হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (8761)


8761 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قلنا لرسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الخندق وقد بلغ منا الجهد: هل من شيء نقوله؟ قال:"قولوا: اللهم استر عوراتنا، وآمن روعاتنا". قال: فهزم الله بالريح.

حسن: رواه البزّار - كشف الأستار (3119) عن محمد بن المثنى، ثنا أبو عامر عبد الملك بن عمرو، ثنا الزُّبير بن عبد الله، ويقال: ابن رهيمة من أهل المدينة، عن ربيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه، عن جده فذكره.

قال البزّار: لا نعلم رواه بهذا الإسناد إِلَّا الزُّبير.

قلت: وهو كما قال. فقد رواه أيضًا الإمام أحمد (10996) عن أبي عامر بإسناده إِلَّا أن فيه: ربيح بن أبي سعيد، عن أبيه.

فالظاهر أن فيه سقطًا، فإن ربيحا ليس ابنا لأبي سعيد، وإنما هو ابن عبد الرحمن كما في إسناد البزّار.

ولذا قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 136): رواه أحمد والبزّار، وإسناد البزّار متصل، ورجاله ثقات، وكذلك رجال أحمد، إِلَّا في نسختي من المسند: عن ربيح بن أبي سعيد، عن أبيه، وهو في البزّار: عن أبيه، عن جده.

قلت: إسناده حسن فإن الزُّبير بن عبد الله الأموي مولاهم، قال فيه أبو حاتم صالح. وذكره ابن حبَّان في الثّقات فهو حسن الحديث.

ولكن قال الحافظ في التقريب"مقبول".

وأمّا ربيح بن عبد الرحمن فقد تكلم فيه البخاريّ وأحمد وغيرهما ولكن قال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، فيحسن حديثه إِلَّا إذا خالف أو أتى بما ينكر عليه.

بقي المشركون محاصرين للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه قريبا من شهر، إِلَّا أنهم لا يَصِلُون إليهم، ولم يقع بينهم قتال إِلَّا أن عمرو بن عبد ود العامري - وكان من الفرسان الشجعان المشهورين في الجاهليّة - ركب، ومعه فوارس فاقتحموا الخندق، وخلصوا إلى ناحية المسلمين، فندب رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين إليه، فلم يبرز إليه أحد، وأمر عليًا فخرج إليه فتجالا ساعة، ثمّ قتله علي رضي
الله عنه، فكان علامة على النصر.

ثمّ أرسل الله عز وجل على الأحزاب ريحًا شديدة الهبوب قوية، حتَّى لم يبق لهم خيمة، ولا شيء ولا توقد لهم نار، ولم يقر لهم قرار حتَّى ارتحلوا خائبين خاسرين كما قال الله تعالى: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ جَاءَتْكُمْ جُنُودٌ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًا وَجُنُودًا لَمْ تَرَوْهَا وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا} [الأحزاب: 9].

وقوله: {وَجُنُودًا لَمْ تَرَوْهَا} وهم الملائكة.

وممن قتل يوم الخندق ابن عمرو بن عبد ود - وهو حسل كما قال ابن هشام: وحدثني الثقة أنه حدّث عن ابن شهاب الزهري أنه قال: قتل عليّ بن أبي طالب يومئذ عمرو بن عبد ود وابنه حسْل بن عمرو. انظر: سيرة ابن هشام (2/ 253).

وممن قتل أيضًا من المشركين: نوفل بن عبد الله المخزومي قتله الزُّبير بن العوام بالسيف فشقّه اثنين وهو الذي طلب المشركون جسده بالدية فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنه خبيث، وخبيث الدية" فلم يقبل منهم الدية وأذن لهم بدفنه.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس: أن المسلمين أصابوا رجلًا من عظماء المشركين، فقتلوه، فسألوهم أن يشتروه، فنهاهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يبيعوا جيفة مشرك. فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (1715)، وأحمد (3011)، والبيهقي (9/ 133) كلّهم من طرق عن سفيان الثوري، عن ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره. وابن أبي ليلى هو: محمد بن عبد الرحمن سيء الحفظ.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب، لا نعرفه إِلَّا من حديث الحكم، ورواه الحجاج بن أرطاة أيضًا عن الحكم".

قلت: رواه أحمد (2230، 2442)، وابن أبي شيبة (12/ 419) من طرق عن الحجاج بن أرطاة قال: عن الحكم به. ولفظه: قتل المسلمون يوم الخندق رجلًا من المشركين، فأعطوا بجيفته مالا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ادفعوا إليهم جيفتهم؛ فإنه خبيث الجيفة، خبيث الدية" فلم يقبل منهم شيئًا.

والحجاج بن أرطاة مدلِّس وقد عنعن. ومدار الاسنادين على الحكم، وهو ابن عيينة، ولم يسمع من مقسم إِلَّا خمسة أحاديث، وليس هذا منها.

ولعل ابن حجر قال لذلك في الفتح (6/ 283):"إسناده غير قوي".

وجاء مرسلًا عن عكرمة أن نوفلا - أو ابن نوفل - تردى به فرسه يوم الخندق، فقتل، فبعث أبو سفيان إلى النبي صلى الله عليه وسلم بديته مئة من الإبل، فأبى النبي صلى الله عليه وسلم، وقال:"خذوه فإنه خبيث الدية، خبيث الجيفة".

رواه ابن أبي شيبة (14/ 423) بإسناد صحيح عن عكرمة مرسلًا.

وممن قتل أيضًا من المشركين يوم الخندق من بني عبد الدار بن قصي: منبّه بن عثمان بن
السبّاق بن عبد الدار أصابه سهم فمات منه بمكة. قاله ابن إسحاق.

قال ابن هشام: هو عثمان بن أمية بن منبّه بن عبيد بن السباق.

هؤلاء الأربعة من المشركين قتلوا يوم الخندق.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের যুদ্ধের দিন, যখন আমাদের কষ্ট চরমে পৌঁছেছিল, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বললাম: (কষ্ট লাঘবের জন্য) এমন কিছু কি আছে যা আমরা বলতে পারি? তিনি বললেন: "তোমরা বলো: 'আল্লাহুম্মাস্তুর আওরা-তানা, ওয়া আ-মিন রওআ-তানা' (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আপনি আমাদের ত্রুটিসমূহ ঢেকে দিন এবং আমাদের ভয়কে নিরাপত্তা দিন)।" তিনি বললেন: অতঃপর আল্লাহ তাআলা (শক্ত) বাতাসের মাধ্যমে (শত্রুদেরকে) পরাজিত করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8762)


8762 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول:"لا إله إِلَّا الله وحده، أعز جنده، ونصر عبده، وغلب الأحزاب وحده، فلا شيء بعده".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4114) ومسلم في الذكر والدعاء (77: 2724) كلاهما عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا اللّيث، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه (هو أبو سعيد المقبريّ) عن أبي هريرة قال: فذكره.

