আল-জামি` আল-কামিল
9048 - عن البراء بن عازب وسأله رجل من قيس: أفررتم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين؟ فقال البراء: ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يفر، وكانت هوازن يومئذ رماة، وإنا لما حملنا عليهم انكشفوا، فأكببنا على الغنائم فاستقبلونا بالسّهام، ولقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلته البيضاء، وإن أبا سفيان بن الحارث آخذٌ بلجامها وهو يقول:
أنا النَّبِيّ لا كذب … أنا ابن عبد المطلب.
وفي رواية: أما أنا أشهد على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه لم يول، ولكن عجل سرعان القوم فرشقتهم هوازن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4317) ومسلم في الجهاد والسير (80: 1776) كلاهما عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر غندر، حَدَّثَنَا شعبة عن أبي إسحاق قال: سمعت البراء وسأله رجل من قيس فذكره.
هذا موقف عظيم من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يدل على ثقته بالله عز وجل، والتوكل عليه، وهو على بغلة ليست سريعة الجري، يركضها إلى وجوههم، وهذا أكبر دليل على نبوته صلى الله عليه وسلم فأنزل الله تعالى كما
قال: {ثُمَّ أَنْزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَى رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنْزَلَ جُنُودًا لَمْ تَرَوْهَا} [التوبة: 26].
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কায়েস গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: আপনারা কি হুনাইনের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে পালিয়ে গিয়েছিলেন? তখন বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পালিয়ে যাননি। সেদিন হাওয়াযিন গোত্রের লোকেরা ছিল তীরন্দাজ। আমরা যখন তাদের উপর আক্রমণ করলাম, তখন তারা ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। ফলে আমরা গনীমতের সম্পদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়লাম, আর তারা তীর নিক্ষেপ করে আমাদের অভ্যর্থনা জানাল (তীর ছুঁড়তে লাগল)। আর আমি নিশ্চিতভাবে দেখেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাদা খচ্চরের উপর ছিলেন, আর আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিস তার লাগাম ধরে ছিলেন এবং তিনি বলছিলেন:
আমিই সেই নবী, এতে কোনো মিথ্যা নেই... আমি আব্দুল মুত্তালিবের পুত্র।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৃষ্ঠপ্রদর্শন করেননি (পালাননি)। বরং দ্রুতগামী লোকেরা (যাদের তাড়াহুড়ো ছিল) প্রথমে গিয়েছিল, আর হাওয়াযিন গোত্র তাদের উপর তীর নিক্ষেপ করেছিল।
9049 - عن أبي إسحاق قال: قال رجل للبراء: يا أبا عمارة! أفررتم يوم حنين؟ قال: لا، والله! ما ولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكنه خرج شبان أصحابه وأخفاؤهم حسرًا ليس عليهم سلاح، أو كثير سلاح فلقوا قومًا رماة لا يكاد يسقط لهم سهم، جمع هوازن وبني نصر، فرشقوهم رشقًا ما يكادون يخطئون، فأقبلوا هناك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلته البيضاء، وأبو سفيان بن الحارث بن عبد المطلب يقود به، فنزل فاستنصر، وقال:
"أنا النَّبِيّ لا كذب … أنا ابن عبد المطلب".
ثمّ صفّهم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2930) ومسلم في الجهاد والسير (78: 1776)
كلاهما من طريق أبي إسحاق قال: فذكره.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ ইসহাক বলেছেন: এক ব্যক্তি বারা'-কে বলল, হে আবূ আম্মারা! আপনারা কি হুনাইনের দিন পালিয়ে গিয়েছিলেন? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, না! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পিঠ দেখাননি (পলায়ন করেননি)। তবে তাঁর সাহাবীদের মধ্যে যারা যুবক এবং হালকা ধরনের ছিলেন, তাদের কাছে অস্ত্র বা খুব বেশি অস্ত্র ছিল না, তারা বেরিয়ে গিয়েছিলেন। তারা এমন এক তীরন্দাজ বাহিনীর মুখোমুখি হন, যাদের কোনো তীর কদাচিৎ লক্ষ্যভ্রষ্ট হতো—তারা ছিল হাওয়াযিন ও বনী নসর গোত্রের দল। তারা তাদের উপর এত তীব্রভাবে তীর নিক্ষেপ করল যে, তা কদাচিৎ লক্ষ্যচ্যুত হচ্ছিল। তখন তারা সেখান থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে ফিরে এলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাঁর সাদা খচ্চরের ওপর ছিলেন এবং আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিস ইবনু আবদুল মুত্তালিব সেটির লাগাম ধরে টেনে নিয়ে যাচ্ছিলেন। এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবতরণ করলেন এবং সাহায্য চাইলেন, আর বললেন:
"আমিই সেই নবী, এতে কোনো মিথ্যা নেই...
আমি আবদুল মুত্তালিবের সন্তান।"
অতঃপর তিনি তাদের সারিবদ্ধ করলেন।
9050 - عن جابر بن عبد الله قال: لما استقبلنا وادي حنين قال: انحدرنا في واد من أودية تهامة أجوف حطوط، إنّما ننحدر فيه انحدارًا، قال: وفي عماية الصبح، وقد كان القوم كمنوا لنا في شعابه وأحنائه ومضايقه، وقد أجمعوا وتهيئوا وأعدوا، قال: فوالله ما راعنا ونحن منحطون إِلَّا الكتائب قد شدت علينا شدة رجل واحد، وانهزم الناس راجعين، فاستمروا لا يلوي أحد على أحد. وانحاز رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات اليمين، ثمّ قال:"إليَّ أيها الناس، هلموا إلي، أنا رسول الله، أنا محمد بن عبد الله" قال: فلا شيء، احتملت الإبل بعضها بعضًا، فانطلق الناس، إِلَّا أن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم رهطًا من المهاجرين والأنصار وأهل بيته غير كثير ثبت معه من المهاجرين أبو بكر وعمر، ومن أهل بيته عليّ بن أبي طالب والعباس بن عبد المطلب، وابنه، والفضل بن العباس، وأبو سفيان بن الحارث، وربيعة بن الحارث، وأيمن بن عبيد، وهو ابن أم أيمن، وأسامة بن زيد.
قال: ورجل من هوازن على جمل له أحمر، في يده راية له سوداء في رأس رمح طويل له أمام الناس، وهوازن خلفه، فإذا أدرك طعن برمحه، وإذا فاته الناس رفع رمحه لمن وراءه فاتبعوه.
قال ابن إسحاق: وحدثني عاصم بن عمر بن قتادة، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبيه جابر بن عبد الله، قال: بينا ذلك الرّجل من هوازن صاحب الراية على جمله ذلك يصنع ما يصنع، إذ هوى له عليّ بن أبي طالب ورجل من الأنصار يريدانه، قال: فيأتيه عليّ من خلفه، فضرب عرقوبي الجمل، فوقع على عجزه، ووثب الأنصاري على الرّجل، فضربه ضربة أطن قدمه بنصف ساقه، فانجعف عن رحله واجتلد الناس، فو الله ما رجعت راجعة الناس من هزيمتهم حتَّى وجدوا الأسرى مكتفين عند رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أحمد (15027) والبزّار - كشف الأستار (1863) وأبو يعلى والبيهقي في الدلائل (5/ 126 - 127) كلّهم من طريق محمد بن إسحاق قال: حَدَّثَنِي عاصم بن عمر بن قتادة، عن عبد الرحمن بن جابر، عن جابر بن عبد الله فذكره. وإسناده حسن من أجل تصريح ابن إسحاق.
وذكره ابن هشام في سيرته (2/ 443) وزاد فيه ابن أبي سفيان بن الحارث.
وقال ابن هشام: اسم ابن أبي سفيان بن الحارث جعفر، واسم أبي سفيان المغيرة، وبعض الناس يعد فيهم قثم بن العباس، ولا يعد ابن أبي سفيان.
জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা হুনাইনের উপত্যকার দিকে মুখ করলাম, আমরা তিহামার উপত্যকাগুলোর একটি গভীর, ঢালু উপত্যকায় অবতরণ করছিলাম। আমরা শুধু নিচের দিকে নামছিলাম। তিনি বললেন: তখন ছিল অন্ধকারের মতো ভোর। শত্রুরা তার গিরিখাদ, বাঁক ও সংকীর্ণ পথে আমাদের জন্য লুকিয়ে ছিল। তারা একমত হয়েছিল, প্রস্তুত হয়েছিল এবং সজ্জিত হয়েছিল। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ, আমরা যখন নিচে নামছিলাম, তখন শুধু দেখলাম যে সৈন্যরা একযোগে আমাদের উপর তীব্র আক্রমণ শুরু করেছে। লোকেরা পরাজিত হয়ে পিছনের দিকে ছুটে গেল, তারা ছুটতে থাকল— কেউ কারও দিকে ফিরেও তাকাল না।
আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ডান দিকে সরে গেলেন এবং বললেন: "হে মানুষেরা, আমার দিকে এসো! আমার কাছে দ্রুত এসো! আমি আল্লাহর রাসূল, আমি মুহাম্মাদ বিন আব্দুল্লাহ!" তিনি (জাবের) বললেন: কোনো ফল হলো না। উটগুলো পরস্পরকে পিষে ফেলতে লাগল, ফলে লোকেরা দ্রুত পালিয়ে গেল। তবে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে মুহাজির, আনসার এবং আহলে বাইতের সামান্য কিছু লোক স্থির রইলেন। মুহাজিরদের মধ্যে তাঁর সাথে স্থির ছিলেন আবূ বকর ও উমার। আর আহলে বাইতের মধ্যে ছিলেন আলী ইবনে আবী তালিব, আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ও তাঁর পুত্র, ফাদল ইবনুল আব্বাস, আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস, রাবী'আ ইবনুল হারিস, আইমান ইবনে উবাইদ (যিনি উম্মে আইমানের পুত্র) এবং উসামা ইবনে যায়িদ।
তিনি বললেন: আর হাওয়াযিন গোত্রের এক ব্যক্তি তার লাল উটের উপর ছিল। তার হাতে ছিল একটি লম্বা বল্লমের মাথায় কালো পতাকা। সে ছিল জনগণের সামনে, আর হাওয়াযিন গোত্রের লোকেরা ছিল তার পেছনে। যখনই সে কাউকে হাতের নাগালে পেত, তার বল্লম দিয়ে আঘাত করত, আর যখন লোকেরা তার থেকে দূরে সরে যেত, তখন সে পেছনের লোকদের জন্য বল্লম উঁচু করত, ফলে তারা তাকে অনুসরণ করত।
ইবনে ইসহাক বলেন: আমার কাছে আসিম ইবনে উমর ইবনে কাতাদাহ বর্ণনা করেছেন, তিনি আব্দুর রহমান ইবনে জাবের থেকে, তিনি তার পিতা জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, হাওয়াযিন গোত্রের সেই পতাকা বহনকারী ব্যক্তি তার উটের উপর বসে যখন যা করছিল, ঠিক সেই সময় আলী ইবনে আবী তালিব এবং আনসারদের একজন লোক তাকে লক্ষ্য করে এলেন। তিনি (জাবের) বললেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার পেছন দিক থেকে এসে উটটির পায়ের গোড়ালির পেছনের রগ (আরকূব) কেটে দিলেন। ফলে উটটি তার নিতম্বের উপর পড়ে গেল। আর আনসারী লোকটি সেই ব্যক্তির উপর ঝাঁপিয়ে পড়লেন এবং তাকে এমন এক আঘাত করলেন যে, তার গোড়ালি থেকে অর্ধ-জানু পর্যন্ত কেটে গেল। ফলে সে তার হাওদা থেকে উল্টে পড়ে গেল এবং লোকেরা লড়াইয়ে মেতে উঠল। আল্লাহর শপথ! লোকেরা তাদের পরাজয় থেকে ফিরে আসার আগেই তারা দেখতে পেল যে, বন্দীদেরকে রশি দিয়ে বেঁধে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে নিয়ে আসা হয়েছে।
9051 - عن ابن عمر قال: لقد رأيتنا يوم حنين، وإن الفئتين لموليتان، وما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مائة رجل.
