আল-জামি` আল-কামিল
8121 - عن أبي هريرة أنه قال: كان جريج يتعبد في صومعة، فجاءت أمه. قال حميد: فوصف لنا أبو رافع صفة أبي هريرة لصفة رسول الله صلى الله عليه وسلم أمه حين دعته. كيف جعلت
كفها فوق حاجبها. ثم رفعتْ رأسها إليه تدعوه. فقالت: يا جريج، أنا أمك. كلِّمْني، فصادفته يصلي. فقال: اللهم أمي وصلاتي. فاختار صلاته، فرجعت ثم عادتْ في الثانية فقالت: يا جريج، أنا أمك، فكلمني، قال: اللهم، أمي وصلاتي. فاختار صلاته، فقالت: اللهم، إن هذا جريج، وهو ابني، وإني كلمته فأبى أن يكلمني، اللهم! فلا تمته حتى تريه المومسات. قال: ولو دعت عليه أن يفتن لفتن. قال: وكان راعي ضأن يأوي إلى ديره قال: فخرجت امرأة من القرية فوقع عليها الراعي. فحملت فولدت غلامًا. فقيل لها: ما هذا؟ قالت: من صاحب هذا الدير، قال: فجاؤوا بفؤسهم ومساحيهم، فنادوه فصادفوه يصلي، فلم يكلّمهم، قال: فأخذوا يهدمون ديره، فلما رأى ذلك نزل إليهم، فقالوا له: سل هذه، قال: فتبسم ثم مسح رأس الصبي فقال: من أبوك؟ قال: أبي راعي الضأن، فلما سمعوا ذلك منه قالوا: نبني ما هدمنا من ديرك بالذهب والفضة، قال: لا، ولكن أعيدوه تُرابا كما كان، ثم علاه).
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2550) عن شيبان بن فروخ، حدثنا سليمان بن المغيرة، حدثنا حميد بن هلال، عن أبي رافع، عن أبي هريرة .. فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জুরায়জ (নামে এক ব্যক্তি) তার ইবাদতখানায় ইবাদত করতেন। তখন তার মা আসলেন। হুমায়দ (রাবী) বলেন, আবূ রাফি’ আমাদের নিকট আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা অনুসারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বর্ণিত জুরায়েজের মায়ের অবস্থা বর্ণনা করেছেন যে, যখন তিনি তাকে ডাকছিলেন, তখন তিনি কীভাবে তার হাতের তালু ভ্রুর উপরে রাখলেন। অতঃপর তাকে ডাকার জন্য তার দিকে মাথা উঁচু করলেন। তিনি বললেন: হে জুরায়জ! আমি তোমার মা। আমার সাথে কথা বলো। তিনি তাকে সালাতরত অবস্থায় পেলেন। (জুরায়জ মনে মনে) বললেন: ইয়া আল্লাহ! আমার মা, নাকি আমার সালাত? অতঃপর তিনি তার সালাতকেই বেছে নিলেন। ফলে তার মা ফিরে গেলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার ফিরে আসলেন এবং বললেন: হে জুরায়জ! আমি তোমার মা। আমার সাথে কথা বলো। (জুরায়জ মনে মনে) বললেন: ইয়া আল্লাহ! আমার মা, নাকি আমার সালাত? অতঃপর তিনি তার সালাতকেই বেছে নিলেন। তখন মা বললেন: হে আল্লাহ! এই হলো জুরায়জ, আমারই ছেলে। আমি তার সাথে কথা বলতে চাইলাম, কিন্তু সে কথা বলতে অস্বীকার করলো। হে আল্লাহ! তুমি তাকে মৃত্যু দিয়ো না, যতক্ষণ না তুমি তাকে ব্যভিচারিণী নারীদের দেখাও। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: যদি সে (মা) জুরায়জের জন্য ফিতনা (পরীক্ষায় পতিত হওয়ার) দু‘আ করতেন, তবে তিনি তাতে পতিত হতেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: একজন মেষপালক তার ইবাদতখানায় আশ্রয় নিতো। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: অতঃপর গ্রামের এক মহিলা বের হলো এবং রাখালটি তার সাথে কুকর্ম করলো। ফলে সে গর্ভবতী হলো এবং একটি ছেলে জন্ম দিলো। তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: এ কী? সে বলল: এই ইবাদতখানার মালিকের (জুরায়জের) পক্ষ থেকে। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: অতঃপর তারা তাদের কুঠার ও কোদাল নিয়ে আসলো এবং তাকে ডাকলো। তারা তাকে সালাতরত অবস্থায় পেলো। ফলে তিনি তাদের সাথে কথা বললেন না। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: অতঃপর তারা তার ইবাদতখানা ভেঙ্গে ফেলতে শুরু করলো। যখন জুরায়জ তা দেখলেন, তখন তাদের কাছে নেমে আসলেন। তারা তাকে বললো: তুমি একে (মহিলাটিকে) জিজ্ঞাসা করো। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: অতঃপর তিনি মুচকি হাসলেন এবং ছেলেটির মাথায় হাত বুলিয়ে জিজ্ঞাসা করলেন: তোমার বাবা কে? ছেলেটি বললো: আমার বাবা হলো মেষপালক। যখন তারা তার কাছ থেকে এ কথা শুনলো, তখন তারা বললো: আমরা আপনার ইবাদতখানার যা ভেঙ্গেছি, তা সোনা বা রূপা দিয়ে আবার নির্মাণ করে দেবো। তিনি বললেন: না, বরং আগে যেমন ছিল, মাটি দিয়েই তেমনি করে দাও। অতঃপর তিনি ওপরে আরোহণ করলেন।
8122 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لم يتكلم في المهد إلا ثلاثة: عيسى بن مريم، وصاحب جريج، وكان جريج رجلًا عابدًا، فاتخذ صومعة، فكان فيها، فأتته أمه وهو يصلي، فقالت: يا جريج، فقال: يا رب، أمي وصلاتي، فأقبل على صلاته، فانصرفت. فلما كان من الغد أتته وهو يصلي، فقالت: يا جريج، فقال: يا رب، أمي وصلاتي، فأقبل على صلاته، فانصرفت. فلما كان من الغد أتته وهو يصلي، فقالت: يا جريج، فقال: أي رب، أمي وصلاتي، فأقبل على صلاته، فقالت: اللهم، لا تمته حتى ينظر إلى وجوه المومسات. فتذاكر بنو إسرائيل جريجًا وعبادته، وكانت امرأة بغي يتمثل بحسنها، فقالت: إن شئتم لأفتننه لكم، قال: فتعرضت له فلم يلتفت إليها، فأتت راعيًا كان يأوي إلى صومعته فأمكنته من نفسها، فوقع عليها، فحملت، فلما ولدت قالت: هو من جريج، فأتوه فاستنزلوه وهدموا صومعته وجعلوا يضربونه، فقال: ما شأنكم؟ قالوا: زنيتَ بهذه البغي، فولدت منك، فقال: أين الصبي؟ فجاؤوا به، فقال: دعوني حتى أصلي، فصلى، فلما انصرف أتى الصبي فطعن في بطنه: وقال: يا غلام، من أبوك؟ قال: فلان الراعي، قال: فأقبلوا
على جريج يقبلونه ويتمسحون به، وقالوا: نبني لك صومعتك من ذهب، قال: لا، أعيدوها من طين كما كانت، ففعلوا.
وبينا صبي يرضع من أمه، فمرّ رجل راكب على دابة فارهة وشارة حسنة، فقالت أمه: اللهم اجعل ابني مثل هذا، فترك الثدي وأقبل إليه فنظر إليه، فقال: اللهم! لا تجعلني مثله، ثم أقبل على ثديها فجعل يرتضع.
قال: فكأني أنظر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يحكي ارتضاعه بإصبعه السبابة في فمه، فجعل يمصها.
قال: ومروا بجارية وهم يضربونها ويقولون: زنيتِ، سرقتِ، وهي تقول: حسبي الله ونعم الوكيل، فقالت أمه: اللهم لا تجعل ابني مثلها، فترك الرضاع ونظر إليها، فقال: اللهم اجعلني مثلها، فهناك تراجعا الحديث.
فقالت: حلقى! مر رجل حسن الهيئة فقلتُ: اللهم اجعل ابني مثله، فقلتَ: اللهم لا تجعلني مثله، ومروا بهذه الأمة وهم يضربونها ويقولون: زنيتِ، سرقتِ، فقلت: اللهم لا تجعل ابني مثلها! فقلت: اللهم اجعلني مثلها، قال: إن ذاك الرجل كان جبارًا فقلت: اللهم لا تجعلني مثله. وإن هذه يقولون لها: زنيت، ولم تزن، وسرقت ولم تسرق، فقلت: اللهم اجعلني مثلها".
متفق عليه: رواه مسلم في البر والصلة (2550: 8) عن زهير بن حرب، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا جرير بن حازم، حدثنا محمد بن سيرين، عن أبي هريره .. فذكره. ورواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3436) عن مسلم بن إبراهيم: حدثنا جرير بن حازم، بإسناده نحوه.
