আল-জামি` আল-কামিল
8461 - عن شدّاد بن أوس قال:"قلنا يا رسول الله! كيف أُسري بك؟ قال:"صليتُ العتمة بمكة معتمًا، وأتاني جبريل عليه السلام بدابة بيضاء فوق الحمار ودون البغل، فقال: اركب فاستصْعبتْ عليَّ، فدارها بأذنها، ثم حملني عليها، فانطلقتْ تهوي بنا: يقع حافرها حيث أدرك طرفها، حتى بلغنا أرضًا ذات نخل فأنزلني، فقال: صلِّ. فصليتُ، ثم ركبنا فقال: أتدري أين صليت؟ قلت: الله أعلم. قال: صليت
بيثرب، صليت بطيبة، فانطلقتْ تهوي بنا يقع حافرها حيث أدرك طرفها، ثم بلغنا أرضًا فقال: انزل، فنزلتُ، ثم قال: صلِّ فصليتُ، ثم ركبنا، فقال: أتدري أين صليت؟ قلت: الله أعلم، قال: صليتَ بمدين، صليتَ عند شجرة موسى عليه السلام، ثم انطلقتْ تهوى بنا يقع حافرها حيث أدرك طرفها، ثم بلغنا أرضًا بدتْ لنا قصور، فقال: انزل فنزلت، فقال: صلِّ فصليتُ، ثم ركبنا، قال: أتدري أين صليت؟ قلت: الله أعلم. قال: صليت ببيت لحم، حيث وُلد عيسى عليه السلام المسيح ابن مريم، ثم انطلق بي حتى دخلنا المدينة من بابها اليماني، فأتى قبلة المسجد فربط به دابته ودخلنا المسجد من باب فيه تميل الشّمس والقمر، فصليتُ من المسجد حيث شاء الله وأخذني من العطش أشدّ ما أخذني، فأتيتُ بإناءين في أحدهما لبن، وفي الآخر عسل، أُرْسِلَ إليَّ بهما جميعًا، فعدلتُ بينهما ثم هداني الله عز وجل فأخذت اللّبن فشربت، حتى قرعت به جبيني وبين يدي شيخ متكئ على مثْراةٍ له فقال: أخذ صاحبُك الفطرة أنه ليُهدى، ثم انطلق لي حتى أتينا الوادي الذي في المدينة، فإذا جهنّم تنكشف عن مثل الزَّاربيِّ، قلت: يا رسول الله! كيف وجدتها؟ قال: مثل الحمة السخنة، ثم انصرف بي فمررنا بعير لقريش بمكان كذا وكذا قد أضلّوا بعيرًا لهم فجمعه فلان، فسلمت عليهم فقال: بعضهم هذا صوت محمد، ثم أتيتُ أصحابي قبل الصبح بمكة فأتاني أبو بكر رضي الله عنه، فقال: يا رسول الله! أين كنت اللّيلة فقد التمستُك في مكانك. فقال: علمت أني أتيتُ بيت المقدس اللّيلة، فقال: يا رسول الله! إنّه مسيرة شهر فصفه لي. قال: فَفُتِح لي صراط كأني أنظر فيه لا يسلني عن شيء إلّا أنبأته عنه، قال أبو بكر: أشهد أنّك رسول الله، فقال المشركون: انظروا إلى ابن أبي كبشة يزعم أنه أَتى بيت المقدس اللّيلة، قال: فقال: إنّ من آية ما أقول لكم أنّي مررتُ بعير لكم بمكان كذا وكذا قد أضلّوا بعيرًا لهم فجمعه فلان، وإن مسيرهم ينزلون بكذا ثم بكذا، ويأتونكم يوم كذا وكذا يقدمُهم جمل آدم عليه مسح أسود وغرارتان سوداوان، فلما كان ذلك اليوم أشرف الناس ينتظرون حتى كان قريب من نصف النّهار حتى أقبلت العير يقدمهم ذلك الجمل الذي وصفه رسول الله صلى الله عليه وسلم".
حسن: رواه البيهقيّ في"الدّلائل" (2/ 355 - 357) قال: وأخبرنا أبو الحسين علي بن محمد بن عبد الله بن بشران العدل ببغداد، واللّفظ له، قال: أخبرنا أبو أحمد حمزة بن محمد بن العباس، قال: حدّثنا محمد بن إسماعيل أبو إسماعيل التّرمذيّ، قال: حدّثنا إسحاق بن إبراهيم بن
العلاء بن الضّحاك الزّبيديّ، قال: حدّثنا عمرو بن الحارث، عن عبد الله بن سالم الأشعريّ، عن الزّبيديّ محمد بن الوليد بن عامر، قال: حدّثنا الوليد بن عبد الرحمن، أنّ جبير بن نُفير، قال: حدّثنا شدّاد بن أوس، قال: فذكر الحديث.
قال البيهقيّ: هذا إسناد صحيح، ورُوي ذلك مفرّقًا في أحاديث غيره، ونحن نذكر من ذلك إن شاء الله تعالى ما حضرنا".
قال الحافظ ابن كثير في"تفسيره" بعد أن نقل قول البيهقيّ:"ثم ساق أحاديث كثيرة في الإسراء كالشّاهد لهذا الحديث. وقد روي هذا الحديث عن شدّاد بن أوس بطوله الامامُ أبو محمد عبد الرحمن بن أبي حاتم في تفسيره، عن أبيه، عن إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزّبيدي، به، ولا شكّ أنّ هذا الحديث - أعني الحديث المروي عن شدّاد بن أوس - مشتمل على أشياء منها ما هو صحيح كما ذكره البيهقيّ، ومنها ما هو منكر، كالصّلاة في بيت لحم، وسؤال الصّديق عن نعت بيت المقدس وغير ذلك" انتهى.
قلت: لعل بعض النكارة كان سببها إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزبيدي المعروف بابن زبريق مختلف فيه فأثنى عليه ابن معين خيرًا، وقال أبو حاتم: شيخ لا بأس به، ولكنهم يحسدونه، وضعّفه النسائي وأما قول محمد بن عوف الحمصي أنه كان يكذب فهو بعيد.
والخلاصة فيه: أنه حسن الحديث إلا في جمل يسيرة أخطأ فيها.
শাদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনাকে কীভাবে মি‘রাজে নেওয়া হয়েছিল?
তিনি বললেন: আমি মক্কায় এশার (আতামাহ) সালাত আদায় করলাম। তখন জিবরাঈল (আঃ) একটি সাদা প্রাণী নিয়ে আমার কাছে এলেন, যা গাধার চেয়ে বড় এবং খচ্চরের চেয়ে ছোট ছিল। তিনি বললেন: আরোহণ করুন। কিন্তু প্রাণীটি আমার জন্য কঠিন (উদ্দত) হয়ে গেল। তখন তিনি (জিবরাঈল) সেটির কানে হাত দিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে এর পিঠে আরোহণ করালেন। সেটি আমাদের নিয়ে চলতে শুরু করল: তার খুর পড়ছিল সেখানে, যেখানে তার দৃষ্টি পৌঁছাচ্ছিল। অবশেষে আমরা খেজুর বৃক্ষপূর্ণ একটি ভূমিতে পৌঁছলাম। তখন তিনি আমাকে নামিয়ে দিয়ে বললেন: সালাত আদায় করুন। আমি সালাত আদায় করলাম। অতঃপর আমরা আবার আরোহণ করলাম। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন কোথায় সালাত আদায় করলেন? আমি বললাম: আল্লাহই ভালো জানেন। তিনি বললেন: আপনি ইয়াছরিবে সালাত আদায় করেছেন, আপনি তায়্যিবাহতে সালাত আদায় করেছেন। অতঃপর সেটি আমাদের নিয়ে চলতে শুরু করল, তার খুর পড়ছিল সেখানে, যেখানে তার দৃষ্টি পৌঁছাচ্ছিল। অতঃপর আমরা একটি ভূমিতে পৌঁছলাম। তিনি বললেন: অবতরণ করুন। আমি অবতরণ করলাম। অতঃপর তিনি বললেন: সালাত আদায় করুন। আমি সালাত আদায় করলাম। অতঃপর আমরা আরোহণ করলাম। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন কোথায় সালাত আদায় করলেন? আমি বললাম: আল্লাহই ভালো জানেন। তিনি বললেন: আপনি মাদইয়ান-এ সালাত আদায় করেছেন, আপনি মূসা (আঃ)-এর বৃক্ষের কাছে সালাত আদায় করেছেন। অতঃপর সেটি আমাদের নিয়ে চলতে শুরু করল, তার খুর পড়ছিল সেখানে, যেখানে তার দৃষ্টি পৌঁছাচ্ছিল। অতঃপর আমরা এমন একটি ভূমিতে পৌঁছলাম, যেখানে আমাদের জন্য কতগুলো প্রাসাদ দৃশ্যমান হলো। তিনি বললেন: অবতরণ করুন। আমি অবতরণ করলাম। তিনি বললেন: সালাত আদায় করুন। আমি সালাত আদায় করলাম। অতঃপর আমরা আরোহণ করলাম। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন কোথায় সালাত আদায় করলেন? আমি বললাম: আল্লাহই ভালো জানেন। তিনি বললেন: আপনি বায়তুল লাহামে (বেথলেহেম) সালাত আদায় করেছেন, যেখানে ঈসা (আঃ) মাসীহ ইবনে মারইয়াম জন্মগ্রহণ করেছিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে নিয়ে চলতে থাকলেন, অবশেষে আমরা শহরের দক্ষিণ দরজা দিয়ে প্রবেশ করলাম। জিবরাঈল (আঃ) মসজিদের কিবলার দিকে এসে তার প্রাণীটিকে বাঁধলেন। আর আমরা প্রবেশ করলাম সেই দরজা দিয়ে, যেখানে সূর্য ও চন্দ্রের ছায়া পড়ে। অতঃপর আমি মসজিদের মধ্যে আল্লাহর ইচ্ছামতো সালাত আদায় করলাম।
আর আমার পিপাসা এমন তীব্র হলো, যেমন তীব্র পিপাসা এর আগে কখনও হয়নি। তখন আমার সামনে দুটি পাত্র আনা হলো; একটিতে দুধ এবং অন্যটিতে মধু ছিল। দুটোই আমার কাছে পাঠানো হয়েছিল। আমি দুটির মধ্যে তুলনা করলাম। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল আমাকে পথনির্দেশ দিলেন, তাই আমি দুধের পাত্রটি গ্রহণ করলাম এবং পান করলাম। এমনকি আমার কপাল পর্যন্ত (ঠাণ্ডা/স্বস্তি) অনুভূত হলো। আমার সামনে এক বৃদ্ধ লোক ছিলেন যিনি তাঁর একটি আধার বা আধারে হেলান দিয়ে বসেছিলেন। তিনি বললেন: আপনার সাথী ফিতরাত (স্বভাব ধর্ম) গ্রহণ করেছে। নিশ্চয় সে সঠিক পথের দিশা লাভ করেছে।
অতঃপর তিনি আমাকে নিয়ে চললেন, অবশেষে আমরা সেই উপত্যকায় পৌঁছলাম যা শহরের মধ্যে ছিল। সেখানে জাহান্নাম প্রকাশ পেল কার্পেটের মতো (বিস্তৃত)। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কেমন দেখলেন? তিনি বললেন: উত্তপ্ত পানির ঝর্ণার মতো।
অতঃপর তিনি আমাকে নিয়ে ফিরলেন। আমরা কুরাইশের একটি কাফেলার পাশ দিয়ে অতিক্রম করলাম, যারা অমুক অমুক স্থানে তাদের একটি উট হারিয়ে ফেলেছিল এবং অমুক ব্যক্তি সেটি একত্রিত করছিল। আমি তাদের সালাম দিলাম। তখন তাদের কেউ কেউ বলল: এটা তো মুহাম্মদের কণ্ঠস্বর। অতঃপর আমি সুবহে সাদিকের আগেই মক্কায় আমার সাথীদের কাছে ফিরে এলাম।
তখন আমার কাছে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি রাতে কোথায় ছিলেন? আমি আপনাকে আপনার স্থানে খুঁজেছি। তিনি বললেন: জেনে রাখো, আমি আজ রাতে বায়তুল মাকদিসে গিয়েছিলাম। তিনি (আবূ বাকর) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এটা তো এক মাসের দূরত্ব! আপনি এর বর্ণনা দিন। তিনি বললেন: তখন বায়তুল মাকদিসের একটি পথ আমার জন্য এমনভাবে উন্মুক্ত হলো যেন আমি সেটি দেখছি। তারা আমাকে যে বিষয়েই জিজ্ঞাসা করছিল, আমি সে বিষয়েই তাদের জানিয়ে দিচ্ছিলাম। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি আল্লাহর রাসূল।
তখন মুশরিকরা বলল: ইবনে আবী কাবশার দিকে তাকাও! সে দাবি করছে যে, সে এই রাতেই বায়তুল মাকদিস থেকে ঘুরে এসেছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি তোমাদেরকে যা বলছি তার নিদর্শন হলো এই যে, আমি তোমাদের একটি কাফেলার পাশ দিয়ে অমুক অমুক স্থানে অতিক্রম করেছি। তারা তাদের একটি উট হারিয়ে ফেলেছিল এবং অমুক ব্যক্তি সেটি একত্রিত করেছিল। আর তাদের যাত্রা এমন যে, তারা অমুক স্থানে অবতরণ করবে, অতঃপর অমুক স্থানে, আর তারা তোমাদের কাছে অমুক দিন পৌঁছবে। তাদের আগে থাকবে একটি কালো উট, তার ওপর কালো পশমী কম্বল এবং দুটি কালো বস্তা থাকবে।
যখন সেই দিন আসলো, লোকেরা অপেক্ষা করতে করতে মধ্যাহ্নের কাছাকাছি পর্যন্ত উঁকি মেরে দেখতে থাকল। অবশেষে কাফেলাটি এগিয়ে আসলো, আর তাদের আগে ছিল সেই উটটি, যার বর্ণনা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিয়েছিলেন।
8462 - عن عائشة، قالت:"لما أسري بالنّبيّ صلى الله عليه وسلم إلى المسجد الأقصى أصبح يتحدّث النّاسُ بذلك، فارتدّ ناسٌ ممن آمنوا به، وصدّقوه، وسعوا بذلك إلى أبي بكر فقالوا: هل لك إلى صاحبك يزعم أنه أسري به اللّيلة إلى بيت المقدس. قال: أو قال ذلك؟ قالوا: نعم. قال: لئن كان قال ذلك لقد صدق. قالوا: أو تصدّقه أنه ذهب اللّيلة إلى بيت المقدس، وجاء قبل أن يصبح؟ قال: نعم، إنِّي لأصدّقه فيما هو أبعد من ذلك، أصدِّقه بخبر السّماء في غدوة أو روحة، فلذلك سمي أبو بكر الصّديق".