حسن: رواه الترمذيّ في جامعه (1689) وفي العلل الكبير (2/ 715) عن محمد بن عمر بن عليّ المقدمي البصري قال: حَدَّثَنِي أبي، عن سفيان بن حسين، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
وقال الترمذيّ: هذا حديث حسن صحيح غريب، لا نعرفه من حديث عبيد الله إِلَّا من هذا الوجه. اهـ
وقال في العلل: سألت محمدًا (البخاريّ) عن هذا الحديث فقال: لا أعرف أحدًا روى هذا الحديث عن عبيد الله بن عمر غير سفيان بن حسين. اهـ
قل: سفيان بن حسين ثقة في غير الزهري.
وإسناده حسن من أجل عمر بن عليّ بن عطاء بن مقدم المقدمي، فقال فيه ابن معين: كان يدلّس، وما كان به بأس، وقال ابن سعد: كان ثقة، وقال أبو حاتم:"محله الصدق" وهو من رجال الجماعة وحسّنه أيضًا الحافظ في الفتح (8/ 29) إن صحّ هذا العدد فيحمل على من انضم إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عند ندائه.
وإلى هذا يشير ما رواه البيهقيّ في الدلائل (5/ 129) من حديث جابر كما مضى وزاد فيه فجعل الرّجل منهم يذهب ليعطف بعيره فلا يقدر على ذلك فيقذف درعه من عنقه، ويأخذ سيفه وقوسه، ثمّ
يعومّ الصوت حتَّى اجتمع إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم منهم مائة.
وأمّا ما رُوي عن بريدة بن الحصيب رضي الله عنه قال: تفرق الناس عن رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين، فلم يبق معه إِلَّا رجل يقال له: زيد، وهو آخذ بعنان بغلة رسول الله صلى الله عليه وسلم الشهباء، فقال له رسول الله:"ويحك! ادع الناس"، فنادى زيد: أيها الناس! هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعوكم، فلم يجئ أحد، فقال:"ادع الأنصار"، فنادى يا معشر الأنصار! رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعوكم فلم يجئ أحد، قال:"ويحك! خص الأوس والخزرج"، فقال: يا معشر الأوس والخزرج! هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعوكم فلم يجئ أحد، قال:"ويحك! خص المهاجرين فإن لي في أعناقهم بيعة"، قال: فحدثني بريدة: أنه أقبل منهم ألف قد طرحوا الجفون، حتَّى أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فمشوا قدما حتَّى فتح الله عليهم. فرجاله ثقات ولكن في متنه نكارة وشذوذ.
رواه ابن أبي شيبة في مصنفه (38145) والبزّار (4440) والروياني في مسنده (رقم 31) كلّهم من طريق يوسف بن صُهَيب، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه بريدة قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي: رواه البزّار ورجاله ثقات. مجمع الزوائد (6/ 181).
قلت: لكن قوله:"لم يبق معه إِلَّا رجل يقال له زيد" شاذ، وكذلك هذا الحديث مخالف لما جاء في الصَّحيح أن الصّحابة لما سمعوا صوت العباس: أنهم عطفوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم عطفة البقر على أولادها.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين قال: فولّى عنه الناس، وثبت معه ثمانون رجلًا من المهاجرين والأنصار، فنكصنا على أقدامنا نحوا من ثمانين قدمًا، ولم نولهم الدبر، وهم الذين أنزل الله عز وجل عليهم السكينة، قال: ورسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلته يمضي قدما، فحادت به بغلته، فمال عن السرج، فقلت له: ارتفع رفعك الله، فقال:"ناولني كفًّا من تراب" فضرب به وجوههم، فامتلأت أعينهم ترابا، ثمّ قال:"أين المهاجرون والأنصار؟" قلت: هم أولاء، قال:"اهتف بهم" فهتفت بهم، فجاءوا وسيوفهم بأيمانهم كأنّها الشهب، وولى المشركون أدبارهم.
رواه أحمد (4336) والطَّبرانيّ في الكبير (10351) والبزّار - كشف الأستار (1829) والحاكم (2/ 117) كلّهم من حديث عفّان بن مسلم، حَدَّثَنَا عبد الواحد بن زياد، حَدَّثَنَا الحارث بن حصيرة، حَدَّثَنَا القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه قال: قال عبد الله بن مسعود فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وتعقبه الذّهبيّ فقال: الحارث وعبد الواحد ذوا مناكير، هذا منها ثمّ فيه إرسال. أي أن عبد الرحمن بن مسعود لم يسمع من أبيه.
ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি হুনায়নের দিনে আমাদের অবস্থা দেখেছি, যখন উভয় দলই পৃষ্ঠপ্রদর্শন করছিল, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে একশত জন লোকও ছিল না।
9052 - عن عباس بن عبد المطلب قال: شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين فلزمت أنا وأبو سفيان بن الحارث بن عبد المطلب رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم نفارقه، ورسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلة له بيضاء، أهداها له فروة بن نفاثة الجذامي، فلمّا التقى المسلمون والكفار، ولى المسلمون مدبرين فطفق رسول الله صلى الله عليه وسلم يركض بغلته قبل الكفار، قال عباس: وأنا آخذ بلجام بغلة رسول الله صلى الله عليه وسلم أكفها إرادة أن لا تسرع، وأبو سفيان آخذ بركاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أي عباس! ناد أصحاب السمرة". فقال عباس: وكان رجلًا صيتًا فقلت بأعلى صوتي: أين أصحاب السمرة؟ قال: فو الله لكأن عطفتهم، حين سمعوا صوتي عطفة البقر على أولادها. فقالوا يا لبيك يا لبيك - قال: - فاقتتلوا والكفار، والدعوة في الأنصار، يقولون: يا معشر الأنصار! يا معشر الأنصار! قال: ثمّ قصرت الدعوة علي بني الحارث بن الخزرج، فقالوا: يا بني الحارث بن الخزرج! يا بني الحارث بن الخزرج! . فنظر رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على بغلته كالمتطاول عليها إلى قتالهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا حين حمي الوطيس". قال: ثمّ أخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم حصيات فرمى بهن وجوه الكفار ثمّ قال:"انهزموا ورب محمد" قال: فذهبت أنظر فإذا القتال على هيئته فيما أرى، - قال: - فوالله! ما هو إِلَّا أن رماهم بحصياته فما زلت أرى حدهم كليلا وأمرهم مدبرًا.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (76: 1775) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن سرح، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب قال: حَدَّثَنِي كثير بن عباس بن عبد المطلب قال: قال عباس فذكره.
وقوله: أصحاب السمرة، هي الشجرة التي بايعوا تحتها بيعة الرضوان.
وقال مسلم: وحدثناه إسحاق بن إبراهيم ومحمد بن رافع وعبد بن حميد جميعًا عن عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزهري بهذا الإسناد نحوه غير أنه قال: فروة بن نعامة الجذامي، وقال: انهزموا ورب الكعبة، انهزموا ورب الكعبة، وزاد في الحديث: حتَّى هزمهم الله قال: وكأني أنظر إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يركض خلفهم على بغلته.
قوله: على بغلة له بيضاء وفي رواية: على بغلته الشهباء، وهي واحدة.
قال العلماء: لا يعرف له بغلة سواها وهي التي يقال لها: دلدل.
قوله:"فما زلت أرى حدهم كليلًا" أي ما زلت أرى قوتهم ضعيفة.
قوله:"أهداها له فروة بن نفاثة" وفي رواية:"فروة بن نعامة" قال النوويّ: الصَّحيح المعروف الأوّل.
وقوله:"أصحاب السمرة" هي الشجرة التي بايعوا تحتها بيعة الرضوان.
