আল-জামি` আল-কামিল
8741 - عن ابن عمر قال: دخلت على حفصة ونسواتها تنطف، قلت: قد كان من أمر الناس ما ترين، فلم يجعل لي من الأمر شيء، فقالت: الحق فإنهم ينتظرونك، وأخشى أن يكون في احتباسك عنهم فرقة، فلم تدعه حتى ذهب، فلما تفرق الناس خطب معاوية، قال: من كان يريد أن يتكلم في هذا الأمر فليطلع لنا قرنه، فلنحن أحق به منه ومن أبيه، قال حبيب بن مسلمة: فهلا أجبته؟ قال عبد الله: فحللت حبوتي، وهممت أن أقول: أحق بهذا الأمر منك من قاتلك وأباك على الإسلام،
فخشيت أن أقول كلمة تفرق بين الجمع، وتسفك الدم، ويحمل عني غير ذلك، فذكرت ما أعد الله في الجنان، قال حبيب: حفظت وعصمت. قال محمود، عن عبد الرزاق: ونوساتها.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4108) عن إبراهيم بن موسى أخبرنا هشام، عن معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر فذكره.
قوله:"نسواتها" حصل فيه قلب، والصواب: نوساتها. أي ذوائبها. ومعنى تنطف أي تعطر كأنها قد اغتسلت.
قوله:"قد كان من أمر الناس ما ترين" مراده بذلك ما وقع بين علي ومعاوية من القتال في صفين.
قوله:"فحللت حبوتي" الحبوة: ثوب يلقى على الظهر ويربط طرفاه على الساقين بعد ضمهما.
قوله:"من قاتلك وأباك عن الإسلام" أبوه هو أبو سفيان بن حرب، وكان رأس الأحزاب يوم الخندق.
أجمعوا له من الأمر، ضرب الخندق على المدينة. سيرة ابن إسحاق (2/ 214 - 215)
قال ابن هشام (2/ 224): يقال: إن سلمان الفارسي أشار به على رسوله صلى الله عليه وسلم (في حفر الخندق).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন তাঁর বেণী (বা চুল) থেকে সুগন্ধি বের হচ্ছিল (অথবা: তা ভেজা ছিল)। আমি বললাম: মানুষের মধ্যে যে ঘটনা ঘটেছে, তা তো তুমি দেখছই; আর (নেতৃত্বের) কোনো ব্যাপারে আমাকে কোনো দায়িত্বই দেওয়া হয়নি। তখন তিনি বললেন: তুমি (তাড়াতাড়ি) যাও! কারণ তারা তোমার জন্য অপেক্ষা করছে। আর আমি আশঙ্কা করি যে তোমার এই বিলম্বের কারণে তাদের মাঝে কোনো বিভেদ সৃষ্টি হতে পারে। অতঃপর তিনি তাকে যেতে না দিয়ে ক্ষান্ত হননি, যতক্ষণ না তিনি চলে গেলেন।
এরপর যখন মানুষজন বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল, মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খুতবা দিলেন। তিনি বললেন: যে ব্যক্তি এই বিষয়ে কথা বলতে চায়, সে যেন আমাদের সামনে তার মাথা তুলে দেখায় (বা প্রকাশ্যে আসে)। আমরা তার এবং তার বাবার চেয়েও এর (খেলাফতের) জন্য বেশি উপযুক্ত।
হাবীব ইবনু মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কেন তাকে উত্তর দিলেন না? ‘আবদুল্লাহ (ইবনু উমর) বললেন: তখন আমি আমার পরিধানের কাপড় (হুবওয়াহ) খুলে ফেললাম এবং বলতে মনস্থ করেছিলাম যে, এই ব্যাপারের জন্য আপনার চেয়ে সেই ব্যক্তি বেশি উপযুক্ত, যে ইসলাম গ্রহণের জন্য আপনার ও আপনার বাবার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করেছিল। কিন্তু আমি ভয় পেলাম এই ভেবে যে, এমন কোনো কথা বলে ফেলি যা জনসমাবেশে বিভেদ সৃষ্টি করবে, রক্তপাত ঘটাবে এবং আমার সম্পর্কে ভিন্ন কিছু ধারণা তৈরি হবে। তাই আমি আল্লাহ জান্নাতে যা প্রস্তুত করে রেখেছেন, তা স্মরণ করলাম।
হাবীব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি রক্ষা পেয়েছেন এবং আপনি নিরাপদ থেকেছেন। মাহমুদ (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আবদুর রাযযাক (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন: (শব্দটি) ونوساتها।
8742 - عن عائشة في قوله عز وجل: {إِذْ جَاءُوكُمْ مِنْ فَوْقِكُمْ وَمِنْ أَسْفَلَ مِنْكُمْ وَإِذْ زَاغَتِ الْأَبْصَارُ وَبَلَغَتِ الْقُلُوبُ الْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِاللَّهِ الظُّنُونَا} [الأحزاب: 10] قالت: كان ذلك يوم الخندق.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4103) ومسلم في التفسير (12: 3020) كلاهما من حديث عبدة بن سليمان، عن هشام (هو ابن عروة بن الزبير) عن أبيه، عن عائشة قالت فذكرته.
روي عن ابن عباس في قوله تعالى: {جَاءُوكُمْ مِنْ فَوْقِكُمْ} [الأحزاب: 10] عيينة بن حصن، {وَمِنْ أَسْفَلَ مِنْكُمْ} أبو سفيان بن حرب.
وقيل: وكان الذين جاءوهم من فوقهم بنو قريظة، ومن أسفل منهم قريش وغطفان.
قال ابن إسحاق: نزلت قريش بمجتمع السيول في عشرة آلاف من أحابيشهم ومن تبعهم من بني كنانة، وتهامة ونزل عيينة في غطفان ومن معهم من أهل نجد إلى جانب أحد بباب نعمان. وخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون حتى جعلوا ظهورهم إلى سلع في ثلاثة آلاف، والخندق بينه وبين القوم، وجعل النساء والذراري في الآطام. سيرة ابن هشام (2/ 219 - 220)
وأقام المشركون محاصرين رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا. لم يكن بينهم قتال لأجل ما حال بينهم وبين المسلمين من الخندق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর এই বাণী সম্পর্কে বলেন, "যখন তারা তোমাদের নিকট এসেছিল তোমাদের উপর দিক ও নিচ দিক থেকে এবং যখন চক্ষু বিস্ফারিত হয়েছিল এবং প্রাণ কণ্ঠাগত হয়েছিল, আর তোমরা আল্লাহ সম্পর্কে নানা ধারণা পোষণ করতেছিলে।" (সূরা আল-আহযাব: ১০) তিনি বললেন: এটা ছিল খন্দকের যুদ্ধের দিনের ঘটনা।
এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটিকে মাগাযীতে (৪১০৩) এবং মুসলিম তাফসীরে (১২: ৩০২০) বর্ণনা করেছেন। উভয়েই আবদাহ ইবনে সুলাইমানের সূত্রে হিশাম (ইবনু উরওয়াহ ইবনু যুবাইর) তাঁর পিতা হতে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
আল্লাহ তাআলার বাণী: "তোমাদের নিকট এসেছিল তোমাদের উপর দিক থেকে" [আহযাব: ১০] সম্পর্কে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, এর দ্বারা উয়াইনা ইবনে হিসন-কে বোঝানো হয়েছে এবং "নিচ দিক থেকে" বলতে আবু সুফিয়ান ইবনে হারব-কে বোঝানো হয়েছে।
আবার বলা হয়েছে: যারা তাদের নিকট উপর দিক থেকে এসেছিল তারা ছিল বনু কুরাইযা, আর যারা নিচ দিক থেকে এসেছিল তারা ছিল কুরাইশ ও গাতফান গোত্র।
ইবনু ইসহাক বলেন: কুরাইশরা তাদের হাবশী এবং বনূ কিনানাহ ও তিহামাহ থেকে আগত অনুসারীসহ দশ হাজার সৈন্য নিয়ে নদীনালা মিলিত হওয়ার স্থানে অবস্থান নিল। আর উয়াইনা গাতফান এবং তাদের সাথে নজদবাসীদের নিয়ে উহুদের পার্শ্বে বাব নু'মানের কাছে অবস্থান নিল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুসলিমগণ বের হয়ে আসলেন এবং তিন হাজার সৈন্য নিয়ে সাল' পাহাড়ের দিকে পিঠ রেখে অবস্থান নিলেন, তাদের এবং শত্রুদের মাঝে ছিল খন্দক (পরিখা)। আর নারীদের ও শিশুদেরকে দুর্গে (আতাম) রাখা হলো। (সীরাহ ইবনু হিশাম ২/ ২১৯-২২০)
আর মুশরিকরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক মাস ধরে অবরোধ করে রাখল। তাদের ও মুসলিমদের মাঝে পরিখা থাকার কারণে কোনো যুদ্ধ সংঘটিত হয়নি।
8743 - عن يزيد بن شريك التميمي قال: كنا عند حذيفة فقال رجل: لو أدركت رسول الله صلى الله عليه وسلم قاتلت معه وأبليت، فقال حذيفة: أنت كنت تفعل ذلك؟ لقد رأيتنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الأحزاب، وأخذتنا ريح شديدة وقر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا رجل يأتيني بخبر القوم، جعله الله معي يوم القيامة؟" فسكتنا، فلم يجبه منا أحد، ثم قال:"ألا رجل يأتيني بخبر القوم، جعله الله معي يوم القيامة؟" فسكتنا، فلم يجبه منا أحد، ثم قال:"ألا رجل يأتيني بخبر القوم، جعله الله معي يوم القيامة؟" فسكتنا، فلم يجبه منا أحد. فقال:"قم، يا حذيفة! فأتنا بخبر القوم" فلم أجد بدًا، إذ دعاني باسمي، أن أقوم، قال:"أذهب، فأتني بخبر القوم ولا تذعرهم عليّ" فلما وليت من عنده جعلت كأنما أمشي في حمام، حتى أتيتهم، فرأيت أبا سفيان يَصْلي ظهره بالنار، فوضعت سهمًا في كبد القوس، فأردت أن أرميه، فذكرت قول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ولا تذعرهم علي" ولو رميته لأصبته. فرجعت وأنا أمشي في مثل الحمام، فلما
أتيته أخبرته بخبر القوم، وفرغت قُرِرت، فألبسني رسول الله صلى الله عليه وسلم من فضل عباءة كانت عليه يصلي فيها، فلم أزل نائمًا حتى أصبحت فلما أصبحت قال:"قم، يا نومان!"