حسن: رواه الحاكم (3/ 62) ومن طريقه البيهقيّ في الدّلائل (2/ 360 - 361) من طريق محمد بن كثير الصّنعانيّ، قال: حدّثنا معمر بن راشد، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في محمد بن كثير الصّنعانيّ. والخلاصة: أنه حسن الحديث في الشّواهد.
قال ابن شهاب: قال أبو سلمة بن عبد الرحمن فذكر القصة وقال: فبها سمي أبو بكر الصديق رضي الله عنه.
انظر: الدلائل للبيهقي (2/ 360).
وأمّا ما رواه البيهقيّ في الدّلائل (2/ 390 - 396) عن أبي سعيد الخدريّ، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر حديث الإسراء بطوله.
رواه من طريق أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد الخدريّ.
فأبو هارون العبديّ وهو عمارة بن جوين، قال النسائي والحاكم:"متروك". وقال الجوزجاني:"كذاب مفتر" وضعّفه غيرهم.
وساقه ابن كثير في تفسيره بطوله عن البيهقيّ وقال:"ورواه ابنُ أبي حاتم، عن أبيه، عن أحمد بن عبدة، عن أبي عبد الصّمد عبد العزيز بن عبد الصّمد، عن أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر نحوه - بسياق طويل حسن أنيق، أجود مما ساقه غيره على غرابته، وما فيه من النّكارة. ثم قال: وأبو هارون العبديّ - واسمه عمارة بن جوين، وهو مضعَّف عند الأئمّة".
وكذلك ما رواه أبو جعفر بن جرير الطّبريّ في"تفسيره" عن علي بن سهل، حدّثنا حجّاج، حدّثنا أبو جعفر الرّازيّ، عن الرّبيع بن أنس، عن أبي العالية الرّياحيّ، عن أبي هريرة، أو غيره - شك أبو جعفر - في حديث طويل.
ورواه أيضًا البيهقيّ في"الدّلائل" (2/ 397 - 403) من طريق أبي جعفر - وهو عيسى بن ماهان - بإسناده.
وأورده الحافظ ابن كثير في"تفسيره" وقال:"أبو جعفر الرّازيّ قال فيه الحافظ أبو زرعة الرّازيّ: يهم في الحديث كثيرًا، وقد ضعّفه غيره أيضًا، ووثّقه بعضهم، والأظهر أنّه سيء الحفظ، ففيما تفرّد به نظر. وهذا الحديث في بعض ألفاظه غرابة ونكارة شديدة، وفيه شيء من المنام من رواية سمرة بن جندب في المنام الطّويل عند البخاريّ، ويُشبه أن يكون مجموعًا من أحاديث شتّى، أو منام أو قصّة أخرى غير الإسراء، والله أعلم" انتهى.
وكذلك ما رُوي عن عبد الرحمن بن قرط، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة أسري إلى المسجد الأقصى كان بين المقام وزمزم، وجبريل عن يمينه، وميكائيل عن يساره، فطارا به حتى بلغ السّماوات السّبع، فلما رجع قال: سمعتُ تسبيحًا في السماوات العلى مع تسبيح كثير، سبحت السماوات العلى من ذي المهابة مشفقات لذي العلو بما علا سبحان العلي الأعلى سبحانه وتعالى".
رواه الطّبرانيّ عن علي بن عبد العزيز، ثنا سعيد بن منصور، ثنا مسكين بن ميمون مؤذن مسجد الرّملة، عن عروة بن رُويم، عن عبد الصّمد بن قرط، فذكره.
قال الطبرانيّ: لا يُروى عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم إلّا بهذا الإسناد، تفرّد به سعيد. انظر"مجمع البحرين" (58).
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (1/ 78) وقال:"فيه مسكين بن ميمون، ذكر له الذّهبي هذا الحديث وقال: إنّه منكر". أي في"الميزان" (4/ 101).
وكذلك ما رُوي عن ابن مسعود، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لقيتُ ليلة أُسري بي إبراهيم، وموسى،
وعيسى. قال: فتذاكروا أمرَ السّاعة، فردُّوا أمرهم إلى إبراهيم، فقال: لا علْمَ لي بها، فرَدُّوا الأمرَ إلى موسى، فقال: لا علمَ لي بها، فردُّوا الأمر إلى عيسى، فقال: أمّا وَجْبتُها، فلا يعلمُها أحدٌ إلّا الله، ذلك وفيما عهد إليَّ ربّي عز وجل أنّ الدّجال خارج، قال: ومعي قضيبين، فإذا رآني ذاب كما يذوب الرَّصاص، قال: فيُهلكُه الله، حتَّى إنّ الحَجَر والشَّجر ليقولُ: يا مسلم، إنّ تحتي كافرًا، فتعالَ فاقْتُلْه، قال: فيُهلِكُهم الله، ثم يرجعُ النّاسُ إلى بلادهم وأوطانهم، قال: فعند ذلك يخرج يأجوج ومأجوج، وهم من كلِّ حَدَب يَنْسلون، فيطؤون بلادَهم، لا يأتون على شيء إلّا أهلكوه، ولا يمُرُّون على ماءٍ إلّا شَرِبوه، ثم يرجعُ النّاسُ إليَّ فيشكونهم، فأدعو الله عليهم، فيهلكهم الله ويميتُهم، حتى تَجْوى الأرضُ من نَتْن رِيحهم، قال: فيُنزلُ الله عز وجل المطرَ، فَتَجْرُفُ أجسادهم حتى يقذفهم في البحر". قال أبي: ذهب عليَّ هاهنا شيءٌ لم أفهمه، كأديم، وقال يزيد - يعني ابن هارون -:"ثم تُنْسفُ الجبالُ، وتُمدُّ الأرضُ مدَّ الأديم". ثم رجع إلى حديث هُشيم، قال:"ففيما عهد إليَّ ربّي عز وجل: أنّ ذلك إذا كان كذلك، فإنَّ السّاعةَ كالحامِل المُتِمِّ، التي لا يَدري أهلُها متى تفجَؤُهم بولادتِها ليلًا أو نهارًا".
رواه الإمام أحمد (3556) عن هشيم، أخبرنا العوّام بن حوشب، عن جبلة بن سُحيم، عن مُؤْثِر بن عَفازة، عن ابن مسعود، فذكره.
وفيه مؤثر بن عفازة - بالعين - لم يوثّقه غير ابن حبان فهو في عداد المجهولين، كما اختلف في رفعه ووقفه.
فرواه هُشيم، عن العوّام بن حوشب هكذا مرفوعًا.
ورواه يزيد بن هارون، عن العوام بن حوشب موقوفًا.
ومن طريقه رواه ابن ماجه (4081)، والحاكم (4/ 488 - 489) وقال:"حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه. وهو تساهل منهما كما أن في متنه ما ينكر عليه، منها قوله:"فتذاكروا أمر السّاعة".
وقد رُوي عن ابن مسعود ما هو أغرب منه، وهو ما رواه الحسن بن عرفة في جزئه المشهور. (رقم 69) أورده الحافظ ابن كثير في تفسيره وقال:"إسناد غريب ولم يخرجوه، فيه من الغرائب …".
وفي الباب عن أم هانئ في حديث طويل. رواه أبو يعلى في معجمه (10) عن محمد بن إسماعيل بن علي الأنصاري، حدثنا ضمرة بن ربيعة، عن يحيى بن أبي عمرو الشيباني، عن أبي صالح مولى أم هانئ، عن أم هانئ قالت: فذكرت الحديث. وأورده الحافظ في المطالب العالية (17/ 279).
ومحمد بن إسماعيل بن علي هو الوساوسي البصري، قال أحمد بن عمرو البزار الحافظ: كان يضع الحديث، وقال الدارقطني وغيره: ضعيف.
وقال الذهبي في الميزان (3/ 481) بعد أن نقل تضعيفه عن هؤلاء: له حديث في الإسراء سقته
في الترجمة النبوية، أي تاريخ الإسلام ص 246، وقال فيه:"هو حديث غريب، الوساوسي ضعيف تفرد به".
قلت: في متنه نكارة مثل ذكر صلاة الصبح، والصلاة لم تفرض إلا في المعراج.
وذكرها الحافظ ابن حجر في الإصابة (14/ 239) في ترجمة نبعة الحبشية جارية أم هانئ وقال: ذكرها أبو موسى في"الذيل". وذكر من طريق الكلبي، عن أبي صالح مولى أم هانئ، عن أم هانئ بنت أبي طالب في مسرى رسول الله صلى الله عليه وسلم أنها كانت تقول: ما أسري به إلا وهو في بيتي نائم عندي تلك الليلة فصلى العشاء الآخرة، ثم نام ونمنا، فلما كان الصبح أهبّنا لنصلي الصبح فصلينا معه قال:"يا أم هانئ … فذكر قصة الإسراء.
ثم قال: وأخرجه أبو يعلى وروايته أصح من رواية الكلبي، فإن في روايته من المنكر أنه صلى العشاء الآخرة والصبح معهم وإنما فرضت الصلوات ليلة المعراج، وكذا نومه تلك الليلة في بيت أم هانئ وإنما نام في المسجد" انتهى.
وأما ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"وما مررت بملأ من الملائكة ليلة أسري بي إلا قالوا: عليك بالحجامة يا محمد" فهو ضعيف.
