330) من طريق عبيد بن الصباح، عن موسى بن عليّ بن رباح، عن أبيه، عن عقبة بن عامر، فذكره.
قال البيهقيّ: كذا قال: عقبة بن عامر.
قلت: كأنه يشير إلى أن جعل الحديثِ من مسند عقبة بن عامر خطأ والله أعلم.
وأمّا الحاكم فقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه".
قلت: عبيد بن الصباح ليس من رجال الكتب الستة وهو ضعيف الحديث كما قال أبو حاتم.
وهو مترجم في لسان الميزان (4/ 119). وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (5/ 262)، والذّهبيّ في المهذب (5/ 2501).
আবূ ক্বাতাদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘোড়ার মধ্যে সর্বোত্তম হলো কালো (الأدهم), যার কপালে ছোট সাদা দাগ আছে (الأقرح), যার পায়ে সাদা চিহ্ন আছে (المحجل), যার নাক ও উপরের ঠোঁট সাদা (الأرثم) এবং যার ডান সামনের পা সাদা চিহ্নমুক্ত (طلق اليد اليُمنى)। যদি সে কালো না হয়, তবে এই বৈশিষ্ট্যগুলো বিদ্যমান থাকলে কুমাঈত (লালচে-কালো মিশ্রিত) রঙের ঘোড়াও উত্তম।"
7805 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يكره الشِّكال من الخيل.
وزاد في رواية: والشكال أن يكون الفرس في رجله اليُمنى بياض وفي يده اليُسرى، أو في يده اليُمنى ورجله اليُسرى.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1875: 101) من طرق عن سفيان (هو الثوري)، عن سلْم بن عبد الرحمن، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره.
والزيادة في رواية عبد الرزّاق عن سفيان، به.
والظاهر أن هذا التفسير من الصحابي أو ممن هو دونه، وفي تفسير الشكال أقوال أخرى ذكرها النوويّ في شرح مسلم (13/ 18) قال: وقال العلماء: إنّما كرهه لأنه على صورة المشكول. وقيل: يحتمل أن يكون قد جرب ذلك الجنس فلم يكن فيه نجابة. اهـ
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঘোড়ার মধ্যে ‘শিকাল’ অপছন্দ করতেন।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করা হয়েছে: আর ‘শিকাল’ হলো যখন ঘোড়ার ডান পেছনের পায়ে সাদা রঙ থাকে এবং তার বাম সামনের পায়েও (সাদা রঙ থাকে), অথবা তার ডান সামনের পায়ে এবং বাম পেছনের পায়েও (সাদা রঙ থাকে)।
7806 - عن عتبة بن عبد السلمي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقصوا نواصي الخيل، فإن فيها البركة، ولا تجزوا أعرافها؛ فإنها أدفاؤُها، ولا تقصوا أذنابها، فإنها مذابها".
حسن: رواه أحمد (17643) عن عليّ بن بحر، حَدَّثَنَا بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي نصر بن علقمة، حَدَّثَنِي رجال من بني سليم، عن عتبة بن عبد السلمي. فدكره.
وهذا إسناد حسن من أجل نصر بن علقمة - وهو الحضرمي الحمصي - فإنه حسن الحديث، فقد روى عنه جمع، ووثَّقه دحيم، وذكره ابن حبَّان في الثّقات. ورجال من بني سليم مبهومون إِلَّا أنهم يحتملون لكونهم جماعة. وبقية بن الوليد صرَّح بالتحديث.
ورواه ثور بن يزيد، عن نصر، عن رجل من بني سليم، عن عتبة بن عيد السلميّ، واختلف على ثور اختلافا كثيرًا. روايته عند أبي داود (4252)، وأحمد (17638، 17640) وغيرهما.
لكن لا يُعلُّ هذا الطريق الأوّل لاختلاف مخرجهما. والله أعلم.
وقوله:"أعرافها" جمع العرُف وهو شعر عنق الفرس.
وقوله:"أدفاؤها" جمع دفء الذي يدفئك أي يدفع البرد عنك.
وقوله:"مذابُّها" جمع مذبّة وهي ما يذبّ به الذباب.
