হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (8268)


8268 - عن ابن عباس قال: سرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بين مكة والمدينة، فمررنا بواد فقال:"أي واد هذا؟" فقالوا: وادي الأزرق. فقال:"كأني أنظر إلى موسى صلى الله عليه وسلم .. فذكر من لونه وشعره شيئا - لم يحفظه داود - واضعا إصبعيه في أذنيه له جؤار إلى الله بالتلبية، مارًّا بهذا الوادي …".

وفي لفظ:"كأني أنظر إلى موسى عليه السلام هابطا من الثنية وله جؤار إلى الله بالتلبية".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (166: 268، 269) من طرق عن داود بن أبي هند، عن أبي العالية، عن ابن عباس .. فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে পথ চলছিলাম। আমরা একটি উপত্যকার পাশ দিয়ে অতিক্রম করলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “এটি কোন্ উপত্যকা?” লোকেরা বলল: ওয়া-দি আল-আযরাক (নীল উপত্যকা)। তিনি বললেন: “আমি যেন মূসা (আলাইহিস সালাম)-কে দেখতে পাচ্ছি...।” (বর্ণনাকারী দাউদ তাঁর) শরীরের রং ও চুল সম্পর্কে কিছু উল্লেখ করেছিলেন, যা তিনি (দাউদ) স্মৃতিতে রাখতে পারেননি – তিনি কান দু’টিতে তাঁর দু’টি আঙুল ঢুকিয়ে উচ্চস্বরে আল্লাহর কাছে তালবিয়া পাঠ করছেন, আর এই উপত্যকা অতিক্রম করছেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: “আমি যেন মূসা (আলাইহিস সালাম)-কে এই উঁচু স্থান (গিরিসংকট) থেকে নামতে দেখতে পাচ্ছি, আর তিনি উচ্চস্বরে আল্লাহর কাছে তালবিয়া পাঠ করছেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (8269)


8269 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"عُرِضَ عليّ الأنبياء فإذا موسى ضرْبٌ من الرجال كأنه من رجال شنوءة …".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (167: 271) من طرق عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر .. فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার সামনে নবীগণকে পেশ করা হলো। তখন মূসা (আঃ)-কে দেখা গেল, তিনি হলেন মজবুত গড়নের পুরুষ, যেন তিনি শানুআ গোত্রের পুরুষদের একজন..."









আল-জামি` আল-কামিল (8270)


8270 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كانت بنو إسرائيل يغتسلون عراة ينظر بعضهم إلى سوأة بعض، وكان موسى عليه السلام يغتسل وحده فقالوا: والله ما يمنع موسى أن يغتسل معنا إلا أنه آدر قال: فذهب مرة يغتسل فوضع ثوبه على حجر ففر الحجر بثوبه قال: فجمح موسى بإثره يقول: ثوبي حجر، ثوبي حجر حتى نظرت بنو
إسرائيل إلى سوأة موسى قالوا: والله ما بموسى من بأس، فقام الحجر حتى نُظِر إليه، قال: فأخذ ثوبه، فطفق بالحجر ضربًا". قال أبو هريرة: والله إنه بالحجر ندب ستة أو سبعة ضرب موسى بالحجر.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (278)، ومسلم في الفضائل (339: 155) كلاهما من رواية عبد الرزاق، حدثنا معمر عن همام بن منبه قال هذا ما حدثنا أبو هريرة عن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم .. فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বনী ইসরাঈলের লোকেরা উলঙ্গ অবস্থায় গোসল করত, আর একে অপরের লজ্জাস্থানের দিকে তাকাত। কিন্তু মূসা (আঃ) একাকী গোসল করতেন। তখন তারা বলাবলি করল: আল্লাহর কসম! মূসা আমাদের সাথে গোসল করা থেকে বিরত থাকেন কেবল এই কারণে যে তিনি অণ্ডকোষের রোগে (আদর) আক্রান্ত।

(নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:) একবার মূসা (আঃ) গোসল করতে গিয়ে একটি পাথরের উপর তার কাপড় রাখলেন। তখন পাথরটি তার কাপড় নিয়ে দৌড়ে পালালো। তিনি দ্রুত তার পিছু পিছু ছুটলেন এবং বলতে লাগলেন, "আমার কাপড়, হে পাথর! আমার কাপড়, হে পাথর!" অবশেষে বনী ইসরাঈলেরা মূসা (আঃ)-এর লজ্জাস্থানের দিকে তাকালো এবং বলল: আল্লাহর কসম! মূসা (আঃ)-এর মধ্যে কোনো ত্রুটি নেই। এরপর পাথরটি স্থির হয়ে গেল এবং তারা তাকে দেখতে পেল। (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:) অতঃপর মূসা (আঃ) তার কাপড় নিলেন এবং পাথরটিকে সজোরে মারতে লাগলেন।

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! পাথরটির উপর মূসা (আঃ)-এর আঘাতের ছয় বা সাতটি চিহ্ন এখনও বিদ্যমান রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (8271)


8271 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن موسى كان رجلًا حييًا ستيرًا، لا يرى من جلده شيء استحياء منه، فآذاه من آذاه من بني إسرائيل فقالوا: ما يستتر هذا التستر إلا من عيب بجلده إما برص وإما أدرة، وإما آفة، وإن الله أراد أن يبرئه مما قالوا لموسى، فخلا يوما وحده فوضع ثيابه على الحجر، ثم اغتسل فلما فرغ أقبل إلى ثيابه ليأخذها وإن الحجر عدا بثوبه، فأخذ موسى عصاه، وطلب الحجر، فجعل يقول: ثوبي حجر، ثوبي حجر، حتى انتهى إلى ملإ من بني إسرائيل فرأوه عريانا أحسن ما خلق الله، وأبرأه مما يقولون، وقام الحجر، فأخذ ثوبه فلبسه، وطفق بالحجر ضربا بعصاه، فوالله إن بالحجر لندبا من أثر ضربه ثلاثا أو أربعا أو خمسا فذلك قوله: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ آذَوْا مُوسَى فَبَرَّأَهُ اللَّهُ مِمَّا قَالُوا وَكَانَ عِنْدَ اللَّهِ وَجِيهًا} [الأحزاب: 69].

صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3404) عن إسحاق بن إبراهيم: حدثنا روح بن عبادة: حدثنا عوف عن الحسن ومحمد وخلاس عن أبي هريرة .. فذكره.