رواه أحمد (3316) والترمذي (2053) وابن ماجه (3477) والحاكم (4/ 210، 209) كلهم من طرق عن عباد بن منصور، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وعباد بن منصور ضعيف باتفاق أهل العلم وكان يُدلس. وقد دلس في هذا الحديث مع ضعف فيه.
قال علي بن المديني: سمعت يحيى بن سعيد القطان يقول: قلت لعباد بن منصور الباجي: سمعت ما مررت بملأ من الملائكة … فقال: حدثني ابن أبي يحيى، عن داود بن حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. ذكره العقيلي في الضعفاء (3/ 36).
وابن أبي يحيى هو إبراهيم بن محمد متروك، وداود بن حصين ثقة إلا في عكرمة. وأما الحاكم فقال: صحيح الإسناد.
تنبيه: سقط عند الحاكم في الموضع الأول"عكرمة" بين عباد بن منصور وبين ابن عباس، وهو ثابت في الموضع الثاني.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس بن مالك يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما مررتُ ليلة أسري بي بملأ إلا قالوا: يا محمد! مر أمتك بالحجامة".
رواه ابن ماجه (3479) عن جبارة بن المغلس، قال: حدثنا كثير بن سُليم، قال: سمعت أنس بن مالك فذكره.
وجبارة بن المغلس وشيخه كثير بن سُليم ضعيفان.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن مسعود قال: حدّث رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ليلة أسري به أنه لم يمر
على ملأ من الملائكة إلا أمروه أن مر أمتك بالحجامة.
رواه الترمذي (2052) عن أحمد بن بُديل بن قريش اليامي الكوفي، قال: حدثنا محمد بن فُضيل، قال: حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن هو ابن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن ابن مسعود فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب من حديث ابن مسعود".
قلت: فيه عبد الرحمن بن إسحاق بن الحارث الواسطي، أبو شيبة ضعيف باتفاق أهل العلم، قال أحمد: منكر الحديث.
قلت: لأن ذكر الحجامة في قصة الإسراء والمعراج لم يثبت في الأحاديث الصحيحة وهي كثيرة، فوهم هؤلاء الرواة في إقحام الأمر بالحجامة في ليلة أسري بالنبي صلى الله عليه وسلم. وكذلك له شواهد أخرى لا تصح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মসজিদে আকসায় নৈশ ভ্রমণ (ইসরা) করানো হলো, তখন সকালে লোকেরা এই বিষয়ে আলোচনা করতে লাগল। ফলে যারা তাঁর প্রতি ঈমান এনেছিল এবং তাঁকে সত্য বলে মেনেছিল, তাদের মধ্যে কিছু লোক মুরতাদ (ধর্মত্যাগী) হয়ে গেল। তারা দৌড়ে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেল এবং বলল, আপনার বন্ধুর খবর রাখুন! তিনি দাবি করছেন যে তাঁকে নাকি গত রাতে বায়তুল মুকাদ্দাসে নৈশ ভ্রমণ করানো হয়েছে। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তিনি কি সত্যিই এ কথা বলেছেন? তারা বলল, হ্যাঁ। তিনি বললেন, যদি তিনি এ কথা বলে থাকেন, তবে অবশ্যই তিনি সত্য বলেছেন। তারা বলল, আপনি কি বিশ্বাস করেন যে তিনি এক রাতেই বায়তুল মুকাদ্দাসে গেলেন এবং সকাল হওয়ার আগেই ফিরে এলেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ, আমি তো তাঁকে এর চাইতেও দূরবর্তী বিষয়েও বিশ্বাস করি। আমি তো সকাল অথবা সন্ধ্যায় আকাশ থেকে আসা তাঁর খবরের ওপর বিশ্বাস স্থাপন করি। আর এই কারণেই আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সিদ্দীক (মহাসত্যবাদী) নামে অভিহিত করা হয়েছিল।
8463 - عن جابر بن عبد الله، أنّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لمّا كذّبني قريش قمتُ في الحجر، فجلّا اللهُ لي بيتَ المقدس، فطفقتُ أخبرهم عن آياته وأنا أنظر إليه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3886)، ومسلم في الإيمان (170) كلاهما من حديث اللّيث، عن عُقيل، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، سمعتُ جابر بن عبد الله قال. (فذكر الحديث).
ورواه البخاري أيضًا (4710) من وجه آخر من حديث ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال أبو سلمة: سمعت جابر بن عبد الله يقول: فذكر مثله.
قال البخاري: زاد يعقوب بن إبراهيم، حدثنا ابن أخي ابن شهاب، عن عمه: لما كذَّبتْني قريش حين أسري بي إلى بيت المقدس … نحوه.
فقوله: عن عمه - الظاهر فيه بإسناده السابق، ولكنه جعله ابن حجر في الفتح (8/ 392) معلقًا ولذا قال: وصله الذهلي في الزهريات عن يعقوب بهذا الإسناد. وأخرجه قاسم بن ثابت في"الدلائل" من طريقه ولفظه: جاء ناس من قريش إلى أبي بكر فقالوا: هل لك في صاحبك يزعم أنه أتى بيت المقدس، ثم رجع إلى مكة في ليلة واحدة، قال أبو بكر: أو قال ذلك؟ قالوا: نعم، قال: لقد صدق، انتهى.
وفي دلائل البيهقي قال: نعم إني أصدقه بأبعد من ذلك.
أصدقه بخبر السماء. قال: فسمي بذلك الصديق.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছেন: “যখন কুরাইশরা আমাকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করলো, তখন আমি হাতিমে (কাবার পাশে) দাঁড়ালাম। অতঃপর আল্লাহ আমার সামনে বাইতুল মুকাদ্দাসকে উন্মোচিত করে দিলেন। আমি বাইতুল মুকাদ্দাসের দিকে তাকাচ্ছিলাম আর এর নিদর্শনাবলী সম্পর্কে তাদেরকে বলতে লাগলাম।”
8464 - عن أبي هريرة، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لقد رأيتُني في الحجر وقريش تَسْأَلُني عن مَسْرَايَ، فسَأَلَتْني عن أَشْياءَ من بيتِ المقدس لم أُثْبِتْها. فَكُرِبْتُ كُرْبَةً ما كربت مثله قطّ. قال: فرفعه الله لي أنظر إليه، ما يسألوني عن شيء إلا أنبأتُهُمْ به. وقدْ رأَيْتُني في جماعة من الأنبياء. فإذا موسى قائمٌ يُصلِّي. فإذا رجُلٌ ضرْبٌ جعدٌ كأنَّه من رجال شَنُوءَةَ. وإذا عيسى ابنُ مريم عليه السلام قائمٌ يُصلِّي. أقربُ النّاس به شَبَهًا عروةُ بنُ مسعود الثّقفيُّ. وإذا إبراهيمُ عليه السلام قائمٌ يصلي. أَشْبه النّاس به صاحبُكم (يعني نفسَهُ) فحانتِ الصَّلاةُ فأَمَمْتُهُمْ. فلمّا فَرَغْتُ من الصَّلاة قال قَائِلٌ: يا محمّد! هذا مالكٌ صَاحبُ النَّارِ فَسَلِّمْ عليه. فالتفتُّ إِلَيْهِ فبدأني بالسَّلام".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (172) عن زهير بن حرب، حدّثنا حُجين بن المثنّى، حدثّنا عبد العزيز (وهو ابن أبي سلمة)، عن عبد الله بن الفضل، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره مثله.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমি নিজেকে (কা‘বার) হাজরে (হাতিমে) দেখতে পেলাম। কুরাইশরা আমাকে আমার মি’রাজের রাত্রিকালীন সফরের বিষয়ে জিজ্ঞেস করছিল। তারা আমাকে বায়তুল মাকদিস (জেরুজালেম)-এর এমন কিছু জিনিস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল, যা আমি সঠিকভাবে স্মরণ রাখতে পারিনি (বা ভালোভাবে লক্ষ্য করিনি)। ফলে আমি এমন কষ্টের সম্মুখীন হলাম, এর আগে আমি কখনও এমন কষ্টের সম্মুখীন হইনি। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তখন আল্লাহ তাআলা বায়তুল মাকদিসকে আমার সামনে তুলে ধরলেন যেন আমি তা দেখতে পাই। তারা আমাকে যা কিছুই জিজ্ঞেস করল, আমি তাদের সবকিছুই বলে দিলাম। আমি আমাকে নাবীগণের (আলাইহিমুস সালাম) এক দলের মধ্যে দেখতে পেলাম। হঠাৎ দেখলাম, মূসা (আঃ) দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। তিনি ছিলেন সুঠাম দেহের অধিকারী, কোঁকড়ানো চুলের মানুষ, যেন তিনি শানু’আ গোত্রের পুরুষদের একজন। হঠাৎ দেখলাম, ঈসা ইবনু মারইয়াম (আলাইহিস সালাম) দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। দেখতে মানুষদের মধ্যে তাঁর সাথে সবচেয়ে বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ ছিলেন উরওয়াহ ইবনু মাসঊদ সাক্বাফী। আর হঠাৎ দেখলাম, ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম) দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। মানুষদের মধ্যে তাঁর সাথে সবচেয়ে বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ ছিলেন তোমাদের এই সঙ্গী (অর্থাৎ তিনি নিজেকেই ইঙ্গিত করলেন)। এরপর সালাতের সময় হলো এবং আমি তাদের ইমামতি করলাম। যখন আমি সালাত শেষ করলাম, তখন একজন আহ্বানকারী বললেন, 'হে মুহাম্মাদ! ইনি হলেন মালিক, যিনি জাহান্নামের রক্ষক, আপনি তাঁকে সালাম দিন'। আমি তার দিকে তাকালাম। তিনি আমাকে প্রথমে সালাম দিলেন।
8465 - عن عبد الله، قال: لمّا أسْري برسول الله صلى الله عليه وسلم انْتُهِيَ به إلى سِدْرةِ المنتهى. وهي في السّماء السّادسة، إليها ينتهي ما يُعرَجُ به من الأرضِ. فيُقبضُ منها. وإليها ينتهي ما يُهبطُ به من فوقها. فيقْبضُ منها. قال: {إِذْ يَغْشَى السِّدْرَةَ مَا يَغْشَى (16)}. قال: فَراش من ذهب. قال، فأُعطِيَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ثلاثًا: أعُطِيَ الصّلوات الخمس. وأُعْطِيَ خواتيمَ سورةِ البقرة، وغُفرَ - لمن لم يُشْرِك بالله من أُمَّته شيئًا - المُقْحِمَاتُ.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (173) من طرق عن مالك بن مِغْوَل، عن الزّبير بن عدي، عن طلحة، عن مرّة، عن عبد الله، فذكره.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ঊর্ধ্ব আরোহণ (ইসরা) করানো হলো, তখন তাঁকে সিদরাতুল মুনতাহা পর্যন্ত নিয়ে যাওয়া হলো। আর তা হলো ষষ্ঠ আকাশে অবস্থিত। পৃথিবী থেকে যা উপরে ওঠে, তা সেখানেই শেষ হয় এবং সেখান থেকে তা গ্রহণ করা হয়। এবং এর উপরের জগৎ থেকে যা নীচে অবতরণ করানো হয়, তাও সেখানেই শেষ হয় এবং তা সেখান থেকে গ্রহণ করা হয়। আল্লাহ তাআলার বাণী: "যখন বৃক্ষটিকে যা আবৃত করার, তা আবৃত করে ফেলছিল" (সূরা নাজম: ১৬) প্রসঙ্গে তিনি (আব্দুল্লাহ) বলেন: তা ছিল সোনার ফরাশ (সোনার পতঙ্গ)। তিনি আরও বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তিনটি জিনিস প্রদান করা হয়েছিল: তাঁকে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত দেওয়া হয়েছিল, আর সূরা আল-বাকারার শেষাংশ প্রদান করা হয়েছিল, এবং তাঁর উম্মতের মধ্যে যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করেনি, তাদের জন্য (কবিরা বা ধ্বংসাত্মক) গুনাহসমূহ ('মুকহিমাত') ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছিল।
8466 - عن أنس بن مالك، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"رفعت لي سدرةُ المنتهى في السّماء السّابعة، نَبقُها مثلُ قلال هَجَر، وورقها مثلُ آذان الفيلة، يخرج من ساقها نهران ظاهران، ونهران باطنان. فقلت: يا جبريل ما هذان؟ قال: أمّا الباطنان ففي الجنة، وأمّا الظاهران فالنيل والفرات".