উতবাহ ইবনে আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ঘোড়ার কপালের চুল (নাসিয়া) কর্তন করো না, কারণ তাতে বরকত রয়েছে। আর তোমরা তাদের ঘাড়ের কেশর (আ’রাফ) ছেঁটে ফেলো না, কারণ তা তাদের উষ্ণতা (বা আবরণ)। আর তোমরা তাদের লেজও কেটে ফেলো না, কারণ তা তাদের মশা-মাছি তাড়ানোর উপকরণ।"
7807 - عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يسمي الأنثى من الخيل فرسا.
صحيح: رواه أبو داود (2546)، وصحّحه ابن حبَّان (4680)، والحاكم (2/ 144) من طرق عن مروان بن معاوية، عن أبي حيان التيميّ، حَدَّثَنَا أبو زرعة، عن أبي هريرة. فذكره.
وهذا إسناده صحيح، وأبو حيان هو يحيى بن سعيد بن حيان التيمي.
وقال الحاكم: حديث صحيح على شرط الشّيخين.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘোড়ার স্ত্রী-লিঙ্গকে ‘ফারাস’ (ঘোড়া) নামে অভিহিত করতেন।
7808 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سابق بين الخيل التي قد أضمرت من الحفياء، وكان أمدها ثنية الوداع، وسابق بين الخيل التي لم تضمر من الثنية إلى مسجد بني زريق وأن عبد الله بن عمر كان ممن سابق بها.
وزاد في رواية: قال عبد الله يعني ابن عمر: فجئتُ سابقًا، فطفّف بي الفرس المسجد.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (45) عن نافع، عن عبد الله، فذكره.
ورواه البخاريّ في الصّلاة (420)، ومسلم في الإمارة (1870: 95) كلاهما من طريق مالك به مثله.
والزيادة لمسلم من وجه آخر عن نافع.
ورواه البخاريّ في الجهاد والسير (2868) من طريق سفيان، عن عبيد الله، عن نافع به. وزاد: قال سفيان: بين الحفياء إلى ثنية الوداع خمسةُ أميال أو ستة، وبين ثنية الوداع إلى مسجد بني زريق ميل.
والميل يقدر بأربعة آلف ذراع أي بما يساوي 1.600 كم.
قال ابن عبد البر:"فطفف بي الفرس المسجد" أي جاوز بي المسجد الذي كان هو الغاية، هو أصل التطفيف مجاوزة الحد. نقله ابن حجر في الفتح (6/ 72).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল-হাফিয়া নামক স্থান থেকে সেই ঘোড়াগুলোর মধ্যে দৌড়ের প্রতিযোগিতা করিয়েছিলেন, যেগুলোকে দৌড়ের জন্য প্রস্তুত (অদম্য) করা হয়েছিল। আর তার চূড়ান্ত সীমা ছিল সানিয়্যাতুল ওয়াদা নামক স্থান। এবং তিনি সেই ঘোড়াগুলোর মধ্যেও দৌড়ের প্রতিযোগিতা করিয়েছিলেন যেগুলোকে প্রস্তুত (অদম্য) করা হয়নি, সানিয়্যা থেকে বনী যুরাইকের মসজিদ পর্যন্ত। আর আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের মধ্যে ছিলেন যারা সেই দৌড়ে অংশগ্রহণ করেছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে, আব্দুল্লাহ অর্থাৎ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি দৌড়ে প্রথম এসেছিলাম, তখন ঘোড়াটি আমাকে নিয়ে মসজিদ অতিক্রম করে চলে গিয়েছিল।
7809 - عن أبي لبيد قال: أرسلت الخيل زمن الحجاج، والحكم بن أيوب أمير على البصرة، قال: فأتينا الرهان، فلمّا جاءت الخيل، قلنا: لو ملنا إلى أنس بن مالك فسألناه: أكنتم تراهنون على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فأتيناه وهو في قصره في الزاوية، فسألناه، فقلنا: يا أبا حمزة، أكنتم تراهنون على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يراهن؟ قال: نعم، والله لقد راهن رسول الله صلى الله عليه وسلم على فرس له يقال له: سبحة، فسبق الناس، فانتشى لذلك، وأعجبه".
حسن: رواه أحمد (13689، 12627)، والدارمي (2474)، والدارقطني (4/ 301)،
والبيهقي (10/ 12) من طرق عن سعيد بن زيد قال: حَدَّثَنِي الزُّبير بن الخريت، عن أبي لبيد لمازة بن زبّار قال فذكره. واللّفظ لأحمد.
وإسناده حسن من أجل سعيد بن زيد وأبي لبيد فإنهما حسنا الحديث.