قوله:"وغلب الأحزاب وحده، فلا شيء بعده" هو من السجع المحمود، والفرق بينه وبين المذموم ما يأتي بتكلف واستكراه، والمحمود ما جاء بانسجام واتفاق.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: "আল্লাহ্ ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ্ নেই, তিনি একক (অদ্বিতীয়)। তিনি তাঁর বাহিনীকে শক্তিশালী করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন, এবং একাই সব দলকে (শত্রু জোটকে) পরাস্ত করেছেন, সুতরাং তাঁর পরে আর কিছুই নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (8763)


8763 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قفل من الغزو أو الحجّ أو العمرة يبدأ فيكبر ثلاث مرار، ثمّ يقول:"لا إله إِلَّا الله، وحده لا شريك له، له الملك، وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، آيبون عابدون ساجدون، لربنا حامدون، صدق الله وعده، ونصر عبده، وهزم الأحزاب وحده".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4116) ومسلم في الحجّ (428: 1344) كلاهما من طريق نافع عن عبد الله بن عمر قال: فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যুদ্ধ, হজ বা উমরাহ থেকে ফিরতেন, তখন প্রথমে তিনবার তাকবীর বলতেন। অতঃপর বলতেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু, ওয়া হুয়া ‘আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর। আ-ইবূনা, ‘আবিদূনা, সা-জিদূন, লিরাব্বিনা হা-মিদূন। সাদাকাল্লাহু ওয়া’দাহু, ওয়া নাসারা ‘আবদাহু, ওয়া হাযামাল আহযাবা ওয়াহদাহু।"

(অর্থ: আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই। তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই। আর তিনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান। আমরা প্রত্যাবর্তনকারী, ইবাদতকারী, সিজদাবনত এবং আমাদের রবের প্রশংসাকারী। আল্লাহ তাঁর প্রতিশ্রুতি সত্য করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন, আর একাকী শত্রুদলকে পরাজিত করেছেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (8764)


8764 - عن عبد الله بن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"نصرت بالصّبا، وأهلكت عاد بالدبور".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4105) ومسلم في صلاة الاستسقاء (17: 900) كلاهما عن طريق شعبة، حَدَّثَنِي الحكم، عن مجاهد، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

قوله:"نصرت بالصبا" بفتح المهملة وتخفيف الموحدة وهي الريح الشرقية.

و"الدبور": هي الريح الغربية.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে সব্বা (পূর্বা) বায়ু দ্বারা সাহায্য করা হয়েছে এবং আদ জাতিকে দবূর (পশ্চিমা) বায়ু দ্বারা ধ্বংস করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8765)


8765 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نصرت بالصبا، وأهلكت عاد بالدبور".

حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (7837) وفي الصغير (1069) عن محمود بن محمد الواسطي، حَدَّثَنَا محمد بن أبان الواسطي، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن قتادة، عن أنس بن مالك فذكره.

قال الطبرانيّ: لم يروه عن قتادة إِلَّا أبو عوانة، تفرّد به محمد بن أبان.

قلت: محمد بن أبان الواسطي أبو الحسن حسن الحديث، ذكره ابن حبَّان في"الثّقات" وقال بحشل: كان فقيها، وقال مسلمة في الصلة: محمد بن أبان الواسطي يكنى أبا الحسن ثقة.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে সাবা (পূর্ব দিক থেকে আসা মৃদু বাতাস) দ্বারা সাহায্য করা হয়েছে এবং 'আদ' জাতিকে দাবুর (পশ্চিম দিক থেকে আসা তীব্র বাতাস) দ্বারা ধ্বংস করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8766)


8766 - عن سليمان بن صرد يقول: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول حين أجلي الأحزاب عنه:"الآن نغزوهم، ولا يغزوننا نحن نسير إليهم".

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4110) عن عبد الله بن محمد، حَدَّثَنَا يحيى بن آدم، حَدَّثَنَا إسرائيل: سمعت أبا إسحاق يقول: سمعت سليمان بن صرد يقول: فذكره.

قوله:"حين أجلي الأحزاب عنه" أي رجعوا عنه.

وفيه علم من أعلام النبوة فإنه صلى الله عليه وسلم اعتمر في السنة المقبلة فصدته قريش عن البيت، ووقعت الهدنة بينهم إلى أن نقضوها، فكان ذلك سبب فتح مكة، فوقع الأمر كما قال صلى الله عليه وسلم. انظر الفتح (7/ 405).




সুলায়মান ইবনু সুরদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আহযাব (শত্রুদল) যখন তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের) নিকট থেকে চলে গিয়েছিল, তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এখন আমরা তাদের উপর আক্রমণ করব, আর তারা আমাদের উপর আক্রমণ করবে না। আমরাই তাদের দিকে অগ্রসর হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (8767)


8767 - عن جابر بن عبد الله، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم الأحزاب وقد جمعوا له جموعًا كثيرة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يغزوكم بعدها أبدًا، ولكن نغزوهم".

حسن: رواه البزّار - كشف الأستار (1810) عن محمد بن عمر بن هياج، ثنا يحيى بن عبد الرحمن الأرجي، ثنا عبيدة بن الأسود، عن مجالد، عن عامر (الشعبي) عن جابر بن عبد الله فذكره.

قال البزّار: قد اختلفوا في إسناده، فرواه زكريا بن أبي زائدة، عن الشعبي، عن الحارث بن الرصاد. وقال مجالد، عن الشعبي، عن جابر، ولا نعلم أحدا رواه عن جابر إِلَّا عبيدة.

قلت: ومجالد هو ابن سعيد بن عمير الكوفي ضعّفه أكثر أهل العلم ولكن قال ابن عدي: له عن الشعبي، عن جابر أحاديث صالحة، وعن غير جابر من الصّحابة أحاديث صالحة، وعامة ما يرويه غير محفوظ.

قلت: هذا إسناد حسن من أجل رواية مجالد، عن الشعبي، عن جابر.

وحسنه أيضًا الحافظ في الفتح (7/ 405) وقال الهيثميّ: رجاله ثقات.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের (খন্দকের) যুদ্ধের দিন, যখন তারা তাঁর বিরুদ্ধে বিশাল বাহিনী একত্রিত করেছিল, তখন তিনি বললেন: "এর পর তারা আর কখনো তোমাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে আসবে না, বরং আমরাই তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (8768)


8768 - عن عائشة قالت: أصيب سعد يوم الخندق، رماه رجل من قريش يقال له: حبّان بن العرقة رماه في الأكحل فضرب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيمة في المسجد ليعوده من قريب إِلَّا أن جرحه يغذو دمًا فمات منها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4122) ومسلم في الجهاد (1769) كلاهما من حديث عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته في حديث أطول كما سيأتي وأنه مات بعد انصراف الأحزاب بنحو من خمس وعشرين ليلة وبعد أن حكم في بني قريظة.
وروى موسى بن عقبة عن ابن شهاب في تسمية من استشهد من الأنصار يوم الخندق: أنس بن معاذ بن أوس بن عبد عمرو.

رواه الطبرانيّ في الكبير (1/ 238) وهو مرسل.

وذكر أصحاب السير والمغازي ممن استشهد يوم الخندق: عبد الله بن سهل الأشهلي، وثعلبة بن غنمة بن عدي الأنصاري الخزرجي.