صحيح: رواه عبد الرّزاق في تفسيره، وعنه الإمام أحمد (12673) عن معمر، عن قتادة، عن أنس، فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، وقد سبق في حديث أنس الطويل جزء هذا.
قال الحاكم (1/ 81) بعد أن رواه من هذا الطّريق:"صحيح على شرط الشّيخين".
قال القرطبي في المفهم (1/ 394): وفي حديث أنس ما يقتضي أن السدرة في السماء السابعة أو فوقها، لقوله:"ثم ذهب بي إلى السدرة". بعد أن استفتح السماء السابعة ففتح له فدخل، وفي حديث عبد الله أنها في السماء السادسة، وهذا تعارض لا شك فيه، وما في حديث أنس أصح، وهو قول الأكثر، والذي يقتضيه وصفها: بأنها التي ينتهي إليها علم كل ملك مقرب وكل نبي مرسل، على ما قاله كعب، وقال: وما خلفها غيب لا يعلمه إلا الله، وكذلك قال الخليل بن أحمد، وقال: إليها تنتهي أرواح الشهداء، وقال ابن عباس: هي عن يمين العرش، وأيضًا فإن حديث أنس مرفوع، وحديث عبد الله موقوف عليه من قوله، والمسند المرفوع أولى. انتهى.
وقد حاول النووي الجمع بين الحديثين وتبعه ابن حجر بأن أصلها في السادس وفرعها في السابعة وفيه نظر.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার জন্য সপ্তম আকাশে সিদরাতুল মুনতাহা উঠানো হয়েছিল। তার কুল ফলগুলো ছিল হাজার (শহরের) মাটির কলসিগুলোর মতো, এবং তার পাতাগুলো ছিল হাতির কানের মতো। তার কাণ্ড থেকে চারটি নহর (নদী) বের হয়—দু'টি প্রকাশ্য এবং দু'টি অপ্রকাশ্য। আমি (জিবরীলকে) বললাম: হে জিবরীল, এগুলি কী? তিনি বললেন: অপ্রকাশ্য দু'টি নহর হলো জান্নাতের অভ্যন্তরে, আর প্রকাশ্য দু'টি হলো নীল (নদ) এবং ফোরাত (নদ)।"
8467 - عن جابر بن عبد الله قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يعرض نفسه على الناس بالموقف. فيقول:"هل من رجل يحملني إلى قومه؟ فإن قريشًا قد منعوني أن أبلّغ كلام ربي".
فأتاه رجل من همدان فقال:"ممن أنت؟" فقال الرجل: من همدان. قال:"فهل عند قومك من منعة؟" قال: نعم، ثم إن الرجل خشي أن يُخفره قومه. فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: آتيهم فأخبرهم، ثم آتيك من عام قابل. قال:"نعم" فانطلق، وجاء وفد الأنصار في رجب.
صحيح: رواه الإمام أحمد (15192) واللفظ له، وأبو داود (4734) وابن ماجه (201) والترمذي (2925) والحاكم (2/ 612 - 613) كلهم من حديث إسرائيل، عن عثمان بن المغيرة، عن سالم بن أبي الجعد، عن جابر، فذكره. وبعضهم اختصره. قال الترمذي:"حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনসমাবেশের স্থানে (মওকিফে) লোকদের কাছে নিজেকে পেশ করতেন। তিনি বলতেন: "এমন কি কোনো লোক আছে, যে আমাকে তার কওমের (গোত্রের) কাছে নিয়ে যাবে? কারণ কুরাইশরা আমাকে আমার রবের বাণী পৌঁছাতে বাধা দিয়েছে।" এরপর হামদান গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এল। তিনি বললেন: "তুমি কারা?" লোকটি বলল: হামদান গোত্রের। তিনি বললেন: "তোমার গোত্রের কি কোনো প্রতিরোধ ক্ষমতা আছে?" সে বলল: হ্যাঁ। এরপর লোকটি ভয় পেল যে তার কওম হয়তো তাকে লাঞ্ছিত করবে। সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: আমি তাদের কাছে যাই এবং তাদের জানিয়ে আসি, এরপর আগামী বছর আপনার কাছে আসব। তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" অতঃপর সে চলে গেল, আর রজব মাসে আনসারদের প্রতিনিধি দল আগমন করল।
8468 - عن جابر قال: مكث رسول الله صلى الله عليه وسلم بمكة عشر سنين يتبع الناس في منازلهم بعكاظ ومجنّة، وفي المواسم بمنى يقول:"من يؤويني؟ من ينصرني؟ حتى أبلغ رسالة ربي وله الجنة". حتى إن الرجل ليخرج من اليمن أو من مصر - كذا قال - فيأتيه قومه فيقولون: احذر غلام قريش، لا يفتنك. ويمشي بين رجالهم، وهم يشيرون إليه بالأصابع، حتى بعثنا الله له من يثرب فآويناه، وصدّقناه، فيخرج الرجل منا فيؤمن به، ويُقرئه القرآن، فينقلب إلى أهله فيسلمون بإسلامه، حتى لم يبق دار من دور الأنصار إلا وفيها رهط من المسلمين، يُظهرون الإسلام، ثم ائتمروا جميعًا، فقلنا: حتى متى نترك رسول الله صلى الله عليه وسلم يُطرد في جبال مكة ويُخاف؟ فرحل إليه منا سبعون رجلا حتى
قدموا عليه في الموسم، فواعدناه شعب العقبة، فاجتمعنا عنده من رجل ورجلين حتى توافينا، فقلنا: يا رسول الله! علام نبايعك؟ قال:"تبايعوني على السمع والطاعة في النشاط والكسل، والنفقة في العسر واليسر، وعلى الأمر بالمعروف، والنهي عن المنكر، وأن تقولوا في الله، لا تخافون في الله لومة لائم، وعلى أن تنصروني، فتمنعوني إذا قدمت عليكم مما تمنعون منه أنفسكم، وأزواجكم، وأبناءكم، ولكم الجنة"، قال: فقمنا إليه فبايعناه، وأخذ بيده أسعد بن زرارة، وهو من أصغرهم، فقال: رويدًا يا أهل يثرب! فإنا لم نضرب أكباد الإبل إلا ونحن نعلم أنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإن إخراجه اليوم مفارقةُ العرب كافة، وقتلُ خياركم، وأن تعضكم السيوف، فإما أنتم قوم تصبرون على ذلك، وأجركم علي الله، وإما أنتم قوم تخافون من أنفسكم جُبينة، فبينوا ذلك، فهو أعذرُ لكم عند الله، قالوا: أمط عنا يا أسعد! فوالله! لا ندع هذه البيعة أبدًا، ولا نسلبها أبدًا، قال: فقمنا إليه فبايعناه، فأخذ علينا وشرط، ويعطينا على ذلك الجنة.
حسن: رواه الإمام أحمد (14456) وصحّحه ابن حبان (7012) والحاكم (2/ 624) كلهم من حديث عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن أبي الزبير، أنه حدثه جابر بن عبد الله فذكره بطوله، وهو مخرج في بيعة العقبة الثانية وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মক্কায় দশ বছর অবস্থান করলেন। তিনি উকায, মাজান্নাহ এবং (হজ্জের) মৌসুমগুলোতে মিনার লোকজনের আবাসস্থলে তাদের অনুসরণ করতেন এবং বলতেন: "কে আমাকে আশ্রয় দেবে? কে আমাকে সাহায্য করবে? যাতে আমি আমার রবের বার্তা পৌঁছাতে পারি এবং তার জন্য জান্নাত রয়েছে।"
এমনকি কোনো ব্যক্তি ইয়েমেন অথবা মিশর থেকে বের হয়ে তাঁর কাছে এলে—বর্ণনাকারী এমনই বলেছেন—তার গোত্রের লোকেরা তাকে বলত: এই কুরাইশী যুবক থেকে সতর্ক থাকো, সে যেন তোমাকে ফেতনায় না ফেলে। তিনি তাদের পুরুষদের মাঝে হাঁটতেন আর তারা আঙ্গুল দিয়ে তাঁর দিকে ইশারা করত। শেষ পর্যন্ত আল্লাহ তাআলা আমাদের (আনসারদের) মধ্য থেকে ইয়াছরিব (মদীনা) থেকে তাঁর জন্য লোক পাঠালেন। আমরা তাঁকে আশ্রয় দিলাম এবং তাঁকে বিশ্বাস করলাম। আমাদের মধ্যে থেকে যে ব্যক্তি বের হতো, সে তাঁর প্রতি ঈমান আনতো এবং তিনি তাকে কুরআন শিক্ষা দিতেন। সে তার পরিবারের কাছে ফিরে গেলে, তার ইসলাম গ্রহণের কারণে তারাও ইসলাম গ্রহণ করত। এভাবে আনসারদের এমন কোনো বাড়ি অবশিষ্ট ছিল না যেখানে মুসলমানদের একটি দল প্রকাশ্যে ইসলাম প্রকাশ করত না।
এরপর তারা সবাই একত্রিত হয়ে পরামর্শ করল এবং আমরা বললাম: আমরা আর কতদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কার পাহাড়গুলোতে বিতাড়িত হতে এবং ভীত থাকতে দেব? অতঃপর আমাদের মধ্য থেকে সত্তর জন পুরুষ তাঁর কাছে যাত্রা করল এবং হজ্জের মৌসুমে তাঁর কাছে উপস্থিত হলো। আমরা তাঁর সাথে আকাবার গিরিসংকটে সাক্ষাতের প্রতিশ্রুতি দিলাম। আমরা তাঁর কাছে এক-দুই জন করে একত্রিত হতে লাগলাম, যতক্ষণ না আমরা সবাই উপস্থিত হলাম। আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কোন শর্তে আপনার হাতে বাইআত করব?
তিনি বললেন: "তোমরা আমার হাতে বাইআত করবে আগ্রহে ও অলসতায় (সর্বাবস্থায়) কথা শোনা ও মানার উপর, স্বাচ্ছন্দ্য ও কষ্টে ব্যয় করার উপর, ভালো কাজের আদেশ দেওয়া এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করার উপর, আর তোমরা আল্লাহর ব্যাপারে কথা বলবে এবং আল্লাহর পথে কোনো নিন্দুকের নিন্দাকে ভয় করবে না। আর আমাকে সাহায্য করার উপর, যাতে আমি তোমাদের কাছে গেলে তোমরা আমাকে সেইভাবে রক্ষা করবে, যেভাবে তোমরা তোমাদের নিজেদের, তোমাদের স্ত্রী ও পুত্রদের রক্ষা করো। আর এর প্রতিদানে তোমাদের জন্য রয়েছে জান্নাত।"
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তাঁর কাছে দাঁড়ালাম এবং বাইআত করলাম। আসআদ ইবনু যুরারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তিনি ছিলেন তাদের মধ্যে বয়সে কনিষ্ঠ—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাত ধরে বললেন: হে ইয়াছরিবের অধিবাসীরা! শান্ত হও। আমরা এই উটের পিঠে চড়ে (যাত্রা করে) এসেছি—শুধু এই জ্ঞান নিয়ে যে, তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আর আজকের এই (বাইআত গ্রহণের মাধ্যমে) তাঁকে বের করে নেওয়া মানে সমগ্র আরব জাতির সাথে বিচ্ছেদ ঘটানো, তোমাদের শ্রেষ্ঠ ব্যক্তিদেরকে হত্যা করা এবং তলোয়ার তোমাদেরকে কামড় দেবে (তোমাদের উপর আঘাত হানবে)। অতএব, হয় তোমরা এমন এক সম্প্রদায় যারা এর উপর ধৈর্য ধারণ করবে এবং তোমাদের প্রতিদান আল্লাহর উপর, নতুবা তোমরা এমন এক সম্প্রদায় যারা নিজেদের পক্ষ থেকে সামান্য কাপুরুষতা অনুভব করছ, তবে তোমরা তা স্পষ্ট করে বলো। এটি আল্লাহর কাছে তোমাদের জন্য বেশি গ্রহণযোগ্য হবে।
তারা বলল: হে আসআদ! আমাদের কাছ থেকে সরে যাও। আল্লাহর শপথ! আমরা কখনোই এই বাইআত ত্যাগ করব না এবং কখনোই তা ছিনিয়ে নেব না। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তাঁর কাছে দাঁড়ালাম এবং বাইআত করলাম। তিনি আমাদের কাছ থেকে অঙ্গীকার নিলেন ও শর্ত আরোপ করলেন এবং বিনিময়ে আমাদের জন্য জান্নাতের প্রতিশ্রুতি দিলেন।
8469 - عن أشعث قال: حدثني شيخ من بني مالك بن كنانة قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بسوق ذي المجاز يتخللها يقول:"يا أيها الناس! قولوا: لا إله إلا الله تفلحوا". قال: وأبو جهل يحثي عليه التراب ويقول: يا أيها الناس لا يغرنكم هذا عن دينكم، فإنما يريد لتتركوا آلهتكم وتتركوا اللات والعزى، قال: وما يلتفت إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: قلنا: انعتْ لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: بين بردين أحمرين، مربوع، كثير اللحم، حسن الوجه، شديد سواد الشعر، أبيض شديد البياض، سابغ الشعر.