وقوله:"لندبًا" أي أثرًا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই মূসা (আঃ) ছিলেন অত্যন্ত লাজুক ও পর্দাপ্রিয় মানুষ। লজ্জার কারণে তাঁর শরীরের কিছুই দেখা যেত না। ফলে বনী ইসরাঈলের কিছু লোক তাঁকে কষ্ট দিত এবং বলত: সে যে এত বেশি পর্দা করে, তা শুধুমাত্র তার চামড়ার কোনো দোষের কারণে—হয় কুষ্ঠ রোগ, অথবা অণ্ডকোষ স্ফীতি, অথবা অন্য কোনো ব্যাধি। আল্লাহ তা’আলা মূসা (আঃ)-কে তারা যা বলত তা থেকে মুক্ত করার ইচ্ছা করলেন। একদিন তিনি একাকী নির্জনে গেলেন এবং তাঁর কাপড় একটি পাথরের ওপর রাখলেন, অতঃপর গোসল করলেন। গোসল শেষে তিনি তাঁর কাপড় নেওয়ার জন্য এগিয়ে গেলেন, তখন পাথরটি তাঁর কাপড় নিয়ে দ্রুত পালিয়ে গেল। মূসা (আঃ) তাঁর লাঠি নিলেন এবং পাথরটির পেছনে ছুটলেন। তিনি বলতে লাগলেন: ‘আমার কাপড়, হে পাথর! আমার কাপড়, হে পাথর!’ এভাবে তিনি বনী ইসরাঈলের একটি জনসমাবেশের কাছে পৌঁছলেন। তারা তাঁকে উলঙ্গ অবস্থায় দেখতে পেল। আল্লাহ তাঁকে যেমন সুন্দর সৃষ্টি করেছেন (তা দেখল)। ফলে আল্লাহ তাঁকে তাদের অপবাদ থেকে মুক্ত করে দিলেন। এরপর পাথরটি থেমে গেল। তিনি তাঁর কাপড় নিলেন এবং পরিধান করলেন। আর তিনি তাঁর লাঠি দ্বারা পাথরটিকে আঘাত করতে লাগলেন। আল্লাহর কসম! সেই পাথরে এখনও তাঁর সেই আঘাতের চিহ্ন তিন, চার বা পাঁচটি রয়েছে। আর এটাই হলো সেই বাণীর তাৎপর্য যেখানে আল্লাহ বলেন: "হে মুমিনগণ! তোমরা তাদের মতো হয়ো না, যারা মূসা (আঃ)-কে কষ্ট দিয়েছিল। অতঃপর আল্লাহ তাকে তাদের অপবাদ থেকে মুক্ত করেন। আর তিনি ছিলেন আল্লাহর কাছে সম্মানিত।" (সূরা আল-আহযাব: ৬৯)।









আল-জামি` আল-কামিল (8272)


8272 - عن أبي هريرة قال: كان موسى عليه السلام رجلا حييًّا قال: فكان لا يرى متجردًا قال: فقال بنو إسرائيل: إنه آدر قال: فاغتسل عند مشربة، فوضع ثوبه على حجر فانطلق الحجر يسعى واتبعه بعصاه يضربه ثوبي حجر ثوبي حجر حتى وقف على ملإ من بني إسرائيل ونزلت: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ آذَوْا مُوسَى فَبَرَّأَهُ اللَّهُ مِمَّا قَالُوا وَكَانَ عِنْدَ اللَّهِ وَجِيهًا} [الأحزاب: 69].

صحيح. رواه مسلم في الفضائل (339: 156) عن يحيى بن حبيب الحارثي حدثنا يزيد بن زريع: حدثنا خالد الحذاء عن عبد الله بن شقيق قال: أنبأنا أبو هريرة .. فذكره. هكذا ذكره موقوفا وهو مرفوع كما سبق.
وقوله"آدر" أي عظيم الخصيتين.

وأما ما روي عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن موسى بن عمران كان إذا أراد أن يدخل الماء لم يلق ثوبه حتى يواري عورته في الماء" فهو ضعيف.

رواه أحمد (13764) عن عبيد الله بن محمد التيمي، حدثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أنس بن مالك .. فذكره.

وفي إسناده علي بن زيد بن جُدعان وهو ضعيف باتفاق أهل العلم.

ليس في الحديث ما يخالف عصمة الأنبياء فإن موسى عليه السلام لما خرج من الحمام ليلبس ثيابه لم يكن هناك من ينظر إلى عورته، ولكن الله تبارك وتعالى أراد أن يُبرّئه مما قال به بعض بني إسرائيل، فذهب الحجر بثوبه، وهو يجري وراءه ليأخذ ثوبه ويلبسه حتى وصل إلى ملأ من بني إسرائيل فرأوه أنه أجمل ما يكون وأحسنه.

فأين فيه مخالفة لعصمة الأنبياء؟ لأن موسى عليه السلام لم يقصد أن يخرج أمام الناس عريانا.

ثم قول من يدعي لعل بعض الرواة أخطأوا في ذكر هذه القصة، فإنْ كان مقصودهم أن بعضهم كذبوا على النبي صلى الله عليه وسلم فهذا أمر خطير، فإن راويه أبو هريرة رضي الله عنه راوية الإسلام، وأحد أركان الدين، ونسبة الكذب إليه يشكّكُ في جميع مروياته، وإن قلنا بل كذب تلاميذه عليه، فإن هولاء التلاميذ من الثقات المعروفين هم الذين نقلوا لنا كتاب ربنا وسنة نبينا، ونسبة الكذب إليهم يشكك في القرآن والسنة أيضا، فإن قيل: إن بعضهم قد وقع منه الوهم، فيطلب من قائله الدليل على ذلك لأن الوهم لا يثبت بالظن، فإن فتح هذا الباب لم يسلم منه أحدٌ.



الأجلين؟ قال: أبرهما وأوفاهما، فلما أراد فراق شعيب أمر امرأته أن تسأل أباها أن يعطيها من غنمه ما يعيشون به، فأعطاها ما ولدت من غنمه من قالب لون من ولد ذلك العام، وكانت غنمه سوداء حسناء، فانطلق موسى إلى عصاه فتسلمها من طرفها، ثم وضعها في أدنى الحوض، ثم أوردها فسقاها ووقف موسى بإزاء الحوض فلم يصدر منها شاة إلا ضرب جنبها شاة شاة قال: فانمت واثلثت ووضعت كلها قوالب ألوان إلا شاة أو شاتين، ليس فيها قشوش قال يحيى: ولا ضنوب، وقال صفوان: ولا ضنوب، قال أبو زرعة الصواب: طنوب، ولا عزوز ولا ثعول، ولا كمشة، تفوت الكف، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ولو افتحتم الشام وجدتم تلك الغنم وهي السامرية". وهو ضعيف أيضا.

رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1378)، وابن أبي حاتم في تفسيره (9/ 2970) - والسياق له - والطبراني في الكبير (17/ 134) كلهم من طرق عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد الحضرمي، عن علي بن رباح اللخمي قال: سمعت عتبة بن الندر السلمي .. فذكره.

وابن لهيعة ضعيف، والرواة عنه ليسوا من العبادلة الذين تحمل أهل العلم روايتهم عنه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মূসা (আঃ) ছিলেন অত্যন্ত লাজুক স্বভাবের পুরুষ। তিনি কখনোই নিজেকে বিবস্ত্র অবস্থায় প্রকাশ করতেন না। তখন বনী ইসরাঈলরা বলতে শুরু করল যে, নিশ্চয়ই তিনি 'আ-দার' (অর্থাৎ তার অণ্ডকোষ অস্বাভাবিকভাবে বড়)। (একদিন) তিনি একটি ঝরনার কাছে গোসল করতে গেলেন এবং তার কাপড় একটি পাথরের ওপর রাখলেন। অতঃপর পাথরটি দৌড়ে চলতে শুরু করল। মূসা (আঃ) লাঠি দিয়ে পাথরটিকে আঘাত করতে করতে এর পিছু নিলেন, (বলতে লাগলেন,) "আমার কাপড়, হে পাথর! আমার কাপড়! আমার কাপড়, হে পাথর!" অবশেষে পাথরটি বনী ইসরাঈলের এক দল লোকের সামনে গিয়ে থেমে গেল (এবং তারা তাঁকে দেখল)। তখন আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে এই আয়াতটি নাযিল হয়: "হে ঈমানদারগণ! তোমরা তাদের মতো হয়ো না, যারা মূসাকে কষ্ট দিয়েছিল। অতঃপর আল্লাহ্‌ তাকে তাদের অপবাদ থেকে মুক্ত করে দেন। আর তিনি আল্লাহ্‌র কাছে অত্যন্ত সম্মানিত ছিলেন।" (সূরা আহযাব: ৬৯)









আল-জামি` আল-কামিল (8273)


8273 - عن سعيد بن جبير قال: سألني يهودي من أهل الحيرة أي الأجلين قضى موسى؟ قلت: لا أدري حتى أقدم على حبر العرب، فأسأله فقدمت، فسألت ابن عباس فقال: قضى أكثرهما وأطيبهما، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قال فعل.

صحيح: رواه البخاري في الشهادات (2684) عن محمد بن عبد الرحيم، أخبرنا سعيد بن سليمان، حدثنا مروان بن شجاع، عن سالم الأفطس، عن سعيد بن جبير .. فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবন জুবাইর বলেন: হীরা এলাকার একজন ইহুদি আমাকে জিজ্ঞেস করেছিল যে মূসা (আঃ) (চুক্তির) দুটি মেয়াদের মধ্যে কোনটি পূর্ণ করেছিলেন? আমি বললাম, আমি জানি না, যতক্ষণ না আমি আরবের মহাজ্ঞানী পন্ডিতজনের কাছে এসে তাকে জিজ্ঞেস করতে পারি। এরপর আমি এসে ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: তিনি (মূসা আঃ) দুটির মধ্যে যেটি দীর্ঘ ও সর্বোত্তম ছিল, সেটিই পূর্ণ করেছিলেন। নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো কথা বলতেন, তা তিনি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8274)


8274 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل: أي الأجلين قضى موسى؟ قال:"أتمهما وأكملهما".

حسن: رواه البزار (كشف الأستار - 2245) عن أحمد بن أبان القرشي، ثنا سفيان - يعني ابن عيينة - ثنا إبراهيم بن أعين، عن الحكم بن أبان، عن عكرمة، عن ابن عباس .. فذكره. قال البزار: لا نعلمه عن ابن عباس مرفوعا إلا من هذا الوجه.
قلت: إسناده حسن من أجل الحكم بن أبان فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.

وروي أيضا عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سألت جبريل أي الأجلين قضى موسى؟ قال:"أتمهما وأكملهما".

أخرجه الحميدي في مسنده (535)، ومن طريقه: الطبري في تفسيره (18/ 236)، وابن أبي حاتم في تفسيره (9/ 2970) عن سفيان بن عيينة قال: ثني إبراهيم بن يحيى بن أبي يعقوب، عن الحكم بن أبان، عن عكرمة، عن ابن عباس .. فذكره.

وفيه إبراهيم بن يحيى ذكره ابن حبان في الثقات وقال الأزدي: لا يتابع في حديثه، وقال الذهبي:"بخبر منكر والرجل نكرة" ثم ذكر هذا الحديث. انظر: الميزان (1/ 74).

وقال ابن كثير: إبراهيم هذا غير معروف إلا بهذا الحديث. البداية والنهاية (2/ 50 - 51). وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল, মূসা (আঃ) দুই মেয়াদের মধ্যে কোনটি পূর্ণ করেছিলেন? তিনি বললেন: "দুটির মধ্যে যা ছিল সম্পূর্ণতম ও পূর্ণাঙ্গতম।"









আল-জামি` আল-কামিল (8275)


8275 - عن عائشة قالت: كان أول ما بدئ به رسول الله صلى الله عليه وسلم من الوحي الرؤيا الصادقة في النوم وفيه:

فرجع النبي صلى الله عليه وسلم إلى خديجة يرجف فؤاده فانطلقت به إلى ورقة بن نوفل وكان رجلا تنصر يقرأ الإنجيل بالعربية، فقال ورقة: ماذا ترى؟ فأخبره فقال ورقة: هذا الناموس الذي أنزل الله على موسى، وإن أدركني يومك أنصرك نصرًا مؤزرًا.

