হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7961)


7961 - عن ربيع الأنصاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عاد ابن أخي جبر الأنصاري فجعل أهله يبكون عليه فقال لهم جبر: لا تؤذوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دعهن فليبكين ما دام حيا فإذا وجب فليسكتن" فقال بعضهم: ما كنا نرى أن يكون موتك على فراشك حتَّى تقتل في سبيل الله مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أو ما الشهادة إِلَّا في القتل في سبيل الله؟ إن شهداء أمتي إذن لقليل: إن الطعن والطاعون شهادة، والبطن شهادة، والنفساء بجمع شهادة، والحرق شهادة، والغرق شهادة والهدم شهادة، وذات الجنب شهادة".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (5/ 65) من طرق عن جرير (هو ابن عبد الحميد)، عن عبد الملك بن عمير، عن الربيع الأنصاري .. فذكره.

ورواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2191) من طريق جرير بن عبد الحميد به مقتصرًا على جزء البكاء.

قال المنذري في الترغيب والترهيب (2184): رواته محتج به في الصَّحيح.

وتبعه الهيثميّ في مجمع الزوائد (5/ 300) فقال: رجاله رجال الصَّحيح.

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبد الملك بن عمير وهو إن كان من رجال الصَّحيح، ولكنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وقد ذكر الدَّارقطنيّ في علله (13/ 414) الاختلاف عليه ولكنه لا يؤثر في تحسين الحديث.




রবীয় আনসারী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম জাবর আল-আনসারীর ভাতিজাকে দেখতে গেলেন, তখন তার পরিবারের লোকেরা তার জন্য কাঁদতে শুরু করল। জাবর তাদের বললেন: তোমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে কষ্ট দিও না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তাদের কাঁদতে দাও, যতক্ষণ সে জীবিত আছে। যখন সে মৃত্যুবরণ করবে (মৃত্যু অবধারিত হবে), তখন যেন তারা চুপ করে যায়।" তখন তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলল: আমরা তো মনে করেছিলাম যে আপনার মৃত্যু আল্লাহর পথে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে নিহত হওয়ার মাধ্যমেই হবে, আপনার বিছানায় নয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "শাহাদাহ (শাহাদাত) কি শুধু আল্লাহর পথে নিহত হওয়ার মধ্যেই সীমাবদ্ধ? তাহলে তো আমার উম্মতের শহীদগণ সংখ্যায় খুবই কম হবে। নিশ্চয়ই, আঘাত এবং প্লেগ (তাঊন) শাহাদাত, পেটের রোগ শাহাদাত, প্রসবজনিত কারণে (সন্তানসহ) মৃত্যুবরণকারী নারী শাহাদাত, আগুনে পোড়া শাহাদাত, পানিতে ডোবা শাহাদাত, চাপা পড়ে (ধ্বংসস্তূপে) মৃত্যু শাহাদাত এবং ফুসফুসের আবরণীর প্রদাহে (যাতুল জানব) মৃত্যুও শাহাদাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (7962)


7962 - عن عتبة بن عبد السلمي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يأتي الشهداء والمتوفون بالطاعون فيقول أصحاب الطاعون: نحن شهداء، فيقال: انظروا، فإن كانت جراحهم كجراح الشهداء تسيل دما ريحَ المسك فهم شهداء فيجدونهم كذلك".

حسن: رواه أحمد (17651) عن الحكم بن نافع، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن عتبة بن عبد السلمي .. فذكره.

وإسناده حسن، فإن إسماعيل بن عَيَّاش صدوق في روايته عن أهل الشام، وضمضم بن زرعة
صدوق حمصي.

وحسّن ابن حجر إسناده في الفتح (10/ 194).

وكذا قال أيضًا في بذل الماعون (ص 196):"هذا حديث حسن".




উতবাহ ইবনে আব্দুস সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: শহীদগণ এবং যারা প্লেগ (মহামারি) রোগে মৃত্যুবরণ করেছে তারা (একসাথে আল্লাহর সামনে) উপস্থিত হবে। তখন প্লেগ রোগে মৃত ব্যক্তিরা বলবে: আমরা তো শহীদ। তখন বলা হবে: তোমরা লক্ষ্য করো, যদি তাদের যখমগুলো শহীদের যখমের মতো হয়, তা থেকে রক্ত ঝরছে এবং তাতে কস্তুরীর সুঘ্রাণ রয়েছে, তাহলে তারা শহীদ। অতঃপর তাদেরকে সেভাবেই পাওয়া যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (7963)


7963 - عن العرباض بن سارية قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يختصم الشهداء والمتوفون على فرشهم إلى الله عز وجل في الذين ماتوا من الطاعون فيقول الشهداء: إخواننا قتلوا، ويقول المتوفون على فرشهم: إخواننا ماتوا على فرشهم كما متنا، فيقضي الله بينهم: أن انظروا إلى جراحات المطعونين فإنْ أشبهت جراحات الشهداء فهم منهم، فينظرون إلى جراح المطعونين، فإذا هي قد أشبهت جراح الشهداء، فيلحقون معهم".

حسن: رواه أحمد (17164) عن أبي اليمان، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن ابن أبي بلال، عن العرباض بن سارية قال فذكره.

ولعل الحديث كان عند إسماعيل بن عَيَّاش بإسنادين من مسند عتبة بن عبد السلميّ، ومن مسند العرباض بن سارية.

ورواه النسائيّ (3164)، وأحمد (17159) من طرق عن بقية بن الوليد قال: حَدَّثَنِي بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن ابن أبي بلال، عن العرباض. نحوه.