ورواه البخاري أيضا في أحاديث الأنبياء (3466) من وجه آخر عن أبي هريرة وفيه قصة المرأة التي ترضع ابنها فقط.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দোলনায় থাকা অবস্থায় তিনজন ব্যতীত কেউ কথা বলেনি: মারইয়াম-পুত্র ঈসা (আঃ), জুরাইজ-এর সাথী এবং [তৃতীয় জন]। জুরাইজ ছিলেন একজন ইবাদতগুজার ব্যক্তি। তিনি একটি উপাসনালয় নির্মাণ করে সেখানে অবস্থান করতেন। একদিন তিনি সালাত আদায় করছিলেন, এমন সময় তার মা এসে তাকে ডাকলেন: ‘হে জুরাইজ!’ জুরাইজ (মনে মনে) বললেন: ‘হে আমার রব! আমার মা (এর ডাক) নাকি আমার সালাত (জরুরি)?’ এরপর তিনি তার সালাতে মনোযোগ দিলেন। ফলে তার মা ফিরে গেলেন।
পরের দিন যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন, তার মা আবার এসে ডাকলেন: ‘হে জুরাইজ!’ তিনি (মনে মনে) বললেন: ‘হে আমার রব! আমার মা নাকি আমার সালাত?’ এরপর তিনি তার সালাতে মনোযোগ দিলেন। ফলে তার মা ফিরে গেলেন।
যখন তৃতীয় দিন হলো, তিনি সালাত আদায় করছিলেন, তখন তার মা এসে ডাকলেন: ‘হে জুরাইজ!’ তিনি বললেন: ‘হে আমার রব! আমার মা নাকি আমার সালাত?’ এরপর তিনি তার সালাতে মনোযোগ দিলেন। তখন তার মা বললেন: ‘হে আল্লাহ! তাকে মৃত্যু দিও না, যতক্ষণ না সে বেশ্যা নারীদের মুখ দেখে।’
বনী ইসরাঈলগণ জুরাইজ এবং তার ইবাদত নিয়ে আলোচনা করছিল। সেখানে এক রূপবতী পতিতা নারী ছিল, যার সৌন্দর্যের উদাহরণ দেওয়া হতো। সে বলল: ‘যদি তোমরা চাও, তবে আমি তাকে প্রলুব্ধ করব।’ এরপর সে জুরাইজ-এর সামনে এল, কিন্তু তিনি তার দিকে ভ্রুক্ষেপও করলেন না। তখন সে নারীটি একজন রাখালের কাছে গেল, যে জুরাইজ-এর উপাসনালয়ের কাছে আশ্রয় নিত। সে তাকে নিজের সাথে মিলিত হওয়ার সুযোগ দিল এবং রাখাল তার সাথে মিলিত হলো। ফলে সে গর্ভধারণ করল। যখন সে সন্তান প্রসব করল, তখন বলল: ‘এটি জুরাইজ-এর সন্তান।’ লোকেরা তার কাছে এসে তাকে (উপাসনালয় থেকে) নামিয়ে আনল, তার উপাসনালয় ভেঙে ফেলল এবং তাকে মারতে শুরু করল। জুরাইজ বললেন: ‘তোমাদের কী হয়েছে?’ তারা বলল: ‘তুমি এই বেশ্যার সাথে যিনা করেছ এবং সে তোমার থেকে সন্তান প্রসব করেছে।’ জুরাইজ বললেন: ‘শিশুটিকে কোথায়?’ তারা শিশুটিকে নিয়ে এল। তিনি বললেন: ‘আমাকে সালাত আদায় করতে দাও।’ এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন। সালাত শেষে তিনি শিশুটির কাছে এলেন এবং তার পেটে খোঁচা দিয়ে বললেন: ‘ওহে বালক! তোমার বাবা কে?’ শিশুটি বলল: ‘অমুক রাখাল।’
রাবী বলেন, এরপর লোকেরা জুরাইজ-এর দিকে এগিয়ে এল, তাঁকে চুমু খেল এবং তাঁর শরীরে হাত বুলাতে লাগল। তারা বলল: ‘আমরা আপনার উপাসনালয়টি সোনা দিয়ে নির্মাণ করে দেব।’ তিনি বললেন: ‘না, যেমন ছিল, মাটির দ্বারা তেমনই করে দাও।’ অতঃপর তারা তা-ই করল।
(তৃতীয় ঘটনা) একদিন একটি শিশু তার মায়ের স্তন্য পান করছিল। তখন সুন্দর পোশাক পরা, দ্রুতগামী উত্তম সওয়ারীর ওপর আরোহিত এক ব্যক্তি পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। শিশুটির মা বলল: ‘হে আল্লাহ! আমার ছেলেকে এর মতো করে দাও।’ তখন শিশুটি মায়ের স্তন ছেড়ে দিয়ে তার দিকে ফিরে তাকাল এবং বলল: ‘হে আল্লাহ! আমাকে তার মতো করো না।’ এরপর সে আবার মায়ের স্তন গ্রহণ করে দুধ পান করতে লাগল।
(আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন) যেন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখছি—তিনি তার শাহাদাত আঙ্গুল মুখে দিয়ে সেই শিশুর স্তন্য পান করার দৃশ্যটি নকল করে দেখাচ্ছেন এবং তিনি তা চুষছেন।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: আর একবার তারা একটি দাসীর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। লোকেরা তাকে মারছিল এবং বলছিল: ‘তুমি যিনা করেছ, তুমি চুরি করেছ!’ আর সে বলছিল: ‘আল্লাহই আমার জন্য যথেষ্ট এবং তিনি উত্তম কর্মবিধায়ক।’ তখন শিশুটির মা বলল: ‘হে আল্লাহ! আমার ছেলেকে এর মতো করো না।’ তখন শিশুটি স্তন্যপান ছেড়ে দিয়ে তার দিকে তাকাল এবং বলল: ‘হে আল্লাহ! আমাকে এর মতো করে দাও।’ তখন মা ও ছেলের মধ্যে কথোপকথন হলো।
মা বললেন: ‘আফসোস! এক সুন্দর চেহারার ব্যক্তি পাশ দিয়ে গেল, তখন আমি বললাম: ‘হে আল্লাহ! আমার ছেলেকে তার মতো করে দাও।’ কিন্তু তুমি বললে: ‘হে আল্লাহ! আমাকে তার মতো করো না।’ আর এই দাসীটির পাশ দিয়ে যখন তারা যাচ্ছিল এবং মারছিল, আর বলছিল: ‘তুমি যিনা করেছ, তুমি চুরি করেছ!’ তখন আমি বললাম: ‘হে আল্লাহ! আমার ছেলেকে এর মতো করো না।’ কিন্তু তুমি বললে: ‘হে আল্লাহ! আমাকে এর মতো করে দাও।’ শিশুটি বলল: ‘আসলে সেই লোকটি ছিল একজন স্বৈরাচারী (অত্যাচারী), তাই আমি বললাম: হে আল্লাহ! আমাকে তার মতো করো না। আর এই দাসীটির ব্যাপারে লোকেরা বলছে: সে যিনা করেছে, অথচ সে যিনা করেনি; আর বলছে: সে চুরি করেছে, অথচ সে চুরি করেনি। তাই আমি বললাম: হে আল্লাহ! আমাকে এর মতো করে দাও (অর্থাৎ ধৈর্যের ও ঈমানের দিক দিয়ে)।’
8123 - عن صهيب الرومي رضي الله عنه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كان مَلِكٌ فيمن كان قبلكم، وكان له ساحرٌ، فلما كبر، قال للملك: إني قد كبرتُ، فابعث إلي غلاما أعلمه السحر، فبعث إليه غلاما يعلمه، فكان في طريقه، إذا سلك راهب فقعد إليه وسمع كلامه، فأعجبه فكان إذا أتى الساحر مرَّ بالراهب وقعد إليه، فإذا أتى الساحر ضربه، فشكا ذلك إلى الراهب، فقال: إذا خشيتَ الساحرَ، فقل: حبسني أهلي، وإذا خشيتَ أهلك فقل: حبسني الساحرُ، فبينما هو كذلك إذ أتى على دابةٍ عظيمةٍ قد حبست الناسَ، فقال: اليوم أعلم آلساحر أفضل أم الراهب أفضل؟ فأخذ حجرًا، فقال:
اللهم إن كان أمرُ الراهب أحب إليك من أمر الساحر فاقتل هذه الدابة، حتى يمضي الناس، فرماها فقتلها، ومضى الناسُ، فأتى الراهبَ فأخبره، فقال له الراهب: أي بني أنت اليوم أفضل مني، قد بلغ من أمرك ما أرى، وإنك ستُبتلى، فإن ابتليت فلا تدل علي، وكان الغلام يبرئ الأكمه والأبرص، ويداوي الناسَ من سائر الأدواء، فسمع جليسٌ للملك كان قد عمي، فأتاه بهدايا كثيرة، فقال: ما هاهنا لك أجمع، إن أنت شفيتني، فقال: إني لا أشفي أحدًا إنما يشفي الله، فإن أنت آمنت بالله دعوتُ الله فشفاك، فآمن بالله فشفاه الله، فأتى الملكَ فجلس إليه كما كان يجلسُ، فقال له الملكُ: من ردَّ عليك بصرَك؟ قال: ربي، قال: ولك ربٌّ غيري؟ قال: ربي وربُّك اللهُ، فأخذه فلم يزل يعذّبه حتى دلَّ على الغلام، فجيء بالغلام، فقال له الملكُ: أي بني قد بلغ من سحرك ما تبرئ الأكمه والأبرص، وتفعل وتفعل، فقال: إني لا أشفي أحدًا، إنما يشفي اللهُ، فأخذه فلم يزل يعذّبه حتى دلَّ على الراهب، فجيء بالراهب، فقيل له: ارجع عن دينك، فأبى، فدعا بالمئشار، فوضع المئشارَ في مفرق رأسه، فشقه حتى وقع شقاه، ثم جيء بجليس الملك فقيل له: ارجع عن دينك، فأبى فوضع المئشار في مفرق رأسه، فشقه به حتى وقع شقاه، ثم جيء بالغلام فقيل له: ارجع عن دينك، فأبى فدفعه إلى نفرٍ من أصحابه، فقال: اذهبوا به إلى جبل كذا وكذا، فاصعدوا به الجبل، فإذا بلغتم ذروته، فإن رجع عن دينه، وإلا فاطرحوه، فذهبوا به فصعدوا به الجبل، فقال: اللهم اكفنيهم بما شئت، فرجف بهم الجبلُ فسقطوا، وجاء يمشي إلى الملك، فقال له الملك: ما فعل أصحابك؟ قال: كفانيهم الله، فدفعه إلى نفرٍ من أصحابه، فقال: اذهبوا به فاحملوه في قَرْقُورٍ، فتوسطوا به البحر، فإن رجع عن دينه وإلا فاقذفوه، فذهبوا به، فقال: اللهم اكفنيهم بما شئتَ، فانكفأت بهم السفينةُ، فغرِقوا، وجاء يمشي إلى الملك، فقال له الملك: ما فعل أصحابك؟ قال: كفانيهم الله، فقال للملك: إنك لستَ بقاتلي حتى تفعل ما آمرك به، قال: وما هو؟ قال: تجمع الناس في صعيدٍ واحدٍ، وتصلبني على جذعٍ، ثم خذ سهمًا من كنانتي، ثم ضع السهمَ في كبدِ القوسِ، ثم قل: باسم الله رب الغلام، ثم ارمني، فإنك إذا فعلت ذلك قتلتني، فجمع الناس في صعيدٍ واحدٍ، وصلبه على جذعٍ، ثم أخذ سهمًا من كنانته، ثم وضع السهمَ في كبد القوس، ثم قال: باسم الله، رب الغلام، ثم رماه فوقع السهم في صدغه، فوضع يده في صدغه في موضع السهم فمات، فقال الناس:
آمنا برب الغلام، آمنا برب الغلام، آمنا برب الغلام، فأتي المَلِكُ فقيل له: أرأيتَ ما كنت تحذرُ؟ قد واللهِ نزلَ بك حذرُك، قد آمن الناسُ، فأمر بالأخدود في أفواه السكك، فَخُدَّتْ وأضرمَ النيرانَ، وقال: من لم يرجع عن دينه، فأحموه فيها، أو قيل له: اقتحم، ففعلوا حتى جاءت امرأةٌ، ومعها صبيٌّ لها، فتقاعستْ أن تقع فيها، فقال لها الغلام: يا أمه، اصبري، فإنكِ على الحقِّ".
صحيح: أخرجه مسلم في الزهد (3005) عن هدّاب بن خالد، حدثنا حماد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صهيب قال .. فذكره.
ورواه أحمد (23931) عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة بإسناده وفيه: فجاءتْ امرأة بابن لها تُرضعه، فكأنها تقاعست أن تقع في النار.
قلت: وهذا الصبي هو الرابع من تكلم في المهد، فيُحمل حديث أبي هريرة:"لم يتكلم في المهد إلا ثلاثة" أنه متقدم، ثم أوحي إليه صلى الله عليه وسلم فصار الحصر في حديث أبي هريرة منقوضا، وهذا أولى من قول من يقول:"بابن لها ترضعه" شاذٌّ.
قوله:"قرقور" قيل: هي السفينة الصغيرة.
وقوله:"فانكفأت به السفينة" أي انقلبت.
وقوله:"فاحموه فيها" أي فأقحموه فيها.