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3392)، ومسلم في الإيمان (160: 252) كلاهما من طريق الزهري قال: حدثني عروة بن الزبير، عن عائشة .. فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি প্রথম যে ওহী আসা শুরু হয়েছিল, তা ছিল ঘুমের মধ্যে সত্য স্বপ্ন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভীত-কম্পিত হৃদয়ে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে আসলেন। অতঃপর তিনি (খাদীজা) তাঁকে নিয়ে ওয়ারাকাহ ইবনে নওফলের কাছে গেলেন। ওয়ারাকাহ এমন একজন লোক ছিলেন যিনি খ্রিস্টধর্ম গ্রহণ করেছিলেন এবং আরবিতে ইনজীল (বাইবেল) পড়তেন। তখন ওয়ারাকাহ জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি কী দেখেছেন? রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জানালেন। ওয়ারাকাহ বললেন: ইনি সেই নামূস (ওহীবাহী ফেরেশতা) যিনি আল্লাহ তাআলা মূসা (আঃ)-এর প্রতি নাযিল করেছিলেন। যদি আমি আপনার নবুওয়াতের সময় পাই, তবে আমি আপনাকে জোরালোভাবে সাহায্য করব।









আল-জামি` আল-কামিল (8276)


8276 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم لما قدم المدينة وجدهم يصومون يوما يعني عاشوراء فقالوا: هذا يوم عظيم، وهو يوم نجّى الله فيه موسى، وأغرق آل فرعون، فصام موسى شكرًا لله، فقال:"أنا أولى بموسى منهم فصامه وأمر بصيامه".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3397)، ومسلم في الصيام (1130: 127) كلاهما من طريق سعيد بن جبير، عن ابن عباس .. فذكره.
وهذا لفظ البخاري. وفي لفظ مسلم: هذا اليوم الذي أظهر الله فيه موسى وبني إسرائيل على فرعون فنحن نصومه تعظيما له، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"نحن أحق بموسى منكم، فأمر بصومه".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মদীনায় আগমন করলেন, তখন তিনি তাদেরকে একটি দিন রোযা রাখতে দেখলেন—অর্থাৎ আশুরার দিন। তারা বলল: "এটি একটি মহান দিন। এই দিন আল্লাহ মূসা (আঃ)-কে মুক্তি দেন এবং ফিরআউনের পরিবারবর্গকে ডুবিয়ে দেন। মূসা (আঃ) আল্লাহর শুকরিয়া আদায়স্বরূপ রোযা রেখেছিলেন।" তখন তিনি বললেন: "আমি তাদের চেয়ে মূসার অধিক নিকটবর্তী।" অতঃপর তিনি নিজে রোযা রাখলেন এবং রোযা রাখার নির্দেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8277)


8277 - عن أبي سعيد عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الناس يُصعقون يوم القيامة فأكون أول من يفيق، فإذا أنا بموسى آخذ بقائمة من قوائم العرش، فلا أدري أفاق قبلي أم جوزي بصعقة الطور".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3398)، ومسلم في الفضائل (2374: 162)

كلاهما من حديث سفيان، عن عمرو بن يحيى، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের দিন মানুষ বেহুঁশ (সংজ্ঞা) হবে। অতঃপর আমিই সর্বপ্রথম হুঁশ ফিরে পাওয়া ব্যক্তি হব। তখন আমি দেখব যে মূসা (আঃ) আরশের স্তম্ভসমূহের মধ্যে একটি স্তম্ভ ধরে আছেন। আমি জানি না, তিনি কি আমার পূর্বে হুঁশ ফিরে পেয়েছেন, নাকি তূর পাহাড়ে যে বেহুঁশ হয়েছিলেন, তার বিনিময়ে তাকে এই বেহুঁশ হওয়া থেকে অব্যাহতি দেওয়া হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8278)


8278 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تخيروني على موسى، فإن الناس يصعقون يوم القيامة، فأصعق معهم فأكون أول من يفيق، فإذا موسى باطش جانب العرش، فلا أدري أكان فيمن صعق فأفاق قبلي أو كان ممن استثنى الله". والحديث فيه قصة.

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (2411)، ومسلم في الفضائل (2373: 159) كلاهما من طريق عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة .. فذكره. إلا أن البخاري قرن أبا سلمة بن عبد الرحمن بعبد الرحمن الأعرج.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা আমাকে মূসার উপর শ্রেষ্ঠত্ব দিও না। কেননা, কিয়ামতের দিন মানুষ বেহুঁশ হয়ে যাবে, তখন আমিও তাদের সঙ্গে বেহুঁশ হয়ে যাব। আর আমিই সর্বপ্রথম জ্ঞান ফিরে পাব। তখন দেখব, মূসা (আঃ) আরশের পাশ ধরে আছেন। সুতরাং আমি জানি না, তিনি কি তাদের মধ্যে ছিলেন, যারা বেহুঁশ হওয়ার পর আমার আগেই জ্ঞান ফিরে পেয়েছেন, নাকি তিনি তাদের মধ্যে ছিলেন, যাদেরকে আল্লাহ তাআলা (বেহুঁশ হওয়া থেকে) অব্যাহতি দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (8279)


8279 - عن أنس بن مالك، أن النبي صلى الله عليه وسلم قرأ هذه الآية: {فَلَمَّا تَجَلَّى رَبُّهُ لِلْجَبَلِ جَعَلَهُ دَكًّا} قال حماد: هكذا، وأمسك سليمان بطرف إبهامه على أنملة أصبعه اليمنى، قال: فساخ الجبل {وَخَرَّ مُوسَى صَعِقًا}.

صحيح: رواه الترمذي (3074)، وأحمد (12260)، وابن أبي عاصم في السنة (480، 481)، والحاكم (2/ 320) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس .. فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب صحيح لا نعرفه إلا من حديث حماد بن سلمة".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

وقوله:"وأمسك سليمان" هو ابن حرب الراوي عن حماد بن سلمة.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি পাঠ করেন: "অতঃপর যখন তাঁর প্রতিপালক পর্বতের উপর আপন জ্যোতি প্রকাশ করলেন, তখন তা (পর্বতকে) চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দিল।" (সূরা আল-আ'রাফ ৭:১৪৩)। (বর্ণনাকারী) হাম্মাদ বলেন: এভাবে (ঘটেছিল)। আর সুলায়মান (ইবনু হারব) তাঁর ডান আঙ্গুলের গাঁটের উপর বুড়ো আঙ্গুলের অগ্রভাগ দিয়ে ধরলেন (ইশারা করে দেখালেন)। তিনি বলেন: ফলে পর্বতটি বসে গেল এবং "মূসা সংজ্ঞাহীন হয়ে পড়ে গেলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (8280)


8280 - عن عبد الله بن مسعود قال: لما كان يوم حنين آثر رسول الله صلى الله عليه وسلم ناسا في القسمة، فأعطى الأقرع بن حابس مائة من الإبل، وأعطى عيينة مثل ذلك، وأعطى أناسا من أشراف العرب، وآثرهم يومئذ في القسمة فقال رجل: والله إن هذه لقسمة ما عدل فيها، وما أريد فيها وجه الله قال: فقلت: والله لأخبرن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فأتيته فأخبرته بما
قال. قال: فتغير وجهه حتى كان كالصرف ثم قال:"فمن يعدل إن لم يعدل الله ورسوله! ؟" قال: ثم قال:"يرحم الله موسى قد أوذي بأكثر من هذا فصبر".