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইন যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। আমি এবং আবুল সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আঁকড়ে ধরেছিলাম এবং তাঁর সঙ্গ ত্যাগ করিনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর একটি সাদা খচ্চরের ওপর আরোহিত ছিলেন, যা ফুরাওয়াহ ইবনে নুফাসা আল-জুজামি তাঁকে উপহার হিসেবে দিয়েছিলেন। যখন মুসলিম ও কাফিররা মুখোমুখি হলো, তখন মুসলিমরা পিছু হটতে শুরু করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খচ্চরটিকে কাফিরদের দিকে দ্রুত চালনা করতে লাগলেন। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খচ্চরের লাগাম ধরে রেখেছিলাম, যেন সেটি বেশি দ্রুত না চলে। আর আবু সুফিয়ান রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রেকাব ধরেছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আব্বাস! 'আসহাবুস সামুরাহ' (বাবলা গাছের সাথীরা)-কে ডাক দাও।" আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি ছিলাম উচ্চস্বরী মানুষ। আমি আমার সর্বোচ্চ কণ্ঠে আওয়াজ দিলাম: আসহাবুস সামুরাহ কোথায়? তিনি বলেন, আল্লাহর কসম! আমার আওয়াজ শোনার সাথে সাথে তাদের ফিরে আসার ধরণটি ছিল যেন গাভী তার বাচ্চার দিকে ফেরে। তারা বলল, 'লাব্বাইক! লাব্বাইক!' (আমরা হাজির! আমরা হাজির!)।
তিনি বলেন, অতঃপর তারা কাফিরদের সাথে লড়াই শুরু করল। আহবানটি ছিল আনসারদের জন্য: তারা বলছিল: "হে আনসার সম্প্রদায়! হে আনসার সম্প্রদায়!" অতঃপর আহবানটি বনু হারিস ইবনে খাজরাজের জন্য নির্দিষ্ট হয়ে গেল। তারা বলতে লাগল: "হে বনু হারিস ইবনে খাজরাজ! হে বনু হারিস ইবনে খাজরাজ!"।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খচ্চরের ওপর আরোহিত অবস্থায় তাদের লড়াই দেখতে লাগলেন—যেন তিনি উঁচুতে উঠে দেখছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই সেই সময় যখন যুদ্ধ চরম রূপ ধারণ করেছে।"
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একমুঠো নুড়ি পাথর নিলেন এবং তা কাফিরদের মুখের দিকে ছুঁড়ে মারলেন। অতঃপর বললেন: "মুহাম্মাদের রবের কসম! তারা পরাজিত হয়েছে।" আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি দেখতে গেলাম, আমি তখনও যুদ্ধকে তার আগের অবস্থাতেই দেখতে পেলাম। তিনি বলেন, আল্লাহর কসম! তিনি নুড়ি পাথরগুলো নিক্ষেপ করার পর আমি দেখতে লাগলাম যে, তাদের শক্তি দুর্বল হয়ে যাচ্ছে এবং তাদের পরাজয় নিকটবর্তী হচ্ছে।
9053 - عن كثير بن عباس قال: كان عباس وأبو سفيان معه - يعني النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: خطبهم وقال:"الآن حمي الوطيس" وقال:"ناد: يا أصحاب سورة البقرة".
صحيح: رواه أحمد (1772) عن سفيان قال: سمعت الزهري مرة أو مرتين - فلم أحفظه عن كثير بن عباس فذكره.
وصورته إرسال، فإن كثير بن عباس لم يحضر المشهد ولكن رواه مسلم عن ابن أبي عمر، حَدَّثَنَا سفيان بن عيينة، عن الزّهري، قال: أخبرني كثير بن عباس، عن أبيه قال: كنت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم حنين قال مسلم: وساق الحديث غير أن حديث يونس وحديث معمر أكثر منه وأتم.
আববাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আববাস এবং আবু সুফিয়ান নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে লক্ষ্য করে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "এখন রণক্ষেত্র উত্তপ্ত হয়েছে।" আর তিনি বললেন: "আহ্বান করো: হে সূরাহ আল-বাক্বারার সাথীরা।"
9054 - عن سلمة بن الأكوع قال: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حنينًا، فلمّا واجهنا العدو تقدمت، فأعلو ثنية. فاستقبلني رجل من العدو، فأرميه بسهم فتوارى عني، فما دريت ما صنع ونظرت إلى القوم فإذا هم قد طلعوا من ثنية أخرى، فالتقوا هم وصحابة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فولى صحابة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وأرجع منهزما وعليّ بردتان، متزرا بإحداهما، مرتديا بالأخرى، فاستطلق إزاري، فجمعتهما جميعًا ومررت على رسول الله صلى الله عليه وسلم منهزما، وهو على بغلته الشهباء فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد رأى ابن الأكوع فزعا". فلمّا غشوا رسول الله صلى الله عليه وسلم نزل عن البغلة، ثمّ قبض قبضة من تراب من الأرض، ثمّ استقبل به وجوههم، فقال:"شاهت الوجوه". فما خلق الله منهم إنسانًا إِلَّا ملأ عينيه ترابًا، بتلك القبضة. فولوا مدبرين فهزمهم الله عز وجل وقسم رسول الله صلى الله عليه وسلم غنائمهم بين المسلمين.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (81: 1777) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا عمر بن يونس الحنفي، حَدَّثَنَا عكرمة بن عمار، حَدَّثَنِي إياس بن سلمة، حَدَّثَنِي أبي، قال: فذكره.
قوله:"ومررت على رسول الله صلى الله عليه وسلم منهزمًا": هذا حال من ابن الأكوع. كما صرّح أولًا بانهزامه، ولم يرد أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم انهزم. ولم ينقل أحد من الصّحابة قطّ أنه انهزم النَّبِي صلى الله عليه وسلم في موطن من المواطن، وقد نقلوا إجماع المسلمين على أنه لا يجوز أن يعتقد انهزامه، ولا يجوز ذلك عليه.
সালমা ইবনু আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলাম। যখন আমরা শত্রুর মুখোমুখি হলাম, আমি অগ্রসর হলাম এবং একটি টিলার উপরে উঠলাম। তখন শত্রুপক্ষের একজন লোক আমার দিকে এগিয়ে এলো। আমি তাকে তীর মারলাম, ফলে সে আমার চোখের আড়াল হয়ে গেল। আমি বুঝতে পারলাম না যে সে কী করেছে। আমি লোকদের দিকে তাকালাম, দেখলাম তারা অন্য একটি টিলা থেকে উঠে আসছে। তারা এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ মুখোমুখি হলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ পিছু হটতে লাগলেন এবং আমিও পরাজিত হয়ে ফিরে আসছিলাম। আমার শরীরে দুটি চাদর ছিল, একটি দিয়ে আমি ইযার (লুঙ্গি) বেঁধেছিলাম এবং অন্যটি গায়ে দিয়েছিলাম। আমার ইযারটি খুলে যাচ্ছিল, তাই আমি দুটোই একসাথে ধরে নিলাম। আমি যখন পরাজিত হয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে অতিক্রম করছিলাম, তখন তিনি তাঁর শ্বেত-ধূসর খচ্চরের পিঠে আরোহণ করে ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনুল আকওয়া’ আতঙ্কিত হয়েছে (বা ভীত হয়ে পিছু হটতে দেখেছে)।" যখন তারা (শত্রুরা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘিরে ফেলল, তিনি খচ্চর থেকে নেমে গেলেন। এরপর তিনি মাটি থেকে একমুঠো ধুলো নিলেন এবং তাদের মুখের দিকে মুখ করে বললেন: "মুখমণ্ডলগুলো বিকৃত হোক!" আল্লাহ তাদের মধ্যে এমন কোনো মানুষ সৃষ্টি করেননি যার চোখ সেই একমুঠো ধুলো দ্বারা পূর্ণ হয়নি। অতঃপর তারা পিছু হটে গেল। আর মহান আল্লাহ তা‘আলা তাদেরকে পরাজিত করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) মুসলমানদের মধ্যে বণ্টন করে দিলেন।
9055 - عن ابن شهاب قال: غزا رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة الفتح، فتح مكة، ثمّ خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم بمن معه من المسلمين، فاقتتلوا بحنين، فنصر الله دينه والمسلمين، وأعطى رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ صفوان بن أمية مائة من النعم، ثمّ مائة، ثمّ مائة.
قال ابن شهاب: حَدَّثَنِي سعيد بن المسيب؛ أن صفوان قال: والله! لقد أعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم -
ما أعطاني، وإنه لأبغض الناس إلي، فما برح يعطيني حتَّى إنه لأحب الناس إلي.
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (59: 2313) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن سرح، أخبرنا عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب قال: فذكره.
والجزء الأوّل من الحديث مرسل لكن آخره مسند من حديث صفوان بن أمية رضي الله عنه.
সাফওয়ান ইবনে উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের যুদ্ধে অংশ নিলেন, অর্থাৎ মক্কা বিজয় করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সঙ্গে থাকা মুসলিমদেরকে নিয়ে বের হলেন এবং তারা হুনাইনের ময়দানে লড়াই করলেন। অতঃপর আল্লাহ তাঁর দ্বীন ও মুসলিমদেরকে সাহায্য করলেন। সেই দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফওয়ান ইবনে উমাইয়াকে একশ'টি উট দিলেন, এরপর আরও একশ', তারপর আরও একশ'।
সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যা দিলেন—যখন তিনি আমাকে দিলেন, তখন তিনি ছিলেন আমার কাছে সবচেয়ে বেশি ঘৃণিত ব্যক্তি। কিন্তু তিনি আমাকে দিতেই থাকলেন, দিতেই থাকলেন, অবশেষে তিনি আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তিতে পরিণত হলেন।
9056 - عن أنس رضي الله عنه قال: لما كان يوم حنين انهزم الناس عن رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا العباس بن عبد المطلب، وأبو سفيان بن الحارث، وأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم العباس أن ينادي: يا أصحاب سورة البقرة! يا معشر الأنصار! ثمّ استحث النداء في بني الحارث بن الخزرج، فلمّا سمعوا النداء أقبلوا، فوالله ما شبهتهم إِلَّا الإبل تحن إلى أولادها، فلمّا التقوا التحم القتال، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الآن حمي الوطيس" وأخذ صلى الله عليه وسلم كفا من حصى أبيض، فرمى بها، وقال:"هُزموا ورب الكعبة" وكان عليّ بن أبي طالب يومئذ أشد الناس قتالا بين يديه.
حسن: رواه أبو يعلى (3606) عن محمد بن أبي بكر، حَدَّثَنَا عمرو بن عاصم، حَدَّثَنَا أبو العوّام، عن معمر، عن الزّهري، عن أنس قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي العوّام - واسمه عمران بن داور - بفتح الواو وبعدها راء - مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন হুনাইনের দিন আসলো, তখন আব্বাস ইবন আব্দুল মুত্তালিব এবং আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস ছাড়া অন্যান্য লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ছেড়ে পিছু হটে গেল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি ঘোষণা দেন: “হে সূরাহ আল-বাক্বারাহ’র সঙ্গীরা! হে আনসারদের দল!” অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানূ হারিস ইবনুল খাযরাজকে দ্রুত ডাকার জন্য অনুপ্রাণিত করলেন। যখন তারা এই আহ্বান শুনলো, তখন তারা দ্রুত এগিয়ে আসলো। আল্লাহর শপথ! আমার কাছে তাদের দেখে মনে হচ্ছিল যেন তারা সেই উট, যারা তাদের বাচ্চাদের কাছে ফিরে আসার জন্য ব্যাকুল হয়ে থাকে। যখন তারা শত্রুদের সাথে মিলিত হলো, তখন তুমুল যুদ্ধ শুরু হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এখন চুল্লিতে আগুন ধরেছে (অর্থাৎ যুদ্ধ তীব্র আকার ধারণ করেছে)।” আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মুঠো সাদা কাঁকর তুলে নিলেন এবং তা নিক্ষেপ করলেন। অতঃপর বললেন: “কা'বার রবের কসম! তারা পরাজিত হয়েছে।” আর সেদিন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে সবচেয়ে বেশি তীব্রভাবে যুদ্ধকারী।
9057 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حنين:"جزوهم جزًّا" وأومأ بيده إلى الحلق.