وحسّن إسناده البزّار (4194)، وابن حجر في الفتح (10/ 194).

وقال ابن حجر في بذل الماعون (ص 197):"وهذا حديث حسن صحيح، أخرجه أحمد عن حيوة بن شريح، ويزيد بن عبد ربه كلاهما عن بقية، وهو صدوق ليس فيه قادح إِلَّا تدليسه وقد صرّح بالتحديث فأمن تدليسه، وابن أبي بلال المذكور شامي ثقة، اسمه عبد الله".

قلت: وهو كما قال، لولا أن فيه عبد الله بن أبي بلال فإنه لم يعرف أنه رواه عنه غير خالد بن معدان، ولم يؤثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان، ذكره في الثّقات (5/ 49)، ولذا قال في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا، ومع ذلك قال فيه ابن حجر: شامي ثقة. فلعله وقف على توثيق أحد. والله أعلم.




ইরবাদ ইবনে সারিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "শহীদগণ এবং যারা নিজেদের বিছানায় মৃত্যুবরণ করেছে, তারা মহামারি (তাউন)-এ মৃত্যুবরণকারী ব্যক্তিদের ব্যাপারে মহান আল্লাহর কাছে বিতর্কে লিপ্ত হবে। তখন শহীদগণ বলবেন: তারা আমাদের ভাই, তারা (যুদ্ধের ময়দানে) নিহত হয়েছে। আর যারা বিছানায় মারা গিয়েছে, তারা বলবে: তারা আমাদের ভাই, তারা তাদের বিছানায়ই মারা গিয়েছে, যেমন আমরা মারা গিয়েছি। অতঃপর আল্লাহ তাদের মাঝে ফয়সালা দেবেন: তোমরা প্লেগ আক্রান্তদের আঘাতগুলো দেখো। যদি তাদের আঘাতগুলো শহীদদের আঘাতের অনুরূপ হয়, তবে তারা শহীদদের দলভুক্ত। এরপর তারা প্লেগ আক্রান্তদের আঘাতগুলো দেখবে এবং দেখতে পাবে যে তা শহীদদের আঘাতের অনুরূপ, ফলে তাদের শহীদদের সাথে যুক্ত করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7964)


7964 - عن عبد الله بن بسر المازني قال: عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم سعد بن عبادة فقال:"ما تعدون الشهداء من أمتي؟" قال: قال ذلك ثلاثًا. قلنا: الله ورسوله أعلم. قال سعد بن عبادة: إن شاء رسول الله صلى الله عليه وسلم أذن لي فأخبرته من الشهداء من أمته قال:"فأخبرني مَن الشهداءُ من أمتي؟" قال: أسندوني فأسندوه فقال:"من آمن بالله وجاهد في سبيل الله وقاتل حتَّى قتل فهو شهيد"، قال:"إنَّ شهداء أمتي إذًا لقليل، القتيل في سبيل الله شهيد، والمبطون شهيد، والمطعون شهيد، والغريق شهيد، والنفساء شهيد".
حسن: رواه الطبرانيّ في مسند الشاميين (1508) - ومن طريقه الضياء في المختارة (9/ 87) - عن هاشم بن مرثد الطبرانيّ، ثنا أبو صالح الفراء، ثنا أبو إسحاق الفزاريّ، عن الأوزاعيّ، عن العلاء بن الحارث، عن عبد الله بن بسر قال .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي صالح الفراء (وهو محبوب بن موسى)؛ فإنه حسن الحديث كما في التقريب، ومن أجل هاشم بن مرثد الطبرانيّ شيخ الطبرانيّ، فإن الأقرب في حاله أنه يحسن حديثه إذا لم يخالف، ولم يأت بما ينكر عليه، فقد قال الخليلي في الإرشاد (2/ 484): ثقة لكنه صاحب غرائب.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 301):"رواه الطبرانيّ ورجاله رجال الصَّحيح غير أبي صالح الفراء وهو ثقة".

ولكن نقل الذّهبيّ في الميزان (4/ 290) عن ابن حبَّان أنه قال في هاشم بن مرثد: ليس بشيء ولم أقف عليه في المجروحين. والله أعلم.




আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর আল-মাযিনী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সা'দ ইবনু উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে গেলেন এবং বললেন: "আমার উম্মতের মধ্যে তোমরা কাদের শহীদ বলে গণ্য করো?" বর্ণনাকারী বলেন: তিনি এই কথা তিনবার বললেন। আমরা বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। সা'দ ইবনু উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অনুমতি দেন, তবে আমি তাঁকে তাঁর উম্মতের শহীদদের সম্পর্কে জানাবো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমার উম্মতের শহীদ কারা, আমাকে জানাও।" তিনি (সা'দ) বললেন: আমাকে ঠেস দিয়ে বসাও। অতঃপর তারা তাকে ঠেস দিয়ে বসালো। এরপর তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর প্রতি ঈমান আনল, আল্লাহর পথে জিহাদ করল এবং যুদ্ধ করতে করতে নিহত হলো, সে-ই শহীদ।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তবে তো আমার উম্মতের শহীদ খুবই কম! (বরং) আল্লাহর পথে নিহত ব্যক্তি শহীদ, আর পেটের পীড়ায় মৃত ব্যক্তি শহীদ, মহামারীতে (প্লেগে) মৃত ব্যক্তি শহীদ, এবং পানিতে ডুবে মৃত ব্যক্তি শহীদ, আর সন্তান প্রসবের পর (বা প্রসবকালে) মৃত মহিলা শহীদ। (এরাও শহীদ)।"









আল-জামি` আল-কামিল (7965)


7965 - عن عبادة بن الصَّامت قال: عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم عبد الله بن رواحة فما تحوَّز له عن فراشه فقال:"من شهداء أمتي؟" قالوا: قتل المسلم شهادة قال:"إنَّ شهداء أمتي إذا لقليل: قتل المسلم شهادة، والطاعون شهادة، والبطن والغرق والمرأة يقتلها ولدها جُمْعًا".