متفق عليه: رواه البخاري في فرض الخمس (3150)، ومسلم في الزكاة (1062: 140) كلاهما من طرق عن جرير عن منصور عن أبي وائل، عن عبد الله قال .. فذكره.

وفي لفظ: قال عبد الله: فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم فساررته فغضب من ذلك غضبا، واحمرَّ وجهه حتى تمنيتُ أني لم أذكره ثم قال:"قد أوذي موسى …".

رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3405)، ومسلم في الزكاة (1062: 141) كلاهما من رواية الأعمش قال: سمعت أبا وائل قال: سمعت عبد الله .. فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হুনাইনের যুদ্ধ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বন্টনের সময় কিছু মানুষকে প্রাধান্য দিলেন। তিনি আকরা ইবনু হাবিসকে একশ' উট দিলেন, উয়াইনাকে দিলেন এর সমপরিমাণ, এবং তিনি আরবের গণ্যমান্য অন্যান্য কিছু লোককেও দিলেন, সেদিন বন্টনের সময় তিনি তাদের প্রতি বিশেষ অনুগ্রহ দেখালেন। তখন এক ব্যক্তি বললো: আল্লাহর কসম, এই বন্টনে ন্যায় করা হয়নি এবং এতে আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যও ছিল না। আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ কথা জানাবো। তিনি (আবদুল্লাহ) বললেন: অতঃপর আমি তাঁর কাছে এলাম এবং লোকটি যা বলেছে তা তাঁকে জানালাম। তিনি (আবদুল্লাহ) বলেন: এতে তাঁর চেহারা এমনভাবে পরিবর্তিত হলো যেন তা তীব্র রক্তিম বর্ণ ধারণ করেছে। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূল যদি ন্যায়বিচার না করেন, তবে আর কে ন্যায়বিচার করবে?!" আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর তিনি বললেন: "আল্লাহ মূসার প্রতি রহম করুন, তাঁকে এর চেয়েও বেশি কষ্ট দেওয়া হয়েছিল, কিন্তু তিনি ধৈর্য ধারণ করেছিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (8281)


8281 - عن المغيرة بن شعبة مرفوعا:"سأل موسى ربه ما أدنى أهل الجنة منزلة؟ قال: هو رجل يجيء بعد ما أدخل أهل الجنة الجنة فيقال له: ادخل الجنة فيقول: أي رب كيف وقد نزل الناس منازلهم وأخذوا أخَذاتهم؟ فيقال له: أترضى أن يكون لك مثل ملك ملك من ملوك الدنيا؟ فيقول رضيت رب. فيقول: لك ذلك ومثله ومثله ومثله ومثله فقال في الخامسة: رضيت رب فيقول: هذا لك وعشرة أمثاله ولك ما اشتهت نفسك ولذت عينك فيقول: رضيت رب. قال: ربِّ فأعلاهم منزلة؟ قال: أولئك الذين أردت غرست كرامتهم بيدي، وختمت عليها، فلم ترعين ولم تسمع أذن ولم يخطر على قلب بشر قال: ومصداقه في كتاب الله عز وجل: {فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَا أُخْفِيَ لَهُمْ مِنْ قُرَّةِ أَعْيُنٍ} الآية [السجدة: 17]

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (189: 312) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن مطرف وابن أبجر، عن الشعبي، قال: سمعت المغيرة بن شعبة .. فذكره.

قال سفيان: رفعه أحدهما أراه ابن أبجر.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মূসা (আঃ) তাঁর রবকে জিজ্ঞেস করলেন, জান্নাতবাসীদের মধ্যে সর্বনিম্ন মর্যাদার অধিকারী কে হবে? তিনি (আল্লাহ) বললেন: সে এমন এক ব্যক্তি, যে জান্নাতবাসীদের জান্নাতে প্রবেশ করানোর পরে আসবে। তাকে বলা হবে: জান্নাতে প্রবেশ করো। সে বলবে: হে আমার রব! কীভাবে? যখন মানুষ যার যার মনযিলে পৌঁছে গেছে এবং তাদের প্রাপ্য নিয়ে নিয়েছে? তখন তাকে বলা হবে: তুমি কি এতে সন্তুষ্ট যে দুনিয়ার রাজাদের মধ্যে কোনো একজন রাজার রাজত্বের মতো তোমার রাজত্ব হবে? সে বলবে: হে রব, আমি সন্তুষ্ট। আল্লাহ বলবেন: তোমার জন্য তা-ই রইল, তার মতো আরো, তার মতো আরো, তার মতো আরো, তার মতো আরো। সে পঞ্চম বারে বলবে: হে রব, আমি সন্তুষ্ট। আল্লাহ বলবেন: তোমার জন্য এ তো রইলই, আর এর দশ গুণও রইল। আর তোমার যা মন চাইবে এবং তোমার চক্ষু যা দেখে তৃপ্তি পাবে, তাও তোমার জন্য রইল। সে বলবে: হে রব, আমি সন্তুষ্ট। (মূসা আঃ) বললেন: হে রব! তাহলে তাদের মধ্যে সর্বোচ্চ মর্যাদার অধিকারী কে? তিনি বললেন: তারা হলো তারা, যাদের জন্য আমি ইচ্ছা করেছিলাম। আমি নিজ হাতে তাদের সম্মান রোপণ করেছি এবং তার ওপর মোহর এঁটে দিয়েছি। যা কোনো চোখ দেখেনি, কোনো কান শোনেনি এবং কোনো মানুষের হৃদয়ে যার ধারণা পর্যন্ত আসেনি। তিনি (মুগীরাহ) বললেন: আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কিতাবে এর সত্যতা রয়েছে: “কেউ জানে না, তাদের জন্য চক্ষু শীতলকারী কী লুকায়িত আছে।” (সূরা আস-সাজদাহ, ৩৩:১৭)









আল-জামি` আল-কামিল (8282)


8282 - عن أبي هريرة: عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"سأل موسى ربه عن ست خصال كان يظن أنها له خالصة والسابعة لم يكن موسى يحبها قال: يا رب أي عبادك أتقى؟ قال: الذي يذكر ولا ينسى. قال: فأي عبادك أهدى؟ قال: الذي يتبع الهدى قال: فأي عبادك أحكم؟ قال: الذي يحكم للناس كما يحكم لنفسه. قال: فأي عبادك أعلم؟ قال: عالم لا يشبع من العلم يجمع علم الناس إلى علمه قال: فأي عبادك أعز؟ قال: الذي إذا قدر غفر. قال: فأي عبادك أغنى؟ قال: الذي يرضى بما يؤتى
قال: فأي عبادك أفقر؟ قال: صاحب منقوص" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس الغنى عن ظهر إنما الغنى غنى النفس وإذا أراد الله بعبد خيرًا جعل غناه في نفسه وتقاه في قلبه وإذا أراد الله بعبد شرًّا جعل فقره بين عينيه".