صحيح: رواه أحمد (16603، 23192) عن أبي النضر، حدثنا شيبان، عن أشعث قال: فذكره. ورواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (3608) بإسناد آخر عن أشعث به. وإسناده صحيح.
وذكره الهيثمي في مجمع الزوائد (6/ 21 - 22) وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال، فأبو النضر هو هاشم بن القاسم بن مسلم الليثي مولاهم، المشهور بكنيته من رجال الجماعة.
وشيبان هو ابن عبد الرحمن التميمي مولاهم النحوي، منسوب إلى"نحوة" بطن من الأزد، لا إلى علم النحو من رجال الجماعة أيضًا.
ورواه أحمد أيضًا (23151) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أشعث قال: سمعت رجلا في إمرة ابن الزبير قال: سمعت رجلا في سوق عكاظ يقول:
"يا أيها الناس! قولوا: لا إله إلا الله تفلحوا، ورجل يتبعه يقول: إن هذا يريد أن يصدكم عن آلهتكم فإذًا النبي صلى الله عليه وسلم وأبو جهل".
وإسناده صحيح أيضًا.
وأشعث هو ابن أبي الشعثاء - اسمه سُليم - المحاربي الكوفي من رجال الجماعة.
আশআছ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে বনু মালিক ইবনু কিনানাহ গোত্রের একজন শায়খ (বৃদ্ধ) বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যুল-মাজাযের বাজারে দেখতে পেলাম। তিনি তার মধ্যে দিয়ে হেঁটে যাচ্ছিলেন এবং বলছিলেন: "হে লোক সকল! তোমরা বলো: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই), তাহলে তোমরা সফলকাম হবে।" তিনি (ঐ শায়খ) বলেন: আর আবূ জাহল তাঁর (নবীর) উপর মাটি ছিটিয়ে দিচ্ছিল এবং বলছিল: "হে লোক সকল! এই ব্যক্তি যেন তোমাদেরকে তোমাদের দ্বীন থেকে বিভ্রান্ত না করে। কেননা সে কেবল এই চায় যে তোমরা তোমাদের দেব-দেবী এবং লাত ও উযযাকে পরিত্যাগ করো।" তিনি বলেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে কোনো ভ্রূক্ষেপই করছিলেন না। (ঐ শায়খকে) আমরা বললাম: আমাদের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বর্ণনা দিন। তিনি বললেন: তিনি দুটি লাল রঙের চাদরের মধ্যখানে ছিলেন, তিনি মধ্যম আকৃতির, প্রচুর গোশতবিশিষ্ট (সুঠাম দেহের অধিকারী), সুন্দর চেহারার, অত্যন্ত কালো চুলবিশিষ্ট, তীব্র সাদা রঙের (ফর্সা), এবং লম্বা চুলবিশিষ্ট।
8470 - عن ربيعة بن عباد الدّيلي أنه قال: رأيت أبا لهب بعكاظ، وهو يتبع رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يقول: يا أيها الناس! إن هذا قد غوى، فلا يغْوينكم عن آلهة آبائكم. ورسول الله صلى الله عليه وسلم يفر منه، وهو على أثره، ونحن نتبعه، ونحن غلمان. كأني أنظر إليه أحول ذو غديرتين، أبيض الناس، وأجملهم.
صحيح: رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (16020) والطبراني في الكبير (4588) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (963) كلهم من طريق ابن أبي ذئب، عن سعيد بن خالد القارظي، عن ربيعة بن عباد الديلي فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه محمد بن عمرو الليثي، عن محمد بن المنكدر، عن رَبيعة بن عباد الديلي قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بذي المجاز يدعو الله، وخلفه رجل أحول يقول: لا يصدّنكم هذا عن دين آلهتكم، قلت: من هذا؟ قالوا: هذا عمه أبو لهب.
رواه عبد الله بن أحمد (16021) والطبراني في الكبير (4584) والبيهقي (9/ 7) كلهم من هذا الوجه.
ورواه الحاكم (1/ 15) من وجه آخر عن محمد بن المنكدر.
وعكاظ وذو المجاز ومجنة كلها أسواق في الجاهلية.
রাবীআহ ইবনে আব্বাদ আদ-দীলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ লাহাবকে উকাজের বাজারে দেখেছি। সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিছু পিছু চলত এবং বলত: হে লোক সকল! এ ব্যক্তি পথভ্রষ্ট হয়েছে। সে যেন তোমাদেরকে তোমাদের বাপ-দাদাদের উপাস্যদের থেকে বিভ্রান্ত না করে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার থেকে দূরে সরে যাচ্ছিলেন, আর সে তাঁর পিছনে লেগে ছিল। আমরা কিছু বালক তার অনুসরণ করছিলাম। আমি যেন তাকে (আবূ লাহাবকে) এখনো দেখতে পাচ্ছি—সে ছিল টেরা চোখের অধিকারী, তার দুটি বেণী ছিল, সে ছিল লোকেদের মধ্যে সবচেয়ে ফর্সা ও সুদর্শন।
(অন্য একটি বর্ণনায়) রাবীআহ ইবনে আব্বাদ আদ-দীলি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে যুল মাজাযের বাজারে আল্লাহ্র দিকে দাওয়াত দিতে দেখেছি। আর তাঁর পেছনেই এক টেরা চোখের লোক বলছিল: এই ব্যক্তি যেন তোমাদেরকে তোমাদের উপাস্যদের দ্বীন থেকে বিরত না রাখে। আমি জিজ্ঞেস করলাম: এ কে? তারা বলল: ইনি তাঁর চাচা আবূ লাহাব।
(উল্লেখ থাকে যে) উকাজ, যুল মাজায এবং মুজান্নাহ—এগুলো ছিল জাহিলিয়্যাতের সময়ের বাজার।
8471 - عن ربيعة بن عباد الديلي، وكان جاهليًا أسلم فقال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بصر عيني بسوق ذي المجاز يقول:"يا أيها الناس! قولوا: لا إله إلا الله تفلحوا" ويدخل في فجاجها، والناس متقصّفون عليه. فما رأيت أحدًا يقول شيئًا وهو لا يسكت يقول:"يا أيها الناس! قولوا: لا إله إلا الله تفلحوا" إلا أن وراءه رجلًا أحول وضيء الوجه ذا غديرتين يقول: إنه صابئ كاذب. فقلت: من هذا؟ قالوا: محمد بن عبد الله وهو يذكر النبوة. قلت: من هذا الذي يكذّبه؟ قالوا: عمه أبو لهب. قلت: إنك كنت يومئذ صغيرًا. قال: لا والله! إني يومئذ لأعقل.
حسن: رواه عبد الله بن أحمد (16023) والطبراني في الكبير (4582) والحاكم (1/ 15) كلهم من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن ربيعة بن عباد، فذكره.
قال الحاكم:"إنما استشهدت بعبد الرحمن بن أبي الزناد اقتداء بهما، فقد استشهدا جميعا به" قلت: وهو حسن الحديث إذا لم يخالف.
রবী‘আহ ইবনে ‘আব্বাদ আদ-দীলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জাহেলী যুগের লোক ছিলেন এবং পরে ইসলাম গ্রহণ করেন। তিনি বলেন: আমি যুল-মাজাযের বাজারে আমার নিজের চোখে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে দেখেছি: "হে লোকেরা! তোমরা বলো: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), তবে তোমরা সফলকাম হবে।" তিনি বাজারের গলিপথগুলোতে প্রবেশ করছিলেন এবং লোকেরা তাঁর উপর ভীড় জমিয়েছিল। আমি কাউকে কিছু বলতে দেখিনি। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব হচ্ছিলেন না, তিনি বলছিলেন: "হে লোকেরা! তোমরা বলো: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), তবে তোমরা সফলকাম হবে।" শুধু দেখলাম, তাঁর পেছনে একজন ট্যারা চোখবিশিষ্ট, উজ্জ্বল চেহারার, দুই বেণীওয়ালা লোক রয়েছে, যে বলছে: 'নিশ্চয়ই সে একজন ধর্মত্যাগী মিথ্যুক (সাবী কাযিব)।' আমি জিজ্ঞাসা করলাম: ইনি কে? লোকেরা বলল: ইনি মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ, যিনি নবুওয়াতের কথা বলছেন। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: কে এই ব্যক্তি, যে তাঁকে মিথ্যুক বলছে? তারা বলল: ইনি তাঁর চাচা আবু লাহাব। (বর্ণনাকারী রবী‘আহকে উদ্দেশ্য করে বলা হলো): আমি বললাম, আপনি তো সেদিন ছোট ছিলেন। তিনি (রবী‘আহ) বললেন: আল্লাহর কসম! না, আমি সেদিন জ্ঞানবুদ্ধি সম্পন্ন ছিলাম।
8472 - عن ربيعة بن عباد يحدث عن أبيه قال: إني لغلام شاب مع أبي بمنى. ورسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يا بني فلان إني رسول الله إليكم، يأمركم أن تعبدوا الله، ولا تشركوا به شيئًا. وأن تخلعوا ما تعبدون من دونه من هذه الأنداد، وأن توفوا بي، وتصدقوا بي، وتمنعوني حتى أبين عن الله ما بعثني به" قال: وخلفه رجل أحول وضيء، له غديرتان، عليه حلة عدنية. فإذا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من قوله، وما دعا إليه، قال ذلك الرجل: يا بني فلان، إن هذا إنما يدعوكم أن تسلخوا اللات والعزى من أعناقكم وحلفاءكم من الجن من بني مالك بن أقيس، إلى ما جاءه به من البدعة، فلا تطيعوه، ولا تسمعوا منه.
قال: قلت لأبي: يا أبت! من هذا الذي يتبعه، ويرد عليه ما يقول؟ قال: هذا عمه عبد العزى بن عبد المطلب أبو لهب.
حسن: رواه محمد بن إسحاق في سيرته - ابن هشام (1/ 423) قال: حدثني حسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس، قال: سمعت ربيعة بن عباد يحدث عن أبيه فذكره.
وحسين بن عبد الله بن عبيد الله الهاشمي ضعّفه جمهور أهل العلم، ولكن قال ابن عدي: هو ممن يكتب حديثه. قلت: وله ما يشهد له.