حسن: رواه البزّار - كشف الأستار (1830) عن الوليد بن عمر بن سكين - ثنا محمد بن عبد الله بن المثنى، عن أبيه، عن ثمامة، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن المثنى والد محمد - وهو عبد الله بن المثنى بن عبد الله بن أنس بن مالك الأنصاري مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 181): ورجاله ثقات.
وفي الباب ما رُوي عن أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْفِهْرِيِّ، قَالَ: كُنْتُ مَعَ رسول الله صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ حُنينٍ، فَسِرْنَا فِي يَوْمٍ قَائِظٍ شَدِيدِ الْحَرِّ، فَنَزَلْنَا تَحْتَ ظِلالِ الشَّجَرِ، فَلَمَّا زَالَتِ الشَّمْسُ لَبِسْتُ لأْمَتِي، وَرَكِبْتُ فَرَسِي، فَانْطَلَقْتُ إِلَى رسول الله صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي فُسْطَاطِهِ، فَقُلْتُ: السَّلامُ عَلَيْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَرَحْمَةُ اللَّهِ، حَانَ الرَّوَاحُ؟ فَقَالَ:"أجل" فقَالَ:"يَا بِلالُ" فَثَارَ مِنْ تَحْتِ سَمُرَةٍ كَأَنَّ ظِلَّهُ ظِلُّ طَائِرٍ، فَقَالَ: لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ وَأَنَا فِدَاؤُكَ، فقَالَ:"أَسْرِجْ لِي فَرَسِي"، فأخْرَجَ سَرْجًا دَفَّتَاهُ مِنْ لِيفٍ لَيْسَ فِيهَا أَشَرٌّ وَلا بَطَرٌ، قَالَ: فَأَسْرَجَ. قال: فرَكِبَ وَرَكِبْنا فَصَاففناهُمْ عَشِيّتنَا وَلَيْلَتَنَا فَتَشَامَّتِ الْخَيْلانِ، فَوَلَّى الْمُسْلِمُونَ مُدْبِرِينَ كَمَا قَالَ اللَّهُ، فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"يَا عِبَادَ اللَّهِ! أَنَا عَبْدُ
اللَّهِ وَرَسُولُهُ"، ثُمَّ قَالَ:"يَا مَعْشَرَ الْمُهَاجِرِينَ! أَنَا عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ"، ثمّ قَالَ: ثُمَّ اقْتَحَمَ رسول الله صلى الله عليه وسلم عَنْ فَرَسِهِ، فَأَخَذَ كَفًّا مِنْ تُرَابٍ، فَأَخْبَرَنِي الَّذِي كَانَ أَدْنَى إِلَيْهِ مِنِّي: ضَرَبَ به وُجُوهَهُمْ وَقَالَ:"شَاهَتِ الْوجُوهُ"، فَهَزَمَهُمُ اللَّهُ.
قَالَ يَعْلَى بْنُ عَطَاءٍ: فَحَدَّثني أَبْناؤُهُمْ عَنْ آبَائِهِمْ أَنَّهُمْ قَالُوا: لَمْ يَبْقَ مِنَّا أَحَدٌ إِلا امْتَلأَتْ عَيْنَاهُ وَفَمُهُ تُرَابًا وَسَمِعْنَا صَلْصَلَةً بَيْنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ كَإِمْرَارِ الْحَدِيدِ عَلَى الطَّسْتِ الْحَدِيدِ.
رواه أحمد (22468، 22467) واللّفظ له، وأبو داود (5233) والدارمي (4252) مختصرًا - كلّهم من حديث حمّاد بن سلمة، أخبرنا يعلى بن عطاء، عن أبي همّام عبد الله بن يسار، عن أبي عبد الرحمن الفهري قال: فذكره.
قال أبو داود: أبو عبد الرحمن الفهري ليس له إِلَّا هذا الحديث، وهو حديث نبيل جاء به حمّاد بن سلمة.
قلت: ولكن في إسناده أبو همام عبد الله بن يسار، قال فيه عليّ بن المديني: هو شيخ مجهول، وكذا قال أبو جعفر الطبريّ.
وأمّا ابن حبَّان فذكره في الثّقات.
كما أن في متنه نكارة، وهي ذكر الفرس لرسول الله صلى الله عليه وسلم.
وفي الأحاديث الصحيحة كان على بغلة بيضاء يركض قبل الكفار، وكان عباس آخذ بلجام البغلة، إِلَّا أن يقصد بالفرس البغلة لأن البغلة من نسل الفرس والحمار.
وفي الباب ما رُوي عن يزيد بن عامر السوائي، وكان شهد حنينا مع المشركين، ثمّ أسلم، فنحن نسأل عن الرعب الذي ألقى الله عز وجل في قلوب المشركين يوم حنين كيف كان؟ قال: كان يأخذ لنا الحصاة فيرمي بها الطشت، فيظن قال: كنا نجد في أجوافنا مثل هذا.
وفي لفظ قال: عند انكشافة انكشفها المسلمون يوم حنين، فتبعهم الكفار، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم قبضة من الأرض، ثمّ أقبل بها على المشركين، فرمى بها في وجوههم فقال:"ارجعوا شاهت الوجوه" قال: فما من أحد يلقى أخاه إِلَّا وهو يشكو القذى، أو يمسح عينيه.
رواه عبد بن حميد (440، 439) والطَّبرانيّ في الكبير (22/ 237) والبيهقي في الدلائل (5/ 114) كلّهم من حديث سعيد بن السائب الطائفي، حدثني أبي: السائب بن يسار، قال: سمعت يزيد بن عامر السوائي، وكان شهد حنينًا، فذكره وفيه السائب بن يسار ذكره البخاريّ في التاريخ الكبير ولم يقل فيه شيئًا. وذكره ابن حبَّان في تقاته وقال: يُروي عن يزيد المراسيل، ولم أقف على توثيق أحد، وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (6/ 183):"رجاله ثقات" فهو اعتمادًا على توثيق ابن حبَّان.
وقد رُوي عن أنس بن مالك قال: التقى يوم حنين أهل مكة وأهل المدينة، واشتد القتال، فولوا مدبرين فندب رسول الله صلى الله عليه وسلم الأنصار فقال:"يا معشر المسلمين أنا رسول الله" فقالوا: إليك، والله
جئنا فنكسوا رؤوسهم ثمّ قاتلوا حتَّى فتح الله عليهم.
رواه الحاكم (3/ 48) من حديث مبارك بن فضالة، ثنا الحسن، عن أنس بن مالك فذكره. وقال: صحيح الإسناد.
قلت: ولكن فيه الحسن وهو الإمام المشهور مدلِّس لم يصرح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুনায়নের যুদ্ধের দিন বললেন: “তাদেরকে টুকরা টুকরা করে দাও।” এই বলে তিনি তাঁর হাত দ্বারা গলা বা কণ্ঠনালীর দিকে ইশারা করলেন।
এই অধ্যায়ে আবূ আব্দুর রহমান আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত একটি বর্ণনা রয়েছে। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে হুনায়নের যুদ্ধে ছিলাম। আমরা তীব্র গরমের এক উত্তপ্ত দিনে পথ চলছিলাম। এরপর আমরা গাছের ছায়ায় নামলাম। যখন সূর্য হেলে গেল, তখন আমি আমার যুদ্ধের পোশাক পরিধান করলাম এবং আমার ঘোড়ায় চড়লাম। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দিকে রওনা হলাম, তিনি তখন তাঁর তাবুতে ছিলেন। আমি বললাম: আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলাল্লাহ ওয়া রাহমাতুল্লাহ! এখন কি যাত্রা করার সময় হয়েছে? তিনি বললেন: “হ্যাঁ।” তারপর তিনি বললেন: “হে বিলাল!” তখন তিনি (বিলাল) একটি বাবলা গাছের নিচ থেকে এমনভাবে উঠে আসলেন যেন তাঁর ছায়া ছিল কোনো পাখির ছায়ার মতো। বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি উপস্থিত, আমি আপনার সেবায় নিয়োজিত, আমি আপনার জন্য উৎসর্গীকৃত। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমার ঘোড়ার উপর জিন লাগাও।” তখন তিনি এমন একটি জিন আনলেন যার দু’পাশের আস্তরণ ছিল খেজুর পাতা দিয়ে তৈরি। তাতে অহংকার ও জাঁকজমকের কোনো ছাপ ছিল না। আবূ আব্দুর রহমান আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি জিন লাগালেন। তারপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হলেন এবং আমরাও সওয়ার হলাম। সেই দিন সন্ধ্যায় এবং রাতের বেলা আমরা তাদের মোকাবিলা করলাম। ঘোড়সওয়ারী দল পরস্পরের সাথে যুদ্ধ করতে লাগল। আল্লাহ তাআলা যেমন বলেছেন, মুসলিমগণ তখন পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পিছু হটলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে আল্লাহর বান্দাগণ! আমি আল্লাহর বান্দা এবং তাঁর রাসূল।” এরপর তিনি আবার বললেন: “হে মুহাজিরগণ! আমি আল্লাহর বান্দা এবং তাঁর রাসূল।” অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর ঘোড়া থেকে লাফিয়ে নেমে গেলেন। তিনি এক মুষ্টি মাটি নিলেন। আমার চেয়ে তাঁর কাছাকাছি যিনি ছিলেন তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই মাটি তাদের মুখের দিকে ছুঁড়ে মারলেন এবং বললেন: “তোমাদের মুখমণ্ডল বিকৃত হোক (শাহাতিল উজূহ)।” অতঃপর আল্লাহ তাদেরকে পরাজিত করলেন।
ইয়া'লা ইবনু আতা (রাহঃ) বলেন: তাদের (শত্রুদের) সন্তানেরা তাদের পিতাদের পক্ষ থেকে আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, তারা (শত্রুরা) বলেছিল: আমাদের মধ্যে এমন কেউ অবশিষ্ট ছিল না যার চোখ ও মুখ মাটি দ্বারা পূর্ণ হয়ে যায়নি। আর আমরা আকাশ ও পৃথিবীর মধ্যবর্তী স্থানে একটি ঝনঝন শব্দ শুনেছিলাম, যা ছিল লোহার থালার উপর লোহার আঘাতে সৃষ্ট শব্দের ন্যায়।