وطفيل بن النعمان الأنصاري، وكعب بن زيد الأنصار البخاريّ وسليط بن عوف الأسلمي وسفيان بن عوف الأسلمي وسنان بن صيفي الخزرجي، وفي بعضهم خلاف.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাদ (ইবনু মুআয) খন্দকের (যুদ্ধের) দিন আহত হয়েছিলেন। কুরাইশের একজন লোক, যার নাম হাব্বান ইবনুল-আরকাহ, তাকে আকহাল (শিরায়) আঘাত করেছিল। ফলে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য মসজিদে একটি তাঁবু স্থাপন করিয়েছিলেন যেন তিনি নিকট থেকে তার দেখাশোনা করতে পারেন। কিন্তু তার ক্ষত রক্ত ক্ষরণ করতে থাকে, ফলে তিনি এতেই মারা যান।









আল-জামি` আল-কামিল (8769)


8769 - عن * *




৮৭৬৯ - * * থেকে।









আল-জামি` আল-কামিল (8770)


8770 - عن عائشة قالت: لما رجع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من الخندق، ووضع السلاح، واغتسل أتاه جبريل عليه السلام فقال: قد وضعت السلاح، والله! ما وضعناه. فاخرج إليهم، قال:"فإلى أين؟" قال: ها هنا، وأشار إلى بني قريظة، فخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إليهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4117) ومسلم في الجهاد (1769) كلاهما من حديث ابن نمير، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة واللّفظ للبخاريّ. وسيأتي مطولًا.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দক যুদ্ধ থেকে ফিরলেন, অস্ত্র রাখলেন এবং গোসল করলেন, তখন তাঁর নিকট জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন: আপনি কি অস্ত্র রেখে দিয়েছেন? আল্লাহর কসম! আমরা তো এখনও রাখিনি। সুতরাং আপনি তাদের দিকে বের হোন। তিনি (নবী) জিজ্ঞেস করলেন: "তাহলে কোথায়?" তিনি (জিবরীল) বললেন: এই দিকে, এবং বনু কুরাইযার দিকে ইশারা করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দিকে যাত্রা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8771)


8771 - عن أنس قال: كأني أنظر إلى الغبار ساطعًا في زقاق بني غنم، موكب جبريل حين سار رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى بني قريظة.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4118) عن موسى حَدَّثَنَا جرير بن حازم، عن حميد بن هلال، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বানু কুরাইযার দিকে রওয়ানা হলেন, তখন বানু গানামের গলিতে ধূলিকণা বা ধোঁয়া উড়তে আমি যেন জিবরীল (আঃ)-এর বাহিনীকেই দেখতে পাচ্ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8772)


8772 - عن كعب بن مالك قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما رجع من طلب الأحزاب رجع، فوضع لأمته، واستجمر - زاد دحيم في حديثه - قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فنزل جبريل عليه السلام فقال: عذيرك من محارب، ألا أراك قد وضعت اللأمة، وما وضعناها بعد" فوثب رسول الله صلى الله عليه وسلم فزعًا، فعزم على الناس ألا يصلوا العصر إِلَّا في بني قريظة، فلبسوا السلاح، وخرجوا فلم يأتوا بني قريظة حتَّى غربت الشّمس، واختصم الناس في صلاة العصر فقال بعضهم: صلوا، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يرد أن تتركوا الصّلاة، وقال بعضهم: عزم علينا أن لا نصلي حتَّى نأتي بني قريظة، وإنما نحن في عزيمة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فليس علينا إثم، فصلت طائفة العصر إيمانًا واحتسابًا، وطائفة لم يصلوا حتى نزلوا بني قريظة بعد ما غربت الشّمس فصلوها إيمانًا واحتسابًا، فلم يعنف رسول الله صلى الله عليه وسلم واحدة من الطائفتين.
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (19/ 79 - 80) عن إبراهيم بن دحيم الدمشقي، ثنا أبي ح وحدثنا الحسن بن إسحاق، ثنا عليّ بن بحر قالا: ثنا الوليد بن مسلم، ثنا مرزوق بن أبي الهذيل، عن الزّهري، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب، عن عمه عبيد الله بن كعب، عن كعب بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل مرزوق بن أبي الهذيل تكلم فيه البخاريّ.

وقال أبو حاتم: حديثه صالح، وقال ابن عدي: يكتب حديثه.

فهو لا بأس به في الشواهد.

وأمّا الوليد بن مسلم فهو مدلِّس ولكنه صرَّح وحسّنه أيضًا الحافظ في المطالب (4272) والجمهور على أنه يقبل تصريحه ولو في طبقة وإحدة وهي طبقة شيخه.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 140) بعد أن عزاه إلى الطبرانيّ: ورجاله رجال الصَّحيح غير ابن أبي الهذيل وهو ثقة.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আহযাব (শত্রুদল)-কে ধাওয়া করা থেকে ফিরে এলেন, তখন তিনি (তাঁর সামরিক) পোশাক খুলে রাখলেন এবং পবিত্রতা অর্জন করলেন। (দাহিম তার বর্ণনায় যোগ করেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তখন জিবরীল (আঃ) অবতরণ করে বললেন: হে যুদ্ধার (যোদ্ধার), আপনার কী হয়েছে! আমি তো দেখছি আপনি আপনার সামরিক পোশাক খুলে ফেলেছেন, অথচ আমরা এখনও তা খুলে রাখিনি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভীত হয়ে দ্রুত উঠে দাঁড়ালেন এবং লোকদের উপর এই বিষয়ে কঠোর নির্দেশ দিলেন যে, তারা যেন আসরের সালাত বনু কুরায়যায় পৌঁছার আগে আদায় না করে। অতঃপর তারা অস্ত্র পরিধান করলেন এবং বের হলেন। কিন্তু বনু কুরায়যায় পৌঁছতে পৌঁছতে সূর্য ডুবে গেল। লোকেরা আসরের সালাত নিয়ে মতভেদ করল। তাদের মধ্যে কেউ কেউ বললেন: "সালাত আদায় করো, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাননি যে তোমরা সালাত পরিত্যাগ করো।" আবার কেউ কেউ বললেন: "তিনি আমাদের নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমরা বনু কুরায়যায় না পৌঁছা পর্যন্ত সালাত আদায় না করি। আর যেহেতু আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নির্দেশ পালন করছি, তাই আমাদের কোনো পাপ হবে না।" অতঃপর একদল ঈমান ও আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে আসরের সালাত আদায় করে নিলেন এবং অন্য দলটি সূর্য ডুবে যাওয়ার পর বনু কুরায়যায় পৌঁছার আগ পর্যন্ত সালাত আদায় করেননি, কিন্তু সেখানে পৌঁছে তারাও ঈমান ও আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে সালাত আদায় করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই দলের কাউকেই ভর্ৎসনা বা তিরস্কার করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (8773)


8773 - عن ابن عمر قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم الأحزاب:"لا يصلين أحد العصر إِلَّا في بني قريظة" فأدرك بعضهم العصر في الطريق، فقال بعضهم: لا نصلي حتَّى نأتيها، وقال بعضهم: بل نصلي، لم يرد منا ذلك، فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فلم يعنف واحدًا منهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4119) ومسلم في الجهاد والسير (69: 1770) كلاهما عن عبد الله بن محمد بن أسماء الضبعي، حَدَّثَنَا جويرية بن أسماء، عن نافع، عن عبد الله بن عمر قال: فذكره.