রাবি'আ ইবনে আব্বাদ থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা বলেন: মিনার ময়দানে আমি আমার পিতার সাথে একজন যুবক ছিলাম। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছিলেন: "হে অমুক গোত্রের লোকেরা! আমি তোমাদের প্রতি আল্লাহর প্রেরিত রাসূল। তিনি তোমাদের আদেশ করছেন যে তোমরা কেবল আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করো না। এবং তোমরা আল্লাহ ব্যতীত যেসব প্রতিমার ইবাদত করো, সেগুলোকে বর্জন করো। আর তোমরা আমাকে সাহায্য করো, আমাকে সত্য বলে গ্রহণ করো এবং আমাকে নিরাপত্তা দাও, যেন আমি আল্লাহর পক্ষ থেকে প্রেরিত বার্তা স্পষ্টভাবে পৌঁছে দিতে পারি।"
বর্ণনাকারী বলেন, তাঁর (রাসূলের) পেছনে একজন ট্যারা, সুদর্শন লোক ছিল, যার দুটি বেণী ছিল এবং তার পরনে ছিল আদানি (আদন অঞ্চলের) পোশাক। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বক্তব্য এবং তাঁর দাওয়াত সমাপ্ত করলেন, তখন সেই লোকটি বলল: "হে অমুক গোত্রের লোকেরা! এ লোকটি তোমাদের শুধু এজন্যই ডাকছে যে তোমরা তোমাদের গলা থেকে লাত ও উযযাকে এবং বানী মালিক ইবনে আকীস গোত্রের জিনদের মধ্যে তোমাদের মিত্রদের ছুড়ে ফেলো—যা সে নতুন প্রথা (বিদ'আত) নিয়ে এসেছে তার অনুকূলে। সুতরাং তোমরা তার আনুগত্য করো না এবং তার কথা শোনোও না।"
বর্ণনাকারী বলেন, আমি আমার পিতাকে জিজ্ঞেস করলাম: "হে আব্বা! এই লোকটি কে, যে তাঁর অনুসরণ করে এবং তিনি যা বলেন, তা প্রত্যাখ্যান করে?"
তিনি বললেন: "এ হলো তাঁর চাচা আব্দুল উযযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিব—আবূ লাহাব।"
8473 - عن طارق بن عبد الله المحاربي قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في سوق ذي المجاز، وعليه حلة حمراء ويقول:"يا أيها الناس! قولوا: لا إله إلا الله تفلحوا" ورجل يتبعه يرميه بالحجارة، وقد أدمى عرقوبيه وكعبيه وهو يقول: يا أيها الناس، لا تطيعوه، فإنه كذاب. فقلت: من هذا؟ قيل: هذا غلام بني عبد المطلب. فقلت: فمن هذا الذي يتبعه يرميه بالحجارة؟ قال: هذا عبد العزى أبو لهب.
حسن: رواه ابن حبان (6562) والنسائي (8/ 55) والحاكم (2/ 611 - 612) كلهم من حديث يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن جامع بن شداد، عن طارق بن عبد الله المحاربي فذكره في حديث طويل. انظر: باب الوفود.
وإسناده حسن من أجل يزيد بن زياد بن أبي الجعد.
ذكر ابن إسحاق وغيره أن النبي صلى الله عليه وسلم كان بعد موت أبي طالب قد خرج إلى ثقيف بالطائف يدعوهم إلى نصره. فلما اقتنعوا منه رجع إلى مكة فكان يعرض نفسه على قبائل العرب في موسم الحج. وذكر بأسانيد متفرقة أنه أتى كندة، وبني كعب، وبني حذيفة، وبني عامر بن صعصعة
وغيرهم فلم يُجبه أحد منهم إلى ما سأل.
وقال موسى بن عقبة عن الزهري: فكان في تلك السنين - أي التي قبل الهجرة - يعرض نفسه على القبائل، ويكلم كل شريف قوم، لا يسألهم إلا أن يؤدوه، ويمنعوه. ويقول: لا أكره أحدًا منكم على شيء، بل أريد أن تمنعوا من يؤذيني حتى أبلغ رسالة ربي. فلا يقبله أحد. بل يقولون: قوم الرجل أعلم به.
فكان النبي صلى الله عليه وسلم يحزن أشد الحزن على المشركين لتركهم الإيمان فقال الله تعالى مُسلّيًا إياه.
{فَلَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَفْسَكَ عَلَى آثَارِهِمْ إِنْ لَمْ يُؤْمِنُوا بِهَذَا الْحَدِيثِ أَسَفًا (6)} [الكهف: 6].
وقال تعالى: {فَلَا تَذْهَبْ نَفْسُكَ عَلَيْهِمْ حَسَرَاتٍ} [فاطر: 8].
وقال تعالى: {وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ} [الحجر: 88].
وقال تعالى: {لَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ (3)} [الشعراء: 3].
إلى غيرها من الآيات.
তারিক ইবনু আব্দুল্লাহ আল-মুহারিবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যুল-মাজায বাজারে দেখেছি। তাঁর পরনে ছিল একটি লাল চাদর (বা জোব্বা), আর তিনি বলছিলেন: "হে মানবমণ্ডলী! তোমরা বলো: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), তবে তোমরা সফলকাম হবে।" আর একজন লোক তাঁর পিছু নিয়ে তাঁকে পাথর মারছিল। পাথর মারার কারণে তার (নবীর) গোড়ালি ও টাখনু থেকে রক্ত ঝরছিল। লোকটি বলছিল: হে লোকসকল! তোমরা তাকে অনুসরণ করো না, কারণ সে একজন মিথ্যাবাদী। আমি (তারিক) জিজ্ঞেস করলাম: ইনি কে? বলা হলো: ইনি বনু আব্দুল মুত্তালিবের এক যুবক। আমি আবার জিজ্ঞেস করলাম: আর এই যে লোকটি তার পিছু নিয়ে পাথর নিক্ষেপ করছে, সে কে? বলা হলো: ইনি হলেন আব্দুল উযযা, অর্থাৎ আবূ লাহাব।
8474 - عن عائشة قالت: كان يوم بُعاث يومًا قدّمه الله لرسوله صلى الله عليه وسلم. فقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد افترق ملؤهم، وقتلت سرواتهم، وجرّحوا. فقدمه الله لرسوله صلى الله عليه وسلم في دخولهم في الإسلام.
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3777) عن عبيد بن إسماعيل، حدثنا أبو أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وبعاث - هو المكان الذي وقعت فيه الحرب بين الأوس والخزرج وقتل فيها رئيس الأوس حضير والد أسيد بن حضير، وقتل فيها أيضًا رئيس الخزرج عمرو بن النعمان البياضي. وكان النصر أولا للخزرج، ثم للأوس. وكان ذلك قبل مقدم النبي صلى الله عليه وسلم بخمس سنين.
وقولها: سروات: جمع سراة وهو الشريف.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বু'আসের দিনটি এমন একটি দিন ছিল যা আল্লাহ তাঁর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আগে থেকেই তৈরি করে রেখেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মদিনায়) আগমন করলেন, যখন তাদের (গোত্রীয়) সমাবেশ বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়েছিল, তাদের নেতৃস্থানীয় ব্যক্তিবর্গ নিহত হয়েছিল এবং তারা জখম হয়েছিল। আল্লাহ তাদের ইসলামে প্রবেশের জন্য তাঁর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্বার্থে এটিকে প্রস্তুত করে রেখেছিলেন।
8475 - عن محمود بن لبيد أخي بني عبد الأشهل قال: لما قدم أبو الحيسر أنس بن رافع مكة، ومعه فتية من بني عبد الأشهل فيهم إياس بن معاذ يلتمسون الحلف من قريش على قومهم من الخزرج، سمع بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتاهم فجلس إليهم، فقال لهم:"هل لكم إلى خير مما جئتم له؟" قالوا: وما ذاك؟ قال:"أنا رسول الله، بعثني إلى العباد أدعوهم إلى أن يعبدوا الله لا يشركوا به شيئًا، وأنزل علي كتاب" ثم ذكر الإسلام، وتلا عليهم القرآن، فقال إياس بن معاذ، وكان غلامًا حدثًا: أي قوم! هذا والله خير مما جئتم له، قال: فأخذ أبو حيسر أنس بن رافع حفنة من البطحاء فضرب بها في وجه إياس بن معاذ، وقام رسول الله صلى الله عليه وسلم عنهم وانصرفوا إلى المدينة، فكانت
وقعة بعاث بين الأوس والخزرج قال: ثم لم يلبث إياس بن معاذ أن هلك. قال محمود بن لبيد: فأخبرني من حضره من قومي عند موته أنهم لم يزالوا يسمعونه يهلل الله ويكبره ويحمده ويسبحه حتى مات، فما كانوا يشكون أن قد مات مسلمًا لقد كان استشعر الإسلام في ذلك المجلس حين سمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم ما سمع.
حسن: رواه أحمد (23619)، والطبراني في الكبير (1/ 251)، والحاكم (3/ 180 - 181)، والبيهقي في الدلائل (2/ 420) كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني الحصين بن عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ أخي بني عبد الأشهل، عن محمود بن لبيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل تصريح محمد بن إسحاق وشيخه الحصين بن عبد الرحمن وثّقه ابن حبان، وقال ابن سعد: كان قليل الحديث.
وصحّحه الحاكم على شرط مسلم، وهو ليس كذلك فإن الحصين بن عبد الرحمن هذا لم يخرج له مسلم.
وقال الذهبي:"مرسل" يعني أن محمود بن لبيد من صغار الصحابة، ومراسيل الصحابة مقبولة.
মাহমুদ ইবন লাবিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি বনু আবদুল আশহাল গোত্রের ভাই, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: যখন আবুল হাইসার আনাস ইবনু রাফি’ বনু আবদুল আশহাল গোত্রের কিছু যুবককে সঙ্গে নিয়ে মক্কায় এলেন—যাদের মধ্যে ইয়াস ইবনু মুআযও ছিলেন—তখন তারা তাদের গোত্রের (শত্রু) খাযরাজদের বিরুদ্ধে কুরাইশদের সাথে মৈত্রী চুক্তি করার জন্য এসেছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের আগমনের কথা শুনতে পেলেন। তিনি তাদের কাছে এসে বসলেন এবং বললেন: "তোমরা যা চাইতে এসেছ, তার চেয়ে উত্তম জিনিসের দিকে কি তোমাদের আগ্রহ আছে?" তারা জিজ্ঞেস করলো: "সেটা কী?" তিনি বললেন: "আমি আল্লাহর রাসূল। তিনি আমাকে বান্দাদের নিকট প্রেরণ করেছেন যেন আমি তাদের আহ্বান করি যে, তারা যেন আল্লাহর ইবাদত করে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে। আর আমার উপর একটি কিতাব নাযিল করেছেন।" এরপর তিনি ইসলামের কথা উল্লেখ করলেন এবং তাদের সামনে কুরআন তিলাওয়াত করলেন।
তখন ইয়াস ইবনু মুআয, যিনি ছিলেন এক যুবক, বলে উঠলেন: "হে লোক সকল! আল্লাহর শপথ, তোমরা যা চাইতে এসেছ, এটা তার চেয়ে অনেক উত্তম।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন আবুল হাইসার আনাস ইবনু রাফি’ এক মুঠো নুড়ি পাথর তুলে নিয়ে ইয়াস ইবনু মুআযের মুখে ছুঁড়ে মারলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছ থেকে উঠে গেলেন। এরপর তারা মদীনার দিকে ফিরে গেলেন এবং পরবর্তীতে আওস ও খাযরাজ গোত্রের মধ্যে বুআস যুদ্ধ সংঘটিত হলো।
(বর্ণনাকারী) বলেন: এরপর অল্প দিনের মধ্যেই ইয়াস ইবনু মুআয মারা গেলেন। মাহমুদ ইবন লাবিদ বলেন: আমার গোত্রের যারা তার (ইয়াসের) মৃত্যুর সময় তার কাছে উপস্থিত ছিল, তারা আমাকে জানিয়েছেন যে, মৃত্যুর আগ পর্যন্ত তারা তাকে আল্লাহর তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ), তাকবীর (আল্লাহু আকবার), তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ) এবং তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ) পাঠ করতে শুনেছেন। ফলে তারা কোনো সন্দেহ করতেন না যে, তিনি মুসলিম হিসেবেই মৃত্যুবরণ করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা তিনি শুনেছিলেন, সেই মজলিসেই তিনি ইসলামের অনুভূতি লাভ করেছিলেন।
8476 - عن ابن إسحاق قال: فحدثني عاصم بن عمر بن قتادة، عن أشياخ من قومه، قالوا: لما لقيهم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لهم:"من أنتم؟" قالوا: نفر من الخزرج، قال:"أمن موالي يهود؟" قالوا: نعم، قال:"أفلا تجلسون أكلمكم؟" قالوا: بلى. فجلسوا معه، فدعاهم إلى الله عز وجل، وعرض عليهم الإسلام، وتلا عليهم القرآن. قال: وكان مما صنع الله بهم في الإسلام أن يهود كانوا معهم في بلادهم، وكانوا أهل كتاب وعلم، وكانوا هم أهل شرك وأصحاب أوثان، وكانوا قد غزوهم ببلادهم، فكانوا إذا كان بينهم شيء قالوا لهم: إن نبيًا مبعوث الآن، قد أظل زمانه، نتبعه فنقتلكم معه قتل عاد وإرم، فلما كلم رسول الله صلى الله عليه وسلم أولئك النفر، ودعاهم إلى الله، قال بعضهم لبعض: يا قوم! تعلموا والله! إنه للنبي الذي توعدكم به يهود، فلا تسبقنكم إليه. فأجابوه فيما دعاهم إليه بأن صدقوه وقبلوا منه ما عرض عليهم من الإسلام، وقالوا: إنا قد تركنا قومنا، ولا قوم بينهم من العداوة والشر ما بينهم، فعسى أن يجمعهم الله بك، فسنقدم عليهم، فندعوهم إلى أمرك، ونعرض عليهم الذي أجبناك إليه من هذا الدين، فإن يجمعهم الله عليه فلا رجل أعز منك. ثم انصرفوا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم راجعين إلى بلادهم، وقد آمنوا وصدقوا.
