হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7981)


7981 - عن جنادة بن أبي أمية حدث أن رجالا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال بعضهم: إن الهجرة قد انقطعت، فاختلفوا في ذلك قال: فانطلقت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إن أناسًا يقولون: إن الهجرة قد انقطعت، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الهجرة لا تنقطع ما كان الجهاد".
صحيح: رواه أحمد (16597) عن حجَّاج، حَدَّثَنَا ليث (ابن سعد) حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن جنادة بن أبي أمية .. فذكره. وإسناده صحيح.




জুনাদাহ ইবনে আবী উমাইয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে কিছু লোক বলছিলেন: হিজরত (ইসলামের জন্য দেশত্যাগ) বন্ধ হয়ে গেছে। ফলে তারা এ বিষয়ে মতভেদ করলেন। তিনি বলেন: অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিছু লোক বলছে যে, হিজরত বন্ধ হয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যতদিন পর্যন্ত জিহাদ থাকবে, ততদিন পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7982)


7982 - عن عبد الله بن السعدي - رجل من بني مالك بن حسْل - أنه قدم على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في ناس من أصحابه فقالوا له: احفظ رحالنا، ثمّ تدخل، وكان أصغر القوم، فقضى لهم حاجتهم ثمّ قالوا له: ادخل فدخل، فقال: حاجتك؟ قال: حاجتي تحدثني: انقضت الهجرة؟ فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"حاجتك خير من حوائجهم، لا تنقطع الهجرة ما قُوتل العدو".

صحيح: رواه أحمد (22324) والبيهقي (9/ 17 - 18) وصحّحه ابن حبَّان (4866) كلّهم من حديث عبد الله بن محيريز، عن عبد الله بن السعدي .. فذكره.

ورواه أحمد (1671) والنسائي (4172، 4173) بإسناد حسن آخر نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আস-সা'দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি বনু মালিক ইবনে হিসলের একজন লোক ছিলেন, তিনি তার কয়েকজন সাথীসহ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তারা (সাথীরা) তাকে বলল, তুমি আমাদের মালপত্র পাহারা দাও, এরপর ভেতরে প্রবেশ করো। তিনি ছিলেন দলের সবচেয়ে কম বয়সী। তিনি তাদের প্রয়োজন (পাহারা) মিটানোর পর তারা তাকে বলল, এবার ভেতরে প্রবেশ করো। তিনি প্রবেশ করলে (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, তোমার প্রয়োজন কী? তিনি বললেন, আমার প্রয়োজন হলো, আপনি আমাকে বলুন: হিজরত কি শেষ হয়ে গেছে? তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমার প্রয়োজন তাদের সকলের প্রয়োজনের চেয়ে উত্তম। যতক্ষণ শত্রুর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা হবে, ততক্ষণ পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (7983)


7983 - عن عبد الله بن السعدي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تنقطع الهجرة ما دام العدو يقاتل" فقال معاوية وعبد الرحمن بن عوف، وعبد الله بن عمرو بن العاص: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الهجرة خصلتان: إحداهما أن تهجر السيئات، والأخرى أن تهاجر إلى الله ورسوله، ولا تنقطع الهجرة ما تقبلت التوبة، ولا تزال التوبة مقبولة حتَّى تطلع الشّمس من المغرب، فإذا طلعت طبع على كل قلب بما فيه. وكفي الناس عن العمل".

حسن: رواه أحمد (1671) عن الحكم بن نافع، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، يرده إلى مالك بن يخامر عن ابن السعدي .. فذكره.

وهذا إسناد شامي حسن، فإن ضمضم بن زرعة حسن الحديث، وإسماعيل بن عَيَّاش صدوق فيما رواه عن أهل الشام.

وابن السعدي هو عبد الله بن السعدي القرشي العامري الصحابي عاش إلى زمن معاوية، وقيل: مات في خلافة عمر.

وروق أبو داود (2479) وأحمد (16906) والنسائي في الكبرى (8658) من طرق عن حريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن أبي عوف، عن أبي هند البجليّ، عن معاوية قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تنقطع الهجرة حتَّى تنقطع التوبة، ولا تنقطع التوبة حتَّى تطلع الشّمس من مغربها".

وفي إسناده أبو هند البجليّ، لا يذكر في ترجمته من الرواة عنه إِلَّا عبد الرحمن بن أبي عوف، ولم يوثقه أحد ولذا قال الذّهبيّ في الميزان:"لا يعرف" وقال ابن القطان:"مجهول". وقال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة.

مما لا خلاف بين أهل العلم أن الهجرة باقية إلى يوم القيامة من دار الحرب إلى دار الإسلام،
وإنما الذي نسخ بعد فتح مكة: وجوبُ الهجرة من مكة إلى المدينة.




আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যতদিন শত্রু যুদ্ধ করতে থাকবে, ততদিন হিজরত বন্ধ হবে না।" অতঃপর মু'আবিয়া, আব্দুর রহমান ইবনু 'আউফ এবং আব্দুল্লাহ ইবনু 'আমর ইবনুল 'আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় হিজরত দুই প্রকারের: একটি হলো তুমি পাপ কাজসমূহ পরিহার করবে; আর অন্যটি হলো তুমি আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলের দিকে হিজরত করবে। যতক্ষণ পর্যন্ত তওবা কবুল করা হয়, ততক্ষণ পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না। আর তওবা ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হতে থাকবে যতক্ষণ না সূর্য পশ্চিম দিক থেকে উদিত হয়। যখন (সূর্য) উদিত হবে, তখন প্রত্যেক হৃদয়ের কর্ম অনুযায়ী তাতে সীলমোহর মেরে দেওয়া হবে এবং মানুষের কাজ করা বন্ধ হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7984)


7984 - عن سلمة بن الأكوع أنه دخل الحجاج فقال: يا ابن الأكوع؛ ارتددت على عقبيك؟ تعربت؟ قال: لا، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم أذن في البدو.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7087) ومسلم في الإمارة (1862) كلاهما عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع. فذكره.

وزاد البخاريّ عقبه: وعن يزيد بن أبي عبيد قال: لما قتل عثمان بن عفّان خرج سلمة بن الأكوع إلى الربذة، وتزوج هناك امرأة، وولدت له أولادًا، فلم يزل بها حتَّى قبل أن يموت بليال، فنزل المدينة. وهذا موصول بالسند المذكور (فتح الباري 13/ 41).

الأصل أن المهاجر يحرم عليه العودة إلى البلد الذي هاجر منه، إِلَّا إذا ألم يأمن الفتنة على نفسه، وعِرْضه، وماله فلا مانع من ذلك. لأنه لا يوجد نص صريح صحيح يمنع العودة إلى البلد الذي هاجر منه بعد فتح مكة. وقد أذن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ابن الأكوع أن يعود إلى البدو بعد أن هاجر منها إلى الحضر.




সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাজ্জাজের কাছে প্রবেশ করলেন। তখন হাজ্জাজ তাঁকে বললেন: হে ইবনুল আকওয়া', তুমি কি তোমার পূর্বাবস্থায় ফিরে গিয়েছ (হিজরতের পর)? তুমি কি আবার মরুচারী হয়ে গেছ? তিনি বললেন: না, বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মরু অঞ্চলে (গ্রামাঞ্চলে) বসবাসের অনুমতি দিয়েছেন।

বুখারী এর সাথে আরও যোগ করেছেন: ইয়াযিদ ইবনু আবী উবাইদ বলেছেন: যখন উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন, তখন সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাবাযাহ নামক স্থানে চলে গেলেন। সেখানে তিনি একজন মহিলাকে বিবাহ করলেন এবং তার সন্তানাদি জন্মগ্রহণ করলো। তিনি সেখানেই বসবাস করতে থাকলেন। এরপর মৃত্যুর মাত্র কয়েক রাত পূর্বে তিনি মদীনায় ফিরে এলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7985)


7985 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا دخل مكة قال:"اللهم لا تجعل منايانا بها حتَّى تخرجنا منها".

صحيح: رواه أحمد (4778، 6076) والبزّار (كشف الأستار 1751)، والبيهقي (9/ 19) كلّهم من طرق عن عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن أبيه، عن ابن عمر. فذكره. وإسناده صحيح.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কায় প্রবেশ করতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ, আপনি সেখান থেকে আমাদের বের করে না আনা পর্যন্ত সেখানে আমাদের মৃত্যু ঘটাবেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7986)


7986 - عن عبد الله بن عمرو، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل معاهدًا لم يرحْ رائحة الجنّة، وإن ريحها توجد من مسيرة أربعين عاما".

صحيح: رواه البخاريّ في الجزية والموادعة (3166) عن قيس بن حفص، حَدَّثَنَا عبد الواحد، حَدَّثَنَا الحسن بن عمرو، حَدَّثَنَا مجاهد، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিভুক্ত ব্যক্তিকে হত্যা করবে, সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। অথচ জান্নাতের সুঘ্রাণ চল্লিশ বছরের দূর থেকেও পাওয়া যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7987)


7987 - عن أبي بكرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل نفسا معاهدة بغير حلّها حرّم الله عليه الجنّة أن يجد ريحها".

حسن: رواه النسائيّ (4748)، وأحمد (20383)، 20397)، وابن أبي عاصم في الديات (209)، والبيهقي (9/ 205)، وصحّحه ابن حبَّان (4882)، والحاكم (1/ 44) كلّهم من حديث يونس بن عبيد، عن الحكم بن الأعرج، عن الأشعث بن ثُرملة، عن أبي بكرة .. فذكره.

وإسناده حسن، والأشعث بن ثرملة - بضم المثلثة وبعدها راء ساكنة، ثمّ ميم مضمومة - لم يرو عنه إِلَّا الحكم بن الأعرج كما نص عليه أحمد وابن حبَّان وأبو حاتم وأبو زرعة إِلَّا أن ابن أبي حاتم نقل عن ابن معين قوله: يرُوي عنه يونس بن عبيد، بصري ثقة مشهور.

قلت: لقد نص أهل العلم على أن الأشعث ليس له إِلَّا حديث واحد، وهو هذا، فكيف يكون مشهورًا؟ وكذا قول ابن معين:"روى عنه يونس بن عبيد" لم يتابع على ذلك. والله أعلم.

وأمّا ابن حجر فقال:"ثقة" ولعل ذلك اعتمادًا على قول ابن معين، ولكن الصواب أنه حسن الحديث.