وكان عددهم ثلاثة آلاف رجل معهم ستة وثلاثون فرسًا كما ذكره ابن سعد (3/ 74).

قال ابن إسحاق: وحاصرهم رسول الله صلى الله عليه وسلم خمسًا وعشرين ليلة حتَّى جهدهم الحصار، وقذف الله في قلوبهم الرعب. السيرة لابن هشام (2/ 2




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের (খন্দকের) যুদ্ধের দিন বললেন: "কেউ যেন বনু কুরাইজা ছাড়া অন্য কোথাও আসরের সালাত আদায় না করে।" ফলে তাদের কারো কারো পথে আসরের সময় হয়ে গেল। তখন তাদের কেউ কেউ বলল: আমরা বনু কুরাইজায় না পৌঁছানো পর্যন্ত সালাত আদায় করব না। আর কেউ কেউ বলল: বরং আমরা সালাত আদায় করে নেব, তিনি আমাদের থেকে (সালাত বিলম্বিত করা) উদ্দেশ্য করেননি। অতঃপর বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করা হলে তিনি তাদের কাউকেই তিরস্কার করলেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (8774)


8774 - عن البراء بن عازب قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لحسان:"اهجهم - أو هاجهم - وجبريل معك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4123) ومسلم في فضائل الصّحابة (153: 2486) كلاهما من طريق شعبة، أخبرني عدي بن ثابت، قال: سمعت البراء بن عازب قال: فذكره.

وفي الرواية عند البخاريّ أنه قال ذلك يوم قريظة.




বারা ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসসানকে বললেন, “তাদের ব্যঙ্গ করো – অথবা তাদের মোকাবিলা করো – আর জিবরীল তোমার সাথে আছেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (8775)


8775 - عن أبي سعيد قال: نزل أهل قريظة على حكم سعد بن معاذ، فأرسل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى سعد فأتى على حمار، فلمّا دنا من المسجد قال للأنصار:"قوموا إلى سيدكم أو خيركم" فقال:"هؤلاء نزلوا على حكمك"، فقال: تَقتل مقاتلتهم، وتَسبِي ذراريهم، قال:"قضيتَ بحكم الله، وربما قال: بحكم الملك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4121) ومسلم في الجهاد والسير (64: 1768) كلاهما عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا غندر (هو محمد بن جعفر) حَدَّثَنَا شعبة، عن سعد بن إبراهيم، قال: سمعت أبا أمامة قال: سمعت أبا سعيد الخدريّ قال: فذكره.

وأمّا ما رواه الحاكم (2/ 123 - 124) وعنه البيهقيّ في الكبرى (9/ 63) من حديث محمد بن صالح التمار المديني، عن سعد بن إبراهيم، عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص، أن سعد بن معاذ حكم على بني قريظة فذكر الحديث.

وجاء فيه:"لقد حكم اليوم فيهم بحكم الله الذي حكم به من فوق السماوات" فهو معلول، فإن محمد بن صالح التمار خالف شعبة بن الحجاج الإمام المعروف، ولا تقبل مخالفته، أشار إليه أبو حاتم في العلل (971) والبخاري في التاريخ الكبير (4/ 291) والدراقطني في العلل (573).




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু কুরাইযার লোকেরা সা’দ ইবনে মু’আযের ফয়সালা মেনে নিতে রাজি হলো। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন। তিনি গাধার পিঠে চড়ে আসলেন। যখন তিনি মসজিদের কাছাকাছি হলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদেরকে বললেন, "তোমাদের নেতা অথবা তোমাদের শ্রেষ্ঠ ব্যক্তির দিকে ওঠো।" (সা’দ আসার পর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) বললেন, "এরা তোমার ফয়সালা মেনে নিতে রাজি হয়েছে।" তখন সা’দ বললেন, তাদের যোদ্ধাদের হত্যা করা হবে এবং তাদের নারী-শিশুদের বন্দী করা হবে। (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) বললেন, "তুমি আল্লাহর হুকুম অনুযায়ী ফয়সালা করেছ।" আর কখনো হয়তো বলেছেন, "তুমি রাজাধিরাজের হুকুম অনুযায়ী ফয়সালা করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (8776)


8776 - عن عائشة قالت: أصيب سعد يوم الخندق، رماه رجل من قريش، يقال له حبَّان بن العرقة، رماه في الأكحل، فضرب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيمة في المسجد ليعوده من قريب، فلمّا رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من الخندق وضع السلاح واغتسل، فأتاه جبريل عليه السلام وهو ينفض رأسه من الغبار، فقال: وضعت السلاح، والله ما وضعته، اخرج إليهم. قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"فأين". فأشار إلى بني قريظة، فأتاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فنزلوا على حكمه، فرد الحكم إلى سعد، قال: فإني أحكم فيهم: أن تُقتل المقاتلة، وأن تُسبى النساء والذرية، وأن تُقسم أموالهم.

قال هشام: فأخبرني أبي، عن عائشة: أن سعدًا قال: اللهم إنك تعلم أنه ليس أحد أحب إلي أن أجاهدهم فيك، من قوم كذبوا رسولك صلى الله عليه وسلم وأخرجوه، اللهم فإني أظن أنك قد وضعت الحرب بيننا وبينهم، فإن كان بقي من حرب قريش شيء فأبقني له، حتَّى أجاهدهم فيك، وإن كنت وضعت الحرب فافجرها واجعل موتتي فيها، فانفجرت من لبته، فلم يرعهم، وفي المسجد خيمة من بني غفار، إِلَّا الدم يسيل إليهم، فقالوا: يا أهل الخيمة! ما هذا الذي يأتينا من قبلكم؟ فإذا سعد يغذو جرحه
دمًا، فمات رضي الله عنه.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4122) ومسلم في الجهاد والسير (65: 1769) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

وزاد مسلم قول عروة: فأخبرت أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لقد حكمت فيهم بحكم الله عز وجل".

وزاد مسلم أيضًا (68: 1769) من طريق آخر عن هشام بن عروة بهذا الإسناد فانفجر من ليلته فما زال يسيل حتَّى مات.

وزاد في الحديث قال: فذاك حين يقول الشاعر:

ألا يا سعد سعد بني معاذ … فما فعلت قريظة والنضير

لعمرك إن سعد بني معاذ … غداة تحملوا لهو الصبور

تركتم قِدركم لا شيء فيها … وقِدر القوم حامية تفور

وقد قال الكريم أبو حُباب … أقيموا قينُقاع ولا تسيروا

وقد كانوا ببلدتهم ثقالًا … كما ثقلت بميطان الصخور

وقوله:"تركتم قدركم" أراد به الأوس لقلة حلفائهم، فإن حلفاءهم قريظة وقد قتلوا.

وقوله:"قدر القوم" الخزرج لشفاعتهم في حلفائهم بني قينقاع حتَّى منّ عليهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وتركهم لعبد الله بن أبي ابن سلول. وهو أبو حباب المذكور في البيت الأخير.