صحيح: رواه أحمد (17797، 22756، 22684)، والطيالسي (583) من طرق عن شعبة، عن أبي بكر بن حفص (وهو عبد الله بن حفص بن عمر الزهري) قال: سمعت أبا مصبّح - أو ابن مصبح شكَّ أبو بكر - عن شرحبيل بن السمط، عن عبادة بن الصَّامت .. فذكره.

والسياق لأحمد. وزاد الطيالسي:"والبطن شهادة".

وإسناده صحيح، وأبو مصبّح هو المقرائي المعروف بكنيته ولا يعرف اسمه، وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

وقوله:"فما تحوّز" أي ما تنحّى.

وقوله:"جُمْعا" بضم الجيم، وسكون الميم، أي حال كون الولد مجموعا إليها والمعنى: ماتت وهو في طنها.

وأمّا ما رُوي عن راشد بن حبيش نحوه عند أحمد (15998) فلا يصح، فإن فيه انقطاعا واختلافا في الإسناد، وراشد مختلف في صحبته، وذكر ابن حجر في الإصابة (3/ 453) عن ابن منده أنه قال: إن الصواب: عن راشد، عن عبادة. والله أعلم.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে গেলেন। কিন্তু তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা) তাঁর বিছানা থেকে সরে গেলেন না। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "আমার উম্মতের শহীদ কারা?" তারা বলল: মুসলিমের নিহত হওয়া শাহাদাত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তো আমার উম্মতের শহীদ সংখ্যা কম। (শহীদ হলো:) মুসলিমের নিহত হওয়া শাহাদাত, প্লেগ (মহামারি) শাহাদাত, পেট সংক্রান্ত রোগে মৃত্যু, ডুবে যাওয়া এবং সন্তান প্রসবকালে যে নারী মারা যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (7966)


7966 - عن أبي مالك الأشعرى قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من فصل في سبيل الله فمات أو قتل فهو شهيد، أو وقصه فرسه أو بعيره، أو لدغته هامة، أو مات على فراشه بأي حتف شاء الله، فإنه شهيد، وإن له الجنّة".
حسن: رواه أبو داود (2499)، والحاكم (2/ 72)، والبيهقي (9/ 166)، وابن أبي عاصم في الجهاد (54، 235) كلّهم من حديث عبد الوهّاب بن نجدة: حَدَّثَنَا بقية بن الوليد قال: حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبيه يرده إلى مكحول إلى عبد الرحمن بن غنم الأشعرى، أن أبا مالك الأشعرى قال .. فذكره.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه".

وتعقبه الذّهبيّ فقال: ابن ثوبان لم يحتج به مسلم وليس بذاك، وبقية ثقة، وعبد الرحمن بن غنم لم يدركه مكحول فيما أظن.

قلت: ابن ثوبان هذا هو عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان، وهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.

وأمّا الظن بعدم إدراك مكحول لعبد الرحمن بن غنم فمحلُّ نظر، فإن عبد الرحمن بن غنم مات سنة (78)، ومكحول توفي سنة (112) وقيل: سنة (118) فبين وفاتيهما قرابة أربعين سنة، فلقاؤهما ممكن لأن كلا منهما شاميّ، ولم ينص أحد من المتقدمين على عدم سماعه منه.

وفي الإسناد بقية بن الوليد إِلَّا أنه صرّح في بعض مصادر التخريج بالتحديث ومن أجله ومن أجل عبد الرحمن بن ثابت صار الحديث حسنا. وبالله التوفيق.

وفي معناه ما رُوي عن زيد بن عليّ بن الحسين، عن أبيه، عن جده مرفوعًا:"من قتل دون ماله فهو شهيد" وفيه انقطاع على الأرجح.

رواه أحمد في مسند عليّ بن أبي طالب من المسند (590)، وأبو يعلى في مسند الحسين بن عليّ بن أبي طالب من مسنده (6775) كلاهما عن يعقوب بن عيسى جار أحمد بن حنبل، حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن عبد العزيز بن المطلب، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله، عن زيد بن عليّ بن الحسين بن عليّ، عن أبيه، عن جده .. فذكره. وعند أبي يعلى"حقه" بدل"ماله".

قال ابن حجر في أطراف المسند (2258) بعد ما ساق الحديث وإسناده من مسند أحمد:"وقع هذا في مسند عليّ بن أبي طالب، والسياق يقتضي أنه من مسند الحسين فأوردته فيه ثمّ رأيته بعد هذا في مسند إسحاق بن راهويه، أخرجه عن أبي عامر العقدي عن عبد العزيز بن المطلب عن عبد الرحمن بن الحارث عن زيد بن عليّ بن الحسين عن أبيه، عن عليّ بن أبي طالب فيحول إلى مسند عليّ مع إرساله". وانظر أيضًا إتحاف المهرة (11/ 579).

