আল-জামি` আল-কামিল
8888 - عن عمر بن الخطّاب قال: أما والذي نفسي بيده! لولا أن أترك آخر الناس بَبَّانًا ليس لهم شيء ما فُتحتْ عليّ قرية إِلَّا قسمتها كما قسم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيبر، ولكن أتركها خزانة لهم يقتسمونها.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4235) عن سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد (هو ابن أسلم) عن أبيه، أنه سمع عمر بن الخطّاب رضي الله عنه قال: فذكره.
قوله:"ببان" هو المعدم الذي لا شيء له.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাবধান! যার হাতে আমার প্রাণ তার শপথ! যদি আমি শেষ যুগের মানুষকে একেবারে নিঃস্ব অবস্থায় না রেখে যেতাম, যাদের কাছে কিছুই নেই, তবে আমার মাধ্যমে বিজিত কোনো জনপদকে আমি অবশ্যই বন্টন করে দিতাম, যেমন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার বন্টন করেছিলেন। কিন্তু আমি একে তাদের জন্য ভান্ডার স্বরূপ রেখে দিই, যাতে তারা তা ভাগ করে নিতে পারে।
8889 - عن عبد الرحمن بن غنم قال: رابطنا مدينة (قنسرين) مع شرحبيل بن السمط، فلمّا فتحها، أصاب فيها غنمًا وبقرًا، فقسم فينا طائفة منها، وجعل بقيتها في المغنم، فلقيت معاذ بن جبل فحدثته؟ فقال معاذ: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم خيبر، فأصبنا فيها غنمًا، فقسم فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم طائفة وجعل بقيتها في المغنم.
حسن: رواه أبو داود (2707) - ومن طريقه البيهقيّ (9/ 60) - عن محمد بن المصفى، حَدَّثَنَا محمد بن المبارك، عن يحيى بن حمزة، حَدَّثَنَا أبو عبد العزيز - شيخ من أهل الأردن - عن عبادة بن نسي، عن عبد الرحمن بن غنم فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن المصفي وأبي عبد العزيز (وهو يحيى بن عبد العزيز) فإنهما حسنا الحديث.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুর রহমান ইবনু গানাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা শারাহবীল ইবনুস-সামত-এর সাথে কিননাসরীন শহরে পাহারাদারিতে ছিলাম। যখন তিনি শহরটি জয় করলেন, তখন তিনি সেখানে কিছু বকরি ও গরু পেলেন। তিনি সেগুলোর একটি অংশ আমাদের মাঝে বণ্টন করে দিলেন এবং বাকি অংশ যুদ্ধলব্ধ সম্পদের (গনীমত) অন্তর্ভুক্ত করলেন। অতঃপর আমি মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করে তাকে (এই ঘটনাটি) জানালাম। মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খায়বার যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। আমরা সেখানে কিছু বকরি লাভ করেছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেগুলোর একটি অংশ আমাদের মাঝে বণ্টন করে দিয়েছিলেন এবং বাকি অংশ যুদ্ধলব্ধ সম্পদের (গনীমতের) অন্তর্ভুক্ত করেছিলেন।
8890 - عن سهلٍ بن أبي حثمة، قال: قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم خيبر نصفين: نصفًا لنوائبه وحاجته، ونصفًا بين المسلمين، قسمها بينهم على ثمانية عشر سهمًا.
صحيح: رواه أبو داود (3010) عن الربيع بن سليمان المؤذن، حَدَّثَنَا أسد بن موسى، حَدَّثَنَا يحيى بن زكريا، حَدَّثَنِي سفيان، عن يحيى بن سعيد، عن بشير بن يسار، عن سهل بن أبي حثمة فذكره.
إسناده صحيح إِلَّا أنه اختلف على يحيى بن سعيد وهو الأنصاري، فرواه سفيان عنه عن بشير بن يسار، عن سهل بن أبي حثمة، ورواه أبو شهاب، عنه عن بشير بن يسار، أنه سمع نفرًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قالوا: فذكر هذا الحديث، قال: فكان النصف سهام المسلمين، وسهم رسول الله صلى الله عليه وسلم وعزل النصف للمسلمين لما ينوبه من الأمور والنوائب.
ورواه محمد بن فضيل عنه، عن بشير بن يسار مولى الأنصار، عن رجال من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما ظهر على خيبر قسمها على ستة وثلاثين سهمًا، جمع كل سهم مائة سهم، فكان لرسول الله صلى الله عليه وسلم وللمسلمين النصف من ذلك، وعزل النصف الباقي لمن نزل به من الوفود والأمور ونوائب الناس.
ورواه أبو خالد - يعني سليمان بن حيان، عنه عن بشير بن يسار مرسلًا، قال: لما أفاء الله على نبيه صلى الله عليه وسلم خيبر قسمها على ستة وثلاثين سهمًا، جمع كل سهم مائة سهم، فعزل نصفها لنوائبه، وما ينزل به: الوطيحة والكتيبة وما أُحيز معهما، وعزل النصف الآخر فقسمه بين المسلمين: الشق والنطاة وما أُحيز معهما، وكان سهم رسول الله صلى الله عليه وسلم مما أحيز معهما.
وكذلك رواه سليمان بن بلال عنه، عن بشير بن يسار مرسلًا. أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، لما أفاء الله عليه خيبر قسمها ستة وثلاثين سهمًا جمعًا، فعزل للمسلمين الشطر: ثمانية عشر سهما يجمع كلَّ سهم مائة، النبيُّ صلى الله عليه وسلم معهم، له سهم كسهم أحدهم، وعزل رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانية عشر سهما - وهو
الشطر - لنوائبه وما ينزل به من أمر المسلمين، فكان ذلك الوطيح والكتيبة والسلالم وتوابعها، فلمّا صارت الأموال بيد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والمسلمين لم يكن لهم عمال يكفونهم عملها، فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم اليهود فعاملهم.
وهذه الطرق كلها رواها أبو داود، وهي لا تُعِلّ من رفعه، وإنما تفسره، فإذا جمعت هذه الروايات وغيرها يتضح كيف كان تقسيم غنائم خيبر، وإليه يشير الخطّابي بقوله: فيه من الفقه أن الأرض إذا غنمت قسمت كما يقسم المتاع والخرثي، لا فرق بينها وبين غيرها من الأموال. والظاهر من أمر خيبر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم فتحها عَنوة، وإذا فتحها عَنوة فهي مغنومة، وإذا صارت غنيمة فإنما حصته من الغنيمة خمس الخمس وهو سهمه الذي سماه الله تعالى في قوله تعالى: {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [الأنفال: 41] فكيف يكون له النصف منها أجمع حتَّى يصرفه في حوائجه ونوائبه على ظاهر ما جاء في الحديث. قلت (القائل الخطّابي): وإنما يشكل هذا على من لا يشبع طرق الأخبار المروية في فتوح خيبر حتَّى يجمعها ويرتبها، فمن فعل ذلك تبين أمر صحة هذه القسمة من حيث لا يشكل معناه. وبيان ذلك: أن خيبر كانت لها قرى وضياع خارجة عنها منها الوطيحة والكتيبة والشق والنطاة والسلاليم وغيرها من الأسماء، فكان بعضها مغنوما وهو ما غلب عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم كان سبيلها القسم، وكان بعضها فيئًا، لم يوجف عليه بخيل ولا ركاب فكان خاصًا لرسول الله صلى الله عليه وسلم يضعه حيث أراه الله تعالى من حاجته ونوائبه ومصالح المسلمين، فنظروا إلى مبلغ ذلك كله فاستوت القسمة فيها على النصف والنصف، وقد بين ذلك الزهري.
وأمّا حديث الزهري فهو ما رواه أيضًا أبو داود (3016) وغيره مرسلًا عن محمد بن إسحاق، عن الزهري وعبد الله بن أبي بكر وبعض ولد محمد بن مسلمة قالوا: بقيت بقية من أهل خيبر تحصنوا، فسألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يحقن دماءهم ويُسَيِّرهُم، ففعل، فسمع بذلك أهل فدك، فنزلوا على مثل ذلك، فكانت لرسول الله صلى الله عليه وسلم خاصة، لأنه لم يوجف عليها بخيل ولا ركاب.
ورواه أيضًا مالك عن الزهري: أن سعيد بن المسيب أخبره: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم افتتح بعض خيبر عَنوة.
قال أبو داود: قرئ على الحارث بن مسكين - وأنا شاهد - أخبركم ابن وهب، حَدَّثَنِي مالك، عن ابن شهاب: أن خيبر كان بعضها عنوة، وبعضها صلحًا، والكتيبة أكثرها عنوة، وفيها صلح.
قلت لمالك: وما الكتيبة؟ قال: أرض خيبر، وهي أربعون ألف عذق.
ورواه يونس بن يزيد، عن ابن شهاب قال: خمّس رسول الله صلى الله عليه وسلم خيبر، ثمّ قسم سائرها على من شهدها ومن غاب عنها من أهل الحديبية.
وهذه المراسيل تقويها الأحاديث المرفوعة.
قال الواقدي: وتحولت اليهود إلى قلعة الزُّبير - حصن منيع في رأس قلة - فأقام رسول الله صلى الله عليه وسلم -
ثلاثة أيام، فجاء رجل من اليهود يقال له: عزال فقال: يا أبا القاسم، إنك لو أقمت شهرًا ما بالوا، إن لهم شرابًا وعيونًا تحت الأرض، يخرجون بالليل فيشربون منها، ثمّ يرجعون إلى قلعتهم فيمتنعون منك، فإن قطعت مشربهم عليهم أصحروا لك. فسار رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى مائهم فقطعه عليهم، فلمّا قطع عليهم، خرجوا، فقاتلوا أشد القتال، وقتل من المسلمين نفر، وأصيب نحو العشرة من اليهود، وافتتحه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثمّ تحول رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أهل الكتيبة والوطيح والسلالم حصن ابن أبي الحقيق، فتحصن أهله أشد التحصن، وجاءهم كل فل كان انهزم من النطاة والشق، فإن خيبر كانت جانبين الأوّل: الشق والنطاة، وهو الذي افتتحه أولا، والجانب الثاني: الكتيبة والوطيح والسلالم، فجعلوا لا يخرجون من حصونهم حتَّى هم رسول الله صلى الله عليه وسلم أن ينصب عليهم المنجنيق، فلمّا أيقنوا بالهلكة وقد حصرهم رسول الله صلى الله عليه وسلم أربعة عشر يومًا، سألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم الصلح، وأرسل ابن أبي الحقيق إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنزل فأكلمك؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم"، فنزل ابن أبي الحقيق فصالح رسول الله صلى الله عليه وسلم على حقن دماء من في حصونهم من المقاتلة وترك الذرية لهم، ويخرجون من خيبر وأرضها بذراريهم، ويخلون بين رسول الله صلى الله عليه وسلم وبين ما كان لهم من مال وأرض وعلى الصفراء والبيضاء والكراع والحلقة، إِلَّا ثوبًا على ظهر إنسان. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وبرئت منكم ذمة الله وذمة رسوله إن كتمتموني شيئًا". فصالحوه على ذلك.