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1788: 99) عن زهير بن حرب وإسحاق بن إبراهيم جميعًا عن جرير، عن الأعمش، عن إبراهيم التميمي، عن أبيه (يزيد بن شريك) قال: فذكره.
قوله:"ريح شديدة وقر" القرّ هو البرد.
قوله:"كأنما أمشي في الحمام" يعني أنه لم يجد البرد الذي يجده الناس.
والحمّام مشتق من الحميم وهو الماء الحار.
ورواه البزار - كشف الأستار (1809) وأبو بكر بن أبي شيبة - المطالب العالية (4273) والحاكم (3/ 31) وعنه البيهقي في الدلائل (3/ 450) كلهم من حديث بلال العبسي، عن حذيفة قال: إن الناس تفرقوا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الأحزاب، فلم يبق معه إلا اثنا عشر رجلًا، فأتاني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا جاثم من البرد، فقال:"يا ابن اليمان! قم فانطلق إلى عسكر الأحزاب فانظر إلى حالهم"، قلت: يا رسول الله! والذي بعثك بالحق ما قمت إليك إلا حياء - من البرد قال: وبرد الحرة وبرد الصبخة - قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انطلق يا ابن اليمان، فلا بأس عليك من برد ولا حر حتى ترجع إلي" قال: فانطلقت حتى آتي عسكرهم، فوجدت أبا سفيان يوقد النار في عصبة حوله، وقد تفرق عنه الأحزاب، فجئت حتى أجلس فيهم، فحس أبو سفيان أنه قد دخل فيهم من غيرهم، فقال: ليأخذ كل رجل بيد جليسه، قال: فضربت بيميني على الذي بيميني، فأخذت بيده، وضربت شمالي على الذي عن يساري، فأخذت بيده، فكنت فيهم هنيهة، ثم قمت فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو قائم يصلي، فأومى إلي بيده أن ادن، فدنوت منه حتى أرسل علي من الثوب الذي كان عليه ليدفئني، فلما فرغ صلى الله عليه وسلم من صلاته، قال: يا ابن اليمان! اقعد فأخبر الناس، قال: قلت: يا رسول الله! تفرق الناس عن أبي سفيان فلم يبق إلا في عصبة توقد النار، وقد صب الله تعالى عليهم من البرد مثل الذي صب علينا ولكن نرجو من الله ما لا يرجون.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
وقال البزار: لا نعلمه عن بلال، عن حذيفة إلا بهذا الإسناد.
وقال الهيثمي في كشف الأستار: حديث حذيفة في الصحيح. وفي هذا زيادة، منها أنه قال: فلم يبق معه إلا اثنا عشر رجلًا. وفيها ما قمت لك إلا حياء وغير ذلك.
وقال ابن حجر في تعليقه على المطالب: هذا حديث حسن وأصله في الصحيح. وفي هذا زيادات.
قلت: بلال بن يحيى العبسي الكوفي ليس به بأس كما قال ابن معين، ولكن روايته عن حذيفة مرسلة كما قال يحيى بن معين وغيره فإنه كان يقول: بلغني عن حذيفة، ومع إرساله عن حذيفة فإنه لا يقبل تفرده بهذه الزيادات وإلا فإنه صدوق حسن الحديث.
قال ابن القطان: هو ثقة، روى عن حذيفة أحاديث معنعنة ليس في شيء منها ذكر سماع، وقد صحّح الترمذي حديثه عن حذيفة اعتقادا منه أنه سمع منه.
وقصة حذيفة هذه ذكرها أهل السير والمغازي والتاريخ بتفصيل أكثر منها ما رواه أحمد (23334) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، حدثني يزيد بن زياد، عن محمد بن كعب القرظي قال: قال فتًى منا من أهل الكوفة لحذيفة بن اليمان فذكر القصة بطولها، وفيه الواسطة بين محمد بن كعب القرظي وحذيفة مبهمة. وأما محمد بن كعب القرظي فلم يدرك حذيفة. ولكن لها أسانيد أخرى تقوّيها.
وكان لنعيم بن مسعود بن عامر بن غطفان دور بارز في بذر الشقاق بين قريظة وغطفان وقريش وكان قد أسلم، وأخفى إسلامه عن قومه، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني قد أسلمت، وإن قومي لم يعلموا بإسلامي، فمرني بما شئت، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنما أنت فينا رجل واحد فخذّل عنا إن استطعت، فإن الحرب خدعة".
ذكره ابن إسحاق مفصلًا بدون إسناد. انظر: سيرة ابن هشام (2/ 229 - 230) وأورده معظم أصحاب السير والمغازي والتاريخ.
وأما قول النبي صلى الله عليه وسلم:"الحرب خدعة" فهو متفق عليه مخرج في موضعه، وقد قيل: إن النبي صلى الله عليه وسلم تكلم بهذه الجملة في غزوة الخندق.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযীদ ইবনু শারীক আত-তামীমী বলেন: আমরা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন এক লোক বলল: আমি যদি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগ পেতাম, তবে আমি অবশ্যই তাঁর সাথে যুদ্ধ করতাম এবং সাহসিকতা দেখাতাম। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি সত্যি তা করতে? আমরা তো আহযাব (খন্দক) যুদ্ধের রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদেরকে প্রচণ্ড বাতাস ও শীত পেয়ে বসেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমন কি কেউ আছে যে শত্রুদের খবর এনে আমাকে জানাবে? আল্লাহ তাকে কিয়ামতের দিন আমার সাথী বানাবেন।" আমরা নীরব রইলাম, আমাদের মধ্যে থেকে কেউ তাঁর ডাকে সাড়া দিল না। এরপর তিনি আবার বললেন: "এমন কি কেউ আছে যে শত্রুদের খবর এনে আমাকে জানাবে? আল্লাহ তাকে কিয়ামতের দিন আমার সাথী বানাবেন?" আমরা নীরব রইলাম, আমাদের মধ্যে থেকে কেউ তাঁর ডাকে সাড়া দিল না। এরপর তিনি তৃতীয়বার বললেন: "এমন কি কেউ আছে যে শত্রুদের খবর এনে আমাকে জানাবে? আল্লাহ তাকে কিয়ামতের দিন আমার সাথী বানাবেন?" আমরা নীরব রইলাম, আমাদের মধ্যে থেকে কেউ তাঁর ডাকে সাড়া দিল না।
তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওঠো, হে হুযাইফা! গিয়ে শত্রুদের খবর এনে আমাকে দাও।" যখন তিনি আমার নাম ধরে ডাকলেন, তখন আমার না উঠে আর উপায় ছিল না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, শত্রুদের খবর এনে আমাকে দাও, কিন্তু আমার উপর তাদের উত্তেজিত করো না।"
যখন আমি তাঁর কাছ থেকে ফিরে চললাম, তখন মনে হচ্ছিল যেন আমি উষ্ণ গোসলখানায় হাঁটছি (অর্থাৎ শীত অনুভব হচ্ছিল না), যতক্ষণ না আমি তাদের কাছে পৌঁছলাম। আমি দেখলাম, আবূ সুফিয়ান তার পিঠে আগুন পোহাচ্ছে। আমি ধনুকের মাঝখানে একটি তীর রাখলাম এবং তাকে আঘাত করতে চাইলাম, কিন্তু তখনই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা মনে পড়ল: "তাদেরকে আমার উপর উত্তেজিত করো না।" যদি আমি তাকে তীর মারতাম, তবে অবশ্যই তা লক্ষ্যভ্রষ্ট হতো না। এরপর আমি ফিরে এলাম এবং উষ্ণ গোসলখানার মতোই (শীতহীনভাবে) হাঁটছিলাম।
যখন আমি তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে পৌঁছলাম, তাদের খবর জানালাম। যখন আমি খবর শেষ করলাম, তখনই শীত অনুভব করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গায়ে থাকা অতিরিক্ত চাদর, যা দিয়ে তিনি সালাত আদায় করছিলেন, তা আমার গায়ে জড়িয়ে দিলেন। এরপর আমি সকাল হওয়া পর্যন্ত ঘুমিয়ে রইলাম। যখন সকাল হলো, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওঠো, হে মহা ঘুমন্ত ব্যক্তি!"