قلت: يشير ابن حجر بالإرسال إلى الانقطاع بين عليّ بن الحسين بن عليّ بن أبي طالب الهاشمي المعروف بزين العابدين، وبين عليّ بن أبي طالب؛ فإن زين العابدين لم يُدرك عليًّا كما قال أبو زرعة، والترمذيّ، والبيهقي وغيرهم.

وفي الباب أيضًا عن عقبة بن عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خمس من قبض في شيء منهن فهو
شهيد: المقتول في سبيل الله شهيد، والغرق في سبيل الله شهيد، والمبطون في سبيل الله شهيد، والمطعون في سبيل الله شهيد، والنفساء في سبيل الله شهيد".

رواه النسائيّ (3163)، وأبو عوانة (7476) عن يونس بن عبد الأعلى قال: حَدَّثَنَا ابن وهب، قال: حَدَّثَنِي عبد الرحمن بن شريح، عن عبد الله بن ثعلبة الحضرمي أنه سمع ابن حجيرة يخبر، عن عقبة بن عامر .. فذكره.

ورواه عبد الله بن المبارك في الجهاد (198) - ومن طريقه الطبرانيّ (17/ 326) - عن عبد الرحمن بن شريح به، نحوه.

وفي إسناده عبد الله بن ثعلبة الحضرمي لا يُعرف له راوٍ غير عبد الرحمن بن شريح، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته (7/ 27)، ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا فهو لين الحديث. وابن حجيرة اسمه عبد الرحمن.

ورواه أحمد (17434) عن حسن (وهو ابن موسى الأشيب) حَدَّثَنَا ابن لهيعة، حَدَّثَنَا وهب بن عبد الله عن عبد الرحمن بن شماسة عن عقبة بن عامر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الميت من ذات الجنب شهيد".

وفي إسناده عبد الله بن لهيعة وفيه كلام معروف.

وفي الباب أيضًا عن مخارق قال: جاء رجل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: الرّجل يأتيني فيريد مالي؟ قال:"ذكّره بالله" قال: فإن لم يذكر؟ قال:"فاستعنْ عليه من حولك من المسلمين" قال: فإن لم يكن حولي أحد من المسلمين؟ قال:"فاستعن عليه بالسلطان" قال: فإن نأى السلطان عني قال:"قاتل دون مالك حتَّى تكون من شهداء الآخرة أو تمنع مالك".

رواه النسائيّ (4081)، وأحمد (22513 - 22514)، والبيهقي (8/ 336) من طرق عن سماك بن حرب، عن قابوس بن مخارق، عن أبيه. فذكره. والسياق للنسائي.

وقابوس لا بأس به، وسماك بن حرب صدوق، وتغير بأخرة لكن إذا روى عنه شعبة والثوري وأبو الأحوص فأحاديثهم عنه سليمة، كما حكى السهمي في أسئلته (ص 90) عن الدَّارقطنيّ. وهذا مما رواه أبو الأحوص والثوري عنه، كما عند النسائيّ.

ولكن مخارق مختلف في صحبته، والأقرب أنه تابعيّ، فإنه لم يصح عندي ما يثبت به صحبته فالحديث مرسل. والله أعلم.

وفي الباب أيضًا عن صفوان بن أمية قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطاعون والمبطون والغريق والنفساء شهادة".

رواه النسائيّ (2054) عن عبيد الله بن سعيد، حَدَّثَنَا يحيى (وهو القطان)، عن التيمي (وهو سليمان بن طرخان)، عن أبي عثمان (هو النهدي)، عن عامر بن مالك، عن صفوان بن أمية قال
فذكره. إِلَّا أنه لم يرفعه.

ورواه أحمد (15301) عن يحيى بن سعيد - و (15308) عن محمد بن أبي عدي - كلاهما عن سليمان، به.

وقال سليمان التيمي: وحدثنا أبو عثمان مرارًا ورفعه مرة إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

وفي إسناده عامر بن مالك قال ابن المديني: لا أعلم روى عنه غير أبي عثمان.

ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته (5/ 191)، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا، فهو ليّن الحديث.

وفي الباب أيضًا عن سويد بن مقرن قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل دون مظلمته فهو شهيد".

رواه النسائيّ (4096) عن القاسم بن زكريا بن دينار، حَدَّثَنَا سعيد بن عمرو الأشعثيّ، حَدَّثَنَا عبثر، عن مطرف، عن سوادة بن أبي الجعد، عن أبي جعفر قال: كنت جالسًا عند سويد بن مقرن .. فذكر الحديث.

وفي إسناده سوادة بن أبي الجعد ويقال: ابن الجعد لم يرو عنه غير مطرف بن طريف، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته (6/ 429) ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا فهو لين الحديث.

وقد روي من وجه آخر مرفوعًا ومرسلا رواه النسائيّ (4092، 4093) وغيره، ورجّح النسائيّ أن الصواب مرسل.




আবু মালিক আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (জিহাদের উদ্দেশ্যে) বের হলো, অতঃপর সে মারা গেল অথবা নিহত হলো, সে শহীদ। অথবা তাকে তার ঘোড়া বা উট পিষে মারল, অথবা কোনো বিষাক্ত প্রাণী তাকে দংশন করল, অথবা আল্লাহ যা চেয়েছেন, সেভাবে নিজ বিছানায় মৃত্যুবরণ করল—তবে সে অবশ্যই শহীদ, আর তার জন্য রয়েছে জান্নাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (7967)


7967 - عن محمد بن زياد الألهاني قال: ذكر عند أبي عنبة الخولاني الشهداء فذكروا المبطون، والمطعون، والنفساء، فغضب أبو عنبة وقال: حَدَّثَنَا أصحاب نبينا عن نبينا صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إنَّ شهداء الله في الأرض: أمناء الله في الأرض من خلقه، قتلوا أو ماتوا".