لكن يرى الحافظ ابن القيم في زاده (3/ 328 - 329) وقبله الحافظ ابن عبد البر في الدرر ص 214 بأن خيبر كلها فتحت عنوة، وأن رسول الله صلى الله عليه وسلم استولى على أرضها كلها بالسيف عنوة، ولو فتح شيء منها صلحًا لم يُجلهم رسول الله صلى الله عليه وسلم منها، فإنه لما عزم على إخراجهم منها قالوا: نحن أعلم بالأرض منكم دعونا نكون فيها، ونعمرها لكم بشطر ما يخرج فيها، وهذا صريح جدًّا في أنها إنّما فتحت عنوة: وقد حصل بين اليهود والمسلمين من الحرب والمبارزة والقتل من الفريقين ما هو معلوم، ولكنهم لما ألجئوا إلى حصنهم، نزلوا على الصلح الذي ذكر أن لرسول الله صلى الله عليه وسلم الصفراء والبيضاء، والحلقة والسلاح، ولهم رقابهم وذريتهم ويجلوا من الأرض، فهذا كان الصلح ولم يقع بينهم صلح أن شيئًا من أرض خيبر لليهود ولا جرى ذلك البتة، ولو كان كذلك لم يقل نقركم ما شئنا، فكيف يقرهم على أرضهم ما شاء، ولما كان عمر أجلاهم كلّهم من الأرض ولم يصالحهم أيضًا على أن الأرض للمسلمين وعليها خراج يؤخذ منهم هذا لم يقع فإنه لم يضرب على خيبر خراجًا البتة. فالصواب الذي لا شك فيه: أنها فتحت عنوة والإمام مخير في أرض العنوة بين قسمها ووقفها، أو قسم بعضها ووقف البعض، وقد فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم الأنواع الثلاثة، فقسم قريظة والنضير ولم يقسم مكة، وقسم شطر خيبر وترك شطرها. انتهى كلام ابن القيم.
সাহল ইবনু আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাইবারকে দুই ভাগে ভাগ করেছিলেন: এক ভাগ তাঁর প্রয়োজন ও জরুরি কাজের জন্য এবং এক ভাগ মুসলিমদের মধ্যে। তিনি তা মুসলিমদের মধ্যে আঠারোটি ভাগে (শেয়ারে) বিভক্ত করেছিলেন।
সহীহ: এটি আবূ দাঊদ (৩০০৯) বর্ণনা করেছেন রবী' ইবনু সুলাইমান আল-মুআযযিন থেকে, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আসাদ ইবনু মূসা, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিয়্যা, তিনি বলেন, আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান, ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি বাশীর ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি সাহল ইবনু আবী হাছমা থেকে—এরপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
এর সনদ সহীহ। তবে ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ (যিনি আনসারী) এর উপর মতপার্থক্য রয়েছে। সুফিয়ান এটি তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন বাশীর ইবনু ইয়াসার সূত্রে সাহল ইবনু আবী হাছমা থেকে। আর আবূ শিহাব এটি তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন বাশীর ইবনু ইয়াসার সূত্রে, যে তিনি (বাশীর) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবীকে বলতে শুনেছেন: এরপর তিনি এই হাদীসটি উল্লেখ করেন। তিনি (রাবী) বলেন: এক ভাগ ছিল মুসলিমদের অংশ, আর এক অংশ ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য, আর অন্য অর্ধেক জরুরি বিষয়াদি ও বিপদাপদের জন্য মুসলিমদের জন্য আলাদা করে রাখা হয়েছিল।
মুহাম্মাদ ইবনু ফুযাইল এটি তাঁর থেকে, বাশীর ইবনু ইয়াসার (আনসারদের মাওলা) সূত্রে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্য থেকে কয়েকজন লোকের মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন খাইবারের উপর বিজয় লাভ করেন, তখন এটিকে ছত্রিশ ভাগে বিভক্ত করেন। প্রতি ভাগ একশো ভাগের সমতুল্য ছিল। এর অর্ধেক ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুসলিমদের জন্য, আর বাকি অর্ধেক সংরক্ষিত ছিল আগত প্রতিনিধি দল, বিশেষ জরুরি বিষয়াদি ও মানুষের বিপদের জন্য।
আবূ খালিদ—অর্থাৎ সুলাইমান ইবনু হাইয়ান—এটি তাঁর থেকে, বাশীর ইবনু ইয়াসার সূত্রে মুরসালভাবে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: যখন আল্লাহ তা‘আলা তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খাইবারের গনীমতের সম্পদ দান করলেন, তখন তিনি এটিকে ছত্রিশ ভাগে বিভক্ত করেন। প্রতি ভাগ একশো ভাগের সমতুল্য ছিল। তিনি এর অর্ধেক জরুরি কাজের জন্য আলাদা করে রাখেন, যা তাঁর উপর এসে পড়ত: আল-ওয়াতিহ, আল-কাতীবা এবং এর সাথে যুক্ত অন্যান্য এলাকা। আর বাকি অর্ধেক আলাদা করে মুসলিমদের মধ্যে বন্টন করেন: আশ-শিক, আন-নাতা এবং এর সাথে যুক্ত এলাকা। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ ছিল এর সাথে যুক্ত এলাকাগুলোর মধ্য থেকে।
অনুরূপভাবে সুলাইমান ইবনু বিলাল এটি তাঁর থেকে, বাশীর ইবনু ইয়াসার সূত্রে মুরসালভাবে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখন আল্লাহ তা‘আলা খাইবারের সম্পদ দান করলেন, তখন তিনি এটিকে মোট ছত্রিশ ভাগে বিভক্ত করলেন। মুসলিমদের জন্য এর অর্ধেক আলাদা করলেন—আঠারো ভাগ, প্রতি ভাগ একশো ভাগের সমতুল্য। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সাথে ছিলেন, তাঁর জন্য তাদের একজনের ভাগের সমপরিমাণ এক ভাগ ছিল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকি আঠারো ভাগ—যা ছিল অর্ধেক—তাঁর জরুরি বিষয়াদি এবং মুসলিমদের কাজে যা তাঁর উপর এসে পড়ত, তার জন্য আলাদা করে রাখলেন। এগুলো ছিল আল-ওয়াতিহ, আল-কাতীবা, আস-সালালিম এবং এর আনুষঙ্গিক এলাকা। যখন সম্পদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুসলিমদের হাতে আসল, তখন এর কাজ করার জন্য তাদের পর্যাপ্ত লোক ছিল না, তাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহুদীদের ডেকে তাদের সাথে চুক্তিতে আবদ্ধ হলেন।
এই সমস্ত সূত্রই আবূ দাঊদ বর্ণনা করেছেন। এগুলো ঐ বর্ণনাটিকে দুর্বল করে না, বরং এটিকে ব্যাখ্যা করে। এই বর্ণনাগুলো এবং অন্যান্য বর্ণনা একত্রিত করলে খাইবারের গনীমতের ভাগ কীভাবে হয়েছিল, তা স্পষ্ট হয়ে যায়। ইমাম খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এই দিকেই ইঙ্গিত করে বলেন: এর মধ্যে এই ফিকহ রয়েছে যে, জমি যদি গনীমত হিসেবে অর্জিত হয়, তবে তা অন্যান্য মালপত্র ও দ্রব্যের মতো ভাগ করে দেওয়া হবে। অন্যান্য সম্পদ থেকে এর কোনো পার্থক্য নেই। খাইবারের ক্ষেত্রে বাহ্যত এটাই প্রতীয়মান হয় যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা যুদ্ধ করে (আনওয়াতান) জয় করেছিলেন। যদি তা যুদ্ধ করে জয় করা হয়, তবে তা গনীমত। আর যদি তা গনীমত হয়, তবে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অংশ গনীমতের এক-পঞ্চমাংশের এক-পঞ্চমাংশ মাত্র, যা আল্লাহ তা‘আলা তাঁর বাণী: {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [সূরা আনফাল: ৪১] (আর তোমরা জেনে রাখ যে, তোমরা যা কিছু গনীমত হিসেবে লাভ কর, তার এক-পঞ্চমাংশ আল্লাহ, রাসূল, নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম, মিসকীন ও মুসাফিরদের জন্য) তে উল্লেখ করেছেন। তবে কীভাবে তাঁর জন্য এর অর্ধেক হতে পারে, যাতে তিনি তা তাঁর প্রয়োজন ও জরুরি কাজে ব্যয় করতে পারেন, যেমনটি হাদীসের বাহ্যিক অর্থে এসেছে? আমি (খাত্তাবী) বলি: এই বিষয়টি শুধু তার কাছেই কঠিন মনে হবে, যে খাইবারের বিজয়ের বিষয়ে বর্ণিত সকল হাদীসের সূত্র ভালোভাবে অনুসন্ধান করে একত্রিত ও সাজিয়ে নেয়নি। যে তা করবে, তার কাছে এই বন্টন পদ্ধতির বিশুদ্ধতা স্পষ্ট হয়ে যাবে এবং এর অর্থ বুঝতে কোনো অসুবিধা হবে না। এর ব্যাখ্যা হলো: খাইবারের কিছু গ্রাম ও এলাকা এর বাইরে ছিল, যেমন আল-ওয়াতিহ, আল-কাতীবা, আশ-শিক, আন-নাতা, আস-সালালিম এবং অন্যান্য নাম। এর কিছু অংশ ছিল গনীমত হিসেবে অর্জিত, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জোরপূর্বক দখল করেছিলেন, যা ভাগ করা হয়েছিল। আর কিছু অংশ ছিল ফাই (বিনা যুদ্ধে লব্ধ সম্পদ), যার উপর কোনো ঘোড়া বা আরোহী চালানো হয়নি; তা একান্তই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ছিল। তিনি তা তাঁর প্রয়োজন, জরুরি কাজ এবং মুসলিমদের কল্যাণে যেখানে আল্লাহ তাঁকে দেখিয়েছেন, সেখানে ব্যয় করেছেন। এরপর এই সবকিছুর মোট পরিমাণ দেখা হলো এবং তা অর্ধেক অর্ধেক করে বিভক্ত করা হলো। ইমাম যুহরীও তা স্পষ্ট করেছেন।
আর ইমাম যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাদীস হল, যা আবূ দাঊদ (৩০১৬) এবং অন্যান্যরা মুরসালভাবে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি যুহরী, আবদুল্লাহ ইবনু আবী বকর এবং মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামার কিছু বংশধর থেকে বর্ণনা করেছেন। তারা বলেন: খাইবারের কিছু লোক বাকি ছিল যারা দুর্গবন্দী হয়েছিল। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাদের রক্ত রক্ষা করে তাদের বিতাড়িত করার অনুমতি চাইল। তিনি তা করলেন। ফাদাক-এর লোকেরা এ খবর শুনে অনুরূপ শর্তে আত্মসমর্পণ করল। এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একান্ত নিজস্ব ছিল, কারণ এর উপর কোনো ঘোড়া বা আরোহী চালানো হয়নি।
মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) যুহরী থেকে বর্ণনা করেছেন: সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব তাঁকে জানিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাইবারের কিছু অংশ যুদ্ধ করে জয় করেছিলেন (আনওয়াতান)।
আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আল-হারিছ ইবনু মিসকীনকে পড়ে শোনানো হচ্ছিল—আমি উপস্থিত ছিলাম—ইবনু ওয়াহব তোমাদের জানিয়েছেন, মালিক আমাকে ইবনু শিহাব থেকে বর্ণনা করেছেন যে: খাইবারের কিছু অংশ ছিল যুদ্ধ করে জয় করা এবং কিছু অংশ ছিল সন্ধির মাধ্যমে। আর আল-কাতীবা-এর অধিকাংশই ছিল যুদ্ধ করে জয় করা, তবে এর মধ্যেও সন্ধি ছিল।
আমি (আবূ দাঊদ) মালিককে জিজ্ঞাসা করলাম: আল-কাতীবা কী? তিনি বললেন: খাইবারের জমি, যা চল্লিশ হাজার খেজুর বৃক্ষের বাগান।