وقوله:"ثقالا" هم بنو قريظة.

وقوله:"كما ثقلت بميطان الصخور" ميطان - اسم جبل من أرض الحجاز في ديار بني مزينة، إنّما قصد هذا الشاعر تحريض سعد على استبقاء بني قريظة حلفائه. ويلومه على حكمه فيهم، ويذكره بفعل عبد الله بن أبي، ويمدحه بشفاعته في حلفائهم بني قينقاع.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের (যুদ্ধের) দিন সা'দ (ইবনু মুআয) আহত হন। কুরাইশের এক ব্যক্তি, যার নাম ছিল হাব্বান ইবনুল আরিকাহ, তাকে আক্রমণ করে। সে তার আকহাল (বাহুর শিরা) লক্ষ্য করে তীর মারে। তখন নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সেবা করার জন্য মসজিদের মধ্যে একটি তাঁবু স্থাপন করলেন। যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দক থেকে ফিরে এলেন, তিনি অস্ত্র ত্যাগ করে গোসল করলেন। এমতাবস্থায় তাঁর নিকট জিবরীল (আঃ) এলেন, তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা থেকে ধুলা ঝেড়ে ফেলছিলেন। জিবরীল (আঃ) বললেন: আপনি কি অস্ত্র রেখে দিয়েছেন? আল্লাহর কসম! আমি তো রাখিনি। আপনি তাদের দিকে বের হোন। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোথায়?" তিনি বনু কুরায়যার দিকে ইশারা করলেন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিকট গেলেন এবং তারা তাঁর হুকুমের উপর (নতি স্বীকার করে) আত্মসমর্পণ করল। তিনি বিচারের ভার সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ফিরিয়ে দিলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাদের বিষয়ে এই ফায়সালা দিচ্ছি যে, তাদের যুদ্ধ করতে সক্ষম পুরুষদের হত্যা করা হবে, নারী ও শিশুদের বন্দী করা হবে এবং তাদের ধন-সম্পদ ভাগ করে দেওয়া হবে।

হিশাম বলেন: আমার পিতা আমার নিকট আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছিলেন: ইয়া আল্লাহ! তুমি জানো, তোমার পথে আমার নিকট এমন কোনো কওম নেই, যাদের বিরুদ্ধে জিহাদ করা আমার নিকট অধিক প্রিয়, যারা তোমার রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিথ্যা বলেছে এবং তাঁকে (স্বদেশ থেকে) বের করে দিয়েছে। হে আল্লাহ! আমি ধারণা করি যে, তুমি আমাদের এবং তাদের মধ্যে যুদ্ধ সমাপ্ত করেছ। যদি কুরাইশের সাথে যুদ্ধের কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে তুমি আমাকে তার জন্য বাঁচিয়ে রাখো, যাতে আমি তোমার পথে তাদের বিরুদ্ধে জিহাদ করতে পারি। আর যদি তুমি যুদ্ধ সমাপ্ত করে থাকো, তবে তুমি আমার ক্ষতটিকে ফাট লাগিয়ে দাও এবং এতে আমার মৃত্যু ঘটাও।

অতঃপর তাঁর গলার শিরা ফেটে গেল। এতে তারা (উপস্থিত লোকেরা) ভয় পেলেন না। বনু গিফারের একটি তাঁবু মসজিদে ছিল। তাদের কাছে কেবল রক্ত গড়িয়ে আসছিল। তারা বলল: ওহে তাঁবুর লোকসকল! তোমাদের দিক থেকে আমাদের কাছে এটা কী আসছে? দেখা গেল, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ক্ষতস্থান থেকে রক্ত ঝরছে। অতঃপর তিনি (সা'দ) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন।

মুসলিম (তাঁর বর্ণনায়) উরওয়ার এই উক্তিটি যোগ করেছেন যে, তাঁকে জানানো হয়েছে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তুমি তাদের (বনু কুরায়যার) ব্যাপারে মহাপরাক্রমশালী আল্লাহর ফায়সালা অনুযায়ীই ফায়সালা করেছ।"

মুসলিম অন্য এক সূত্রে আরও যোগ করেছেন যে, সা’দের ক্ষতস্থান সে রাতে ফেটে গেল এবং তা প্রবাহিত হতে থাকল, যতক্ষণ না তিনি মৃত্যুবরণ করলেন।

আর হাদীসে আরও যোগ করা হয়েছে: সেই সময়ই কবি বলেছিলেন:

আলা ইয়া সা'দ সা'দা বানী মুআয… ফামা ফা'আলাত কুরাইযাতু ওয়ান নাদীর
তোমার জীবনের শপথ! সা'দ বানী মু'আয… যখন তারা ভার বহন করলো, সে ছিল বড়ই ধৈর্যশীল।
তোমরা তোমাদের পাত্র রেখে এসেছ, তাতে কিছুই নেই… আর সেই কওমের পাত্র উত্তপ্ত ও টগবগ করছে।
আর দয়ালু আবূ হুবাব বলেছিলেন… তোমরা কাইনুকা'তে অবস্থান করো, কোথাও যেও না।
তারা তাদের শহরে ভারী বোঝা ছিল… যেমন মায়তানের (Maitan) উপরে পর্বত ভারী।

তাঁর উক্তি: "তোমরা তোমাদের পাত্র রেখে এসেছ" দ্বারা তিনি আওস গোত্রকে বুঝিয়েছেন, তাদের মিত্র সংখ্যা কম হওয়ায়। কারণ তাদের মিত্র ছিল বনু কুরায়যা, আর তাদের হত্যা করা হয়েছে।

তাঁর উক্তি: "সেই কওমের পাত্র" দ্বারা খাযরাজ গোত্রকে বুঝানো হয়েছে, কারণ তারা তাদের মিত্র বনু কাইনুকার জন্য সুপারিশ করেছিল, যার ফলে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রতি দয়া করেন এবং তাদেরকে আব্দুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূলের জন্য ছেড়ে দেন। এই আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইই হলেন শেষ কাব্যাংশে উল্লেখিত আবূ হুবাব।

তাঁর উক্তি: "ভারী বোঝা ছিল" দ্বারা বনু কুরায়যাকে বোঝানো হয়েছে।

তাঁর উক্তি: "যেমন মায়তানের উপরে পর্বত ভারী" - মায়তান হলো হিজাজ ভূমির একটি পর্বতের নাম, যা বনী মুযায়নার আবাসস্থলে অবস্থিত। এই কবির উদ্দেশ্য ছিল সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর মিত্র বনু কুরায়যাকে বাঁচিয়ে রাখার জন্য উৎসাহিত করা এবং তাদের বিষয়ে তাঁর সিদ্ধান্তের জন্য তাঁকে তিরস্কার করা। আর আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইয়ের কাজের কথা তাঁকে স্মরণ করিয়ে দেওয়া, এবং তাদের মিত্র বনু কাইনুকার জন্য তার সুপারিশের প্রশংসা করা।









আল-জামি` আল-কামিল (8777)