ইয়াযীদ ইবনু আমের আস-সুওয়ায়ী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি মুশরিকদের সাথে হুনায়নের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন, অতঃপর তিনি ইসলাম গ্রহণ করেন। আমরা তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলাম যে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা হুনায়নের দিন মুশরিকদের অন্তরে যে ভয় (রূ'ব) ঢেলে দিয়েছিলেন, তা কেমন ছিল? তিনি বললেন: এটা এমন ছিল যেন কেউ আমাদের জন্য কাঁকর বা নুড়ি উঠিয়ে লোহার থালার উপর নিক্ষেপ করছে। আমরা আমাদের পেটের মধ্যে এমন অনুভূতি পেতাম।
অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি বলেছেন: হুনায়নের দিন যখন মুসলিমরা পিছু হটলেন এবং কাফিররা তাদের পিছু ধাওয়া করল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক মুষ্টি মাটি নিলেন, অতঃপর মুশরিকদের দিকে মুখ করে সেটি তাদের মুখের উপর ছুঁড়ে মারলেন এবং বললেন: “ফিরে যাও, তোমাদের মুখমণ্ডল বিকৃত হোক (শাহাতিল উজূহ)।” তিনি (ইয়াযীদ) বলেন: তখন এমন কোনো লোক ছিল না যে তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করেছে অথচ সে তার চোখে ধূলিকণার অভিযোগ করছে না বা তার চোখ মুছছে না।
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হুনায়নের দিন মক্কার অধিবাসী ও মদীনার অধিবাসীরা (অর্থাৎ মুসলিমরা) পরস্পর মিলিত হলো। যুদ্ধ তীব্র আকার ধারণ করলে তারা পিছু হটতে শুরু করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদেরকে আহ্বান করলেন এবং বললেন: “হে মুসলিম জনতা! আমি আল্লাহর রাসূল।” তারা বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা আপনার কাছেই এসেছি। অতঃপর তারা তাদের মাথা ঝুঁকিয়ে পুনরায় যুদ্ধ করলেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তাদের জন্য বিজয় দান করলেন।
9058 - عن عَنْ أَبِي قَتَادَةَ بن ربعي، قَالَ: خَرَجْنَا مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَامَ حُنينٍ، فَلَمَّا الْتَقَيْنَا كَانَتْ لِلْمُسْلِمِينَ جَوْلَةٌ، فَرَأَيْتُ رَجُلًا مِنَ الْمُشْرِكِينَ، قَدْ عَلَا رَجُلًا مِنَ الْمُسْلِمِينَ، فَضَرَبْتُهُ مِنْ وَرَائِهِ عَلَى حَبْلى عَاتِقِهِ بِالسَّيْفِ، فَقَطَعْتُ الدِّرْعَ، وَأَقْبَلَ عَلَيَّ فَضَمَّنِي ضَمَّةً وَجَدْتُ مِنْهَا رِيحَ الْمَوْتِ، ثمَّ أَدْرَكَهُ الْمَوْتُ فَأَرْسَلَنِي، فَلَحِقْتُ عُمَرَ بن الخطّاب فَقُلْتُ: مَا بَالُ النَّاسِ؟ قَالَ: أَمْرُ اللَّهِ عز وجل. ثُمَّ رَجَعُوا وَجَلَسَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ:"مَنْ قَتَلَ قَتِيلًا لَهُ عَلَيْهِ بَيِّنَةٌ فَلَهُ سَلَبُهُ" فَقُلْتُ: مَنْ يَشْهَدُ لِي ثُمَّ جَلَسْتُ قَالَ: ثُمَّ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ فَقُمْتُ، فَقَالَ:"مَا لَكَ يَا أَبَا قَتَادَةَ" فَأَخْبَرْتُهُ. فَقَالَ رَجُلٌ: صَدَقَ وَسَلَبُهُ عِنْدِي، فَأَرْضِهِ مِنِّي. فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ: لَاهَا اللَّهِ إِذًا، لَا يَعْمِدُ إِلَى أَسَدٍ مِنْ أُسْدِ اللَّهِ، يُقَاتِلُ عَنِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ صلى الله عليه وسلم فَيُعْطِيَكَ سَلَبَهُ. فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"صَدَقَ فَأَعْطِهِ" فَأَعْطَانِيهِ فَابْتَعْتُ بِهِ مَخْرَفًا فِي بَنِي سَلِمَةَ، فَإِنَّهُ لأَوَّلُ مَالٍ تَأَثَّلْتُهُ فِي الاسْلَامِ.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (18) عن يحيى بن سعيد، عن عمر بن كثير بن أفلح، عن أبي محمد مولى أبي قتادة، عن أبي قتادة بن ربعي أنه قال: فذكره.
ورواه البخاريّ في المغازي (4321) ومسلم في الجهاد والسير (41: 1751) كلاهما من طريق مالك به.
আবূ কাতাদাহ ইবনে রিবঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা হুনাইনের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম। যখন আমাদের (শত্রুদের সাথে) সাক্ষাৎ হলো, তখন মুসলিমদের একটি বিপর্যয় (বা পিছু হটা) ঘটেছিল। আমি মুশরিকদের এক ব্যক্তিকে দেখলাম, যে একজন মুসলিমকে আক্রমণ করেছে। আমি তার পিছন থেকে তরবারি দ্বারা তার ঘাড়ের রগের (বা কাঁধের পিছনের) উপর আঘাত করলাম। ফলে আমি তার বর্ম কেটে দিলাম। সে আমার দিকে এগিয়ে এলো এবং আমাকে এমন জোরে জাপটে ধরল যে, আমি তাতে মৃত্যুর গন্ধ পেলাম। অতঃপর তার মৃত্যু উপস্থিত হলো এবং সে আমাকে ছেড়ে দিল। এরপর আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং বললাম, "লোকদের কী হয়েছে?" তিনি বললেন, "এ আল্লাহরই আদেশ।" এরপর তারা (মুসলিমরা) ফিরে এলেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি কোনো নিহতকে হত্যা করেছে এবং সে বিষয়ে তার প্রমাণ আছে, তবে নিহত ব্যক্তির সম্পত্তি (সলব) তারই প্রাপ্য।" আমি বললাম: "কে আমার পক্ষে সাক্ষ্য দেবে?" তারপর আমি বসে পড়লাম।
বর্ণনাকারী বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একই কথা পুনরায় বললেন। আমি দাঁড়ালাম। তিনি বললেন: "হে আবূ কাতাদাহ! তোমার কী হয়েছে?" আমি তাকে বিষয়টি জানালাম। তখন এক ব্যক্তি বলল: "তিনি সত্য বলেছেন, আর তার (নিহত ব্যক্তির) সলব আমার কাছে আছে। সুতরাং, আপনি তাকে আমার পক্ষ থেকে সন্তুষ্ট করে দিন (অন্য কিছু দিয়ে)।"
আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: "আল্লাহর কসম! এমন হতে পারে না! আল্লাহর সিংহদের মধ্য থেকে একজন সিংহ, যিনি আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে যুদ্ধ করছেন—তুমি তার সলব নিয়ে যাবে?" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (আবূ বাকর) সত্য বলেছে। সুতরাং তাকে তা দিয়ে দাও।" অতঃপর সে আমাকে তা দিয়ে দিল। আমি তা দিয়ে বনু সালিমা গোত্রে একটি খেজুর বাগান (বা ফল তোলার সরঞ্জাম) কিনলাম। ইসলাম গ্রহণের পর এই ছিল আমার প্রথম সম্পদ যা আমি জমা করতে পেরেছিলাম।
9059 - عن عَنْ أَبِي مُحَمَّدٍ مَوْلَى أَبِي قَتَادَةَ، أَنَّ أَبَا قَتَادَةَ، قَالَ: لَمَّا كَانَ يَوْمُ حُنينٍ نَظَرْتُ إِلَى رَجُلٍ مِنَ الْمُسْلِمِينَ يُقَاتِلُ رَجُلًا مِنَ الْمُشْرِكِينَ، وَآخَرُ مِنَ الْمُشْرِكِينَ يَخْتِلُهُ مِنْ وَرَائِهِ لِيَقْتُلَهُ، فَأَسْرَعْتُ إِلَى الَّذِي يَخْتِلُهُ فَرَفَعَ يَدَهُ لِيَضْرِبَنِي، وَأَضْرِبُ يَدَهُ، فَقَطَعْتُهَا، ثُمَّ أَخَذَنِي، فَضَمَّنِي ضَمًّا شَدِيدًا حَتَّى تَخَوَّفْتُ، ثُمَّ تَرَكَ فَتَحَلَّلَ، وَدَفَعْتُهُ ثُمَّ قَتَلْتُهُ، وَانْهَزَمَ الْمُسْلِمُونَ، وَانْهَزَمْتُ مَعَهُمْ، فَإِذَا بِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ فِي النَّاسِ، فَقُلْتُ لَهُ: مَا شَأْنُ النَّاسِ؟ قَالَ: أَمْرُ اللَّهِ، ثُمَّ تَرَاجَعَ النَّاسُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"مَنْ أَقَامَ بَيِّنَةً عَلَى قَتِيلٍ قَتَلَهُ فَلَهُ سَلَبُهُ" فَقُمْتُ لأَلْتَمِسَ بَيِّنَةً عَلَى قَتِيلِي، فَلَمْ أَرَ أَحَدًا
يَشْهَدُ لِي فَجَلَسْتُ، ثُمَّ بَدَا لِي، فَذَكَرْتُ أَمْرَهُ لِرَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ رَجُلٌ مِنْ جُلَسَائِهِ: سِلَاحُ هَذَا الْقَتِيلِ الَّذِي يَذْكُرُ عِنْدِي، فَأَرْضِهِ مِنْهُ. فَقَال أَبُو بَكْرٍ: كَلَّا لَا يُعْطِهِ أُصَيْبغَ مِنْ قُرَيْشٍ، وَيَدَعَ أَسَدًا مِنْ أُسْدِ اللَّهِ، يُقَاتِلُ عَنِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ: فَقَامَ رَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَدَّاهُ إِلَيَّ، فَاشْتَرَيْتُ مِنْهُ خِرَافًا، فَكَانَ أَوَّل مَالٍ تَأَثَّلْتُهُ فِي الإسْلَامِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4322) قال: وقال اللّيث، حَدَّثَنِي يحيى بن سعيد، عن عمر بن كثير بن أفلح، عن أبي محمد مولى أبي قتادة فذكره واللّفظ له، وأسنده في الأحكام (7170) فقال: حَدَّثَنَا قُتَيبة، حَدَّثَنَا اللّيث فذكره مختصرًا.