ইউনূস ইবনু ইয়াযীদ ইবনু শিহাব থেকে বর্ণনা করেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাইবারকে পাঁচ ভাগ (খুমুস) করে বাকিটা আল-হুদাইবিয়াহর সেই লোকদের মধ্যে বন্টন করলেন, যারা সেখানে উপস্থিত ছিল এবং যারা অনুপস্থিত ছিল।
এই মুরসাল বর্ণনাগুলো মারফূ' হাদীসগুলোকে শক্তিশালী করে।
আল-ওয়াকিদী বলেন: ইহুদীরা আয-যুবাইর দুর্গে স্থানান্তরিত হয়েছিল—যা একটি পাহাড়ের চূড়ায় অবস্থিত সুরক্ষিত দুর্গ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে তিন দিন অবস্থান করলেন। তখন আযযাল নামক এক ইহুদী এসে বলল: হে আবুল কাসিম, আপনি যদি এক মাসও এখানে থাকেন, তবুও তারা পাত্তা দেবে না। তাদের মাটির নীচে পানীয় ও ঝর্ণা রয়েছে। তারা রাতে বেরিয়ে এসে পান করে এবং আবার দুর্গে ফিরে গিয়ে আপনার থেকে নিজেদের রক্ষা করে। আপনি যদি তাদের পানির উৎস কেটে দেন, তবে তারা আপনার সামনে বেরিয়ে আসতে বাধ্য হবে। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের পানির উৎসের দিকে গেলেন এবং তা কেটে দিলেন। যখন তাদের পানি বন্ধ হয়ে গেল, তারা বেরিয়ে আসল এবং প্রচণ্ড লড়াই করল। মুসলিমদের মধ্য থেকে কয়েকজন শহীদ হলেন এবং ইহুদীদের প্রায় দশজন নিহত হলো। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা জয় করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল-কাতীবা, আল-ওয়াতিহ এবং আস-সালালিম এলাকার দিকে গেলেন—যা ইবনু আবিল হুকায়কের দুর্গ ছিল। সেখানকার বাসিন্দারা কঠোরভাবে দুর্গবন্দী হলো। আন-নাতা এবং আশ-শিক থেকে পরাজিত সকল লোক সেখানে এসে আশ্রয় নিল। খাইবার দুই ভাগে বিভক্ত ছিল: প্রথম ভাগ ছিল আশ-শিক ও আন-নাতা, যা তিনি প্রথমে জয় করেছিলেন। দ্বিতীয় ভাগ ছিল আল-কাতীবা, আল-ওয়াতিহ এবং আস-সালালিম। তারা তাদের দুর্গ থেকে বের হচ্ছিল না, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর মিনজানিক (পাথর নিক্ষেপক যন্ত্র) স্থাপন করার মনস্থির করলেন। যখন তারা ধ্বংসের বিষয়ে নিশ্চিত হলো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের চৌদ্দ দিন ধরে অবরোধ করে রাখলেন, তখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সন্ধির আবেদন করল। ইবনু আবিল হুকায়েক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে লোক পাঠালেন: আমি কি নেমে আপনার সাথে কথা বলতে পারি? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হ্যাঁ।” এরপর ইবনু আবিল হুকায়েক নিচে নেমে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সন্ধি করলেন এই শর্তে যে, তাদের দুর্গের মধ্যে যুদ্ধ করতে সক্ষম পুরুষদের রক্ত রক্ষা করা হবে, তাদের সন্তানদেরকে তাদের জন্য ছেড়ে দেওয়া হবে, তারা তাদের সন্তানদের নিয়ে খাইবার এবং এর জমি থেকে বেরিয়ে যাবে, এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের যাবতীয় সম্পদ, জমি, স্বর্ণ, রৌপ্য, যুদ্ধের সরঞ্জাম (ঘোড়া ও অস্ত্র) অর্পণ করবে—মানুষের পরিহিত বস্ত্র ব্যতীত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যদি তোমরা আমার কাছে কোনো কিছু গোপন করো, তবে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকে তোমাদের দেওয়া নিরাপত্তা বাতিল।” তারা এই শর্তে সন্ধি করল।
কিন্তু হাফিয ইবনু কাইয়্যিম তাঁর যাদুল মা‘আদ গ্রন্থে (৩/৩২৮-৩২৯) এবং তার পূর্বে হাফিয ইবনু আবদিল বার্র আদ-দুরার গ্রন্থে (পৃষ্ঠা ২১৪) মনে করেন যে, খাইবার সম্পূর্ণটাই যুদ্ধ করে (আনওয়াতান) জয় করা হয়েছিল এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তলোয়ারের জোরে এর সমস্ত জমি দখল করেছিলেন। যদি এর কোনো অংশ সন্ধির মাধ্যমে জয় করা হতো, তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সেখান থেকে উচ্ছেদ করতেন না। কারণ যখন তিনি তাদের উচ্ছেদ করার সিদ্ধান্ত নিলেন, তখন তারা বলেছিল: আমরা জমি সম্পর্কে আপনাদের চেয়ে বেশি জানি, আমাদের এতে থাকতে দিন এবং যা উৎপন্ন হবে তার অর্ধেকের বিনিময়ে আমাদের চাষ করতে দিন। এটা স্পষ্ট প্রমাণ করে যে, এটি কেবল যুদ্ধ করেই জয় করা হয়েছিল। ইহুদী ও মুসলিমদের মধ্যে যুদ্ধ, দ্বন্দ্ব এবং উভয় পক্ষে হতাহতের ঘটনা ঘটেছিল, যা জানা কথা। কিন্তু যখন তারা তাদের দুর্গে আশ্রয় নিতে বাধ্য হলো, তখন তারা সেই সন্ধিতে রাজি হয়েছিল, যা উল্লেখ করা হয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ছিল স্বর্ণ, রৌপ্য, অস্ত্র এবং যুদ্ধ সরঞ্জাম, আর তাদের জন্য ছিল তাদের জীবন ও সন্তান-সন্ততি এবং জমি থেকে তাদের চলে যেতে হবে। এই সন্ধিই হয়েছিল এবং খাইবারের কোনো অংশ ইহুদীদের জন্য থাকবে, এমন কোনো সন্ধি তাদের মধ্যে কখনো হয়নি। যদি এমনটি হতো, তবে তিনি বলতেন না যে, আমরা যতদিন চাইব ততদিন তোমাদের থাকতে দেব। তিনি কীভাবে তাদের জমিতে যতদিন চান ততদিন থাকতে দিতে পারেন? যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের সবাইকে জমি থেকে বিতাড়িত করলেন, তখন তিনি তাদের সাথে এই শর্তেও সন্ধি করেননি যে, জমি মুসলিমদের থাকবে এবং তাদের থেকে খাজনা নেওয়া হবে। এমনটি হয়নি, কারণ তিনি খাইবারের উপর কোনো খাজনা ধার্য করেননি। সুতরাং, সঠিক মত হলো, এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, খাইবার যুদ্ধ করেই জয় করা হয়েছিল। আর যুদ্ধ করে জয় করা জমির বিষয়ে ইমামের এখতিয়ার রয়েছে—তিনি হয় তা ভাগ করে দেবেন, অথবা ওয়াকফ করবেন, অথবা কিছু ভাগ করে কিছু ওয়াকফ করবেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন প্রকারই করেছেন। তিনি বনু কুরাইযা ও বনু নাযীরকে ভাগ করে দিয়েছেন, মক্কাকে ভাগ করেননি, আর খাইবারের অর্ধেক ভাগ করেছেন এবং অর্ধেক রেখে দিয়েছেন। ইবনু কাইয়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য এখানেই শেষ হলো।
8891 - عن عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ فَاطِمَةَ عليها السلام بِنْتَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَرْسَلَتْ إِلَى أَبِي بَكْرٍ تَسْأَلُهُ مِيرَاثَهَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْهِ بِالْمَدِينَةِ وَفَدَكَ، وَمَا بَقِيَ مِنْ خُمُسِ
خَيْبَرَ، فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ: إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"لَا نُورَثُ، مَا تَرَكْنَا صَدَقَة، إِنَّمَا يَأْكُلُ آلُ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم مِنْ هَذَا الْمَالِ" وَإنِّي وَاللَّهِ لَا أُغَيِّرُ شَيئًا مِن صَدَقَةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَن حَالِهَا الَّتِي كَانَ عَلَيْهَا فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَلأَعْمَلَنَّ فِيهَا بِمَا عَمِلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَبَى أَبُو بَكْرٍ أَنْ يَدْفَعَ إِلَى فَاطِمَةَ مِنْهَا شَيْئًا فَوَجَدَتْ فَاطِمَةُ عَلَى أَبِي بَكْرٍ فِي ذَلِكَ فَهَجَرَتْهُ، فَلَمْ تُكَلِّمْهُ حَتَّى تُوُفِّيَتْ، وَعَاشتْ بَعْدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم سِتَّةَ أَشْهُرٍ، فَلَمَّا تُوُفِّيَتْ، دَفَنَهَا زَوْجُهَا عَلِيٌّ لَيْلًا، وَلَمْ يُؤْذِنْ بِهَا أَبَا بَكْرٍ وَصَلَّى عَلَيْهَا، وَكَانَ لِعَلِيٍّ مِنَ النَّاسِ وَجْه حَيَاةَ فَاطِمَةَ، فَلَمَّا تُوُفِّيَتِ اسْتَنْكَرَ عَلِيٌّ وُجُوهَ النَّاسِ، فَالْتَمَسَ مُصَالَحَةَ أَبِي بَكْرٍ وَمُبَايَعَتَهُ، وَلَمْ يَكُنْ يُبَايعُ تِلْكَ الأَشْهُرَ، فَأَرْسَلَ إِلَى أَبِي بَكْرٍ أَنِ ائْتِنَا، وَلَا يَأْتِنَا أَحَدٌ مَعَكَ، كَرَاهِيَةً لِمَحْضرِ عُمَرَ. فَقَالَ عُمَرُ: لَا وَاللَّهِ! لَا تَدْخُلُ عَلَيْهِمْ وَحْدَكَ. فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ: وَمَا عَسَيْتَهُمْ أَنْ يَفْعَلُوا بِي؟ وَاللَّهِ لآتِيَنَّهُمْ. فَدَخَلَ عَلَيْهِمْ أَبُو بَكْرٍ، فَتَشَهَّدَ عَلِيٌّ فَقَالَ: إِنَّا قَدْ عَرَفْنَا فَضْلَكَ، وَمَا أَعْطَاكَ اللَّهُ، وَلَمْ نَنْفَسْ عَلَيْكَ خَيْرًا سَاقَهُ اللَّهُ إِلَيْكَ، وَلَكِنَّكَ اسْتَبْدَدْتَ عَلَيْنَا بِالأَمْرِ، وَكُنَّا نَرَى لِقَرَابَتِنَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَصِيبًا. حَتَّى فَاضَتْ عَيْنَا أَبِي بَكْرٍ، فَلَمَّا تَكَلَّمَ أَبُو بَكْرٍ قَالَ: وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَقَرَابَةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَحَبُّ إِلَيَّ أَنْ أَصِلَ مِنْ قَرَابَتِي، وَأَمَّا الَّذِي شَجَرَ بَيْنِي وَبَيْنكُمْ مِنْ هَذِهِ الأَمْوَالِ، فَلَمْ آلُ فِيهَا عَنِ الْخَيْرِ، وَلَمْ أَتْرُكْ أَمْرًا رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصنَعُهُ فِيهَا إِلَّا صَنَعْتُهُ. فَقَالَ عَلِيٌّ لأَبِي بَكْر: مَوْعِدُكَ الْعَشِيَّةُ لِلْبَيْعَةِ. فَلَمَّا صَلَّى أَبُو بَكْرٍ الظُّهْرَ رَقِيَ عَلَى الْمِنْبَرِ، فَتَشَهَّدَ وَذَكَرَ شَأْنَ عَلِيٍّ، وَتَخَلُّفَهُ عَنِ الْبَيْعَةِ، وَعُذْرَهُ بِالَّذِي اعْتَذَرَ إِلَيْهِ، ثُمَّ اسْتَغْفَرَ، وَتَشَهَّدَ عَلِيٌّ فَعَظَّمَ حَقَّ أَبِي بَكْرٍ، وَحَدَّثَ أَنَّهُ لَمْ يَحْمِلْهُ عَلَى الَّذِي صَنَعَ نَفَاسَةً عَلَى أَبِي بَكْرٍ، وَلَا إِنْكَارًا لِلَّذِي فَضلَهُ اللَّهُ بِهِ، وَلَكِنَّا نرَى لَنَا فِي هَذَا الأَمْرِ نَصِيبًا، فَاسْتَبَدَّ عَلَيْنَا، فَوَجَدْنَا فِي أَنْفُسِنَا، فَسُرَّ بِذَلِكَ الْمُسْلِمُونَ وَقَالُوا: أَصَبْتَ. وَكَانَ الْمُسْلِمُونَ إِلَى عَلِيٍّ قَرِيبًا، حِينَ رَاجَعَ الأَمْرَ الْمَعْرُوفَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4241، 4240) ومسلم في الجهاد والسير (52: 1759) كلاهما من طريق اللّيث، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة قالت: فذكرته.