حسن: رواه أحمد (17786) عن أبي اليمان قال: حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن محمد بن زياد الألهاني .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عَيَّاش، فإنه صدوق في روايته عن أهل الشام وهذه منها.

وأمّا ما غضب عليه أبو عنبة الخولاني - وهو كون المطعون والمبطون والنفساء هم الشهداء - فلعل غضبه كان سببه ما فهم من قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنَّ شهداء الله في الأرض أمناء في الأرض من خلقه" فليس هولاء الذين ذكروا عنده هم الشهداء فقط.

ولكن المعنى الصَّحيح لقوله صلى الله عليه وسلم:"إن شهداء الله في الأرض هم أمناء من خلقه" بمعنى الشهود لا الشهداء الذين يقتلون في سبيل الله، وأطلق الشهداء أيضًا على الشهود مثل قوله صلى الله عليه وسلم:"أنتم شهداء الله في الأرض" قاله حين أثنى الناس على جنازة بخير، وعلى أخرى بشرٍّ كما في حديث أنس المتفق عليه. والله أعلم.




মুহাম্মাদ ইবনু যিয়াদ আল-আলহানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু আনবাহ আল-খাওলানীর নিকট শহীদদের প্রসঙ্গ আলোচিত হচ্ছিল। তখন তারা পেটের পীড়ায় মৃত ব্যক্তি (মাবতূন), প্লেগে মৃত ব্যক্তি (মাত'উন) এবং প্রসবকালীন মৃত নারীর (নাফসاء) কথা উল্লেখ করল। এ শুনে আবু আনবাহ ক্রোধান্বিত হলেন এবং বললেন: আমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবীগণ আমাদের নিকট আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: "নিশ্চয় যমীনে আল্লাহর শহীদগণ (বা সাক্ষীগণ) তাঁর সৃষ্টির মধ্যে আল্লাহর আমানতদার (বা বিশ্বস্ত), তারা নিহত হোক বা মৃত্যুবরণ করুক।"









আল-জামি` আল-কামিল (7968)


7968 - عن أبي فاطمة قال: قلت: يا رسول الله، حدثْني بعمل أستقيم عليه، وأعمله. قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عليك بالهجرة فإنه لا مثل لها".

حسن: رواه النسائيّ (4167) عن هارون بن محمد بن بكار بن بلال، عن محمد (وهو ابن عيسى بن سميع) قال: حَدَّثَنَا زيد بن واقد، عن كثير بن مرة أن أبا فاطمة حدَّثه، أنه قال: يا رسول الله .. فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عيسى بن سميع، فإنه حسن الحديث.

وأبو فاطمة هو الأزديّ، وقيل: الدوسيّ، وقيل: الليثي صحابي شهد فتح مصر، ونزل الشام.

واختلف في اسمه: فقيل أنيس، وقيل: عبد الله بن أنيس.




আবু ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে এমন একটি আমলের কথা বলুন যার উপর আমি অবিচল থাকতে পারি এবং তা করতে পারি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তুমি হিজরতকে আবশ্যক করে নাও, কারণ এর কোনো তুলনীয় (আমল) নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (7969)


7969 - عن خبّاب قال: هاجرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم نبتغي وجه الله، ووجب أجرنا على الله، فمنا من مضى لم يأكل من أجره شيئًا. منهم مصعب بن عمير قتل يوم أحد، فلم نجد شيئًا نكفنه فيه إِلَّا نمرة، كنا إذا غطينا بها رأسه خرجتْ رجلاه، فإذا غطينا رجليه خرج رأسه. فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نغطي رأسه بها، ونجعل على رجليه من إذخر، ومنا من أينعتْ له ثمرته فهو يهدبها.

صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3914) عن مسدد، حَدَّثَنَا يحيى، عن الأعمش، قال: سمعت شقيق بن سلمة، قال: حَدَّثَنَا خبّاب قال .. فذكره.

وقوله: يهْدبها - من الهدب وهو الاجتناء.




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহ্‌র সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে আল্লাহ্‌র রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে হিজরত করেছিলাম এবং আমাদের প্রতিদান আল্লাহ্‌র উপর আবশ্যক হয়ে গিয়েছিল। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ এমন ছিলেন, যারা চলে গেছেন (মৃত্যুবরণ করেছেন) কিন্তু তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যতমও উপভোগ করেননি। তাদের মধ্যে অন্যতম হলেন মুসআব ইবনু উমায়ের, যিনি উহুদের দিন শহীদ হন। আমরা তাকে কাফন দেওয়ার জন্য একটি চাদর (নামিরাহ) ছাড়া আর কিছুই পাইনি। আমরা যখন তা দিয়ে তাঁর মাথা ঢাকতাম, তখন তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যখন তাঁর পা ঢাকতাম, তখন মাথা বেরিয়ে যেত। তখন আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ দিলেন যে, আমরা যেন সেই চাদর দিয়ে তাঁর মাথা ঢেকে দেই এবং তাঁর পায়ের উপর ইজখির ঘাস দিয়ে দেই। আর আমাদের মধ্যে এমন লোকও আছেন, যার ফল পেকেছে এবং তিনি তা সংগ্রহ করছেন (বা উপভোগ করছেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (7970)