وقال ابن القيم:"وهو حديث جيد الإسناد". الفروسية (ص 166).
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ লুবাইদ বলেন, হাজ্জাজের শাসনামলে ঘোড়দৌড়ের প্রতিযোগিতা অনুষ্ঠিত হয়েছিল, যখন হাকাম ইবনু আইয়ুব বসরা'র আমির ছিলেন। তিনি (আবূ লুবাইদ) বলেন, আমরা ঘোড়দৌড়ের মাঠে আসলাম। যখন ঘোড়াগুলো আসল, তখন আমরা বললাম: যদি আমরা আনাস ইবনু মালিকের কাছে যাই এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করি: তোমরা কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে প্রতিযোগিতার পণ (বাজি) করতে? অতঃপর আমরা তাঁর কাছে আসলাম। তিনি তখন তাঁর প্রাসাদের এক কোণে অবস্থান করছিলেন। আমরা তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম, হে আবূ হামযা! আপনারা কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে প্রতিযোগিতার পণ করতেন? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি পণ করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর একটি ঘোড়ার উপর পণ করেছিলেন, যার নাম ছিল সাবহা। এটি অন্যদের থেকে এগিয়ে গিয়েছিল। এতে তিনি আনন্দিত হয়েছিলেন এবং এটি তাঁকে মুগ্ধ করেছিল।
7810 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال."لا سبق إِلَّا في نصل أو خف أو حافر".
صحيح: رواه أبو داود (2574)، والتِّرمذيّ (1700)، والنسائي (3585، 3586)، وأحمد (10138)، وصحّحه ابن حبَّان (4690)، والبيهقي (10/ 16) من طرق عن ابن أبي ذئب، عن نافع بن أبي نافع، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده صحيح. وصحّحه أيضًا ابن القطان في بيان الوهم (5/ 383، 384)، وابن دقيق العيد فيما نقل عنه ابن حجر في التلخيص (4/ 161).
وجاء في الطبعة المكملة لتحقيق الشّيخ أحمد شاكر قول الترمذيّ: حديث حسن. وكذا نقل عنه الإشبيلي في الأحكام الوسطى (3/ 9)، وابن الملقن في البدر المنير (9/ 418) ولكن لم يذكر قول الترمذيّ هذا المزي في التحفة، وجزم العراقي في تكملة شرح الترمذيّ بأن الترمذيّ سكت عليه. والله أعلم.
وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
وذكر الدَّارقطنيّ بعضها في العلل (11/ 230) وأعلها بالوقف.
وقوله:"السبق" بفتح الباء وهو المال المشروط للسابق على سبقه، والسبق بسكون الباء مصدر سبقته سبقا.
قال الخطّابي: والرّواية الصحيحة في هذا الحديث السَّبَق مفتوح الباء.
وقوله:"خُفّ" أراد به ذو الخف وهو الابل وألحق به الفيل.
وقوله:"حافر" أراد به الفرس، وألحق به البغال والحمير، لأنها كلها ذوات حوافر، وهي كانت تستعمل في حمل عدة الحرب ونقلها.
وقوله:"النصل" المراد به ذو النصل وهو سهم صغير.
قال البغوي في شرح السنة (10/ 394):"وفيه إباحة المال على المناضلة لمن نضل، وعلى المسابقة على الخيل، والإبل لمن سبق، وإليه ذهب جماعة من أهل العلم أباحوا أخذ المال على المناضلة، والمسابقة، لأنها عدة لقتال العدو، وفي بدل الجعل عليها ترغيب في الجهاد". وانظر للمزيد: المنة الكبرى (8/ 414 - 415).
وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من أدخل فرسا بين فرسين - وهو لا يَأمن أن يسبق - فليس بقمار، ومن أدخل فرسا بين فرسين وهو يأمن أن يسبق فهو قمار" فلا يصح.
رواه أبو داود (2589)، وابن ماجة (2876)، وأحمد (10557)، والدارقطني (4/ 111، 350)، والحاكم (2/ 114)، والبيهقي (10/ 20) من طرق عن سفيان بن حسين، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. فذكره.
ورواه أبو داود (2580)، والحاكم (2/ 114)، والبيهقي (10/ 20) من طريق سعيد بن بشير، عن الزّهريّ، به.
وسفيان بن حسين ضعيف في الزّهريّ، وسعيد بن بشير ضعيف مطلقًا.