وفي الباب عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حدَّثه قال: لما فتحنا خيبر أخرجوا غنائمهم من المتاع والسبي، فجعل الناس يتبايعون غنائمهم، فجاء رجل حين صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله لقد ربحت ربحًا ما ربح اليوم مثله أحد من أهل هذا الوادي. قال:"ويحك وما
ربحت؟" قال: ما زلت أبيع وأبتاع، حتَّى ربحت ثلاث مائة أوقية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنا أنبئك بخير رجل ربح" قال: ما هو يا رسول الله؟ قال:"ركعتين بعد الصّلاة".
رواه أبو داود (2785) ومن طريقه البيهقيّ (6/ 332) عن الربيع بن نافع، حَدَّثَنَا معاوية - يعني ابن سلّام - عن زيد، يعني ابن سلّام أنه سمع أبا سلّام يقول: حَدَّثَنِي عبيد الله بن سلمان أن رجلًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حدَّثه فذكره.
وفي إسناده عبيد الله بن سلمان، لم يرو عنه سوى أبي سلّام الأسود، ولم يوثقه أحد، فهو مجهول، وكذا قال أيضًا الحافظ ابن حجر في"التقريب".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (আলাইহাস সালাম/রাঃ) আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট লোক পাঠালেন তাঁর জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মীরাস (উত্তরাধিকার) থেকে সেই অংশটুকু চাইতে, যা আল্লাহ তাঁকে মদীনা ও ফাদাক থেকে এবং খায়বার-এর এক-পঞ্চমাংশ থেকে ফায় হিসেবে দিয়েছিলেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের কোনো উত্তরাধিকারী হয় না, আমরা যা রেখে যাই তা হলো সাদকা। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গ কেবল এই সম্পদ থেকে খাবেন (জীবনধারণ করবেন)।" আল্লাহর কসম! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাদকাকে সেই অবস্থা থেকে বিন্দুমাত্র পরিবর্তন করব না, যেই অবস্থায় তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ছিল। এবং আমি তাতে সেই আমলই করব, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করতেন। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা থেকে কিছুই দিতে অস্বীকার করলেন। এর ফলে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি অসন্তুষ্ট হলেন এবং তাঁকে বর্জন করলেন। তিনি আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে তাঁর ইন্তেকাল পর্যন্ত কোনো কথা বলেননি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে তিনি ছয় মাস জীবিত ছিলেন। যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তাঁর স্বামী আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাতের বেলা তাঁকে দাফন করলেন। তিনি আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (মৃত্যুর) খবর দেননি এবং (নিজেই) তাঁর জানাযার সালাত পড়ালেন। ফাতিমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জীবদ্দশায় লোকজনের মাঝে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি বিশেষ মর্যাদা ছিল। কিন্তু যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের মুখমণ্ডলকে (তাদের মনোভাবকে) অচেনা মনে করতে লাগলেন। অতঃপর তিনি আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সন্ধি স্থাপন ও তাঁর হাতে বাই’আত করার আগ্রহ প্রকাশ করলেন। এই ছয় মাস তিনি বাই’আত করেননি। তিনি আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে লোক পাঠালেন এই বলে যে, আপনি আমাদের কাছে আসুন, আপনার সাথে অন্য কেউ যেন না আসে। (কারণ) তিনি উমারকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত থাকা অপছন্দ করেছিলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আপনি একা তাদের কাছে যাবেন না। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারা আমার কী-ই বা করতে পারে? আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তাদের কাছে যাব। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে প্রবেশ করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাহ (কালিমা) পাঠ করলেন এবং বললেন: আমরা আপনার মর্যাদা ও আল্লাহ আপনাকে যা দান করেছেন, তা অবশ্যই জানি। আল্লাহ আপনার প্রতি যে কল্যাণ প্রবাহিত করেছেন, তার জন্য আমরা ঈর্ষা করি না। কিন্তু আপনি আমাদের ওপর (খিলাফতের) এই বিষয়ে একক কর্তৃত্ব করেছেন, আর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাদের আত্মীয়তার কারণে এর মধ্যে একটি অংশ পাওয়ার যোগ্য মনে করতাম। এ কথা শুনে আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চোখ থেকে অশ্রু ঝরতে লাগল। যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন, তিনি বললেন: যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমার আত্মীয়ের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখা আমার কাছে অধিক প্রিয়। আর এই সম্পদগুলো নিয়ে আমার ও আপনাদের মধ্যে যে মতপার্থক্য সৃষ্টি হয়েছে, তাতে আমি কল্যাণের কোনো কমতি করিনি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাতে যা করতে দেখেছি, তা ছাড়া আর কিছুই আমি করিনি। এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আজ বিকেলে বাই’আতের জন্য আমাদের সাক্ষাতের সময় ধার্য রইল। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুহরের সালাত আদায় করে মিম্বরে আরোহণ করলেন। তিনি শাহাদাহ পাঠ করলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়টি উল্লেখ করলেন—যে কেন তিনি বাই’আত থেকে বিরত ছিলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে যে কৈফিয়ত দিয়েছিলেন, তা বর্ণনা করলেন, অতঃপর তিনি ক্ষমা চাইলেন। এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাহ পাঠ করলেন এবং আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অধিকারের মর্যাদা দিলেন। তিনি বললেন, তিনি যা করেছেন, তা আবূ বাকরের প্রতি কোনো হিংসার কারণে বা আল্লাহ তাঁকে যে শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন তার অস্বীকারের কারণে নয়; বরং আমরা মনে করতাম যে, এই বিষয়ে আমাদের একটি অংশ রয়েছে, কিন্তু তিনি আমাদের উপর এককভাবে সিদ্ধান্ত নেন। তাই আমরা মনে কষ্ট পেলাম। এতে মুসলিমগণ অত্যন্ত খুশি হলেন এবং বললেন: আপনি ঠিক করেছেন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কল্যাণের দিকে ফিরে এলেন, তখন মুসলিমগণ আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খুব কাছাকাছি হয়ে গেলেন।
[মুত্তাফাকুন আলাইহি: বুখারী, মাগাযী (৪২৪১, ৪২৪০); মুসলিম, জিহাদ ওয়াস সিয়ার (৫২: ১৭৫৯)]
8892 - عن عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ: بَلَغَنَا مَخْرَجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَنَحْنُ بالْيَمَنِ، فَخَرَجْنَا مُهَاجِرِينَ إِلَيْهِ أَنَا، وَأَخَوَانِ لِي أَنَا أَصغَرُهُمْ، أَحَدُهُمَا أَبُو بُرْدَةَ، وَالآخَرُ أَبُو رُهْمٍ - إِمَّا قَالَ: بِضْعٌ وِإمَّا قَالَ: فِي ثَلَاثَةٍ وَخَمْسِينَ، أَوِ اثْنينِ وَخَمْسِينِ رَجُلًا مِنْ قَوْمِي، فَرَكِبْنَا سَفِينَة، فَأَلْقَتْنَا سَفِينَتُنَا إِلَى النَّجَاشِيِّ بِالْحَبَشَةِ، فَوَافَقْنَا جَعْفرَ بْنَ أَبِي طَالِب فَأَقَمْنَا مَعَهُ حَتَّى قَدِمْنَا جَمِيعًا، فَوَافَقْنَا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حِينَ افْتَتَحَ خَيْبَرَ، وَكَانَ أُنَاسٌ مِنَ النَّاسِ يَقُولُونَ لَنَا، - يَعْنِي لأَهْلِ السَّفِينَةِ - سَبَقْنَاكُمْ بِالْهِجْرَةِ، وَدَخَلَتْ أَسمَاءُ بِنْتُ عُمَيْسٍ، وَهيَ مِمَّنْ قَدِمَ مَعَنَا، عَلَى حَفْصَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم زَائِرَةً، وَقَدْ كَانَتْ هَاجَرَتْ إِلَى النَّجَاشِيِّ فِيمَنْ هَاجَرَ، فَدَخَلَ عُمَرُ عَلَى حَفْصَةَ وَأَسْمَاءُ عِنْدَهَا، فَقَالَ عُمَرُ حِينَ رَأَى أَسْمَاءَ: مَنْ هَذِهِ؟ قَالَتْ: أَسمَاءُ بِنْتُ عُمَيْسٍ. قَالَ عُمَرُ: الْحَبَشِيَّةُ هَذِهِ، الْبَحْرِيَّةُ هَذِهِ؟ قَالَتْ أَسْمَاءُ: نَعَمْ. قَالَ: سَبَقْنَاكُمْ بِالْهِجْرَةِ، فَنَحْنُ أَحَقُّ بِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْكُمْ. فَغَضِبَتْ وَقَالَتْ: كَلَّا وَاللَّهِ، كُنْتُمْ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُطْعِمُ جَائِعَكُمْ، وَيَعِظُ جَاهِلَكُمْ، وَكُنَّا فِي دَارٍ - أَوْ فِي أَرْضِ - الْبُعَدَاءِ الْبُغَضَاءِ بِالْحَبَشَةِ، وَذَلِكَ فِي اللهِ وَفِي رَسُولِهِ صلى الله عليه وسلم وَايْمُ اللَّهِ، لَا أَطْعَمُ طَعَامًا، وَلَا أَشْرَبُ شَرَابًا حَتَّى أَذْكُرَ مَا قُلْتَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَنَحْنُ كُنَّا نُؤْذَى وَنُخَافُ، وَسَأَذْكُرُ ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَأَسْأَلُهُ، وَاللَّهِ لَا أَكْذِبُ وَلَا أَزِيغُ وَلَا أَزِيدُ عَلَيْهِ. فلمّا جاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قالت: يا نبي الله، إن عمر قال كذا وكذا؟ قال:"فما قلت له؟" قالت: قلت له: كذا وكذا، قال:"ليس بأحق بي منكم، وله ولأصحابه هجرة واحدة، ولكم أنتم - أهل السفينة - هجرتان" قالت: فلقد رأيت أبا موسى وأصحاب السفينة يأتونني أرسالا، يسألونني عن هذا الحديث، ما من الدُّنيا شيء هم به أفرح ولا أعظم في أنفسهم مما قال لهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. قال أبو بردة: قالت أسماء: فلقد رأيت أبا موسى وإنه ليستعيد هذا الحديث مني.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4231، 4235) ومسلم في فضائل الصّحابة (169: 2503، 2552) كلاهما عن محمد بن العلاء، حَدَّثَنَا أبو أسامة، حَدَّثَنِي بريد بن عبد الله عن