8744 - عن عبد الله بن الزبير قال: كنت أنا وعمر بن أبي سلمة يوم الخندق مع النسوة في أطم حسّان.
متفق عليه: رواه مسلم في الفضائل (2416) من طرق عن علي بن مسهر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير فذكره في سياق أطول.
ورواه البخاري في المغازي (3720) من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير قال: كنت يوم الأحزاب، جعلت أنا وعمر بن أبي سلمة في النساء في سياق أطول.
قال ابن سعد: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يبعث سلمة بن أسلم في مائتي رجل، وزيد بن حارثة في ثلاثمائة رجل يحرسون المدينة، ويظهرون التكبير وذلك أنه كان يخاف على الذراري من بني قريظة. الطبقات (3/ 67)
وفي الباب ما رُوي عن هريرة بن عبد الرحمن بن رافع بن خديج عن أبيه عن جده قال: لما كان يوم الخندق لم يكن حصن أحصن من حصن بني حارثة فجعل النبي صلى الله عليه وسلم النساء والصبيان والذراري فيه فقال:"إن ألم بكن أحد فألمعن بالسيف" فجاءهن رجل من بني ثعلبة بن سعد يقال له: بجدان أحد بني جحاش على فرس حتى كان في أصل الحصن، ثم جعل يقول للنساء انزلن إلي خير لكن،
فحركن السيف فأبصره أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فابتدر الحصن قوم فيهم رجل من بني حارثة يقال له: ظهير بن رافع فقال له: يا بجدان أبرز فبرز إليه فحمل عليه فرسه فقتله، وأخذ رأسه فذهب به إلى النبي صلى الله عليه وسلم.
رواه الطبرأني في المعجم الكبير (4/ 318) عن محمد بن عبد الله القرمطي البغدادي، ثنا عثمان بن يعقوب العثماني، ثنا محمد بن طلحة التميمي، عن محمد بن سهل بن أبي حثمة، عن هرير بن عبد الرحمن بن رافع بن خديج، عن أبيه، عن جده قال: فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عبد الرحمن بن رافع فإنه مجهول كما قال أبو حاتم (5/ 232) وأما هرير بن عبد الرحمن فليس"بمقبول" كما قال الحافظ في التقريب فإنه قد وثّقه ابن معين والدارمي وابن حبان.
وقول الهيثمي في"المجمع" (6/ 133): رجاله ثقات فيه تساهل.
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খন্দকের যুদ্ধের দিন আমি এবং উমার ইবনু আবী সালামাহ মহিলাদের সাথে হাসসান (ইবনু সাবিতের) দুর্গে ছিলাম।
8745 - عن أبي هريرة قال: جاء الحارث الغطفاني إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا محمد! ناصفنا تمر المدينة، وإلا ملأناها عليك خيلًا ورجالًا، فقال: حتى أستأمر السعود، سعد بن عبادة، وسعد بن معاذ، يعني يشاورهما، فقالا: لا والله، ما أعطينا الدنية من أنفسنا في الجاهلية، فكيف وقد جاء الله بالإسلام؟ فرجع إليه الحارث، فأخبره،
فقال: غدرت يا محمد! قال: فقال حسان:
يا حار من يغدر بذمة جاره … منكم فإن محمدًا لا يغدر
إن تغدروا فالغدر من عاداتكم … واللؤم ينبت في أصول السخبر
وأمانة النهدي حيث لقيتها … مثل الزجاجة صدعها لا يجبر
قال: فقال الحارث: كف عنا يا محمد! لسان حسان، فلو مزج به ماء البحر لمزجه.
حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1803) عن عقبة بن سنان، ثنا عثمان بن عثمان الغطفاني، ثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلم رواه عن محمد بن عمرو هكذا إلا عثمان، ولم نسمعه إلا من عقبة".
وقال الهيثمي في المجمع (6/ 132): رواه البزار والطبراني، ولفظه: عن أبي هريرة قال: جاء الحارث الغطفاني إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا محمد! شاطرنا تمر المدينة فقال: حتى أستأمر السعود، فبعا إلى سعد بن معاذ، وسعد بن عبادة، وسعد بن الربيع، وسعد بن خيثمة، وسعد بن مسعود، فقال: قد علمت أن العرب قد رمتكم عن قوس واحدة وأن الحارث قد سألكم تشاطروه تمر المدينة، فإن أردتم أن تدفعوه عامكم هذا في (كذا ولعل الصواب حتى) أمركم بعد فقالوا: يا رسول الله أوحي من السماء؟ فالتسليم لأمر الله، أو عن رأيك أو هواك؟ فرأينا نتبع هواك ورأيك، فإن كنت إنما تريد الإبقاء علينا، فوالله! لقد رأيتنا وإياهم على سواء ما ينالون منا تمرة إلا شراء أو قرى، فقال رسول الله - صل: ى ال له عليه وسلم -"هو ذا تسمعون ما يقولون؟" قالوا: غدرت يا محمد، فقال حسان بن ثابت رضي الله عنه:
يا حار من يغدر بذمة جاره … منكم فإن محمدًا لا يغدر
وأمانة المري حين لقيتها … كسر الزجاجة صدعها لا يجبر
إن تغدروا فالغدر من عاداتكم … واللؤم ينبت في أصول السخبر
ورجال البزار والطبراني فيهما محمد بن عمرو وحديثه حسن وبقية رجاله ثقات.
والصحيح الثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم استشار السعدين وهما سعد بن عبادة وسعد بن معاذ كما قال ابن إسحاق.
فلعل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة بن وقاص الليثي المدني أصاب مرة، ووهم مرة أخرى، لأن بعض هؤلاء ماتوا قبل غزوة الخندق وغزوة بني قريظة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল-হারিথ আল-গাতাফানি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে মুহাম্মাদ! মদীনার খেজুরের অর্ধেক আমাদের দিয়ে দাও, অন্যথায় আমরা ঘোড়া ও সৈন্য দ্বারা তা তোমার উপর পূর্ণ করে দেব।
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি সা'উদ-দের (সাদগণ) সাথে পরামর্শ না করা পর্যন্ত নয়। (তারা হলেন) সা'দ ইবনে উবাদাহ এবং সা'দ ইবনে মু'আয। অর্থাৎ, তিনি তাদের সাথে পরামর্শ করতে চাইলেন।
তখন তারা দুজন বললেন: আল্লাহর কসম, জাহিলিয়্যাতের যুগেও আমরা নিজেদের পক্ষ থেকে হীনতা স্বীকার করিনি। এখন আল্লাহ যখন ইসলাম দ্বারা সম্মানিত করেছেন, তখন তা কীভাবে সম্ভব?
অতঃপর হারিথ তার (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) কাছে ফিরে এল এবং তাকে (জবাব) জানাল। তখন সে বলল: হে মুহাম্মাদ! তুমি বিশ্বাসঘাতকতা করেছ!
বর্ণনাকারী বলেন, তখন হাসসান (ইবনে সাবিত) বললেন:
"হে হারিথ! তোমাদের মধ্য থেকে যে তার প্রতিবেশীর প্রতিশ্রুতি ভঙ্গ করে,
মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিন্তু বিশ্বাসঘাতকতা করেন না।
যদি তোমরা বিশ্বাসঘাতকতা করো, তবে বিশ্বাসঘাতকতা তোমাদের স্বভাব;
এবং হীনতা জন্ম নেয় সাখবারের মূলে।
আর নাহ্দি গোত্রের আমানত, যখন তুমি তা দেখবে,
তা ভাঙা কাঁচের মতো, যার ফাটল মেরামত করা যায় না।"
বর্ণনাকারী বলেন, তখন হারিথ বলল: হে মুহাম্মাদ! আমাদের থেকে হাসসানের জিহ্বাকে সংযত করুন। কারণ, যদি তার জিহ্বা দিয়ে সমুদ্রের পানি মিশ্রিত করা হয়, তবে সে তাও মিশিয়ে ফেলবে (অর্থাৎ, তার কবিতার প্রভাব এত তীব্র)।
8746 - عن سهل بن سعد قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في الخندق، وهم يحفرون ونحن ننقل التراب على أكتادنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"للهم لا عيش إلا عيش الآخرة، فاغفر للمهاجرين والأنصار".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4098) ومسلم في الجهاد والسير (126: 1804) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد قال: فذكره.