حسن: رواه ابن إسحاق بإسناده كما في سيرة ابن هشام (1/ 428 - 429) وإسناده حسن من
أجل محمد بن إسحاق. وأما جهالة أشياخ فلا تضر لأنهم عدد كثير يشد بعضهم بعضًا.
وهؤلاء الذين لقيهم رسول الله صلى الله عليه وسلم عند العقبة كانوا ستة نفر من الخزرج:
1 - أسعد بن زرارة أبو أمامة.
2 - عوف بن الحارث بن رفاعة
3 - رافع بن مالك بن العجلان
4 - قطبة بن عامر بن حديدة
5 - عقبة بن عامر بن نأبي
6 - جابر بن عبد الله بن رئاب
فلما قدموا المدينة إلى قومهم ذكروا لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ودعوهم إلى الإسلام حتى فشا فيهم، فلم يبق دار من دور الأنصار إلا وفيها ذكر من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
سيرة ابن هشام (1/ 429 - 4
ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে আসিম ইবনু উমর ইবনু কাতাদাহ তাঁর গোত্রের মুরব্বিদের সূত্রে বলেছেন, তারা বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন তাদের সাথে সাক্ষাৎ করলেন, তখন তাদের জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কারা?"
তারা বলল: আমরা খাজরাজ গোত্রের কিছু লোক। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কি ইহুদিদের মিত্র (মাওয়ালী)?" তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তোমরা কি বসবে না? আমি তোমাদের সাথে কথা বলবো।" তারা বলল: হ্যাঁ (নিশ্চয়ই)। অতঃপর তারা তাঁর সাথে বসলো। তিনি তাদেরকে মহান আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা-এর দিকে দাওয়াত দিলেন, তাদের কাছে ইসলামের প্রস্তাব দিলেন এবং তাদের সামনে কুরআন তিলাওয়াত করলেন।
তিনি বললেন: ইসলামের ক্ষেত্রে আল্লাহ তাদের প্রতি যে অনুগ্রহ করেছেন, তার মধ্যে এটিও ছিল যে, ইহুদিরা তাদের সাথে তাদের দেশে বসবাস করত এবং তারা ছিল কিতাব ও জ্ঞানের অধিকারী। আর এই লোকগুলো ছিল মূর্তিপূজক এবং মুশরিক। ইহুদিরা তাদের দেশে তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করত। যখনই তাদের মধ্যে কোনো ধরনের বিরোধ সৃষ্টি হতো, ইহুদিরা তাদেরকে বলতো: "এখন একজন নবী আবির্ভূত হতে চলেছেন, যার সময়কাল ঘনিয়ে এসেছে। আমরা তাঁর অনুসরণ করে তাঁর সাথে তোমাদেরকে আদ ও ইরাম জাতির মতো হত্যা করব।"
যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেই লোকগুলোর সাথে কথা বললেন এবং তাদের আল্লাহর দিকে দাওয়াত দিলেন, তখন তারা একে অপরের সাথে বলাবলি করলো: "হে আমাদের কওম! আল্লাহর কসম, জেনে রাখো! ইনিই সেই নবী, যার ভয় ইহুদিরা তোমাদের দেখাতো। সুতরাং তারা যেন তোমাদের আগে গিয়ে তাঁর অনুসারী না হয়ে যায়।"
অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দাওয়াতের সাড়া দিল এই বলে যে, তারা তাঁকে বিশ্বাস করলো এবং ইসলামের যে প্রস্তাব তিনি তাদের কাছে পেশ করলেন, তা গ্রহণ করে নিল। তারা বলল: "আমরা এমন এক কওমকে ছেড়ে এসেছি, যাদের মধ্যে আপনার (আমাদের) মতো আর কোনো গোত্রের এত বেশি শত্রুতা ও খারাপ সম্পর্ক নেই। সম্ভবত আল্লাহ আপনার মাধ্যমে তাদের একত্র করবেন। আমরা তাদের কাছে ফিরে গিয়ে আপনার নির্দেশের দিকে তাদের আহ্বান করব এবং এই দীনের যে বিষয়ে আমরা আপনাকে সাড়া দিয়েছি, তা তাদের সামনে পেশ করব। যদি আল্লাহ তাদের এর ওপর একত্রিত করেন, তবে আপনার চেয়ে সম্মানিত আর কেউ থাকবে না।" এরপর তারা ঈমান এনে এবং বিশ্বাস স্থাপন করে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছ থেকে নিজেদের দেশে ফিরে গেল।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে আকাবাতে এই ছয়জন খাজরাজ গোত্রের লোক সাক্ষাৎ করেছিলেন: ১. আসআদ ইবনু যুরারাহ আবূ উমামাহ; ২. আওফ ইবনু হারিস ইবনু রিফাআহ; ৩. রাফি’ ইবনু মালিক ইবনুল আজলান; ৪. কুতবাহ ইবনু আমির ইবনু হাদিদাহ; ৫. উকবাহ ইবনু আমির ইবনু না-বি; ৬. জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু রিআব।
তারা যখন মদিনায় নিজ গোত্রের কাছে পৌঁছালেন, তখন তারা তাদেরকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সম্পর্কে জানালেন এবং ইসলামের দিকে আহ্বান করলেন। এভাবে তাদের মধ্যে ইসলাম ছড়িয়ে পড়ল। আনসারদের এমন কোনো ঘর বাকি থাকল না, যেখানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আলোচনা হতো না।
8477 - عن عبادة بن الصامت وكان شهد بدرًا، وهو أحد النقباء ليلة العقبة - أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: وحوله عصابة من أصحابه -"بايعوني على أن لا تشركوا بالله شيئًا، ولا تسرقوا، ولا تزنوا، ولا تقتلوا أولادكم، ولا تأتوا ببهتان تفترونه بين أيديكم وأرجلكم، ولا تعصوا في معروف، فمن وفى منكم فأجره على الله، ومن أصاب من ذلك شيئًا فعوقب في الدنيا فهو كفارة له، ومن أصاب من ذلك شيئًا ثم ستره الله فهو إلى الله إن شاء عفا عنه، وإن شاء عاقبه". فبايعناه على ذلك.
متفق عليه: رواه البخاري في الايمان (18)، ومسلم في الحدود (1709) كلاهما من حديث الزهري، عن أبي إدريس، عن عبادة بن الصامت فذكره.
وعبادة بن الصامت كان أحد النقباء الذين بايعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم كما يقول عن نفسه: إني كنت من النقباء الذين بايعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم. البخاري (3893)، ومسلم (1709: 44).
وذكر ابن إسحاق كما في سيرة ابن هشام (1/ 431):"حتى إذا كان العام المقبل وافى الموسم من الأنصار اثنا عشر رجلا فلقوه بالعقبة، قال: وهي العقبة الأولى فبايعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم على بيعة النساء. وذلك قبل أن تفرض عليهم الحرب.
وقوله: بيعة النساء: يريد مثل ما جاء في سورة الممتحنة: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَى أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْنِينَ وَلَا يَقْتُلْنَ أَوْلَادَهُنَّ وَلَا يَأْتِينَ بِبُهْتَانٍ يَفْتَرِينَهُ بَيْنَ أَيْدِيهِنَّ
وَأَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْصِينَكَ فِي مَعْرُوفٍ فَبَايِعْهُنَّ وَاسْتَغْفِرْ لَهُنَّ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (12)} [الممتحنة: 12].
وليس فيها ذكر للحرب لأنها نزلت بعد صلح الحديبية.
ثم ذكر ابن إسحاق أسماء اثني عشر رجلا وهم:
1 - أسعد بن زرارة بن عدس بن عبيد بن ثعلبة بن غنم بن مالك بن النجار من الخزرج.
2 - عوف بن الحارث بن رفاعة بن سواد من بني النجار من الخزرج.
3 - معاذ بن الحارث بن رفاعة بن سواد من بني النجار من الخزرج.
4 - رافع بن مالك بن العجلان من بني زريق من الخزرج.
5 - ذكوان بن عبد قيس من بني زريق من الخزرج.
6 - عبادة بن الصامت بن قيس بن أصرم من بني عوف من الخزرج.
7 - أبو عبد الرحمن يزيد بن ثعلبة بن خزمة من بني عوف من الخزرج.
8 - العباس بن عبادة بن نضلة من بني سالم من الخزرج.
9 - عقبة بن عامر بن نابي من بني سلمة من الخزرج.
10 - قطبة بن عامر بن حديدة من بني سواد من بني سلمة من الخزرج.
11 - أبو الهيثم بن التيهان اسمه مالك من الأوس.
12 - عويم بن ساعدة من بني الأوس.
نلاحظ أن من اثني عشر رجلا كان عشر من الخزرج، واثنان من الأوس.
قال ابن إسحاق: ثم انصرفوا بعد البيعة وبعمث رسول الله صلى الله عليه وسلم معهم مصعب بن عمير.
قال ابن إسحاق:"فحدثني عاصم بن عمر بن قتادة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما بعثه بعدهم، وإنما كتبوا إليه: أن الإسلام قد فشا فينا، فابعث إلينا رجلا من أصحابك يقرئنا القرآن، ويفقهنا في الإسلام، ويقيمنا لسنته وشرائعه، ويؤمنا في صلاتنا. فبعث مصعب بن عمير. فكان ينزل مصعب بن عمير على أبي أمامة أسعد بن زرارة. وكان مصعب يسمى بالمدينة المقرئ، وكان أبو أمامة يذهب به إلى دور الأنصار يدعوهم إلى الإسلام ويفقه من أسلم منهم. الدلائل للبيهقي (2/ 437).
وفي سيرة ابن هشام (1/ 434 - 435): قال ابن إسحاق: فحدثني عاصم بن عمر بن قتادة: أنه كان يصلي بهم وذلك أن الأوس والخزرج كره بعضهم أن يؤمه بعض.