أبي بردة، عن أبي موسى قال: فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা ইয়ামানে ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মদীনায় আগমনের) খবর আমাদের কাছে পৌঁছল। তাই আমরা তাঁর দিকে হিজরত করার জন্য বের হলাম—আমি এবং আমার দুই ভাই। তাদের মধ্যে আমি ছিলাম সবচেয়ে ছোট। একজন ছিলেন আবূ বুরদাহ এবং অন্যজন আবূ রুহম। [বর্ণনাকারী বলেন] তিনি হয় 'কিছু সংখ্যক' বলেছেন, নয়তো বলেছেন, আমার গোত্রের ৫২ কিংবা ৫৩ জন লোককে নিয়ে। আমরা জাহাজে আরোহণ করলাম। আমাদের জাহাজটি আমাদেরকে আবিসিনিয়ার (হাবশা) নাজ্জাশীর কাছে পৌঁছে দিল। সেখানে আমরা জা'ফর ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা পেলাম। আমরা তাঁর সাথে অবস্থান করলাম, অবশেষে আমরা সবাই একসাথে (মদীনায়) এসে পৌঁছলাম। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তখন পেলাম, যখন তিনি খায়বার বিজয় করলেন।
কিছু লোক আমাদের—অর্থাৎ জাহাজের লোকদের—বলত: হিজরতের ব্যাপারে আমরা তোমাদের চেয়ে অগ্রগামী।
আসমা বিনতু উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি আমাদের সাথে এসেছিলেন এবং তিনিও হিজরতকারীদের সাথে নাজ্জাশীর কাছে হিজরত করেছিলেন—তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে সাক্ষাৎ করতে গেলেন।
এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলেন। তখন আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে উপস্থিত ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখে জিজ্ঞেস করলেন: ইনি কে? হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইনি আসমা বিনতু উমাইস। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইনিই কি সেই হাবশার মহিলা? ইনিই কি সেই সমুদ্রের পথযাত্রী? আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হিজরতের ব্যাপারে আমরা তোমাদের চেয়ে অগ্রগামী। সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর আমাদের হক তোমাদের চেয়ে বেশি।
এতে আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হয়ে বললেন: কক্ষনো না, আল্লাহর কসম! আপনারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন, তিনি আপনাদের ক্ষুধার্তদের খাওয়াতেন এবং আপনাদের মূর্খদের উপদেশ দিতেন। আর আমরা আল্লাহর এবং তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য আবিসিনিয়ার সেই দূরবর্তী ঘৃণিত ভূমিতে বা বাড়িতে ছিলাম। আল্লাহর কসম! আমি খাবার খাব না এবং পানীয় পান করব না, যতক্ষণ না আপনার বলা এই কথাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করি। আমরা সেখানে কষ্ট পেতাম এবং ভীত থাকতাম। আমি অবশ্যই এ বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করব এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করব। আল্লাহর কসম, আমি মিথ্যা বলব না, বানোয়াট কথা বলব না এবং এর সাথে অতিরিক্ত কিছু যোগ করব না।
যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন, তখন তিনি (আসমা) বললেন: হে আল্লাহর নবী! উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন এমন কথা বলেছেন। তিনি (নবী) জিজ্ঞেস করলেন: তুমি তাকে কী বলেছ? তিনি বললেন: আমি তাঁকে এমন এমন কথা বলেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তিনি তোমাদের চেয়ে আমার কাছে বেশি হকদার নন। তাঁর এবং তাঁর সাথীদের জন্য একটি হিজরত হয়েছে, আর তোমাদের—অর্থাৎ জাহাজের লোকদের জন্য—দুটি হিজরত হয়েছে।
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর আমি আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং জাহাজের সাথীদের দলবদ্ধভাবে আমার কাছে আসতে দেখেছি এবং এই হাদীস সম্পর্কে আমাকে জিজ্ঞাসা করতে দেখেছি। দুনিয়ার আর কোনো কিছুই তাদের কাছে এত আনন্দদায়ক বা গুরুত্বপূর্ণ ছিল না, যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য বলেছেন।
আবূ বুরদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছি, তিনি বারবার আমার কাছ থেকে এই হাদীসটি জানতে চাইতেন।
8893 - عن أبي هريرة قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بخيبر بعد ما افتتحوها فقلت: يا رسول الله! أسهم لي، فقال بعض بني سعيد بن العاص: لا تسهم له يا رسول الله! فقال أبو هريرة: هذا قاتل ابن قوقل، فقال ابن سعيد بن العاص: واعجبًا لوبر تدلى من قدوم ضأن، ينعى عليّ قتل رجل مسلم أكرمه الله على يدي، ولم يُهِنِّي على يديه، قال: فلا أدري أسهم له أم لم يسهم له.
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2827) عن الحميدي، حَدَّثَنَا سفيان، حَدَّثَنَا الزّهري، قال: أخبرني عنبسة بن سعيد، عن أبي هريرة قال: فذكره.
"ابن قوقل" اسمه النعمان بن مالك بن ثعلبة وقوقل لقب ثعلبة، استشهد يوم أحد.
"بعض بني سعيد بن العاص" هو أبان بن سعيد.
قوله:"لوبر تدلى علينا من قدوم ضأن" الوبر: دابة صغيرة كالسنور وحشية، أراد أبان بهذا تحقير أبي هريرة.
"وتدلى" كأنه يقول: تهجم علينا بغتة.
"وقدوم ضأن" أي طرف ضأن وأمّا الضأن فقيل: هو رأس الجبل لأنه في الغالب مرعى الغنم، وميل: هو بغير همز، جبل لدوس قوم أبي هريرة.
وجاء في رواية باللام، الضال بدل النون ومعناه السدر البري.
قوله:"أكرمه الله على يدي .." يعني أن النعمان بن مالك بن قوقل استشهد بيد أبان فأكرمه الله بالشهادة، ولم يقتل أبان على كفره فيدخل النّار وهو المراد بالإهانة، بل عاش أبان حتَّى تاب وأسلم.
قوله:"لا أدري أسهم له أم لم يسهم له" القائل هو ابن عيينة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খায়বার বিজয়ের পর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম, যখন তিনি খায়বারেই ছিলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য (গনীমতের) অংশ বরাদ্দ করুন। তখন সাঈদ ইবনুল আসের বংশের কেউ একজন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তার জন্য অংশ বরাদ্দ করবেন না। তখন আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এ লোকটি তো ইবনু কুওক্বালের হত্যাকারী। তখন সাঈদ ইবনুল আসের পুত্রটি বলল: আশ্চর্য! একটি 'ওয়া'বার' (ছোট বন্য প্রাণী) মেষের চূড়া থেকে ঝুলে এসে আমাকে এমন এক মুসলিম হত্যার জন্য তিরস্কার করছে, যাকে আল্লাহ তাআলা আমার হাতে সম্মানিত করেছেন (শাহাদাত দান করেছেন), কিন্তু আমাকে তার হাতে লাঞ্ছিত করেননি! (বর্ণনাকারী) বলেন: আমি জানি না, তিনি তাকে অংশ বরাদ্দ করেছিলেন নাকি করেননি।
8894 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أبان بن سعيد بن العاص على سرية من المدينة قبل نجد، فقدم أبان بن سعيد وأصحابه على رسول الله صلى الله عليه وسلم بخيبر بعد أن فتحها، وإن حزم خيلهم ليف، فقال أبان: اقسم لنا يا رسول الله، قال أبو هريرة: فقلت: لا تقسم لهم يا رسول الله، فقال أبان: أنت بها يا وبر تحدر علينا من رأس ضال، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"اجلس يا أبان" ولم يقسم لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود في الجهاد (2723) عن سعيد بن منصور وهو في سننه (2/ 285) حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن محمد بن الوليد الزبيدي، عن الزّهري، أن عنبسة بن سعيد أخبره أنه سمع
أبا هريرة يحدّث: سعيد بن العاص أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث: فذكره. ومن طريق أبي داود البيهقيّ في الكبرى (6/ 334).
ورواه البخاريّ في المغازي (4238) معلقًا عن الزبيدي، عن الزهري به.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عَيَّاش فإنه حسن الحديث في روايته عن أهل بلده، وهذا منها.
كذا في رواية الزبيدي: أنه لم يسهم له بدون شك، ولكن الثابت في كتب السير والمغازي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أعطى أبا هريرة وبعض الدوسيين من المغانم برضى الغانمين، كما أن في هذه الرواية أن أبا هريرة هو السائل أن يقسم له، وأن أبان هو الذي أشار بمنعه، وفي رواية الزبيدي أن أبان هو الذي سأل، وأن أبا هريرة هو الذي أشار بمنعه، وقد رجّح الذهلي رواية الزبيدي، ويؤيد ذلك وقوع التصريح في روايته بقول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"يا أبان اجلس" ولم يقسم لهم، ويحتمل أن يجمع بينهما بأن يكون كل من أبان وأبي هريرة أشار أن لا يقسم للآخر، ويدل عليه أن أبا هريرة احتج على أبان بأنه قاتل ابن قوقل، وأبان احتج على أبي هريرة بأنه ليس ممن له في الحرب يد. يستحق بها النفل، فلا يكون فيه قلب. الفتح (7/ 492 - 493).
قلت: ويجوز للإمام أن يعطي بعض الناس الذين لم يشاركوا القتال تطييبًا لخاطرهم وتأليفا لقلوبهم كما فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم جمع أصحاب السفينة جعفر وأصحابه. وكما أعطى أبا هريرة رضى الله عنه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবান ইবনু সাঈদ ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মদীনা থেকে নজদের দিকে একটি ক্ষুদ্র সেনাবাহিনীর (সারিয়্যা) প্রধান করে প্রেরণ করলেন। আবান ইবনু সাঈদ এবং তাঁর সাথীরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট খায়বার বিজয়ের পর সেখানে উপস্থিত হলেন, আর তাদের ঘোড়ার লাগাম ছিল খেজুর গাছের আঁশের তৈরি। তখন আবান বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের জন্য (গনীমতের অংশ) বন্টন করুন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! তাদের জন্য বন্টন করবেন না। তখন আবান বললেন: ওহে পাথরবাসী প্রাণী (ধাল নামক উঁচু স্থানের প্রাণী), তুমিও এর (বন্টনের) মধ্যে? তুমি তো আমাদের উপর উঁচু স্থান থেকে নেমে এসেছো! তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে আবান! বসে যাও।" আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য (গনীমত) বন্টন করলেন না।
8895 - عن عمير مولى آبي اللحم قال: شهدت خيبر مع سادتي، فكلموا فيّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وكلموه أني مملوك، قال: فأمر بي، فقلدت السيف، فإذا أنا أجره، فأمر لي بشيء من خرثي المتاع، وعرضت عليه رقية كنت أرقي بها المجانين، فأمرني بطرح بعضها، وحبس بعضها.
وفي رواية: وأعطاني خرثي متاع ولم يسهم لي.
صحيح: رواه أبو داود (2730) والتِّرمذيّ (1557) وابن ماجة (2855) والنسائي في الكبرى (7493) وصحّحه ابن حبَّان (4831) والحاكم (1/ 327) كلّهم من طرق عن محمد بن زيد، عن عمير مولى أبي اللحم فذكره.
وإسناده صحيح وذكر في بعض المصادر"حنين" بدل"خيبر".
وقوله:"خرثي المتاع": أثاث البيت كالقدر ونحوه.
উমায়ের (আবী আল-লাহমের আযাদকৃত গোলাম) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার মনিবদের সাথে খায়বার যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। তারা আমার ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে জানালেন যে আমি একজন গোলাম। তিনি (উমায়ের) বলেন: তখন তিনি আমার বিষয়ে নির্দেশ দিলেন এবং আমাকে তরবারি পরানো হলো। আমি দেখলাম যে আমি সেটি টেনে নিয়ে যাচ্ছিলাম। এরপর তিনি আমাকে গৃহস্থালীর ভাঙা-চুরা কিছু সামগ্রী (খরথি আল-মাতা') দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। আমি তাঁর সামনে একটি রুকইয়া (ঝাড়-ফুঁক) পেশ করলাম যা দিয়ে আমি পাগলদের ঝাড়তাম। তখন তিনি আমাকে সেটির কিছু অংশ বর্জন করতে এবং কিছু অংশ রেখে দিতে আদেশ করলেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি আমাকে ভাঙা-চুরা সামগ্রী দিয়েছিলেন কিন্তু আমাকে (গনিমতের) কোনো অংশ দেননি।
8896 - عن أبي ليلى قال: شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتح خيبر، فلمّا انهزموا وقعنا في
رحالهم، فأخذ الناس ما وجدوا من خرثي، فلم يكن أسرع من أن فارت القدور. قال: فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالقدور فأكفئت وقسم بيننا، فجعل لكل عشرة شاة.
صحيح: رواه أحمد (19058) والدارمي (2513) والحاكم (2/ 134) من طريق زكريا بن عدي، حَدَّثَنَا عبيد الله بن عمرو الرقي، عن زيد بن أبي أُنَيسة، عن قيس بن مسلم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبيه فذكره، واللّفظ لأحمد.
وإسناده صحيح واختلف فيه على عبيد الله بن عمرو الرقي. لكن قال الدَّارميّ: الصواب عندي ما قال زكريا في الإسناد.
وقال الحاكم: حديث صحيح الإسناد.
আবূ লায়লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খায়বার বিজয়ে উপস্থিত ছিলাম। যখন তারা পরাজিত হলো, তখন আমরা তাদের মালপত্রের ওপর কর্তৃত্ব লাভ করলাম। লোকেরা সেখানে যা কিছু পেল, তা থেকে জিনিসপত্র নিলো। দ্রুতই হাঁড়িগুলো ফুটতে শুরু করলো (যখন তারা রান্না করছিল)। তিনি (আবূ লায়লা) বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাঁড়িগুলো উল্টিয়ে ফেলার নির্দেশ দিলেন এবং (গনীমতের পশু) আমাদের মাঝে বন্টন করে দিলেন। তিনি প্রতি দশজনের জন্য একটি করে বকরী নির্ধারণ করলেন।
8897 - عن ثابت بن الحارث الأنصاري قال: قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم خيبر لسهلة بنت عاصم بن عدي ولابنة لها وُلدتْ.
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (2/ 75) عن عليّ بن عبد العزيز، ثنا الحسن بن الربيع الكوفي، ثنا ابن المبارك، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد الحضرمي، عن ثابت بن الحارث فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة فإن رواية العبادلة منهم ابن المبارك عنه حسن.
وقد ثبت أيضًا في صحيح مسلم (1812) أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أعطى النساء اللآئي كن يداوين الجرحى من الغنيمة، أما السهم فلم يضرب لهن.
وأمّا ما رُوي عن زينب امرأة عبد الله الثقفية أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أعطاها بخيبر خمسين وسقا تمرًا، وعشرين وسقًا شعيرًا بالمدينة. فلا يصح.
رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 287) وابن أبي شيبة في المصنف (21426) من طريق وكيع بن الجراح، عن أبي العميس، عن يزيد بن جعدبة، عن عبيد بن السباق، عن زينب امرأة عبد الله فذكرته.
وأبو العميس هو عتبة بن عبد الله بن عتبة بن عبد الله بن مسعود الهذلي.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 7): رجاله رجال الصَّحيح.
قلت: ليس كما قال فإن يزيد بن جعدبة ليس من رجال الصَّحيح. قيل إنه يزيد بن عياض بن جعدبة. وقد كذبه مالك وروى له الترمذيّ وابن ماجة.
وقال البخاريّ: منكر الحديث. وقال النسائيّ: متروك.
وقيل: إنه جد يزيد بن عياض بن يزيد بن جعدبة، فإن كان هو فهو لا يعرف، ترجم له ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 255) ولم يذكر فيه جرحًا أو تعديلًا. وليس له رواية في الكتب الستة.
সাবেত ইবনুল হারিস আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের দিন সাহলা বিনত আসিম ইবনে আদী এবং তার সদ্য ভূমিষ্ঠ হওয়া এক কন্যার জন্য অংশ (ভাগ) বণ্টন করে দিয়েছিলেন।
8898 - عن محمد بن أبي المجالد قال: بعثني أهل المسجد إلى ابن أبي أوفى أسأله ما صنع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في طعام خيبر، فأتيته، فسألته عن ذلك، قال: وقلت: هل خَمَّسَه؟ قال: لا، كان أقل من ذلك، وكان أحدنا إذا أراد منه شيئًا أخذ حاجته.
وفي لفظ: فكان الرّجل يجيء، فيأخذ منه مقدار ما يكفيه ثمّ ينصرف.
صحيح: رواه أبو داود (2704) وأحمد (19124) وصحّحه الحاكم (2/ 126) من طريقين عن أبي إسحاق الشيباني، عن محمد بن أبي المجالد فذكره، واللّفظ الأحمد، واللّفظ الثاني لأبي داود والحاكم. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم: صحيح على شرط البخاري، فقد احتج بمحمد وعبد الله ابني أبي المجالد جميعًا.
قلت: جعل الحاكم عبد الله ومحمدًا اثنين من أبناء أبي المجالد، والصواب أنه شخص واحد إنما اختلف في اسمه.
انظر للمزيد: تهذيب التهذيب (5/ 388 - 389)
ইবন আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবন আবী আল-মুজাল্লিদ বলেন: মসজিদের লোকেরা আমাকে ইবন আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠাল, তাঁকে জিজ্ঞাসা করার জন্য যে, খাইবারের খাদ্যশস্যের ব্যাপারে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী করেছিলেন। আমি তাঁর কাছে আসলাম এবং তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তিনি কি এর এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) গ্রহণ করেছিলেন? তিনি বললেন: না, এর পরিমাণ এর চেয়ে কম ছিল। আমাদের মধ্যে কেউ যখন তা থেকে কিছু নিতে চাইত, তখন সে তার প্রয়োজনমতো নিয়ে নিত।
অন্য বর্ণনায় আছে: লোকটি আসত, সে তার জন্য যথেষ্ট পরিমাণ খাদ্য নিত এবং তারপর চলে যেত।
8899 - عن عائشة قالت: لما فتحت خيبر قلنا: الآن نشبع من التمر.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4242) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا حرمي، حَدَّثَنَا شعبة، قال: أخبرني عمارة، عن عكرمة، عن عائشة قالت: فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন খায়বার জয় হলো, তখন আমরা বললাম: এখন আমরা খেজুর খেয়ে পেট ভরে খাব।
8900 - عن ابن عمر قال: ما شبعنا حتَّى فتحنا خيبر.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4243) عن الحسن، حَدَّثَنَا مرة بن حبيب، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খায়বার বিজয় না হওয়া পর্যন্ত আমরা পেট ভরে খেতে পাইনি।
8901 - عن أَنَسٍ قَالَ: لَمَّا قَدِمَ الْمُهَاجِرُونَ الْمَدِينَةَ مِنْ مَكَّةَ وَلَيْسَ بِأَيْدِيهِمْ شيء وَكَانَتِ الأَنْصَارُ أَهْلَ الأَرْضِ وَالْعَقَارِ، فَقَاسَمَهُمُ الأَنْصَارُ عَلَى أَنْ أعْطَوهُمْ أنصاف ثِمَارِ أَمْوَالِهِمْ كُلَّ عَامٍ وَيَكْفُوهُمُ الْعَمَلَ وَالْمَؤُونَةَ، وَكَانَتْ أُمُّ أَنَسٍ وهي تدعى أُمُّ سلَيْمٍ وكَانَتْ أُمَّ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، كَانَ أَخًا لأَنَسٍ لأمه، وكَانَتْ أَعْطَتْ أُمُّ أَنَسٍ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عِذَاقًا لها، فَأَعْطَاهُنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أُمَّ أَيْمَنَ مَوْلَاتَهُ أُمَّ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدِ.
قَالَ ابْنُ شِهَابٍ فَأَخْبَرَنِي أَنَسُ بْنُ مَالِكٍ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمَّا فَرَغَ مِنْ قَتْلِ أَهْلِ خَيْبَرَ وانْصَرَفَ إِلَى الْمَدِينَةِ، رَدَّ الْمُهَاجِرُونَ إِلَى الأَنْصَارِ مَنَائِحَهُمُ الَّتِي كَانُوا مَنَحُوهُمْ مِنْ
ثِمَارِهِمْ فَرَدَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم إِلَى أُمِّهِ عِذَاقَهَا، وَأَعْطَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أُمَّ أَيْمَنَ مَكَانَهُنَّ مِنْ حَائِطِهِ.