ولحديث أبي بكرة طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

منها ما رواه عبد الرزّاق (10/ 462)، ومن طريقه أحمد (20469)، والبيهقي (13318) وغيرهم. قال: أخبرنا معمر، عن قتادة أو غيره عن الحسن، عن أبي بكر قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ ريح الجنّة ليوجد من مسيرة مئة عام، وما من عبد يقتل نفسا معاهدة بغير حقها إِلَّا حرم الله عليه الجنّة".

والحسن هو البصري الإمام المعروف مدلِّس وقد عنعن، وقد روى ابن حبَّان (7382) وغيره عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن أبي بكرة.

قال البخاريّ والدارقطني وغيرهما: حديث الأشعث أصح.




আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে তার ন্যায্য অধিকার ব্যতীত হত্যা করবে, আল্লাহ তার উপর জান্নাত হারাম করে দেবেন, এমনকি সে তার সুগন্ধও পাবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7988)


7988 - عن جابر بن عبد الله، قال: كنا لا نقتل تجار المشركين على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه ابن أبي شيبة في مسنده (1956 - المطالب العالية)، وأبو يعلى (1917) كلاهما من طريق عباد بن العوام، عن حجَّاج - هو ابن الأرطاة - عن أبي الزُّبير، عن جابر .. فذكره.

وفيه حجَّاج بن أرطاة وهو مدلِّس وقد عنعنه، لكنه توبع.

فقد روى ابن أبي شيبة في المصنف (33802)، والبيهقي (9/ 91) من طريق عبد الرحيم بن سليمان، عن أشعث، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: كانوا لا يقتلون تجار المشركين.

وأشعث بن سوار ضعيف يكتب حديثه، فيكون الحديث حسنا بطريقيه إن شاء الله تعالى.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা মুশরিকদের ব্যবসায়ীদের হত্যা করতাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (7989)


7989 - عن جويرية بن قدامة التميمي قال: سمعت عمر بن الخطّاب رضي الله عنه قلنا: أوصنا يا أمير المؤمنين قال: أوصيكم بذمة الله، فإنه ذمة نبيكم ورزق عيالكم.

صحيح: رواه البخاريّ في الجزية والموادعة (3162) عن آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، حَدَّثَنَا أبو جمرة قال: سمعت جويرية بن قدامة التميمي .. فذكره.

هكذا ذكره البخاريّ مختصرًا. ورواه الإمام أحمد (362) عن محمد بن جعفر، عن شعبة بإسناده مطوَّلًا. وهذا نصه:

عن جويرية بن قدامة قال: حججت، فأتيت المدينة العام الذي أصيب فيه عمر رضي الله عنه قال: فخطب فقال: إني رأيت كأن ديكا أحمر نقرني نقرة أو نقرتين - شعبة الشاك - فكان من أمره أنه طُعن فأذن للناس عليه فكان أول من دخل عليه أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ثمّ أهل المدينة، ثمّ أهل الشام، ثمّ أذن لأهل العراق، فدخلت فيمن دخل قال فكان كلما دخل عليه قوم أثنوا عليه وبكوا.

قال: فلمّا دخلنا عليه قال: وقد عصب بطنه بعمامة سوداء والدم يسيل قال: فقلنا: أوصنا قال: وما سأله الوصية أحد غيرنا فقال: عليكم بكتاب الله؛ فإنكم لن تضلوا ما اتبعتموه. فقلنا: أوصنا فقال: أوصيكم بالمهاجرين فإن الناس سيكثرون ويقلون. وأوصيكم بالأنصار؟ فإنهم شعب الإسلام الذي لجأ إليه. وأوصيكم بالأعراب؛ فإنهم أصلكم ومادتكم .. وأوصيكم بأهل ذمتكم؛ فإنهم عهد نبيكم ورزق عيالكم. قوموا عني، قال: فما زادنا على هؤلاء الكلمات.

قال محمد بن جعفر: قال شعبة: ثمّ سألته بعد ذلك فقال في الأعراب: وأوصيكم بالأعراب؛ فإنهم إخوانكم وعدو عدوكم. اهـ.

ولكن رواه البخاريّ بأسانيد أخرى توصية عمر بن الخطّاب في كتاب الزّكاة (1392) وفي
كتاب فضائل الصّحابة (3700) وغيرهما من المواضع الأخرى مطولًا أطول من هذا.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুওয়াইরিয়াহ ইবনু কুদামাহ বলেন, আমি হজ করার জন্য গেলাম এবং যেই বছর তিনি (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) আঘাতপ্রাপ্ত (শহীদ) হন, সেই বছর মদীনায় পৌঁছলাম। তিনি খুতবা দিলেন এবং বললেন: আমি স্বপ্নে দেখলাম, যেন একটি লাল মোরগ আমাকে একবার বা দু’বার ঠোকর মারল— শু‘বাহ (বর্ণনাকারী) সন্দেহ করেছেন। পরে তার (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) ব্যাপারটি এমন ঘটল যে তিনি ছুরিকাহত হলেন। এরপর তিনি মানুষের জন্য তার কাছে প্রবেশের অনুমতি দিলেন। সর্বপ্রথম তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ, অতঃপর মদীনাবাসী, অতঃপর সিরিয়াবাসী এবং অতঃপর ইরাকবাসীদের অনুমতি দেওয়া হলো। আমি যারা প্রবেশ করেছিল তাদের মধ্যে ছিলাম। তিনি (জুওয়াইরিয়াহ) বলেন, যখনই কোনো দল তাঁর নিকট প্রবেশ করতো, তখনই তারা তাঁর প্রশংসা করতো এবং কাঁদতো।