8777 - عن عائشة قالت: خرجت يوم الخندق أقفو آثار الناس قالت: فسمعت وئيد الأرض ورائي يعني - حس الأرض - قالت: فالتفت فإذا أنا بسعد بن معاذ ومعه ابن أخيه الحارث بن أوس، يحمل مِجَنّه قالت: فجلست إلى الأرض، فمر سعد وعليه درع من حديد، قد خرجت منها أطرافه، فأنا أتخوف على أطراف سعد قالت: وكان سعد من أعظم الناس وأطولهم. قالت: فمر وهو يرتجز ويقول:

لبث قليلًا يدرك الهيجا حمل … ما أحسن الموت إذا حان الأجل

قالت: فقمت، فاقتحمت حديقة، فإذا فيها نفر من المسلمين، وإذا فيهم عمر بن
الخطّاب وفيهم رجل عليه تسبغة له - يعني مغفرًا - فقال عمر: ما جاء بك؟ ! لعمري والله إنك لجريئة، وما يؤمنك أن يكون بلاء، أو يكون تحوز؟ قالت: فما زال يلومني حتَّى تمنيت أن الأرض انشقت لي ساعتئذ، فدخلت فيها، قالت: فرفع الرّجل التسبغة عن وجهه، فإذا طلحة بن عبيد الله، فقال: يا عمر! إنك قد أكثرت منذ اليوم، وأين التحوز أو الفرار إِلَّا إلى الله عز وجل؟ !

قالت: ويرمي سعدًا رجل من المشركين من قريش - يقال له: ابن العرقة - بسهم له، فقال له: خذها وأنا ابن العرقة، فأصاب أكحله، فقطعه، فدعا الله عز وجل سعد، فقال: اللهم لا تمتني حتَّى تقر عيني من قريظة. قالت: وكانوا حلفاءه ومواليه في الجاهليّة.

قالت: فرقأ كلمه، وبعث الله عز وجل الريح على المشركين، فكفى الله عز وجل المؤمنين القتال، وكان الله قويًا عزيزًا، فلحق أبو سفيان ومن معه بتهامة، ولحق عيينة بن بدر ومن معه بنجد، ورجعت بنو قريظة، فتحصنوا في صياصيهم، ورجع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، فوضع السلاح، وأمر بقبة من أدم، فضربت على سعد في المسجد.

قالت: فجاء جبريل عليه السلام، وإن على ثناياه لنقع الغبار فقال: أقد وضعت السلاح؟ والله ما وضعت الملائكة بعد السلاح، اخرج إلى بني قريظة فقاتلهم، قالت: فلبس رسول الله صلى الله عليه وسلم لأمته، وأذن في الناس بالرحيل أن يخرجوا، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمر على بني غنم، وهم جيران المسجد حوله، فقال:"من مر بكم؟" قالوا: مر بنا دحية الكلبي، وكان دحية الكلبي تشبه لحيته وسنة وجهه جبريل عليه السلام.

فقالت: فأتاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فحاصرهم خمسًا وعشرين ليلة، فلمّا اشتد حصرهم واشتد البلاء، قيل لهم: انزلوا على حكم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فاستشاروا أبا لبابة بن عبد المنذر، فأشار إليهم أنه الذبح قالوا: ننزل على حكم سعد بن معاذ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انزلوا على حكم سعد بن معاذ" فنزلوا وبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى سعد بن معاذ، فأتي به على حمار عليه إكاف من ليف، قد حمل عليه، وحف به قومه، فقالوا: يا أبا عمرو! حلفاؤك ومواليك وأهل النكاية ومن قد علمت. قالت: لا يُرجِع إليهم شيئًا، ولا يلتفت إليهم حتَّى إذا دنا من دورهم، التفت إلى قومه، فقال: قد أنى لي أن لا أبالي في الله لومة لائم.
قال: قال أبو سعيد: فلمّا طلع على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"قوموا إلى سيدكم فأنزلوه" فقال عمر: سيدنا الله عز وجل. قال: أنزلوه، فأنزلوه، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حكم فيهم" قال سعد: فإني أحكم فيهم، أن تُقتل مقاتلتهم، وتُسبى ذراريهم، وتقسم أموالهم - وقال يزيد ببغداد: ويقسم - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد حكمت بحكم الله عز وجل وحكم رسوله".

قالت: ثمّ دعا سعد قال: اللهم إن كنت أبقيت على نبيك صلى الله عليه وسلم من حرب قريش شيئًا، فأبقني لها، وإن كنت قطعت الحرب بينه وبينهم، فاقبضني إليك. قالت: فانفجر كلمه، وكان قد برئ حتَّى ما يرى منه إِلَّا مثل الخرص، ورجع إلى قبته التي ضرب عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قالت عائشة: فحضره رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمر. قالت: فوالذي نفس محمد بيده! إني لأعرف بكاء عمر من بكاء أبي بكر، وأنا في حجرتي، وكانوا كما قال الله عز وجل: {رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ} [الفتح: 29] قال علقمة: قلت: أي أمه! فكيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع؟ قالت: كانت عينه لا تدمع على أحد، ولكنه كان إذا وجد، فإنما هو آخذ بلحيته.

حسن: رواه أحمد (25097) وابن سعد (3/ 421) وابن حبَّان (7028) كلّهم من حديث يزيد، قال: أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبيه، عن جده علقمة بن وقَّاص، قال: أخبرتني عائشة فذكرته.

فيه عمرو بن علقمة لم يوثّقه أحد، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات" على قاعدته ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، وبعض فقراته صحيح ثابت في الصحيحين وغيرهما. كما أن لبعض فقراته متابعة ذكرت في مواضعها، ولذا حسّنه الحافظ في الفتح (11/ 51).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি খন্দকের দিন লোকেদের পদচিহ্ন অনুসরণ করতে করতে বের হলাম। তিনি বলেন, আমি আমার পেছনে যমীনের আওয়াজ (অর্থাৎ, মাটির শব্দ) শুনতে পেলাম। তিনি বলেন, আমি ফিরে তাকালাম এবং দেখলাম সাদ ইবনে মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার ভাতিজা হারিস ইবনে আওসকে সাথে নিয়ে আছেন, হারিস তাঁর ঢাল বহন করছে। তিনি বলেন, আমি মাটিতে বসে পড়লাম। সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তার পরনে ছিল লোহার বর্ম, যার ভেতর থেকে তার হাত-পা বের হয়ে আসছিল। আমি সাদের হাত-পা (আহত হওয়ার) ভয়ে শঙ্কিত ছিলাম। তিনি বলেন, সাদ ছিলেন লোকেদের মধ্যে সবচেয়ে বিশাল ও দীর্ঘদেহী।

তিনি বলেন, তিনি যাওয়ার সময় রাজায (কবিতা) আবৃত্তি করছিলেন এবং বলছিলেন: 'অল্প অপেক্ষা করো, রণক্ষেত্রে আক্রমণকারী বীরের সাক্ষাৎ পাবে... মৃত্যু যখন আসন্ন, তখন মৃত্যু কতই না সুন্দর!'