সুহাইব আর-রুমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমাদের পূর্ববর্তী জাতিদের মধ্যে একজন বাদশাহ ছিল। তার একজন জাদুকর ছিল। যখন জাদুকরটি বৃদ্ধ হলো, তখন সে বাদশাহকে বলল: আমি তো বৃদ্ধ হয়ে গেছি, তাই আমার কাছে একজন বালককে পাঠান, যেন আমি তাকে জাদু শিক্ষা দিতে পারি। তখন বাদশাহ তার কাছে জাদু শেখার জন্য একটি বালককে পাঠাল।
(ঐ বালকটি) যখন পথ চলত, তখন তার পথে একজন সন্ন্যাসী (রাহিব) ছিল। সে তার কাছে বসে তার কথা শুনত এবং তা তার কাছে খুবই ভালো লাগত। সে যখন জাদুকরের কাছে যেত, তখন সন্ন্যাসীর পাশ দিয়ে যেত এবং তার কাছে বসে যেত। (এই কারণে) যখন সে জাদুকরের কাছে পৌঁছত, তখন জাদুকর তাকে মারত। সে এই বিষয়ে সন্ন্যাসীর কাছে অভিযোগ করল। সন্ন্যাসী বলল: যখন তুমি জাদুকরকে ভয় করবে, তখন বলবে: আমার পরিবার আমাকে আটকে রেখেছিল। আর যখন তুমি তোমার পরিবারকে ভয় করবে, তখন বলবে: জাদুকর আমাকে আটকে রেখেছিল।
সে এভাবেই চলছিল। হঠাৎ একদিন সে এক বিশাল জন্তুর কাছে এসে পড়ল, যা মানুষকে পথ চলতে বাধা দিচ্ছিল। বালকটি বলল: আজ আমি জানব, জাদুকর শ্রেষ্ঠ নাকি সন্ন্যাসী শ্রেষ্ঠ? এরপর সে একটি পাথর হাতে নিল এবং বলল: হে আল্লাহ! যদি তোমার কাছে জাদুকরের কাজের চেয়ে সন্ন্যাসীর কাজ বেশি প্রিয় হয়, তবে এই জন্তুটিকে মেরে ফেলো, যাতে লোকেরা পথ চলতে পারে। এরপর সে পাথরটি ছুঁড়ে মারল এবং তাকে মেরে ফেলল। আর লোকেরা পথ চলতে শুরু করল।
এরপর সে সন্ন্যাসীর কাছে এসে তাকে ঘটনাটি জানাল। সন্ন্যাসী তাকে বলল: হে আমার বৎস! আজ তুমি আমার চেয়েও উত্তম। আমি দেখতে পাচ্ছি, তোমার বিষয়টি কত দূর গড়িয়েছে। তবে তুমি শীঘ্রই পরীক্ষার সম্মুখীন হবে। যদি তুমি পরীক্ষিত হও, তবে আমার সম্পর্কে কাউকে বলে দিও না।
বালকটি জন্মান্ধ ও কুষ্ঠরোগীদের আরোগ্য করত এবং অন্যান্য সব রোগ থেকে মানুষকে সুস্থ করত। বাদশাহর এক অন্ধ পার্শ্বচর এই কথা শুনতে পেল। সে অনেক উপঢৌকন নিয়ে তার কাছে এসে বলল: তুমি যদি আমাকে সুস্থ করতে পারো, তবে এখানে যা কিছু আছে, সব তোমার জন্য। বালকটি বলল: আমি কাউকে সুস্থ করি না, সুস্থ করেন শুধু আল্লাহ। তুমি যদি আল্লাহতে বিশ্বাস করো, তবে আমি আল্লাহর কাছে দু’আ করব, আর তিনি তোমাকে সুস্থ করে দেবেন। লোকটি আল্লাহতে ঈমান আনল এবং আল্লাহ তাকে সুস্থ করে দিলেন।
সে বাদশাহর কাছে এল এবং তার কাছে আগের মতোই বসল। বাদশাহ তাকে বলল: কে তোমার দৃষ্টি ফিরিয়ে দিল? সে বলল: আমার প্রতিপালক। বাদশাহ বলল: আমার ছাড়া তোমার অন্য কোনো প্রতিপালক আছে? সে বলল: আমার এবং আপনার প্রতিপালক হলেন আল্লাহ। বাদশাহ তাকে ধরে ফেলল এবং ক্রমাগত শাস্তি দিতে লাগল, যতক্ষণ না সে বালকটির সন্ধান দিল।
এরপর বালকটিকে আনা হলো। বাদশাহ তাকে বলল: হে বৎস! তোমার জাদু এমন পর্যায়ে পৌঁছে গেছে যে, তুমি জন্মান্ধ ও কুষ্ঠরোগীদের আরোগ্য করছ এবং আরও অনেক কিছু করছ। বালকটি বলল: আমি কাউকে সুস্থ করি না, সুস্থ করেন শুধু আল্লাহ। বাদশাহ তাকে ধরে ফেলল এবং ক্রমাগত শাস্তি দিতে লাগল, যতক্ষণ না সে সন্ন্যাসীর সন্ধান দিল।
এরপর সন্ন্যাসীকে আনা হলো। তাকে বলা হলো: তোমার দ্বীন (ধর্ম) থেকে ফিরে আসো। সে অস্বীকার করল। তখন বাদশাহ করাত আনতে বলল। এরপর করাতটি তার মাথার মাঝখানে রাখা হলো এবং তা দিয়ে তাকে চিরে দু’ভাগ করে দেওয়া হলো।
এরপর বাদশাহর পার্শ্বচরকে আনা হলো। তাকে বলা হলো: তোমার দ্বীন থেকে ফিরে আসো। সে অস্বীকার করল। তখন করাতটি তার মাথার মাঝখানে রাখা হলো এবং তা দিয়ে তাকে চিরে দু’ভাগ করে দেওয়া হলো।
এরপর বালকটিকে আনা হলো। তাকে বলা হলো: তোমার দ্বীন থেকে ফিরে আসো। সে অস্বীকার করল। তখন বাদশাহ তার কয়েকজন সঙ্গীর হাতে তাকে সঁপে দিল এবং বলল: একে অমুক অমুক পাহাড়ে নিয়ে যাও। পাহাড়ে আরোহণ করার পর যদি সে তার দ্বীন থেকে ফিরে আসে (তাহলে ঠিক আছে), অন্যথায় তাকে উপর থেকে ফেলে দাও।
তারা তাকে নিয়ে গেল এবং পাহাড়ে আরোহণ করল। (বালকটি দু'আ করল:) "হে আল্লাহ! তুমি যেভাবে চাও, এদের হাত থেকে আমাকে রক্ষা করো।" তখন পাহাড়টি তাদের নিয়ে কেঁপে উঠল, ফলে তারা সবাই পড়ে গেল। আর বালকটি হেঁটে বাদশাহর কাছে ফিরে এল।
বাদশাহ তাকে বলল: তোমার সঙ্গীরা কী করল? সে বলল: আল্লাহই তাদের পক্ষ থেকে আমার জন্য যথেষ্ট হয়েছেন। এরপর বাদশাহ তাকে তার অন্য কয়েকজন সঙ্গীর হাতে সঁপে দিল এবং বলল: তাকে নিয়ে যাও এবং একটি ছোট নৌকায় তুলে নাও। এরপর তাকে নিয়ে সমুদ্রের মাঝখানে যাও। যদি সে তার দ্বীন থেকে ফিরে আসে (তবে ভালো), অন্যথায় তাকে সমুদ্রে নিক্ষেপ করো।
তারা তাকে নিয়ে গেল। (বালকটি দু'আ করল:) "হে আল্লাহ! তুমি যেভাবে চাও, এদের হাত থেকে আমাকে রক্ষা করো।" তখন নৌকাটি উল্টে গেল এবং তারা ডুবে মরল। আর বালকটি হেঁটে বাদশাহর কাছে ফিরে এল।
বাদশাহ তাকে বলল: তোমার সঙ্গীরা কী করল? সে বলল: আল্লাহই তাদের পক্ষ থেকে আমার জন্য যথেষ্ট হয়েছেন। এরপর বালকটি বাদশাহকে বলল: তুমি ততক্ষণ পর্যন্ত আমাকে হত্যা করতে পারবে না, যতক্ষণ না আমি তোমাকে যা করতে আদেশ করি, তা করো। বাদশাহ বলল: সেটা কী? সে বলল: তুমি সমস্ত মানুষকে একটি ময়দানে একত্র করবে, আমাকে একটি গাছের গুঁড়ির ওপর শুলে চড়াবে (ক্রুশবিদ্ধ করবে), এরপর আমার তুণ থেকে একটি তীর নাও, তারপর তীরটি ধনুকের ছিলাতে রাখো, তারপর বলো: ‘বিসমিল্লাহি রব্বিল গুলাম’ (এই বালকের প্রতিপালক আল্লাহর নামে)। এরপর আমাকে তীরবিদ্ধ করো। তুমি যদি এমনটি করো, তবেই আমাকে হত্যা করতে পারবে।
তখন বাদশাহ সমস্ত মানুষকে একটি ময়দানে একত্র করল এবং বালকটিকে একটি গুঁড়ির ওপর শুলে চড়াল। এরপর তার তুণ থেকে একটি তীর নিল, তারপর তীরটি ধনুকের ছিলাতে রাখল এবং বলল: ‘বিসমিল্লাহি রব্বিল গুলাম’ (এই বালকের প্রতিপালক আল্লাহর নামে)। এরপর সে তাকে তীরবিদ্ধ করল। তীরটি তার কানের পাশে গিয়ে লাগল। বালকটি তার কানের পাশে তীরের স্থানে হাত রেখে মারা গেল।
তখন লোকেরা বলে উঠল: আমরা এই বালকের রবের প্রতি ঈমান আনলাম! আমরা এই বালকের রবের প্রতি ঈমান আনলাম! আমরা এই বালকের রবের প্রতি ঈমান আনলাম! বাদশাহর কাছে এসে বলা হলো: আপনি যা ভয় করছিলেন, তা কি দেখেননি? আল্লাহর কসম! আপনি যা ভয় করেছিলেন, তাই আপনার উপর আপতিত হয়েছে— লোকেরা ঈমান এনে ফেলেছে!
তখন বাদশাহ রাস্তার মোড়ে মোড়ে গর্ত (আল-উখদুদ) খননের আদেশ দিল। খনন করা হলো এবং তাতে আগুন জ্বালানো হলো। সে বলল: যে তার দ্বীন থেকে ফিরে না আসবে, তাকে তাতে ঝাঁপিয়ে পড়তে বাধ্য করো, অথবা বলা হলো: তাকে তাতে ঢুকিয়ে দাও। লোকেরা তাই করতে লাগল। অবশেষে এক মহিলা তার কোলের শিশুসন্তানসহ এল। সে তাতে পতিত হতে ইতস্তত করল। তখন শিশুটি তাকে বলল: হে মাতা! ধৈর্য ধরুন! নিশ্চয়ই আপনি সত্যের উপর আছেন।
8124 - عن عبد الله بن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"بينا ثلاثة نفر يتمشون أخذهم المطر، فأووا إلى غار في جبل فانحطت على فم غارهم صخرة من الجبل، فانطبقت عليهم، فقال بعضهم لبعض: انظروا أعمالًا عملتموها صالحة لله، فادعوا الله تعالى بها، لعل الله يفرجها عنكم، فقال أحدهم: اللهم إنه كان لي والدان شيخان كبيران، وامرأتي، ولي صبية صغار أرعي عليهم، فإذا أرحت عليهم، حلبت فبدأت بوالدي، فسقيتهما قبل بنيّ، وأنه نأى بي ذات يوم الشجر، فلم آت حتى أمسيت فوجدتهما قد ناما، فحلبت كما كنت أحلب، فجئت بالحِلاب، فقمت عند رؤوسهما، أكره أن أوقظهما من نومهما، وأكره أن أسقي الصبية قبلهما، والصبية يتضاغون عند قدمي، فلم يزل ذلك دأبي ودأبهم حتى طلع الفجر، فإن كنتَ تعلم أني فعلت ذلك ابتغاء وجهك، فافرج لنا منها فرجة، نرى منها السماء، ففرج الله منها فرجة، فرأوا منها السماء.
وقال الآخر: اللهم إنه كانت لي ابنة عم أحببتها كأشد ما يحب الرجال النساء،
وطلبت إليها نفسها، فأبت حتى آتيها بمائة دينار، فتعبت حتى جمعت مائة دينار، فجئتها بها، فلما وقعت بين رجليها، قالت: يا عبد الله، اتق الله، ولا تفتح الخاتم إلا بحقه، فقصت عنها، فإن كنت تعلم أني فعلت ذلك ابتغاء وجهك، فافرج لنا منها فرجة، ففرج لهم.
وقال الآخر: اللهم إني كنت استأجرت أجيرًا بفرق أرزّ، فلما قضى عمله قال: أعطني حقي، فعرضت عليه فرقه فرغب عنه، فلم أزل أزرعه حتى جمعت منه بقرًا ورعاءها، فجاءني فقال: اتق الله ولا تظلمني حقي، قلت: اذهب إلى تلك البقر ورعائها فخذها، فقال: اتق الله ولا تستهزئ بي فقلت: إني لا أستهزئ بك، خذ ذلك البقر ورعاءها، فأخذه فذهب به، فإن كنت تعلم أني فعلت ذلك ابتغاء وجهك، فافرج لنا ما بقي، ففرج الله ما بقي".
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2215) ومسلم في الذكر (2743) كلاهما من حديث موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر .. فذكره.
وقوله:"نأى" أي بعُدَ.
وقوله:"الحِلاب" هو الإناء الذي يُحلب فيه يسع حلبة ناقة.
وقوله:"يتضاغون" أي يصيحون ويستغيثون من الجوع.