7970 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: جاء أعرابي إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسأله عن الهجرة فقال:"ويحك إن الهجرة شأنها شديد فهل لك من إبل؟" قال: نعم قال:"فتعطي صدقتها؟" قال: نعم، قال:"فهل تمنح منها؟" قال: نعم قال:"فتحلبها يوم ورودها؟" قال: نعم قال:"فاعمل من وراء البحار فإن الله لن يترك من عملك شيئًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3923)، ومسلم في الإمارة (1865) كلاهما
من طريق الوليد بن مسلم حَدَّثَنَا الأوزاعي عن الزّهريّ، عن عطاء بن يزيد الليثيّ، عن أبي سعيد .. فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

وقوله:"فاعمل من وراء البحار" مبالغة في إعلامه بأن لا يضيع في أي موضع كان. فتح الباري (7/ 259).




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার জন্য আফসোস! নিশ্চয়ই হিজরতের বিষয়টি কঠিন। তোমার কি উট আছে?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি সেগুলোর যাকাত দাও?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি তা থেকে (অন্যকে) দান করো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি পানি পানের দিনে সেগুলোর দুধ দোহন করো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তাহলে তুমি দূর-দূরান্তে কাজ করে যাও, নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমার কোনো আমলকে বৃথা যেতে দেবেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7971)


7971 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رجل يا رسول الله، أي الهجرة أفضل؟ قال:"أن تهجر ما كره ربَّك عز وجل" وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الهجرة هجرتان، هجرة الحاضر وهجرة البادي. فأما البادي فيجيب إذا دُعيّ، ويطيع إذا أمر. وأمّا الحاضر فهو أعظمها بلية، وأعظمها أجرًا"

صحيح: رواه النسائيّ (4165) وصحّحه ابن حبَّان (4863) كلاهما من حديث عمرو بن مرة، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي كثير الزبيديّ، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره. وإسناده صحيح.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কোন হিজরতটি সর্বোত্তম?" তিনি বললেন: "তুমি তোমার মহান ও মহিমান্বিত রব যা অপছন্দ করেন, তা বর্জন করা।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "হিজরত দুই প্রকার: স্থায়ীভাবে বসবাসকারীর হিজরত এবং যাযাবরের (বা গ্রামীণ ব্যক্তির) হিজরত। যাযাবর হলে, তাকে আহ্বান করা হলে সে সাড়া দেয় এবং তাকে আদেশ করা হলে সে আনুগত্য করে। আর স্থায়ীভাবে বসবাসকারী ব্যক্তিটি (এই দুইয়ের মধ্যে) সবচেয়ে বড় পরীক্ষার সম্মুখীন হয় এবং সবচেয়ে বেশি প্রতিদান লাভ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7972)


7972 - عن عمر بن الخطّاب كان فرض للمهاجرين الأوّلين أربعة آلاف في أربعة. وفرض لابن عمر ثلاثة آلاف وخمس مائة. فقيل له: هو من المهاجرين، فلم نقصته من أربعة آلاف؟ فقال: إنّما هاجر به أبواه. يقول: ليس هو كمن هاجر بنفسه.

صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3912) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام (ابن يوسف الصنعاني) عن ابن جريج قال: أخبرني عبيد الله بن عمر، عن نافع، يعني عن ابن عمر، عن عمر بن الخطّاب .. فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি প্রথম দিকের মুহাজিরদের জন্য চার হাজার (মুদ্রা) বরাদ্দ করেছিলেন। আর ইবনু উমরের (আব্দুল্লাহ ইবনু উমর) জন্য তিনি সাড়ে তিন হাজার (৩,৫০০) বরাদ্দ করেছিলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: তিনিও তো মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত, তাহলে আপনি কেন তাঁকে চার হাজার থেকে কম দিলেন? তিনি বললেন: তার পিতা-মাতাই তাকে নিয়ে হিজরত করেছেন। তিনি বোঝাতে চাইলেন: সে তার মতো নয়, যে নিজে (স্বেচ্ছায়, পূর্ণ সামর্থ্যে) হিজরত করেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7973)


7973 - عن مجاشع بن مسعود السلمي قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بأخي بعد الفتح، قلت: يا رسول الله، جئتك بأخي لتبايعه على الهجرة، قال: ذهب أهل الهجرة بما فيها فقلت: على أي شيء تبايعه؟ قال: أبايعه على الإسلام، والإيمان، والجهاد. فلقيت أبا معبد بعد، وكان أكبرهما، فسألته فقال: صدق مجاشع.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4306، 4305) ومسلم في الإمارة (84: 1863) كلاهما من طرق عن عاصم بن سليمان الأحول، عن أبي عثمان النهديّ، قال: أخبرني مجاشع بن مسعود السلمي قال .. فذكره.

وفي رواية عند مسلم (83: 1863) من طريق إسماعيل بن زكريا، عن عاصم الأحول بإسناده
أن مجاشع بن مسعود السلمي هو الذي أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يبايعه، والصواب هو الأوّل. كذا أكده أيضًا الدَّارقطنيّ واسم أخيه مجالد بن مسعود، وكنيته أبو معبد.