তিনি বলেন, এরপর আমি দাঁড়ালাম এবং একটি বাগানে প্রবেশ করলাম। সেখানে মুসলিমদের একটি দল ছিল, তাদের মধ্যে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন এবং তাদের মধ্যে একজন লোক ছিলেন যার মাথায় একটি 'তাসবিগাহ' (অর্থাৎ শিরস্ত্রাণ বা লৌহবর্মের অংশ) ছিল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কেন এখানে এসেছ? আমার জীবনের কসম! আল্লাহর কসম! তুমি সত্যিই খুব সাহসী। তোমার কি নিশ্চিত হওয়া উচিত ছিল না যে এটি কোনো বিপদ বা (শত্রুদের) পক্ষ থেকে কৌশল হতে পারে?" তিনি (আয়েশা) বলেন, উমর আমাকে তিরস্কার করতেই থাকলেন, এমনকি আমি আকাঙ্ক্ষা করলাম যে এই মুহূর্তে যদি মাটি ফেটে যেত এবং আমি তার ভেতরে প্রবেশ করতাম! তিনি বলেন, এরপর লোকটি তার মুখ থেকে সেই 'তাসবিগাহ' সরালেন, দেখলাম তিনি হলেন তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তখন তিনি (তালহা) বললেন: "হে উমর! তুমি আজ অনেক বেশি বলে ফেলেছ। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে ছাড়া আর কোথায় বা কৌশল বা পলায়নের স্থান আছে?"

তিনি বলেন, কুরাইশ মুশরিকদের মধ্যে ইবনুল ইরকাহ নামক একজন লোক সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে একটি তীর ছুঁড়ল এবং বলল: "এই নাও, আমি ইবনুল ইরকাহ।" তীরটি সাদের 'আকহাল' (রগ বা শিরা)-এ আঘাত করল এবং তা কেটে গেল। সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে দু'আ করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমাকে মৃত্যু দিও না, যতক্ষণ না বনু কুরাইযা সম্পর্কে আমার চোখ শীতল হয় (তাদের পরিণতি দেখে শান্তি না পাই)।" তিনি (আয়েশা) বলেন, জাহিলিয়াতের যুগে তারা (বনু কুরাইযা) ছিল সাদের মিত্র ও চুক্তিবদ্ধ।

তিনি বলেন, এরপর সাদের ক্ষত শুকিয়ে গেল। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা মুশরিকদের ওপর বায়ু প্রেরণ করলেন এবং আল্লাহ তাআলা মুমিনদেরকে যুদ্ধের কষ্ট থেকে মুক্তি দিলেন। আল্লাহ ছিলেন মহাশক্তিধর, পরাক্রমশালী। এরপর আবু সুফিয়ান এবং তার সাথীরা তিহামায় ফিরে গেল এবং উয়াইনা ইবনে হিসন ও তার সাথীরা নাজদে ফিরে গেল। বনু কুরাইযা তাদের দুর্গে ফিরে গিয়ে অবস্থান নিল। আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনায় ফিরে আসলেন, অস্ত্র রেখে দিলেন এবং চামড়ার একটি তাঁবু তৈরি করার নির্দেশ দিলেন, যা মসজিদের মধ্যে সাদের জন্য স্থাপন করা হলো।

তিনি বলেন, এরপর জিবরীল (আলাইহিস সালাম) এলেন, তখন তাঁর সামনের দাঁতের ওপর ধূলা লেগেছিল। তিনি বললেন: "আপনারা কি অস্ত্র রেখে দিয়েছেন? আল্লাহর কসম! ফেরেশতারা এখনও অস্ত্র রাখেননি। আপনি বনু কুরাইযার দিকে বের হোন এবং তাদের সাথে যুদ্ধ করুন।" তিনি বলেন, তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর বর্ম পরিধান করলেন এবং লোকদেরকে সফরের জন্য বের হওয়ার অনুমতি দিলেন। আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বনু গানামের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন, যারা মসজিদের আশেপাশে থাকত। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমাদের পাশ দিয়ে কে অতিক্রম করেছে?" তারা বলল: "আমাদের পাশ দিয়ে দিহিয়া আল-কালবী অতিক্রম করেছেন।" দিহিয়া আল-কালবীর দাড়ি ও চেহারার গঠন জিবরীল (আলাইহিস সালাম)-এর মতো ছিল।

তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের কাছে গেলেন এবং পঁচিশ রাত ধরে তাদের অবরোধ করে রাখলেন। যখন অবরোধ কঠিন হলো এবং বিপদ বাড়লো, তখন তাদের বলা হলো: "তোমরা আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ফয়সালার ওপর নেমে আসো।" তখন তারা আবু লুবাবা ইবনে আবদুল মুনযিরের পরামর্শ চাইল। তিনি ইশারা করে বোঝালেন যে, এটি হবে জবাই। তারা তখন বলল: "আমরা সাদ ইবনে মু'আযের ফয়সালার ওপর নেমে আসব।" আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা সাদ ইবনে মু'আযের ফয়সালার ওপর নেমে আসো।" তখন তারা নেমে আসল। আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাদ ইবনে মু'আযের কাছে লোক পাঠালেন। তাকে একটি গাধার পিঠে করে আনা হলো, যার ওপর ছিল আঁশের তৈরি একটি জীন। তার সম্প্রদায় তাকে ঘিরে রেখেছিল এবং তারা বলছিল: "হে আবু আমর! এরা আপনার চুক্তিবদ্ধ মিত্র, আপনার ঘনিষ্ঠজন এবং এমন লোক যারা যুদ্ধ ক্ষেত্রে আপনাকে সাহায্য করেছে—যাদের সম্পর্কে আপনি জানেন।"

তিনি বলেন, তিনি (সাদ) তাদের কোনো কথার জবাব দিলেন না এবং তাদের দিকে ফিরেও তাকালেন না। এমনকি যখন তিনি তাদের বাড়ির কাছাকাছি পৌঁছালেন, তখন তিনি তার সম্প্রদায়ের দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন: "আল্লাহর ব্যাপারে কোনো নিন্দুকের নিন্দার পরোয়া না করার সময় আমার এসে গেছে।"

আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন তিনি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের নেতার দিকে ওঠো এবং তাকে নামাও।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমাদের নেতা হলেন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে নামাও।" এরপর তারা তাকে নামাল। আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তাদের বিষয়ে ফয়সালা করো।" সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি তাদের বিষয়ে এই ফয়সালা করছি যে, তাদের যুদ্ধ করতে সক্ষম পুরুষদের হত্যা করা হবে, তাদের নারীদের ও সন্তানদের বন্দী করা হবে এবং তাদের সম্পদ ভাগ করে দেওয়া হবে।" তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তো আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা এবং তাঁর রাসূলের ফয়সালা অনুযায়ী ফয়সালা করেছ।"