তিনি বলেন, যখন আমরা তাঁর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি কালো পাগড়ি দ্বারা তাঁর পেট বেঁধে রেখেছিলেন এবং রক্ত ঝরছিল। আমরা বললাম, ‘হে আমীরুল মু’মিনীন! আমাদের জন্য অসিয়ত করুন।’ তিনি বলেন, আমাদের ব্যতীত অন্য কেউ তাঁকে অসিয়ত করার কথা জিজ্ঞাসা করেনি। তিনি বললেন: তোমরা আল্লাহ্‌র কিতাবকে আঁকড়ে ধরো; তোমরা যতদিন তা অনুসরণ করবে, ততদিন পথভ্রষ্ট হবে না। আমরা বললাম, ‘আরও অসিয়ত করুন।’ তিনি বললেন: আমি তোমাদেরকে মুহাজিরদের (অভিবাসীদের) প্রতি বিশেষ খেয়াল রাখার অসিয়ত করছি; কারণ মানুষ সংখ্যায় বৃদ্ধি পাবে কিন্তু মুহাজিররা (সংখ্যায়) কমে যাবেন। আর আমি তোমাদেরকে আনসারদের প্রতি বিশেষ খেয়াল রাখার অসিয়ত করছি; কারণ তাঁরা ইসলামের ভিত্তি, যার দিকে (ইসলাম) আশ্রয় নিয়েছিল। আর আমি তোমাদেরকে গ্রাম্য আরবদের (আ’রাবদের) প্রতি বিশেষ খেয়াল রাখার অসিয়ত করছি; কারণ তারা তোমাদের মূল ভিত্তি এবং তোমাদের সরবরাহকারী (উৎস)। ... আর আমি তোমাদেরকে যিম্মি সম্প্রদায়ের প্রতি বিশেষ খেয়াল রাখার অসিয়ত করছি; কারণ তারা তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অঙ্গীকার এবং তোমাদের পরিবারের জীবিকা (নিরাপত্তা)। আমার নিকট থেকে তোমরা উঠে যাও। তিনি বলেন, এর বেশি তিনি আমাদের জন্য কিছু বলেননি।

মুহাম্মাদ ইবনু জা‘ফর বলেন, শু‘বাহ বলেছেন: এরপর আমি তাকে (জুওয়াইরিয়াহকে) আবার জিজ্ঞেস করলে তিনি আ’রাবদের (গ্রাম্য আরবদের) সম্পর্কে বললেন: আর আমি তোমাদেরকে আ’রাবদের প্রতি বিশেষ খেয়াল রাখার অসিয়ত করছি; কারণ তারা তোমাদের ভাই এবং তোমাদের শত্রুর শত্রু।









আল-জামি` আল-কামিল (7990)


7990 - عن أبي هريرة قال: كيف أنتم إذا لم تجتبوا دينارًا ولا درهما؟ فقيل له: وكيف ترى ذلك كائنا يا أبا هريرة؟ قال: إي والذي نفس أبي هريرة بيده عن قول الصادق المصدوق قالوا: عم ذاك؟ قال:"تنتهك ذمة الله وذمة رسوله صلى الله عليه وسلم فيشد الله عز وجل قلوب أهل الذمة، فيمنعون ما في أيديهم".

صحيح: رواه البخاريّ في الجزية والموادعة (3180) قال: قال أبو موسى (هو محمد بن المثنى) حَدَّثَنَا هاشم بن القاسم، حَدَّثَنَا إسحاق بن سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة .. فذكره.

تنبيه: قال الحميدي في الجمع بين الصحيحين (2/ 261):"وقد أخرج مسلم معنى هذا الحديث بلفظ آخر أوجب تفريقه، وإلَّا فهو في المعنى متفق عليه، وأوله:"منعت العراق درهما وقفيزها".

قلت: وهو الحديث الآتي:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা তখন কেমন হবে, যখন তোমরা কোনো দিনার (স্বর্ণমুদ্রা) বা দিরহাম (রৌপ্যমুদ্রা) সংগ্রহ করতে পারবে না? তখন তাঁকে বলা হলো: হে আবূ হুরায়রাহ! এটা কীভাবে ঘটবে বলে আপনি মনে করেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, ঐ সত্তার শপথ, যার হাতে আবূ হুরায়রাহ-এর প্রাণ, (এটা ঘটবে) সত্যবাদী, সত্যায়িত ব্যক্তিত্বের (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) কথা অনুসারে। তারা জিজ্ঞেস করল: তা কিসের কারণে? তিনি বললেন: আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুরক্ষা (বা অঙ্গীকার) ভঙ্গ করা হবে। ফলে আল্লাহ্ তা‘আলা যিম্মি সম্প্রদায়ের অন্তরে কঠোরতা সৃষ্টি করে দেবেন এবং তারা তাদের হাতে যা আছে তা (প্রদান করতে) অস্বীকার করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (7991)


7991 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: منعت العراق درهمها وقفيزها، ومنعت الشام مديها ودينارها، ومنعت مصر إردبها ودينارها، وعدتم من حيث بدأتم، وعدتم من حيث بدأتم، وعدتم من حيث بدأتم" شهد على ذلك لحم أبي هريرة ودمه.