وقد رواه الثقة الثبت يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن سعيد بن المسيب من قوله. حديثه عند مالك في الجهاد (46).
ورجّح الأئمة وقفه على سعيد بن المسيب.
قال أبو حاتم الرازي عن رواية سفيان بن حسين:"هذا خطأ، لم يعمل سفيان بن حسين بشيء، لا يشبه أن يكون عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وأحسن أحواله أن يكون عن سعيد بن المسيب قوله. وقد رواه يحيى بن سعيد عن يحيى قوله". علل ابن أبي حاتم (2/ 252).
وقال ابن خيثمة: سألت ابن معين عنه فقال: باطل، وضرب على أبي هريرة. نقله عنه ابن حجر في التلخيص الحبير (4/ 163).
وقال أبو داود عقب حديث أبي هريرة:"رواه معمر وشعيب وعقيل عن الزّهريّ، عن رجال من أهل العلم قالوا:"من أدخل فرسا" وهذا أصح عندنا. اهـ
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পুরস্কার (বা বাজি ধরা) শুধুমাত্র তীর নিক্ষেপ, উট বা ঘোড়ার দৌড়ের প্রতিযোগিতা ব্যতীত অন্য কিছুতে (বৈধ) নয়।”
7811 - عن ابن عمر: أن نبي الله صلى الله عليه وسلم كان يُضمِّر الخيل يُسابق بها.
صحيح: رواه أبو داود (2576) عن مسدد، حَدَّثَنَا المعتمر، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وهذا إسناد صحيح.
وتضمير الخيل هو:"أن يقلل علفها مدة، وتدخل بيتا كنًّا وتُجلل لتعرق، ويجفّ عرقها فيخفّف لحمُها، وتقوى على الجري". قاله النوويّ في شرح مسلم.
والكنّ: ما يرد الحر والبرد من الأبنية والمساكن.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহ্র নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘোড়াকে (দৌড় প্রতিযোগিতার জন্য) তাদমীর (প্রস্তুত) করতেন এবং তা দিয়ে দৌড় প্রতিযোগিতা করতেন।
7812 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سبّق بين الخيل، وفضّل القرح في الغاية.
حسن: رواه أبو داود (2577)، وأحمد (6466)، وصحّحه ابن حبَّان (4688) كلّهم من طريق عقبة بن خالد، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر. فذكره. وإسناده حسن من أجل عقبة بن خالد فإنه حسن الحديث.
وقال ابن الملقن في تحفة المحتاج (2/ 555): رواه أبو داود بإسناد على شرط الصَّحيح. إِلَّا أن الدَّارقطنيّ نص في العلل (12/ 335) على أن عقبة بن خالد زاد فيه لفظا لم يأت به غيره، وهو قوله:"وفضّل القرح في الغاية" وسبق إليه العقيلي في الضعفاء (3/ 355).
قوله:"القرح" بضم القاف وتشديد الراء المفتوحة جمع قارح، وهو من الخيل ما دخل في السنة الخامسة.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘোড়াসমূহের মধ্যে দৌড় প্রতিযোগিতা করিয়েছিলেন, এবং 'আল-কার্হ' (পূর্ণ বয়স্ক) ঘোড়াদেরকে লক্ষ্যস্থল অর্জনের (দূরবর্তী দৌড়ের) ক্ষেত্রে বিশেষ প্রাধান্য দিয়েছিলেন।
7813 - عن أنس قال: كان للنبي صلى الله عليه وسلم ناقة تسمى العضباء لا تسبق. قال حميد: أو لا تكاد تسبق، فجاء أعرابي على قعود فسبقها فشق ذلك على المسلمين حتَّى عرفه فقال:"حق على الله أن لا يرتفع شيء من الدُّنيا إِلَّا وضعه".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2872) عن مالك بن إسماعيل، حَدَّثَنَا زهير، عن حميد، عن أنس قال فذكره.
وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة قال:"كانت القصوى لا تُسبق، فجاء أعرابي على بكر، فسابقه فسبقها، فشق ذلك على المسلمين فقال: يا رسول الله، سُبقت العضباء، وقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: إنه حق على الله أن لا يرفع شيئًا من الأرض إِلَّا وضعه".
رواه الدَّارقطنيّ (4/ 302) عن طريق معن، نا مالك، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
وقد رواه غير واحد عن مالك، عن الزّهريّ، عن سعيد مرسلًا.
