আল-জামি` আল-কামিল
921 - عن ربيعة بن كعب الأسلميّ، قال: كنتُ أبيتُ مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأتيته بوَضوئه وحاجته، فقال لي:"سَلْ". فقلتُ: أسألُك مرافتَك في الجنّة. قال:"أو غير ذلك؟". قلت: هو ذاك. قال:"فأعنّي على نفسك بكثرة السّجود".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (489) عن الحكم بن موسى أبي صالح، حدّثنا حِقْل بن زياد قال: سمعت الأوزاعيّ قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة، حدثني ربيعة بن كعب فذكره.
রাবিয়া ইবনু কা'ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রাত যাপন করতাম। আমি তাঁর জন্য উযূর পানি ও তাঁর প্রয়োজনীয় সামগ্রী নিয়ে আসতাম। তখন তিনি আমাকে বললেন, "কিছু চাও।" আমি বললাম, আমি আপনার কাছে জান্নাতে আপনার সাথীত্ব (সাহচর্য) প্রার্থনা করি। তিনি বললেন, "অথবা অন্য কিছু?" আমি বললাম, ঐটাই (আমার চাওয়া)। তিনি বললেন, "তাহলে তুমি অধিক সিজদা করার মাধ্যমে এ ব্যাপারে আমাকে সাহায্য করো।"
922 - عن خادم للنّبيّ صلى الله عليه وسلم رجل أو امرأة قال: كان النّبيُّ صلى الله عليه وسلم مما يقول للخادم:"ألك حاجة؟". قال: حتّى كان ذات يوم، فقال: يا رسول اللَّه حاجتي. قال:"وما
حاجتُك؟". قال: حاجتي أن تشفع لي يوم القيامة. قال:"ومن دلَّك على هذا؟". قال: ربِّي. قال:"إما لا، فأعنّي بكثرة السّجود".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16076) عن عفّان، حدّثنا خالد -يعني الواسطيّ- قال: حدّثنا عمرو بن يحيى الأنصاريّ، عن زياد بن أبي زياد مولى بني مخزوم، عن خادم، فذكره.
وإسناده صحيح. وأورده الهيثميّ في"المجمع" (2/ 249) فقال:"رواه أحمد، ورجاله رجال الصّحيح". والخادم هو ربيعة بن كعب الأسلمي كما مضى.
রাবিআ ইবনে কা'ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খাদেমকে প্রায়ই জিজ্ঞেস করতেন: “তোমার কি কোনো প্রয়োজন আছে?” সে (খাদেম) বলল, এমনকি একদিন এমন হলো যে সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার একটি প্রয়োজন আছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: “তোমার কী প্রয়োজন?” সে বলল: আমার প্রয়োজন হলো, আপনি যেন কিয়ামতের দিন আমার জন্য সুপারিশ করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “কে তোমাকে এ বিষয়ে জানালো?” সে বলল: আমার রব (আল্লাহ)। তিনি বললেন: “যদি (তুমি সত্যিই তা চাও), তবে তুমি অধিক সেজদার মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করো।”
923 - عن ربيعة بن كعب، قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"سَلْني أُعْطِكَ". قلتُ: يا رسولَ اللَّه، أَنْظِرْني أنظر في أمري. قال:"فانظر في أمرك". قال: فنظرتُ، فقلت: إنّ أمر الدّنيا ينقطع، فلا أرى شيئًا خيرًا من شيء آخذُه لنفسي لآخرتي، فدخلتُ على النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"ما حاجَتُك؟". فقلت: يا رسول اللَّه، اشْفَعْ لي إلى ربِّك عز وجل، فلْيُعْتقني من النّار، فقال:"مَنْ أمرك بهذا؟". فقلت: لا واللَّه يا رسول اللَّه، ما أمرني به أحدٌ، ولكني نظرتُ في أمري، فرأيتُ أنّ الدُّنيا زائلة من أهلها، فأحببتُ أن آخُذ لآخرتي. قال:"فأعنِّي على نفسِك بكثرة السُّجود".
حسن: رواه الإمام أحمد (16578) عن أبي اليمان، قال: حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن نعيم بن مجمرة، عن ربيعة وفيه إسماعيل بن عياش وهو ضعف في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها، ولكنه تابع.
ومحمد بن إسحاق مدلّس، إلّا أنه صرَّحَ بالتحديث في الرواية التالية.
وهي ما رواه الإمام أحمد (16579) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدّثني محمد بن عمرو بن عطاء، عن نعيم بن مجمّر، عن ربيعة بن كعب قال: كنت أخدم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأقوم له في حوائجه نهاري أجمع حتى يصلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم العشاء الآخرة، فأجلسُ ببابه إذا دخل بيته أقول: لعلَّها أن تحدث لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حاجةٌ. فما أزال أسمعُه يقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"سبحان اللَّه سبحان اللَّه، سبحان اللَّه وبحمده". حتى أَملَّ، فارْجِعَ أو تغلبني عيني فأرقد. قال: فقال لي يومًا لما يرى من خِفّتي له وخدمتي إيّاه:"سَلْني يا ربيعةُ أُعْطِكَ". قال: فقلت: أنظر في أمري يا رسول اللَّه ثم أعلمك ذلك. قال: ففكّرت في نفسي، فعرفتُ أنّ الدُّنيا منقطعة زائلة، وأنَّ لي فيها رزقًا سيكفيني ويأتيني. قال: فقلت: أسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لآخرتي فإنه من اللَّه عز وجل بالمنزل الذي هو به قال: فجئت. فقال:"ما فعلتَ يا ربيعةُ؟". قال: فقلت: نعم يا رسول اللَّه أسألُك أن تشفع لي إلى ربِّك فيعتقني من النّار. قال: فقال:"مَنْ أمرك بهذا يا ربيعة؟". قال: فقلت: لا واللَّه الذي بعثك بالحقّ ما أمرني به أحدٌ، ولكنّك لما قلتَ:"سَلْنِي أُعْطِك". وكنتَ من اللَّه بالمنزل
الذي أنت به، نظرتُ في أمري وعرفت أنّ الدّنيا منقطعة وزائلة، وأن لي فيها رزقًا سيأتيني. فقلت: أسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لآخرتي. قال: فصمت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم طويلًا ثم قال لي:"إنّى فاعلُ، فأعنّي على نفسك بكثرة السّجود".