حسن: رواه ابن حبان (6217) عن عبد الله بن محمد بن سلم ببيت المقدس حدثنا حرملة بن يحيى، حدثنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أن أبا السمح حدثه، عن ابن حجيرة، عن أبي هريرة .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل دراج أبي السمح، وهو مختلف فيه غير أنه يحسن حديثه عن غير أبي الهيثم، وروايته هنا عن عبد الرحمن بن حُجيرة وهو ثقة.

وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"قال موسى: يا رب علمني شيئا أذكرك به وأدعوك. به قال: قل يا موسى: لا إله إلا الله. قال: يا رب، كل عبادك يقول هذا. قال: قل: لا إله إلا الله قال: إنما أريد شيئا تخصني به قال: يا موسى، لو أن أهل السماوات السبع والأرضين السبع في كفة ولا إله إلا الله في كفة مالت بهم لا إله إلا الله". فهو ضعيف.

رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (834)، وابن حبان (6218)، وأبو يعلى (1393)، والطبراني في الدعاء (1480، 1480) كلهم من طرق عن دراج أبي السمح، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره.

ودراج أبو السمح ضعيف في أبي الهيثم كما قال أحمد وأبو داود وغيرهما.

وأما قول الحافظ في الفتح (11/ 208): أخرج النسائي بسند صحيح فهو مخالف لما في التقريب من قوله:"صدوق في حديثه عن أبي الهيثم ضعيف".

روي أيضا عن أبي سعيد الخدري عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إن موسى قال: أي رب عبدك المؤمن تُقَتّر عليه في الدنيا. قال: فيفتح له باب الجنة فينظر إليها قال: يا موسى، هذا ما أعددت له. فقال موسى: أي رب وعزتك وجلالك: لو كان أقطع اليدين والرجلين يسحب على وجهه منذ يوم خلقته إلى يوم القيامة، وكان هذا مصيره لم ير بؤسًا قط. قال: ثم قال موسى: أي رب عبدك الكافر توسع عليه في الدنيا. قال: فيفتح له باب من النار فيقال: يا موسى هذا ما أعددت له. فقال موسى: أي رب وعزتك وجلالك! لو كانت له الدنيا منذ يوم خلقته إلى يوم القيامة، وكان هذا مصيره كان لم ير خيرًا قط".

رواه أحمد (11767)، وأبو نعيم في صفة الجنة (40، 41) كلاهما من رواية يحيى بن إسحاق السيلحيني، حدثنا ابن لهيعة، عن دراج، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد الخدري .. فذكره. وفي سنده: ابن لهيعة، ودراج عن أبي الهيثم وكلاهما ضعيفان.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মূসা (আঃ) তাঁর রবকে সাতটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলেন। ছয়টি বিষয় সম্পর্কে তাঁর ধারণা ছিল যে সেগুলো কেবল তাঁর জন্যই নির্দিষ্ট, আর সপ্তমটি মূসা (আঃ) পছন্দ করতেন না। মূসা (আঃ) বললেন: "হে আমার রব! আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি মুত্তাকী (আল্লাহভীরু)?" আল্লাহ বললেন: "যে সর্বদা স্মরণ করে এবং ভুলে যায় না।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি সৎপথপ্রাপ্ত?" আল্লাহ বললেন: "যে হেদায়েতের (সৎপথের) অনুসরণ করে।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি সুবিচারক?" আল্লাহ বললেন: "যে মানুষের জন্য সেভাবেই বিচার করে, যেভাবে সে নিজের জন্য বিচার করে।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি জ্ঞানী?" আল্লাহ বললেন: "সেই জ্ঞানী, যে জ্ঞান থেকে তৃপ্ত হয় না এবং মানুষের জ্ঞানকে নিজের জ্ঞানের সাথে একত্রিত করে।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি সম্মানিত (বা ক্ষমতাবান)?" আল্লাহ বললেন: "যে ক্ষমতা থাকা সত্ত্বেও ক্ষমা করে দেয়।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে ধনী?" আল্লাহ বললেন: "যে তাকে যা দেওয়া হয় তাতে সন্তুষ্ট থাকে।" তিনি বললেন: "আপনার বান্দাদের মধ্যে কে সবচেয়ে দরিদ্র?" আল্লাহ বললেন: "যার ঘাটতিপূর্ণ সম্পদ বা সঙ্গী রয়েছে (যে সর্বদা অভাব অনুভব করে)।"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "ধনী হওয়া সম্পদের প্রাচুর্যের ওপর নির্ভর করে না, বরং আসল সম্পদ হলো হৃদয়ের প্রাচুর্য। আল্লাহ যখন কোনো বান্দার কল্যাণ চান, তখন তার ধনী হওয়াকে তার নিজের মধ্যে (তার অন্তরে) এবং তার তাকওয়াকে তার হৃদয়ে স্থাপন করেন। আর আল্লাহ যখন কোনো বান্দার ক্ষতি চান, তখন তার অভাবকে তার চোখের সামনে রাখেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (8283)


8283 - عن أبي هريرة قال: أرسل ملك الموت إلى موسى عليهما السلام، فلما جاءه صكّه، فرجع إلى ربه فقال: أرسلتني إلى عبد لا يريد الموت. قال: ارجع إليه فقل له: يضع يده على متن ثور فله بما غطت يده بكل شعرة سنة قال: أي رب ثم ماذا؟ قال: ثم الموت قال: فالآن قال: فسأل الله أن يدنيه من الأرض المقدسة رمية بحجر.