তিনি বলেন, এরপর সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দু'আ করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! আপনি যদি আপনার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য কুরাইশের সাথে যুদ্ধ করার আর কিছু বাকি রেখে থাকেন, তবে আমাকে তার জন্য বাঁচিয়ে রাখুন। আর যদি আপনি তাঁর ও তাদের (কুরাইশের) মধ্যে যুদ্ধ সমাপ্ত করে থাকেন, তাহলে আমাকে আপনার কাছে তুলে নিন।" তিনি বলেন, এরপর তাঁর ক্ষত থেকে রক্ত ঝরতে শুরু করল। যদিও তা এমনভাবে সেরে গিয়েছিল যে, শুধুমাত্র একটি আংটির মতো দাগ ছাড়া আর কিছুই দেখা যাচ্ছিল না। এরপর তিনি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য নির্মিত তাঁর তাঁবুতে ফিরে গেলেন।

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (সাদের) পাশে উপস্থিত ছিলেন। তিনি বলেন: যার হাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবন, তাঁর শপথ! আমি আমার হুজরায় থাকা সত্ত্বেও উমরের কান্নার আওয়াজ আবু বকরের কান্নার আওয়াজ থেকে চিনতে পারতাম। আর তারা ছিলেন এমন, যেমন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেছেন: "তারা একে অপরের প্রতি সহানুভূতিশীল।" [সূরা ফাতহ: ২৯] আলকামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "হে আম্মাজান! আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন কী করতেন?" তিনি বললেন: "তাঁর চোখ কারো জন্য অশ্রু ঝরাতো না, তবে তিনি যখন কষ্ট অনুভব করতেন, তখন তিনি কেবল তাঁর দাড়ি ধরতেন (দাড়ি হাতাতেন)।"









আল-জামি` আল-কামিল (8778)


8778 - عن جابر قال: رُمِيَ سعدُ بن معاذ في أكحله، فحسمه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بيده بمشقص، ثمّ وَرِمَتْ، فحسمه الثانية.

صحيح: رواه مسلم في السّلام (2208: 75) من طرق عن أبي خيثمة زهير بن حرب، حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر فذكره.

وتفصيله في الحديث الآتي:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সা’দ ইবনু মু’আযকে তাঁর ‘আকহাল’ (প্রধান শিরা)-এ আঘাত করা হয়েছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিজ হাতে একটি চওড়া তীরের ফলা দ্বারা সেটি দাগিয়ে দেন (বা আগুনে সেঁকে দেন)। এরপর যখন সেটি ফুলে উঠল, তখন তিনি দ্বিতীয়বার সেটি দাগিয়ে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8779)


8779 - عن جابر أنه قال: رُمِيَ يومَ الأحزاب سعدُ بن معاذ فقطعوا أكحله - أو أبجله - فحسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم بالنار، فانتفخت يده، فتركه فنزفه الدم، فحسمه أخرى فانتفخت يده، فلمّا رأى ذلك قال: اللهم لا تخرج نفسي حتَّى تقر عيني من بني قريظة، فاستمسك عرقه، فما قطر قطرة، حتَّى نزلوا على حكم سعد بن معاذ. فأرسل إليه،
فحكم أن يقتل رجالهم وتستحيى نساؤهم، يستعين بهن المسلمون، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أصبت حكم الله فيهم" وكانوا أربعمائة، فلمّا فرغ من قتلهم انفتق عرقه فمات.

صحيح: رواه الترمذيّ (1582) وأحمد (14773) وابن حبَّان (4784) كلّهم من طرق عن اللّيث بن سعد، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: فذكره.

وإسناده صحيح، وقال الترمذيّ: حسن صحيح.

صحّح إسناده أيضًا الحافظ في الفتح (7/ 414).

ويستفاد من هذا الحديث أن الذين قتلوا يوم قريظة كان عددهم أربعمائة.

اختلف أهل المغازي والسير في عدتهم إلى تسعمائة. والصحيح ما في حديث جابر، وقد حمل بعضهم بأن العدد الذي ذكره جابر للمقاتلين، والباقي تبع لهم.

هذا مصير كل من يخون بلده، وينقض عهده، لأن أمن الدولة فوق كل شيء، فإن هؤلاء الخونة جعلوا مدينة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والمسلمين في خطر عظيم، فنصرهم الله على أعدائهم بأن قتّل رجالهم وسبيتْ نساءهم، وبهذا انتهى الحظر المحدق حول دولة الإسلام. يقال: إنهم أُدخلوا المدينة وحفر لهم أخدود في السوق، وضربت أعناقهم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের (আহযাব) যুদ্ধের দিন সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তীর নিক্ষেপ করা হয়েছিল এবং তা তাঁর প্রধান শিরা (আকহল বা আবজল) কেটে দেয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রক্তপাত বন্ধ করার জন্য আগুন দিয়ে তা দগ্ধ করে দেন। এতে তাঁর হাত ফুলে গেল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ছেড়ে দিলেন এবং রক্ত প্রবাহিত হতে শুরু করল। তিনি দ্বিতীয়বার তা দগ্ধ করেন, এতেও তাঁর হাত ফুলে গেল। যখন তিনি এই অবস্থা দেখলেন, তখন বললেন: হে আল্লাহ! বনু কুরায়যা সম্পর্কে আমার চোখ শীতল না হওয়া পর্যন্ত তুমি আমার রূহ কবয করো না। তখন তাঁর রক্তনালী থেমে গেল এবং বনু কুরাইযা সা'দ ইবনু মু'আযের রায়ের কাছে আত্মসমর্পণ না করা পর্যন্ত এক ফোঁটাও রক্ত ঝরল না। তখন তাঁর (সা'দ)-এর কাছে লোক পাঠানো হলো। তিনি রায় দিলেন যে, তাদের পুরুষদের হত্যা করা হবে এবং তাদের মহিলাদের জীবিত রাখা হবে, যাতে মুসলিমরা তাদের কাজে লাগাতে পারে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তাদের ব্যাপারে আল্লাহর হুকুম অনুযায়ীই ফয়সালা করেছ।" তারা সংখ্যায় চারশত ছিল। যখন তাদের হত্যা শেষ হলো, তখন তাঁর (সা'দ-এর) রক্তনালী আবার খুলে গেল এবং তিনি ইন্তেকাল করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8780)


8780 - عن عطية القرظي قال: كنت من سبي بني قريظة، فكانوا ينظرون، فمن أنبت الشعر قُتِلَ، ومن لم ينبت لم يُقتَل، فكنت فيمن لم ينبت.

صحيح: رواه أبو داود (4404، 4405)، والتِّرمذيّ (1584)، والنسائي (4981، 3430)، وابن ماجة (2541، 2542)، وأحمد (18766)، وصحّحه ابن حبَّان (4780، 4783، 4788)، والحاكم (2/ 123 و 3/ 135) كلّهم من طرق عن عبد الملك بن عمير، حَدَّثَنِي عطية القرظي فذكره. وإسناده صحيح.

قال الترمذيّ: هذا حديث حسن صحيح. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.




আতিয়্যাহ আল-কুরাযী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ছিলাম বনু কুরায়যা গোত্রের বন্দিদের অন্তর্ভুক্ত। তারা (কর্তৃপক্ষ) পরীক্ষা করে দেখতেন। যার শরীরে (গুপ্ত) লোম গজিয়েছে, তাকে হত্যা করা হতো এবং যার শরীরে লোম গজায়নি, তাকে হত্যা করা হতো না। আমি ছিলাম তাদের মধ্যে, যাদের শরীরে লোম গজায়নি।