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—যিনি বদরের যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন এবং যিনি আক্বাবার রাতে উপস্থিত নকী-বদের (নেতাদের) অন্যতম ছিলেন—যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চারপাশে তাঁর একদল সাহাবী পরিবেষ্টিত থাকা অবস্থায় বললেন: "তোমরা আমার কাছে এই মর্মে বাইআত (শপথ) করো যে, তোমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করবে না, চুরি করবে না, ব্যভিচার করবে না, তোমাদের সন্তানদের হত্যা করবে না, তোমরা এমন কোনো মিথ্যা অপবাদ আনয়ন করবে না যা তোমরা তোমাদের সম্মুখ ও পায়ের মধ্যবর্তী স্থান হতে তৈরি করছ এবং কোনো ন্যায়সঙ্গত বিষয়ে (আমার) অবাধ্য হবে না। তোমাদের মধ্যে যে এই অঙ্গীকার পূর্ণ করবে, তার প্রতিদান আল্লাহর উপর। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে ফেলবে এবং দুনিয়াতে তাকে তার শাস্তি দেওয়া হবে, তবে তা তার জন্য কাফ্ফারা (গুনাহের প্রায়শ্চিত্ত) হয়ে যাবে। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে ফেলবে, অতঃপর আল্লাহ তা গোপন রাখবেন, তবে তার বিষয়টি আল্লাহর ওপর ন্যস্ত; তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন, আর চাইলে শাস্তি দেবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা এই শর্তে তাঁর হাতে বাইআত করলাম।
8478 - عن جابر بن عبد الله: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لبث عشر سنين يتبع الحاج في منازلهم، في الموسم وبمجنة وبعكاظ، وبمنازلهم بمنى يقول:"من يؤويني، من ينصرني، حتى أبلغ رسالات ربي، وله الجنة" فلا يجد أحدًا ينصره ويؤويه، حتى إن
الرجل يرحل من مضر، أو من اليمن إلى ذي رحمه فيأتيه قومه، فيقولون: احذر غلام قريش لا يفتنك، ويمشي بين رحالهم يدعوهم إلى الله عز وجل يشيرون إليه بالأصابع، حتى بعثنا الله عز وجل له من يثرب، فيأتيه الرجل فيؤمن به فيقرئه القرآن، فينقلب إلى أهله فيسلمون بإسلامه، حتى لم يبق دار من دور يثرب إلا وفيها رهط من المسلمين يظهرون الإسلام. ثم بعثنا الله فأتمرنا واجتمعنا سبعون رجلا منا، فقلنا: حتى متى نذر رسول الله صلى الله عليه وسلم يطرد في جبال مكة، ويخاف؟ فرحلنا حتى قدمنا عليه في الموسم فواعدناه شعب العقبة، فقال عمه العباس: يا ابن أخي! إني لا أدري ما هؤلاء القوم الذين جاؤوك؟ إني ذو معرفة بأهل يثرب، فاجتمعنا عنده من رجل ورجلين، فلما نظر العباس في وجوهنا، قال: هؤلاء قوم لا أعرفهم، هؤلاء أحداث. فقلنا: يا رسول الله! علام نبايعك؟ قال:"تبايعوني على السمع والطاعة في النشاط والكسل، وعلى النفقة في العسر واليسر، وعلى الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر، وعلى أن تقولوا في الله لا تأخذكم فيه لومة لائم، وعلى أن تنصروني إذا قدمت يثرب، فتمنعوني مما تمنعون منه أنفسكم وأزواجكم وأبناءكم، ولكم الجنة".
فقمنا نبايعه، فأخذ بيده أسعد بن زرارة، وهو أصغر السبعين، فقال: رويدًا يا أهل يثرب! إنا لم نضرب إليه أكباد المطي إلا ونحن نعلم أنه رسول الله، إن إخراجه اليوم مفارقة العرب كافة، وقتل خياركم، وأن تعضكم السيوف، فإما أنتم قوم تصبرون على السيوف إذا مستكم، وعلى قتل خياركم، وعلى مفارقة العرب كافة، فخذوه وأجركم على الله، وإما أنتم قوم تخافون من أنفسكم خيفة، فذروه، فهو أعذر عند الله، قالوا: يا أسعد بن زرارة! أمط عنا يدك، فو الله! لا نذر هذه البيعة، ولا نستقيلها. فقمنا إليه رجلًا رجلًا يأخذ علينا بشرطة العباس ويعطينا على ذلك الجنة.
حسن: رواه الإمام أحمد (14653) وصحّحه ابن حبان (7012) والحاكم (2/ 624 - 625) كلهم من حديث يحيى بن سليم، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزبير، أنه حدثه جابر بن عبد الله فذكره.
ورواه أيضًا أحمد (14456) والبزار - كشف الأستار (1756) وابن حبان (6274) كلهم من طريق عبد الرزاق أخبرنا معمر، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم به نحوه وله طرق أخرى عن ابن خثيم.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير فإنه حسن الحديث إذا صرّح.
জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দশ বছর ধরে হজ্জের মৌসুমে মিনা, মাজান্না ও উকাযের বিভিন্ন স্থানে হাজীদের ডেরার কাছে যেতেন এবং বলতেন: "কে আমাকে আশ্রয় দেবে? কে আমাকে সাহায্য করবে, যেন আমি আমার রবের রিসালাত (বার্তা) পৌঁছে দিতে পারি? তার জন্য জান্নাত রয়েছে।" কিন্তু তিনি এমন কাউকে খুঁজে পাননি যে তাকে সাহায্য করবে বা আশ্রয় দেবে।
এমনকি মুদার অথবা ইয়েমেন থেকে যখন কোনো লোক তার আত্মীয়ের কাছে যেত, তখন তার গোত্রের লোকেরা এসে বলত: ‘সাবধান! কুরাইশের এই যুবক থেকে দূরে থাকো, যেন সে তোমাকে ফিতনায় না ফেলে।’ তিনি তাদের ডেরার মধ্য দিয়ে হেঁটে হেঁটে তাদের মহান আল্লাহর দিকে আহ্বান করতেন, আর লোকেরা আঙুল দিয়ে তার দিকে ইশারা করত। অবশেষে আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল ইয়াছরিব (মদীনা) থেকে তার জন্য (সাহায্যকারী) পাঠালেন।
এরপর একজন লোক তাঁর কাছে আসত এবং ঈমান আনত। তিনি তাকে কুরআন শিক্ষা দিতেন। সে তার পরিবারের কাছে ফিরে যেত এবং তার ইসলাম গ্রহণের ফলে তারাও ইসলাম গ্রহণ করত। এভাবে ইয়াছরিবের এমন কোনো ঘর বাকি ছিল না, যেখানে মুসলমানদের একটি দল প্রকাশ্যে ইসলাম পালন করত না। এরপর আল্লাহ্ (আমাদের) পাঠালেন। আমরা নিজেদের মধ্যে পরামর্শ করলাম এবং আমাদের মধ্য থেকে সত্তর জন লোক একত্রিত হলাম। আমরা বললাম: আমরা আর কতকাল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কার পাহাড়গুলোতে বিতাড়িত হতে এবং ভীত থাকতে দেব? এরপর আমরা রওয়ানা হয়ে হজ্জের মৌসুমে তাঁর কাছে পৌঁছলাম এবং আকাবার ঘাঁটিতে (শাব আল-আকাবাহ) তাঁর সাথে সাক্ষাতের ওয়াদা করলাম।
তাঁর চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'হে ভাতিজা! আমি জানি না এই লোকগুলো কারা যারা তোমার কাছে এসেছে? আমি ইয়াছরিবের লোকদেরকে ভালো করে চিনি।' আমরা এক-দুজন করে তাঁর কাছে একত্রিত হলাম। যখন আব্বাস আমাদের চেহারা দেখলেন, তখন বললেন: 'এই লোকদেরকে আমি চিনি না, এরা হলো যুবক দল (আহদাস)।' আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কোন শর্তে আপনার হাতে বাইয়াত (শপথ) করব? তিনি বললেন: "তোমরা আমার হাতে বাইয়াত করবে— উৎসাহে ও অলসতায় (উভয় অবস্থায়) আমার কথা শোনা ও মানার উপর, কষ্টে ও সুখে (আল্লাহর পথে) ব্যয় করার উপর, সৎকাজের আদেশ এবং অসৎকাজ থেকে নিষেধ করার উপর, এবং আল্লাহর বিষয়ে (সত্য বলতে) কোনো নিন্দুকের নিন্দা তোমাদেরকে যেন প্রভাবিত না করে, আর যখন আমি ইয়াছরিবে যাব, তখন তোমরা আমাকে সাহায্য করবে এবং আমাকে এভাবে রক্ষা করবে যেভাবে তোমরা তোমাদের নিজেদের, তোমাদের স্ত্রী ও সন্তানদের রক্ষা করো। আর এর প্রতিদানে তোমাদের জন্য রয়েছে জান্নাত।"
এরপর আমরা বাইয়াত করার জন্য উঠলাম। তখন আসআদ ইবনু যুরারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)— যিনি সত্তর জনের মধ্যে বয়সের দিক থেকে সবচেয়ে ছোট ছিলেন— তিনি তাঁর হাত ধরলেন এবং বললেন: "হে ইয়াছরিববাসী! স্থির হও! আমরা সওয়ারীর পিঠে চড়ে এখানে এসেছি এই জ্ঞান নিয়ে যে, তিনি আল্লাহর রাসূল। আজ তাঁকে (মক্কা থেকে) বের করে আনা মানে সমস্ত আরবদের সাথে সম্পর্ক ছিন্ন করা, তোমাদের মধ্য থেকে উত্তম লোকদের নিহত হওয়া এবং তোমাদেরকে তলোয়ারের আঘাতে জর্জরিত করা। হয় তোমরা এমন এক জাতি হও যারা তলোয়ারের আঘাত সহ্য করতে প্রস্তুত, তোমাদের শ্রেষ্ঠদের হত্যা এবং সমস্ত আরবদের সাথে সম্পর্ক ছিন্ন করা মেনে নিতে প্রস্তুত— তাহলে তাঁকে গ্রহণ করো, আর তোমাদের প্রতিদান আল্লাহর উপর। নতুবা যদি তোমরা নিজেদের ব্যাপারে কোনো ভয় পাও, তাহলে তাঁকে ছেড়ে দাও। তাহলে আল্লাহর কাছে তিনি ওজর পেশ করার সুযোগ পাবেন।" তারা বলল: হে আসআদ ইবনু যুরারাহ! আমাদের হাত থেকে তোমার হাত সরাও। আল্লাহর কসম! আমরা এই বাইয়াত ছাড়ব না এবং তা বাতিলও করব না। এরপর আমরা তাঁর কাছে একজন একজন করে গেলাম। তিনি আব্বাসের শর্তানুযায়ী আমাদের কাছ থেকে অঙ্গীকার নিলেন এবং বিনিময়ে আমাদের জন্য জান্নাতের প্রতিশ্রুতি দিলেন।
8479 - عن جابر بن عبد الله قال: شهد بي خالاي العقبة.
قال أبو عبد الله (البخاري) قال ابن عيينة: أحدهما البراء بن معرور.
صحيح: رواه في المناقب (3890) عن علي بن عبد الله، حدثنا سفيان، قال: كان عمرو يقول: سمعت جابر بن عبد الله يقول: فذكره.
ورواه أيضًا (3891) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام، أن ابن جريج أخبرهم، قال عطاء: قال جابر: أنا وأبي وخالي من أصحاب العقبة.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার দুই মামা আকাবায় উপস্থিত ছিলেন। (ইমাম) আবু আব্দুল্লাহ (বুখারী) বলেন, ইবনে উয়াইনাহ বলেছেন: তাদের একজন হলেন বারাআ ইবন মা’রূর। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: আমি, আমার পিতা এবং আমার মামা আকাবার সাথীদের অন্তর্ভুক্ত।
8480 - عن عبد الله بن كعب - وكان قائد كعب حين عمي - قال: سمعت كعب بن مالك يحدث حين تخلف عن النبي صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك بطوله.
قال ابن بكير في حديثه: ولقد شهدت مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة العقبة حين تواثقنا على الإسلام. وما أحب أن لي بها مشهد بدر، وإن كانت بدر أذكر في الناس منها.
صحيح: رواه البخاري في المناقب (3889) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، أن عبد الله بن كعب وكان قائد كعب فذكره مختصرًا هكذا.
وقوله: بطوله. لعله يقصد الحديث الذي رواه ابن إسحاق وهو الآتي:
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি তাবুক যুদ্ধে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে না গিয়ে পেছনে থেকে গিয়েছিলেন, তখন তিনি পুরো ঘটনাটি বর্ণনা করেন। ইবনে বুকাইর তার বর্ণনায় বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আকাবার রাতে উপস্থিত ছিলাম, যখন আমরা ইসলামের ওপর বাইয়াত গ্রহণ করেছিলাম। এর বিনিময়ে আমি বদরের যুদ্ধে উপস্থিতি চাই না, যদিও মানুষের কাছে বদর এর চেয়ে বেশি পরিচিত।