قوله:"على أكتادنا" بالمثناة جمع كتد بفتح أوله وكسر المثناة وهو ما بين الكاهل إلى الظهر. وعند مسلم:"أكتافنا".
وكان موقع الخندق في المنطقة الشمالية الغربية من المدينة، لأن هذه الجهة وحدها كانت مكشوفة بخلاف الجهات الأخرى فإن فيها أشجار النخيل والزروع الكثيفة والجبال والحواجز الأخرى.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খন্দকে ছিলাম, আর তারা (খন্দক) খনন করছিলেন এবং আমরা আমাদের কাঁধের উপর মাটি বহন করছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! আখিরাতের জীবন ছাড়া প্রকৃত কোনো জীবন নেই। সুতরাং আপনি মুহাজির ও আনসারদের ক্ষমা করে দিন।"
8747 - عن أنس قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الخندق فإذا المهاجرون والأنصار يحفرون في غداة باردة، فلم يكن لهم عبيد يعملون ذلك لهم، فلما رأى ما بهم من النصب والجوع قال:"اللهم إن العيش عيش الآخرة، فاغفر للأنصار والمهاجرة" فقالوا مجيبين له: نحن الذين بايعوا محمدًا على الجهاد ما بقينا أبدًا.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4099) عن عبد الله بن محمد، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق، عن حميد (هو الطويل) عن أنس فذكره.
ورواه مسلم في الجهاد (130: 1805) من وجه آخر عن أنس مختصرًا.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দকের দিকে বের হলেন। তখন তিনি দেখতে পেলেন যে মুহাজির ও আনসারগণ এক ঠাণ্ডা সকালে (খন্দক) খনন করছেন। তাদের এমন কোনো গোলাম ছিল না, যারা তাদের পক্ষ থেকে এই কাজ করে দিত। যখন তিনি তাদের মধ্যে কষ্ট ও ক্ষুধা দেখতে পেলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! নিশ্চয় জীবন হলো আখেরাতের জীবন। সুতরাং আপনি আনসার ও মুহাজিরদের ক্ষমা করে দিন।" তখন তারা জবাবে বললেন: "আমরাই সেই লোক, যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে জিহাদের বাইয়াত গ্রহণ করেছি, যতদিন আমরা বেঁচে থাকব ততদিন (এই প্রতিজ্ঞা অটুট রাখব)।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
8748 - عن أنس قال: جعل المهاجرون والأنصار يحفرون الخندق حول المدينة، وينقلون التراب على متونهم وهم يقولون:
نحن الذين بايعوا محمدًا … على الإسلام ما بقينا أبدًا
قال: يقول النبي صلى الله عليه وسلم وهو يجيبهم:
"اللهم إنه لا خير إلا خير الآخرة … فبارك في الأنصار والمهاجرة"
قال: يؤتون بملء كفيّ من الشعير، فيصنع لهم بإهالة سنخة توضع بين يدي القوم، والقوم جياع، وهي بشعة في الحلق ولها ريح منتن.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4100) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، عن عبد
العزيز (هو ابن صهيب) عن أنس قال: فذكره.
قوله"بإهالة" بكسر الهمزة وتخفيف الهاء: الدهن الذي يؤتدم به سواء كان زيتًا أو سمنًا أو شحمًا.
قوله:"سنخة" أي تغير طعمها ولونها من قدمها.
قوله:"بشعة" أن كريهة الطعم تأخذ الحلق.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাজির ও আনসারগণ মদীনার চারপাশে খন্দক খনন করতে লাগলেন এবং তাদের পিঠে করে মাটি বহন করতে থাকলেন। আর তারা বলছিলেন:
আমরা সেই সকল লোক, যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইয়াত করেছি;
ইসলাম রক্ষার জন্য, যতদিন আমরা বেঁচে থাকি ততদিন পর্যন্ত।
তিনি (আনাস) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জবাবে বলছিলেন:
"হে আল্লাহ! নিশ্চয়ই আখিরাতের কল্যাণ ছাড়া অন্য কোনো কল্যাণ নেই। অতএব, আনসার ও মুহাজিরদের প্রতি বরকত দাও।"
তিনি বলেন, তখন তাদের কাছে দুই হাতের অঞ্জলি পরিমাণ যব আনা হতো। এরপর বাসি ও নষ্ট চর্বি বা তেল মিশিয়ে তা তাদের জন্য রান্না করা হতো এবং সে জিনিস ক্ষুধার্ত লোকজনের সামনে রাখা হতো। বস্তুটি স্বাদে বিস্বাদ ছিল, যা গলায় লাগতো এবং এর দুর্গন্ধও ছিল।
8749 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
"اللهم لا عيش إلا عيش الآخرة، … فاغفر للأنصار والمهاجرة".
متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3795) ومسلم في الجهاد والسير (127: 1805) كلاهما من طريق شعبة، حدتنا أبو إياس معاوية بن قرة، عن أنس بن مالك قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! আখেরাতের জীবন ছাড়া কোনো জীবন নেই, সুতরাং আনসার ও মুহাজিরদেরকে ক্ষমা করে দিন।"
8750 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول يوم الخندق:
والله لولا الله ما اهتدينا … ولا تصدقنا ولا صلينا
فأنزلن سكينة علينا
حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1804) وأبو يعلى (3395) كلاهما من حديث محمد بن المثنى، ثنا زكريا بن يحيى، قال: سمعت ثابتا البناني، يحدث عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده حسن من أجل زكريا بن يحيى وهو ابن عمارة الأنصاري، وقد ينسب إلى جده مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 133): رواه البزار وأبو يعلى ورجاله ثقات.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খন্দকের দিন বলতেন:
আল্লাহর কসম, যদি আল্লাহ না থাকতেন, তবে আমরা হেদায়েত পেতাম না... না আমরা দান-সদকা করতাম, আর না সালাত আদায় করতাম।
সুতরাং আমাদের উপর প্রশান্তি (সাখিনা) বর্ষণ করুন।
8751 - عن أم سلمة قالت: ما نسيت قوله يوم الخندق وهو يعاطيهم اللّبن، وقد اغبرّ شعر صدره وهو يقول:
اللهم إن الخير خير الآخرة … فاغفر للأنصار والمهاجرة
قال: فرأى عمارًا فقال:"ويحك ابن سمية تقتله الفئة الباغية"
قال: فذكرته لمحمد - يعني ابن سيرين - فقال: عن أمه؟ قلت: نعم، أما إنها كانت تخالطها تلج عليها.
حسن: رواه أحمد (26482) وأبو يعلى (1645) كلاهما من حديث ابن عون، عن الحسن، عن أمه، عن أم سلمة فذكرته، واللفظ لأحمد.
وعند أبي يعلى: قال ابن عون: حدثت محمدًا عن أمه، فقال: أما إنها قد كانت تدخل على أم سلمة. وأم الحسن هي اسمها خيرة مولاة أم سلمة. روى لها مسلم قصة قتل عمار وهو سيأتي في موضعه، ولكن قال الحافظ في التقريب:"مقبولة".
قلت: هي:"صدوقة" روى عنها جماعة ووثّقه ابن حبان وأخرج لها مسلم.
উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খন্দকের দিনের তাঁর সেই কথাটি আমি ভুলিনি, যখন তিনি তাদেরকে ইট (বা দুধ) দিচ্ছিলেন, আর তাঁর বুকের লোম ধূলায় মলিন হয়ে গিয়েছিল। তিনি বলছিলেন:
হে আল্লাহ, নিশ্চয়ই আসল কল্যাণ হলো আখিরাতের কল্যাণ; সুতরাং আনসার ও মুহাজিরগণকে ক্ষমা করে দিন।
তিনি বলেন, এরপর তিনি আম্মারকে দেখে বললেন, "আফসোস তোমার জন্য, হে সুমাইয়্যার পুত্র! তোমাকে একটি বিদ্রোহী দল হত্যা করবে।"
8752 - عن البراء قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يوم الخندق وهو ينقل التراب حتى وارى التراب شعر صدره، - وكان رجلًا كثير الشعر - وهو يرتجز برجز عبد الله بن رواحة.
اللهم لولا أنت ما اهتدينا … ولا تصدقنا ولا صلينا
فأنزلن سكينة علينا … وثبت الأقدام إن لاقينا
إن الأعداء قد بغوا علينا … إذا أرادوا فتنة أبينا
يرفع بها صوته.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (3034) من طريق أبي الأحوص، ومسلم في الجهاد والسير (125: 1803) من طريق شعبة - كلاهما عن أبي إسحاق، عن البراء، فذكره واللفظ للبخاري.