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2896: 33) من طريق يحيى بن آدم بن سليمان مولى خالد بن خالد، حَدَّثَنَا زهير، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه عن أبي هريرة. فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইরাক তার দিরহাম এবং কাফীয (খাদ্য পরিমাপক) দিতে বাধা দেবে। আর শাম (সিরিয়া) তার মুদ এবং দীনার দিতে বাধা দেবে। আর মিসর তার ইরদাব এবং দীনার দিতে বাধা দেবে। আর তোমরা যেখান থেকে শুরু করেছিলে, তোমরা সেখানেই ফিরে যাবে। আর তোমরা যেখান থেকে শুরু করেছিলে, তোমরা সেখানেই ফিরে যাবে। আর তোমরা যেখান থেকে শুরু করেছিলে, তোমরা সেখানেই ফিরে যাবে। আবু হুরায়রার গোশত ও রক্ত এর সাক্ষ্য দিচ্ছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7992)


7992 - عن هشام بن حكيم بن حزام قال: مرَّ بالشام على أناس، وقد أقيموا في الشّمس، وصب على رؤوسهم الزيت فقال: ما هذا؟ قيل: يعذبون في الخراج. فقال: أما إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله يعذب الذين يعذبون في الدُّنيا".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2613: 117) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا حفص بن غياث، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن هشام بن حكيم بن حزام .. فذكره.




হিশাম ইবনে হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সিরিয়ার (শাম) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি কিছু লোককে দেখলেন যাদেরকে সূর্যের নিচে দাঁড় করিয়ে রাখা হয়েছে এবং তাদের মাথায় তেল ঢালা হচ্ছে। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: এটা কী? বলা হলো: তাদেরকে খাজনার (কর) কারণে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে। তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ তাদের শাস্তি দেবেন, যারা দুনিয়াতে (মানুষকে) শাস্তি দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7993)


7993 - عن عدة من أبناء أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عن آبائهم دِنْية عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ألا من ظلم معاهدًا أو انتقصه أو كلفه فوق طاقته أو أخذ منه شيئًا بغير طيب نفس، فأنا حجيجه يوم القيامة".

وزاد في رواية: وأشار رسول الله صلى الله عليه وسلم بأصبعه على صدره:"ألا ومن قتل معاهدًا له ذمة الله ورسوله حرم الله عليه ريح الجنّة، وإن ريحها لتوجد من مسيرة سبعين خريفا".

حسن: رواه أبو داود (3052) عن سليمان بن داود المهرى، أخبرنا ابن وهب، حَدَّثَنِي أبو
صخر المديني أن صفوان بن سليم أخبره عن عدة من أبناء أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم. فذكره.

ورواه البيهقيّ (9/ 205) من طريق محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن ابن وهب، به وفيه: عن ثلاتين من أبناء أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم. والزيادة المذكورة له.

وإسناده حسن من أجل أبي الصخر المدينيّ، وأبناء الصّحابة وإن لم يسموا، لكنهم جمعٌ كبير تنجبر به جهالتهم.

وقوله:"دنية" بكسر الدال وسكون النون وفتح الياء مصدر في موضع الحال والمعنى متصلو النسب.




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাবধান! যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ অমুসলিমকে (মুয়াহিদকে) অত্যাচার করবে, অথবা তার অধিকার খর্ব করবে, অথবা তার সামর্থ্যের অতিরিক্ত বোঝা চাপিয়ে দেবে, অথবা তার অনুমতি ও সন্তুষ্টি ব্যতীত তার থেকে কোনো কিছু গ্রহণ করবে, কিয়ামতের দিন আমি তার পক্ষ হয়ে ঝগড়াকারী (প্রতিদ্বন্দ্বী) হব।

এবং এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আঙ্গুল দিয়ে নিজের বুকের দিকে ইশারা করে বললেন: সাবধান! যে ব্যক্তি এমন কোনো চুক্তিবদ্ধ অমুসলিমকে হত্যা করবে, যার জন্য আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা চুক্তি রয়েছে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতের সুঘ্রাণ হারাম করে দেবেন। অথচ সেই সুঘ্রাণ সত্তর বছরের পথের দূরত্ব থেকেও পাওয়া যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (7994)


7994 - عن العرباض بن سارية السلمي قال: نزلنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيبر، ومعه من معه من أصحابه، وكان صاحب خيبر رجلًا ماردا منكرًا، فأقبل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا محمد، ألكم أن تذبحوا حمرنا، وتأكلوا ثمرنا، وتضربوا نساءنا، فغضب يعني: النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقال:"يا ابن عوف، اركب فرسك، ثمّ ناد: ألا إن الجنّة لا تحل إِلَّا لمؤمن وأن اجتمعوا للصلاة". قال: فاجتمعوا ثمّ صلى بهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ثمّ قام فقال:"أيحسب أحدكم متكئا على أريكته قد يظن أن الله لم يحرم شيئًا إِلَّا ما في هذا القرآن، ألا وإني والله قد وعظت، وأمرت، ونهيت عن أشياء إنها لمثل القرآن، أو أكثر، وأن الله عز وجل لم يحل لكم أن تدخلوا بيوت أهل الكتاب إِلَّا بإذن، ولا ضَرْب نسائهم، ولا أكلَ ثمارهم إذا أعطوكم الذي عليهم".