মুজাশ্শি' ইবনে মাসঊদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আমার ভাইকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আমার ভাইকে আপনার নিকট নিয়ে এসেছি যাতে তিনি হিজরতের উপর বাই'আত করতে পারেন। তিনি বললেন, হিজরতের সাথে যা কিছু (সওয়াব/ফযীলত) সম্পর্কিত ছিল, হিজরতকারীরা তা নিয়ে গেছে। আমি বললাম, তাহলে আপনি কিসের উপর তাকে বাই'আত করাবেন? তিনি বললেন, আমি তাকে ইসলাম, ঈমান ও জিহাদের উপর বাই'আত করাব। এরপর আমি আবূ মা'বাদ-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম, যিনি তাদের দুজনের মধ্যে বড় ছিলেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, মুজাশ্শি' সত্য বলেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7974)


7974 - عن مجاشع بن مسعود أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بابن أخ له، يبايعه على الهجرة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، بل يبايع على الإسلام، فإنه لا هجرة بعد الفتح، ويكون من التابعين بإحسان".

صحيح: رواه أحمد (15847) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1404) والطَّبرانيّ في الكبير (20/ 768) كلّهم من طريق أبي معاوية - يعني شيبان، عن يحيى بن أبي كثير، عن يحيى بن إسحاق، عن مجاشع بن مسعود .. فذكره.

وإسناده صحيح. يحيى بن إسحاق ويقال: ابن أبي إسحاق الأنصاري ثقة وثّقه ابن معين وابن حبَّان.

والجمع بين هذا وما قبله أن مجاشع أتى بأخيه كما أتى بابن أخيه أيضًا.




মুজাশে' ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর ভাতিজাকে নিয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যাতে তিনি হিজরতের উপর তাঁর হাতে বাইআত গ্রহণ করেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং সে ইসলামের উপর বাইআত করুক। কেননা বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত নেই। সে যেন উত্তমভাবে অনুসরণকারীদের (তাবেয়ীদের) অন্তর্ভুক্ত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7975)


7975 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح، فتح مكة:"لا هجرة، ولكن جهاد ونية وإذا استنفرتم فانفروا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3077) ومسلم في الإمارة (85: 1353) كلاهما من حديث منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس .. فذكره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন বলেছেন: "আর (মক্কা বিজয়ের পর) কোনো হিজরত নেই, তবে রয়েছে জিহাদ ও নিয়ত (সংকল্প)। আর যখন তোমাদেরকে (জিহাদের জন্য) ডাকা হবে, তখন তোমরা বেরিয়ে পড়বে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7976)


7976 - عن عائشة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الهجرة؟ فقال:"لا هجرة بعد الفتح، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (86: 1864) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن عطاء، عن عائشة قالت فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর হিজরত নেই, তবে জিহাদ ও নিয়ত (সৎ সংকল্প) আছে। আর যখন তোমাদেরকে (জিহাদের জন্য) আহ্বান জানানো হয়, তখন তোমরা বের হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7977)


7977 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لما فتحت مكة:"لا هجرة بعد الفتح، ولا شغار في الإسلام".

حسن: رواه أبو داود (2751، 1591) والتِّرمذيّ (1413) والنسائي (4806) وابن ماجة (2959) وأحمد (7012) وصحّحه ابن خزيمة (2280) كلّهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন মক্কা বিজয় হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত (দেশত্যাগ) নেই এবং ইসলামে কোনো শিগার (বিবাহ) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (7978)


7978 - عن صفوان بن أمية أنه قيل له: إنه لا يدخل الجنّة إِلَّا من هاجر. قال: فقلت: لا أدخل منزلي حتَّى أتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسأله، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله إن هذا سرق خميصة لي لرجل معه، فأمر بقطعه. فقلت: يا رسول الله إني قد وهبتها له.
قال:"فهلا قبل أن تأتيني به" قال: قلت: يا رسول الله، إنهم يقولون: لا يدخل الجنّة إِلَّا من هاجر؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا هجرة بعد فتح مكة، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".

صحيح: رواه النسائيّ (4169) وأحمد (15306) كلاهما من حديث وهيب، حَدَّثَنَا ابن طاوس، عن أبيه، عن صفوان بن أمية .. فذكره، واللّفظ لأحمد، ولفظ النسائيّ مختصر. وإسناده صحيح. وله طرق أخرى عن طاوس، انظر للمزيد كتاب الحدود باب لا شفاعة للسارق إذا بلغ السلطان.




সাফওয়ান ইবন উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বলা হয়েছিল: যে ব্যক্তি হিজরত করেনি, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না। তিনি বললেন, তখন আমি বললাম: আমি আমার ঘরে প্রবেশ করব না যতক্ষণ না আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করি। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম এবং বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যক্তি আমার সাথে থাকা এক লোকের একটি পশমী চাদর চুরি করেছে। তখন তিনি তার হাত কাটার নির্দেশ দিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো তাকে তা দান করে দিয়েছি। তিনি বললেন: তুমি তাকে আমার কাছে নিয়ে আসার আগেই কেন দান করলে না? তিনি বললেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! তারা বলে যে, যে ব্যক্তি হিজরত করেনি, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: মক্কা বিজয়ের পর (নির্দিষ্ট) হিজরত নেই। তবে রয়েছে জিহাদ এবং নিয়ত। আর যখন তোমাদেরকে যুদ্ধে বের হওয়ার জন্য ডাকা হয়, তখন তোমরা বেরিয়ে পড়ো।









আল-জামি` আল-কামিল (7979)


7979 - عن غزية بن الحارث أنه أخبره أن شبابًا من قريش أرادوا أن يهاجروا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فمنعهم آباؤهم. فذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا هجرة بعد الفتح، إنّما هو الحشر، والنية، والجهاد".