وفي المصادر الأخرى:"ينقل في زنبيل" بكسر الزاي ونون ساكنة.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খন্দকের দিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি, যখন তিনি মাটি বহন করছিলেন, এমনকি মাটি তাঁর বুকের পশম পর্যন্ত ঢেকে ফেলেছিল—আর তিনি ছিলেন খুব পশমবিশিষ্ট পুরুষ—আর তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহার 'রাজাজ' কবিতা আবৃত্তি করছিলেন:
হে আল্লাহ! আপনি না থাকলে আমরা হেদায়েত পেতাম না, আর না আমরা দান করতাম, আর না সালাত আদায় করতাম।
সুতরাং, আমাদের ওপর প্রশান্তি নাযিল করুন, এবং যদি আমরা (শত্রুর) মুখোমুখি হই, তবে আমাদের পদযুগল সুদৃঢ় রাখুন।
নিশ্চয়ই শত্রুরা আমাদের ওপর বিদ্রোহ করেছে, যদি তারা কোনো ফিতনা চায় তবে আমরা তা প্রত্যাখ্যান করি।
তিনি উচ্চস্বরে এগুলো বলছিলেন।
8753 - عن جابر بن عبد الله قال: لما حفر الخندق رأيت بالنبي صلى الله عليه وسلم خمصًا شديدًا، فانكفأت إلى امرأتي، فقلت: هل عندك شيء؟ فإني رأيت برسول الله صلى الله عليه وسلم خمصًا شديدًا، فأخرجت إلي جرابًا فيه صاع من شعير، ولنا بُهيمة داجن فذبحتها، وطحنت الشعير، ففرغتْ إلى فراغي، وقطعتها في برمتها، ثم وليت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: لا تفضحني برسول الله صلى الله عليه وسلم وبمن معه، فجئته فساررته، فقلت: يا رسول الله ذبحنا بُهيمة لنا وطحنا صاعًا من شعير كان عندنا، فتعال أنت ونفر معك، فصاح النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أهل الخندق إن جابرًا قد صنع سورا، فحي هلا بكم". فقال رسول الله
- صلى الله عليه وسلم:"لا تنزلن برمتكم، ولا تخبزن عجينتكم حتَّى أجيء". فجئت وجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم يقدم الناس حتَّى جئت امرأتي، فقالت: بك وبك، فقلت: قد فعلت الذي قلت، فأخرجت له عجينًا فبصق فيه وبارك، ثمّ عمد إلى برمتنا فبصق وبارك، ثمّ قال:"ادع خابزة فلتخبز معي، واقدحي من برمتكم ولا تنزلوها". وهم ألف، فأقسم بالله لقد أكلوا حتَّى تركوه وانحرفوا، إن برمتنا لتغط كما هي، وإن عجيننا ليخبز كما هو.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4102) ومسلم في الأشربة (141: 2039) كلاهما من طريق أبي عاصم الضَّحَّاك بن مخلد بن حنظلة بن أبي سفيان، أخبرنا سعيد بن ميناء، قال: سمعت جابر بن عبد الله قال: فذكره.
قوله:"خمصًا" أي جوعًا والخمص خلاء البطن من الطعام.
قوله:"جِرابًا" وعاء يحفظ فيه الزاد ونحوه.
قوله:"حي هلا بكم" هي كلمة استدعاء فيها حث، أي هلموا مسرعين.
ورواه البيهقيّ في الدلائل (3/ 422 - 423) من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن محمد المحاربي، عن عبد الواحد بن أيمن، عن أبيه، عن جابر به أطول من هذا وجاء فيه قول جابر: فاستحييت حياءً حتَّى لا يعلمه إِلَّا الله، فقلت لامرأتي: ثكلتك أمك، وقد جاءك رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه أجمعون، فقالت: أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سألك عن الطعام؟ قلت: نعم، قالت: الله ورسوله أعلم قد أخبرته بما كان عندك، فذهب عني بعض ما كنت أجد، قلت: لقد صدقت.
وقال في آخره: وأخبرني أنهم كانوا ثمان مائة أو ثلاثمائة.
قوله:"وهم ألف": هو الصَّحيح لأن فيه زيادة العلم، ولا يحتمل على التعدد، لأن القصة وقعت مرة واحدة.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন খন্দক খনন করা হচ্ছিল, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে তীব্র ক্ষুধার্ততা দেখতে পেলাম। তখন আমি দ্রুত আমার স্ত্রীর কাছে ফিরে গিয়ে জিজ্ঞেস করলাম: তোমার কাছে কি কিছু আছে? কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে তীব্র ক্ষুধা দেখতে পেয়েছি।
তখন সে আমাকে একটি থলে বের করে দিল, যাতে এক সা’ যব ছিল। আর আমাদের একটি পোষা ছোট প্রাণী (ছাগল বা ভেড়া) ছিল, সেটি আমি যবেহ করলাম। সে যব পিষল, আমিও আমার কাজ শেষ করলাম। সে মাংসগুলো পাত্রে টুকরা করে রাখল। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে রওনা হলাম। (যাওয়ার সময়) সে বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীদের কাছে যেন আমাকে লজ্জিত করো না।
আমি তাঁর কাছে এসে চুপিসারে বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা আমাদের একটি ছোট প্রাণী যবেহ করেছি এবং আমাদের কাছে থাকা এক সা’ যব পিষেছি। আপনি আপনার সাথে কিছু লোক নিয়ে আসুন।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উচ্চস্বরে ঘোষণা দিলেন: "হে খন্দকের লোকেরা! জাবির একটি ভোজের আয়োজন করেছে, তোমরা সবাই দ্রুত চলে এসো!"
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি না আসা পর্যন্ত তোমরা তোমাদের হাঁড়ি নামাবে না এবং খামির থেকে রুটি বানাবে না।"
আমি (বাড়িতে) পৌঁছালাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের নেতৃত্ব দিয়ে আসলেন। আমি আমার স্ত্রীর কাছে এলে সে (রাগ করে) বলতে লাগল, তোমার কী হবে! তোমার কী হবে! আমি বললাম: তুমি যা করতে বলেছিলে, আমি তাই করেছি।
এরপর সে (স্ত্রী) তাঁর জন্য আটা মাখা খামির বের করল। তিনি তাতে থুথু দিলেন এবং বরকত চাইলেন। এরপর তিনি আমাদের রান্না করা মাংসের হাঁড়ির দিকে গেলেন, তাতেও থুথু দিলেন এবং বরকত চাইলেন।
এরপর তিনি বললেন: "রুটি প্রস্তুতকারককে ডাকো, সে যেন আমার সাথে রুটি তৈরি করে। আর তোমরা তোমাদের হাঁড়ি থেকে (মাংস) উঠাও, কিন্তু হাঁড়ি নামাবে না।" আর তারা (উপস্থিত লোক) ছিল এক হাজার।
আল্লাহর কসম! তারা সবাই তৃপ্তি সহকারে খেল এবং চলে গেল, অথচ আমাদের হাঁড়ি যেমন ছিল তেমনই ফুটছিল এবং আমাদের আটা মাখা খামির তখনও যেমন ছিল তেমনই রুটি তৈরি হচ্ছিল।
8754 - عن جابر قال: إنا يوم الخندق نحفر، فعرضت كدية شديدة، فجاؤوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: هذه كدية عرضت في الخندق، فقال:"أنا نازل". ثمّ قام وبطنه معصوب بحجر، ولبثنا ثلاثة أيام لا نذوق ذواقا، فأخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم المعول فضرب في الكدية، فعاد كثيبًا أهيل، أو أهيم، فقلت: يا رسول الله! ائذن لي إلى البيت، فقلت لامرأتي: رأيت بالنبي صلى الله عليه وسلم شيئًا ما كان في ذلك صبر، فعندك شيء؟ قالت: عندي شعير وعناق، فذبحت العناق، وطحنت الشعير حتَّى جعلنا اللحم في البرمة، ثمّ جئت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والعجين قد انكسر، والبرمة بين الأثافي قد كادت تنضج، فقلت: طعيم لي، فقم أنت يا رسول ورجل أو رجلان، قال:"كم هو؟". فذكرت له، قال:"كثير طيب، قال: قل لها: لا تنزع البرمة، ولا الخبز من التنور حتَّى آتي، فقال: قوموا". فقام
المهاجرون والأنصار، فلمّا دخل على امرأته قال: ويحك جاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالمهاجرين والأنصار ومن معهم، قالت: هل سألك؟ قلت: نعم، فقال:"ادخلوا ولا تضاغطوا". فجعل يكسر الخبز، ويجعل عليه اللحم، ويخمر البرمة والتنور إذا أخذ منه، ويقرب إلى أصحابه ثمّ ينزع، فلم يزل يكسر الخبز، ويغرف حتَّى شبعوا وبقي بقية، قال:"كلي هذا وأهدي، فإن الناس أصابتهم مجاعة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4101) عن خلَّاد بن يحيى حَدَّثَنَا عبد الواحد بن أيمن، عن أبيه قال: أتيت جابرًا فقال: فذكره.