حسن: رواه أبو داود (3050) عن محمد بن عيسى، حَدَّثَنَا أشعث بن شعبة، حَدَّثَنَا أرطاة بن المنذر قال: سمعت حكيم بن عمير أبا الأحوص يحدث عن العرباض، فذكره.

وإسناده حسن، من أجل حكيم بن عمير؛ فإنه حسن الحديث ومن أجل أشعث بن شعبة فقد قال عنه أبو زرعة: لين. وفي سؤالات الآجري عن أبي داود: ثقة. ووثَّقه أيضًا الطبرانيّ في الدعاء عقب حديث (187) وذكره ابن حبَّان في الثّقات فمثله يحسن حديثه إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.




ইরবায ইবনু সারিয়াহ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে খায়বারে অবতরণ করলাম। তাঁর সঙ্গে তাঁর সাহাবীগণও ছিলেন। খায়বারের নেতা ছিল একজন বিদ্রোহী ও দুষ্ট লোক। সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে মুহাম্মাদ! তোমরা কি আমাদের গাধা যবেহ করবে, আমাদের ফল খাবে এবং আমাদের নারীদের মারবে?

(বর্ণনাকারী বলেন) অর্থাৎ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: "হে ইবনু আওফ! তোমার ঘোড়ায় আরোহণ করো, এরপর ঘোষণা করো: সাবধান! জান্নাত কেবল মু'মিনের জন্যই হালাল। আর তোমরা সালাতের জন্য একত্রিত হও।"

তিনি বলেন: অতঃপর তারা একত্রিত হলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং বললেন: "তোমাদের কেউ কি তার আসনে হেলান দিয়ে বসে এমন ধারণা করে যে, আল্লাহ তা'আলা এই কুরআনে যা আছে, তা ছাড়া আর কিছুই হারাম করেননি? সাবধান! আল্লাহর শপথ! আমি তোমাদেরকে উপদেশ দিয়েছি, আদেশ করেছি এবং এমন অনেক কিছু থেকে নিষেধ করেছি যা কুরআনের মতোই অথবা তার চেয়েও বেশি। আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তোমাদের জন্য কিতাবধারীদের গৃহে অনুমতি ছাড়া প্রবেশ করা, অথবা তাদের নারীদের প্রহার করা, কিংবা তাদের ফল ভক্ষণ করা হালাল করেননি, যতক্ষণ না তারা তোমাদের প্রতি তাদের পাওনা পরিশোধ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7995)


7995 - عن أنس قال: كان غلام يهودي يخدم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فمرض فأتاه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يعوده، فقعد عند رأسه، فقال له:"أسْلِمْ"، فنظر إلى أبيه وهو عنده فقال له: أطعْ أبا القاسم صلى الله عليه وسلم فأسلمَ، فخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يقول:"الحمد لله الذي أنقذه من النّار".

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1356) عن سليمان بن حرب، حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، عن
ثابت، عن أنس قال فذكره.

وقد ثبت أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عاد عبد الله بن أبي ابن سلول رأس المنافقين.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন ইয়াহুদি বালক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করত। এরপর সে অসুস্থ হয়ে পড়লে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে আসলেন। তিনি তার মাথার কাছে বসলেন এবং তাকে বললেন: "তুমি ইসলাম গ্রহণ করো।" তখন সে তার পিতার দিকে তাকাল, যিনি তার কাছেই ছিলেন। তার পিতা তাকে বললেন: "আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা মান্য করো।" ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে বের হলেন এবং বলতে লাগলেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (7996)


7996 - عن عليّ بن أبي طالب قال: من زعم أن عندنا شيئًا نقرؤه إِلَّا كتاب الله وهذه الصحيفة قال: - وصحيفة معلقة في قراب سيفه - فقد كذب. وفيها:"وذمة المسلمين واحدة يسعى بها أدناهم. ومن أخفر مسلما فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين لا يقبل منه يوم القيامة صرف ولا عدل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجزية (3172)، ومسلم في الحجّ (1370: 467، 468) كلاهما من حديث الأعمش، عن إبراهيم التيميّ، عن أبيه قال: خطبنا عليّ فقال .. فذكره في حديث طويل. والسياق لمسلم.

وقوله:"وذمة المسلمين" أي أمانهم.

وقوله:"أخفر مسلما" أي نقض أمان مسلم فتعرض لكافر له أمان، فقتله.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি দাবি করে যে, আমাদের কাছে আল্লাহর কিতাব (কুরআন) এবং এই সহীফা (ছোট লিখিত দলীল) ছাড়া পড়ার মতো আর কিছু আছে—তিনি বললেন, (তা ছিল) তাঁর তলোয়ারের খাপের সাথে ঝুলানো একটি সহীফা—সে মিথ্যা বলল। এবং তাতে (সহীফাতে) রয়েছে: 'মুসলমানদের দেওয়া নিরাপত্তা (যিম্মাহ) এক ও অভিন্ন। তাদের মধ্যেকার নিম্নতম ব্যক্তিও সেই নিরাপত্তার জন্য প্রচেষ্টা চালাতে পারে (বা নিরাপত্তা দিতে পারে)। আর যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের দেওয়া অঙ্গীকার ভঙ্গ করে, তার ওপর আল্লাহ্‌র, ফেরেশতাদের এবং সকল মানুষের লানত (অভিসম্পাত)। কিয়ামতের দিন তার কাছ থেকে (আজাবের) কোনো বিনিময় বা মুক্তিপণ গ্রহণ করা হবে না।'









আল-জামি` আল-কামিল (7997)


7997 - عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ذمة المسلمين واحدة، يسعى بها أدناهم فمن أخفر مسلما فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه يوم القيامة عدل ولا صرف".