وكذلك رواه غير مالك عن الزهري. انظر تفصيل ذلك في علل ابن أبي حاتم (1914)، وعلل الدَّارقطنيّ (9/ 172 - 173).
وقال أبو زرعة: الصَّحيح عن الزهري عن سعيد فقط.
وقال الدَّارقطنيّ: والمرسل أصح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের একটি উটনী ছিল, যার নাম ছিল ‘আল-আদবা’, যাকে কেউ অতিক্রম করতে পারত না। (বর্ণনাকারী) হুমাইদ বলেন: অথবা তাকে অতিক্রম করা প্রায় অসম্ভব ছিল। এরপর একজন বেদুঈন একটি অল্প বয়স্ক উটের (কা‘ঊদ) পিঠে চড়ে এলো এবং তাকে অতিক্রম করে গেল। এতে মুসলিমদের কাছে খুব খারাপ লাগল, অবশেষে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তা জানতে পারলেন, তখন তিনি বললেন: "আল্লাহর জন্য এটা অবধারিত যে, দুনিয়ার কোনো কিছু উপরে উঠলে তিনি তাকে নিচে নামিয়ে দেন।"
7814 - عن عائشة: أنها كانت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في سفر. قالت: فسابقتَهَ، فسبقتُه على رِجليَّ، فلمّا حملتُ اللحم سابقتُه فسبقنيّ، فقال:"هذه بتلك السبقة".
صحيح: رواه أبو داود (2578)، وابن ماجة (1979)، وأحمد (24118) وصحّحه ابن حبَّان (4691) كلّهم من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. واللّفظ لأبي داود وقرن أبا سلمة مع عروة.
وإسناده صحيح.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলেন। তিনি বলেন, আমি তাঁর সাথে দৌড় প্রতিযোগিতা করলাম এবং আমার দু'পায়ে আমি তাঁকে অতিক্রম করে গেলাম। এরপর যখন আমার শরীরে মেদ জমল, তখন আমি তাঁর সাথে আবার প্রতিযোগিতা করলাম এবং এবার তিনি আমাকে অতিক্রম করে গেলেন। তখন তিনি বললেন: "এই (জয়) হলো সেই (আগের) দৌড়ের প্রতিদান।"
7815 - عن عقبة بن عامر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر يقول: {وَأَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّة}"ألا إن القوة الرميُ، ألا إن القوة الرميّ، ألا إن القوة الرمي".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1918: 167) عن هارون بن معروف، حَدَّثَنَا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي عليّ ثمامة بن شفيّ، عن عقبة بن عامر، فذكره.
উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বারের উপর দাঁড়িয়ে বলতে শুনেছি, তিনি বলছিলেন: "{আর তোমরা তাদের মুকাবিলায় তোমাদের সাধ্যমতো শক্তি সঞ্চয় করো।}" (সূরা আনফাল: ৬০) (এরপর তিনি বললেন:) "শুনে রাখো! নিশ্চয়ই শক্তি হলো নিক্ষেপ করা (তীরন্দাজী)। শুনে রাখো! নিশ্চয়ই শক্তি হলো নিক্ষেপ করা। শুনে রাখো! নিশ্চয়ই শক্তি হলো নিক্ষেপ করা।"
7816 - عن عقبة بن عامر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ستفتح عليكم أرضون، ويكفيكم الله، فلا يعجز أحدكم أن يلهو بأسهمه".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1918: 168) عن هارون بن معروف، حَدَّثَنَا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي عليّ، عن عقبة بن عامر، فذكره.
উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের জন্য বিভিন্ন অঞ্চল বিজয় করা হবে এবং আল্লাহ তোমাদের জন্য যথেষ্ট হবেন। সুতরাং তোমাদের কেউই যেন তার তীরসমূহ নিয়ে খেল-তামাশা (বা তীরন্দাজির অনুশীলন) করতে দুর্বলতা প্রকাশ না করে।"
7817 - عن سلمة بن الأكوع قال: مر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على نفر من أسلم ينتضلون، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ارموا بني إسماعيل، فإن أباكم كان راميا، ارموا وأنا مع بني فلان"، قال: فأمسك أحد الفريقين بأيديهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما لكم لا ترمون؟" قالوا: كيف نرمي وأنت معهم؟ قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ارموا فأنا معكم كلِّكم".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2899) عن عبد بن مسلمة، حَدَّثَنَا حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد قال: سمعت سلمة بن الأكوع. فذكره.