ورواه أحمد (14220) عن وكيع، حَدَّثَنَا عبد الواحد بن أيمن وجاء فيه: لما حفر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه الخندق أصابهم جهد شديد حتَّى ربط النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على بطنه حجرًا من الجوع.
قوله:"كثيبًا أهيم": معناه أنه صار رملًا يسيل ولا يتماسك، وأهيم بمعني أهيل.
قوله:"فقلت لامرأتي" اسمها سهلة بنت مسعود بن أوس الأنصارية رضي الله عنها.
وقوله:"البرمة" هي القدر.
وقوله:"بين الأثافي"جمع الأثفية، وهي الحجارة التي تنصب وتوضع عليها القدر وهي ثلاثة.
وقوله:"تضاغطوا": أي تزدحموا.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের দিন আমরা খনন করছিলাম, তখন একটি কঠিন শিলাখণ্ড সামনে এলো। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: এটি একটি শিলাখণ্ড যা খন্দকের খননে বাধা সৃষ্টি করেছে। তিনি বললেন: "আমি নামছি।" এরপর তিনি উঠে দাঁড়ালেন, অথচ তাঁর পেটে একটি পাথর বাঁধা ছিল। আমরা তিন দিন এমন অবস্থায় কাটালাম যে কোনো স্বাদের জিনিস গ্রহণ করিনি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোদালটি নিলেন এবং শিলাখণ্ডটিতে আঘাত করলেন, ফলে সেটি নরম মাটির স্তূপে পরিণত হলো, অথবা নরম বালির স্তূপে পরিণত হলো।
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে বাড়িতে যাওয়ার অনুমতি দিন। আমি আমার স্ত্রীকে বললাম: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে এমন কিছু দেখেছি, যে বিষয়ে ধৈর্য ধারণ করা সম্ভব নয় (অর্থাৎ তিনি তীব্র ক্ষুধার্ত)। তোমার কাছে কি কিছু আছে? সে বলল: আমার কাছে কিছু যব এবং একটি বকরির বাচ্চা আছে। এরপর আমি বকরির বাচ্চাটি জবাই করলাম এবং যব পিষে আটা তৈরি করলাম, যতক্ষণ না আমরা মাংস পাতিলে রাখলাম।
এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম যখন আটা খামির হয়ে গেছে এবং চুলায় তিনটি পাথরের (আসাফী) ওপর রাখা পাতিলে মাংস প্রায় রান্না হওয়ার পথে। আমি বললাম: আমার জন্য সামান্য খাবার তৈরি হয়েছে। হে আল্লাহর রাসূল! আপনি এবং একজন বা দুজন লোক চলুন। তিনি বললেন: "কতটুকু আছে?" আমি তাঁকে পরিমাণ বললাম। তিনি বললেন: "অনেক এবং উত্তম! তাকে বলো: আমি না আসা পর্যন্ত সে যেন পাতিল নামিয়ে না রাখে এবং রুটিও তন্দুর থেকে বের না করে।" এরপর তিনি বললেন: "তোমরা উঠে দাঁড়াও।" ফলে মুহাজির ও আনসারগণ সবাই উঠে দাঁড়ালেন।
যখন আমি আমার স্ত্রীর কাছে প্রবেশ করলাম, তখন বললাম: তোমার সর্বনাশ হোক! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাজির, আনসার এবং তাদের সাথে যারা ছিলেন, তাদের সবাইকে নিয়ে এসেছেন! স্ত্রী বললেন: তিনি কি আপনাকে জিজ্ঞেস করেছিলেন? আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে) বললেন: "তোমরা প্রবেশ করো এবং ভিড় করো না।" তিনি রুটি ভাঙতে শুরু করলেন এবং তার ওপর মাংস রাখছিলেন। যখন তিনি পাতিল বা তন্দুর থেকে কিছু নিতেন, তখন তিনি তা ঢেকে দিতেন। তিনি সাহাবীদের নিকটবর্তী করতেন এবং এরপর তা তুলে নিতেন। তিনি অনবরত রুটি ভাঙছিলেন এবং পরিবেশন করছিলেন, যতক্ষণ না তারা সকলে পরিতৃপ্ত হলো এবং কিছু খাবার অবশিষ্ট রইল। তিনি বললেন: "তুমি এটি খাও এবং অন্যদের উপহার দাও, কারণ মানুষ দুর্ভিক্ষের শিকার হয়েছে।"
8755 - عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: لما أمر النبي صلى الله عليه وسلم بحفر الخندق، عرضت لهم صخرة حالت بينهم، وبين الحفر، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم وأخذ المعول، ووضع رداءه ناحية الخندق وقال: {وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلًا لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [الأنعام: 115] فندر ثلث الحجر، وسلمان الفارسي قائم ينظر، فبرق مع ضربة رسول الله صلى الله عليه وسلم برقة، ثمّ ضرب الثانية وقال: {وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلًا لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [الأنعام: 115] فندر الثلث الآخر، فبرقت برقة، فرآها سلمان، ثمّ ضرب الثالثة وقال: {وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلًا لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [الأنعام: 115]، فندر الثلث الباقي، وخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخذ رداءه وجلس. قال سلمان يا رسول الله! رأيتك حين ضربت ما تضرب ضربة، إِلَّا كانت معها برقة؟ ! قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا سلمان، رأيت ذلك؟" فقال: أي والذي بعثك بالحق يا رسول الله! قال:"فإني حين ضربت الضربة الأولى، رفعت لي مدائن كسرى وما حولها، ومدائن كثيرة، حتَّى رأيتها بعيني". قال له من حضره من أصحابه: يا رسول الله! ادع الله أن يفتحها علينا، ويغنمنا ديارهم، ويخرب بأيدينا بلادهم. فدعا
رسول الله صلى الله عليه وسلم بذلك. ثمّ ضربت الضربة الثانية فرفعت لي مدائن قيصر وما حولها، حتَّى رأيتها بعيني" قالوا: يا رسول الله! ادع الله أن يفتحها علينا، ويغنمنا ديارهم، ويخرب بأيدينا بلادهم، فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بذلك. ثمّ ضربت الثالثة، فرفعت لي مدائن الحبشة وما حولها من القرى، حتَّى رأيتها بعيني" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم عند ذلك: ادعوا الحبشة ما ودعوكم، واتركوا الترك ما تركوكم".
حسن: رواه النسائيّ (3176) عن عيسى بن يونس، قال: حَدَّثَنَا ضمرة، عن أبي زرعة السيباني، عن أبي سكينة رجل من المحررين، عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أبو داود (4302) عن عيسى بن محمد الرملي، عن ضمرة بإسناده مقتصرا على لفظ:"دعوا الحبشة ما ودعوكم، واتركوا الترك ما تركوكم".
إسناده حسن من أجل ضمرة وهو ابن ربيعة الفلسطيني فإنه حسن الحديث، وأبو سكينة هو الحمصي، قيل اسمه محلّم مختلف في صحبته كما في"التقريب".
وأمّا المزي فقال في"تهذيبه" رُوي عن النَّبِي صلى الله عليه وسلم، وعن رجل عن النَّبِي صلى الله عليه وسلم، ذكر من الرواة عنه بلال بن سعد، ويحيى بن أبي عمرو السيباني.
ولكن قصة إبصار النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يذكرها البخاريّ في حديث جابر لأنها ليست على شرطه وهي زيادة حسنة.
ويشهد له على ذلك حديث البراء بن عازب رواه أحمد (18694) وأبو يعلى (1685) وأبو نعيم في دلائل النبوة (430) كلّهم من حديث عوف عن أبي عبد الله ميمون، عن البراء، قال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بحفر الخندق قال: عرض لنا صخرة لا تأخذ فيها المعاول، فشكوا ذلك إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: فأخذ المعول قال: وأحسبه قال: وضع ثوبه - فضرب ضربة وقال:"بسم الله" فكسر ثلث الصخرة، ثمّ قال:"الله أكبر! أعطيت مفاتيح الشام، إني لأنظر إلى قصورها الحمر من مكاني هذا" ثمّ قال:"بسم الله" وضرب أخرى فكسر ثلثها، وقال: الله أكبر! أعطيت مفاتيح فارس، والله إني لأنظر إلى المدائن وقصرها الأبيض من مكاني هذا" ثمّ قال:"بسم الله" وضرب أخرى فكسر بقية الحجر وقال:"الله أكبر أعطيت مفاتيح اليمن، والله إني لأنظر إلى مفاتيح صنعاء من مكاني هذا" وإسناده ضعيف من أجل أبي عبد الله ميمون البصري الكندي، ويقال: القرشي فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم، قال يحيى بن معين: لا شيء، وقال أحمد بن حنبل: أحاديثه مناكير، وذكره ابن حبَّان في الثّقات وقال: كان يحيى القطان سيء الرأي فيه.