وأخرجه مسلم في الجهاد (1751) عن قُتَيبة بن سعيد بإسناده ولم يسق لفظ الحديث بل قال: وساق الحديث. أي الحديث الذي بعده، وهذا فيه خلل في الترتيب فإن الإحالة تكون للسابق لا للاحق، ولذا أغربه أيضًا النوويّ.
আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হুনাইনের যুদ্ধ হয়েছিল, তখন আমি একজন মুসলিমকে দেখলাম যে একজন মুশরিকের সাথে যুদ্ধ করছে। আর অপর একজন মুশরিক তার পেছন থেকে তাকে হত্যার জন্য লুকিয়ে সুযোগ খুঁজছিল। তখন আমি দ্রুত সেই ব্যক্তির দিকে এগিয়ে গেলাম যে লুকিয়ে সুযোগ খুঁজছিল। সে আমাকে আঘাত করার জন্য হাত তুলল, আর আমিও তার হাতে আঘাত করলাম এবং সেটি কেটে দিলাম। এরপর সে আমাকে জাপটে ধরল এবং এতো জোরে চেপে ধরল যে আমি ভয় পেয়ে গেলাম। এরপর সে ঢিলা হলো ও আমাকে ছেড়ে দিল। আমি তাকে ধাক্কা দিলাম এবং তাকে হত্যা করলাম। মুসলিমরা তখন ছত্রভঙ্গ হয়ে গিয়েছিল এবং আমিও তাদের সাথে পিছু হটলাম। হঠাৎ দেখি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের মাঝে দাঁড়িয়ে আছেন। আমি তাকে বললাম, লোকেদের কী হয়েছে? তিনি বললেন, আল্লাহর নির্দেশ। এরপর লোকজন আবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে ফিরে এলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো নিহতকে হত্যা করার প্রমাণ পেশ করতে পারবে, তার জন্যই সে নিহত ব্যক্তির সকল মালামাল (সালাব) প্রাপ্য।" আমি আমার নিহত ব্যক্তির সাক্ষ্য তালাশ করার জন্য দাঁড়ালাম, কিন্তু আমার পক্ষে সাক্ষ্য দেওয়ার মতো কাউকে দেখলাম না, তাই আমি বসে গেলাম। এরপর আমার মনে পড়ল, তাই আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে সে বিষয়টি উল্লেখ করলাম। তখন তাঁর (নবীজীর) মজলিসে উপবিষ্ট একজন ব্যক্তি বললেন: এই নিহত ব্যক্তির অস্ত্র যা তিনি উল্লেখ করছেন, তা আমার কাছে আছে। সুতরাং আপনি তাকে (আবূ কাতাদাহকে) তা দিয়ে সন্তুষ্ট করে দিন। তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, কক্ষনো নয়! তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পক্ষে যুদ্ধকারী আল্লাহর সিংহদের মধ্যে একজন সিংহকে ছেড়ে দিয়ে কুরাইশ বংশের একটি অল্পবয়সী ছেলেকে তা (সালাব) দেবেন না। আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ালেন এবং সেটি (সালাব) আমাকে দিয়ে দিলেন। আমি তা দিয়ে কিছু ভেড়া কিনলাম। ইসলামের মধ্যে সেটিই ছিল আমার প্রথম সম্পদ যা আমি সঞ্চয় করেছিলাম।
9060 - عن أنس بن مالك: أن هوازن جاءت يوم حنين بالصبيان والنساء، والإبل والنعم، فجعلوهم صفوفًا، يكثرون على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلمّا التقوا ولى المسلمون مدبرين، كما قال الله عز وجل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عباد الله! أنا عبد الله ورسوله، يا معشر الأنصار! أنا عبد الله ورسوله" فهزم الله المشركين قال عفّان: ولم نضرب بسيف، ولم نطعن برمح فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يومئذ:"من قتل كافرًا فله سلبه" فقتل أبو طلحة يومئذ عشرين رجلًا، وأخذ أسلابهم.
قال: وقال أبو قتادة: يا رسول الله، ضربت رجلًا على حبل العاتق وعليه درع، فأُجهضت عنه، فانظر من أخذها، فقام رجل، فقال: أنا أخذتها، فأرضه منها، وأعطنيها قال: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يسأل شيئًا إِلَّا أعطاه أو سكت، فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال عمر: لا والله لا يفيئها الله على أسد من أسده ويعطيكها فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"صدق عمر".
قال: وكانت أم سليم معها خنجر، فقال أبو طلحة: ما هذا معك؟ قالت: اتخذته إن دنا مني بعض المشركين أن أبعج به بطنه، فقال أبو طلحة: يا رسول الله! ألا تسمع ما تقول أم سليم؟ ! قالت: يا رسول الله! اقتل من بعدنا من الطلقاء، انهزموا بك، قال:"إن الله قد كفانا وأحسن يا أم سليم".
صحيح: رواه أحمد (12977)، (13975) وابن حبَّان (4838) من طرق عن حمّاد بن سلمة، أخبرنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة عن أنس بن مالك فذكره. ورواه مسلم (1809) من هذا
الطريق مقتصرًا على قصة أم سليم.
كما رواه أيضًا أبو داود (2718) ولم يذكر قصة أبي قتادة.
وقال أبو داود: هذا حديث حسن.
وقوله:"ولم نضرب بسيف، ولم نطعن برمح" وفي بعض الروايات:"لم يضرب .. ولم يطعن".
وقوله:"على حبل العاتق" موضع الرداء من العنق، وقيل: عرق أو عصب هناك.
وقوله:"فأجهضت عنه" على بناء المفعول من الاجهاض، بمعنى الإزالة والازلاق، أي: بعدت عنه. اهـ
وقول أم سليم:"اقتل من بعدنا من الطلقاء انهزموا بك" قالت ذلك أم سليم اعتقادا منها بأن الطلقاء هم السبب لما وقع على المسلمين من انهزام في أول الأمر، فرد عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم بقوله: إن الله قد كفى وأحسن. مشيرًا إلى ما وقع للمسلمين من غلبة في نهاية الأمر.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুনায়নের যুদ্ধের দিন হাওয়াজেন গোত্রের লোকেরা শিশু, মহিলা, উট ও গৃহপালিত পশুদের সাথে নিয়ে এসেছিল এবং তাদেরকে কাতারবদ্ধ করে রেখেছিল। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সংখ্যায় অনেক বেশি ছিল। যখন উভয় দল মুখোমুখি হলো, তখন মুসলমানরা পিঠ দেখিয়ে পালিয়ে গেল, যেমন আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আল্লাহর বান্দাগণ! আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল। হে আনসারগণ! আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।" এরপর আল্লাহ মুশরিকদের পরাজিত করলেন। আফ্ফান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমরা তরবারি দ্বারা আঘাত করিনি এবং বর্শা দ্বারা বিদ্ধও করিনি। ঐ দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো কাফিরকে হত্যা করবে, সে তার সম্পদ (সালাব) পাবে।" সে দিন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিশজন লোককে হত্যা করলেন এবং তাদের অস্ত্র ও সম্পদ নিয়ে নিলেন।
তিনি (আনাস) বলেন, আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন লোককে তার ঘাড়ের সংযোগস্থলে (হাবেলুল আতিক) আঘাত করেছিলাম, তার গায়ে বর্ম ছিল। আঘাত করার পর আমি তার কাছ থেকে সরে যাই। দেখুন, কে সেটি (বর্ম) নিয়েছে। তখন একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল, আমি সেটি নিয়েছি। আপনি তাকে (আবু কাতাদাহকে) এর বিনিময়ে সন্তুষ্ট করে দিন এবং আমাকে সেটি দিন। তিনি (আনাস) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে কিছু চাওয়া হলে তিনি হয় তা দিয়ে দিতেন অথবা নীরব থাকতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আল্লাহ তাঁর সিংহদের একজনের উপর গনিমত হিসেবে ফিরিয়ে দিয়েছেন, আর তা আপনাকে দিয়ে দেবেন না! (অর্থাৎ এটা আবু কাতাদাহরই হক)। এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন এবং বললেন, "উমার সত্য বলেছে।"
তিনি (আনাস) বলেন, উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি ছোরা ছিল। আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এটা তোমার কাছে কী? তিনি বললেন, আমি এটা নিয়েছি, যদি কোনো মুশরিক আমার কাছে আসে, তবে আমি এটা দিয়ে তার পেট ফেড়ে দেব। তখন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি শুনছেন না উম্মু সুলাইম কী বলছেন? উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের পরে যারা পালিয়ে গিয়েছিল, সেই 'তুলকাআ' (মুক্ত করে দেওয়া মক্কাবাসী)-দেরকে হত্যা করুন। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে উম্মু সুলাইম! আল্লাহ আমাদের জন্য যথেষ্ট হয়েছেন এবং উত্তম ফায়সালা করেছেন।"
9061 - عن إسماعيل بن أبي خالد قال: رأيت بيد ابن أبي أوفى ضربة قال: ضربتها مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم حنين، قلت: شهدت حنينًا؟ قال: قبل ذلك.
صحيح: أخرجه البخاريّ في المغازي (4314) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون أخبرنا إسماعيل قال: فذكره.
ورواه الإمام أحمد (19131) عن يزيد بن هارون مطولًا.
فقال فيه عبد الله بن أبي أوفى: اعتمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فطاف بالبيت، وطفنا معه، وصلى خلف المقام، وصلينا معه، ثمّ خرج فطاف بين الصفا والمروة، ونحن معه نستره من أهل مكة، لا يرميه أحد، أو يصيبه أحد بشيء، قال: فدعا على الأحزاب فقال:"اللهم منزل الكتاب، سريع الحساب، هازم الأحزاب، الفهم اهزمهم وزلزلهم" قال: ورأيت بيده ضربة على ساعد فقلت: ما هذه؟ قال: ضربتها يوم حنين، فقلت له: أشهدت معه حنينًا؟ قال: نعم وقبل ذلك.