রাবিআ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করতাম। একদিন যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দ্রুতগতি ও খেদমত দেখলেন, তখন আমাকে বললেন: "হে রাবিআ, আমার কাছে কিছু চাও, আমি তোমাকে দেব।" তিনি (রাবিআ) বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে সময় দিন, আমি আমার বিষয়টি বিবেচনা করে দেখি, তারপর আপনাকে জানাব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি তোমার বিষয়টি বিবেচনা করে নাও।" তিনি (রাবিআ) বলেন: আমি মনে মনে চিন্তা করলাম এবং বুঝতে পারলাম যে দুনিয়া ক্ষণস্থায়ী ও বিনাশশীল, এবং আমার জন্য এতে যে রিযিক নির্ধারিত আছে তা আমাকে যথেষ্ট হবে ও আমার কাছে আসবেই। তাই আমি বললাম: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার আখিরাতের জন্য চাইব, কারণ তিনি পরাক্রমশালী আল্লাহর কাছে বিশেষ মর্যাদার আসনে রয়েছেন। এরপর আমি তাঁর কাছে গেলাম। তিনি বললেন: "হে রাবিআ, তুমি কী করলে?" আমি বললাম, হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল, আমি আপনার কাছে আবেদন করি যে আপনি যেন আপনার রবের নিকট আমার জন্য সুপারিশ করেন, যেন তিনি আমাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। তিনি বললেন: "হে রাবিআ, কে তোমাকে এই কথা বলতে নির্দেশ দিয়েছে?" আমি বললাম, না, আল্লাহর কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে পাঠিয়েছেন! আমাকে কেউ এই নির্দেশ দেয়নি। তবে আপনি যখন বললেন, 'আমার কাছে কিছু চাও, আমি তোমাকে দেব,' আর আপনি আল্লাহর কাছে যে মর্যাদার আসনে আছেন তা দেখে, আমি আমার বিষয়টি বিবেচনা করলাম এবং বুঝলাম যে দুনিয়া ক্ষণস্থায়ী ও বিলীন হয়ে যাবে, আর আমার জন্য যে রিযিক নির্ধারিত আছে তা আমার কাছে আসবেই। তাই আমি আমার আখিরাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে চাওয়াকে পছন্দ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দীর্ঘ সময় নীরব থাকলেন, তারপর আমাকে বললেন: "আমি অবশ্যই তা করব। অতএব, তুমি অধিক পরিমাণে সিজদার মাধ্যমে আমার কাজে (বা নিজের কল্যাণে) আমাকে সাহায্য করো।"
924 - عن عائشة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما من ميّتٍ يصلّي عليه أمَّةٌ من المسلمين يبلغون مائةً كلّهم يشفعون له، إلّا شُفِّعوا فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (947) عن الحسن بن عيسى، حدّثنا ابن المبارك، أخبرنا سلّام ابن أبي مُطيع، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عبد اللَّه بن يزيد رضيع عائشة، عن عائشة، فذكرته.
قال: فحدثتُ به شعيب بن الحبحاب، فقال: حدّثني به أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. القائل: فحدّثتُ به شُعيبًا - هو سلّام بن أبي المطيع فإنّه يرويه من وجهين: أحدهما عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عبد اللَّه بن يزيد، عن عائشة.
والثاني: من طريق شعيب بن الحبحاب، عن أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন: "যে কোনো মৃত ব্যক্তির উপর মুসলমানদের একটি দল জানাযার সালাত আদায় করে, যাদের সংখ্যা একশত পর্যন্ত পৌঁছে, এবং তারা সকলেই তার জন্য সুপারিশ করে, তাহলে তাদের সুপারিশ তার ব্যাপারে কবুল করা হয় (গ্রহণ করা হয়)।"
925 - عن ابن عباس، أنه مات له ابنٌ بقديد أو بعسفان، فقال: يا كريب، انظر ما اجتمع له من النّاس. قال: فخرجتُ فإذا ناسٌ قد اجتمعوا له، فأخبرته، فقال: تقول: هم أربعون؟ قال: نعم. قال: أخرجوه، فإنّي سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من رجل مسلم يموت فيقوم على جنازته أربعون رجلًا، لا يشركون باللَّه شيئًا إلّا شفّعهم اللَّه فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (948) من طرق عن أبي صخر، عن شريك بن عبد اللَّه بن أبي نمير، عن كريب مولى ابن عباس، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره.
قال السّخاويّ في"القول البديع" (ص 127):"رواه الطبرانيّ بإسنادين أحدهما جيد، لكن فيه انقطاع؛ لأنّ خالد بن معدان لم يسمع من أبي الدّرداء، وأخرجه ابن أبي عاصم، وفيه ضعف".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, কুদাইদ অথবা উসফান নামক স্থানে তাঁর এক পুত্র মারা গেল। তিনি বললেন, হে কুরাইব! দেখো তার (জানাজার) জন্য কত লোক সমবেত হয়েছে। (কুরাইব) বলেন, আমি বের হলাম এবং দেখলাম কিছু লোক তার জন্য একত্রিত হয়েছে। আমি তাঁকে জানালাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, তুমি কি বলবে যে তারা চল্লিশ জন? (কুরাইব) বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, তাকে (জানাজার জন্য) বের করো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি মারা যায়, আর তার জানাযায় এমন চল্লিশ জন লোক দাঁড়ায়, যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করে না, আল্লাহ অবশ্যই তাদের সুপারিশ তার (মৃত ব্যক্তির) ব্যাপারে কবুল করেন।"
926 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حتى إذا خلص المؤمنون من النّار، فوالذي نفسي بيده ما منكم من أحد بأشدّ مناشدةً للَّه في استقصاء الحقّ من المؤمنين للَّه يوم القيامة لإخوانهم الذين في النّار، يقولون: ربَّنا كانوا يصومون معنا، ويصلُّون ويحجُّون؟ فيقال لهم: أخرجُوا من عرفتم، فتحرم صورهم على النّار. فيخرجُون خلقًا كثيرًا قد أخذت النّارُ إلى نصف ساقيه وإلى ركبتيه، ثم يقولون: ربَّنا ما بقي فيها أحدٌ ممن أمرْتنا به. فيقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال دينار من خير فأخرجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربَّنا لم نذرْ فيها أحدًا ممن أمرْتنا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال نصف دينار من خير فأخرجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربّنا لم نَذرْ فيها ممن أمرتنا أحدًا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال ذرة من خير فأخرجوه فيخرجون خلقًا كثيرًا. ثم يقولون: ربَّنا لم نَذَرْ فيها أحدًا".