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1371) عن أبي بكر بن النضر بن أبي النضر، حَدَّثَنِي أبو النضر، حَدَّثَنِي عبيد الله الأشجعيّ، عن سفيان، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة .. فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুসলমানদের প্রদত্ত নিরাপত্তা (বা অঙ্গীকার) অভিন্ন। তাদের মধ্যেকার নিকৃষ্টতম ব্যক্তিও তা নিশ্চিত করতে পারে (অর্থাৎ, একজন সাধারণ মুসলমানের দেওয়া নিরাপত্তা বা আশ্রয় সবাই মানতে বাধ্য)। সুতরাং যে ব্যক্তি কোনো মুসলমানের দেওয়া নিরাপত্তা লঙ্ঘন করবে, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ বর্ষিত হবে। কিয়ামতের দিন তার কাছ থেকে কোনো ফিতিয়া (মুক্তিপণ) বা বিনিময় গ্রহণ করা হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7998)


7998 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إن المرأة لتأخذ للقوم يعني تجير على
المسلمين".

حسن: رواه الترمذي: (1579) عن يحيى بن أكثم: حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن كثير بن زيد، عن الوليد بن رباح، عن أبي هريرة .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل كثير بن زيد الأسلمي، والوليد بن رباح؛ فإنهما حسنا الحديث.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب. وسألت محمدًا فقال: هذا حديث صحيح، وكثير بن زيد قد سمع من الوليد بن رباح، والوليد بن رباح سمع من أبي هريرة، وهو مقارب الحديث".

ورواه الحاكم (2/ 41) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، عن عبد العزيز بن أبي حازم، به بلفظ: يجير على أمتي أدناهم.

ورواه أحمد (8780) من طريق سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، به. مثل لفظ الحاكم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই নারী কোনো গোষ্ঠীর জন্য (নিরাপত্তা) গ্রহণ করে, অর্থাৎ সে মুসলিমদের ওপর (কারও জন্য) আশ্রয় বা নিরাপত্তা ঘোষণা করতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7999)


7999 - عن أم هانئ بنت أبي طالب قالت: ذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الفتح، فوجدته يغتسل، وفاطمة ابنته تستره بثوبٍ، فسلمت عليه فقال:"من هذه؟" فقلت: أنا أم هانئ بنت أبي طالب فقال:"مرحبا بأم هانئ" فلما فرغ من غسله قام، فصلى ثماني ركعات ملتحفا في ثوب واحد، فقلت: يا رسول الله، زعم ابن أمي علي أنه قاتلٌ رجلا قد أجرته فلان بن هبيرة فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أجرنا من أجرتِ يا أم هانئ"، قالت أم هانئ: وذلك ضحى.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (28) عن أبي النضر مولى عمر بن عبيد الله، أن أبا مرة مولى عقيل بن أبي طالب أخبره أنه سمع أم هانئ بنت أبي طالب تقول .. فذكرته.

ورواه البخاري في الجزية (3171)، ومسلم في الحيض (336) كلاهما من طريق مالك، به مثله.

ومن الآثار: عن عائشة قالت: إن كانت المرأة لتجير على المؤمنين فيجوز.

رواه أبو داود (2764) عن عثمان بن أبي شيبة حدثنا سفيان بن عيينة، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرته.

ورواه النسائي في الكبرى (8630) من وجه آخر عن إبراهيم به نحوه.

وإسناده صحيح. الأسود وهو ابن يزيد النخعي. وإبراهيم هو النخعي أيضا ومنصور هو المعتمر.

اختلف أهل العلم في هذا الأمان فذهب بعض المالكية إلى أنه موقوف على إجازة الإمام، فله الخيار بين إمضائه وردّه بحسب ما يراه صوابًا أو خطأ، وهو الذي يجب أن يكون صحيحا، لأن قضية الأمان تمس بأمن الدولة، والحاكم هو المسئول عنه، فيجب أن تخضع الأمان لحكمه. فإذا أمضاه الإمام فلا يجوز لأحد من المسلمين إخفاره.




উম্মে হানী বিনত আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। আমি তাঁকে দেখলাম তিনি গোসল করছেন এবং তাঁর কন্যা ফাতিমা একটি কাপড় দিয়ে তাঁকে আড়াল করে আছেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "এ কে?" আমি বললাম: আমি উম্মে হানী বিনত আবী তালিব। তিনি বললেন: "উম্মে হানীকে স্বাগতম।" যখন তিনি গোসল শেষ করলেন, তখন উঠে দাঁড়ালেন এবং এক কাপড়ে আবৃত অবস্থায় আট রাকআত সালাত আদায় করলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মায়ের ছেলে আলী দাবি করে যে, সে এমন একজন লোককে হত্যা করবে যাকে আমি আশ্রয় দিয়েছি; সে হলো (অমুক) ইবনু হুবায়রাহ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উম্মে হানী! তুমি যাকে আশ্রয় দিয়েছো, আমরাও তাকে আশ্রয় দিলাম।" উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর এটা ছিল পূর্বাহ্ণের (চাশতের) সময়।

(এটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি। মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) কাসরুস সালাত ফিস সাফার (২৮) অধ্যায়ে আবুন নাদর মাওলা উমার ইবনু উবাইদিল্লাহর সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, আবূ মুররাহ মাওলা আকীল ইবনু আবী তালিব তাঁকে জানিয়েছেন যে, তিনি উম্মে হানী বিনত আবী তালিবকে বলতে শুনেছেন... এরপর তিনি তা উল্লেখ করেন। আর বুখারী (জিযিয়া: ৩১৭৯) এবং মুসলিম (হায়িয: ৩৩৬) উভয়ই মালিকের সূত্রে তা একই রকম বর্ণনা করেছেন। এবং অন্যান্য আসারসমূহের মধ্যে রয়েছে: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কোনো নারী মুমিনদের পক্ষেও আশ্রয় দিতে পারত এবং তা অনুমোদিত ছিল। আবূ দাঊদ (২৭৬৪) উসমান ইবনু আবী শাইবাহ্, সুফিয়ান ইবনু উআইনাহ্, মানসুর, ইবরাহীম, আসওয়াদ (ইবনু ইয়াযীদ নাখাঈ) এর সূত্রে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন। নাসায়ীও কুবরা (৮৬৩০)-তে ইবরাহীম থেকে অন্য সূত্রে প্রায় একই রকম বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ। আসওয়াদ হলেন ইবনু ইয়াযীদ নাখাঈ এবং ইবরাহীমও নাখাঈ, আর মানসুর হলেন মু'তামির।

এই আশ্রয়ের (আমান) বিষয়ে আলিমগণের মধ্যে মতপার্থক্য রয়েছে। কিছু মালিকী ফকীহ এই মত পোষণ করেন যে, এটি ইমামের অনুমোদনের উপর নির্ভরশীল। ইমামের জন্য তা সঠিক না ভুল—তাঁর বিবেচনা অনুযায়ী তা বহাল রাখা বা বাতিল করার ইখতিয়ার রয়েছে। আর এটিই সঠিক হওয়া উচিত; কারণ আশ্রয়ের বিষয়টি রাষ্ট্রের নিরাপত্তার সাথে জড়িত এবং শাসকই এর জন্য দায়ী। তাই এই আমান অবশ্যই শাসকের সিদ্ধান্তের অধীন হতে হবে। যদি ইমাম এটি বহাল রাখেন, তবে কোনো মুসলিমের জন্য তা ভঙ্গ করা বৈধ নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (8000)


8000 - عن عمرو بن عوف - وهو حليف بني عامر بن لؤي، وكان شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبره أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أبا عبيدة بن الجراح إلى البحرين يأتي بجزيتها، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم هو صالح أهل البحرين، وأمر عليهم العلاء بن الحضرمي، فقدم أبو عبيدة بمال من البحرين، فسمعت الأنصار بقدوم أبي عبيدة، فوافوا صلاة الفجر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم انصرف، فتعرضوا له، فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم حين رآهم ثم قال: أظنكم سمعتم أن أبا عبيدة قدم بشيء من البحرين فقالوا: أجل، يا رسول الله قال:"فأبشروا وأملوا ما يسركم، فوالله ما الفقر أخشى عليكم، ولكني أخشى عليكم أن تبسط الدنيا عليكم كما بسطت على من كان قبلكم، فتنافسوها كما تنافسوها وتهلككم كما أهلكتهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجزية (3158)، ومسلم في الزهد (2961: 6) كلاهما من طريق الزهري، حدثني عروة بن الزبير، أن المسور بن مخرمة أخبره عن عمرو بن عوف. فذكره.




আমর ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (তিনি বানী আমির ইবনু লুয়াইয়ের মিত্র ছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদর যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন।) তিনি তাঁকে জানিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ উবাইদাহ ইবনুুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বাহরাইনের জিযিয়া (কর) আনার জন্য সেখানে পাঠান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাহরাইনবাসীদের সাথে সন্ধি করেছিলেন এবং আলা ইবনুল হাদরামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাদের উপর শাসক নিযুক্ত করেছিলেন। আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাহরাইন থেকে সম্পদ নিয়ে এলেন। আনসারগণ আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আগমনের কথা শুনতে পেলেন এবং তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ফাজরের সালাতে উপস্থিত হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করার পর ফিরে গেলে, তাঁরা তাঁর সামনে এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁদের দেখলেন, তখন মুচকি হাসলেন এবং বললেন: "আমি মনে করি তোমরা শুনেছ যে আবূ উবাইদাহ বাহরাইন থেকে কিছু মাল নিয়ে এসেছেন।" তাঁরা বললেন: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)!" তখন তিনি বললেন: "সুতরাং তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো এবং সেই বিষয়ে আশা রাখো যা তোমাদেরকে আনন্দিত করে। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের জন্য দারিদ্র্যকে ভয় করি না, বরং আমি ভয় করি যে তোমাদের উপর দুনিয়া প্রশস্ত করে দেওয়া হবে, যেমন তোমাদের পূর্ববর্তীদের উপর প্রশস্ত করা হয়েছিল। ফলে তোমরা এর জন্য প্রতিযোগিতা করবে, যেমন তারা প্রতিযোগিতা করেছিল, আর এটি তোমাদেরকে ধ্বংস করে দেবে, যেমন তাদেরকে ধ্বংস করে দিয়েছিল।"