সালমা ইবনু আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলাম গোত্রের কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা তীর নিক্ষেপের প্রতিযোগিতা করছিল। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে ইসমাঈলের বংশধরেরা! তোমরা তীর নিক্ষেপ করো। কারণ তোমাদের পিতা একজন তীরন্দাজ ছিলেন। তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আর আমি অমুক দলের সাথে আছি।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন দুই দলের মধ্যে এক দল তাদের হাত গুটিয়ে নিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কী হলো, তোমরা কেন তীর নিক্ষেপ করছো না?" তারা বলল: আপনি যখন তাদের সাথে আছেন, তখন আমরা কীভাবে তীর নিক্ষেপ করি? তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আমি তোমাদের সকলের সাথেই আছি।"
7818 - عن ابن عباس قال: مرّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بنفر يرمون فقال:"رميًا بني إسماعيل؛ فإن أباكم كان راميا".
صحيح: رواه ابن ماجة (2815)، وأحمد (3444)، والحاكم (2/ 94) من طريق عبد الرزّاق، أنبأنا سفيان، عن الأعمش، عن زياد بن الحصين، عن أبي العالية، عن ابن عباس فذكره.
وهذا إسناد صحيح، وأبو العالية هو رفيع بن مهران الرياحي.
وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
وصحّحه أيضًا البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 166).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা (তীর) নিক্ষেপ করছিল। তখন তিনি বললেন, "হে ইসমাঈলের বংশধরগণ! তোমরা (নিক্ষেপ) করতে থাকো। কারণ তোমাদের পিতা ছিলেন একজন তীরন্দাজ।"
7819 - عن أبي هريرة قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وأسلم يرمون فقال:"ارموا بني إسماعيل؛ فإن أباكم كان راميًا، وارموا وأنا مع ابن الأدرع"، فأمسك القوم قسّيهم، وقالوا: من كنتَ معه غلب قال:"ارموا وأنا مع كلكم".
حسن: رواه أبو يعلى (6119)، وصحّحه ابن حبَّان (4695)، والحاكم (2/ 94) كلّهم من طرق عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, তখন আসলাম গোত্রের লোকেরা তীর নিক্ষেপ করছিল। তিনি বললেন: "হে ইসমাঈলের বংশধরেরা! তোমরা তীর নিক্ষেপ করো; কেননা তোমাদের পিতা (ইসমাঈল আ.) ছিলেন তীরন্দাজ। আর তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আমি ইবনুল আদরা’-এর সাথে আছি।" তখন লোকেরা তাদের ধনুক ধরে রাখল (তীর নিক্ষেপ করা থামিয়ে দিল)। তারা বলল: যার সাথে আপনি থাকবেন, সে-ই তো জয়ী হবে। তিনি বললেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আর আমি তোমাদের সবার সাথে আছি।"
7820 - عن أبي أُسيد قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم بدر حين صففنا لقريش وصفّوا لنا:"إذا أكثبوكم فعليكم بالنبل".
وزاد في لفظ:"واستبقوا نبلكم".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2950) عن أبي نعيم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن الغسيل، عن حمزة بن أبي أسيد، عن أبيه، فذكره.
ورواه أيضًا في المغازي (3984) من طريق أبي أحمد الزُّبيريّ، عن عبد الرحمن بن الغسيل، عن حمزة بن أبي أسيد والزُّبير بن المنذر بن أبي أسيد، عن أبيه فذكره. وفيه الزيادة المذكورة.
ورواه أبو داود (2664) من طريق إسحاق بن نجيح - وليس بالملطي - عن مالك بن حمزة بن أبي أسيد الساعديّ، عن أبيه، عن جده نحوه. وزاد فيه:"ولا تسلوا السيوف حتَّى يغشوكم".
وفي إسناده إسحاق بن نجيح مجهول، ومالك بن حمزة بن أبي أسيد لم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، وذكر البخاريّ له حديثًا، وقال: لا يتابع عليه.
আবূ উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমরা কুরাইশদের জন্য সারিবদ্ধ হলাম এবং তারা আমাদের জন্য সারিবদ্ধ হলো, তখন বদরের যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তারা তোমাদের কাছাকাছি এসে যাবে (ঘন হয়ে যাবে), তখন তোমরা তীর ব্যবহার করবে।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: "আর তোমরা তোমাদের তীর সংরক্ষণ করবে।"