قال ابن شهاب: وكان من شأن أم أيمن، أم أسامة بن زيد، أنها كانت وصيفة لعبد الله بن عبد المطلب، وكانت من الحبشة، فلمّا ولدت آمنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، بعدما توفي أبوه، فكانت أم أيمن تحضنه، حتَّى كبَّر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأعتقها، ثمّ أنكحها زيد بن حارثة، ثمّ توفيت بعد ما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم بخمسة أشهر.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2630) ومسلم في الجهاد والسير (70: 1771) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মুহাজিরগণ মক্কা থেকে মদীনায় এলেন, তখন তাদের হাতে কিছুই ছিল না। আর আনসারগণ ছিলেন জমিন ও স্থাবর সম্পত্তির মালিক। তাই আনসারগণ মুহাজিরদের সাথে এই শর্তে ভাগ করে নিলেন যে, তারা প্রতি বছর তাদের ফসলের অর্ধেক ফল মুহাজিরদের দেবেন এবং মুহাজিরদের কাজ ও ভরণ-পোষণের দায়িত্ব আনসারগণ বহন করবেন।
আনাসের মা, যার নাম উম্মু সুলাইম, যিনি ছিলেন আবদুল্লাহ ইবনে আবি তালহার মা (আর আবদুল্লাহ ছিলেন আনাসের বৈমাত্রেয় ভাই), তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার কিছু খেজুর গাছের বাগান দান করেছিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা উসামা ইবনে যায়েদের মা তাঁর আযাদকৃত দাসী উম্মে আইমানকে দিয়ে দিলেন।
ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারবাসীকে হত্যা করা শেষ করলেন এবং মদীনায় ফিরে এলেন, তখন মুহাজিরগণ আনসারদেরকে তাদের সেই দানগুলো ফিরিয়ে দিলেন, যা আনসারগণ তাদের ফল-ফসল থেকে দান করেছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনাসের মাকে তার খেজুরের বাগান ফিরিয়ে দিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে আইমানকে তার (আনাসের মায়ের) বাগানের পরিবর্তে তাঁর নিজের বাগান থেকে অন্য সম্পত্তি দিলেন।
ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: উসামা ইবনে যায়েদের মা উম্মে আইমানের ঘটনা ছিল এই যে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের দাসী ছিলেন এবং তিনি ছিলেন আবিসিনিয়ার (হাবশা) অধিবাসী। তাঁর পিতা (আব্দুল্লাহ) ইন্তেকাল করার পর যখন আমিনা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জন্ম দিলেন, তখন উম্মে আইমান তাঁকে লালন-পালন করতেন, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বড় হলেন। এরপর তিনি তাকে আযাদ করে দিলেন এবং তাঁকে যায়িদ ইবনে হারিসার সঙ্গে বিবাহ দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তেকালের পাঁচ মাস পরে তিনি মারা যান।
8902 - عن عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم غَزَا خَيْبَرَ، قال: فَصَلَّيْنَا عِنْدَهَا صَلَاةَ الْغَدَاةِ بِغَلَسٍ، فَرَكِبَ نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَرَكِبَ أَبُو طَلْحَةَ، وَأَنَا رَدِيفُ أَبِي طَلْحَةَ، فَأَجْرَى نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي زُقَاقِ خَيْبَرَ، وَإنَّ رُكْبَتِي لَتَمَسُّ فَخِذَ نَبِيِّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وانحَسَرَ الإِزَارُ عَنْ شَخِذِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فإِنِّي لأرى بَيَاضَ فَخِذِ نَبِيِّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَلَمَّا دَخَلَ الْقَرْيَةَ قَالَ:"اللَّهُ أَكْبَرُ، خَرِبَتْ خَيْبَرُ، إِنَّا إِذَا نَزَلْنَا بِسَاحَةِ قَوْمٍ فَسَاءَ صَبَاحُ الْمُنْذَرِينَ". قَالَهَا ثَلَاث مرات. قَالَ: وَخَرَجَ الْقَوْمُ إِلَى أَعْمَالِهِمْ فَقَالُوا: مُحَمَّدٌ، والله!
قَالَ عَبْدُ الْعَزِيزِ: وَقَالَ بَعْضُ أَصْحَابِنَا: محمد وَالْخَمِيسُ.
قَالَ: وأَصَبْنَاهَا عَنْوَةً، وجُمِعَ السَّبْيُ، فَجَاءَ دِحْيَةُ فَقَالَ: يَا رسول اللَّهِ! أَعْطِنِي جَارِيَةً مِنَ السَّبْيِ. قَال:"اذْهَبْ فخُذْ جَارِيَةً". فَأَخَذَ صَفِيَّةَ بِنْتَ حُيَيٍّ، فَجَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِي صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: يَا نَبِيَّ اللَّهِ! أَعْطَيْتَ دِحْيَةَ صَفِيَّةَ بِنْتَ حُيَيٍّ سَيِّدَةَ قُرَيْظَةَ وَالنَّضِيرِ؟ ما تَصْلُحُ إِلَّا لَكَ. قَال:"ادْعُوهُ بِهَا" فَجَاءَ بِهَا، فَلَمَّا نَظَرَ إِلَيْهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"خُذْ جَارِيَةً مِنَ السَّبْي غَيْرَهَا". قَالَ: وأَعْتَقَهَا وَتَزَوَّجَهَا.
فَقَال لَهُ ثَابِتٌ: يَا أَبَا حَمْزَةَ! مَا أَصْدَقَهَا؟ قَال: نَفْسَهَا، أَعْتَقَهَا وَتَزَوَّجَهَا، حَتَّى إِذَا كَانَ بِالطَّرِيقِ جَهَّزَتْهَا لَهُ أُمُّ سُلَيْمٍ فَأَهْدَتْهَا لَهُ مِنَ اللَّيْلِ، فَأَصْبَحَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَرُوسًا فَقَالَ:"مَنْ كَانَ عِنْدَهُ شَىْءٌ فَلْيَجِئْ بِهِ". وَبَسَطَ نِطَعًا، قال: فَجَعَلَ الرَّجُلُ يَجِيءُ بالأقط، وجَعَلَ الرَّجُلُ يَجِيءُ بِالتَّمْرِ، وَجَعَلَ الرَّجُلُ يَجِيءُ بِالسَّمْنِ، فَحَاسُوا حَيْسًا، فَكَانَتْ وَليمَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (371) ومسلم في النكاح (84: 1365) كلاهما من طريق
إسماعيل ابن علية قال: حَدَّثَنَا عبد العزيز بن صُهَيب، عن أنس قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম খায়বার যুদ্ধ করেন। তিনি (আনাস) বলেন: আমরা তখন ফজরের সালাত 'গালাস'-এর সময় (অন্ধকার থাকতে) আদায় করলাম। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করলেন এবং আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আরোহণ করলেন, আর আমি ছিলাম আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে সহ-আরোহী। এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের রাস্তায় দ্রুত ঘোড়া চালালেন। আমার হাঁটু আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উরুর সাথে স্পর্শ করছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইযার (লুঙ্গি) তাঁর উরু থেকে সরে গিয়েছিল। আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উরুর শুভ্রতা দেখতে পাচ্ছিলাম।
যখন তিনি জনপদের কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন বললেন: "আল্লাহু আকবার, খায়বার ধ্বংস হলো! আমরা যখন কোনো কওমের আঙ্গিনায় অবতরণ করি, তখন সতর্কীকৃতদের সকাল বড়ই মন্দ হয়।" তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন।
তিনি (আনাস) বলেন: লোকেরা তাদের কাজকর্মে বের হলো এবং (বিস্ময়ে) বলল: আল্লাহর কসম! মুহাম্মাদ! আব্দুল আযীয বলেন: আমাদের কয়েকজন সঙ্গী বলেছেন: মুহাম্মাদ এবং সেনাবাহিনী।
তিনি (আনাস) বলেন: আমরা জোরপূর্বক তা (খায়বার) জয় করলাম এবং যুদ্ধবন্দীদের একত্রিত করা হলো। এরপর দিহইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! বন্দীদের মধ্য থেকে আমাকে একটি দাসী দিন। তিনি বললেন: "যাও, একটি দাসী নিয়ে নাও।" ফলে তিনি সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইকে নিয়ে নিলেন।
তখন একজন ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি দিহইয়াহকে কুরাইযা ও নাযীর গোত্রের নেত্রী সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইকে দিয়ে দিয়েছেন? তিনি তো কেবল আপনার জন্যই উপযুক্ত। তিনি বললেন: "তাকে তার (সাফিয়্যাহকে) সাথে নিয়ে আসতে বলো।" সে তাকে নিয়ে এলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁকে দেখলেন, তখন বললেন: "এর বদলে বন্দীদের মধ্য থেকে অন্য কোনো দাসী নিয়ে নাও।" তিনি (আনাস) বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) আযাদ করলেন এবং তাঁকে বিবাহ করলেন।
তখন সাবিত (তাঁকে) বললেন: হে আবূ হামযাহ (আনাস)! তিনি তাঁকে কী মাহর দিয়েছিলেন? তিনি (আনাস) বললেন: তাঁর আযাদীই ছিল তাঁর মাহর, তিনি তাঁকে মুক্ত করে বিবাহ করেছিলেন। যখন তাঁরা রাস্তায় ছিলেন, তখন উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য প্রস্তুত করলেন এবং রাতের বেলা তাঁকে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অর্পণ করলেন। সকালে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাসরকারী (নববিবাহিত) অবস্থায় উপনীত হলেন। তিনি বললেন: "যার কাছে কোনো কিছু (খাবার) আছে, সে যেন তা নিয়ে আসে।" এরপর তিনি চামড়ার দস্তরখান বিছালেন। তিনি (আনাস) বলেন: একজন লোক 'আকিত' (শুকনো পনির), একজন লোক খেজুর এবং একজন লোক ঘি নিয়ে আসতে লাগল। অতঃপর তারা (সবকিছু মিশিয়ে) 'হায়স' (এক ধরনের খাবার) তৈরি করল। আর সেটাই ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওয়ালীমা (বিবাহের ভোজ)।
8903 - عن أنس يقول: سبى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صفية فأعتقها وتزوجها.
