হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (928)


928 - عن أبي بكر الصّديق في حديث الشّفاعة في الموقف وفيه:"ثم يقال: ادعوا الصّدِّيقين فيشفعون، ثم يقال: ادْعُوا الأنبياء، قال: فيجيء النبي ومعه العصابة، والنّبي ومعه الخمسة والسّتة، والنّبيُّ وليس معه أحد. ثم يقال: ادعوا الشّهداء فيشفعون لمن أرادوا، وقال: فإذا فعلت الشُّهداء ذلك. قال: يقول اللَّه عز وجل: أنا أرحم الرّاحمين، أدْخلوا جنَّتِي مَنْ كان لا يُشركُ بي شيئًا. قال: فيدخلون الجنَّةَ".

حسن: رواه الإمام أحمد (15)، وأبو يعلى (56)، والبزّار -كشف الأستار (3465) - كلّهم من طريق النّضر بن شُميل، قال: حدّثني أبو نَعامة، قال: حدّثني أبو هُنيد البراء بن نوفل، عن والان العدَويّ، عن حذيفة، عن أبي بكر الصّديق، فذكره في حديث طويل سبق ذكره والنكارة فيه: تقديم الصديقين على الأنبياء.




আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শাফা‘আত (সুপারিশ) সংক্রান্ত হাদীসে বর্ণিত হয়েছে যে, বিচারের স্থানে (মওকিফে) বলা হবে: এরপর বলা হবে: ‘সিদ্দীকগণকে (সত্যনিষ্ঠদেরকে) ডাকো।’ ফলে তারা সুপারিশ করবে। এরপর বলা হবে: ‘নবীগণকে ডাকো।’ তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তখন নবী আসবেন এবং তাঁর সাথে থাকবে একটি দল, আরেক নবী আসবেন, তাঁর সাথে থাকবে পাঁচ-ছয় জন, আর আরেকজন নবী আসবেন, তাঁর সাথে কেউ থাকবে না। এরপর বলা হবে: ‘শহীদগণকে ডাকো।’ তারা যাদের জন্য ইচ্ছা করবে তাদের জন্য সুপারিশ করবে। তিনি বললেন: শহীদগণ যখন সুপারিশের এই কাজ শেষ করবে, তখন আল্লাহ তা‘আলা বলবেন: ‘আমি সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু। আমার জান্নাতে তাদেরকে প্রবেশ করাও যারা আমার সাথে সামান্যতমও কোনো কিছু শিরক করেনি।’ তিনি বললেন: ফলে তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (929)


929 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الرّجلَ ليشفعُ للرّجلين والثّلاثة، والرّجل للرّجل".
صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (3473) -، وابن خزيمة في التوحيد (624) من طرق عن عبد الرزّاق، أنبأ معمر، عن ثابت، أنه سمع أنس بن مالك يقول (فذكره). وإسناده صحيح.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই একজন ব্যক্তি দুই বা তিনজনের জন্য সুপারিশ করবে এবং একজন ব্যক্তি কেবল একজনের জন্যও সুপারিশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (930)


930 - عن عبد اللَّه بن أبي الجدْعاء، أنّه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"ليُدخلنّ الجنّة بشفاعة رجل من أمّتي أكثر من بني تميم". قالوا: يا رسول اللَّه، سواك؟ قال:"سوايَ".

صحيح: رواه الترمذيّ (2438)، وابن ماجه (4316) -والسياق له- كلاهما من طريق خالد الحذّاء، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن عبد اللَّه بن أبي الجدعاء، فذكره.

وسياق الترمذيّ: قال عبد اللَّه بن شقيق: كنتُ مع رهط بإيلياء، فقال رجل منهم: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث). فلما قام، قلت: من هذا؟ قالوا: هذا ابنُ أبي الجدْعاء.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب، وابن أبي الجدعاء هو عبد اللَّه، وإنّما يعرف له هذا الحديث الواحد" انتهى.

قلت: إسناده صحيح، وأخرجه ابن خزيمة في التوحيد (619)، وابن حبان في صحيحه (7336)، والحاكم (1/ 70، 71)، والبيهقي في دلائل النّبوة (6/ 378) كلّهم من طريق خالد الحذّاء.

وكان الحسن يقول:"هو أويس القرني". وفي رواية"عثمان".




আব্দুল্লাহ ইবনু আবিল জাদ্‌আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার উম্মতের একজন লোকের সুপারিশের কারণে বনু তামিম গোত্রের লোকদের চেয়েও বেশি লোক জান্নাতে প্রবেশ করবে।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি ছাড়া?" তিনি বললেন, "আমি ছাড়া।"









আল-জামি` আল-কামিল (931)


931 - عن أبي بكرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يُحمل النّاس على الصراط يوم القيامة، فتقادعُ بهم جنبتا الصّراط تقادعُ الفراش في النّار. قال: فينجّي اللَّهُ برحمته من يشاء". قال:"ثم يؤذن للملائكة والنّبيين والشّهداء أن يشفعوا، فيشفعون ويخرجون، ويشفعون ويُخرجون، ويشفعون ويُخرجون، وزاد عفان: مرة فقال أيضًا ويشفعون ويُخرجون مَنْ كان في قلبه ما يزن ذرّة من إيمان".

حسن: رواه الإمام أحمد (20440)، والبزّار -البحر الزّخار (3671) -، والطبرانيّ في الصغير (929)، وابن أبي عاصم في السنة (838) كلّهم من حديث عفّان بن مسلم، حدّثنا سعيد بن زيد، قال: سمعت أبا سليمان العصريّ، حدّثنا عقبة بن صُهبان، عن أبي بكرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده حسن من أجل سعيد بن زيد وهو أخو حمّاد بن زيد فإنه حسن الحديث، وأبو سليمان العصريّ وثقه ابن معين كما روى ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 380) وسمّاه الدَّولابيّ في الكنى (1/ 195) كعب بن شبيب، وأخرج الحديث من طريق آخر عن سعيد بن زيد بإسناده، مثله.

وقال البزّار:"لا نعلمه رواه بهذا اللّفظ إِلَّا أبو بكرة، وإسناده مرضيون". وصحّح رجاله أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (10/ 359).




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামতের দিন মানুষকে পুলসিরাতের উপর বহন করা হবে। সিরাতের উভয় পার্শ্ব দিয়ে তারা পতঙ্গ যেভাবে আগুনে পড়ে, সেভাবে নিক্ষিপ্ত হতে থাকবে। তিনি বললেন: অতঃপর আল্লাহ্ তাঁর রহমতে যাকে ইচ্ছা মুক্তি দেবেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এরপর ফেরেশতাগণ, নবীগণ এবং শহীদগণকে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে। অতঃপর তারা সুপারিশ করবে এবং (যাদের জন্য সুপারিশ করবে) তাদের বের করে আনবে। তারা সুপারিশ করবে এবং তাদের বের করে আনবে। তারা সুপারিশ করবে এবং তাদের বের করে আনবে। আর আফ্ফান (বর্ণনা করার সময়) একবার বাড়িয়ে বলেছেন, তিনি আরো বললেন: তারা সুপারিশ করবে এবং এমন ব্যক্তিকে বের করে আনবে যার অন্তরে অণু পরিমাণ ঈমান রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (932)


932 - عن أنس بن مالك، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خررتُ ساجدًا فأسجد سجودي أوّل مرة ومثله معه، ويفتح لي من الثّناء والتّحميد مثل ذلك، ثم يقال: سلْ تُعْطَه،
واشْفع تُشفَّع، فأقول: يا ربّ ذرية آدم لا تُحرق اليوم بالنّار، فيقول: اذهبوا فمن وجدتم في قلبه مثقال ذرّة من إيمان فأخرجوه، فيُخرجون ما يعلم عدَّتهم إِلَّا اللَّه عز وجل، ويبقى أكثرهم، ثم يؤذن لآدم بالشّفاعة فيشفع لعشرة آلاف ألف، ثم يؤذن للملائكة والنّبيين فيشفعون حتى إنّ المؤمن ليشفعُ لأكثر من ربيعة ومضر".

حسن: رواه الآجرّي في الشّريعة (809) عن أبي بكر جعفر بن محمد الفريابيّ، قال: حدّثنا قتيبة بن سعيد، قال: حدّثنا اللّيث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن أنس ابن مالك، فذكر الحديث بطوله، وسبق كاملا في الشّفاعة لأهل الموقف.

وإسناده حسن من أجل الكلام في سعيد بن أبي هلال اللّيثيّ، غير أنه حسن الحديث.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি সিজদায় লুটিয়ে পড়ব, অতঃপর আমি আমার সিজদা প্রথমবার করব এবং অনুরূপ আরও একবার করব। এবং অনুরূপভাবে আমার জন্য প্রশংসা ও গুণকীর্তনের দ্বার খুলে দেওয়া হবে। এরপর বলা হবে: চাও, তোমাকে দেওয়া হবে; সুপারিশ করো, তোমার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে। তখন আমি বলব: হে আমার রব, আজ আদম-সন্তানদেরকে আগুনে পোড়াবেন না। তিনি বলবেন: তোমরা যাও, যাদের অন্তরে তোমরা অণু পরিমাণও ঈমান পাবে, তাদের বের করে আনো। তখন তারা এমন সংখ্যক লোককে বের করে আনবে যাদের সংখ্যা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা ছাড়া আর কেউ জানে না। আর তাদের অধিকাংশ (জাহান্নামে) থেকে যাবে। এরপর আদম (আ)-কে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে, তখন তিনি এক কোটি লোকের জন্য সুপারিশ করবেন। এরপর ফিরিশতা ও নবিগণকে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে, অতঃপর তাঁরা সুপারিশ করবেন। এমনকি একজন মুমিনও রাবীআহ ও মুদার (গোত্রের) চেয়েও বেশি লোকের জন্য সুপারিশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (933)


933 - عن حذيفة بن اليمان، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يُخرجُ اللَّهُ قومًا مُنْتنين قد محشتْهم النَّارُ بشفاعة الشّافعين، فيدخلهم الجنّة، فيُسَمَّون الجهنميُّون".

حسن: رواه الإمام أحمد (23423)، وأبو داود الطيالسيّ في"مسنده" (420) ومن طريقه ابنُ خزيمة (545)، والآجريّ في الشّريعة (805) كلّهم من طريق شعبة، عن حمّاد، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل حمّاد وهو ابن أبي سليمان، فإنه حسن الحديث.

تنبيه: وقع سقط في مسند أبي داود الطَّيالسيّ في طبعة المعارف القديمة، فإنّ الإسناد الذي ذكر فيه وهو:"حدّثنا أبو عوانة، عن أبي مالك، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة". هو لمتن آخر سقط منه وهو:"كلّ معروف صدقة". وكذا رواه أيضًا مسلم (1005) من طريق أبي عوانة، بإسناده.

وأمّا متن هذا الحديث فإسناده كما ذكرناه، وبهذا الإسناد أخرجه ابن خزيمة والآجري فلا يكون أبو مالك الأشجعيّ متابعًا لحماد بن أبي سليمان؛ لأنّ هذا الحديث يدور على حمّاد بن أبي سليمان، وعنه رواه شعبة كما مضى، ومحمد بن جعفر عند الإمام أحمد (23423)، وابن خزيمة (542)، وحماد بن سلمة، وهشام الدّستوائيّ عند ابن أبي عاصم في السنة (835، 836) كلّهم عن حمّاد بن أبي سليمان، بإسناده، مثله.

وقد نبّه على سقط المتن المشار إليه، الدكتور محمد بن عبد المحسن التركي في تحقيق مسند أبي داود الطيالسيّ فجزاه اللَّه خيرًا.




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ সুপারিশকারীদের সুপারিশের ফলে এমন কিছু সম্প্রদায়কে (জাহান্নাম থেকে) বের করবেন, যাদের শরীর দুর্গন্ধযুক্ত এবং আগুন যাদেরকে ঝলসে দিয়েছে। অতঃপর তিনি তাদেরকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন এবং তাদেরকে 'জাহান্নামী' নামে ডাকা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (934)


934 - عن أبي أمامة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرجُ من النّار بشفاعة رجل من أمّتي أكثر من ربيعة ومضر".

حسن: رواه الطّبرانيّ في الكبير (8/ 330) عن أحمد بن داود المكيّ، ثنا مسلم بن إبراهيم، ثنا مبارك بن فضالة، عن أبي غالب، عن أبي أمامة، فذكره.
وأبو غالب صاحب أبي أمامة مختلف فيه، فضعّفه النسائيّ وأبو حاتم وابن حبان، ووثقه الدارقطنيّ، ويُحسَّن حديثُه في الشّواهد والمتابعات، وقد توبع.

رواه الإمام أحمد (22215)، والآجريّ في الشّريعة (817) كلاهما من حديث حريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن ميسرة، عن أبي أمامة قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ليدخلن الجنّة بشفاعة رجل ليس بنبي مثلُ الحيَّين -أو مثل أَحد الحيين-: ربيعة ومضر". فقال رجل: يا رسول اللَّه، أو ما ربيعة من مضر؟ فقال:"إنّما أقول ما أُقَوَّل".




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের একজন ব্যক্তির সুপারিশে রবী‘আহ ও মুদার গোত্রের লোকসংখ্যার চেয়েও বেশি লোককে জাহান্নাম থেকে বের করা হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (935)


935 - عن عتبة بن عبد السُّلميّ، قال: جاء أعرابي إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: ما حوضُك الذي تُحدِّث عنه؟ قال:"كما بين البيضاء إلى بصري يمدُّني اللَّه فيه بكُراعٍ لا يدري إنسانٌ مِمَّن خُلق أين طرفاه"، فكبَّر عمر بن الخطّاب، فقال:"أما الحوض فيرد عليه فقراء المهاجرين الذين يقاتلون في سبيل اللَّه، ويموتون في سبيل اللَّه. فأرجو أن يُورِثَني الكُرَاع فأشرب منه". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ ربي وعدني أن يدخل الجنّة من أمتي سبعين ألفًا بغير حساب، ثم يشفع كلُّ ألف لسبعين ألفًا، ثم يَحثي ربي تبارك وتعالى بكفيه ثلاث حَثَيَات". فكبَّر عمر وقال: إنّ السَّبعين الأُوّلى ليشفعهم اللَّه في آبائهم، وأبنائهم، وعشائرهم. وأرجو أن يجعلني اللَّهُ في إحدى الحثيات الأواخر". فقال الأعرابيُّ: يا رسول اللَّه، فيها فاكهةٌ؟ قال:"نعم وفيها شجرة تدعى طوبى هي تطابق الفردوس". فقال: أيّ شجر أرضنا تُشبه؟ قال:"ليس تشبه من شجر أرضك، ولكن أتيتَ الشّام؟". قال: لا يا رسول اللَّه، قال:"فإنَّها تشبه شجرة في الشّام تُدعى الجوْزَةَ تنبت على ساق واحد، ثم ينتشر أعلاها". قال: فما عِظم أصلها؟ قال:"لو ارتحلتَ جذعةً من إبل أهلك لما قطعتها حتى تنكسر ترقوتُها هَرَمًا". قال: فيها عنب؟ قال:"نعم". قال: ما عظم العنقود منها؟ قال:"مسيرة شهر للغراب الأبقع لا ينثني ولا يفتر". قال: فما عظم الحبة منه؟ قال: هل ذبح أبوك من غنمه تيسًا عظيمًا؟ قال:"نعم". قال: فسلخ إهابها فأعطاه أمَّك، فقال ادبغي هذا ثم افري لنا منه ذنوبا نروي به ماشيتنا". قال: نعم. قال: فإن تلك الحبة تشبعني وأهل بيتي فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"وعامة عشيرتك".

حسن: رواه الطَّبرانيّ في"الأوسط" (404) واللّفظ له، وفي"الكبير" (17/ 126 - 127)، وأحمد (17642) مختصرًا كلّهم من طريق عامر بن زيد البكاليّ، أنه سمع عتبة بن عبد السّلميّ، فذكره. وصحّحه ابن حبان (6450).

وإسناده حسن، عامر بن زيد البكاليّ، ذكره ابن حبان في الثقات (5/ 191)، وابن أبي حاتم
في الجرح والتعديل ولم يذكر فيه شيئًا، وهو من رجال التعجيل (505)، ولما قال الحسيني:"ليس بالمشهور" تعقبه الحافظ فقال:"بل معروف" وأطال في ذكره، والخلاصة أنه حسن الحديث.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 414) وقال:"رواه الطّبرانيّ في"الأوسط" واللّفظ له، وفي"الكبير"، وأحمد باختصار عنهما وفيه عامر بن زيد البكاليّ، وقد ذكره ابن أبي حاتم ولم يجرحه ولم يوثقه، وبقية رجاله ثقات".

وقوله:"بكراع" أي بطرف من ماء الجنّة.

قال في النهاية:"وفي حديث الحوض:"فبدأ اللَّه بكراع" أي طرف من ماء الجنّة، فشبّه بالكراع لقلته وأنه كالكراع من الدَّابة".

وفي الباب أيضًا ما رُوي مرسلًا عن الحسن، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:

"يشفع عثمان بن عفّان يوم القيامة في مثل ربيعة ومضر".

رواه الترمذيّ (2439)، والآجريّ في الشريعة (818) كلاهما من حديث جسر أبي جعفر، عن الحسن، فذكره.

وهو مع إرساله ضعيف؛ لأنّ جسرًا وهو ابن فرقد القصّاب أبو جعفر، وقيل: جسر بن الحسن اليمامي ولكن كنيته أبو عثمان، كلاهما في طبقة واحدة يرويان عن الحسن إِلَّا أن الأوّل ضعيف، والثاني صدوق، والغالب أنه الأوّل لأنه يكنى بأبي جعفر.

ولكن رواه الإمام أحمد في الزهد (671)، والحاكم (3/ 405) كلاهما من وجهين مختلفين عن الحسن، فذكر مثله.

قال الحسن كما في الزهد:"كانوا يرونه عثمان بن عفان أو أويس القرنيّ".

وفي المستدرك: قال أبو بكر بن عياش:"فقلت لرجل من قومه: أويس بأي شيء بلغ هذا؟ قال: فضل اللَّه يؤتيه من يشاء".

وفي الباب ما رُوي عن الحارث بن أُقيش مرفوعًا:"إنّ من أمّتي مَنْ يدخلُ الجنّة بشفاعته أكثر من مضر، وإنّ من أمّتي من يعظم للنار حتى يكون أحدَ زواياها". وفيه عبد اللَّه بن قيس النخعيّ مجهول.

رواه ابن ماجه (323) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن داود بن أبي هند، قال: حدّثنا عبد اللَّه بن قيس، قال: كنت عند أبي بردة، ذات ليلة، فدخل علينا الحارث بن أقيش، فحدثنا الحارث ليلتئذ أن رسول اللَّه قال (فذكر الحديث).

وأخرجه الإمام أحمد (17858)، وابن خزيمة في كتاب التوحيد (621)، والحاكم في المستدرك (1/ 71) وقال:"صحيح على شرط مسلم". والحافظ ابن حجر في الإصابة في ترجمة الحارث بن أقيش (1/ 273) وقال:"أخرج ابن ماجه حديثه في الشّفاعة بسند صحيح". وله حديث آخر فيمن مات له ثلاثة من الولد.
وقد أخرجه ابن خزيمة (أي في التوحيد) مجموعًا إلى الحديث الآخر، ووقع عند البغويّ تصريحه بسماعه من النّبيّ صلى الله عليه وسلم". انتهى كلامه.

قلت: في الإسناد عبد اللَّه بن قيس وهو ليس من رجال مسلم، وإنّما أخرج له ابن ماجه.

وهو ممن ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا فهو في عداد المجهولين. وكذا قال الحافظ في التقريب:"مجهول". ونقل في التهذيب عن علي بن المديني أنه جهله. ولم يوثقه الذّهبيّ في الكاشف، وإنّما اكتفى بقوله: روى عنه داود بن أبي هند - يعني أنه مجهول. وقال في"الميزان" عنه داود بن أبي هند، ولعله الذي قبله - أي عبد اللَّه بن قيس، عن ابن عباس: لا يدري من هو؟ تفرّد عنه أبو إسحاق" انتهى كلامه.

وأخرجه البخاريّ في التاريخ الكبير (2/ 261) من طريق داود بن أبي هند بإسناده مكتفيًا بحديث الشّفاعة وقال:"إسناده ليس بذاك المشهور".

وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر قال: يقول النّبيُّ صلى الله عليه وسلم للرّجل:"يا فلان قم فاشفع، فيقوم الرجل فيشفع للقيلة، ولأهل البيت، وللرّجل وللرّجلين على قدر عمله".

رواه ابن خزيمة في التوحيد (623) عن إسحاق بن إبراهيم بن حبيب بن الشّهيد، قال: حدّثنا يحيى بن يمان، عن سفيان، عن آدم بن علي، عن ابن عمر، فذكره.

ويحيى بن يمان العجليّ الكوفيّ مختلف فيه فمشاه ابن معين في رواية، وضعّفه في رواية، وأكثر أهل العلم على تضعيفه لسوء حفظه حتى قال ابن عدي بعد أن أخرج عدّة من أحاديثه:"ولابن يمان عن الثوريّ غير ما ذكرت، وعامّة ما يرويه غير محفوظ، وابن يمان في نفسه لا يتعمّد الكذب، إِلَّا أنّه يخطئ ويشتبه عليه".




উতবাহ ইবনু আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞেস করল, আপনি যে হাউয (হাউজে কাউসার) সম্পর্কে আলোচনা করেন, তা কেমন? তিনি বললেন: 'তা বাইদা থেকে বসরা (শহর) পর্যন্ত বিস্তৃত। আল্লাহ তা'আলা এটিকে (জান্নাতের) পানির এক ক্বুরা' (প্রবাহ) দ্বারা পূর্ণ করবেন, যার উভয় প্রান্ত সৃষ্টিকুলের কেউ জানে না।'

তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'তবে ঐ হাউযে তারাই আগমন করবে যারা আল্লাহর পথে যুদ্ধ করে এবং আল্লাহর পথে মৃত্যুবরণকারী মুহাজিরদের মধ্য থেকে দরিদ্র। আমি আশা করি, আল্লাহ আমাকে সেই ক্বুরা' এর উত্তরাধিকারী করবেন এবং আমি তা থেকে পান করব।'

আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'আমার রব আমাকে প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন যে, আমার উম্মাতের সত্তর হাজার লোককে বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। এরপর প্রত্যেক এক হাজার ব্যক্তি সত্তর হাজার লোকের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) করবে। অতঃপর আমার রব তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তাঁর উভয় মুষ্টি দ্বারা আরও তিন মুষ্টি (মানুষকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন)।'

তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললেন এবং বললেন: 'নিশ্চয় আল্লাহ প্রথম সত্তর হাজারকে তাদের পিতা-মাতা, সন্তান-সন্ততি এবং গোত্রের লোকদের জন্য শাফা‘আত করার অনুমতি দেবেন। আমি আশা করি, আল্লাহ আমাকে শেষ মুষ্টিগুলোর (মানুষের) অন্তর্ভুক্ত করবেন।'

তখন বেদুঈন জিজ্ঞেস করল: 'হে আল্লাহর রাসূল, তাতে কি ফলমূল থাকবে?' তিনি বললেন: 'হ্যাঁ, আর তাতে 'ত্বূবা' নামক একটি গাছ থাকবে, যা জান্নাতুল ফিরদাউসের অনুরূপ।'

সে জিজ্ঞেস করল: 'আমাদের দুনিয়ার কোন গাছের সাথে তা সাদৃশ্যপূর্ণ?' তিনি বললেন: 'তা তোমাদের দুনিয়ার কোনো গাছের মতো নয়। তবে আপনি কি শাম (সিরিয়া) দেশে এসেছেন?' সে বলল: 'না, হে আল্লাহর রাসূল।' তিনি বললেন: 'তবে তা শামের একটি গাছের মতো, যাকে 'জাওযাহ' বলা হয়। তা একটি মাত্র কাণ্ডের উপর জন্মায়, এরপর তার উপরের অংশ ছড়িয়ে পড়ে।'

সে জিজ্ঞেস করল: 'তার মূল কতটুকু বিশাল?' তিনি বললেন: 'যদি তুমি তোমার পরিবারের একটি শক্তিশালী উটনীতে চড়ে তাতে ভ্রমণ করো, তবে বার্ধক্যজনিত কারণে তার ঘাড়ের অস্থি ভেঙে যাওয়ার পূর্ব পর্যন্ত তুমি তা অতিক্রম করতে পারবে না।'

সে জিজ্ঞেস করল: 'তাতে কি আঙ্গুর থাকবে?' তিনি বললেন: 'হ্যাঁ।' সে বলল: 'তার আঙ্গুরের থোকা কতটুকু বিশাল হবে?' তিনি বললেন: 'একটি সাদা-কালো চড়ুই পাখির এক মাসের ভ্রমণ পথের সমান হবে, যা মোড় নেয় না এবং ক্লান্তও হয় না।'

সে জিজ্ঞেস করল: 'তবে তার একটি আঙ্গুরের দানা কত বড় হবে?' তিনি বললেন: 'তোমার পিতা কি তার ছাগলের মধ্য থেকে কখনো একটি বিশাল পুরুষ ছাগল যবেহ করেছেন?' সে বলল: 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন: 'তখন সে তার চামড়া ছাড়িয়ে তোমার মাকে দিয়েছিল এবং বলেছিল যে, এটি দাবাগাত (চামড়া পাকা) করে নাও, অতঃপর তা থেকে আমাদের জন্য একটি 'যানুব' (বড় চামড়ার মশক) তৈরি করে দাও, যা দ্বারা আমরা আমাদের পশুদের পানি পান করাবো?' সে বলল: 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন: 'তবে সেই আঙ্গুরের একটি দানাই তোমাকে এবং তোমার পরিবারকে তৃপ্ত করার জন্য যথেষ্ট হবে।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'এবং তোমার গোত্রের বেশিরভাগ লোককেও।'









আল-জামি` আল-কামিল (936)


936 - عن حذيفة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يقول إبراهيم يوم القيامة: يا ربَّاه، فيقول الرَّبُّ جَلَّ وعلا: يا لبَّيكاه فيقول إبراهيم: يا ربّ، حرَّقْتَ بنيَّ. فيقول: أخرجوا من النّار من كان في قلبه ذرّةً، أو شعيرة من إيمان".

صحيح: رواه ابنُ حبان (7378) عن محمد بن الحسن بن مكرم، قال: حدّثنا سُريج بن يونس، قال: حدّثنا مروان بن معاوية، قال: حدّثنا أبو مالك الأشجعيّ، عن حذيفة، فذكره. وإسناده صحيح.

وفي الباب ما رُوي عن ربعي بن حراش قال: لقيت عبد اللَّه بن سلام فقال: ألا أحدثك حديثًا أجده في كتاب اللَّه عز وجل:"إنّ اللَّه يخرج قومًا من النّار حتى إنّ إبراهيم خليل الرّحمن يقول: أي ربّ، حرَّقْت بني، فيخرجون".
رواه ابن خزيمة في التوحيد (627)، والطبرانيّ في الكبير (قطعة من الجزء 13 - 14 (396) كلاهما من حديث أبي داود، حدّثنا شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش قال: قدمتُ المدينة فلقيتُ عبد اللَّه بن سلام، فذكره.

ولفظهما سواء إِلَّا أنه ذكر في الطبرانيّ خرشة بن الحرّ، وكذلك ذكره أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (10/ 381)، وعزاه إلى الطبرانيّ وقال:"رجاله رجال الصّحيح".

وخرشة بن الحرّ من كبار التّابعين روى عن عبد اللَّه بن سلام، وعنه ربعي بن حراش، ولم أرَ أنَّ ربعي بن حراش روي عن عبد اللَّه بن سلام فالذي يظهر أنّه سقط في إسناد ابن خزيمة خرشة بن الحرّ. ثم هذا لم يسنده عبد اللَّه بن سلام إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم.

وقوله:"أجده في كتاب اللَّه" لعلّه يقصد به التَّوراة؛ لأنّه لا يوجد مثل هذا في القرآن الكريم.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ইবরাহীম (আঃ) কিয়ামতের দিন বলবেন: "হে আমার রব!" তখন মহিমান্বিত রব বলবেন: "আমি তোমার ডাকে সাড়া দিতে প্রস্তুত!" তখন ইবরাহীম বলবেন: "হে রব, আপনি আমার সন্তানদের জ্বালিয়ে দিলেন।" তখন (আল্লাহ) বলবেন: "যার অন্তরে অণু পরিমাণ অথবা যব পরিমাণ ঈমান আছে, তাকে জাহান্নাম থেকে বের করে আনো।"









আল-জামি` আল-কামিল (937)


937 - عن مقدام بن معدي كرب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"للشّهيد ستُّ خصال: يُغفر له في أول دَفْعةٍ، ويرى مقعده من الجنّة، ويجار من عذاب القبر، ويأمن من الفزع الأكبر، ويوضع على رأسه تاج الوقار: الياقوتةُ منها خيرٌ من الدُّنيا وما فيها، ويزوّج اثنين وسبعين زوجة من الحور العين، ويُشفَّع في سبعين من أقاربه".

حسن: رواه الترمذيّ (1661) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، حدّثنا نُعيم بن حمّاد، حدّثنا بقية ابن الوليد، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معدي كرب، فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب".

قلت: فيه بقية بن الوليد وهو مدلّس وقد عنعن، ولكنّه توبع.

رواه ابن ماجه (2799)، والآجري في الشريعة (811)، وأحمد (17182) كلّهم من طرق عن إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعد، بإسناده إِلَّا أن الآجرّي قال:"تسع خصال". وزاد الجميع خصلة واحدة وهي:"ويحلّى حلّة الإيمان".

وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن أهل بلده، وبحير بن سعد من أهل بلده، وباقي رجاله ثقات.

وأمّا قوله:"ست خصال" أو"تسع خصال". والعدد الصّحيح في المتن"ثمان خصال". وفي بعض الرّوايات تكرار الزواج هكذا: ويزوَّج من الحور العين، ويزوَّج اثنين وسبعين من الحور العين".

وأظنّ هذا كلّه من تخليط إسماعيل بن عياش، لأنّه كان مختلطًا في غير أهل بلده، وهذا لا يمنع أن يقع له الاختلاط أيضًا في أهل بلده أحيانًا.
فإذا صحّ تكرار الزواج صحَّ عدد الخصال وهو تسع.

ولعلّ ممّا اضطرب فيه إسماعيل بن عياش أنه جعل هذا الحديث مرة من مسند معد يكرب، كما جعل أخرى من مسند عبادة بن الصّامت.

رواه الآجريّ في الشّريعة (812) من طريقه عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير ابن مرة، عن عبادة بن الصّامت، فذكره.

ولكن هذا لا يعلّل ما ثبت، أو أنّ هذا الحديث رُوي عن صحابين وكلاهما صحيح.




মিকদাম ইবনে মা’দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “শহীদের জন্য ছয়টি বিশেষ প্রাপ্তি রয়েছে: প্রথম রক্তবিন্দু পড়ার সাথে সাথেই তার গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়, সে জান্নাতে তার অবস্থান দেখতে পায়, তাকে কবরের আযাব থেকে রক্ষা করা হয়, সে মহাত্রাস (কিয়ামতের দিনের ভয়) থেকে নিরাপদ থাকে, তার মাথায় মর্যাদার মুকুট পরিয়ে দেওয়া হয়—যার একটি ইয়াকুত দানা পৃথিবী এবং এর মধ্যে যা কিছু আছে, তার চেয়েও উত্তম—তাকে বাহাত্তর জন সুন্দরী হুর-আইনের সাথে বিবাহ দেওয়া হয় এবং তাকে তার সত্তর জন নিকটাত্মীয়ের জন্য সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (938)


938 - عن أبي الدّرداء قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يُشفَّع الشّهيد في سبعين من أهل بيته".

حسن: رواه أبو داود (2522) ومن طريقه البيهقيّ (9/ 164) عن أحمد بن صالح، حدّثنا يحيى ابن حسان، حدّثنا الوليد بن رباح الذَّماريّ، حدّثني عمي نمران بن عتبة الذَّماريّ، قال: دخلنا على أمّ الدّرداء ونحن أيتام، فقالت: أبشروا فإنّي سمعتُ أبا الدّرداء يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم (فذكره).

وإسناده حسن من أجل نمران بن عتبة روى عنه حريز بن عثمان، وشيوخ حريز كلّهم ثقات، ولم يوثقه أحدٌ وإنّما ذكره ابن حبان في"ثقاته" (7/ 544) وروى من طريقه في صحيحه (4660)، ومن طريقه رواه أيضًا الآجريّ في الشّريعة (814).

أمّا الوليد بن رباح الذّماريّ فقال أبو داود:"صوابه: رباح بن الوليد". وهو: رباح بن الوليد بن يزيد بن نمران الذَّماريّ فانقلب على بعض الرّواة فقالوا: الوليد بن رباح الذّماريّ وهو"صدوق".

وفي الباب عن عثمان بن عفّان مرفوعًا:"يشفع يوم القيامة ثلاثة: الأنبياء، ثم العلماء، ثم الشّهداء".

رواه ابن ماجه (4313) عن سعيد بن مروان قال: حدّثنا أحمد بن يونس، قال: حدّثنا عنبسة ابن عبد الرحمن، عن عِلاق بن أبي مسلم، عن أبان بن عثمان، عن عثمان بن عفّان، فذكره.

وفيه عنبسة بن عبد الرحمن الأمويّ جمهور أهل العلم متفقون على تضعيفه، وقد رماه أبو حاتم بالوضع، وشيخه علاق بن مسلم أو ابن أبي مسلم"مجهول".




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: শহীদ তার পরিবারের সত্তর জনের জন্য সুপারিশ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (939)


939 - عن أبي أمامة الباهليّ، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"اقرأوا القرآن، فإنّه يأتي يوم القيامة شفيعًا لأصحابه، اقرأوا الزّهراوين البقرة وسورة آل عمران، فإنّهما تأتيان يوم القيامة كأنهما غمامنان، أو كأنهما غياتيان، أو كأنهما فرقان من طير صوافّ تُحاجّان عن أصحابهما. اقرأوا سورة البقرة، فإنّ أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (804) عن الحسن بن علي الحلوانيّ، حدّثنا أبو توبة (وهو الربيع بن نافع)، حدّثنا معاوية (يعني ابن سلّام)، عن زيد، أنه سمع أبا سلّام يقول: حدّثني أبو أمامة، فذكره.

وزيد هو أخو معاوية بن سلّام بن أبي سلّام، فيكون أبو سلّام هو جدّ زيدٍ.




আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: তোমরা কুরআন পাঠ করো। কেননা তা ক্বিয়ামতের দিন তার পাঠকের জন্য সুপারিশকারী হিসেবে আগমন করবে। তোমরা 'আয-যাহরাওয়াইন' (উজ্জ্বলতম দু'টি সূরা) অর্থাৎ সূরা আল-বাক্বারাহ এবং সূরা আলে ইমরান পাঠ করো। কেননা, এই দু'টি সূরা ক্বিয়ামতের দিন আগমন করবে যেন তারা দু'টি মেঘখন্ড, অথবা দু'টি ছায়াদানকারী, অথবা ডানা মেলে উড়ে বেড়ানো পাখির দু'টি ঝাঁক; তারা তাদের পাঠকের পক্ষ থেকে তর্ক করবে (সুপারিশ করবে)। তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ পাঠ করো। কারণ তা গ্রহণ (তথা তিলাওয়াত করা) বরকত এবং তা ত্যাগ করা আক্ষেপের কারণ। আর বাতিলপন্থীরা (জাদুকররা) এর উপর বিজয় লাভ করতে পারে না।









আল-জামি` আল-কামিল (940)


940 - عن أبي هريرة مرفوعًا:"إنّ سورة من القرآن ثلاثون آية شفعت لرجل حتى غفر له هي: {تَبَارَكَ الَّذِي بِيَدِهِ الْمُلْكُ}".

حسن: رواه أبو داود (1400)، والترمذيّ (2891)، وابن ماجه (3786)، وصحّحه ابن حبان (787)، والحاكم (1/ 565) كلّهم من طريق شعبة، عن قتادة، عن عباس الجشميّ، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عباس الجشمي واسم أبيه عبد اللَّه، ذكره ابن حبان في ثقاته، وأخرج حديثه في صحيحه، وصحّحه أيضًا الحاكم، وحسّنه الترمذيّ، وهو من التابعين، وروى عنه جمعٌ، فلا بأس من تحسين حديثه وخاصة في الفضائل والأحكام.

وأمّا ما نقل عن البخاريّ أن الجشمي لم يذكر سماعا فلم أجده في التاريخ (7/ 4)، وإنْ وجد في بعض النسخ فذلك راجع إلى مذهبه، والجشمي لم يتهم بالتدليس، فعنعنته تحمل على الاتصال كما هو رأي الجمهور.

وفي الباب ما رُوي عن علي بن أبي طالب مرفوعًا:"من قرأ القرآن واستظهره، فأحلَّ حلاله، وحرَّم حرامه، أدخله اللَّه به الجنّة، وشفَّعه في عشرة من أهل بيته كلّهم وجبت له النّار".

رواه الترمذيّ (2905) واللّفظ له، وابن ماجه (216) كلاهما من طريق حفص بن سليمان أبي عمرو، عن كثير بن زاذان، عن عاصم بن ضمرة، عن علي بن أبي طالب، فذكره. واختصره ابن ماجه.

ومن هذا الطّريق رواه أيضًا عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (1268)، والآجريّ في الشّريعة (816).

وحفص بن سليمان الأسديّ أبو عمرو مع إمامته في القراءة كان ضعيفًا في الحديث. قال البخاريّ:"تركوه". وقال مسلم:"متروك". وتكلَّم فيه ابنُ معين، وابن المدينيّ، والنسائيّ، والحاكم، وابن عدي وغيرهم. وكان الإمام أحمد حسن الرّأي فيه فقال:"صالح" ولعله يقصد به صلاحه في الدّين، ولجلالته في القراءات، وشيخه كثير بن زاذان مجهول.

قال الذّهبيّ في"الميزان":"كثير بن زاذان عن عاصم بن ضمرة له حديث منكر".

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وليس إسناده صحيح، وحفص ابن سليمان يُضعَّف في الحديث" انتهى.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কুরআনের একটি সূরা রয়েছে, যার মধ্যে ত্রিশটি আয়াত আছে। সেটি এক ব্যক্তির জন্য সুপারিশ করবে যতক্ষণ না তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর সেটি হলো: {তাবারাকাল্লাযী বি ইয়াদিহিল মুল্ক} (সূরা আল-মুলক)।"









আল-জামি` আল-কামিল (941)


941 - عن * *




৯৪১ - থেকে ** **









আল-জামি` আল-কামিল (942)


942 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تفضّلوا بين أنبياء اللَّه، فإنّه
يُنفخ في الصُّور، فيصعق مَنْ في السّماوات وَمَنْ في الأرض إِلَّا مَنْ شاء اللَّه، ثم يُنفخ فيه أخرى، فأكون أوَّلَ من بُعث، فإذا موسى آخذ بالعرش، فلا أدري أحُوسب بصعقته يوم الطّور، أم بُعث قبلي".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3414)، ومسلم في كتاب الفضائل (2373) كلاهما عن عبد العزيز بن عبد اللَّه بن أبي سلمة، عن عبد اللَّه بن الفضل الهاشميّ، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

وفي الحديث قصة وسيأتي الحديث بطوله في كتاب الفضائل. فضائل موسى عليه السلام.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর নবীদের মধ্যে কাউকে শ্রেষ্ঠত্ব দিও না। কেননা শিঙায় ফুঁক দেওয়া হবে, ফলে আল্লাহ যাঁর উপর দয়াময়, তিনি ব্যতীত আসমান ও যমিনের সবাই বেহুঁশ হয়ে যাবে (বা মারা যাবে)। এরপর আবার ফুঁক দেওয়া হবে। তখন আমিই হব প্রথম পুনরুত্থিত ব্যক্তি। তখন আমি দেখব, মূসা (আঃ) আরশ ধরে আছেন। আমি জানি না, তূর পর্বতের দিনের বেহুঁশ (মৃত্যু)-এর কারণে তাঁকে (শেষ দিবসের) বেহুঁশ হওয়ার হিসাব থেকে অব্যাহতি দেওয়া হয়েছে, নাকি তিনি আমার আগেই পুনরুত্থিত হয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (943)


943 - عن عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر خروج الدّجال- ثم قال:"فيبقى شرار النّاس في خفّة الطّير وأحلام السِّباع، لا يعرفون معروفًا ولا ينكرون منكرًا. فيتمثَّل لهم الشّيطان فيقول: ألا تستجيبون؟ فيقولون: فما تأمرنا؟ فيأمرهم بعبادة الأوثان، وهم في ذلك دارّةٌ أرزاقهم، وحسنٌ عيشُهم، ثم ينفخ في الصُّور، فلا يسمعه أحدٌ إِلَّا أضغى لِيتًا، ورفع لِيتًا. قال: وأوّلُ من يسمعه رجل يلوط حوض إبله، قال: فيصعق ويصعق النّاس، ثم يرسل اللَّه -أو قال: ينزل اللَّه- مطرًا كأنّه الطّلُّ أو الظّلُّ -نعمان الشّاك- فتنبتُ منه أجسادُ النّاس. ثم يُنفخ فيه أخرى فإذا هم قيام ينظرون. . .".

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2940) عن عبد اللَّه بن معاذ العنبريّ، حدّثنا أبي، حدّثنا شعبة، عن النعمان بن سالم، قال: سمعت يعقوب بن عاصم بن عروة بن مسعود الثّقفيّ. يقول: سمعت عبد اللَّه بن عمرو، فذكر الحديث بطوله في قصة خروج الدّجال.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাজ্জালের আবির্ভাবের কথা উল্লেখ করে বললেন: "তখন সমাজের নিকৃষ্টতম লোকেরাই অবশিষ্ট থাকবে। তাদের মন হবে পাখির মতো হালকা এবং তাদের আকাঙ্ক্ষা হবে হিংস্র পশুর মতো। তারা ভালো কাজকে ভালো বলে জানবে না এবং খারাপ কাজকে খারাপ বলে অস্বীকারও করবে না। তাদের সামনে শয়তান মানবাকৃতিতে এসে বলবে: 'তোমরা কি সাড়া দেবে না?' তারা বলবে: 'আপনি আমাদের কী করতে আদেশ করেন?' তখন সে তাদের মূর্তিপূজা করার আদেশ দেবে। আর এই সময়ে তাদের রিযিক সচ্ছল ও জীবন সুন্দর হবে। এরপর শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে। যে ব্যক্তিই তা শুনবে, সে অবশ্যই নিজের ঘাড় একদিকে বাঁকিয়ে দেবে এবং অন্যদিকে তুলে ধরবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যে ব্যক্তি সবার আগে শিঙ্গার আওয়াজ শুনতে পাবে, সে হবে উটের হাউজ (চৌবাচ্চা) মেরামতকারী এক ব্যক্তি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তখন সে (ঐ ব্যক্তি) বেহুশ হয়ে যাবে এবং মানুষও বেহুশ হয়ে যাবে। এরপর আল্লাহ্‌ বৃষ্টি পাঠাবেন—কিংবা বললেন, আল্লাহ্‌ বৃষ্টি বর্ষণ করবেন—যা শিশিরবিন্দুর মতো হবে অথবা ছায়ার মতো হবে (বর্ণনাকারী নু'মান সন্দেহ প্রকাশ করেছেন)। আর সেই বৃষ্টি দ্বারা মানুষের দেহ উৎপন্ন হবে। এরপর দ্বিতীয়বার শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে, তখন তারা সবাই দাঁড়িয়ে দেখতে থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (944)


944 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كيف أُنعم وصاحبُ الصّور قد الْتقم، وحنا جبهته ينتظر متى يُؤمر أن ينفخ". قيل: قلنا يا رسول اللَّه، ما نقول يومئذ؟ قال:"قولوا: حسبنا اللَّه ونعم الوكيل على اللَّه توكّلنا".

صحيح: رواه أبو يعلى (1084 - تحقيق حسين أسد) عن عثمان، حدّثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد، فذكر الحديث. وإسناده صحيح. وصحّحه ابن حبّان (823).

وأخرجه الحاكم (4/ 559) من طريق إسماعيل بن إبراهيم أبي يحيى التّيميّ، عن الأعمش إِلَّا أنّ إسماعيل ضعيف.

وأمّا ما رواه الترمذيّ (2431)، وابن ماجه (4273)، والإمام أحمد (11039) وغيرهم من طريق عطية العوفيّ، عن أبي سعيد ففيه اضطراب فإنّ عطية العوفي ضعيف، وقد اضطرب فيه فمرة يرويه عن أبي سعيد، وأخرى عن ابن عباس، وثالثه عن زيد بن أسلم، وقد أورد هذا الحديث ابنُ
عدي في"الكامل" (3/ 891) وذكر فيه هذا الاختلاف.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কিভাবে শান্তিতে থাকব, অথচ শিঙার অধিকারী (ফেরেশতা) শিঙাটি মুখে তুলে নিয়েছেন, মাথা ঝুঁকিয়ে আছেন, অপেক্ষা করছেন কখন তাঁকে ফুঁক দেওয়ার আদেশ করা হবে?" জিজ্ঞেস করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! সেদিন আমরা কী বলব? তিনি বললেন: "তোমরা বলো: 'আল্লাহই আমাদের জন্য যথেষ্ট, আর তিনি কতই না উত্তম অভিভাবক। আমরা আল্লাহর ওপরই ভরসা করলাম'।"









আল-জামি` আল-কামিল (945)


945 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن طَرْف صاحب الصّور مذ وكِّل به مستعد ينظر نحو العرش مخافة أن يؤمر قبل أن يرتدّ إليه طرْفه، كأنّ عينيه كوكبان درّيان".

حسن: رواه الحاكم (4/ 558 - 559) من طريق محمد بن هشام بن ملاس النّمريّ، عن مروان ابن معاوية الفزاريّ، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن الأصمّ، ثنا يزيد بن الأصمّ، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقال الذّهبيّ:"صحيح على شرط مسلم".

وإسناده حسن؛ فإنّ محمد بن هشام بن ملاس النّمري الدّمشقيّ ليس من رجال مسلم، بل ليس من رجال التهذيب غير أنّه صدوق كما قال ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 116) ولذا حسَّنه الحافظ في"الفتح" (11/ 368).

وأمّا عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الأصمّ فهو من رجال مسلم وقال فيه ابن حجر:"مقبول" لأنه لم يوثقه غير ابن حبان فأورده في الثقات (7/ 142) وقال:"روى عنه مروان بن معاوية الفزاريّ". وزاد ابن أبي حاتم (5/ 321)"عبد الواحد بن زياد". وزاد الذّهبيّ في"الكاشف" ابن عيينة وغيرها. ولكن لمن يذكر أحد توثيقه من أحد الأئمة فهو في عداد المجهولين إِلَّا أن رواية مسلم له اكتسبته قوّة، ولم يأتِ في حديثه ما ينكر عليه، فلا بأس من قبول حديثه في الشّواهد.

تنبيه: إنه وقع تحريف في نسخة الحاكم فقال:"عمرو بن عبد اللَّه بن الأصمّ". والصَّحيح أنه عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن الأصم؛ لأنه لا يوجد في كتب الرّجال مَنْ اسمه"عمرو بن عبد اللَّه بن الأصمّ".

وفي الباب عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كيف أنعم وصاحب الصّور قد التقم القرن، وحنا ظهره ينظر تجاه العرش كأن عينيه كوكبان دُريَّان، لم يَطْرِفْ قطّ مخافة أن يؤمر قبل ذلك".

رواه الخطيب في"تاريخه" (5/ 153) والضياء في المختارة (2567) كلاهما من حديث إسماعيل بن علي بن إسماعيل الخطبيّ، قال: حدّثنا أحمد بن منصور بن حبيب أبو بكر المروزيّ الخطيب، قال: حدّثنا عفّان بن مسلم، قال: حدّثنا همام، عن قتادة، عن أنس بن مالك، فذكره.

أخرجه الخطيب في ترجمة أحمد بن منصور بن حبيب وقال: حدّث عن عفّان بن مسلم وعمرو ابن عبيد المكتِب. روى عنه الحسن بن محمد بن شعبة الأنصاريّ وإسماعيل الخطبيّ، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلا فهو في عداد المجهولين.



الحافظ في"فتحه" (11/ 368)، ولكن لم يرد فيه حديث صحيح بأنَّ إسرافيل هو الذي ينفخ في الصّور.

وأمّا الحديث المشهور بين النّاس الذي يسمى بحديث الصّور، وإنَّ إسرافيل قد التقم الصّور، وهو شاخص بصره إلى العرش ينتظر متى يؤمر، فهو حديث ضعيف وإن كان أورده كثير من أهل العلم في كتبهم.

وهو ما روي عن أبي هريرة، أنه قال: حدّثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو في طائفة من أصحابه- فقال:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى لما فرغ من خلق السماوات والأرض خلق الصّور، فأعطاه إسرافيل عليه السلام فهو واضعه على فيه شاخص بصره إلى العرش ينتظر متى يؤمر". فقال أبو هريرة رضي الله عنه: يا رسول اللَّه، وما الصُّور؟ قال:"القرن". قلت: كيف هو؟ قال:"عظيم! والذي نفسي بيده إنّ عظم دارة فيه كعرض السَّماوات -وقال غيره: إنه قال: والأرض- ينفخ فيه ثلاث نفخات: الأولى: نفخة الفزع، والثانية: نفخة الصَّعق، والثّالثة: نفخة القيام لربّ العالمين، يأمر اللَّه عز وجل إسرافيل بالنفخة الأوّلى، فيقولُ له: انفخ نفخة الفزع، فيفزع له من في السماوات والأرض إِلَّا مَنْ شاء اللَّه، ويأمره فيديمها ويطيلها ولا يفتر وهي التي يقول اللَّه تبارك وتعالى: {وَمَا يَنْظُرُ هَؤُلَاءِ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً مَا لَهَا مِنْ فَوَاقٍ} [سورة ص: 15]، فيسير اللَّه الجبال فتمر مرّ السَّحاب ثم تكون ترابا ثم ترتج الأرض بأهلها رجًّا، وهي التي يقول اللَّه تبارك وتعالى: {يَوْمَ تَرْجُفُ الرَّاجِفَةُ (6) تَتْبَعُهَا الرَّادِفَةُ (7) قُلُوبٌ يَوْمَئِذٍ وَاجِفَةٌ (8)} [سورة النازعات: 6 - 8]، فتكون الأرض كالسّفينة المرتفعة في البحر تضربها الأمواج تكفأ بأهلها، وكالقنديل المعلّق بالعرش ترجحه الأرواح، فيبيد النّاس عن ظهرها فتذهل المراضع، وتضع الحوامل، ويشيب الولدان، وتطير الشياطين هاربة حتى تأتي الأقطار فتلقاها الملائكة فتضرب وجوهها وترجع ويولي النّاس مدبرين فبينا هم على ذلك إذ تصدَّعت الأرض فانصدعت من قطر إلى قطر فرأوا أمرًا عظيمًا، فأخذهم لذلك من الكرب ما اللَّه به عليم، ثم نظروا إلى السّماء فإذا هي كالمهل، ثم انشقَّت من قطر إلى قطر، ثم انخسفت شمسها وقمرها قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"والأموات لا يعلمون بشيء من ذلك". قال أبو هريرة رضي الله عنه: يا رسول اللَّه؟ فمن استثنى اللَّه عز وجل حين يقول: {فَفَزِعَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ} [سورة النمل: 87]؟ قال:"أولئك الشّهداء وهم أحياء عند ربهم يرزقون، وإنما يصل الفزع إلى الأحياء فوقاهم اللَّه فزع ذلك اليوم وأمّنهم منه، وهو عذاب اللَّه يبعثه على شرار خلقه، وهو الذي يقول اللَّه عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمْ إِنَّ زَلْزَلَةَ السَّاعَةِ شَيْءٌ عَظِيمٌ (1) يَوْمَ تَرَوْنَهَا تَذْهَلُ كُلُّ مُرْضِعَةٍ عَمَّا أَرْضَعَتْ وَتَضَعُ كُلُّ ذَاتِ حَمْلٍ حَمْلَهَا وَتَرَى النَّاسَ سُكَارَى وَمَا هُمْ بِسُكَارَى وَلَكِنَّ عَذَابَ اللَّهِ شَدِيدٌ (2)} [سورة الحج: 1 - 2]. فيمكثون في ذلك البلاء ما شاء اللَّه إِلَّا أنّه يطول، ثم يأمر اللَّه عز وجل إسرافيل بنفخة الصَّعْق فينفخ نفخة الصَّعق، فيصعق أهل السماوات والأرض إِلَّا من شاء اللَّه، فإذا هم خمدوا جاء ملك الموت عليه السلام إلى
الجبّار تبارك وتعالى، فيقول: يا ربّ، قد مات أهل السماوات والأرض إِلَّا مَنْ شئتَ، فيقول اللَّه عز وجل -وهو أعلم-: فمن بقي؟ فيقول: يا ربّ بقيتَ أنت الحي الذي لا يموت، وبقي حملة عرشك وبقي جبريل وميكائيل وأنا. فيقول اللَّه عز وجل: ليمت جبريل وميكائيل. فيتكلّم العرش فيقول: يا ربّ، تميتُ جبريل وميكائيل؟ فيقول اللَّه عز وجل: اسكت فإنِّي كتبتُ على كل مَنْ تحت عرشي الموت، فيموتان، ويأتي ملك الموت عليه السلام إلى الجبَّار تبارك وتعالى، فيقول: قد مات جبريل وميكائيل، فيقول اللَّه عز وجل -واللَّه أعلم- فمن بقي؟ فيقول: يا ربّ بقيت أنت الحي الذي لا يموت، وبقي حملةُ عرشك، وبقيتُ أنا. فيقول اللَّه عز وجل: ليمتْ حملة عرشيّ، فيموتون، ثم يأتي ملك الموت إلى الجبَّار تبارك وتعالى، فيقول: يا ربّ، قد مات حملةُ عرشك، فيقول اللَّه عز وجل -وهو أعلم-: فمن بقي؟ فيقول: يا ربّ، بقيتَ أنت الحي الذي لا يموت، وبقيتُ أنا، فيقول اللَّه عز وجل له: أنت من خلقيّ، خلقتُك لما رأيتُ، فَمُتْ فيموتُ، فإذا لم يبق إِلَّا اللَّه الواحد الأحد الصمد ليس بوالد ولا ولد، كان آخرًا كما كان أوَّلًا قال: لا موت على أهل الجنّة، ولا موت لأهل النّار، ثم يطوي اللَّه تبارك وتعالى السماوات والأرض كطيّ السّجل، ثم دحاها ثم يلففها، ثم قال: أنا الجبَّار، ثم هتف بصوته تبارك وتعالى وتقدَّس، فقال: {لِمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَ} ثم قال: {لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ} [سورة غافر: 16]. . .". الحديث بطوله.

رواه أبو الشّيخ في"العظمة" (386) -واللّفظ له-، وأبو القاسم الطبرانيّ في"الأحاديث الطوال" (36)، والبيهقي في"البعث" (609) كلّهم من طريق إسماعيل بن رافع، عن محمد بن يزيد، عن محمد بن كعب، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الحافظ ابن كثير في تفسير سورة الأنعام (آية: 73):"هذا حديث غريب جدًّا، ولبعضه شواهد في الأحاديث المتفرقة، وفي بعض ألفاظه نكارة، تفرّد به إسماعيل بن رافع قاص أهل المدينة، وقد اختلف فيه، فمنهم من وثّقه، ومنهم من ضعّفه. ونصَّ على نكارة حديثه غير واحد من الأئمة كأحمد بن حنبل، وأبي حاتم الرّازيّ، وعمرو بن علي الفلاس. ومنهم من قال فيه: هو متروك. وقال ابن عدي: أحاديثه كلّها فيها نظر، إِلَّا أنه يكتب حديثه في جملة الضعفاء".

وقال ابن كثير أيضًا:"وقد اختلف عليه في إسناد هذا الحديث على وجوه كثيرة قد أفردتها في جزء على حدة، وأمّا سياقه فغريب جدًّا، ويقال: إنه جمعه من أحاديث كثيرة وجعله سياقًا واحدًا، فأنكر عليه بسبب ذلك" انتهى.

ونقل أيضًا ابنُ عديّ عن البخاريّ أنّه قال: وروى إسماعيل بن رافع، عن محمد بن يزيد بن أبي زياد، عن رجل، عن محمد بن كعب"حديث الصُّور" مرسل لا يصح. انتهى انظر: الكامل (1/ 278).

وقال الحافظ:"اضطرب في سنده مع ضعفه، فرواه عن محمد بن كعب القرظيّ تارة بلا واسطة، وتارة بواسطة رجل مبهم ومحمد، عن أبي هريرة، تارة بلا واسطة، وتارة بواسطة رجل
من الأنصار مبهم أيضًا. وأخرجه إسماعيل بن أبي زياد الشّاميّ أحد الضّعفاء أيضًا في"تفسيره" عن محمد بن عجلان، عن محمد بن كعب القرظيّ، واعترض مغلطاي على عبد الحقّ في تضعيفه الحديث بإسماعيل بن رافع، وخفي عليه أنَّ الشّاميّ أضعف منه، ولعلّه سرقه منه، فألصقه بابن"عجلان". الفتح (11/ 368).

وكذلك ذكر أبو الشّيخ آثارًا عن التابعين وأتباعهم في كون إسرافيل هو الذي ينفخ في الصّور ومع كونها. موقوفة عليهم فإن في أسانيدهم ضعفًا شديدًا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই শিঙ্গাধারী (ফেরেশতা)-এর দৃষ্টি, যখন থেকে তাকে এই কাজের দায়িত্ব দেওয়া হয়েছে, তখন থেকেই তিনি আরশের দিকে প্রস্তুত অবস্থায় তাকিয়ে আছেন, এই আশঙ্কায় যে, দৃষ্টি ফিরিয়ে আনার আগেই যেন তাঁকে আদেশ না করা হয়। তার দু'টি চোখ যেন দু'টি উজ্জ্বল নক্ষত্র।"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত আছে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের এক দলের মাঝে থাকা অবস্থায় আমাদের কাছে হাদিস বর্ণনা করে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা যখন আসমান ও যমিন সৃষ্টি করা শেষ করলেন, তখন শিঙ্গা (صور) সৃষ্টি করলেন এবং তা ইসরাফীল (আঃ)-কে প্রদান করলেন। তিনি শিঙ্গাটি মুখে ধারণ করে আরশের দিকে দৃষ্টি স্থির করে আছেন এবং কখন তাঁকে আদেশ করা হবে তার অপেক্ষা করছেন।"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! صور (সূর) কী?' তিনি বললেন, "শিং (القرن)।" আমি (আবু হুরায়রা) বললাম, 'তা কেমন?' তিনি বললেন, "বিশাল! যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! এর বৃত্তের বিশালতা আসমানসমূহের প্রস্থের মতো – (অন্য বর্ণনাকারী বলেন: এবং যমিনের মতো)।"

"এতে তিনবার ফুঁক দেওয়া হবে: প্রথমটি হলো 'নাফখাতুল ফাযা' (ভীতির ফুৎকার), দ্বিতীয়টি হলো 'নাফখাতুস স্বা‘ক্ব' (মূর্ছা যাওয়ার ফুৎকার) এবং তৃতীয়টি হলো 'নাফখাতুল ক্বিয়াম লিরব্বিল আলামীন' (সারা জাহানের রবের কাছে দাঁড়ানোর ফুৎকার)।

আল্লাহ আযযা ওয়া জাল ইসরাফীল (আঃ)-কে প্রথম ফুৎকারের আদেশ করবেন। তিনি তাঁকে বলবেন: 'ভীতির ফুঁক দাও।' ফলে আল্লাহ যাদেরকে ইচ্ছা করেন তারা ব্যতীত আসমান ও যমিনের সবাই ভীত-সন্ত্রস্ত হয়ে যাবে। তিনি তাঁকে আদেশ করবেন এবং তিনি ফুঁক দিতে থাকবেন, তা লম্বা করবেন এবং তা থেকে বিরত হবেন না। এটাই সেই ফুঁক, যার সম্পর্কে আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বলেন: {এরা কেবল একটিমাত্র তীব্র আওয়াজের অপেক্ষায় রয়েছে, যাতে কোনো বিরতি থাকবে না।} [সূরা ছোয়াদ: ১৫]

আল্লাহ তাআলা পর্বতসমূহকে চালিত করবেন। ফলে তা মেঘমালার মতো দ্রুত চলবে। অতঃপর তা ধূলিকণায় পরিণত হবে। এরপর যমিন তার অধিবাসীদের নিয়ে প্রচণ্ডভাবে কাঁপতে থাকবে। এটাই সেই ঘটনা, যা সম্পর্কে আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বলেন: {সেদিন প্রকম্পিত করার মতো কিছু প্রকম্পিত করবে। অতঃপর অনুসরণকারী কিছু তাকে অনুসরণ করবে। সেদিন অনেকের হৃদয় ভয়ে কম্পিত হবে।} [সূরা নাযিআত: ৬-৮]

তখন যমিন সাগরের মধ্যে উঁচু ঢেউ দ্বারা প্রকম্পিত জাহাজের মতো হবে, যা তার অধিবাসীদের নিয়ে এদিক-ওদিক হেলে পড়বে। আর আরশের সাথে ঝোলানো প্রদীপের মতো হবে, যাকে বাতাস দুলিয়ে থাকে। ফলে মানুষ তার উপরিভাগ থেকে বিলীন হয়ে যাবে। স্তন্যদাত্রী মা ভুলে যাবে তার দুগ্ধপোষ্য শিশুকে, গর্ভবতীরা গর্ভপাত করবে, শিশুরা বৃদ্ধ হয়ে যাবে, শয়তানরা পালাতে থাকবে, এমনকি তারা দিগন্তে পৌঁছবে। তখন ফেরেশতারা তাদের সাথে দেখা করে তাদের মুখে আঘাত করবে। তারা ফিরে আসবে। মানুষ ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে পিছু হটতে থাকবে।

তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, তখন যমিন ফাটতে শুরু করবে। তা এক প্রান্ত থেকে আরেক প্রান্ত পর্যন্ত বিদীর্ণ হবে। তারা এক ভয়াবহ দৃশ্য দেখবে। ফলে আল্লাহই জানেন, তাদের কী পরিমাণ কষ্ট হবে। অতঃপর তারা আকাশের দিকে তাকাবে, তখন তা গলিত তামার মতো হবে। অতঃপর তা এক প্রান্ত থেকে আরেক প্রান্ত পর্যন্ত ফেটে যাবে। অতঃপর তার সূর্য ও চন্দ্র জ্যোতিহীন হয়ে যাবে।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আর মৃতরা এসবের কিছুই জানতে পারবে না।"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহ আযযা ওয়া জাল যখন বলেন: {আকাশ ও যমিনে যারা আছে, তারা সকলেই ভীত-সন্ত্রস্ত হবে, তবে আল্লাহ যাদেরকে ইচ্ছা করেন তারা ব্যতীত।} [সূরা নামল: ৮৭] তখন আল্লাহ কাদেরকে ব্যতিক্রম করবেন?'

তিনি বললেন, "তারা হলো শহীদগণ। তারা তাদের রবের নিকট জীবিত এবং তাদেরকে রিযিক দেওয়া হয়। ভয় কেবল জীবিতদের কাছেই পৌঁছবে। আল্লাহ সেদিনকার ভয় থেকে তাদের রক্ষা করবেন এবং নিরাপত্তা প্রদান করবেন। আর এটি হচ্ছে আল্লাহর আযাব, যা তিনি তাঁর নিকৃষ্টতম সৃষ্টির উপর প্রেরণ করবেন। এটাই সেই কথা, যা সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: {হে মানুষ! তোমরা তোমাদের রবকে ভয় কর। নিশ্চয়ই কিয়ামতের প্রকম্পন এক মহা বিষয়। যেদিন তোমরা তা দেখবে, সেদিন প্রত্যেক স্তন্যদাত্রী তার দুগ্ধপোষ্য শিশুকে ভুলে যাবে এবং প্রত্যেক গর্ভবতী নারী তার গর্ভপাত করে ফেলবে। আর তুমি দেখবে, মানুষ মাতাল, যদিও তারা মাতাল নয়। বরং আল্লাহর আযাব বড়ই কঠিন।} [সূরা হজ্জ: ১-২]"

তারা আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী সেই বিপদে দীর্ঘকাল থাকবে। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল ইসরাফীল (আঃ)-কে 'নাফখাতুস স্বা‘ক্ব' (মূর্ছা যাওয়ার ফুৎকার)-এর আদেশ করবেন। তিনি মূর্ছা যাওয়ার ফুঁক দেবেন। ফলে আল্লাহ যাদেরকে ইচ্ছা করেন তারা ব্যতীত আসমান ও যমিনের অধিবাসীরা মূর্ছা যাবে।

তারা যখন নিস্তেজ হয়ে যাবে, তখন মৃত্যুর ফেরেশতা (আঃ) মহাপরাক্রমশালী তাবারাকা ওয়া তাআলা রবের কাছে এসে বলবেন: 'হে রব! আসমান ও যমিনের সবাই মৃত্যুবরণ করেছে, তবে তুমি যাদেরকে ইচ্ছা করেছ (তারা ব্যতীত)।'

আল্লাহ আযযা ওয়া জাল – যদিও তিনি অধিক অবগত – বলবেন: 'কে বাকি আছে?' তিনি বলবেন: 'হে রব! আপনি বাকি আছেন, যিনি চিরঞ্জীব, যাঁর মৃত্যু নেই। আর বাকি আছে আপনার আরশের বাহকগণ, বাকি আছে জিবরীল, মীকাইল এবং আমি (মৃত্যুর ফেরেশতা)।'

আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলবেন: 'জিবরীল ও মীকাইলও যেন মৃত্যুবরণ করে।' তখন আরশ কথা বলবে এবং বলবে: 'হে রব! আপনি জিবরীল ও মীকাইলকে মৃত্যু দেবেন?' আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলবেন: 'চুপ থাক! আমি আমার আরশের নিচে যা আছে, তার সবার উপর মৃত্যু লিখে দিয়েছি।' ফলে তারা দু'জন মৃত্যুবরণ করবেন।

মৃত্যুর ফেরেশতা (আঃ) মহাপরাক্রমশালী তাবারাকা ওয়া তাআলা রবের কাছে এসে বলবেন: 'জিবরীল ও মীকাইল মৃত্যুবরণ করেছেন।' আল্লাহ আযযা ওয়া জাল – যদিও তিনি অধিক অবগত – বলবেন: 'কে বাকি আছে?' তিনি বলবেন: 'হে রব! আপনি বাকি আছেন, যিনি চিরঞ্জীব, যাঁর মৃত্যু নেই। আর বাকি আছে আপনার আরশের বাহকগণ এবং বাকি আছি আমি (মৃত্যুর ফেরেশতা)।' আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলবেন: 'আমার আরশের বাহকগণও যেন মৃত্যুবরণ করে।' ফলে তারা মৃত্যুবরণ করবেন।

অতঃপর মৃত্যুর ফেরেশতা মহাপরাক্রমশালী তাবারাকা ওয়া তাআলা রবের কাছে এসে বলবেন: 'হে রব! আপনার আরশের বাহকগণও মৃত্যুবরণ করেছেন।' আল্লাহ আযযা ওয়া জাল – যদিও তিনি অধিক অবগত – বলবেন: 'কে বাকি আছে?' তিনি বলবেন: 'হে রব! আপনি বাকি আছেন, যিনি চিরঞ্জীব, যাঁর মৃত্যু নেই। আর বাকি আছি আমি (মৃত্যুর ফেরেশতা)।' আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তাঁকে বলবেন: 'তুমি আমারই সৃষ্টি। আমি যা দেখেছি, তার জন্য তোমাকে সৃষ্টি করেছি। সুতরাং তুমিও মৃত্যুবরণ কর।' ফলে তিনিও মৃত্যুবরণ করবেন।

যখন এক, অদ্বিতীয়, চিরন্তন (الصمد), যার কোনো জনকও নেই, সন্তানও নেই – তিনি ব্যতীত আর কেউ অবশিষ্ট থাকবে না, তখন তিনি শেষের মতোই প্রথম অবস্থায় থাকবেন। তিনি বললেন: জান্নাতবাসীদের উপর কোনো মৃত্যু নেই এবং জাহান্নামবাসীদের উপরও কোনো মৃত্যু নেই।

অতঃপর আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা আকাশ ও যমিনকে ভাঁজ করা দলিলের মতো গুটিয়ে নেবেন। এরপর তিনি তা বিছিয়ে আবার মুড়িয়ে নেবেন। অতঃপর বলবেন: 'আমিই জাব্বার (মহাপরাক্রমশালী)।' এরপর তিনি উচ্চস্বরে ঘোষণা দেবেন – তিনি তাবারাকা ওয়া তাআলা এবং সুউচ্চ ও পবিত্র – এবং বলবেন: {আজ রাজত্ব কার?} [সূরা গাফির: ১৬] অতঃপর তিনি নিজেই বলবেন: {এক, পরাক্রমশালী আল্লাহর।}।" এই দীর্ঘ হাদিস।









আল-জামি` আল-কামিল (946)


946 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، قال: جاء أعرابيٌّ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: ما الصُّور؟ قال:"قرنٌ يُنفخُ فيه".

صحيح: رواه أبو داود (4742)، والترمذيّ (2430، 3244) كلاهما من طريق سليمان التيميّ، عن أسلم العجليّ، عن بشر بن شفاف، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكر الحديث، واللّفظ للترمذيّ.

ولفظ أبي داود:"الصور قرنٌ ينفخ فيه".

قال الترمذيّ في الموضع الأوّل:"حسن لا نعرفه إِلَّا من حديث سليمان التيمي". وفي الموضع الثاني:"حسن صحيح، إنّما نعرفه من حديث سليمان التيمي". وفي بعض النسخ عكس ما ذكرته.

والصّواب أنه صحيح فإنّ رجاله ثقات، والتيميّ هو ابن طرخان.

وقد أخرجه ابن حبان في صحيحه (7312)، والحاكم (2/




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করল: ‘সুর’ (শিঙ্গা) কী? তিনি বললেন: "এটি একটি শিংগা, যাতে ফুঁক দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (947)


947 - عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّكم تحشرون حفاةً عراة غُرلًا ثم قرأ: {كَمَا بَدَأْنَا أَوَّلَ خَلْقٍ نُعِيدُهُ وَعْدًا عَلَيْنَا إِنَّا كُنَّا فَاعِلِينَ} [سورة الأنبياء: 104]، وأوَّل من يُكسى يوم القيامة إبراهيم، وإنَّ ناسًا من أصحابي يؤخذ بهم ذات الشّمال، فأقول: أصحابي أصحابي، فيقول: إنّهم لم يزالوا مرتدين على أعقابهم منذ فارقتهم، فأقول كما قال العبد الصَّالح: {مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلَّا مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ وَكُنْتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَا دُمْتُ فِيهِمْ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنْتَ أَنْتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ وَأَنْتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ (117) إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [سورة المائدة: 117 - 118]".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3349)، ومسلم في كتاب الجنة (2860) كلاهما من حديث المغيرة بن النّعمان، قال: حدّثني سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر
الحديث، واللّفظ للبخاريّ.

وفي بعض الرّوايات: قال:"قام فينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خطيبًا بموعظة".

وأمّا رُوي عن علي بن أبي طالب:"أوّل من يُكسى إبراهيم قبطيتين، ثم يكسى النبيّ صلى الله عليه وسلم حُلّة حبرة، وهو عن يمين العرش". فهو موقوف.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن مسعود: أول ما يُكسى إبراهيم، يقول اللَّه تعالى: اكسُوا خليلي، فيؤتَى برَيْطتين بيضاوين فيلبسهما، ثم يقعد فيتقبل العرش، ثم أُوتى بكسوتي فألبسها، فأقوم عن يمينه مقامًا لا يقومُه أحدٌ غيريّ، يغبطني به الأوّلون والآخرون".

رواه الإمام أحمد (3787) حدّثنا سعيد بن زيد، حدّثنا علي بن الحكم البنانيّ، عن عثمان، عن إبراهيم، عن علقمة والأسود، عن ابن مسعود، في حديث طويل.

عثمان هو ابن عمير البجليّ أبو اليقظان الكوفي الأعميّ، قال الحافظ:"ضعيف واختلط، وكان يدلس، ويغلو في التّشيّع".

وسعيد بن زيد هو أخو حمّاد بن زيد"صدوق له أوهام" كما في التقريب. قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 361 - 362):"رواه أحمد والبزّار والطَّبرانيّ، وفي أسانيدهم كلّهم عثمان بن عمير وهو ضعيف".

وصحّحه الحاكم (2/ 364)، فقال الذّهبيّ:"لا واللَّه، فعثمان ضعّفه الدّارقطنيّ".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমাদেরকে খালি পায়ে, উলঙ্গ এবং অ-খতনাকৃত (অ-সুন্নতকৃত) অবস্থায় একত্রিত করা হবে।"

এরপর তিনি তিলাওয়াত করলেন:
"যেভাবে আমি প্রথম সৃষ্টি শুরু করেছিলাম, সেভাবেই তার পুনরাবৃত্তি করব। এটা আমার জন্য প্রতিজ্ঞা, আমি তা কার্যকরকারী।" [সূরা আল-আম্বিয়া: ১০৪]

আর কিয়ামতের দিন সর্বপ্রথম যাকে পোশাক পরানো হবে, তিনি হলেন ইব্রাহীম (আঃ)। আর আমার সাহাবীদের মধ্য থেকে কিছু লোককে বাম দিকে ধরে নিয়ে যাওয়া হবে। তখন আমি বলব: "আমার সাহাবী! আমার সাহাবী!" (তখন আল্লাহ) বলবেন: "আপনি যখন তাদের ছেড়ে এসেছেন, তখন থেকে তারা তাদের পশ্চাতে ফিরে যাচ্ছিল (ধর্মচ্যুত হয়ে গিয়েছিল)।"

তখন আমি সেই নেক বান্দার (ঈসা (আঃ)-এর) মতোই বলব:
"আমি তো তাদের শুধু সেটাই বলেছি, যা আপনি আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন—এই যে, তোমরা আল্লাহ্‌র ইবাদত কর, যিনি আমার প্রতিপালক এবং তোমাদেরও প্রতিপালক। যতদিন আমি তাদের মধ্যে ছিলাম, আমি ছিলাম তাদের উপর সাক্ষী। অতঃপর যখন আপনি আমাকে তুলে নিলেন, তখন আপনিই ছিলেন তাদের উপর তত্ত্বাবধায়ক। আর আপনি সবকিছুর উপর সাক্ষী। যদি আপনি তাদের শাস্তি দেন, তবে তারা আপনারই বান্দা; আর যদি আপনি তাদের ক্ষমা করে দেন, তবে নিশ্চয়ই আপনি মহাপরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়।" [সূরা আল-মায়িদাহ: ১১৭-১১৮]