وقوله:"فرق" هو إناء يسع ثلاثة آصع.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "একদা তিন ব্যক্তি পথ চলছিল, এমন সময় তাদের বৃষ্টি এসে ধরল। তারা পাহাড়ের একটি গুহায় আশ্রয় নিল। হঠাৎ পাহাড় থেকে একটি পাথর গড়িয়ে এসে গুহার মুখে পড়ে গেল এবং তাদের ওপর দরজা বন্ধ করে দিল। তখন তারা একে অপরের সঙ্গে বলাবলি করল: তোমরা আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে যে সৎকাজ করেছ, তা দিয়ে আল্লাহ্র কাছে দুআ করো। হয়তো আল্লাহ তোমাদের ওপর থেকে এই বিপদ দূর করে দেবেন।"
তাদের একজন বলল: "হে আল্লাহ! আমার বৃদ্ধ মা-বাবা ছিলেন, স্ত্রী ছিল এবং ছোট ছোট কিছু সন্তান ছিল, যাদের আমি পশুপালন করে জীবিকা নির্বাহ করতাম। যখন আমি (সন্ধ্যায়) বাড়ি ফিরতাম, দুধ দোহন করতাম এবং আমার সন্তানদের আগে আমার মা-বাবাকে পান করাতাম। একদিন গাছ (চারণভূমি) আমাকে অনেক দূরে নিয়ে গিয়েছিল। তাই আমি ফিরতে ফিরতে সন্ধ্যা হয়ে গেল এবং আমি দেখলাম তাঁরা (মা-বাবা) ঘুমিয়ে পড়েছেন। আমি আগের মতোই দুধ দোহন করলাম এবং পাত্রটি নিয়ে তাঁদের মাথার কাছে দাঁড়িয়ে থাকলাম। তাঁদের ঘুম ভাঙাতে আমি অপছন্দ করলাম এবং তাঁদের আগে সন্তানদের পান করাতে অপছন্দ করলাম। অথচ আমার সন্তানেরা আমার পায়ের কাছে (ক্ষুধায়) চিৎকার করছিল। ফজর উদিত হওয়া পর্যন্ত আমার ও তাদের এই অবস্থা চলল। হে আল্লাহ! তুমি যদি জানো যে আমি তোমার সন্তুষ্টি লাভের জন্যই তা করেছিলাম, তবে আমাদের জন্য এই পাথরটি একটু সরিয়ে দাও, যাতে আমরা আকাশ দেখতে পাই।" ফলে আল্লাহ তাআলা পাথরটিকে সামান্য সরিয়ে দিলেন এবং তারা আকাশ দেখতে পেল।
অপরজন বলল: "হে আল্লাহ! আমার একজন চাচাতো বোন ছিল। পুরুষরা নারীদেরকে যতটা ভালোবাসে, আমি তাকে তার চেয়েও তীব্রভাবে ভালোবাসতাম। আমি তার কাছে কুপ্রস্তাব দিলাম, কিন্তু সে রাজি হলো না, যতক্ষণ না আমি তাকে একশো দিনার দিই। এরপর আমি কষ্ট করে একশো দিনার সংগ্রহ করলাম এবং তার কাছে নিয়ে এলাম। যখন আমি তার দুই পায়ের মাঝখানে পৌঁছলাম (অর্থাৎ সহবাসের জন্য প্রস্তুত হলাম), তখন সে বলল: 'হে আল্লাহর বান্দা! আল্লাহকে ভয় করো। অধিকার ছাড়া মোহর (সতীত্ব) ভঙ্গ করো না।' আমি তৎক্ষণাৎ তাকে ছেড়ে দিলাম। হে আল্লাহ! তুমি যদি জানো যে আমি তোমার সন্তুষ্টির জন্যই তা করেছিলাম, তবে আমাদের জন্য এই পাথরটি আরও সরিয়ে দাও।" ফলে আল্লাহ তাদের জন্য (পাথরটি) সরিয়ে দিলেন।
তৃতীয়জন বলল: "হে আল্লাহ! আমি একবার একজন শ্রমিককে এক 'ফারাক' (একটি পরিমাপের পাত্র) চালের বিনিময়ে নিয়োগ করেছিলাম। যখন সে তার কাজ শেষ করল, তখন বলল: 'আমার প্রাপ্য দিয়ে দাও।' আমি তাকে তার প্রাপ্য 'ফারাক' চাল পেশ করলাম, কিন্তু সে তা নিতে অস্বীকার করল (বা তুচ্ছ জ্ঞান করল)। এরপর আমি তার সেই চাল বারবার চাষ করতে থাকলাম, ফলে তা থেকে অনেক গরু এবং তাদের রাখাল সংগ্রহ করলাম। এরপর সে আমার কাছে এসে বলল: 'আল্লাহকে ভয় করো এবং আমার প্রাপ্য থেকে আমাকে বঞ্চিত করো না।' আমি বললাম: 'ঐ গরুগুলো এবং তাদের রাখালকে নিয়ে যাও।' সে বলল: 'আল্লাহকে ভয় করো! আমার সাথে ঠাট্টা করো না।' আমি বললাম: 'আমি তোমার সাথে ঠাট্টা করছি না। ঐ গরুগুলো ও তাদের রাখালকে নিয়ে যাও।' সে তখন সেগুলো নিয়ে চলে গেল। হে আল্লাহ! তুমি যদি জানো যে আমি তোমার সন্তুষ্টি লাভের জন্যই তা করেছিলাম, তবে আমাদের জন্য অবশিষ্টটুকু (পাথর) সরিয়ে দাও।" ফলে আল্লাহ অবশিষ্টটুকুও সরিয়ে দিলেন।
8125 - عن أبي بكرة قال: لقد نفعني الله بكلمة سمعتها من رسول الله صلى الله عليه وسلم أيام الجمل بعدما كدت أن ألْحق بأصحاب الجمل فأقاتل معهم، قال: لما بلغ رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أهل فارس قد ملّكوا عليهم بنت كسرى، قال:"لن يفلح قوم ولّوا أمرهم امرأة".
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4425) عن عثمان بن الهيثم، حدثنا عوف، عن الحسن، عن أبي بكرة .. فذكره.
وأما ما روي عن أبي هريرة قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحد أبوي بلقيس كان جنيًّا" فهو ضعيف: رواه ابن عدي في الكامل (3/ 1209) والثعالبي في تفسيره (7/ 202) كلاهما من رواية هشام بن عمار قال: ثنا الوليد بن مسلم، ثنا سعيد بن بشير، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة .. فذكره.
قال ابن عدي:"لا أعلمه رواه عن قتادة غير سعيد بن بشير".
وعدّ الذهبي هذا الحديث في جملة ما استنكرت عليه، الميزان (2/ 129).
وقال ابن كثير:"هذا حديث غريب" في سنده ضعف البداية (2/ 21).
وقال ابن نمير:"يروي عن قتادة المنكرات" وبنحوه قال ابن حبان كما في تهذيب الكمال.
وكذلك لا يصح ما روى عن أبي الصديق الناجي قال:"خرج سليمان بن داود يستسقي فإذا نملة مستلقية على قفاها رافعة قوائمها تقول: يا رب إنا خلق من خلقك، لا غنى لنا عن سقياك ورزقك، اللهم إن لم تسقنا وترزقنا هلكنا، فقال سليمان: ارجعوا فقد سقيتم بدعوة غيركم".
رواه ابن أبي شيبة في المصنف (6/ 62) وابن أبي حاتم في تفسيره (9/ 2858) وأبو بكر الشافعي في الغيلانيات (640) وابن حبان في الثقات (8/ 414) وأبو نعيم في الحلية (3/ 101) كلهم من طرق عن مسعر بن كرام، عن زيد العمى، عن أبي الصديق الناجي .. فذكره. وفي سنده: زيد العمي، وهو ضعيف.
আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমাকে একটি বাণীর মাধ্যমে উপকার করেছেন, যা আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে 'জামাল যুদ্ধের' দিনগুলোতে শুনেছিলাম। আমি তো প্রায় 'জামাল যুদ্ধে' অংশগ্রহণকারী লোকজনের সাথে যোগ দিয়ে তাদের পক্ষে যুদ্ধ করার কাছাকাছি পৌঁছে গিয়েছিলাম (কিন্তু এই বাণী শুনে বিরত থাকি)। [তিনি বলেন,] যখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এই সংবাদ পৌঁছালো যে পারস্যবাসীরা কিসরার কন্যাকে তাদের শাসক হিসেবে নিযুক্ত করেছে, তখন তিনি বললেন: "যে জাতি তাদের শাসনভার কোনো নারীর হাতে তুলে দেয়, তারা কখনো সফলকাম হতে পারে না।"
8126 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنما سمّي الخضر أنه جلس على فروة بيضاء، فإذا هي تهتزّ من خلفه خضراء".
صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3402) عن محمد بن سعيد الأصبهاني، أخبرنا ابن المبارك، عن معمر، عن همام بن منبّه، عن أبي هريرة .. فذكره.
الفروة: الأرض اليابسة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “খিদিরকে এই কারণে নামকরণ করা হয়েছিল যে, তিনি একটি সাদা শুকনো ভূমির উপর বসলেন, অতঃপর তার পশ্চাৎভাগ সবুজ হয়ে কাঁপতে (বা সতেজ হতে) লাগল।”
8127 - عن سعيد بن جبير قال: قلت لابن عباس: إن نوفًا البكالي يزعم: أن موسى صاحبَ الخضر ليس هو موسى بني إسرائيل إنما هو موسى آخر، فقال: كذب عدو الله، حدثنا أبي بن كعب، عن النبي صلى الله عليه وسلم"أن موسى قام خطيبًا في بني إسرائيل، فسُئل أي الناس أعلم؟ فقال: أنا، فعتب الله عليه، إذ لم يرد العلم إليه، فقال له: بلى، لي عبد بمجمع البحرين هو أعلم منك، قال: أي رب ومن لي به؟ - وربما قال سفيان أي
رب وكيف لي به؟ - قال: تأخذ حوتا، فتجعله في مكتل، حيثما فقدت الحوت فهو ثم، وربما قال: فهو ثمه، وأخذ حوتا فجعله في مكتل، ثم انطلق هو وفتاه يوشع بن نون، حتى أتيا الصخرة وضعا رءوسهما، فرقد موسى واضطرب الحوت فخرج، فسقط في البحر فاتخذ سبيله في البحر سربا، فأمسك الله عن الحوت جرية الماء، فصار مثل الطاق، فقال: هكذا مثل الطاق، فانطلقا يمشيان بقية ليلتهما ويومهما، حتى إذا كان من الغد قال لفتاه: آتنا غداءنا، لقد لقينا من سفرنا هذا نصبا، ولم يجد موسى النصب حتى جاوز حيث أمره الله، قال له فتاه: أرأيت إذ أوينا إلى الصخرة، فإني نسيت الحوت وما أنسانيه إلا الشيطان أن أذكره، واتخذ سبيله في البحر عجبا، فكان للحوت سربا ولهما عجبا، قال له موسى: ذلك ما كنا نبغي، فارتدا على آثارهما قصصا، رجعا يقصان آثارهما، حتى انتهيا إلى الصخرة، فإذا رجل مسجى بثوب، فسلم موسى فرد عليه، فقال: وأنى بأرضك السلام؟ قال: أنا موسى، قال موسى بني إسرائيل؟ قال: نعم، أتيتك لتعلمني مما علمت رشدًا، قال: يا موسى إني على علم من علم الله علمنيه الله لا تعلمه، وأنت على علم من علم الله علمكه الله لا أعلمه، قال: هل أتبعك؟ قال: {قَالَ إِنَّكَ لَنْ تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا (67) وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَى مَا لَمْ تُحِطْ بِهِ خُبْرًا} إلى قوله: {إِمْرًا} [الكهف: 67 - 71] فانطلقا يمشيان على ساحل البحر، فمرت بهما سفينة كلموهم أن يحملوهم، فعرفوا الخضر فحملوه بغير نول، فلما ركبا في السفينة جاء عصفور، فوقع على حرف السفينة فنقر في البحر نقرة أو نقرتين، قال له الخضر: يا موسى ما نقص علمي وعلمك من علم الله إلا مثل ما نقص هذا العصفور بمنقاره من البحر، إذ أخذ الفأس فنزع لوحا، قال: فلم يفجأ موسى إلا وقد قلع لوحا بالقدوم، فقال له موسى: ما صنعت؟ قوم حملونا بغير نول عمدت إلى سفينتهم فخرقتها لتغرق أهلها لقد جئت شيئا إمرًا، قال: ألم أقل إنك لن تستطيع معي صبرًا، قال: لا تؤاخذني بما نسيت ولا ترهقني من أمري عسرًا، فكانت الأولى من موسى نسيانا، فلما خرجا من البحر مروا بغلام يلعب مع الصبيان، فأخذ الخضر برأسه فقلعه بيده هكذا - وأومأ سفيان بأطراف أصابعه كأنه يقطف شيئا - فقال له موسى: أقتلت نفسا زكية بغير نفس، لقد جئت شيئا نكرًا، قال: ألم أقل لك إنك لن تستطيع معي صبرا، قال: إن سألتك عن شيء بعدها فلا تصاحبني قد بلغت من لدني عذرًا، فانطلقا، حتى إذا أتيا أهل قرية استطعما أهلها، فأبوا أن يضيفوهما، فوجدا
فيها جدارا يريد أن ينقض مائلا، أومأ بيده هكذا - وأشار سفيان كأنه يمسح شيئا إلى فوق، فلم أسمع سفيان يذكر مائلا إلا مرة - قال: قوم آتيناهم فلم يطعمونا ولم يضيفونا، عمدت إلى حائطهم، لو شئت لاتخذت عليه أجرًا، قال: هذا فراق بيني وبينك، سأنبئك بتأويل ما لم تستطع عليه صبرا - قال النبي صلى الله عليه وسلم: - وددنا أن موسى كان صبر فقص الله علينا من خبرهما - قال سفيان: قال النبي صلى الله عليه وسلم: - يرحم الله موسى، لو كان صبر يقص علينا من أمرهما، وقرأ ابن عباس: (أمامهم ملك يأخذ كل سفينة صالحة غصبًا، وأما الغلام فكان كافرًا وكان أبواه مؤمنين).