فقال ثابت لأنس: ما أصدقها؟ قال: أصدقها نفسها فأعتقها.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4201) عن آدم، حَدَّثَنَا شعبة، عن عبد العزيز بن صُهَيب، قال: سمعت أنس بن مالك يقول: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যাকে (যুদ্ধবন্দী হিসেবে) গ্রহণ করেন, অতঃপর তাঁকে মুক্ত করে দেন এবং তাঁকে বিবাহ করেন। তখন সাবেত আনাসকে জিজ্ঞেস করলেন: তাঁকে কী মোহর প্রদান করেছিলেন? তিনি বললেন: তাঁকে মুক্ত করে দেওয়াই ছিল তাঁর মোহর।
8904 - عن عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ: قَدِمْنَا خَيْبَرَ، فَلَمَّا فَتَحِ اللَّهُ عَلَيْهِ الْحِصنَ ذُكِرَ لَهُ جَمَالُ صَفِيَّةَ بِنْتِ حُيَيِّ بْنِ أَخْطَبَ، وَقَدْ قُتِلَ زَوْجُهَا وَكَانتْ عَرُوسًا، فَاصْطَفَاهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم لِنَفْسِهِ، فَخَرَجَ بِهَا، حَتَّى بَلَغْنَا سَدَّ الصَّهْبَاءِ حَلَّتْ، فَبَنَى بِهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، ثُمَّ صَنَعَ حَيْسًا فِي نِطَعٍ صَغِيرٍ، ثُمَّ قَالَ لِي:"آذِنْ مَنْ حَوْلَكَ". فَكَانَتْ تِلْكَ وَلِيمَتَهُ عَلَى صَفِيَّةَ، ثمَّ خَرَجْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ، فَرَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يُحَوِّي لَهَا وَرَاءَهُ بِعَبَاءَةٍ، ثُمَّ يَجْلِسُ عِنْدَ بَعِيرِهِ، فَيَضَعُ رُكْبَتَهُ، وَتَضَعُ صَفِيَّةُ رِجْلَهَا عَلَى رُكْبَتِهِ حَتَّى تَرْكَبَ.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4211) من طريقين عن يعقوب بن عبد الرحمن الزّهري، عن عمرو مولى المطلب، عن أنس فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা খায়বারে পৌঁছলাম। যখন আল্লাহ তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) হাতে দুর্গটি বিজয় দান করলেন, তখন তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) নিকট সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াই ইবনে আখতাবের সৌন্দর্যের কথা উল্লেখ করা হলো, যার স্বামী নিহত হয়েছিল এবং তিনি ছিলেন নব বিবাহিতা। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নিজের জন্য মনোনীত করলেন এবং তাঁকে নিয়ে রওনা হলেন। আমরা সহবা নামক স্থানে পৌঁছলে তিনি (সাফিয়্যাহ) মাসিক থেকে পবিত্র হলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে বাসর যাপন করলেন। এরপর তিনি একটি ছোট চামড়ার দস্তরখানে 'হাইস' (খেজুর, পনির ও ঘি মিশ্রিত খাদ্য) তৈরি করলেন। অতঃপর তিনি আমাকে বললেন, "তোমার আশেপাশে যারা আছে, তাদের দাওয়াত দাও।" সেটিই ছিল সাফিয়্যাহর জন্য তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) ওয়ালীমা (বিবাহের ভোজ)। অতঃপর আমরা মদীনার দিকে রওনা হলাম। আমি দেখলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি চাদর দ্বারা সাফিয়্যাহর জন্য তাঁর পিছনে (উটের পিঠে) একটি পর্দা তৈরি করছেন। এরপর তিনি তাঁর উটের পাশে বসলেন এবং নিজের হাঁটু স্থাপন করলেন। আর সাফিয়্যাহ তাঁর হাঁটুর উপর পা রেখে আরোহণ করলেন।
8905 - عن أنس قال: صارَتْ صَفِيَّةُ لِدِحْيَةَ فِي مَقْسَمِهِ وَجَعَلُوا يَمْدَحُونَهَا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. قَالَ: - وَيَقُولُونَ مَا رَأَيْنَا فِي السَّبْي مِثْلَهَا. قَالَ: فَبَعَثَ إِلَى دِحْيَةَ فَأَعْطَا بِهَا مَا أَرَادَ، ثُمَّ دَفَعَهَا إِلَى أمِّي فَقَالَ:"أَصْلِحِيهَا". قَالَ: ثُمَّ خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ خَيْبَرَ حَتَّى إِذَا جَعَلَهَا فِي ظَهْرِهِ نَزَلَ، ثُمَّ ضَرَبَ عَلَيْهَا الْقُبَّةَ، فَلَمَّا أَصْبَحَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"مَنْ كَانَ عِنْدَهُ فَضْلُ زَادٍ فَلْيَأْتِنَا بِهِ". قَالَ: فَجَعَلَ الرَّجُلُ يَجِيءُ بِفَضْلِ التَّمْرِ، وَفَضلِ السَّوِيقِ حَتَّى جَعَلُوا مِنْ ذَلِكَ سَوَادًا حَيْسًا، فَجَعَلُوا يَأْكُلُونَ مِنْ ذَلِكَ الْحَيْسِ وَيَشْرَبُونَ مِنْ حِيَاضٍ إِلَى جَنْبِهِمْ مِنْ مَاءِ السَّمَاءِ. قَالَ: فَقَالَ أَنَسٌ: فَكَانَتْ تِلْكَ وَلِيمَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم علَيْهَا. قَالَ: فَانْطَلَقْنَا حَتَّى إِذَا رَأَيْنَا جُدُرَ الْمَدِينَةِ هَشِشْنَا إِلَيْهَا، فَرَفَعْنَا مَطِيَّنَا وَرَفَعَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَطِيَّتَهُ، قَالَ: وَصَفِيَّةُ خَلْفَهُ قَدْ أَرْدَفَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، قَالَ: فَعَثَرَتْ مَطِيَّةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَصُرعَ وَصُرِعَتْ. قَالَ: فَلَيْسَ أَحَدٌ مِنَ النَّاسِ يَنْظُرُ إِلَيْهِ وَلَا إِلَيْهَا، حَتَّى قَامَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَسَتَرَهَا، قَالَ: فَأَتَيْنَاهُ فَقَالَ:"لَمْ نُضَرَّ". قَالَ: فَدَخَلْنَا الْمَدِينَةَ فَخرَجَ جَوَارِي نِسَائِهِ يَتَرَاءَيْنَهَا وَيَشْمَتْنَ بِصرْعَتِهَا.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (88: 1365) من طرق عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، حَدَّثَنَا أنس قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গনীমতের ভাগ হিসেবে দিহ্ইয়ার অংশে পড়েন। লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাঁর (সাফিয়্যাহর) প্রশংসা করতে শুরু করল। তিনি বলেন, তারা বলছিল, বন্দী নারীদের মধ্যে আমরা তার মতো আর কাউকে দেখিনি। তিনি বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিহ্ইয়ার নিকট লোক পাঠালেন এবং এর (সাফিয়্যাহর) বিনিময়ে তিনি যা চাইলেন, তা তাঁকে দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আমার মায়ের হাতে তুলে দিলেন এবং বললেন, "তাকে তৈরি করো।"
তিনি বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার থেকে বের হলেন। যখন তিনি (সাফিয়্যাহকে) তাঁর পেছনে আরোহণ করালেন, তখন তিনি (এক স্থানে) অবতরণ করলেন এবং তাঁর জন্য তাঁবু স্থাপন করলেন। যখন সকাল হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যার কাছে অতিরিক্ত খাবার আছে, সে যেন তা আমাদের কাছে নিয়ে আসে।" তিনি বলেন, এরপর লোকেরা অতিরিক্ত খেজুর এবং অতিরিক্ত ছাতু নিয়ে আসতে লাগল, আর তা দিয়ে তারা কালচে রঙের হায়স (এক ধরনের খাবার) তৈরি করল। তারা সেই হায়স খেতে লাগল এবং তাদের পাশেই বৃষ্টির পানি জমা হওয়া জলাশয় থেকে পানি পান করতে লাগল।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আর সেটিই ছিল তাঁর (সাফিয়্যাহর) জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওয়ালীমা (বিয়ের ভোজ)। তিনি বলেন, আমরা চলতে লাগলাম, যখন আমরা মদীনার দেয়াল দেখতে পেলাম, তখন আমরা আনন্দের সাথে তার দিকে দ্রুত চললাম। আমরা আমাদের সওয়ারীগুলোকে দ্রুত হাঁকালাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও তাঁর সওয়ারীকে দ্রুত হাঁকালেন। তিনি বলেন, সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পেছনে ছিলেন; রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আরোহণ করিয়েছিলেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সওয়ারী হোঁচট খেল, ফলে তিনিও পড়ে গেলেন এবং তিনিও (সাফিয়্যাহও) পড়ে গেলেন।
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) না ওঠা পর্যন্ত এবং তাঁকে আড়াল না করা পর্যন্ত উপস্থিত লোকদের মধ্যে কেউই তাঁর (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিকে বা তাঁর (সাফিয়্যাহর) দিকে তাকাচ্ছিল না। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা তাঁর কাছে আসলাম। তিনি বললেন, "আমরা কোনো আঘাত পাইনি।" তিনি বলেন, এরপর আমরা মদীনায় প্রবেশ করলাম। তখন তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) স্ত্রীদের দাসীরা তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) দেখতে বের হলো এবং তাঁর পড়ে যাওয়ার কারণে উপহাস করতে লাগল।
8906 - عن أبي هريرة قال: لما دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بصفية بات أبو أيوب على باب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فلمّا أصبح فرأى رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر، ومع أبي أيوب السيف، فقال يا رسول الله! كانت جارية حديثة عهد بعرس، وكنت قتلت أباها، وأخاها وزوجها، فلم آمنها عليك، فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"خيرًا".
حسن: رواه الحاكم (4/ 28 - 29) وصحّحه عن عبد الله بن إسحاق الخراساني العدل، ثنا يحيى بن جعفر بن الزبرقان، ثنا عبد الوهّاب بن عطاء، أنبأ خالد الحذاء، عن كثير بن زيد، عن الوليد بن رباح، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل كثير بن زيد وشيخه وليد بن رباح فإنهما حسنا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সাফিয়্যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে নির্জনবাস করলেন, তখন আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজায় রাত কাটালেন। অতঃপর যখন সকাল হলো এবং তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলেন, তখন তাকবীর বললেন। আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে তলোয়ার ছিল। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি (সাফিয়্যাহ) নতুন বিবাহিত এক যুবতী এবং আমি তার পিতা, ভাই ও স্বামীকে হত্যা করেছিলাম। তাই আমি আপনার ব্যাপারে তাকে নিরাপদ মনে করিনি। এতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাসলেন এবং বললেন: "কল্যাণই হবে।"
8907 - عن أنس قال: بلغ صفية أن حفصة قالت: بنت يهودي، فدخل عليها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهي تبكي، فقال:"ما يبكيك؟" فقالت: قالت لي حفصة: إني بنت يهودي، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"وإنك لابنة نبي، وإن عمك لنبي، وإنك لتحت نبي، ففيم تفخر عليك؟" ثمّ قال:"اتقي الله يا حفصة!"
صحيح: رواه الترمذيّ (3894) وأحمد (12392) وصحّحه ابن حبَّان (7211) كلّهم من حديث عبد الرزّاق - وهو في مصنفه (20921) عن معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره.
قال الترمذيّ: حسن صحيح غريب من هذا الوجه.
قلت: وهو كما قال. فإنه حديث صحيح الإسناد، وقد تكلم في معمر، عن ثابت فإذا ظهر خطأه فهو ضعيف فيه وإلَّا فهو صحيح الإسناد، ولذا أخرجه أصحاب الصحاح كمسلم وابن حبَّان والحاكم وضياء الدين المقدسي عن معمر، عن ثابت.
وفىِ معناه رُوي عن صفية بنت حيي نفسها قالت: دخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم. وقد بلغني عن حفصة وعائشة كلام، فذكرت ذلك له، فقال:"ألا قلت: فكيف تكونان خيرًا مني، وزوجي محمد، وأبي هارون، وعمي موسى".
وكأن الذي بلغها أنهم قالوا: نحن أكرم على رسول الله صلى الله عليه وسلم منها: وقالوا: نحن أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وبنات عمه.
رواه الترمذيّ (3892) والحاكم (4/ 29) كلاهما من طريق هاشم بن سعيد الكوفي، عن كنانة، عن صفية قالت: فذكرتها.
وسكت عليه الحاكم.
قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث صفية إِلَّا من حديث هاشم الكوفي. وليس إسناده بذاك.
قلت: هاشم بن سعيد الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم، إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في"الثّقات" (7/ 585).
وصفية هي بنت حيي بن أخطب من بني النضير، وهو من سبط لاوي بن يعقوب، ثمّ من ذرية هارون بن عمران أخي موسى عليهما السلام. وكانت تحت سلّام بن مشكم، ثم خلف عليها كنانة بن أبي الحقيق، فقتل كنانة يوم خيبر، وكان عروسًا كما في البخاريّ (4211) فاختارها لنفسه.
وأخرج ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (3112) من طريق القاسم بن عوف، عن أبي برزة قال: لما نزل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيبر كانت صفية عروسًا في مجاسدها فرأت في المنام أن الشّمس نزلت حتَّى وقعت على صدرها، فقصت ذلك على زوجها فقال: ما تمنين إِلَّا هذا الملك الذي نزل بنا، قال: فافتتحها رسول الله صلى الله عليه وسلم فضرب عنق زوجها صبرًا.
وكانت صفية رأت قبل ذلك أن القمر وقع في حجرها، فذكرت ذلك لأبيها، فلطم وجهها وقال: إنك لتمدين عنقك إلى أن تكوني عند ملك العرب. فلم يزل الأثر في وجهها، حتَّى أتي بها رسول الله صلى الله عليه وسلم فسألها عنه فأخبرته.
ولم يخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من خيبر حتَّى طهرت صفية من حيضها.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে খবর পৌঁছাল যে হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বলেছেন: তুমি এক ইয়াহুদীর কন্যা। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট গেলেন, তখন তিনি কাঁদছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কাঁদছো কেন?" তিনি বললেন: হাফসা আমাকে বলেছেন, আমি নাকি এক ইয়াহুদীর কন্যা। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তো এক নবীর কন্যা, তোমার চাচাও একজন নবী, আর তুমি একজন নবীর স্ত্রী। তাহলে সে তোমার উপর কী নিয়ে অহংকার করে?" এরপর তিনি বললেন: "হে হাফসা, আল্লাহকে ভয় করো!"