صحيح: رواه سعيد بن منصور في سننه (2353) عن عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث أن ابن أبي هلال حدَّثه عن يزيد بن خصيفة عن عبد اللهْ بن رافع، عن غزية .. فذكره. وإسناده صحيح.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: لما نزلت هذه السورة: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ (1) وَرَأَيْتَ النَّاسَ} قال: قرأها رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى ختمها. وقال:"الناس حَيِّز، وأنا وأصحابي حيز" وقال:"لا هجرة بعد الفتح ولكن جهاد ونية" فقال له مروان: كذبت، وعنده رافع بن خديج، وزيد بن ثابت، وهما قاعدان معه على السرير. فقال أبو سعيد: لو شاء هذان لحدثاك ولكن هذا يخاف أن تنزعه عن عرافة قومه، وهذا يخشى أن تنزعه عن الصّدقة. فسكتا، فرفع مروان عليه الدرة ليضربه، فلمّا رأيا ذلك، قالا: صدق. فإسناده منقطع.

رواه أحمد (11167) عن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري الطائيّ، عن أبي سعيد .. فذكره.

ورواه الطيالسي (2319) ومن طريقه الحاكم (2/ 257) من رواية شعبة به.

وهذا إسناد منقطع، فإن أبا البختري الطائي - وهو سعيد بن فيروز - لم يدرك أبا سعيد، كما قال أبو حاتم. وأمّا الحاكم فقال: صحيح الإسناد.

وقوله"حيز" بفتح الحاء المهملة. وتشديد الياء المكسورة، وفي آخره الزاي: أي في ناحية في الفضل.

وفي هذا الباب عدة آثار:

منها: ما جاء عن مجاهد قال: قلت لابن عمر رضي الله عنهما: إني أريد أن أهاجر إلى الشام. قال: لا هجرة، ولكن جهاد، فانطلق فاعرض نفسك، فإن وجدت شيئًا وإلَّا رجعت. وفي رواية:"لا هجرة اليوم، أو بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
رواه البخاريّ في المناقب (3899) وفي المغازي (4311، 4310، 4309) وهي كلها موقوفة على ابن عمر.

ومنها: ما جاء عن عطاء بن أبي رباح قال: زرت عائشة مع عبيد بن عمير الليثيّ، فسألناها عن الهجرة فقالت: لا هجرة اليوم. كان المؤمنون يفرّ أحدهم بدينه إلى الله تعالى، وإلى رسوله مخافة أن يفتن عليه، فأما اليوم فقد أظهر الله الإسلام، واليوم يعبد ربه حيث شاء. ولكن جهاد ونية.

رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3900) عن إسحاق بن يزيد الدمشقيّ، حَدَّثَنَا يحيى بن حمزة، حَدَّثَنِي الأوزاعيّ، عن عطاء بن أبي رباح، قال فذكره.

هكذا رواه البخاريّ في عدة مواضع موقوفًا على عائشة، ورواه مسلم كما سبق مرفوعًا.

وفي قول عائشة دليل على أن المسلم إذا كان في بلد ولو في بلد الكفر، ولكن له حرية في العبادة لله وحده، وأداء شعائر الإسلام الأخرى فلا تجب عليه الهجرة، بل البقاء في مثل هذا البلد أفضل من الهجرة منه لدعوة غير المسلمين إلى الإسلام. وأمّا إن كان في بلد لا يستطيع أن يعبد الله كما ينبغي، فيجب عليه الهجرة من هذا البلد وعليه يدل الباب الآتي:




গাযিয়াহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে খবর দিয়েছেন যে, কুরাইশের কতিপয় যুবক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হিজরত করতে চেয়েছিলেন, কিন্তু তাদের পিতারা তাদের বাধা দেন। তারা এ বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত নেই। এখন হলো (দ্বীনের জন্য) সমবেত হওয়া, নিয়ত এবং জিহাদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7980)


7980 - عن عبد الرحمن بن حميد أنه سمع عمر بن عبد العزيز يسأل السائب بن يزيد يقول: هل سمعت في الإقامة بمكة شيئًا؟ فقال السائب: سمعت العلاء بن الحضرمي يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"للمهاجر إقامة ثلاثٍ بعد الصدر". كأنه يقول: لا يزيد عليها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3933)، ومسلم في الحجّ (1352) كلاهما من طرق عن حميد بن عبد الرحمن. فذكره.

وليس عند البخاريّ:"كأنه يقول: لا يزيد عليها".

وقوله:"بعد الصدر" أي بعد الرجوع من منى. وهذا خاصٌّ بالمهاجرين من مكة إلى المدينة؛ لأن عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان وقت الجهاد وتأسيس الدولة الإسلامية.




আব্দুর রহমান ইবনু হুমাইদ থেকে বর্ণিত, তিনি উমার ইবনু আব্দুল আযীযকে সাইব ইবনু ইয়াযীদকে জিজ্ঞেস করতে শুনেছেন: "মক্কায় অবস্থান (ইক্বামত) সম্পর্কে আপনি কি কিছু শুনেছেন?" তখন সাইব বললেন, "আমি আলা ইবনুল হাদরামি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: 'মুহাজিরদের জন্য (হজ্জ থেকে) প্রত্যাবর্তনের পর তিন দিন অবস্থান করার অনুমতি আছে।' যেন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছেন, এর বেশি যেন না হয়।"