إِلَّا أن الحافظ ابن حجر حسن إسناده في الفتح (7/ 397) وذكر له شاهدا آخر من حديث كثير
بن عبد الله بن عمرو بن عوف المزني قال: حَدَّثَنِي أبي، عن أبيه.
رواه البيهقيّ في الدلائل (3/ 418) وجاء فيه: خط رسول الله صلى الله عليه وسلم الخندق عام الأحزاب …
فقطع أربعين ذراعًا بين كل عشرة. وجاء فيه: فهبط رسول الله صلى الله عليه وسلم مع سلمان في الخندق، ورقينا عن الشقة في شقة الخندق.
فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم المعول من سلمان فضرب الصخرة ضربة صدعها، وبرقت منها برقة أضاء ما بين لابتيها - يعني لابتي المدينة، حتَّى لكأن مصباحًا في جوف ليل مظلم، فكبر رسول الله صلى الله عليه وسلم تكبيرة فتح، فكبر المسلمون.
ثمّ ضربها رسول الله صلى الله عليه وسلم الثانية، فصدعها وبرق منها برقة أضاء لها ما بين لابتيها حتَّى لكأن مصباحًا في جوف ليل مظلم، فكبر رسول الله صلى الله عليه وسلم تكبيرة فتح، وكبر المسلمون.
ثمّ ضربها رسول الله صلى الله عليه وسلم الثالثة، فكسرها، وبرق منها برقة أضاء ما بين لابتيها، حتَّى لكأن مصباحًا في جوف بيت مظلم، فكبر رسول الله صلى الله عليه وسلم تكبيرة فتح، فكبر المسلمون.
ثمّ أخذ بيد سلمان فرقيَ فقال سلمان: بأبي أنت وأمي يا رسول الله! لقد رأيت شيئًا ما رأيته قطّ، فالتفت رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى القوم، فقال: هل رأيتم ما يقول سلمان؟ قالوا: نعم يا رسول الله! بأبينا أنت وأمنا، قد رأيناك تضرب، فخرج برق كالموج فرأيناك تكبر، ولا نرى شيئًا غير ذلك، فقال: صدقتم، ضربت ضربتي الأولى، فبرق الذي رأيتم أضاءت لي منها قصور الحيرة، ومدائن كسرى، كأنّها أنياب الكلاب، فأخبرني جبريل أن أمتي ظاهرة عليها.
ثمّ ضربت ضربتي الثانية، فبرق الذي رأيتم أضاءت لي منها قصور الحمر من أرض الروم كأنّها أنياب الكلاب، وأخبرني جبريل عليه السلام أن أمتي ظاهرة عليها.
ثمّ ضربت ضربتي الثالثة فبرق منها الذي رأيتم، أضاءت منها قصور صنعاء كأنّها أنياب الكلاب، فأخبرني جبريل عليه السلام أن أمتي ظاهرة عليها، فأبشروا يبلغهم النصر، وأبشروا يبلغهم النصر، وأبشروا يبلغهم النصر.
فاستبشر المسلمون، وقالوا: الحمد لله موعود صادق بأن الله وعدنا النصر بعد الحصر، فطلعت الأحزاب، فقال المسلمون: {وَلَمَّا رَأَى الْمُؤْمِنُونَ الْأَحْزَابَ قَالُوا هَذَا مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّا إِيمَانًا وَتَسْلِيمًا} [الأحزاب: 22].
وقال المنافقون: ألا تعجبون: يحدثكم ويمنيكم، ويعدكم بالباطل، يخبركم أنه بصر من يثرب قصور الحيرة، ومدائن كسرى، وإنها تفتح لكم، وأنتم تحفرون الخندق، ولا تستطيعون أن تبرزوا! !
وأنزل القرآن: {وَإِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ إِلَّا غُرُورًا} [الأحزاب: 12].
وكثير بن عبد الله بن عمرو بن عوف المزني ضعيف باتفاق أهل العلم.
وله شاهد آخر عن عبد الله بن عمرو بن العاص نحوه.
قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 131) أخرجه الطبرانيّ بإسنادين في أحدهما حيي بن عبد الله وثّقه ابن معين وضعّفه جماعة، وبقية رجاله رجال الصَّحيح.
وله شاهد آخر عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: احتفر رسول الله صلى الله عليه وسلم الخندق، وأصحابه قد شدوا الحجارة على بطونهم من الجوع فلمّا رأى ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"هل دللتم على أحد يطعمنا أكلة" قال رجل: نعم، قال:"أما لا فتقدم فدلنا عليه" فانطلقوا إلى رجل فإذا هو في الخندق يعالج نصيبه فيه، فأرسلت امرأته أن جيء فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أتانا فجاء الرّجل يسعى.
فقال: بأبي وأمي، وله معزة ومعها جديها فوثب إليها، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"الجدي من ورائنا" فذبح الجدي، وعمدت امرأته إلى طحينة لها فعجنتها وخبزت، وأدركت وتردت، فقربتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه فوضع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أصبعه فيها فقال:"بسم الله، اللهم بارك فيها، اللهم بارك فيها، اطعموا" فأكلوا منها حتَّى صدروا، ولم يأكلوا إِلَّا ثلثها وبقي ثلثاها، فسرح أولئك العشرة الذين كانوا معه أن اذهبوا، وسرحوا إلينا نغديكم فذهبوا وجاء أولئك العشرة مكانه، فأكلوا منها حتَّى شبعوا، ثمّ قام ودعا لربة البيت وسمت عليها وعلى أهلها، ثمّ مشوا إلى الخندق فقالوا: اذهبوا بنا إلى سلمان، وإذا صخرة بين يديه قد ضعف عنها، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"دعوني فأكون أول من ضربها فقال بسم الله" فضربها فوقعت فلقة ثلثها فقال:"الله أكبر قصور الروم ورب الكعبة" ثمّ ضرب أخرى فوقعت فلقة فقال:"الله أكبر قصور فارس ورب الكعبة" فقال عندها المنافقون: نحن بخندق وهو يعدنا قصور فارس والروم.
رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 376) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، حَدَّثَنِي سعيد بن محمد الجرمي، ثنا أبو ثميلة، ثنا نعيم بن سعيد العبدي، أن عكرمة حدث عن ابن عباس فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 132):"رجاله رجال الصَّحيح غير عبد الله بن أحمد بن حنبل ونعيم العبدي وهما ثقتان".
كذا قال: ولم أقف على ترجمة نعيم بن سعيد العبدي فإنه ليس من رجال التقريب، ولا من رجال التعجيل، ولم يترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" وابن حبَّان في ثقاته، فتأكد منه.
وأمّا ما رُوي عن سهل بن سعد الساعدي قال: كنت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالخندق، فأخذ الكرزين فضربه، فصادف حجرًا، فضحك، قيل: ما يضحكك يا رسول الله؟ قال:"ضحكت من ناس يؤتى بهم من قبل المشرق في النكول يساقون إلى الجنّة". فهو ضعيف.
رواه أحمد (22861) والطَّبرانيّ (5733) كلاهما من طريق الفضيل بن سليمان، حَدَّثَنَا محمد بن أبي يحيى، عن العباس بن سهل بن سعد الساعدي، عن أبيه فذكره.
والفضيل بن سليمان هو النميري البصري ضعيف باتفاق أهل العلم، ومع هذا ذكره ابن حبَّان في الثّقات (7/ 316) وأخرج له البخاريّ متابعة.
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খন্দক খননের নির্দেশ দিলেন, তখন তাদের সামনে এমন একটি বিরাট পাথর এলো যা খননকাজে বাধা সৃষ্টি করলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ালেন, কোদাল নিলেন এবং তাঁর চাদরটি খন্দকের পাশে রাখলেন। তিনি বললেন:
**"আর সত্য ও ন্যায়ের দিক থেকে তোমার রবের বাণী পূর্ণতা লাভ করেছে। তাঁর বাণী পরিবর্তনকারী কেউ নেই। তিনিই সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।"** [সূরা আল-আন'আম: ১১৫]
ফলে পাথরের এক-তৃতীয়াংশ খসে পড়ল। সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন দাঁড়িয়ে দেখছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আঘাতের সাথে একটি বিজলী চমকে উঠল। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার আঘাত করলেন এবং বললেন:
**"আর সত্য ও ন্যায়ের দিক থেকে তোমার রবের বাণী পূর্ণতা লাভ করেছে। তাঁর বাণী পরিবর্তনকারী কেউ নেই। তিনিই সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।"** [সূরা আল-আন'আম: ১১৫]
ফলে অবশিষ্ট এক-তৃতীয়াংশ খসে পড়ল। একটি বিজলী চমকে উঠল, যা সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখতে পেলেন। এরপর তিনি তৃতীয়বার আঘাত করলেন এবং বললেন:
**"আর সত্য ও ন্যায়ের দিক থেকে তোমার রবের বাণী পূর্ণতা লাভ করেছে। তাঁর বাণী পরিবর্তনকারী কেউ নেই। তিনিই সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।"** [সূরা আল-আন'আম: ১১৫]
ফলে অবশিষ্ট এক-তৃতীয়াংশও খসে পড়ল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (খন্দক থেকে) বেরিয়ে এসে তাঁর চাদর নিলেন এবং বসলেন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি দেখেছি যে আপনি যখনই আঘাত করেছেন, তখনই তার সাথে একটি বিজলী চমকে উঠেছে!