ثم قال لي سفيان: سمعته منه مرتين: وحفظته منه، قيل لسفيان: حفظته قبل أن تسمعه من عمرو، أو تحفظته من إنسان؟ فقال: ممن أتحفظه؟ ورواه أحد عن عمرو غيري، سمعته منه مرتين، أو ثلاثا، وحفظته منه.
متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3401) ومسلم في الفضائل (2380: 170) كلاهما من طرق عن سفيان، حدثنا عمرو بن دينار، قال أخبرني سعيد بن جبير، قال: قلت لابن عباس .. فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন) আমি তাঁকে বললাম, নাওফ আল-বুকালী দাবি করে যে, খিযির (আঃ)-এর সঙ্গী মূসা (আঃ) বনী ইসরাঈলের মূসা নন, বরং অন্য একজন মূসা। তখন তিনি বললেন: আল্লাহর দুশমন মিথ্যা বলেছে। উবাই ইবনু কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের নিকট নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, মূসা (আঃ) একবার বনী ইসরাঈলের মাঝে খুতবা দেওয়ার জন্য দাঁড়ালেন। তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো, মানুষের মধ্যে সবচেয়ে জ্ঞানী কে? তিনি বললেন: আমি। আল্লাহ্ তাঁর প্রতি অসন্তুষ্ট হলেন, কারণ তিনি জ্ঞানকে আল্লাহর দিকে প্রত্যাবর্তিত করেননি। আল্লাহ্ তাঁকে বললেন: না, দুই সমুদ্রের সঙ্গমস্থলে আমার এক বান্দা আছে, যে তোমার চেয়েও বেশি জ্ঞানী। মূসা (আঃ) বললেন: হে আমার রব, আমি তাঁকে কীভাবে পাব? (সুফিয়ান সম্ভবত বলেছিলেন: হে আমার রব, আমি তাঁর কাছে কীভাবে পৌঁছব?) আল্লাহ্ বললেন: তুমি একটি মাছ নাও এবং একটি ঝুড়িতে রাখো। যখনই মাছটি হারাবে, তখনই সে সেখানে থাকবে। (সুফিয়ান সম্ভবত বলেছিলেন: সে সেখানেই থাকবে।)
মূসা (আঃ) একটি মাছ নিলেন এবং ঝুড়িতে রাখলেন। এরপর তিনি এবং তাঁর খাদেম ইউশা ইবনু নূন রওয়ানা হলেন। চলতে চলতে তারা একটি পাথরের কাছে পৌঁছলেন এবং সেখানে মাথা রেখে ঘুমিয়ে পড়লেন। মূসা (আঃ) যখন ঘুমিয়ে পড়লেন, তখন মাছটি নড়াচড়া করে ঝুড়ি থেকে বের হয়ে সমুদ্রে পড়ে গেল এবং সমুদ্রের মধ্যে সুড়ঙ্গের মতো পথ করে নিল। আল্লাহ্ মাছটির উপর পানির প্রবাহ বন্ধ করে দিলেন, ফলে পথটি খিলানের মতো হয়ে গেল। (তিনি ইশারা করে বললেন: এই খিলানের মতো।) এরপর তারা সেই রাতের বাকি অংশ এবং পরের দিন হেঁটে চললেন।
পরের দিন সকালে মূসা (আঃ) তাঁর খাদেমকে বললেন: আমাদের খাবার নিয়ে এসো, আমরা এই সফরে দারুণ ক্লান্ত হয়ে পড়েছি। আল্লাহ্ তাঁকে যেখানে যেতে বলেছিলেন, সেই স্থান অতিক্রম না করা পর্যন্ত মূসা (আঃ) ক্লান্তি অনুভব করেননি।
তাঁর খাদেম বললেন: আপনি কি লক্ষ করেছেন, যখন আমরা পাথরের কাছে বিশ্রাম নিচ্ছিলাম, তখন আমি মাছটির কথা ভুলে গিয়েছিলাম। শয়তান ছাড়া আর কেউ আমাকে তা স্মরণ করাতে ভুলিয়ে দেয়নি। আর মাছটি আশ্চর্যজনকভাবে সমুদ্রের মধ্যে তার পথ করে নিয়েছিল। (মাছটির জন্য তা ছিল পথ, আর তাঁদের উভয়ের জন্য ছিল এক বিস্ময়।) মূসা (আঃ) বললেন: আমরা তো সেটাই খুঁজছিলাম। অতঃপর তাঁরা উভয়ে নিজেদের পদচিহ্ন অনুসরণ করে ফিরে চললেন। তাঁরা নিজেদের পায়ের চিহ্ন ধরে ফিরে চললেন, অবশেষে সেই পাথরের কাছে পৌঁছলেন।
সেখানে একজন লোককে দেখলেন কাপড়ে আবৃত অবস্থায়। মূসা (আঃ) সালাম দিলেন। লোকটি সালামের জবাব দিলেন। অতঃপর বললেন: আপনার এলাকায় কীভাবে সালাম এলো? মূসা (আঃ) বললেন: আমি মূসা। লোকটি বললেন: বনী ইসরাঈলের মূসা? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমি আপনার নিকট এসেছি, যেন আপনি আমাকে আল্লাহ্র শেখানো জ্ঞানের কিছু ভালো কথা শিক্ষা দিতে পারেন। লোকটি বললেন: হে মূসা, আল্লাহ্র জ্ঞানের এমন কিছু বিষয় আমার কাছে আছে যা আল্লাহ আমাকে শিক্ষা দিয়েছেন, যা আপনি জানেন না। আর আপনার কাছে আল্লাহ্র জ্ঞানের এমন কিছু বিষয় আছে যা আল্লাহ্ আপনাকে শিক্ষা দিয়েছেন, যা আমি জানি না। মূসা (আঃ) বললেন: আমি কি আপনার অনুসরণ করতে পারি? তিনি বললেন: {নিশ্চয়ই আপনি আমার সাথে ধৈর্য ধারণ করে থাকতে পারবেন না। আর যে বিষয় আপনার জ্ঞানের আওতাভুক্ত নয়, তাতে আপনি কীভাবে ধৈর্য ধারণ করবেন?}— এ থেকে শুরু করে {গুরুতর কাজ} পর্যন্ত (সূরা আল-কাহ্ফ: ৬৭-৭১)।
এরপর তাঁরা উভয়ে সমুদ্রের তীরে হেঁটে চললেন। তাদের পাশ দিয়ে একটি নৌকা গেল। তাঁরা নৌকার আরোহীদেরকে তাঁদের তুলে নিতে বললেন। তারা খিযির (আঃ)-কে চিনতে পারল এবং কোনো ভাড়া ছাড়াই তাঁদেরকে তুলে নিল। যখন তাঁরা নৌকায় উঠলেন, তখন একটি চড়ুই পাখি এসে নৌকার কিনারে বসল এবং একবার অথবা দু’বার সমুদ্রের পানিতে ঠোকর দিল। খিযির (আঃ) মূসা (আঃ)-কে বললেন: হে মূসা, আমার জ্ঞান ও আপনার জ্ঞান আল্লাহর জ্ঞানের তুলনায় ততটুকুও কমায়নি, যতটুকু এই চড়ুই পাখিটি তার ঠোঁট দিয়ে সমুদ্র থেকে কমিয়েছে।
অতঃপর খিযির (আঃ) কুঠার নিলেন এবং নৌকার একটি তক্তা তুলে ফেললেন। মূসা (আঃ) কিছু বুঝে ওঠার আগেই তিনি একটি আদ্ল (ছোরা)-এর দ্বারা একটি তক্তা উপড়ে ফেললেন। মূসা (আঃ) তাঁকে বললেন: আপনি একি করলেন? এ লোকেরা আমাদেরকে কোনো ভাড়া ছাড়াই তুলে নিলেন, আর আপনি তাদের নৌকাটি ফুটো করে দিলেন, যাতে এর আরোহীরা ডুবে যায়? নিশ্চয়ই আপনি এক গুরুতর কাজ করলেন! তিনি বললেন: আমি কি বলিনি যে, আপনি আমার সঙ্গে ধৈর্য ধারণ করে থাকতে পারবেন না? মূসা (আঃ) বললেন: আমি যা ভুলে গিয়েছি, সে জন্য আমাকে পাকড়াও করবেন না এবং আমার ব্যাপারে কঠোরতা করবেন না। (মূসা (আঃ)-এর প্রথম ভুলটি ছিল ভুলে যাওয়ার কারণে।)
এরপর যখন তাঁরা উভয়ে সমুদ্র থেকে বের হলেন, তখন তাঁরা একটি বালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে অন্যান্য বালকদের সাথে খেলছিল। খিযির (আঃ) তার মাথা ধরলেন এবং নিজের হাত দিয়ে তা ছিঁড়ে ফেললেন—সুফিয়ান তাঁর আঙ্গুলের ডগা দিয়ে ইশারা করলেন, যেন তিনি কিছু ছিঁড়ে নিচ্ছেন। মূসা (আঃ) তাঁকে বললেন: আপনি কি কোনো প্রাণের বিনিময় ছাড়াই একটি নিষ্পাপ প্রাণকে হত্যা করলেন? নিশ্চয়ই আপনি এক জঘন্য কাজ করেছেন! তিনি বললেন: আমি কি আপনাকে বলিনি যে, আপনি আমার সাথে ধৈর্য ধারণ করে থাকতে পারবেন না? মূসা (আঃ) বললেন: এরপর যদি আমি আপনাকে কোনো বিষয়ে জিজ্ঞাসা করি, তবে আর আমাকে আপনার সঙ্গী রাখবেন না; আপনি আমার দিক থেকে তখন (বিচ্ছেদের) একটি ওজর পেয়ে যাবেন।
এরপর তাঁরা চলতে লাগলেন, যখন তাঁরা একটি জনপদের অধিবাসীদের কাছে পৌঁছলেন এবং তাঁদের কাছে খাবার চাইলেন, কিন্তু তারা তাঁদেরকে মেহমানদারি করতে অস্বীকার করল। অতঃপর তাঁরা সেখানে একটি দেয়াল দেখতে পেলেন, যা হেলে পড়ে যাওয়ার উপক্রম হয়েছিল। (তিনি হাত দিয়ে এভাবে ইশারা করলেন—সুফিয়ান যেন উপর দিকে কিছু মুছে দেওয়ার ইঙ্গিত করলেন। সুফিয়ানকে একবারের বেশি ‘হেলে পড়া’ শব্দটি বলতে শুনিনি।)
মূসা (আঃ) বললেন: এই জনপদের লোকেরা, যাদের কাছে আমরা এলাম, কিন্তু তারা আমাদের খেতে দিল না এবং মেহমানদারিও করল না; আর আপনি তাদের দেয়াল ঠিক করে দিলেন? আপনি ইচ্ছে করলে এর জন্য মজুরি নিতে পারতেন। খিযির (আঃ) বললেন: এখানেই আমার ও আপনার মাঝে বিচ্ছেদ। যে বিষয়গুলোতে আপনি ধৈর্য ধারণ করতে পারেননি, আমি সেগুলোর ব্যাখ্যা আপনাকে জানিয়ে দেব।
নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমরা আশা করি, মূসা (আঃ) যদি আরও ধৈর্য ধারণ করতেন, তবে আল্লাহ্ আমাদের কাছে তাঁদের উভয়ের আরও খবর বর্ণনা করতেন।
সুফিয়ান বলেন: নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ্ মূসা (আঃ)-এর প্রতি দয়া করুন, যদি তিনি ধৈর্য ধারণ করতেন, তবে আল্লাহ্ তাঁদের উভয়ের আরও ঘটনা আমাদের কাছে বর্ণনা করতেন।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিলাওয়াত করতেন: (তাদের সামনে ছিল এক রাজা, যে প্রতিটি [ভালো] নৌকা জোর করে কেড়ে নিত। আর বালকটির ব্যাপার হলো, সে ছিল কাফির, আর তার পিতামাতা ছিলেন মু’মিন।)
এরপর সুফিয়ান আমাকে বললেন: আমি এটি তাঁর (আম্র ইবনু দীনার) থেকে দু’বার শুনেছি এবং তা মুখস্থ করেছি। সুফিয়ানকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি কি আম্র (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কাছ থেকে শোনার আগে মুখস্থ করেছিলেন, নাকি কারো কাছ থেকে মুখস্থ করে নিয়েছিলেন? তিনি বললেন: আমি কার কাছ থেকে মুখস্থ করব? আম্র (রাহিমাহুল্লাহ)-এর থেকে তো আমি ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেনি। আমি তাঁর থেকে দু’বার বা তিনবার শুনেছি এবং তা মুখস্থ করেছি।
8128 - عن عبد الله بن عمر قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، صلاة العشاء، في آخر حياته، فلما سلم قام فقال:"أرأيتكم ليلتكم هذه؟ فإن على رأس مائة سنة منها لا يبقى ممن هو على ظهر الأرض أحد".