قال أبو هريرة فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كنت ثم لأريتكم قبره إلى جانب الطريق تحت الكثيب الأحمر".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3407)، ومسلم في الفضائل (2373: 157) كلاهما من طرق عن عبد الرزاق أخبرنا معمر عن ابن طاوس عن أبيه عن أبي هريرة .. فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মালাকুল মাউত (মৃত্যুর ফেরেশতা)-কে মূসা (আলাইহিস সালাম)-এর নিকট প্রেরণ করা হলো। যখন তিনি তাঁর নিকট এলেন, তখন মূসা (আঃ) তাকে সজোরে আঘাত করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর রবের নিকট ফিরে গেলেন এবং বললেন: আপনি আমাকে এমন বান্দার নিকট পাঠিয়েছেন যে মৃত্যু চায় না। আল্লাহ বললেন: তুমি তার নিকট ফিরে যাও এবং তাকে বলো: সে যেন একটি গরুর পিঠের উপর তার হাত রাখে; তার হাতের নিচে যতগুলো পশম ঢাকা পড়বে, প্রতিটি পশমের বিনিময়ে সে এক বছর করে জীবন পাবে। মূসা (আঃ) বললেন: হে আমার রব! তারপর কী হবে? আল্লাহ বললেন: তারপর মৃত্যু। মূসা (আঃ) বললেন: তবে এখনই (মৃত্যু দিন)। তিনি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করলেন যেন তাকে পবিত্র ভূমির (বায়তুল মুকাদ্দাস) এক ঢিল ছোঁড়া দূরত্বে (কবরে) রাখা হয়। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: আমি যদি সেখানে থাকতাম, তবে পথের পাশে লাল বালিয়াড়ির নিচে আমি তোমাদেরকে তাঁর কবর দেখিয়ে দিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8284)


8284 - عن أبي هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"جاء ملك الموت إلى موسى عليه السلام فقال له: أجب ربك قال: فلطم موسى عليه السلام عين ملك الموت ففقأها قال: فرجع الملك إلى الله تعالى فقال: إنك أرسلتني إلى عبد لك لا يريد الموت، وقد فقأ عيني قال فرد الله إليه عينه وقال: ارجع إلى عبدي فقل: الحياة تريد؟ فإن كنت تريد الحياة فضع يدك على متن ثور، فما توارت يدك من شعرة فإنك تعيش بها سنةً قال: ثم مه؟ قال: ثم تموت قال: فالآن من قريب، رب أمتني من الأرض المقدسة رمية بحجر. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والله لو أني عنده لأريتكم قبره إلى جانب الطريق عند الكثيب الأحمر".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2373) عن محمد بن رافع: حدثنا عبد الرزاق: حدثنا معمر عن همام بن منبه، قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة .. فذكره.

في الحديث أن موسى عليه السلام لطم ملك الموت ففقأ عينه، وذلك لأنه دخل داره بغير إذنه ولم يعرفه أنه ملك الموت وقال له: أجبْ ربك فلطمه لدخوله بيتَه بغير استئذان، فلما تبين له أنه ملك الموت وخير بين الحياة والموت فاختار الموت.



قال:"إن موسى لما سار ببني إسرائيل من مصر ضلوا الطريق فقال: ما هذا؟ فقال علماؤهم: إن يوسف لما حضره الموت أخذ علينا موثقا من الله أن لا نخرج من مصر حتى ننقل عظامه معنا. قال: فمن يعلم موضع قبره؟ قال: عجوز من بني إسرائيل. فبعث إليها فأتته، فقال: دليني على قبر يوسف، قالت: حتى تعطيني حكمي قال: ما حكمك؟ قالت: أكون معك في الجنة، فكره أن يعطيها ذلك، فأوحى الله إليه أن أعطها حكمها فانطلقت بهم إلى بحيرة: موضع مستنقع ماء فقالت: أنضبوا هذا الماء فأنضبوا قالت: احتفروا. واستخرجوا عظام يوسف فلما أقلوها إلى الأرض إذا الطريق مثل ضوء النهار".

رواه أبو يعلى (7254)، وعنه ابن حبان (723)، والحاكم (2/ 404 - 405، 571 - 572) كلهم من طرق عن يونس بن أبي إسحاق، عن أبي بردة، عن أبي موسى قال .. فذكره. قال الحاكم في الموضع الأول:"صحيح على شرط الشيخين، واكتفى في الموضع الثاني بقوله:"صحيح الإسناد".

قلت: ظاهر إسناده السلامة من العلة. وقد ثبت سماع يونس بن أبي إسحاق من أبي بردة، ولكن في معناه غرابة، وهي كيف خفي قبر يوسف عليه السلام على موسى عليه السلام وهو نبي مرسل يوحى إليه حتى دلته عجوز من بني إسرائيل، ثم لماذا جعل قبره في بحيرة موضع مستنقع ماء، وهل لم يبق من جسمه إلا العظام. وقد جاء في حديث صحيح:"إن الأرض لا تأكل أجساد الأنبياء".

وقال ابن كثير في تفسيره في تفسير قوله تعالى: {وَأَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِي إِنَّكُمْ مُتَّبَعُونَ} [الشعراء: 52] بعد أن روى قصة عجوز بني إسرائيل من طريق ابن أبي حاتم:"هذا حديث غريب جدا، والأقرب أنه موقوف".

قلت: لعل أبا موسى الأشعري تلقاه من بعض اليهود.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মৃত্যুর ফেরেশতা (আযরাঈল) মূসা (আঃ)-এর কাছে এসে বললেন: আপনার রবের ডাকে সাড়া দিন (অর্থাৎ মৃত্যুকে বরণ করুন)। মূসা (আঃ) তখন মৃত্যুর ফেরেশতার চোখে আঘাত করলেন এবং তা উপড়ে ফেললেন। ফেরেশতা আল্লাহর কাছে ফিরে গিয়ে বললেন: আপনি আমাকে আপনার এমন এক বান্দার কাছে পাঠিয়েছেন, যে মৃত্যুকে চায় না, আর সে আমার চোখ উপড়ে ফেলেছে।

আল্লাহ তখন ফেরেশতার চোখ ফিরিয়ে দিলেন এবং বললেন: আমার বান্দার কাছে ফিরে যাও এবং বলো: তুমি কি জীবন চাও? যদি তুমি জীবন চাও, তাহলে একটি ষাঁড়ের পিঠে তোমার হাত রাখো। তোমার হাতের নিচে যে পরিমাণ পশম পড়বে, প্রতিটি পশমের বিনিময়ে তুমি এক বছর করে বাঁচবে। মূসা (আঃ) বললেন: এরপর কী হবে? আল্লাহ বললেন: এরপর তোমার মৃত্যু হবে। মূসা (আঃ) বললেন: তাহলে এখন (মৃত্যু) নিকটেই ভালো। হে আমার রব, আমাকে পবিত্র ভূমির এক ঢিল নিক্ষেপের দূরত্বে মৃত্যু দিন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহর কসম, আমি যদি সেখানে থাকতাম, তাহলে পথের পাশে লাল বালির স্তূপের কাছে আমি তোমাদেরকে তাঁর কবর দেখিয়ে দিতাম।