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "হে সালমান, তুমি কি তা দেখেছো?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, ঐ সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি যখন প্রথম আঘাত করলাম, তখন আমার জন্য কিসরার (পারস্য সম্রাটের) শহরগুলো এবং এর আশেপাশে অনেক শহর দৃশ্যমান করে দেওয়া হলো, এমনকি আমি সেগুলো নিজ চোখে দেখলাম।"
তাঁর সাহাবীদের মধ্যে যারা উপস্থিত ছিলেন, তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ্র কাছে দু'আ করুন যেন তিনি এগুলো আমাদের জন্য বিজয় করে দেন, তাদের দেশগুলোকে আমাদের জন্য গনিমত করে দেন এবং তাদের শহরগুলোকে আমাদের হাতে ধ্বংস করেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য সেই দু'আ করলেন।
এরপর আমি দ্বিতীয় আঘাত করলাম, তখন আমার জন্য কায়সারের (রোম সম্রাটের) শহরগুলো এবং এর আশেপাশে যা কিছু আছে তা দৃশ্যমান করে দেওয়া হলো, এমনকি আমি সেগুলো নিজ চোখে দেখলাম।" তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ্র কাছে দু'আ করুন যেন তিনি এগুলো আমাদের জন্য বিজয় করে দেন, তাদের দেশগুলোকে আমাদের জন্য গনিমত করে দেন এবং তাদের শহরগুলোকে আমাদের হাতে ধ্বংস করেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য সেই দু'আ করলেন।
"এরপর আমি তৃতীয় আঘাত করলাম, তখন আমার জন্য আবিসিনিয়ার শহরগুলো এবং এর আশেপাশের গ্রামগুলো দৃশ্যমান করে দেওয়া হলো, এমনকি আমি সেগুলো নিজ চোখে দেখলাম।" সেই সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আবিসিনীয়রা যতক্ষণ তোমাদের (শান্তিতে) থাকতে দেবে, তোমরাও তাদের (শান্তিতে) থাকতে দাও, আর তুর্কিরা যতক্ষণ তোমাদের (শান্তিতে) থাকতে দেবে, তোমরাও তাদের (শান্তিতে) থাকতে দাও।"
8756 - عن عائشة قالت: أرق النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فقال:"ليت رجل صالح من أصحابي
يحرسني الليلة" إذ سمعنا صوت السلاح قال:"من هذا؟" قال: سعد يا رسول الله! جئت أحرسك، فنام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حتَّى سمعنا غطيطه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التمني (7231) ومسلم في الفضائل (2410) كلاهما من حديث سليمان بن بلال، حَدَّثَنِي يحيى بن سعيد، سمعت عبد الله بن عامر بن ربيعة قال: قالت عائشة: فذكرته. واللفظ للبخاري.
وفي رواية مسلم: فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما جاء بك؟" فقال: وقع في نفسي خوف على رسول الله صلى الله عليه وسلم فجئت أحرسه فدعا له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ثم نام.
وسعد هو ابن أبي وقَّاص كما جاء مصرحًا في الروايات الأخرى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘুম আসছিল না। তিনি বললেন, "আহ! যদি আমার সাহাবীদের মধ্য থেকে কোনো নেককার ব্যক্তি আজ রাতে আমাকে পাহারা দিত।" তখনই আমরা অস্ত্রের আওয়াজ শুনতে পেলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "কে ওখানে?" সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আমি সা'দ। আমি আপনাকে পাহারা দিতে এসেছি।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমিয়ে গেলেন, এমনকি আমরা তাঁর নাসিকা গর্জন (নাক ডাকার শব্দ) শুনতে পেলাম।
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কেন এসেছ?" তিনি বললেন, আমার অন্তরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ভয় সৃষ্টি হয়েছিল, তাই আমি আপনাকে পাহারা দিতে এসেছি। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য দু'আ করলেন, তারপর ঘুমিয়ে পড়লেন।
8757 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الأحزاب:"من يأتينا بخبر القوم؟" فقال الزُّبير: أنا، ثمّ قال:"من يأتينا بخبر القوم؟" فقال الزُّبير: أنا، ثمّ قال:"من يأتينا بخبر القوم؟" فقال الزُّبير: أنا، ثمّ قال:"إنَّ لكل نبي حواريًا، وإن حواري الزُّبير".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4113) ومسلم في فضائل الصّحابة (48: 2415) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: فذكره.
قوله:"من يأتينا بخبر القوم؟" المراد خبر بني قريظة في نقض العهد، وأمّا قصة حذيفة رضي الله عنه فكانت لخبر قريش وكانت في ليلة شديدة البرد.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের দিন (খন্দকের যুদ্ধের দিন) বললেন: "কে আমাকে এই সম্প্রদায়ের খবর এনে দেবে?" তখন যুবাইর বললেন: "আমি।" এরপর তিনি আবার বললেন: "কে আমাকে এই সম্প্রদায়ের খবর এনে দেবে?" যুবাইর বললেন: "আমি।" এরপর তিনি আবার বললেন: "কে আমাকে এই সম্প্রদায়ের খবর এনে দেবে?" যুবাইর বললেন: "আমি।" এরপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই প্রত্যেক নবীর একজন করে হাওয়ারী (সাহায্যকারী বা বিশেষ শিষ্য) থাকে, আর যুবাইর হলো আমার হাওয়ারী।"
8758 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم على الأحزاب فقال:"اللهم منزل الكتاب، سريع الحساب، اهزم الأحزاب، اللهم اهزمهم وزلزلهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4115) ومسلم في الجهاد والسير (21: 1741) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الله بن أبي أوفى، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাব (সংঘবদ্ধ শত্রু দল)-এর বিরুদ্ধে দু'আ করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! হে কিতাব অবতীর্ণকারী, হে দ্রুত হিসাব গ্রহণকারী! আপনি আহযাবকে পরাজিত করুন। হে আল্লাহ! আপনি তাদের পরাজিত করুন এবং তাদেরকে কম্পিত করে দিন (অস্থির করে দিন)।"
8759 - عن عليّ بن أبي طالب، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال يوم الخندق:"ملأ الله عليهم بيوتهم وقبورهم نارًا كما شغلونا عن الصّلاة الوسطى حتَّى غابت الشّمس".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4111) ومسلم في المساجد ومواضع الصّلاة (202: 627) كلاهما من طريق هشام (هو الدستوائي) عن محمد (هو ابن سيرين) عن عبيدة (هو السلماني) عن عليّ قال: فذكره.
আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দকের যুদ্ধের দিন বললেন: "আল্লাহ তাদের ঘরগুলো এবং তাদের কবরসমূহকে আগুন দ্বারা পূর্ণ করে দিন, যেভাবে তারা আমাদেরকে সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) থেকে সূর্য অস্তমিত না হওয়া পর্যন্ত বিরত রেখেছে।"
8760 - عن جابر بن عبد الله أن عمر بن الخطّاب جاء يوم الخندق بعدما غربت الشّمس
جعل يسب كفار قريش وقال: يا رسول الله ما كدت أن أصلي حتَّى كادت الشّمس أن تغرب. قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"والله ما صليتها" فنزلنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بطحان، فتوضأ للصلاة وتوضأنا لها، فصلى العصر بعدما غربت الشمس، ثمّ صلى بعدها المغرب.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4112) ومسلم في المساجد ومواضع الصّلاة (209: 631) كلاهما من طريق هشام (هو ابن عبد الله الدستوائي) عن يحيى بن أبي كثير، حَدَّثَنَا أبو سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر بن عبد الله رضي الله عنهما قال: فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খন্দকের যুদ্ধের দিন সূর্য ডুবে যাওয়ার পর এলেন এবং কুরাইশের কাফেরদের গালি দিতে শুরু করলেন। তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি সালাত আদায় করতে পারিনি, এমনকি সূর্য প্রায় ডুবে যাচ্ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহর শপথ, আমিও তা আদায় করিনি।" অতঃপর আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বাতহান নামক স্থানে অবতরণ করলাম। তিনি সালাতের জন্য ওযু করলেন এবং আমরাও তার জন্য ওযু করলাম। এরপর তিনি সূর্য ডুবে যাওয়ার পর আসরের সালাত আদায় করলেন, তারপর এর পরে মাগরিবের সালাত আদায় করলেন।