قال ابن عمر: فوهل الناس في مقالة رسول الله صلى الله عليه وسلم تلك، فيما يتحدثون من هذه الأحاديث، عن مائة سنة، وإنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يبقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض أحد" يريد بذلك أن ينخرم ذلك القرن".
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (116)، ومسلم في كتاب فضائل الصحابة (217 - 2537) كلاهما من طرق عن ابن شهاب الزهري، أخبرني سالم بن عبد الله وأبو بكر بن سليمان بن أبي خيثمة، أن عبد الله بن عمر قال .. فذكره.
ففيه:"لا يبقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض أحد" وهذا نكرة في سياق النفي من صيغ العموم، يدخل فيه الخضر وغيره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবনের শেষদিকে এক রাতে আমাদের নিয়ে ইশার সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন দাঁড়িয়ে বললেন: "তোমরা কি তোমাদের এই রাতটি সম্পর্কে অবগত আছো? কেননা, এই রাত থেকে একশ বছর পূর্ণ হলে, যারা বর্তমানে পৃথিবীর পৃষ্ঠে রয়েছে, তাদের কেউই আর অবশিষ্ট থাকবে না।" ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তিটি নিয়ে লোকেরা ভুল বোঝাবুঝিতে পতিত হয়েছে, বিশেষত যখন তারা একশ বছর সম্পর্কিত এসব হাদীস নিয়ে আলোচনা করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এইটুকুই বলেছিলেন: "যারা আজ পৃথিবীর পৃষ্ঠে রয়েছে, তাদের কেউই অবশিষ্ট থাকবে না।" এর দ্বারা তিনি ঐ প্রজন্মটির সমাপ্তি বোঝাতে চেয়েছিলেন।
8129 - عن جابر بن عبد الله يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول قبل أن يموت بشهر:"تسألوني عن الساعة؟ وإنما علمها عند الله، وأقسم بالله ما على الأرض من نفس منفوسة تأتي عليها مائة سنة".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2538 - 218) من طريقين عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول .. فذكره.
ورواه من طريقين آخرين عن سليمان بن طرخان: حدثنا عبد الرحمن بن آدم صاحب السقاية، وأبو نضرة كلاهما عن جابر بن عبد الله عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال ذلك قبل موته بشهر، أو نحو ذلك:"ما من نفس منفوسة اليوم تأتي عليها مائة سنة، وهي حية يومئذ".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর মৃত্যুর এক মাস পূর্বে বলতে শুনেছি: "তোমরা কি আমাকে কিয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছো? এর জ্ঞান তো কেবল আল্লাহর কাছেই রয়েছে। আমি আল্লাহর কসম করে বলছি, যমীনে আজ যে প্রাণ আছে, তাদের কেউই একশো বছর অতিক্রম করতে পারবে না।"
8130 - عن أبي سعيد الخدري قال: لما رجع النبي صلى الله عليه وسلم من تبوك سألوه عن الساعة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تأتي مائة سنة وعلى الأرض نفس منفوسة اليوم".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2539 - 219) من طرق عن أبي خالد سليمان بن حيان، عن داود، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد .. فذكره.
وقد سئل شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله عن حياة خضر فقال: لو كان الخضر حيا لوجب عليه أن يأتي النبي صلى الله عليه وسلم ويجاهد بين يديه، ويتعلم منه، وقد قال النبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر:"اللهم إن تهلك هذه العصابة لا تعبد في الأرض"، وكانوا ثلاثمائة وثلاثة عشر رجلًا معروفين بأسمائهم وأسماء آبائهم وقبائلهم، فأين كان الخضر يومئذ؟ انظر: مجموع الفتاوي (4/ 337).
والأحاديث الواردة في حياة الخضر كثيرة أوردها الحافظ ابن حجر في مؤلفه الخاص بأخبار الخضر المسمى:"الزهر النضر في حال الخضر" وبيّن ضعفها، كما تناول بعضها ابن الجوزي في الموضوعات (1/ 308 - 322) وابن كثير في البداية والنهاية (2/ 180) وغيرهم وبيّنوا ضعفها، وأنها لم تصح عن النبي صلى الله عليه وسلم.
يُرِيدُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا يَالَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَا أُوتِيَ قَارُونُ إِنَّهُ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍ (79) وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ اللَّهِ خَيْرٌ لِمَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا وَلَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الصَّابِرُونَ (80) فَخَسَفْنَا بِهِ وَبِدَارِهِ الْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُ مِنْ فِئَةٍ يَنْصُرُونَهُ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُنْتَصِرِينَ} [القصص: 76 - 81].
আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক থেকে ফিরলেন, তখন লোকেরা তাঁকে কিয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "একশ বছর এমনভাবে আসবে না যে, আজকের দিনে পৃথিবীর বুকে যে কোনো সজীব প্রাণ (মানুষ) বিদ্যমান আছে, তাদের কেউ (তখনও) জীবিত থাকবে।"
8131 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه ذكر الصلاة يومًا فقال:"من حافظ عليها كانت له نورًا وبرهانًا ونجاة يوم القيامة، ومن لم يحافظ عليها لم يكن له نور ولا برهان ولا نجاة، وكان يوم القيامة مع قارون، وفرعون، وهامان، وأبي بن خلف".
حسن: رواه أحمد (2/ 169) عن أبي عبد الرحمن - وهو عبد الله بن يزيد المقرئ - ثنا سعيد - وهو ابن أبي أيوب، حدثني كعب بن علقمة، عن عيسى بن هلال الصدفي، عن عبد الله بن عمرو بن العاص .. فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه ابن حبان (1467) في صحيحه.
وإسناده حسن من أجل عيسى بن هلال الصدفي فإنه حسن الحديث.
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 292):"رواه أحمد والطبراني في الكبير والأوسط، ورجال أحمد ثقات".
وذكره المنذري في الترغيب والترهيب (839) وقال: رواه أحمد بإسناد جيد.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন সালাত (নামাজ) প্রসঙ্গে আলোচনা করতে গিয়ে বললেন: "যে ব্যক্তি সালাতকে সংরক্ষণ করে, ক্বিয়ামাত দিবসে তা তার জন্য নূর, প্রমাণ (দলীল) ও মুক্তির কারণ হবে। আর যে ব্যক্তি সালাতকে সংরক্ষণ করে না, তার জন্য ক্বিয়ামাত দিবসে কোনো নূর, প্রমাণ বা মুক্তি থাকবে না। বরং ক্বিয়ামাত দিবসে সে কারূন, ফিরআউন, হামান ও উবাই ইবনু খালাফের সাথে থাকবে।"
8132 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس لم تُحبس على بشرٍ إلا ليوشع ليالي سار إلى بيت المقدس".
صحيح: رواه أحمد (8315) ومن طريقه الفسوي في المعرفة والتاريخ (2/ 172) عن أسود بن عامر، أخبرنا أبو بكر عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره .. إسناده صحيح. وصحّحه أيضا الحافظ في الفتح (6/ 221).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “ইউশা’ (আঃ) ব্যতীত অন্য কোনো মানুষের জন্য সূর্যকে কখনো আটকে রাখা বা স্থগিত করা হয়নি; যখন তিনি বাইতুল মাকদিসের দিকে যাত্রা করছিলেন।”
8133 - عن أبي هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر أحاديث منها:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"غزا نبي من الأنبياء، فقال لقومه: لا يتبعني رجل قد ملك بُضْع امرأة، وهو يريد أن يبني بها، ولما يبن، ولا آخر قد بنى بنيانًا، ولما يرفع سقفها، ولا آخر قد اشترى غنمًا أو خلفات، وهو منتظر ولادها قال: فغزا فأدنى للقرية حين صلاة العصر، أو قريبًا من ذلك، فقال للشمس: أنتِ مأمورة وأنا مأمور، اللهم احبسها عليَّ شيئًا فحُبسَت عليه حتى فتح الله عليه. قال: فجمعوا ما غنموا. فأقبلت النار لتأكله، فأبت أَن تطعمه، فقال: فيكم غلول، فليبايعني من كل قبيلة
رجل، فبايعوه، فلصقتْ يدُ رجل بيده، فقال: فيكم الغلول. فلتبايعني قبيلتك، فبايعتْه قال: فلصقتْ بيد رجلين أو ثلاثة، فقال: فيكم الغلول، أنتم غللتم، قال: فأخرجوا له مثل رأس بقرة من ذهب، قال: فوضعوه في المال وهو بالصعيد، فأقبلت النار فأكلته، فلم تحل الغنائم لأحد من قبلنا، ذلك بأن الله تبارك وتعالى رأى ضعفنا وعجْزنا، فطيّبها لنا".
متفق عليه: رواه البخاري في فرض الخمس (3124) ومسلم في الجهاد والسير (1747) كلاهما من طريق ابن المبارك، عن معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكره .. واللفظ لمسلم.