وكان أبو سعيد يقول: إن لم تصدقوني بهذا الحديث فاقرءوا إن شئتم: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِنْ لَدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا} [سورة النساء: 40]. فيقول اللَّه عز وجل: شفعت الملائكةُ، وشفع النّبيُّون، وشفع المؤمنون، ولم يبقَ إلا أرحمُ الرّاحمين فيقبض قبضةً من النّار فيخرج منها قوما لم يعملوا خيرًا قطّ، قد عادوا حُممًا، فيلقيهم في نهر في أفواه الجنّة يقال له:"نهر الحياة" فيخرجون كما تخرج الحِبة في حميل السّيل، ألا ترونها تكون إلى الحجر أو إلى الشّجر، ما يكون إلى الشّمس أُصيفر وأُخَيضر. وما يكون منها إلى الظّل يكون أبيض؟". فقالوا: يا رسول اللَّه، كأنّك كنتَ ترعى بالبادية! . قال:"فيخرجون كاللؤلؤ في رقابهم الخواتم يعرفهم أهلُ الجنَّة. هؤلاء عتقاء اللَّه الذين أدخلهم اللَّه الجنّة بغير عمل عمِلوه ولا خير قدَّموه. ثم يقول: ادخُلوا الجنّة فما رأيتموه فهو لكم. فيقولون: ربّنا، أعطيتنا ما لم تُعط أحدًا من العالمين. فيقول: لكم عندي أفضلُ من هذا. فيقولون: يا ربَّنا، أيُّ شيءٍ أفضلُ من هذا؟ فيقول: رِضاي فلا أسخط عليكم بعده أبدًا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7439)، ومسلم في الإيمان (183) من طريق زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره في حديث طويل، انظره في رؤية المؤمنين ربَّهم يوم القيامة.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মু'মিনগণ জাহান্নাম থেকে মুক্তি লাভ করবে, তখন সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তোমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই যে, আখিরাতে তাদের ঐ ভাইদের জন্য আল্লাহর কাছে পূর্ণ অধিকারের দাবিতে মু'মিনদের চেয়ে বেশি কঠিনভাবে কাকুতি-মিনতি করবে, যারা জাহান্নামে আছে।
তারা বলবে, 'হে আমাদের প্রতিপালক! তারা আমাদের সাথে সাওম পালন করত, সালাত আদায় করত এবং হাজ্জ করত।' তখন তাদেরকে বলা হবে: 'যাদেরকে তোমরা চিনতে পারো, তাদেরকে বের করে নিয়ে আসো।' ফলে জাহান্নামের জন্য তাদের দেহাকৃতি হারাম হয়ে যাবে। তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে, যাদের কারও পায়ের গোছার অর্ধেক পর্যন্ত এবং কারও হাঁটু পর্যন্ত আগুন গ্রাস করেছিল। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, তাদের কেউই আর সেখানে অবশিষ্ট নেই।'
আল্লাহ্ বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে এক দীনার পরিমাণ কল্যাণ (ঈমান) পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, আমরা তাদের কাউকে আর সেখানে রাখিনি।' অতঃপর তিনি বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে অর্ধ দীনার পরিমাণ কল্যাণ পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, তাদের কাউকে আমরা ছাড়িনি।' এরপর তিনি বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে অণু পরিমাণও কল্যাণ (ঈমান) পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! আমরা আর সেখানে কাউকে রাখিনি।'
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: 'যদি তোমরা আমাকে এ হাদীস সম্পর্কে বিশ্বাস না করো, তাহলে ইচ্ছা হলে তোমরা পাঠ করতে পারো: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ অণু পরিমাণও জুলুম করেন না। যদি তা নেক কাজ হয়, তবে তিনি তা বহুগুণে বাড়িয়ে দেন এবং তাঁর কাছ থেকে মহা পুরস্কার দান করেন।" (সূরা নিসা: ৪০)
তখন আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা বলবেন: 'ফেরেশতারা সুপারিশ করেছে, নবীগণ সুপারিশ করেছে, মু'মিনগণও সুপারিশ করেছে। এখন শুধু আরহামুর রাহিমীন (দয়ালুদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দয়ালু) বাকি আছে।' অতঃপর তিনি জাহান্নাম থেকে এক মুষ্টি ভরে এমন এক জাতিকে বের করবেন, যারা কখনও কোনো ভালো কাজ করেনি এবং যারা কয়লার মতো কালো হয়ে গেছে। তাদেরকে জান্নাতের প্রবেশমুখে অবস্থিত একটি নদীতে নিক্ষেপ করা হবে, যার নাম 'নহরে হায়াত' (জীবনের নদী)। তারা সেখান থেকে এমনভাবে বের হবে, যেভাবে বন্যার আবর্জনার স্তূপ থেকে বীজ (অথবা ঘাস) গজিয়ে ওঠে। তোমরা কি দেখো না যে, তা পাথর বা গাছের কাছে থাকে? এর যে অংশ সূর্যের দিকে থাকে, তা সামান্য হলুদ ও সামান্য সবুজ হয় এবং যে অংশ ছায়ার দিকে থাকে, তা সাদা হয়?"
সাহাবীগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! মনে হচ্ছে আপনি যেন মরুভূমিতে মেষ চরাতেন!" রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা মুক্তা সদৃশ অবস্থায় বের হবে এবং তাদের ঘাড়ে চিহ্ন (জান্নাতে প্রবেশের সীলমোহর) থাকবে, যা দেখে জান্নাতবাসীরা তাদেরকে চিনতে পারবে। এরাই হলো আল্লাহর মুক্তিপ্রাপ্ত বান্দা, যাদেরকে আল্লাহ্ তাদের আমল বা কোনো নেক কাজ ছাড়াই জান্নাতে প্রবেশ করালেন। এরপর তিনি বলবেন: 'জান্নাতে প্রবেশ করো। তোমরা যা কিছু দেখতে পাবে, তা তোমাদেরই।' তখন তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি আমাদেরকে এমন কিছু দান করেছেন, যা সৃষ্টিকুলের আর কাউকেই দান করেননি।' আল্লাহ্ বলবেন: 'আমার কাছে এর চেয়েও উত্তম কিছু তোমাদের জন্য রয়েছে।' তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! এর চেয়ে উত্তম আর কী হতে পারে?' আল্লাহ্ বলবেন: 'আমার সন্তুষ্টি। এরপর আমি তোমাদের ওপর কখনও অসন্তুষ্ট হব না।"'
927 - عن أبي سعيد الخدري، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"قد أُعطي كلُّ نبيٍّ عطيّة، فكلّ قد تعجّلها، وإنّي أخّرتُ عطيتي شفاعةً لأمّتي، وإنّ الرّجل من أمّتي ليشفع للفئام من النّاس، فيدخلون الجنّة، وإنّ الرّجل ليشفع للقبيلة، وإنّ الرّجل ليشفع للعُصبة، وإنّ الرّجل ليشفع للثلاثة وللرّجلين وللرّجل".
حسن: رواه الإمام أحمد (11148)، وأبو يعلى (1014)، والبزّار -كشف الأستار (3458) - كلّهم من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عطيّة العوفيّ.
ورواه ابن خزيمة في التوحيد (626) من طريق مالك بن مغول، عن عطية، به، مثله.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عطية وهو ابن سعيد بن جنادة العوفيّ مختلف فيه. فقال ابن معين: صالح، وضعّفه النسائيّ وغيره وقال أبو حاتم: ضعيف يكتب حديثه.
قلت: قول أبي حاتم هو العمدة فإنه مع ضعف فيه يكتب حديثه في الشّواهد والمتابعات، وهذا منها وإن انفرد ضُعِّف.
وأرى أنه لم يخطئ في هذا الحديث لوجود شواهد كثيرة لأجزائه، وقد حسّنه الترمذيّ (2440) بعد أن رواه من الطّريق نفسه الجزء الثاني من الحديث.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 371):"إسناده حسن".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: প্রত্যেক নবীকেই একটি বিশেষ দান (দোয়া কবুলের ক্ষমতা) প্রদান করা হয়েছিল, আর প্রত্যেকেই তা তাড়াতাড়ি করে চেয়ে নিয়েছেন। কিন্তু আমি আমার সেই দানকে আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফাআত) হিসেবে স্থগিত রেখেছি। আর আমার উম্মতের কোনো ব্যক্তি মানুষের বিশাল দলের (বহু সংখ্যক) জন্য সুপারিশ করবে, ফলে তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি একটি গোত্রের জন্য সুপারিশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি একটি ছোট দলের (গোষ্ঠীর) জন্য সুপারিশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি তিনজনের জন্য, দু’জনের জন্য এবং মাত্র একজনের জন্য সুপারিশ করবে।
928 - عن أبي بكر الصّديق في حديث الشّفاعة في الموقف وفيه:"ثم يقال: ادعوا الصّدِّيقين فيشفعون، ثم يقال: ادْعُوا الأنبياء، قال: فيجيء النبي ومعه العصابة، والنّبي ومعه الخمسة والسّتة، والنّبيُّ وليس معه أحد. ثم يقال: ادعوا الشّهداء فيشفعون لمن أرادوا، وقال: فإذا فعلت الشُّهداء ذلك. قال: يقول اللَّه عز وجل: أنا أرحم الرّاحمين، أدْخلوا جنَّتِي مَنْ كان لا يُشركُ بي شيئًا. قال: فيدخلون الجنَّةَ".
حسن: رواه الإمام أحمد (15)، وأبو يعلى (56)، والبزّار -كشف الأستار (3465) - كلّهم من طريق النّضر بن شُميل، قال: حدّثني أبو نَعامة، قال: حدّثني أبو هُنيد البراء بن نوفل، عن والان العدَويّ، عن حذيفة، عن أبي بكر الصّديق، فذكره في حديث طويل سبق ذكره والنكارة فيه: تقديم الصديقين على الأنبياء.
আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শাফা‘আত (সুপারিশ) সংক্রান্ত হাদীসে বর্ণিত হয়েছে যে, বিচারের স্থানে (মওকিফে) বলা হবে: এরপর বলা হবে: ‘সিদ্দীকগণকে (সত্যনিষ্ঠদেরকে) ডাকো।’ ফলে তারা সুপারিশ করবে। এরপর বলা হবে: ‘নবীগণকে ডাকো।’ তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তখন নবী আসবেন এবং তাঁর সাথে থাকবে একটি দল, আরেক নবী আসবেন, তাঁর সাথে থাকবে পাঁচ-ছয় জন, আর আরেকজন নবী আসবেন, তাঁর সাথে কেউ থাকবে না। এরপর বলা হবে: ‘শহীদগণকে ডাকো।’ তারা যাদের জন্য ইচ্ছা করবে তাদের জন্য সুপারিশ করবে। তিনি বললেন: শহীদগণ যখন সুপারিশের এই কাজ শেষ করবে, তখন আল্লাহ তা‘আলা বলবেন: ‘আমি সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু। আমার জান্নাতে তাদেরকে প্রবেশ করাও যারা আমার সাথে সামান্যতমও কোনো কিছু শিরক করেনি।’ তিনি বললেন: ফলে তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে।
929 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الرّجلَ ليشفعُ للرّجلين والثّلاثة، والرّجل للرّجل".
صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (3473) -، وابن خزيمة في التوحيد (624) من طرق عن عبد الرزّاق، أنبأ معمر، عن ثابت، أنه سمع أنس بن مالك يقول (فذكره). وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই একজন ব্যক্তি দুই বা তিনজনের জন্য সুপারিশ করবে এবং একজন ব্যক্তি কেবল একজনের জন্যও সুপারিশ করবে।"
930 - عن عبد اللَّه بن أبي الجدْعاء، أنّه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"ليُدخلنّ الجنّة بشفاعة رجل من أمّتي أكثر من بني تميم". قالوا: يا رسول اللَّه، سواك؟ قال:"سوايَ".
صحيح: رواه الترمذيّ (2438)، وابن ماجه (4316) -والسياق له- كلاهما من طريق خالد الحذّاء، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن عبد اللَّه بن أبي الجدعاء، فذكره.
وسياق الترمذيّ: قال عبد اللَّه بن شقيق: كنتُ مع رهط بإيلياء، فقال رجل منهم: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث). فلما قام، قلت: من هذا؟ قالوا: هذا ابنُ أبي الجدْعاء.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب، وابن أبي الجدعاء هو عبد اللَّه، وإنّما يعرف له هذا الحديث الواحد" انتهى.
قلت: إسناده صحيح، وأخرجه ابن خزيمة في التوحيد (619)، وابن حبان في صحيحه (7336)، والحاكم (1/ 70، 71)، والبيهقي في دلائل النّبوة (6/ 378) كلّهم من طريق خالد الحذّاء.
وكان الحسن يقول:"هو أويس القرني". وفي رواية"عثمان".
আব্দুল্লাহ ইবনু আবিল জাদ্আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার উম্মতের একজন লোকের সুপারিশের কারণে বনু তামিম গোত্রের লোকদের চেয়েও বেশি লোক জান্নাতে প্রবেশ করবে।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি ছাড়া?" তিনি বললেন, "আমি ছাড়া।"
931 - عن أبي بكرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يُحمل النّاس على الصراط يوم القيامة، فتقادعُ بهم جنبتا الصّراط تقادعُ الفراش في النّار. قال: فينجّي اللَّهُ برحمته من يشاء". قال:"ثم يؤذن للملائكة والنّبيين والشّهداء أن يشفعوا، فيشفعون ويخرجون، ويشفعون ويُخرجون، ويشفعون ويُخرجون، وزاد عفان: مرة فقال أيضًا ويشفعون ويُخرجون مَنْ كان في قلبه ما يزن ذرّة من إيمان".
حسن: رواه الإمام أحمد (20440)، والبزّار -البحر الزّخار (3671) -، والطبرانيّ في الصغير (929)، وابن أبي عاصم في السنة (838) كلّهم من حديث عفّان بن مسلم، حدّثنا سعيد بن زيد، قال: سمعت أبا سليمان العصريّ، حدّثنا عقبة بن صُهبان، عن أبي بكرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سعيد بن زيد وهو أخو حمّاد بن زيد فإنه حسن الحديث، وأبو سليمان العصريّ وثقه ابن معين كما روى ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 380) وسمّاه الدَّولابيّ في الكنى (1/ 195) كعب بن شبيب، وأخرج الحديث من طريق آخر عن سعيد بن زيد بإسناده، مثله.
وقال البزّار:"لا نعلمه رواه بهذا اللّفظ إِلَّا أبو بكرة، وإسناده مرضيون". وصحّح رجاله أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (10/ 359).
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামতের দিন মানুষকে পুলসিরাতের উপর বহন করা হবে। সিরাতের উভয় পার্শ্ব দিয়ে তারা পতঙ্গ যেভাবে আগুনে পড়ে, সেভাবে নিক্ষিপ্ত হতে থাকবে। তিনি বললেন: অতঃপর আল্লাহ্ তাঁর রহমতে যাকে ইচ্ছা মুক্তি দেবেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এরপর ফেরেশতাগণ, নবীগণ এবং শহীদগণকে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে। অতঃপর তারা সুপারিশ করবে এবং (যাদের জন্য সুপারিশ করবে) তাদের বের করে আনবে। তারা সুপারিশ করবে এবং তাদের বের করে আনবে। তারা সুপারিশ করবে এবং তাদের বের করে আনবে। আর আফ্ফান (বর্ণনা করার সময়) একবার বাড়িয়ে বলেছেন, তিনি আরো বললেন: তারা সুপারিশ করবে এবং এমন ব্যক্তিকে বের করে আনবে যার অন্তরে অণু পরিমাণ ঈমান রয়েছে।
932 - عن أنس بن مالك، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خررتُ ساجدًا فأسجد سجودي أوّل مرة ومثله معه، ويفتح لي من الثّناء والتّحميد مثل ذلك، ثم يقال: سلْ تُعْطَه،
واشْفع تُشفَّع، فأقول: يا ربّ ذرية آدم لا تُحرق اليوم بالنّار، فيقول: اذهبوا فمن وجدتم في قلبه مثقال ذرّة من إيمان فأخرجوه، فيُخرجون ما يعلم عدَّتهم إِلَّا اللَّه عز وجل، ويبقى أكثرهم، ثم يؤذن لآدم بالشّفاعة فيشفع لعشرة آلاف ألف، ثم يؤذن للملائكة والنّبيين فيشفعون حتى إنّ المؤمن ليشفعُ لأكثر من ربيعة ومضر".
حسن: رواه الآجرّي في الشّريعة (809) عن أبي بكر جعفر بن محمد الفريابيّ، قال: حدّثنا قتيبة بن سعيد، قال: حدّثنا اللّيث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن أنس ابن مالك، فذكر الحديث بطوله، وسبق كاملا في الشّفاعة لأهل الموقف.
وإسناده حسن من أجل الكلام في سعيد بن أبي هلال اللّيثيّ، غير أنه حسن الحديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি সিজদায় লুটিয়ে পড়ব, অতঃপর আমি আমার সিজদা প্রথমবার করব এবং অনুরূপ আরও একবার করব। এবং অনুরূপভাবে আমার জন্য প্রশংসা ও গুণকীর্তনের দ্বার খুলে দেওয়া হবে। এরপর বলা হবে: চাও, তোমাকে দেওয়া হবে; সুপারিশ করো, তোমার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে। তখন আমি বলব: হে আমার রব, আজ আদম-সন্তানদেরকে আগুনে পোড়াবেন না। তিনি বলবেন: তোমরা যাও, যাদের অন্তরে তোমরা অণু পরিমাণও ঈমান পাবে, তাদের বের করে আনো। তখন তারা এমন সংখ্যক লোককে বের করে আনবে যাদের সংখ্যা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা ছাড়া আর কেউ জানে না। আর তাদের অধিকাংশ (জাহান্নামে) থেকে যাবে। এরপর আদম (আ)-কে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে, তখন তিনি এক কোটি লোকের জন্য সুপারিশ করবেন। এরপর ফিরিশতা ও নবিগণকে সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হবে, অতঃপর তাঁরা সুপারিশ করবেন। এমনকি একজন মুমিনও রাবীআহ ও মুদার (গোত্রের) চেয়েও বেশি লোকের জন্য সুপারিশ করবে।"
933 - عن حذيفة بن اليمان، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يُخرجُ اللَّهُ قومًا مُنْتنين قد محشتْهم النَّارُ بشفاعة الشّافعين، فيدخلهم الجنّة، فيُسَمَّون الجهنميُّون".
حسن: رواه الإمام أحمد (23423)، وأبو داود الطيالسيّ في"مسنده" (420) ومن طريقه ابنُ خزيمة (545)، والآجريّ في الشّريعة (805) كلّهم من طريق شعبة، عن حمّاد، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حمّاد وهو ابن أبي سليمان، فإنه حسن الحديث.
تنبيه: وقع سقط في مسند أبي داود الطَّيالسيّ في طبعة المعارف القديمة، فإنّ الإسناد الذي ذكر فيه وهو:"حدّثنا أبو عوانة، عن أبي مالك، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة". هو لمتن آخر سقط منه وهو:"كلّ معروف صدقة". وكذا رواه أيضًا مسلم (1005) من طريق أبي عوانة، بإسناده.
وأمّا متن هذا الحديث فإسناده كما ذكرناه، وبهذا الإسناد أخرجه ابن خزيمة والآجري فلا يكون أبو مالك الأشجعيّ متابعًا لحماد بن أبي سليمان؛ لأنّ هذا الحديث يدور على حمّاد بن أبي سليمان، وعنه رواه شعبة كما مضى، ومحمد بن جعفر عند الإمام أحمد (23423)، وابن خزيمة (542)، وحماد بن سلمة، وهشام الدّستوائيّ عند ابن أبي عاصم في السنة (835، 836) كلّهم عن حمّاد بن أبي سليمان، بإسناده، مثله.
وقد نبّه على سقط المتن المشار إليه، الدكتور محمد بن عبد المحسن التركي في تحقيق مسند أبي داود الطيالسيّ فجزاه اللَّه خيرًا.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ সুপারিশকারীদের সুপারিশের ফলে এমন কিছু সম্প্রদায়কে (জাহান্নাম থেকে) বের করবেন, যাদের শরীর দুর্গন্ধযুক্ত এবং আগুন যাদেরকে ঝলসে দিয়েছে। অতঃপর তিনি তাদেরকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন এবং তাদেরকে 'জাহান্নামী' নামে ডাকা হবে।"
934 - عن أبي أمامة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرجُ من النّار بشفاعة رجل من أمّتي أكثر من ربيعة ومضر".
حسن: رواه الطّبرانيّ في الكبير (8/ 330) عن أحمد بن داود المكيّ، ثنا مسلم بن إبراهيم، ثنا مبارك بن فضالة، عن أبي غالب، عن أبي أمامة، فذكره.
وأبو غالب صاحب أبي أمامة مختلف فيه، فضعّفه النسائيّ وأبو حاتم وابن حبان، ووثقه الدارقطنيّ، ويُحسَّن حديثُه في الشّواهد والمتابعات، وقد توبع.
رواه الإمام أحمد (22215)، والآجريّ في الشّريعة (817) كلاهما من حديث حريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن ميسرة، عن أبي أمامة قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ليدخلن الجنّة بشفاعة رجل ليس بنبي مثلُ الحيَّين -أو مثل أَحد الحيين-: ربيعة ومضر". فقال رجل: يا رسول اللَّه، أو ما ربيعة من مضر؟ فقال:"إنّما أقول ما أُقَوَّل".
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের একজন ব্যক্তির সুপারিশে রবী‘আহ ও মুদার গোত্রের লোকসংখ্যার চেয়েও বেশি লোককে জাহান্নাম থেকে বের করা হবে।
935 - عن عتبة بن عبد السُّلميّ، قال: جاء أعرابي إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: ما حوضُك الذي تُحدِّث عنه؟ قال:"كما بين البيضاء إلى بصري يمدُّني اللَّه فيه بكُراعٍ لا يدري إنسانٌ مِمَّن خُلق أين طرفاه"، فكبَّر عمر بن الخطّاب، فقال:"أما الحوض فيرد عليه فقراء المهاجرين الذين يقاتلون في سبيل اللَّه، ويموتون في سبيل اللَّه. فأرجو أن يُورِثَني الكُرَاع فأشرب منه". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ ربي وعدني أن يدخل الجنّة من أمتي سبعين ألفًا بغير حساب، ثم يشفع كلُّ ألف لسبعين ألفًا، ثم يَحثي ربي تبارك وتعالى بكفيه ثلاث حَثَيَات". فكبَّر عمر وقال: إنّ السَّبعين الأُوّلى ليشفعهم اللَّه في آبائهم، وأبنائهم، وعشائرهم. وأرجو أن يجعلني اللَّهُ في إحدى الحثيات الأواخر". فقال الأعرابيُّ: يا رسول اللَّه، فيها فاكهةٌ؟ قال:"نعم وفيها شجرة تدعى طوبى هي تطابق الفردوس". فقال: أيّ شجر أرضنا تُشبه؟ قال:"ليس تشبه من شجر أرضك، ولكن أتيتَ الشّام؟". قال: لا يا رسول اللَّه، قال:"فإنَّها تشبه شجرة في الشّام تُدعى الجوْزَةَ تنبت على ساق واحد، ثم ينتشر أعلاها". قال: فما عِظم أصلها؟ قال:"لو ارتحلتَ جذعةً من إبل أهلك لما قطعتها حتى تنكسر ترقوتُها هَرَمًا". قال: فيها عنب؟ قال:"نعم". قال: ما عظم العنقود منها؟ قال:"مسيرة شهر للغراب الأبقع لا ينثني ولا يفتر". قال: فما عظم الحبة منه؟ قال: هل ذبح أبوك من غنمه تيسًا عظيمًا؟ قال:"نعم". قال: فسلخ إهابها فأعطاه أمَّك، فقال ادبغي هذا ثم افري لنا منه ذنوبا نروي به ماشيتنا". قال: نعم. قال: فإن تلك الحبة تشبعني وأهل بيتي فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"وعامة عشيرتك".
حسن: رواه الطَّبرانيّ في"الأوسط" (404) واللّفظ له، وفي"الكبير" (17/ 126 - 127)، وأحمد (17642) مختصرًا كلّهم من طريق عامر بن زيد البكاليّ، أنه سمع عتبة بن عبد السّلميّ، فذكره. وصحّحه ابن حبان (6450).
وإسناده حسن، عامر بن زيد البكاليّ، ذكره ابن حبان في الثقات (5/ 191)، وابن أبي حاتم
في الجرح والتعديل ولم يذكر فيه شيئًا، وهو من رجال التعجيل (505)، ولما قال الحسيني:"ليس بالمشهور" تعقبه الحافظ فقال:"بل معروف" وأطال في ذكره، والخلاصة أنه حسن الحديث.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 414) وقال:"رواه الطّبرانيّ في"الأوسط" واللّفظ له، وفي"الكبير"، وأحمد باختصار عنهما وفيه عامر بن زيد البكاليّ، وقد ذكره ابن أبي حاتم ولم يجرحه ولم يوثقه، وبقية رجاله ثقات".
وقوله:"بكراع" أي بطرف من ماء الجنّة.
قال في النهاية:"وفي حديث الحوض:"فبدأ اللَّه بكراع" أي طرف من ماء الجنّة، فشبّه بالكراع لقلته وأنه كالكراع من الدَّابة".
وفي الباب أيضًا ما رُوي مرسلًا عن الحسن، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:
"يشفع عثمان بن عفّان يوم القيامة في مثل ربيعة ومضر".
رواه الترمذيّ (2439)، والآجريّ في الشريعة (818) كلاهما من حديث جسر أبي جعفر، عن الحسن، فذكره.
وهو مع إرساله ضعيف؛ لأنّ جسرًا وهو ابن فرقد القصّاب أبو جعفر، وقيل: جسر بن الحسن اليمامي ولكن كنيته أبو عثمان، كلاهما في طبقة واحدة يرويان عن الحسن إِلَّا أن الأوّل ضعيف، والثاني صدوق، والغالب أنه الأوّل لأنه يكنى بأبي جعفر.
ولكن رواه الإمام أحمد في الزهد (671)، والحاكم (3/ 405) كلاهما من وجهين مختلفين عن الحسن، فذكر مثله.
قال الحسن كما في الزهد:"كانوا يرونه عثمان بن عفان أو أويس القرنيّ".
وفي المستدرك: قال أبو بكر بن عياش:"فقلت لرجل من قومه: أويس بأي شيء بلغ هذا؟ قال: فضل اللَّه يؤتيه من يشاء".
وفي الباب ما رُوي عن الحارث بن أُقيش مرفوعًا:"إنّ من أمّتي مَنْ يدخلُ الجنّة بشفاعته أكثر من مضر، وإنّ من أمّتي من يعظم للنار حتى يكون أحدَ زواياها". وفيه عبد اللَّه بن قيس النخعيّ مجهول.
رواه ابن ماجه (323) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن داود بن أبي هند، قال: حدّثنا عبد اللَّه بن قيس، قال: كنت عند أبي بردة، ذات ليلة، فدخل علينا الحارث بن أقيش، فحدثنا الحارث ليلتئذ أن رسول اللَّه قال (فذكر الحديث).
وأخرجه الإمام أحمد (17858)، وابن خزيمة في كتاب التوحيد (621)، والحاكم في المستدرك (1/ 71) وقال:"صحيح على شرط مسلم". والحافظ ابن حجر في الإصابة في ترجمة الحارث بن أقيش (1/ 273) وقال:"أخرج ابن ماجه حديثه في الشّفاعة بسند صحيح". وله حديث آخر فيمن مات له ثلاثة من الولد.
وقد أخرجه ابن خزيمة (أي في التوحيد) مجموعًا إلى الحديث الآخر، ووقع عند البغويّ تصريحه بسماعه من النّبيّ صلى الله عليه وسلم". انتهى كلامه.
قلت: في الإسناد عبد اللَّه بن قيس وهو ليس من رجال مسلم، وإنّما أخرج له ابن ماجه.
وهو ممن ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا فهو في عداد المجهولين. وكذا قال الحافظ في التقريب:"مجهول". ونقل في التهذيب عن علي بن المديني أنه جهله. ولم يوثقه الذّهبيّ في الكاشف، وإنّما اكتفى بقوله: روى عنه داود بن أبي هند - يعني أنه مجهول. وقال في"الميزان" عنه داود بن أبي هند، ولعله الذي قبله - أي عبد اللَّه بن قيس، عن ابن عباس: لا يدري من هو؟ تفرّد عنه أبو إسحاق" انتهى كلامه.
وأخرجه البخاريّ في التاريخ الكبير (2/ 261) من طريق داود بن أبي هند بإسناده مكتفيًا بحديث الشّفاعة وقال:"إسناده ليس بذاك المشهور".
وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر قال: يقول النّبيُّ صلى الله عليه وسلم للرّجل:"يا فلان قم فاشفع، فيقوم الرجل فيشفع للقيلة، ولأهل البيت، وللرّجل وللرّجلين على قدر عمله".