وقوله: قبل ذلك، معناه: أي شهدت حنينًا وكذلك ما قبل حنين من المشاهد.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহ পালন করলেন। তিনি কাবা শরীফ তাওয়াফ করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে তাওয়াফ করলাম। তিনি মাকামে (ইবরাহীমের) পেছনে সালাত আদায় করলেন এবং আমরা তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম। অতঃপর তিনি বের হয়ে সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করলেন, আমরা তাঁর সাথে ছিলাম এবং আমরা তাঁকে মক্কার লোকদের থেকে আড়াল করে রেখেছিলাম, যেন কেউ তাঁকে তীর নিক্ষেপ করতে না পারে বা কোনো কিছু দ্বারা আঘাত করতে না পারে। তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা) বলেন: এরপর তিনি সম্মিলিত শত্রু দল (আহযাব)-এর বিরুদ্ধে বদদোয়া করলেন এবং বললেন: "আল্লাহুম্মা মুনযিলাল কিতাব, সারী‘আল হিসাব, হাযিমাল আহযাব, ইহযিমহুম ওয়া যালযিলহুম" (অর্থাৎ হে আল্লাহ! কিতাব নাযিলকারী, দ্রুত হিসাব গ্রহণকারী, সম্মিলিত শত্রু দলকে পরাভূতকারী! তুমি তাদের পরাজিত করো এবং তাদের ভিত-সন্ত্রস্ত করে দাও)। [রাবী ইসমাইল] বলেন: আর আমি তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা’র) বাহুতে একটি আঘাতের চিহ্ন দেখলাম। আমি জিজ্ঞেস করলাম: এটা কী? তিনি বললেন: হুনায়নের দিন আমি এই আঘাতটি পেয়েছিলাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর) সাথে হুনাইনের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এবং তার আগেও।
9062 - عن أنس أن أم سليم اتخذت يوم حنين خنجرًا فكان معها، فرآها أبو طلحة فقال: يا رسول الله! هذه أم سليم معها خنجر، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما هذا الخنجر؟" قالت: اتخذته إن دنا مني أحد من المشركين بقرت به بطنه، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يضحك، قالت: يا رسول الله! اقتل من بعدنا من الطلقاء، انهزموا
بك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أم سليم! إن الله قد كفى وأحسن".
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1809: 134) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، أخبرنا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس بن مالك قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু সুলাইম হুনাইন যুদ্ধের দিন একটি খঞ্জর (ছোরা) গ্রহণ করলেন এবং সেটি তার সাথেই ছিল। তখন আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখতে পেলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই যে উম্মু সুলাইম, তার সাথে একটি খঞ্জর রয়েছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন, "এই খঞ্জরটি কীসের জন্য?" তিনি বললেন, আমি এটি নিয়েছি যেন মুশরিকদের কেউ যদি আমার কাছে আসে, আমি এর দ্বারা তার পেট ফেড়ে দিতে পারি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসতে লাগলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের পেছনে যারা রয়েছে, সেই মুক্তিপ্রাপ্তদের (তালাকাদের) হত্যা করুন, যারা আপনাকে দেখে পালিয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "হে উম্মু সুলাইম! আল্লাহই যথেষ্ট এবং তিনি উত্তম কাজ করেছেন।"
9063 - عن عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ: شَهِدْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حُنينًا، فَقَالَ لِرَجُلٍ مِمَّنْ يُدْعَى بِالإسْلَامِ:"هَذَا مِنْ أَهْلِ النَّارِ" فَلَمَّا حَضَرْنَا الْقِتَالَ قَاتَلَ الرَّجُلُ قِتَالًا شَدِيدًا فَأَصَابَتْهُ جِرَاحَةٌ، فَقِيلَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! الرَّجُلُ الَّذِي قُلْتَ لَهُ آنِفًا إِنَّهُ مِنْ أَهْلِ النَّارِ، فَإِنَّهُ قَاتَلَ الْيَوْمَ قِتَالًا شَدِيدًا وَقَدْ مَاتَ، فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"إِلَى النَّارِ" فَكَادَ بَعْضُ الْمُسْلِمِينَ أَنْ يَرْتَابَ، فَبَيْنَمَا هُمْ عَلَى ذَلِكَ إِذْ قِيلَ: إِنَّهُ لَمْ يَمُتْ وَلَكِنَّ بِهِ جِرَاحًا شَدِيدًا، فَلَمَّا كَانَ مِنْ اللَّيْلِ لَمْ يَصْبِرْ عَلَى الْجِرَاحِ، فَقَتَلَ نَفْسَهُ، فَأُخْبِرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِذَلِكَ، فَقَالَ:"اللَّهُ أَكْبَرُ، أَشْهَدُ أَنِّي عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ" ثُمَّ أَمَرَ بِلَالًا، فَنَادَى فِي النَّاسِ:"أَنَّهُ لَا يَدْخُلُ الْجَنَّةَ إِلَّا نَفْسٌ مُسْلِمَةٌ، وَأَنَّ اللَّهَ يُؤَيِّدُ هَذَا الدِّينَ بِالرَّجُلِ الْفَاجِرِ".
متفق عليه: أخرجه البخاريّ في الجهاد والسير (3062)، ومسلم في الإيمان (111) كلاهما من حديث عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره، واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। তখন তিনি এক ব্যক্তিকে লক্ষ্য করে, যাকে ইসলামের অনুসারী হিসেবে দাবি করা হচ্ছিল, বললেন: "এ লোকটি জাহান্নামবাসীদের অন্তর্ভুক্ত।" যখন আমরা যুদ্ধে অবতীর্ণ হলাম, লোকটি অত্যন্ত জোরেশোরে যুদ্ধ করল এবং আঘাতপ্রাপ্ত হলো। তখন বলা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি একটু আগে যে লোকটিকে জাহান্নামের অধিবাসী বলেছিলেন, সে আজ কঠোরভাবে যুদ্ধ করেছে এবং মারা গেছে।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে জাহান্নামের দিকেই গেল।" ফলে কিছু মুসলিম সন্দেহগ্রস্ত হওয়ার উপক্রম হলো। তারা যখন এই অবস্থায় ছিল, তখন বলা হলো: "আসলে সে মারা যায়নি, তবে মারাত্মকভাবে আহত হয়েছে।" রাত যখন হলো, সে তার জখমের উপর ধৈর্য ধারণ করতে পারল না, তাই সে আত্মহত্যা করল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে খবর দেওয়া হলো। তখন তিনি বললেন: "আল্লাহু আকবার! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।" এরপর তিনি বিলালকে আদেশ করলেন। বিলাল লোকজনের মধ্যে ঘোষণা করলেন: "মুসলিম ব্যক্তি ব্যতীত কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না, এবং আল্লাহ এই দীনকে ফাসিক (পাপী) ব্যক্তির দ্বারাও সাহায্য করেন।"
9064 - عن عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ: لَمَّا فَرَغَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِنْ حُنينٍ بَعَثَ أَبَا عَامِرٍ عَلَى جَيْشٍ إِلَى أَوْطَاسٍ فَلَقِيَ دُرَيْدَ بْنَ الصمَّةِ، فَقُتِلَ دُرَيْد وَهَزَمَ اللَّهُ أَصْحَابَهُ. قَالَ أَبُو مُوسَى: وَبَعَثَنِي مَعَ أَبِي عَامِرٍ فَرُمِيَ أَبُو عَامِرٍ فِي رُكْبَتِهِ، رَمَاهُ جُشَمِيٌّ بِسَهْمٍ فَأَثْبَتَهُ فِي رُكْبَتِهِ، فَانْتَهَيْتُ إِلَيْهِ فَقُلْتُ: يَا عَمِّ مَنْ رَمَاكَ؟ فَأَشَارَ إِلَى أَبِي مُوسَى فَقَالَ: ذَاكَ قَاتِلِي الَّذِي رَمَانِي. فَقَصَدْتُ لَهُ فَلَحِقْتُهُ، فَلَمَّا رَآنِي وَلَّى، فَاتَّبَعْتُهُ وَجَعَلْتُ أَقُولُ لَهُ: أَلَا تَسْتَحِي، أَلَا تَثْبُتُ. فَكَفَّ فَاخْتَلَفْنَا ضَرْبَتَيْنِ بِالسَّيْفِ فَقَتَلْتُهُ، ثُمَّ قُلْتُ لأَبِي عَامِرٍ: قَتَلَ اللَّهُ صَاحِبَكَ. قَالَ: فَانْزِعْ هَذَا السَّهْمَ، فَنَزَعْتُهُ فَنَزَا مِنْهُ الْمَاءُ. قَالَ: يَا ابْنَ أَخِي أَقْرِئِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم السَّلَامَ، وَقُلْ لَهُ: اسْتَغْفِرْ لِي. وَاسْتَخْلَفَنِي أَبُو عَامِرٍ عَلَى النَّاسِ، فَمَكَثَ يَسِيرًا ثُمَّ مَاتَ، فَرَجَعْتُ فَدَخَلْتُ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي بَيْتِهِ عَلَى سَرِيرٍ مُرْمَلٍ وَعَلَيْهِ فِرَاشٌ قَدْ أَثَّرَ رِمَالُ السَّرِيرِ بِظَهْرِهِ وَجَنْبَيْهِ، فَأَخْبَرْتُهُ بِخَبَرِنَا وَخَبَرِ أَبِي عَامِرٍ، وَقَالَ: قُلْ لَهُ اسْتَغْفِرْ لِي، فَدَعَا
بِمَاءٍ فَتَوَضَّأَ ثُمَّ رَفَعَ يَدَيْهِ فَقَالَ:"اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِعُبَيْدٍ أَبِي عَامِرٍ" وَرَأَيْتُ بَيَاضَ إِبْطَيْهِ، ثُمَّ قَالَ:"اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَوْقَ كَثِيرٍ مِنْ خَلْقِكَ مِنَ النَّاسِ" فَقُلْتُ: وَلي فَاسْتَغْفِرْ. فَقَالَ:"اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِعَبْدِ اللَهِ بْنِ قَيْسٍ ذَنْبَهُ وَأَدْخِلْهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مُدْخَلًا كَرِيمًا" قَالَ أَبُو بُرْدَةَ: إِحْدَاهُمَا لأَبِي عَامِرٍ وَالأُخْرَى لأَبِي مُوسَى.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4323) ومسلم في فضائل الصّحابة (165: 2498) كلاهما من طريق محمد بن العلاء، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى، رضي الله قال: فذكره.