كان يوشع بن نون نبيًّا من أنبياء بني إسرائيل، ووصيّ موسى عليه السلام بعد وفاته، وكان أحد النقباء لسبط يوسف عليه السلام، وكانوا أربعين ألفا وخمسائة شخص، وهو الذي خرج ببني إسرائيل بعد وفاة موسى عليه السلام من القبة، وقصد بهم بيت المقدس، فقطع نهر الأردن وانتهى إلى مدينة أريحا، وكانت من أحصن المدائن سورًا، وأعلاها قصورًا، وأكثرها أهلًا، فحاصرها ستة أشهر، ثم افتتحها، وقيل: حبست له الشمس في محاصرته لمدينة أريحا، وقيل: كان ذلك في فتح بيت المقدس، والله أعلم. انظر: البداية والنهاية (2/ 235 - 236).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীদের মধ্যে একজন নবী যুদ্ধাভিযান পরিচালনা করলেন। তিনি তাঁর কওমকে বললেন: এমন কোনো ব্যক্তি যেন আমার অনুসরণ না করে, যে কোনো নারীকে বিবাহ করেছে এবং তার সাথে সহবাসের ইচ্ছা করে, কিন্তু এখনও সহবাস করেনি; কিংবা এমন ব্যক্তি, যে কোনো ঘর নির্মাণ করেছে, কিন্তু এখনও তার ছাদ তোলেনি; অথবা এমন ব্যক্তি, যে বকরী বা গর্ভবতী উটনি ক্রয় করেছে এবং সেগুলোর প্রসবের অপেক্ষায় আছে।"
তিনি (ঐ নবী) এরপর যুদ্ধাভিযান করলেন এবং আসরের নামাযের সময় কিংবা এর কাছাকাছি সময়ে গ্রামটির নিকটে পৌঁছলেন। তখন তিনি সূর্যকে বললেন: 'তুমি আদিষ্ট এবং আমিও আদিষ্ট। হে আল্লাহ! তুমি এর (সূর্যকে) গতিপথ আমার জন্য সামান্য সময়ের জন্য থামিয়ে দাও।' তখন তা তাঁর জন্য থেমে গেল, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁকে বিজয় দিলেন।
তিনি বললেন: এরপর তারা যা গনীমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) পেয়েছিল, তা একত্রিত করল। তখন আগুন এলো এবং তা খেয়ে ফেলার (ভস্ম করার) জন্য এগিয়ে গেল, কিন্তু তা খেতে অস্বীকার করল। তখন তিনি বললেন: 'তোমাদের মধ্যে (গনীমতের সম্পদে) খেয়ানত হয়েছে। অতএব, প্রতিটি গোত্রের একজন করে লোক যেন আমার হাতে বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করে।' তারা বাইয়াত করল। তখন একজন ব্যক্তির হাত তাঁর হাতের সাথে আটকে গেল। তিনি বললেন: 'তোমাদের গোত্রের মধ্যে খেয়ানত হয়েছে। তোমার গোত্র যেন আমার হাতে বাইয়াত করে।' তখন গোত্রটি তাঁর হাতে বাইয়াত করল।
তিনি বললেন: এরপর দু'জন বা তিনজন লোকের হাত তাঁর হাতের সাথে আটকে গেল। তখন তিনি বললেন: 'তোমাদের মধ্যে খেয়ানত হয়েছে, তোমরাই খেয়ানত করেছ।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন তারা গরুর মাথার আকারের এক খণ্ড সোনা তাঁর জন্য বের করে দিল। তিনি বলেন: তারা সেটাকে (গনীমতের) সম্পদের মধ্যে খোলা প্রান্তরে রাখল। তখন আগুন এলো এবং তা খেয়ে ফেলল (ভস্ম করে দিল)।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাদের পূর্বের কোনো উম্মতের জন্য গনীমতের মাল হালাল করা হয়নি। এটি এ কারণে যে, আল্লাহ তা'আলা আমাদের দুর্বলতা ও অক্ষমতা দেখেছেন, তাই তিনি এটি আমাদের জন্য বৈধ করে দিয়েছেন।"
8134 - عن أبي هريرة رضي الله عنه حدثه أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن ثلاثة في بني إسرائيل: أبرص وأقرع وأعمى، فأراد الله أن يبتليهم، فبعث إليهم ملكًا، فأتى الأبرص فقال: أي شيء أحب إليك؟ قال: لون حسن وجلد حسن، ويذهب عني الذي قد قذرني الناس، قال: فمسحه فذهب عنه، فأعطي لونًا حسنًا، وجلدًا حسنًا، فقال: فأي المال أحب إليك؟ قال: الإبل - أو قال: البقر، هو شك في ذلك، إن الأبرص والأقرع: قال أحدهما الإبل، وقال الآخر البقر - فأعطى ناقةً عشراء، فقال: يُبارك لك فيها، وأتى الأقرع فقال: أي شيء أحب إليك؟ قال: شعر حسن، ويذهب عني هذا، قد قذرني الناس، قال: فمسحه فذهب، وأعطى شعرًا حسنًا، قال: فأي المال أحب إليك؟ قال: البقر، قال: فأعطاه بقرةً حاملًا، وقال: يبارك لك فيها، وأتى الأعمى فقال: أي شيء أحب إليك؟ قال: يرد الله إلي بصري، فأبصر به الناس، قال: فمسحه فرد الله إليه بصره، قال: فأي المال أحب إليك؟ قال: الغنم، فأعطاه شاةً والدًا فأُنتج هذان وولّد هذا، قال: فكان لهذا واد من إبل، ولهذا واد من بقر، ولهذا واد من الغنم، ثم إنه أتى الأبرص في صورته وهيئته، فقال: رجل مسكين
قد تقطعت بي الحبال في سفري، فلا بلاغ لي اليوم إلا بالله ثم بك، أسألك بالذي أعطاك اللون الحسن والجلد الحسن والمال، بعيرًا أتبلغ عليه في سفري، فقال: إن الحقوق كثيرة، فقال له: كأني أعرفك، ألم تكن أبرص يقذرك الناس فقيرًا فأعطاك الله؟ فقال: لقد ورثت لكابر عن كابر، فقال: إن كنت كاذبا فصيرك الله إلى ما كنت. وأتى الأقرع في صورته وهيئته، فقال له مثل ما قال لهذا، ورد عليه مثل ما رد عليه هذا، فقال: إن كنت كاذبا فصيرك الله إلى ما كنت. وأتى الأعمى في صورته، فقال: رجل مسكين وابن سبيل، وتقطعت بي الحبال في سفري، فلا بلاغ اليوم إلا بالله ثم بك، أسألك بالذي رد عليك بصرك شاة أتبلغ بها في سفري، فقال: قد كنت أعمى فرد الله بصري، وفقيرًا فقد أغناني، فخذ ما شئت، فوالله لا أجهدك اليوم بشيء أخذته لله، فقال: أمسك مالك، فإنما ابتليتم، فقد رضي الله عنك، وسخط على صاحبيك".
متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3464) ومسلم في الزهد (2964) كلاهما من حديث همام، حدثنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، حدثني عبد الرحمن بن أبي عمرة، أن أبا هريرة حدثه أنه سمع صلى الله عليه وسلم يقول .. فذكره واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "বনী ইসরাঈলের মধ্যে তিনজন লোক ছিল: একজন ছিল শ্বেতরোগী, একজন ছিল টাকমাথা এবং একজন ছিল অন্ধ। আল্লাহ্ তাদেরকে পরীক্ষা করতে চাইলেন। তাই তিনি তাদের কাছে একজন ফেরেশতা পাঠালেন।
ফেরেশতা প্রথমে শ্বেতরোগীর কাছে এসে বললেন: তোমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় জিনিস কী? সে বলল: সুন্দর রং ও সুন্দর চামড়া এবং যা দেখে মানুষ আমাকে ঘৃণা করে, তা যেন দূর হয়ে যায়। বর্ণনাকারী বলেন: তখন ফেরেশতা তাকে মুছে দিলেন (স্পর্শ করলেন), ফলে তার রোগ দূর হয়ে গেল এবং তাকে সুন্দর রং ও সুন্দর চামড়া দেওয়া হলো। এরপর ফেরেশতা বললেন: তোমার কাছে কোন ধরনের সম্পদ সবচেয়ে প্রিয়? সে বলল: উট – অথবা তিনি বললেন, গরু। (রাবী সন্দেহ করেছেন, শ্বেতরোগী ও টাকমাথার মধ্যে একজন উট চেয়েছিল এবং অন্যজন গরু চেয়েছিল।) অতঃপর ফেরেশতা তাকে একটি দশ মাসের গর্ভবতী উটনী দিলেন এবং বললেন: আল্লাহ্ এর মধ্যে তোমাকে বরকত দিন।
তারপর তিনি টাকমাথা লোকটির কাছে এসে বললেন: তোমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় জিনিস কী? সে বলল: সুন্দর চুল, আর এই জিনিসটি যেন দূর হয়ে যায়, যার কারণে মানুষ আমাকে ঘৃণা করে। বর্ণনাকারী বলেন: ফেরেশতা তাকে স্পর্শ করলেন, ফলে তা দূর হয়ে গেল এবং তাকে সুন্দর চুল দেওয়া হলো। ফেরেশতা বললেন: তোমার কাছে কোন সম্পদ সবচেয়ে প্রিয়? সে বলল: গরু। ফেরেশতা তাকে একটি গর্ভবতী গাভী দিলেন এবং বললেন: আল্লাহ্ এর মধ্যে তোমাকে বরকত দিন।
তারপর তিনি অন্ধ লোকটির কাছে এসে বললেন: তোমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় জিনিস কী? সে বলল: আল্লাহ্ যেন আমার দৃষ্টি ফিরিয়ে দেন, যাতে আমি মানুষ দেখতে পাই। বর্ণনাকারী বলেন: ফেরেশতা তাকে স্পর্শ করলেন, ফলে আল্লাহ্ তার দৃষ্টি ফিরিয়ে দিলেন। ফেরেশতা বললেন: তোমার কাছে কোন সম্পদ সবচেয়ে প্রিয়? সে বলল: বকরী। অতঃপর ফেরেশতা তাকে একটি বাচ্চা প্রসবকারিনী বকরী দিলেন।
বর্ণনাকারী বলেন: এই দুইজন (উট ও গরুর মালিক) সন্তান উৎপাদন করল এবং এই একজন (বকরীর মালিক) বাচ্চাকাচ্চা জন্ম দিল। ফলে এর (শ্বেতরোগী থেকে আরোগ্য লাভকারীর) এক উপত্যকা ভর্তি উট হলো, এর (টাকমাথা থেকে আরোগ্য লাভকারীর) এক উপত্যকা ভর্তি গরু হলো, এবং এর (অন্ধ থেকে আরোগ্য লাভকারীর) এক উপত্যকা ভর্তি বকরী হলো।
অতঃপর সেই ফেরেশতা পূর্বের শ্বেতরোগীর কাছে তার পুরাতন রূপে এবং বেশে এলেন। তিনি বললেন: আমি একজন অসহায় দরিদ্র লোক, আমার সফরে সব অবলম্বন বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। আজ আল্লাহ্র পর আপনার সাহায্য ছাড়া আমার আর কোনো গন্তব্যে পৌঁছার উপায় নেই। আমি আপনাকে সেই সত্তার দোহাই দিয়ে একটি উট চাচ্ছি, যিনি আপনাকে সুন্দর রং, সুন্দর চামড়া এবং সম্পদ দান করেছেন, যাতে আমি আমার সফর শেষ করতে পারি। লোকটি বলল: পাওনাদারের হক অনেক বেশি। ফেরেশতা তাকে বললেন: আমার মনে হচ্ছে আমি আপনাকে চিনি। আপনি কি সেই শ্বেতরোগী ছিলেন না, যাকে মানুষ ঘৃণা করত এবং আপনি দরিদ্র ছিলেন? এরপর আল্লাহ্ আপনাকে দান করেছেন? সে বলল: আমি তো এই সম্পদ উত্তরাধিকার সূত্রে পূর্বপুরুষদের কাছ থেকে পেয়েছি। ফেরেশতা বললেন: যদি তুমি মিথ্যা বলে থাকো, তবে আল্লাহ্ তোমাকে তোমার পূর্বাবস্থায় ফিরিয়ে দিন।
এরপর ফেরেশতা টাকমাথা লোকটির কাছে তার পুরাতন রূপ ও বেশে এলেন। তিনি তাকে তেমনই বললেন যা তিনি প্রথম জনকে বলেছিলেন। আর সেও তাকে তেমনই উত্তর দিল যেমন প্রথম জন দিয়েছিল। ফেরেশতা বললেন: যদি তুমি মিথ্যা বলে থাকো, তবে আল্লাহ্ তোমাকে তোমার পূর্বাবস্থায় ফিরিয়ে দিন।
তারপর ফেরেশতা অন্ধ লোকটির কাছে তার পূর্বের রূপে এলেন। তিনি বললেন: আমি একজন অসহায় দরিদ্র মুসাফির। আমার সফরে সব অবলম্বন বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। আজ আল্লাহ্র পর আপনার সাহায্য ছাড়া আমার আর কোনো গন্তব্যে পৌঁছার উপায় নেই। আমি আপনাকে সেই সত্তার দোহাই দিয়ে একটি বকরী চাচ্ছি, যিনি আপনার দৃষ্টি ফিরিয়ে দিয়েছেন, যাতে আমি আমার সফর শেষ করতে পারি। লোকটি বলল: আমি তো অন্ধ ছিলাম, অতঃপর আল্লাহ্ আমার দৃষ্টি ফিরিয়ে দিয়েছেন; আর দরিদ্র ছিলাম, অতঃপর আল্লাহ্ আমাকে ধনী করেছেন। অতএব, আপনি যা ইচ্ছা নিয়ে যান। আল্লাহ্র কসম! আজ আল্লাহ্র ওয়াস্তে আপনি যা কিছু নেবেন, সে ব্যাপারে আমি আপনাকে কোনো কষ্ট দেব না। ফেরেশতা বললেন: আপনার সম্পদ আপনি রাখুন। তোমাদেরকে শুধু পরীক্ষা করা হয়েছে। আল্লাহ্ আপনার প্রতি সন্তুষ্ট হয়েছেন এবং আপনার অপর দুই সঙ্গীর প্রতি অসন্তুষ্ট হয়েছেন।"
8135 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أسرف رجل على نفسه، فلما حضره الموت أوصى بنيه فقال: إذا أنا مت فأحرقوني، ثم اسحقوني، ثم ذروني في الريح في البحر، فوالله لئن قدر عليّ ربي ليعذّبني عذابًا ما عذّبه به أحدًا، قال: ففعلوا ذلك به، فقال للأرض. أدّي ما أخذت، فإذا هو قائم، فقال له: ما حملك على ما صنعت؟ فقال: خشيتك يا رب، أو قال: مخافتك فغفر له بذلك".
متفق عليه: رواه البخاري في أحادث الأنبياء (3481) ومسلم في كتاب التوبة (2756 - 25) كلاهما من طريق معمر قال: قال لي الزهري: ألا أحدثك بحديثين عجيبين؟ قال الزهري: أخبرني حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة .. فذكره.
ورواه البخاري في التوحيد (7506) ومسلم في التوبة (2756 - 24) كلاهما من طريق مالك (كتاب الجنائز 52) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"قال رجل لم يعمل حسنة قط لأهله: إذا مات فحرّقوه، ثم ذروا نصفه في البر، ونصفه في البحر فوالله لئن قدر الله عليه .." الحديث بنحو رواية حميد بن عبد الرحمن عن أبي هريرة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক ব্যক্তি তার নিজের ওপর সীমালঙ্ঘন করেছিল। যখন তার মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন সে তার পুত্রদের ওসিয়ত করল এবং বলল: যখন আমি মারা যাব, তখন তোমরা আমাকে পুড়িয়ে দেবে, এরপর আমাকে চূর্ণ-বিচূর্ণ করবে, অতঃপর আমাকে সাগরের বায়ুতে (বাতাসে) ছড়িয়ে দেবে। কারণ, আল্লাহর কসম! যদি আমার রব আমার উপর ক্ষমতা প্রয়োগ করতে সক্ষম হন, তবে তিনি আমাকে এমন শাস্তি দেবেন, যা তিনি অন্য কাউকে দেননি।" বর্ণনাকারী বলেন: তারা তার সাথে তাই করল। আল্লাহ্ যমীনকে বললেন, 'যা তুমি নিয়েছ, তা ফিরিয়ে দাও।' তখন হঠাৎ সে ব্যক্তি দাঁড়িয়ে গেল। আল্লাহ তাকে জিজ্ঞেস করলেন: 'তুমি এই কাজ কেন করেছিলে?' সে বলল: 'হে আমার রব! আপনার ভয়ই (আমাকে এই কাজ করতে উৎসাহিত করেছিল)।' অথবা সে বলল: 'আপনার ভীতির কারণে।' তখন আল্লাহ্ সেই কারণে তাকে ক্ষমা করে দিলেন।
8136 - عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"أنه ذكر رجلا فيمن سلف، أو فيمن كان قبلكم،
قال: كلمة: يعني - أعطاه الله مالا وولدًا، فلما حضرت الوفاةُ، قال لبنيه: أيُّ أبٍ كنت لكم؟ قالوا: خير أب، قال: فإنه لم يبتئر، أو لم يبتئز عند الله خيرًا، وإن يقدر الله عليه يعذبه، فانظروا إذا متُّ فأحرقوني، حتى إذا صرت فحمًا فأسْحقوني، أو قال: فاسحكوني، فإذا كان يوم ريح عاصف فاذروني فيها، فقال نبي صلى الله عليه وسلم: فأخذ مواثيقهم على ذلك. وربي! ففعلوا ثم أذروه في يوم عاصف، فقال الله عز وجل: كن، فإذا هو رجل قائم، قال الله: أي عبدي ما حملك على أن فعلت ما فعلمت؟ قال: مخافتك، أو: فرق منك، قال: فما تلافاه أن رحمه عندها". وقال مرة أخرى:"فما تلافاه غيرُها" فحدثت به أبا عثمان فقال: سمعت هذا من سلمان، غير أنه زاد فيه: أذروني في البحر، أو كما حدث.
متفق عليه: رواه البخاري في التوحيد (7508)، ومسلم في التوبة (2757 - 27) كلاهما من طريق قتادة، سمع عقبة بن عبد الغافر يقول: سمعت أبا سعيد الخدري .. فذكره.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পূর্ববর্তী উম্মতদের মধ্য থেকে একজন ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন, অথবা তিনি বললেন, তোমাদের পূর্বের লোকদের মধ্য থেকে একজন ব্যক্তি ছিল, যাকে আল্লাহ সম্পদ ও সন্তান দান করেছিলেন। যখন তার মৃত্যুর সময় ঘনিয়ে এলো, তখন সে তার পুত্রদের বলল: আমি তোমাদের জন্য কেমন পিতা ছিলাম? তারা বলল: উত্তম পিতা ছিলাম। লোকটি বলল: সে তো আল্লাহর কাছে কোনো নেক আমল জমা করেনি, আর যদি আল্লাহ তাকে পাকড়াও করেন, তাহলে তিনি অবশ্যই তাকে শাস্তি দেবেন। সুতরাং তোমরা দেখো, আমি যখন মারা যাবো, তখন আমাকে পুড়িয়ে ফেলবে। এমনকি যখন আমি কয়লা হয়ে যাবো, তখন আমাকে পিষে ফেলবে (বা চূর্ণ-বিচূর্ণ করে ফেলবে)। আর যখন ঝোড়ো হাওয়ার দিন আসবে, তখন আমাকে সেই হাওয়ায় উড়িয়ে দেবে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: লোকটি তার সন্তানদের থেকে এ ব্যাপারে দৃঢ় অঙ্গীকার গ্রহণ করলো। আমার রবের শপথ! তারা তাই করলো এবং এক ঝোড়ো দিনে তাকে উড়িয়ে দিল। অতঃপর আল্লাহ তাআলা বললেন: 'হও'। সঙ্গে সঙ্গেই সে দাঁড়িয়ে থাকা একজন পূর্ণাঙ্গ মানুষ হয়ে গেল। আল্লাহ বললেন: হে আমার বান্দা! কী কারণে তুমি এমনটি করলে যা তুমি করেছো? সে বলল: আপনার ভয়ে (অথবা আপনার কাছ থেকে ভয়ে)। তিনি বললেন: তার সেই ভয় তাকে রক্ষা করলো, অতঃপর আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরেকবার বললেন: কেবল সেই ভয়ই তাকে রক্ষা করলো (অন্য কোনো আমল নয়)। রাবী বলেন, আমি আবূ উসমানকে এই হাদীসটি শোনালে তিনি বললেন: আমি এটি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে শুনেছি। তবে তিনি এতে অতিরিক্ত বলেছেন যে, ‘আমাকে সমুদ্রে নিক্ষেপ করবে।’ অথবা যেমন তিনি বর্ণনা করেছেন।
8137 - عن حذيفة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن رجلًا حضره الموت، لما أيس من الحياة أوصى أهله، إذا متّ فاجمعوا لي حطبًا كثيرًا، ثم أوروا نارًا، حتى إذا أكلتْ لحمي وخلصتْ إلى عظْمي فخذوها فاطحنوها، فذروني في اليم في يوم حار أو راحٍ، فجمعه الله فقال: لم فعلت؟ قال: خشيتك فغفر له".
صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3479) عن مسدد، حدثنا أبو عوانة، عن عبد الملك بن عمير، عن ربعي بن حراش قال: قال عقبة لحذيفة: ألا تحدثنا ما سمعت من النبي صلى الله عليه وسلم قال .. فذكره.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এক ব্যক্তিকে যখন মৃত্যু উপস্থিত হলো এবং সে জীবন থেকে নিরাশ হয়ে গেল, তখন সে তার পরিবারকে অসিয়ত করল, 'আমি মারা গেলে আমার জন্য প্রচুর কাঠ সংগ্রহ করো, তারপর আগুন জ্বালাও, এমনকি যখন তা আমার মাংস খেয়ে ফেলবে এবং হাড়ে পৌঁছে যাবে, তখন তোমরা তা নিয়ে চূর্ণ করে ফেলো, অতঃপর আমাকে সমুদ্রের মধ্যে কোনো উত্তপ্ত দিনে অথবা বাতাস প্রবাহিত দিনে ছিটিয়ে দিও।' তখন আল্লাহ তাকে একত্রিত করলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: 'তুমি কেন এমন করলে?' সে বলল: 'আমি আপনার ভয় করতাম।' ফলে আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দিলেন।"
8138 - عن علي بن أبي طالب قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"خير نسائها مريم بنت عمران، وخير نسائها خديجة بنت خويلد".
متفق عليه: رواه البخاري في أحادث الأنبياء (3432) ومسلم في الفضائل (2430 - 69) كلاهما من طريق هشام بن عروة قال: أخبرني أبي قال: سمعت عبد الله بن جعفر قال: سمعت عليًّا رضي الله عنه يقول .. فذكره.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তাঁর নারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলেন মারইয়াম বিনতে ইমরান, এবং তাঁর নারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলেন খাদীজা বিনতে খুয়াইলিদ।"
8139 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كمل من الرجال كثير، ولم يكمل من النساء إلا آسية امرأةُ فرعون، ومريمُ بنت عمران، وإن فضل عائشة على النساء كفضل الثريد على سائر الطعام".
متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3411)، ومسلم في الفضائل (2341 - 70) كلاهما من طرق عن شعبة، عن عمرو بن مرّة، عن مرّة الهمداني، عن أبي موسى، قال .. فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পুরুষদের মধ্যে অনেকেই পূর্ণতা লাভ করেছে, কিন্তু মহিলাদের মধ্যে ফিরআউনের স্ত্রী আসিয়া এবং ইমরান-কন্যা মারইয়াম ছাড়া আর কেউ পূর্ণতা লাভ করেনি। আর অন্যান্য সকল খাবারের উপর ছারীদের মর্যাদা যেমন, তেমনি সকল মহিলাদের উপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা।"
8140 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"حسبك من نساء العالمين: مريم بنت عمران، وخديجة بنت خويلد، وفاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وآسية امرأة فرعون".
صحيح: رواه عبد الرزاق (20919) ومن طريقه الترمذي (3878) والإمام أحمد (12391) والبزار في مسنده (7256) وابن حبان (7003) كلهم من طرق عن عبد الرزاق، عن قتادة، عن أنس وقال الترمذي:"هذا حديث صحيح".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিশ্ব নারী সমাজের মধ্যে তোমাদের জন্য যথেষ্ট হলেন: মারইয়াম বিনত ইমরান, এবং খাদীজা বিনত খুওয়াইলিদ, এবং ফাতিমা বিনত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), এবং আসিয়া, ফিরাউনের স্ত্রী।"