(অন্য এক বর্ণনায়) বলা হয়েছে: মূসা (আঃ) যখন বনী ইসরাঈলকে নিয়ে মিশর থেকে যাত্রা শুরু করলেন, তখন তারা পথ হারিয়ে ফেলল। তিনি বললেন: এর কারণ কী? তাদের আলেমরা বললেন: ইউসুফ (আঃ)-এর যখন মৃত্যু সন্নিকট হয়েছিল, তখন তিনি আল্লাহর নামে আমাদের কাছ থেকে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমরা মিশর থেকে বের হবো না, যতক্ষণ না আমরা তার অস্থিগুলো (দেহাবশেষ) সাথে করে নিয়ে যাই। মূসা (আঃ) বললেন: কে তাঁর কবরের স্থান জানে? তারা বলল: বনী ইসরাঈলের এক বৃদ্ধা। তিনি তার কাছে লোক পাঠালেন এবং সে এল। তিনি বললেন: আমাকে ইউসুফের কবরের সন্ধান দাও। সে বলল: যতক্ষণ না আপনি আমাকে আমার প্রাপ্য দেন। তিনি বললেন: তোমার প্রাপ্য কী? সে বলল: আমি জান্নাতে আপনার সাথী হতে চাই। মূসা (আঃ) তাকে তা দিতে অপছন্দ করলেন। তখন আল্লাহ তাঁর কাছে ওহী পাঠালেন যে, তাকে তার প্রাপ্য দিয়ে দাও। অতঃপর সে তাদেরকে নিয়ে একটি জলাশয়ের কাছে গেল, যেখানে পানি জমে থাকত। সে বলল: এই পানি শুকিয়ে ফেলো। তারা পানি শুকিয়ে ফেলল। সে বলল: খনন করো। তারপর তারা ইউসুফ (আঃ)-এর অস্থি (দেহাবশেষ) বের করল। যখন তারা তা মাটির উপরে উঠাল, তখন পথ দিনের আলোর মতো স্পষ্ট হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (8285)


8285 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أتيتُ على موسى عليه السلام ليلة أسري بي عند الكثيب الأحمر، وهو قائم يصلي في قبره".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2375: 165) من طرق عن حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، وسليمان التيمي، عن أنس بن مالك .. فذكره.

قوله:"وهو قائم يصلي في قبره" يحمل على الحياة البرزخية لا الحياة الدنيوية.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মি'রাজের রাতে যখন আমাকে নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল, তখন আমি লাল বালিয়াড়ির (আল-কাছীব আল-আহমার) কাছে মূসা (আঃ)-এর কাছে পৌঁছলাম। আর তিনি তাঁর কবরে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (8286)


8286 - عن مالك بن صعصعة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: بينا أنا عند البيت بين النائم واليقظان .. في قصة الإسراء وفيه:"فأتينا على السماء السادسة قيل: من هذا؟ قيل:
جبريل قيل: من معك؟ قيل: محمد قيل: وقد أرسل إليه؟ مرحبا به، ولنعم المجيء جاء، فأتيت على موسى فسلمت عليه فقال: مرحبا بك من أخ ونبي، فلما جاوزت بكى فقيل: ما أبكاك قال: يا رب هذا الغلام الذي بعث بعدي يدخل الجنة من أمته أفضل مما يدخل من أمتي …".

متفق عليه: رواه البخاري في بدء الخلق (3207)، ومسلم في الإيمان (164: 264) كلاهما من رواية سعيد بن أبي عروبة وهشام الدستوائي، عن قتادة، عن أنس، عن مالك بن صعصعة .. فذكره.




মালিক ইবনু সা'সা'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি যখন বাইতুল্লাহর নিকট ঘুম ও জাগরণের মাঝামাঝি অবস্থায় ছিলাম... (এটি ইসরা ও মি'রাজের ঘটনার অংশ, এবং তাতে রয়েছে:) অতঃপর আমরা ষষ্ঠ আসমানের নিকট পৌঁছলাম। জিজ্ঞাসা করা হলো: এ কে? বলা হলো: জিবরীল। জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনার সাথে কে? বলা হলো: মুহাম্মাদ। জিজ্ঞাসা করা হলো: তাঁর কাছে কি (দূত) পাঠানো হয়েছে? তাঁকে স্বাগতম, তিনি কতই না উত্তম আগমন করেছেন! অতঃপর আমি মূসা (আঃ)-এর কাছে আসলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: ভাই ও নবী হিসেবে আপনাকে স্বাগতম। যখন আমি তাঁকে অতিক্রম করে চলে আসলাম, তখন তিনি কাঁদলেন। জিজ্ঞাসা করা হলো: কিসে আপনাকে কাঁদাচ্ছে? তিনি বললেন: হে আমার রব, আমার পরে প্রেরিত এই যুবক (মুহাম্মাদ)। আমার উম্মত থেকে যতটুকু জান্নাতে প্রবেশ করবে, তার চেয়ে বেশি তাঁর উম্মত থেকে জান্নাতে প্রবেশ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (8287)


8287 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: أتيت بالبراق في قصة الإسراء والمعراج وفيه:"ثم عرج بنا إلى السماء السادسة، فاستفتح جبريل عليه السلام قيل: من هذا؟ قال: جبريل قيل: ومن معك؟ قال: محمد. قيل: وقد بعث إليه؟ قال: قد بعث إليه، ففتح لنا، فإذا أنا بموسى صلى الله عليه وسلم فرحب ودعا لي بخير".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (162: 259) عن شيبان بن فروخ، حدثنا حماد بن سلمة، حدثنا ثابت البناني، عن أنس بن مالك .. فذكره.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মি'রাজ ও ইসরার ঘটনা প্রসঙ্গে বলেছেন: "আমার জন্য বুরাক আনা হলো। এর মধ্যে (এই ঘটনাও আছে যে), অতঃপর আমাদেরকে নিয়ে ষষ্ঠ আকাশে আরোহণ করা হলো। তখন জিবরীল (আঃ) দরজা খুলতে চাইলেন। বলা হলো: ইনি কে? তিনি বললেন: জিবরীল। বলা হলো: আপনার সাথে কে? তিনি বললেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। বলা হলো: তাঁর কাছে কি (দূত) পাঠানো হয়েছে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তাঁর কাছে পাঠানো হয়েছে। তখন আমাদের জন্য দরজা খুলে দেওয়া হলো। সেখানে আমি মূসা (আঃ)-এর সাথে সাক্ষাৎ পেলাম। তিনি আমাকে স্বাগত জানালেন এবং আমার জন্য কল্যাণের দোয়া করলেন।"