أبو عامر اسمه: عبيد بن سليم بن حضار الأشعري.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুনাইনের যুদ্ধ থেকে অবসর নিলেন, তখন আবূ আমিরকে একটি সৈন্যদলের নেতা করে আওতাসের দিকে পাঠালেন। আবূ আমির দুরাইদ ইবনুস সুম্মার মোকাবিলা করলেন। অতঃপর দুরাইদ নিহত হলো এবং আল্লাহ তার সঙ্গীদের পরাজিত করলেন। আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকেও আবূ আমিরের সঙ্গে পাঠিয়েছিলেন। (যুদ্ধে) আবূ আমিরের হাঁটুর নিচে তীর লাগে। বানু জুশামের এক ব্যক্তি তাকে তীর মেরেছিল, যা তার হাঁটুর নিচে বিদ্ধ হয়ে যায়। আমি তার কাছে গেলাম এবং বললাম, হে চাচা! কে আপনাকে তীর মেরেছে? তিনি (ঘাতকের দিকে) ইশারা করলেন এবং বললেন, ঐ আমার হত্যাকারী, যে আমাকে আঘাত করেছে। আমি তার দিকে লক্ষ্য করে ধাওয়া করলাম এবং তাকে ধরে ফেললাম। যখন সে আমাকে দেখল, সে পিঠ ফিরিয়ে পালিয়ে যেতে লাগল। আমি তার পিছু নিলাম এবং বলতে লাগলাম, তুমি কি লজ্জা পাও না? তুমি কি স্থির হতে পারো না? তখন সে থেমে গেল। আমরা তরবারি দিয়ে দু’বার আঘাত বিনিময় করলাম এবং আমি তাকে হত্যা করে ফেললাম। এরপর আমি আবূ আমিরকে বললাম, আল্লাহ আপনার সঙ্গীকে হত্যা করেছেন। তিনি বললেন, এই তীরটি বের করো। আমি তীরটি বের করলাম, আর তা থেকে পানি বের হয়ে এলো। তিনি (আবূ আমির) বললেন, হে আমার ভাতিজা! নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে আমার সালাম পৌঁছিয়ে দিও এবং তাকে বলো যেন তিনি আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন। আবূ আমির আমাকে লোকদের উপর স্থলাভিষিক্ত করে দিলেন। এরপর তিনি অল্প কিছুক্ষণ থাকলেন, তারপর মারা গেলেন। অতঃপর আমি ফিরে এলাম এবং নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর ঘরে তাঁর কাছে গেলাম। তিনি একটি খেজুর ডালের বুনানো খাটের উপরে ছিলেন। তার উপর একটি বিছানা ছিল, কিন্তু খাটের বুননের দাগ তাঁর পিঠ ও দেহের পার্শ্বদেশে বসে গিয়েছিল। আমি তাঁকে আমাদের খবর ও আবূ আমিরের খবর জানালাম এবং বললাম যে তিনি আপনাকে তার জন্য ক্ষমা চাইতে বলেছেন। তখন তিনি পানি চাইলেন এবং উযূ করলেন। এরপর তিনি দু’হাত উপরে তুললেন এবং বললেন, “হে আল্লাহ! উবাইদ আবূ আমিরকে ক্ষমা করে দাও।” আমি তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। এরপর তিনি বললেন, “হে আল্লাহ! ক্বিয়ামাতের দিন তাকে তোমার সৃষ্টির (অন্যান্য) অনেক মানুষের উপরে স্থান দিও।” আমি বললাম, আমার জন্যও ক্ষমা প্রার্থনা করুন। তিনি বললেন, “হে আল্লাহ! আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়িস (অর্থাৎ আবূ মূসা)-এর গুনাহ ক্ষমা করে দাও এবং ক্বিয়ামাতের দিন তাকে সম্মানিত স্থানে প্রবেশ করাও।” আবূ বুরদাহ বলেন, দু’আগুলোর মধ্যে একটি আবূ আমিরের জন্য এবং অপরটি আবূ মূসার জন্য।
9065 - عن عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ حُنينٍ بَعَثَ جَيْشًا إِلَى أَوْطَاسٍ، فَلَقُوا عَدُوًّا، فَقَاتَلُوهُمْ، فَظَهَرُوا عَلَيْهِمْ، وَأَصَابُوا لَهُمْ سَبَايَا، فَكَأَنَّ نَاسًا مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم تَحَرَّجُوا مِنْ غِشْيَانِهِنَّ مِنْ أَجْلِ أَزْوَاجِهِنَّ من الْمُشْرِكِينَ، فَأَنْزَلَ اللَّهُ عز وجل فِي ذَلِكَ: {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} [النساء: 24] أَيْ: فَهُنَّ لَكُمْ حَلَالٌ إِذَا انْقَضَتْ عِدَّتُهُنَ.
صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1456: 33) عن عبيد الله بن عمر بن ميسرة القواريري، حَدَّثَنَا يزيد بن زريع، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
وأوطاس واد بين الطائف وحنين، وقد فر هوازن بعد هزيمتهم إلى أوطاس، فأرسل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أبا عامر الأشعري إليهم فقاتلهم، فاستشهد بعد أن عيّن أبا موسى الأشعري بعده ففتح الله عليه.
قال ابن إسحاق: ولما انهزم المشركون أتوا الطائف ومعهم مالك بن عوف، وعسكر بعضهم بأوطاس وتوجه بعضهم نحو نخلة. سيرة ابن هشام (2/ 453).
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের যুদ্ধের দিন আওতাসের দিকে একটি সেনাদল প্রেরণ করেন। তারা শত্রুর মোকাবিলা করে, তাদের সাথে যুদ্ধ করে, তাদের উপর বিজয়ী হয় এবং তাদের (শত্রুদের) পক্ষ থেকে যুদ্ধবন্দিনী লাভ করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী তাদের (বন্দিনীদের) সাথে সহবাস করতে দ্বিধা বোধ করেন, কারণ মুশরিকদের মধ্যে তাদের স্বামীরা জীবিত ছিল। তখন আল্লাহ তাআলা এই বিষয়ে এই আয়াত নাযিল করেন: "আর নারীদের মধ্যে যারা বিবাহিত, তবে তোমাদের অধিকারভুক্ত দাসীগণ ছাড়া।" [সূরা নিসা: ২৪] অর্থাৎ: যখন তাদের ইদ্দতকাল শেষ হবে, তখন তারা তোমাদের জন্য হালাল।
9066 - عن حنش الصنعاني قال: غزونا مع رويفع بن ثابت الأنصاري قرية من قرى المغرب يقال لها: جربة، فقام فينا خطيبا فقال: أيها الناس! إني لا أقول فيكم إِلَّا ما سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: قام فينا يوم حنين فقال:"لا يحل لامرئ يؤمن بالله واليوم الآخر أن يسقي ماءه زرع غيره" يعني إتيان الحبالى من السبايا،"وأن يصيب امرأة ثيّبًا من السبي حتَّى يستبرئها" يعني إذا اشتراها"وأن يبيع مغنمًا حتَّى يُقسم، وأن يركب دابة من فيء المسلمين حتَّى إذا أعجفها ردها فيه، وأن يلبس ثوبًا من فيء
المسلمين حتَّى إذا أخلقه رده فيه".
حسن: رواه أبو داود (2159، 2158) (2708) وأحمد (16997) من طريق ابن إسحاق قال: حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن أبي مرزوق مولى تجيب، عن حنش الصنعاني، فذكره، والسياق لأحمد.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنه حسن الحديث إذا صرَّح بالتحديث، وهو مخرج في كتاب البيوع.
রুওয়াইফা' বিন সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। হানাশ আস-সানআনী বলেন: আমরা রুওয়াইফা’ বিন সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মাগরিবের (পশ্চিমাঞ্চলের) জারবা নামক একটি গ্রামে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করি। তিনি আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! আমি তোমাদের কাছে তা-ই বলব যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি। তিনি হুনাইনের যুদ্ধের দিন আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে বলেছিলেন:
'আল্লাহ ও আখেরাতের প্রতি বিশ্বাসী কোনো ব্যক্তির জন্য এটা বৈধ নয় যে, সে তার পানি দ্বারা অন্যের শস্যকে সেচ করবে।' এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, বন্দিনীদের মধ্য থেকে গর্ভবতী দাসীর সাথে সহবাস করা।
'আর কোনো বন্দিনী বিধবাকে (বা অকুমারী নারীকে) ততক্ষণ পর্যন্ত ভোগ করা বৈধ নয়, যতক্ষণ না সে ইস্তিবরা’ (গর্ভাশয় পবিত্র কি না তা নিশ্চিত) করে নেবে।' এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, যখন সে তাকে ক্রয় করবে।
'আর গনীমতের মাল বণ্টন হওয়ার আগে তা বিক্রি করা বৈধ নয়।'
'আর মুসলমানদের ফায় (সাধারণ সম্পদ) থেকে কোনো চতুষ্পদ জন্তুর উপর ততক্ষণ পর্যন্ত আরোহণ করা বৈধ নয়, যতক্ষণ না সে সেটিকে দুর্বল করে তাতে ফিরিয়ে দেবে।'
'আর মুসলমানদের ফায় থেকে কোনো কাপড় ততক্ষণ পর্যন্ত পরিধান করা বৈধ নয়, যতক্ষণ না তা জীর্ণ করে তাতে ফিরিয়ে দেবে।"
9067 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: حاصر رسول الله صلى الله عليه وسلم أهل الطائف فلم ينل منهم شيئًا، فقال:"إنا قافلون إن شاء الله" قال أصحابه: نرجع ولا نفتتحه؟ ! فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اغدوا على القتال" فغدوا عليه فأصابهم جراح، فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنا قافلون غدًا" قال: فأعجبهم ذلك، فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4325) ومسلم في الجهاد والسير (82: 1778) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار) عن أبي العباس الشاعر الأعمى، عن عبد الله بن عمرو قال: فذكره.
وقيل: إن هذا الحديث من مسند عبد الله بن عمر بن الخطّاب، والصواب عبد الله بن عمرو بن العاص.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তায়েফবাসীকে অবরোধ করলেন, কিন্তু তাদের কাছ থেকে (বিজয়ের) কিছুই লাভ করতে পারলেন না। তখন তিনি বললেন: "ইনশাআল্লাহ, আমরা ফিরে যাব।" তাঁর সাহাবীগণ বললেন: আমরা কি ফিরে যাব এবং এটি জয় করব না?! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদেরকে বললেন: "আগামীকাল সকালে তোমরা যুদ্ধের জন্য যাও।" তারা পরের দিন সকালে যুদ্ধের জন্য গেলেন এবং তারা আহত হলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদেরকে বললেন: "আমরা আগামীকাল ফিরে যাব।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন এটা তাদের কাছে খুবই ভালো লাগল (বা তারা এতে আনন্দিত হলেন)। এতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসলেন।