হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7861)


7861 - عن عوف بن مالك الأشجعي وخالد بن الوليد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى بالسلب للقاتل، ولم يخمس السلب.

صحيح: رواه أبو داود (2721) - ومن طريقه البيهقيّ (6/ 310) - عن سعيد بن منصور (2698)، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن صفوان بن عمرو، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن عوف بن مالك الأشجعي وخالد بن الوليد، فذكراه.

وفي إسناده إسماعيل بن عَيَّاش وهو صدوق في روايته عن أهل الشام، وهذه منها وقد توبع.

رواه أحمد (16822)، وابن الجارود (1077) من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، عن صفوان بن عمرو به، ولفظه: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يخمس السلب. وهذا إسناد صحيح.




আওফ ইবনে মালিক আল-আশজাঈ ও খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিয়েছেন যে, (শত্রুকে) হত্যাকারী তার 'সালাব' (নিহত শত্রুর ব্যক্তিগত মালামাল) পাবে, এবং তিনি 'সালাব'-এর এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) গ্রহণ করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (7862)


7862 - عن ابن عمر قال: ذهب فرس له فأخذه العدو، فظهر عليه المسلمون فرد عليه في زمن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبق عبد له، فلحق بالروم فظهر عليهم المسلمون، فردّه عليه خالد بن الوليد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3067) قال: قال ابن نمير: حَدَّثَنَا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. ومثل هذا موصول على رأي ابن الصلاح




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁর একটি ঘোড়া হারিয়ে গেল এবং শত্রু সেটি ধরে নিয়ে গেল। এরপর মুসলিমগণ তাদের উপর জয় লাভ করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যামানায় সেটি তাঁর কাছে ফিরিয়ে দেওয়া হলো। আর তাঁর এক গোলাম পালিয়ে গেল এবং রোমকদের সাথে যোগ দিল। এরপর মুসলিমগণ তাদের উপর জয় লাভ করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (ওফাতের) পর খালিদ ইবনু ওয়ালীদ তাকে তাঁর কাছে ফিরিয়ে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7863)


7863 - عن ابن عمر: أنه كان على فرس يوم لقي المسلمون - وأمير المسلمين يومئذ خالد بن الوليد بعثه أبو بكر - فأخذه العدو، فلمّا هُزم العدو رد خالد فرسه.

صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3069) عن أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا زهير، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুসলিমরা যেদিন শত্রুর মুখোমুখি হয়েছিল, সেদিন তিনি একটি ঘোড়ার উপর ছিলেন। আর সেইদিন মুসলিমদের সেনাপতি ছিলেন খালিদ ইবনে ওয়ালীদ, যাঁকে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রেরণ করেছিলেন। শত্রুরা ঘোড়াটিকে ধরে নিয়ে গেল। অতঃপর যখন শত্রুরা পরাজিত হলো, তখন খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ঘোড়াটি ফিরিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7864)


7864 - عن نافع أن عبدًا لابن عمر أبق، فلحق بالروم، فظهر عليه خالد بن الوليد، فردّه على عبد الله، وأن فرسا لابن عمر عارٍ، فلحق بالروم، فظهر عليه، فردوه على عبد الله.

صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3068) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا يحيى، عن عبيد الله قال: أخبرني نافع .. فذكره.

وأمّا ما رُوي عن عثمان بن أبي حازم، عن أبيه، عن جده صخر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم غزا ثقيفا،
فلمّا أن سمع ذلك صخر ركب في خيل يمد النبي صلى الله عليه وسلم فوجد نبي الله صلى الله عليه وسلم قد انصرف، ولم يفتح، فجعل صخر يومئذ عهد الله وذمته أن لا يفارق هذا القصر حتَّى ينزلوا على حكم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يفارقهم حتَّى نزلوا على حكم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكتب إليه صخر:

أما بعد: فإن ثقيفا قد نزلت على حكمك يا رسول الله وأنا مقبل إليهم وهم في خيل. فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالصلاة جامعة، فدعا لأحمس عشر دعوات:"اللهم بارك لأحمس في خيلها ورجالها".

وأتاه القوم فتكلم المغيرة بن شعبة فقال: يا نبي الله إن صخرًا أخذ عمتي ودخلت فيما دخل فيه المسلمون. فدعاه فقال:"يا صخر إن القوم إذا أسلموا أحرزوا دماءهم وأموالهم فادفع إلى المغيرة عمته". فدفعها إليه. وسأل نبي الله صلى الله عليه وسلم ماء لبني سليم قد هربوا عن الإسلام وتركوا ذلك الماء. فقال: يا نبي الله أنزلنيه أنا وقومي. قال"نعم". فأنزله وأسلم - يعني السلميين - فأتوا صخرًا فسألوه أن يدفع إليهم الماء فأبى فأتوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا نبي الله أسلمنا وأتينا صخرًا ليدفع إلينا ماءنا فأبى علينا. فأتاه فقال:"يا صخر إن القوم إذا أسلموا أحرزوا أموالهم ودماءهم فادفع إلى القوم ماءهم". قال: نعم يا نبي الله. فرأيت وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم يتغير عند ذلك حمرةً حياءً من أخذه الجارية وأخذه الماء. فلا يصح.

رواه أبو داود (3067) - ومن طريقه البيهقيّ (9/ 114) - من رواية الفريابي (وهو محمد بن يوسف) حَدَّثَنَا أبان بن عبد الله بن أبي حازم، حَدَّثَنِي عثمان بن أبي حازم، عن أبيه، عن جده صخر فذكره.

وصخر هو: ابن العيلة.

وقال المزي في التحفة (4/ 160): وهكذا رواه أبو نعيم عن أبان.

وفي إسناده عثمان بن أبي حازم روى عنه أبان، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته.

ولذا قال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا.

وأبوه أبو حازم بن صخر روى عنه ابنه عثمان، ولم يوثقه أحد فلا يعرف حاله ولذا قال ابن حجر: مستور.

وأبان بن عبد الله بن أبي حازم صدوق في حفظه لين، وقد اختلف عليه في إسناده، ساقه أبو نعيم في ترجمة صخر بن العبلة من معرفة الصّحابة، وابن حجر في الإصابة، والمزي في تحفة الأشراف (4/ 160) وقال المزي: حديث الفريابي وأبي نعيم أصح.

وقد ضعف هذا الحديث غير واحد من أهل العلم منهم البيهقيّ في الكبرى (9/ 115)، والإشبيلي في أحكامه الوسطى (3/ 74) ووافقه ابن القطان في بيان الوهم والإيهام (3/ 2




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর একজন দাস পালিয়ে গিয়ে রোমকদের সাথে যোগ দিয়েছিল। অতঃপর খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার উপর বিজয় লাভ করে তাকে আব্দুল্লাহর (ইবনে উমর) নিকট ফিরিয়ে দেন। আর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি ঘোড়া উদ্দেশ্যহীন হয়ে রোমকদের নিকট চলে গিয়েছিল, অতঃপর [মুসলিমরা] সেটির উপর বিজয়ী হলে তারা সেটিকে আব্দুল্লাহর (ইবনে উমর) নিকট ফিরিয়ে দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (7865)


7865 - عن عليّ قال: كانت لي شارف من نصيبي من المغنم يوم بدر، وكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم -
أعطاني شارفا من الخمس، فلمّا أردت أن أبتني بفاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، واعدتُ رجلًا صواغا من بني قينقاع أن يرتحل معي، فنأتي بإذخر أردت أن أبيعه الصواغين، وأستعين به في وليمة عرسي فبينا أنا أجمع لشارفي متاعا من الأقتاب والغرائر والحبال، وشارفاي مناختان إلى جنب حجرة رجل من الأنصار، رجعت حين جمعت ما جمعت، فإذا شارفاي قد اجتب أسنمتهما، وبقرت خواصرهما، وأخذ من أكبادهما، فلم أملك عيني حين رأيت ذلك المنظر منهما، فقلت: من فعل هذا؟ فقالوا: فعل حمزة بن عبد المطلب، وهو في هذا البيت في شربٍ من الأنصار، فانطلقت حتَّى أدخل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وعنده زيد بن حارثة فعرف النبي صلى الله عليه وسلم في وجهي الذي لقيت، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما لك؟" فقلت: يا رسول الله، ما رأيت كاليوم قطّ عدَا حمزة على ناقتي فأجب أسنمتهما وبقر خواصرهما، وها هو ذا في بيت معه شرب، فدعا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بردائه فارتدى، ثمّ انطلق يمشي، واتبعته أنا وزيد بن حارثة حتَّى جاء البيت الذي فيه حمزة، فاستأذن فأذنوا لهم، فإذا هم شرب، فطفق رسول الله صلى الله عليه وسلم يلوم حمزة فيما فعل، فإذا حمزة قد ثمل حمرة عيناه، فنظر حمزة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمّ صعد النظر، فنظر إلى ركبته، ثمّ صعد النظر فنظر إلى سرته، ثمّ صعد النظر فنظر إلى وجهه، ثمّ قال حمزة: هل أنتم إِلَّا عبيد لأبي، فعرف رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قد ثمل، فنكص رسول الله صلى الله عليه وسلم على عقبيه القهقرى وخرجنا معه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3091)، ومسلم في الأشربة (1979: 2) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرنا يونس بن يزيد، عن الزّهريّ، أخبرني عليّ بن الحسين بن عليّ، أن حسين بن عليّ أخبره أن عليا قال فذكره.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: বদর যুদ্ধের দিন গনীমতের মালের আমার অংশে একটি উটনী ছিল। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) থেকে একটি উটনী দিয়েছিলেন। এরপর যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বাসর যাপন করতে মনস্থ করলাম, তখন আমি বনু কাইনুকা গোত্রের একজন স্বর্ণকারের সাথে ওয়াদা করলাম যে সে আমার সাথে যাবে। আমরা ইযখির (এক প্রকার সুগন্ধি ঘাস) সংগ্রহ করে আনব, যা আমি স্বর্ণকারদের কাছে বিক্রি করে আমার বিবাহের ওয়ালীমায় সাহায্য নেব। এরপর আমি যখন আমার উটনী দুটির জন্য হাওদা, বস্তা ও রশি জাতীয় জিনিসপত্র একত্রিত করছিলাম, আর আমার উটনী দুটি এক আনসারীর কক্ষের পাশে বসানো ছিল, তখন আমি সব জিনিসপত্র জমা করে ফিরে এলাম। এসে দেখি আমার উটনী দুটির কুঁজ কেটে ফেলা হয়েছে, পাঁজর চিরে ফেলা হয়েছে এবং কলিজা বের করে নেওয়া হয়েছে। সেই দৃশ্য দেখে আমি চোখের পানি ধরে রাখতে পারলাম না। আমি বললাম, কে এই কাজ করেছে? তারা বলল: হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিব এই কাজ করেছে। আর তিনি এই ঘরে কিছু সংখ্যক আনসারীর সাথে মদ্যপান করছেন। তখন আমি দ্রুত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম। তাঁর কাছে যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার চেহারা দেখেই বুঝতে পারলেন যে আমি কঠিন কিছুর সম্মুখীন হয়েছি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার কী হয়েছে?" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি আজকের দিনের মতো আর কখনো দেখিনি! হামযা আমার উটনী দুটির উপর আক্রমণ করেছে, তাদের কুঁজ কেটে ফেলেছে এবং পাঁজর চিরে দিয়েছে। আর সে এই ঘরে কিছু মদ্যপানকারীর সাথে আছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাদরটি আনতে বললেন এবং সেটি পরিধান করলেন। এরপর তিনি হেঁটে চললেন। আমি ও যায়দ ইবনু হারিসা তাঁর অনুসরণ করলাম, যতক্ষণ না তিনি সেই ঘরে আসলেন যেখানে হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তিনি অনুমতি চাইলেন। তারা অনুমতি দিলেন। দেখা গেল তারা মদ্যপানে রত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন হামযাকে তার কাজের জন্য ভর্ৎসনা করতে লাগলেন। হামযা তখন নেশায় আচ্ছন্ন ছিল এবং তার চোখ লাল হয়ে গিয়েছিল। হামযা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে তাকাল, এরপর দৃষ্টি উপরে তুলে তাঁর হাঁটুর দিকে তাকাল, এরপর দৃষ্টি উপরে তুলে তাঁর নাভির দিকে তাকাল, এরপর দৃষ্টি উপরে তুলে তাঁর চেহারার দিকে তাকাল। এরপর হামযা বলল: তোমরা কি আমার বাবার দাস ছাড়া আর কিছু নও? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বুঝতে পারলেন যে সে নেশাগ্রস্ত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পিছনের দিকে পা টেনে সরতে সরতে ঘর থেকে বের হলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে বের হয়ে গেলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (7866)


7866 - عن عمر قال:"لولا آخر المسلمين ما فتحتُ قرية إِلَّا قسمتها بين أهلها كما قسم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيبر".

صحيح: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3125) عن صدقة، أخبرنا عبد الرحمن، عن مالك، عن زيد بن أسلم، عن أبيه قال: قال عمر فذكره.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি ভবিষ্যতের মুসলিমরা না থাকত, তবে আমি যে কোনো জনপদ জয় করতাম, তা অবশ্যই এর অধিবাসীদের মাঝে ভাগ করে দিতাম, যেভাবে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার বণ্টন করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7867)


7867 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما أعطيكم ولا أمنعكم أنا قاسم أضع حيث أمرت".

صحيح: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3117) عن محمد بن سنان، حَدَّثَنَا فليح، حَدَّثَنَا هلال، عن عبد الرحمن بن أبي عمرة، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদের কিছু দান করি না এবং তোমাদের থেকে কিছু আটকাইও না। আমি তো বন্টনকারী মাত্র, যেখানে আমাকে আদেশ করা হয়েছে আমি সেখানেই রাখি।"









আল-জামি` আল-কামিল (7868)


7868 - عن عوف بن مالك الأشجعي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاء فيء قسمه من يومه، فأعطى الآهل حظين، وأعطى العزب حظا واحدًا، فدُعينا، وكنت أدعى قبل عمار بن ياسر، فدعيت فأعطاني حظين، وكان لي أهل، ثمّ دعا بعمار بن ياسر فأعطي حظا واحدًا، فبقيت قطعة سلسلة من ذهب، فجعل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يرفعها بطرف عصاه، ثمّ رفعها وهو يقول:"كيف أنتم يوم يكثر لكم من هذا!".

صحيح: رواه أحمد (23986) - والسياق له - وأبو داود (2953)، وصحّحه ابن حبَّان (4816)، والحاكم (2/ 140 - 141) من طرق عن صفوان بن عمرو، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن عوف بن مالك فذكره. ومنهم من اختصره. وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم فقد أخرج بهذا الإسناد بعينه أربعة أحاديث".




আওফ ইবনে মালিক আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখনই ফাই (বিনা যুদ্ধে লব্ধ সম্পদ) আসত, তিনি ঐ দিনই তা বণ্টন করে দিতেন। তিনি বিবাহিতদের দুই ভাগ এবং অবিবাহিতদের এক ভাগ দিতেন। আমরা (বণ্টনের জন্য) আহূত হলাম। আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্বে আমাকে ডাকা হয়েছিল। আমাকে ডাকা হলো এবং আমার পরিবার থাকার কারণে আমাকে দুই ভাগ দেওয়া হলো। এরপর তিনি আম্মার ইবনে ইয়াসিরকে ডাকলেন এবং তাকে এক ভাগ দেওয়া হলো। অতঃপর সোনার একটি চেন অবশিষ্ট রইল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর লাঠির মাথা দিয়ে সেটি তুলে ধরলেন, তারপর এটিকে উপরে উঠিয়ে বললেন: "তোমাদের অবস্থা কেমন হবে যখন তোমাদের জন্য এ জাতীয় সম্পদের প্রাচুর্য ঘটবে!"









আল-জামি` আল-কামিল (7869)


7869 - عن عائشة: أن النبي صلى الله عليه وسلم أُتي بظبية فيها خرزٌ، فقسمها للحرة والأمة. قالت عائشة: كان أبي رضي الله عنه حتَّى يقسم للحر والعبد.

صحيح: رواه أبو داود (2952)، وأحمد (25229) والحاكم (2/ 137)، والبيهقي (6/ 347) كلّهم من طريق ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن عبد الله بن نيار الأسلميّ، عن عروة، عن عائشة. فذكرته.

وإسناده صحيح. وقد صحّحه الحاكم.

وقولها:"الظبية" هي جراب صغير عليه شعر. وقيل: هي شبه الخريطة والكيس. قاله ابن الأثير. وهذه كانت من الغنيمة كما جاء التصريح عند الحاكم.

وفي الباب عن عمر بن الخطّاب رضي الله عنه أنه كتب إلى بعض أمراء الجيش: إن الغنيمة لمن شهد الوقعة.

رواه الطبرانيّ في الكبير (8/ 358)، وسعيد بن منصور (2791)، وابن أبي شيبة (33900) كلّهم من طرق عن شعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب بإسناد صحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি ‘যাবিয়া’ (ছোট চামড়ার বস্তা) আনা হলো, যার মধ্যে কিছু পুঁতি ছিল। অতঃপর তিনি তা স্বাধীন মহিলা ও দাসীর মধ্যে বণ্টন করে দিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার পিতা (আবু বকর) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমনকি স্বাধীন ব্যক্তি ও দাসদের মধ্যেও তা বণ্টন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7870)


7870 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم جعل للفرس سهمين، ولصاحبه سهما.

وفي لفظ: قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم خيبر للفرس سهمين، وللراجل سهما. قال - أي عبيد الله بن عمر العمري -: فسّره نافع، فقال: إذا كان مع الرّجل فرس فله ثلاثة أسهم، فإن لم يكن له فرس فله سهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد (2863) عن عبيد بن إسماعيل، عن أبي أسامة، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره باللفظ الأوّل.
ورواه في المغازي (4228) من طريق زائدة، عن عبيد الله بن عمر به، باللفظ الثاني.

ورواه مسلم في الجهاد (1762: 57) من طريق سُليم بن الأخضر، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قسم في النفل: للفرس سهمين، وللرجل سهما.

ورواه أبو داود (2733) عن أحمد بن حنبل - وهو في مسنده (4448) - عن أبي معاوية، عن عبيد الله، به بلفظ:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم جعل لرجل ولفرسه ثلاثة أسهم: سهما له، وسهمين لفرسه".

وخلاصة هذه الروايات أن الفارس له ثلاثة أسهم: سهم له، وسهمان لفرسه، والراجل له سهم واحد.

وأمّا ما روي بلفظ:"جعل للفارس سهمين، وللراجل سهما" فلا يصح.

رواه الدَّارقطنيّ (4/ 106) عن أبي بكر النيسابوريّ، حَدَّثَنَا أحمد بن منصور (وهو الرمادي)، حَدَّثَنَا أبو بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا أبو أسامة وابن نمير قالا: حَدَّثَنَا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر. فذكره.

قال الدَّارقطنيّ:"قال لنا النيسابوري: هذا عندي وهم من ابن أبي شيبة، أو من الرمادي؛ لأن أحمد بن حنبل وعبد الرحمن بن بشر وغيرهما رووه عن ابن نمير خلاف هذا. ورواه ابن كرامة وغيره عن أبي أسامة خلاف هذا أيضًا" اهـ.

قلت: الظاهر أن الوهم من الرماديّ، وأمّا ابن أبي شيبة فبريء من عهدته فإنه رواه في مصنفه (33841، 37212)، وفي المسند كما أفاده الحافظ في الفتح (6/ 68) بهذا الإسناد، فقال: للفرس سهمين.

وكذلك رواه ابن أبي عاصم في كتاب الجهاد له عن ابن أبي شيبة - كما أفاد الحافظ أيضًا وليس في القسم المطبوع منه - وعلى هذا فابن أبي شيبة بريء من عهدة هذا الوهم.

ورواه الدَّارقطنيّ (4/ 106) من طريق نعيم بن حمّاد، عن ابن المبارك، عن عبيد الله بن عمر به بلفظ:"أنه أسهم للفارس سهمين، وللراجل سهما".

قال النيسابوري شيخ الدَّارقطنيّ: لعل الوهم من نعيم؛ لأن ابن المبارك من أثبت الناس.

قلت: يؤيد ذلك أن عليّ بن الحسن بن شقيق - وهو أثبت من نعيم - رواه عن ابن المبارك بلفظ:"أسهم للفرس سهمين" كما ذكره ابن حجر في الفتح (6/ 68).

ورواه الدَّارقطنيّ (4/ 104، 107) من طريق حجَّاج بن منهال، عن حمّاد بن سلمة، عن عبيد الله بن عمر بلفظ:"أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قسم للفارس سهمين، وللراجل سهما" ثمّ قال الدَّارقطنيّ: كذا قال! وخالفه النضر بن محمد عن حمّاد.

قلت: رواية النضر بن محمد بن موسى اليمامي عن حمّاد عند الدَّارقطنيّ (4/ 104) أيضًا بلفظ: أسهم للفارس سهما وللفَرَس سهمين".
ورواه عبد الرزّاق (9320)، وابن عدي (4/ 1460) من طريق عبد الله بن عمر، عن نافع به بلفظ: للفارس سهمين.

قال البيهقيّ في الكبرى (6/ 325) عبد الله العمري كثير الوهم، وقد روي ذلك من وجه آخر عن القعنبيّ، عن عبد الله العمري بالشك في الفارس أو الفرس.

قال الشافعي في القديم: كأنه سمع نافعا يقول: للفرس سهمين، وللرجل سهما فقال: للفارس سهمين، وللراجل سهما، وليس يشك أحد من أهل العلم في تقدمة عبيد الله بن عمر على أخيه في الحفظ".

وأمّا ما رواه الدَّارقطنيّ في المؤتلف والمختلف - كما في نصب الراية (3/ 418) - من طريق أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بكير، عن عبد الرحمن بن أمين، عن نافع، عن ابن عمر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يقسم للفارس سهمين، وللراجل سهما فلا يصح إسناده؛ فإن عبد الرحمن بن أمين منكر الحديث، كما قال أبو حاتم، وأحمد بن عبد الجبار ضعيف أيضًا.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘোড়ার জন্য দু'টি অংশ (সেহম) এবং এর মালিকের জন্য একটি অংশ নির্ধারণ করেছিলেন।

অন্য এক শব্দে (বর্ণনায়) আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের দিন ঘোড়ার জন্য দু'টি অংশ এবং পদাতিক (পায়ে হেঁটে যুদ্ধকারী) ব্যক্তির জন্য একটি অংশ বণ্টন করেছিলেন। (রাবী) বলেন—অর্থাৎ উবাইদুল্লাহ ইবনে উমর আল-উমারী বলেন—নাফি' এটির ব্যাখ্যা করে বলেছেন: যখন কোনো ব্যক্তির সাথে ঘোড়া থাকে, তখন সে তিনটি অংশ পায়, আর যদি তার ঘোড়া না থাকে, তবে সে একটি অংশ পায়।

এই বর্ণনাগুলোর সারসংক্ষেপ হলো এই যে, অশ্বারোহী ব্যক্তি তিনটি অংশ পায়: তার নিজের জন্য একটি অংশ এবং তার ঘোড়ার জন্য দুটি অংশ। আর পদাতিক ব্যক্তি পায় মাত্র একটি অংশ।









আল-জামি` আল-কামিল (7871)


7871 - عن عبد الله بن عباس: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قسم لمائتي فرس يوم خيبر سهمين سهمين.

حسن: رواه البخاريّ في التاريخ الكبير (7/ 215)، والدارقطني (4/ 103)، والحاكم (2/ 138)، والبيهقي (6/ 326) كلّهم من طريق إبراهيم بن سعد بن إبراهيم، عن كثير مولى بني مخزوم، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط البخاريّ ولم يخرجاه بهذا اللّفظ، وقد احتج البخاريّ بيحيى بن أيوب وكثير المخزومي".

قلت: كذا قال! ولم يبين من هو كثير المخزومي الذي أخرج له البخاريّ؟ وقد أخرج البخاريّ هذا الحديث في ترجمة كثير مولى بني مخزوم من التاريخ الكبير (7/ 215) ولم يذكر له راويا غير إبراهيم بن سعد. وكذا ترجم له ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (7/ 160) ولم يذكر له راويا غير إبراهيم، ولم أجد من وثَّقه فهو في عداد المجهولين.

وله طريق آخر: رواه إسحاق بن راهويه في مسنده كما في نصب الراية (3/ 414)، وابن أبي شيبة (33842)، وعنه أبو يعلى (2528) من طريق حجَّاج، عن أبي صالح، عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم جعل للفارس ثلاثة أسهم: سهما له واثنين لفرسه. واللّفظ لابن أبي شيبة.

وفي سنده حجَّاج وهو ابن أرطاة وهو مدلِّس وقد عنعن.

فالحديث بمجموع الطريقين يرتقي إلى درجة الحسن.

تنبيه: في مطبوعة الدَّارقطنيّ القديمة"بحنين" بدل"بخيبر" وفي طبعة الرسالة (4174)"بخيبر" كما في أكثر المصادر.

وعند الطبرانيّ في الكبير (11/ 192) من هذا الطريق:"قسم لثمانين فرسا يوم حنين سهمين
سهمين" وهو خطأ.

وأمّا ما رُوي عن مجمع بن جارية الأنصاري - وكان أحد القراء الذين قرؤوا القرآن قال: شهدنا الحديبية مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فلمّا انصرفنا عنها إذا الناس يهزون الأباعر فقال بعض الناس لبعض: ما للناس؟ قالوا: أوحي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فخرجنا مع الناس نوجف فوجدنا النبي صلى الله عليه وسلم واقفا على راحلته عند كُراع الغميم فلمّا اجتمع عليه الناس قرأ عليهم: {إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُبِينًا} فقال رجل: يا رسول الله أفتح هو؟ قال:"نعم، والذى نفس محمد بيده إنه لفتح". فقسمت خيبر على أهل الحديبية فقسمها رسول الله صلى الله عليه وسلم على ثمانية عشر سهما، وكان الجيش ألفا وخمسمائة فيهم ثلاثمائة فارس فأعطى الفارس سهمين، وأعطى الراجل سهما.

رواه أبو داود (2736)، وأحمد (15470)، والحاكم (2/ 131)، والبيهقي (6/ 325) من طريق مجمع بن يعقوب بن مجمع بن يزيد الأنصاري قال: سمعت أبي يعقوب بن"المجمع" يذكر عن عمه عبد الرحمن بن يزيد الأنصاريّ، عن عمه مجمع بن جارية الأنصاري قال فذكره.

وقال الحاكم:"هذا حديث كبير صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

قلت: بل إسناده ضعيف وفي متنه نكارة.

أما الضعف في الإسناد فقد قال ابن القطان في بيان الوهم (4/ 419):"وعلة هذا الخبر إنّما هي الجهل بحال يعقوب بن مجمع بن يزيد الأنصاري". اهـ

ويعقوب هذا لم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا فهو لين الحديث وقد اختلف في إسناده وليس هذا موضع بسطه.

وأمّا النكارة في المتن فقال أبو داود عقب الحديث: وحديث أبي معاوية أصح والعمل عليه وأرى الوهم في حديث مجمع أنه قال: ثلاث مائة فارس وكانوا مائتي فارس.

قلت: يشير أبو داود بحديث أبي معاوية إلى حديث ابن عمر الذي رواه هو (2733) عن أحمد بن حنبل، عن أبي معاوية، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أسهم لرجل ولفرسه ثلاثة أسهم: سهما له وسهمين لفرسه.

وينظر للمزيد: معرفة السنن والآثار (9/ 248)، وزاد المعاد (3/ 331)، وفتح الباري (6/ 68)، والمنة الكبرى (8/ 6 - 7).

تنبيه: في مطبوعة المستدرك وقع سقط في إسناد الحديث وجاء على الصواب في تلخيص الذّهبيّ المطبوع بهامش المستدرك.

وقوله:"الأباعر" جمع بعير والمعنى يحركون ويُسرعون رواحلهم.

وأمّا ما رُوي عن أبي عمرة، عن أبيه قال:"أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أربعة نفر، ومعنا فرس، فأعطى
كل إنسان منا سهما، وأعطى الفرس سهمين" فإسناده ضعيف.

رواه أحمد (17239) - وعنه أبو داود (2734) - عن عبد الله بن يزيد، حَدَّثَنِي المسعوديّ، حَدَّثَنِي أبو عمرة، عن أبيه، فذكره.

وهذا إسناد ضعيف فإن المسعودي - وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة - كان قد اختلط، واختلف عليه في إسناده، فمرة صرّح بسماعه من أبي عمرة، ومرة أدخل بينه وبينه رجلًا لم يسمه. وليس فيه:"عن أبيه" وقد قال ابن حجر في ترجمة أبي عمرة من التهذيب بعد ما ساق بعض الاختلاف:"والظاهر من مجموع ذلك أن الحديث لأبي عمرة الأنصاري لا لغيره". والله أعلم.

وأبو عمرة هذا لا يعرف له راو غير عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة المسعوديّ، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته.

وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن الزُّبير أنه كان يقول:"ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم عام خيبر للزبير بن العوام أربعة أسهم سهما للزبير، وسهما لذي القربى لصفية بنت عبد المطلب أم الزُّبير، وسهمين للفرس". فالصحيح أنه مرسل.

رواه النسائيّ (3593)، والطحاوي في شرح المعاني (3/ 282) من طريق سعيد بن عبد الرحمن الجمحي - والدارقطني (4/ 111)، والبيهقي (6/ 326) من طريق محاضر بن المورع - كلاهما عن هشام بن عروة، عن يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزُّبير، عن جده .. فذكره.

ومداره على هشام بن عروة واختلف عليه وعلى الرواة عنه على ألوان شتى، وقد ساق الدَّارقطنيّ هذا الاختلاف في سننه (4/ 110 - 111)، وعلله (4/ 230 - 231) ثمّ قال في العلل:"وأصحاب هشام الحفاظ عنه يروونه عن هشام، عن يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزُّبير مرسلًا وهو الصَّحيح".

كذا نقل العراقي في ترجمة إسحاق بن إدريس الخولاني من ذيل الميزان قول الدَّارقطنيّ. وأمّا في المطبوعة فأثبت المحقق"إسماعيل" بدل"هشام" اجتهادًا منه.

فقه الباب: قال الترمذيّ:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم، وهو قول سفيان الثوري والأوزاعي ومالك بن أنس، وابن المبارك، والشافعي وأحمد وإسحق قالوا: للفارس ثلاثة أسهم: سهم له، وسهمان لفرسه، وللراجل سهم".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন দুইশত ঘোড়ার জন্য দুই-দুই অংশ (সাহম) করে বণ্টন করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7872)


7872 - عن يزيد بن هرمز قال: كتب نجدة بن عامر الحروري إلى ابن عباس يسأله عن العبد والمرأة يحضران المغنم، هل يقسم لهما؟ وعن قتل الولدان، وعن اليتيم متى ينقطع عنه اليتم؟ وعن ذوي القربى من هم؟ فقال ليزيد: اكتب إليه فلولا أن يقع في أحموقة ما كتبتُ إليه، اكتب: إنك كتبت تسألني عن المرأة والعبد يحضران المغنم،
هل يقسم لهما شيء وإنه ليس لهما شيء إِلَّا أن يحذيا. وكتبت تسألني عن قتل الولدان وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يقتلهم وأنت فلا تقتلهم إِلَّا أن تعلم منهم ما علم صاحب موسى من الغلام الذي قتله. وكتبت تسألني عن اليتيم متى ينقطع عنه اسم اليتم؟ وإنه لا ينقطع عنه اسم اليتم حتَّى يبلغ ويؤنس منه رشد. وكتبت تسألني عن ذوي القربى من هم؟ هانا زعمنا أنَّا هم فأبى ذلك علينا قومنا.

صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1812: 139) عن ابن أبي عمر، حَدَّثَنَا سفيان، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد المقبريّ، عن يزيد بن هرمز، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযিদ ইবনু হুরমুয বলেন: নাজ্জাদা ইবনু আমির আল-হারুরী ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চিঠি লিখে জিজ্ঞাসা করেন: কোনো দাস ও নারী যদি গনীমতের (যুদ্ধলব্ধ সম্পদের) স্থানে উপস্থিত থাকে, তবে কি তাদের জন্য কোনো অংশ ভাগ করে দেওয়া হবে? তিনি আরও জিজ্ঞাসা করেন, বাচ্চাদের হত্যা করা সম্পর্কে, কখন ইয়াতীমের উপর থেকে ‘ইয়াতীম’ নাম উঠে যায়? এবং ‘নিকটাত্মীয়’ (যাবিল কুরবা) কারা? তখন তিনি (ইবনু আব্বাস) ইয়াযিদকে বললেন: তুমি তাকে লিখো। যদি সে বোকামিতে লিপ্ত না হতো, তবে আমি তাকে লিখতাম না। তুমি লিখো: তুমি আমাকে লিখেছো, গনীমতের স্থানে উপস্থিত নারী ও দাস সম্পর্কে, তাদের জন্য কি কোনো অংশ ভাগ করে দেওয়া হবে? তাদের জন্য কিছুই নেই, তবে তাদের কিছু উপঢৌকন (ইহযা) দেওয়া যেতে পারে। তুমি আমাকে লিখেছো, বাচ্চাদের হত্যা করা সম্পর্কে। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের হত্যা করেননি। অতএব তুমিও তাদের হত্যা করো না, তবে যদি তাদের সম্পর্কে তুমি এমন কিছু জানতে পারো যা মূসা (আঃ)-এর সঙ্গী সেই ছেলেটি সম্পর্কে জানতে পেরেছিলেন, যাকে তিনি হত্যা করেছিলেন। আর তুমি আমাকে লিখেছো, ইয়াতীমের উপর থেকে কখন ‘ইয়াতীম’ নামটি উঠে যায়? নিশ্চয়ই তার উপর থেকে ‘ইয়াতীম’ নামটি উঠে যায় না, যতক্ষণ না সে সাবালক হয় এবং তার মধ্যে বুদ্ধিমত্তা (রশদ) পরিলক্ষিত হয়। আর তুমি আমাকে লিখেছো, ‘নিকটাত্মীয়’ (যাবিল কুরবা) কারা? আমরা মনে করি যে আমরাই সেই নিকটাত্মীয়; কিন্তু আমাদের গোত্রের লোকেরাই তা অস্বীকার করে।









আল-জামি` আল-কামিল (7873)


7873 - عن عمير مولى آبي اللحم قال: شهدت خيبر مع سادتي فكلموا في رسول لله صلى الله عليه وسلم وكلموه أني مملوك قال: فأمرني فقلدت السيف فإذا أنا أجره فأمر لي بشيء من خرثي المتاع، وعرضت عليه رقية كنت أرقي بها المجانين، فأمرني بطرح بعضها، وحبس بعضها.

وفي رواية: وأعطاني خرثي متاع، ولم يسهم لي.

صحيح: رواه الترمذيّ (1557)، والنسائي في الكبرى (7493)، والحاكم (1/ 327) من طريق قُتَيبة، حَدَّثَنَا بشر بن المفضل، عن محمد بن زيد (هو ابن المهاجر بن قنفذ)، عن عمير مولى آبي اللحم فذكره.

قال الترمذيّ: هذا حديث حسن صحيح.

ورواه أبو داود (2730)، وابن ماجة (2855)، وأحمد (21940)، وابن الجارود (1087)، وابن حبَّان (4831)، والحاكم (1/ 131) كلّهم من طرق عن محمد بن زيد بن مهاجر به نحوه دون قصة الرقية.

وعند ابن حبَّان والحاكم:"حنين" بدل"خيبر".

ورواه أحمد (21941) من وجه آخر عن محمد بن زيد به نحوه مع قصة الرقية.

وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد.

وقال البيهقيّ (6/ 332): أخرج مسلم بهذا الإسناد حديثًا آخر في الزّكاة، وهذا المتن أيضًا صحيح على شرطه.

وقوله:"فقلدت السيف" بصيغة المجهول من التقليد أي أمرني أن أحمل السلاح وأكون مع المجاهدين.

وقوله:"أجره" أي أجرّ السيف على الأرض من قصر قامتي.

قوله:"خرثي المتاع" بالخاء المعجمة المضمومة وسكون الراء المهملة وهو أردأُ المتاع.

قال البغوي في شرح السنة (11/ 104):"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم: أن العبيد
والصبيان والنسوان إذا حضروا القتال يُرضخ لهم، ولا يُسهم لهم".

وأمّا ما رُوي عن حشرج بن زياد، عن جدته أم أبيه:"أنها خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة خيبر سادس ست نسوة، فبلغ رسول الله صلى الله عليه وسلم فبعث إلينا، فجئنا فرأينا فيه الغضب فقال:"مع من خرجتن وبإذن من خرجتن" فقلنا: يا رسول الله خرجنا نغزل الشعر، ونعين به في سبيل الله، ومعنا دواء الجرحى، ونناول السهام ونسقي السويق فقال:"قمن" حتَّى إذا فتح الله عليه خيبر أسهم لنا كما أسهم للرجال. قال: فقلت لها: يا جدة وما كان ذلك؟ قالت: تمرًا". فإسناده ضعيف.

رواه أبو داود (2729)، وأحمد (22332)، والنسائي في الكبرى (828) من طرق عن رافع بن سلمة بن زياد، حَدَّثَنِي حشرج بن زياد، عن جدته، فذكرته.

في إسناده رافع بن سلمة بن زياد روى عنه جمع، وذكره ابن حبَّان في الثّقات، وجهل حاله ابن حزم، وابن القطان كل ذلك ذكره ابن حجر في التهذيب، ومع ذلك قال في التقريب:"ثقة". والصحيح أنه"مقبول" أي عند المتابعة.

وفيه أيضًا حشرج بن زياد لم يرو عنه إِلَّا رافع بن سلمة بن زياد ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة. وقال ابن حزم وابن القطان: مجهول. وقال الذّهبيّ: لا يعرف.

قال الخطّابي: إسناده ضعيف لا تقوم الحجة بمثله.




উমাইর মাওলা আবিল লাহাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খায়বার যুদ্ধে আমার মনিবদের সাথে উপস্থিত ছিলাম। তারা আমার ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে জানালেন যে, আমি একজন ক্রীতদাস। তিনি বললেন: অতঃপর তিনি আমাকে নির্দেশ দিলেন, তাই আমি তলোয়ার ধারণ করলাম। কিন্তু আমি তা টেনে নিয়ে যাচ্ছিলাম। অতঃপর তিনি আমার জন্য কিছু নিকৃষ্ট মালপত্রের ব্যবস্থা করার নির্দেশ দিলেন। আর আমি তাঁর সামনে একটি রুকইয়াহ (ঝাড়-ফুঁক) পেশ করলাম, যা দ্বারা আমি পাগলদের ঝেড়ে দিতাম। অতঃপর তিনি সেটির কিছু অংশ বর্জন করতে এবং কিছু অংশ রাখতে আদেশ দিলেন।

অন্য বর্ণনায় আছে: আর তিনি আমাকে নিকৃষ্ট মালপত্র দিলেন, কিন্তু তিনি আমার জন্য কোনো অংশ নির্ধারণ করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (7874)


7874 - عن ابن عمر قال: إنّما تغيّب عثمان عن بدر، فإنه كانت تحته بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم وكانت مريضة، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"إن لك أجر رجل ممن شهد بدر وسهمه".

صحيح: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3130)، عن موسى، حَدَّثَنَا أبو عوانة، حَدَّثَنَا عثمان بن موهب، عن ابن عمر فذكره.

ورواه أبو داود (2726) عن محبوب بن موسى، أخبرنا أبو إسحاق الفزارى، عن كليب بن وائل، عن هانئ بن قيس، عن حبيب بن أبي مليكة، عن ابن عمر قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام - يعني يوم بدر - فقال:"إن عثمان انطلق في حاجة الله وحاجة رسول الله وإني أبايع له". فضرب له رسول الله صلى الله عليه وسلم بسهم ولم يضرب لأحد غاب غيره.

وإسناده لا بأس به، هانئ بن قيس روى عنه جمع وذكره ابن حبَّان في ثقاته.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর যুদ্ধ থেকে অনুপস্থিত ছিলেন, কারণ তাঁর কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ছিলেন এবং তিনি অসুস্থ ছিলেন। অতঃপর নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "নিশ্চয়ই বদরে অংশগ্রহণকারী একজন লোকের সমান সওয়াব এবং তার (গনিমতের) অংশ তোমার জন্য রয়েছে।"

(ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত) তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন দাঁড়িয়ে বললেন: "নিশ্চয়ই উসমান আল্লাহ এবং আল্লাহর রাসূলের প্রয়োজনে গিয়েছে এবং আমি তার পক্ষ থেকে বাইয়াত গ্রহণ করছি।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য (গনিমতের) অংশ নির্ধারণ করে দিলেন এবং উসমান ছাড়া অনুপস্থিত আর কারও জন্য (অংশ) নির্ধারণ করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (7875)


7875 - عن أبي موسى قال: بلغنا مخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ونحن باليمن، فخرجنا مهاجرين إليه
أنا وأخوان ليّ، أنا أصغرهم، أحدهما أبو بردة والآخر أبو رهم، إما قال: في بضع وإما قال: في ثلاثة وخمسين أو اثنين وخمسين رجلًا من قومي، فركبنا سفينة، فألقتنا سفينتنا إلى النجاشي بالحبشة ووافقنا جعفر بن أبي طالب وأصحابه عنده فقال جعفر: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثنا هاهنا، وأمرنا بالإقامة فأقيموا معنا، فأقمنا معه حتَّى قدّمنا جميعًا فوافقنا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حين افتتح خيبر، فأسهم لنا أو قال: فأعطانا منها وما قسم لأحد غاب عن فتح خيبر منها شيئًا إِلَّا لمن شهد معه إِلَّا أصحاب سفينتنا مع جعفر وأصحابه قسم لهم معهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3136)، ومسلم في فضائل الصّحابة (2502) كلاهما عن محمد بن العلاء الهمداني - وزاد مسلم عبد الله بن براد الأشعري - عن أبي أسامة، حَدَّثَنَا بُريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন ইয়ামানে ছিলাম, তখন আমাদের কাছে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মক্কা থেকে) হিজরতের খবর পৌঁছল। তাই আমরা তাঁর দিকে হিজরতকারী হিসেবে বেরিয়ে পড়লাম—আমি এবং আমার দুই ভাই। আমি তাদের মধ্যে সবচেয়ে ছোট, তাদের একজন আবূ বুরদাহ এবং অন্যজন আবূ রুহম। বর্ণনাকারী বলেন: তিনি হয়তো বলেছেন: আমরা আমাদের গোত্রের পঞ্চাশের অধিক অথবা বাষট্টি বা তিপ্পান্ন জন লোক ছিলাম। আমরা নৌকায় আরোহণ করলাম। আমাদের নৌকা আমাদের আবিসিনিয়ার (হাবশা) নাজ্জাশীর (বাদশাহর) কাছে পৌঁছালো। সেখানে আমরা জা'ফর ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তাঁর সাথীদের সাক্ষাৎ পেলাম। তখন জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এখানে পাঠিয়েছেন এবং এখানে থাকার নির্দেশ দিয়েছেন। তোমরাও আমাদের সাথে থেকে যাও। সুতরাং আমরা তাঁর সাথে থাকলাম, এরপর আমরা সবাই একসাথে (মদীনায়) পৌঁছলাম। আমরা যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম, তখন তিনি খায়বার জয় করছিলেন। তিনি আমাদের অংশ দিলেন (অর্থাৎ গনীমতের ভাগ দিলেন) অথবা তিনি বললেন: তিনি আমাদের তা থেকে দিলেন। যারা খায়বার বিজয়ে অনুপস্থিত ছিল, তাদের কাউকেই তিনি কিছু ভাগ দেননি, শুধুমাত্র যারা তাঁর সাথে উপস্থিত ছিল তারা ব্যতীত। তবে আমাদের নৌকার সাথীরা, যারা জা'ফর ও তাঁর সাথীদের সাথে ছিল, তাদেরকে তাদের সাথে ভাগ দেওয়া হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7876)


7876 - عن عبد الله بن مغفل قال: كنا محاصرين قصر خيبر فرمى إنسانٌ بجراب فيه شحمٌ، فنزوتُ لآخذه فالتفتُّ فإذا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فاستحييتُ منه.

وفي لفظ: أصبت جرابا من شحم يوم خيبر قال: فالتزمته فقلت: لا أعطي اليوم أحدًا من هذا شيئًا، قال: فالتفت فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم متبسما.

متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3153)، ومسلم في الجهاد والسير (1772: 73) كلاهما من طريق شعبة، حَدَّثَنِي حميد بن هلال، سمعت عبد الله بن مغفّل. فذكره.

واللّفظ الآخر لمسلم (1772: 72) من طريق سليمان بن المغيرة، حَدَّثَنَا حميد بن هلال به فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আমরা খাইবারের কেল্লা অবরোধ করে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি চর্বি ভর্তি একটি মশ্ক (চামড়ার থলে) নিক্ষেপ করল। আমি সেটা নেওয়ার জন্য লাফিয়ে উঠলাম। এরপর ফিরে তাকাতেই দেখি যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে উপস্থিত। তখন আমি তাঁর প্রতি লজ্জাবোধ করলাম।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি খাইবারের দিন এক মশ্ক চর্বি পেলাম। তিনি বলেন: আমি সেটি শক্ত করে আঁকড়ে ধরলাম এবং বললাম: আজ আমি এটা থেকে কাউকে কিছুই দেব না। তিনি বলেন: এরপর ফিরে তাকাতেই দেখি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7877)


7877 - عن عبد الله بن عمر قال: كنا نصيب في مغازينا العسل والعنب فنأكله ولا نرفعه.

صحيح: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3154) عن مسدّد، حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আমাদের সামরিক অভিযানে মধু ও আঙ্গুর লাভ করতাম, অতঃপর আমরা তা খেয়ে ফেলতাম এবং তা (গণীমতের মাল হিসেবে) জমা রাখতাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (7878)


7878 - عن ابن عمر: أن جيشا غنموا في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم طعاما وعسلا، فلم يؤخذ منهم الخمس.

صحيح: رواه أبو داود (2701)، وصحّحه ابن حبَّان (4825) والبيهقي (9/ 59) كلّهم من طرق عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده صحيح.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে একটি সৈন্যদল খাদ্য ও মধু যুদ্ধলব্ধ সম্পদ হিসেবে লাভ করেছিল। কিন্তু তাদের থেকে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) গ্রহণ করা হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (7879)


7879 - عن رافع بن خديج قال: كنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بذي الحليفة، فأصاب الناس جوع،
وأصبنا إبلا وغنما وكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في أخريات الناس فعجلوا فنصبوا القدور، فأمر بالقدور فأكفئت، ثمّ قسم فعدل عشرة من الغنم ببعير، فندَّ منها بعير، وفي القوم خيل يسيرة فطلبوه فأعياهم فأهوى إليه رجل بسهم، فحبسه الله، فقال:"هذه البهائم لها أوابد كأوابد الوحش فما ندّ عليكم فاصنعوا به هكذا" فقال جدّي: إنا نرجو أو نخاف أن نلقى العدو غدا، وليس معنا مدى أفنذبح بالقصب؟ فقال:"ما أنهر الدم وذكر اسم الله عليه فكلوه ليس السن والظفر، وسأحدّثكم عن ذلك، أما السن فعظم، وأمّا الظفر فمدى الحبشة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3075)، ومسلم في الأضاحي (1968: 20) كلاهما من طريق سعيد بن مسروق، عن عباية بن رفاعة بن رافع بن خديج، عن جده رافع .. فذكره.




রাফে' ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যুল-হুলাইফাতে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। তখন লোকেরা ক্ষুধায় আক্রান্ত হলো। আমরা কিছু উট ও বকরী লাভ করলাম। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন লোকদের পেছনে ছিলেন। তারা তাড়াতাড়ি করে হাঁড়িগুলো বসিয়ে দিলো। তিনি হাঁড়িগুলো উপুড় করে দিতে নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বণ্টন করলেন, আর একটি উটের বদলে দশটি বকরীকে সমমূল্য ধরলেন। সেগুলোর মধ্য থেকে একটি উট পালিয়ে গেলো। আর দলটির কাছে কম সংখ্যক ঘোড়া ছিল। তারা সেটির পেছনে ধাওয়া করলো, কিন্তু তারা সেটিকে কাবু করতে পারলো না। তখন এক ব্যক্তি তীর ছুঁড়ে সেটিকে আল্লাহর ইচ্ছায় থামিয়ে দিলো। তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই গৃহপালিত পশুগুলোরও বন্য পশুর মতো মাঝে মাঝে বিদ্রোহভাব বা পালিয়ে যাওয়ার প্রবণতা দেখা যায়। তাই তোমাদের কাছ থেকে যে পশু পালিয়ে যায়, তার সঙ্গে তোমরা এরূপই করবে।" (রাফে' এর দাদা) বললেন: আমরা আশা করি (বা আমাদের আশঙ্কা হয়) যে, আগামীকাল আমরা শত্রুর মুখোমুখি হবো, আর আমাদের কাছে ছুরি নেই। আমরা কি বাঁশের কঞ্চি দিয়ে যবেহ করতে পারবো? তিনি বললেন, "যা রক্ত প্রবাহিত করে এবং যার ওপর আল্লাহর নাম স্মরণ করা হয়, তা তোমরা খাও। তবে দাঁত ও নখ দিয়ে নয়।" "আর আমি তোমাদের এ সম্পর্কে জানাবো: দাঁত হলো হাড় এবং নখ হলো হাবশাবাসীদের ছুরি।"









আল-জামি` আল-কামিল (7880)


7880 - عن ثعلبة بن الحكم قال: أصبنا غنما للعدو، فانتهبناها فنصبنا قدورنا، فمرّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالقدور، فأمر بها فأكفئت ثمّ قال:"إن النهبة لا تحل".

حسن رواه ابن ماجة (3938) - واللّفظ له - والطيالسي (1291)، وعبد الرزّاق (18841)، وصحّحه الحاكم (2/ 134) كلّهم من طرق عن سماك، عن ثعلبة بن الحكم .. فذكره.

وجاء عند عبد الرزّاق والحاكم أن ذلك كان يوم خيبر.

ورواه ابن حبَّان (5169) من طريق شريك، عن سماك به، إِلَّا أن فيه:"يوم حنين" بدل خيبر.

وجزم البخاريّ في التاريخ الكبير (2/ 173) بأن خيبر هو الأصح.

وإسناده حسن من أجل سماك بن حرب فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه لحديث سماك بن حرب، فإنه رواه مرة عن ثعلبة بن الحكم، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم".

قل: جزم البخاريّ في التاريخ الكبير (2/ 173) بأن ذكر ابن عباس في إسناد هذا الحديث لا يصح، وكذلك قال أبو زرعة وأبو حاتم. انظر: العلل (2222).




ছা'লাবাহ ইবনুল হাকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা শত্রুদের কিছু ভেড়া হস্তগত করলাম এবং সেগুলোকে লুট হিসেবে গ্রহণ করলাম। এরপর আমরা আমাদের রান্নার হাঁড়ি পাতলাম। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাঁড়িগুলোর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি সেগুলোকে উল্টে দেওয়ার আদেশ দিলেন। এরপর বললেন: "নিশ্চয় নোহবা (লুটের মাল, যা গনিমত হিসেবে বণ্টিত হয়নি) হালাল নয়।"