رواه ابن خزيمة في التوحيد (623) عن إسحاق بن إبراهيم بن حبيب بن الشّهيد، قال: حدّثنا يحيى بن يمان، عن سفيان، عن آدم بن علي، عن ابن عمر، فذكره.
ويحيى بن يمان العجليّ الكوفيّ مختلف فيه فمشاه ابن معين في رواية، وضعّفه في رواية، وأكثر أهل العلم على تضعيفه لسوء حفظه حتى قال ابن عدي بعد أن أخرج عدّة من أحاديثه:"ولابن يمان عن الثوريّ غير ما ذكرت، وعامّة ما يرويه غير محفوظ، وابن يمان في نفسه لا يتعمّد الكذب، إِلَّا أنّه يخطئ ويشتبه عليه".
উতবাহ ইবনু আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞেস করল, আপনি যে হাউয (হাউজে কাউসার) সম্পর্কে আলোচনা করেন, তা কেমন? তিনি বললেন: 'তা বাইদা থেকে বসরা (শহর) পর্যন্ত বিস্তৃত। আল্লাহ তা'আলা এটিকে (জান্নাতের) পানির এক ক্বুরা' (প্রবাহ) দ্বারা পূর্ণ করবেন, যার উভয় প্রান্ত সৃষ্টিকুলের কেউ জানে না।'
তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'তবে ঐ হাউযে তারাই আগমন করবে যারা আল্লাহর পথে যুদ্ধ করে এবং আল্লাহর পথে মৃত্যুবরণকারী মুহাজিরদের মধ্য থেকে দরিদ্র। আমি আশা করি, আল্লাহ আমাকে সেই ক্বুরা' এর উত্তরাধিকারী করবেন এবং আমি তা থেকে পান করব।'
আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'আমার রব আমাকে প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন যে, আমার উম্মাতের সত্তর হাজার লোককে বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। এরপর প্রত্যেক এক হাজার ব্যক্তি সত্তর হাজার লোকের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) করবে। অতঃপর আমার রব তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তাঁর উভয় মুষ্টি দ্বারা আরও তিন মুষ্টি (মানুষকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন)।'
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললেন এবং বললেন: 'নিশ্চয় আল্লাহ প্রথম সত্তর হাজারকে তাদের পিতা-মাতা, সন্তান-সন্ততি এবং গোত্রের লোকদের জন্য শাফা‘আত করার অনুমতি দেবেন। আমি আশা করি, আল্লাহ আমাকে শেষ মুষ্টিগুলোর (মানুষের) অন্তর্ভুক্ত করবেন।'
তখন বেদুঈন জিজ্ঞেস করল: 'হে আল্লাহর রাসূল, তাতে কি ফলমূল থাকবে?' তিনি বললেন: 'হ্যাঁ, আর তাতে 'ত্বূবা' নামক একটি গাছ থাকবে, যা জান্নাতুল ফিরদাউসের অনুরূপ।'
সে জিজ্ঞেস করল: 'আমাদের দুনিয়ার কোন গাছের সাথে তা সাদৃশ্যপূর্ণ?' তিনি বললেন: 'তা তোমাদের দুনিয়ার কোনো গাছের মতো নয়। তবে আপনি কি শাম (সিরিয়া) দেশে এসেছেন?' সে বলল: 'না, হে আল্লাহর রাসূল।' তিনি বললেন: 'তবে তা শামের একটি গাছের মতো, যাকে 'জাওযাহ' বলা হয়। তা একটি মাত্র কাণ্ডের উপর জন্মায়, এরপর তার উপরের অংশ ছড়িয়ে পড়ে।'
সে জিজ্ঞেস করল: 'তার মূল কতটুকু বিশাল?' তিনি বললেন: 'যদি তুমি তোমার পরিবারের একটি শক্তিশালী উটনীতে চড়ে তাতে ভ্রমণ করো, তবে বার্ধক্যজনিত কারণে তার ঘাড়ের অস্থি ভেঙে যাওয়ার পূর্ব পর্যন্ত তুমি তা অতিক্রম করতে পারবে না।'
সে জিজ্ঞেস করল: 'তাতে কি আঙ্গুর থাকবে?' তিনি বললেন: 'হ্যাঁ।' সে বলল: 'তার আঙ্গুরের থোকা কতটুকু বিশাল হবে?' তিনি বললেন: 'একটি সাদা-কালো চড়ুই পাখির এক মাসের ভ্রমণ পথের সমান হবে, যা মোড় নেয় না এবং ক্লান্তও হয় না।'
সে জিজ্ঞেস করল: 'তবে তার একটি আঙ্গুরের দানা কত বড় হবে?' তিনি বললেন: 'তোমার পিতা কি তার ছাগলের মধ্য থেকে কখনো একটি বিশাল পুরুষ ছাগল যবেহ করেছেন?' সে বলল: 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন: 'তখন সে তার চামড়া ছাড়িয়ে তোমার মাকে দিয়েছিল এবং বলেছিল যে, এটি দাবাগাত (চামড়া পাকা) করে নাও, অতঃপর তা থেকে আমাদের জন্য একটি 'যানুব' (বড় চামড়ার মশক) তৈরি করে দাও, যা দ্বারা আমরা আমাদের পশুদের পানি পান করাবো?' সে বলল: 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন: 'তবে সেই আঙ্গুরের একটি দানাই তোমাকে এবং তোমার পরিবারকে তৃপ্ত করার জন্য যথেষ্ট হবে।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'এবং তোমার গোত্রের বেশিরভাগ লোককেও।'
936 - عن حذيفة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يقول إبراهيم يوم القيامة: يا ربَّاه، فيقول الرَّبُّ جَلَّ وعلا: يا لبَّيكاه فيقول إبراهيم: يا ربّ، حرَّقْتَ بنيَّ. فيقول: أخرجوا من النّار من كان في قلبه ذرّةً، أو شعيرة من إيمان".
صحيح: رواه ابنُ حبان (7378) عن محمد بن الحسن بن مكرم، قال: حدّثنا سُريج بن يونس، قال: حدّثنا مروان بن معاوية، قال: حدّثنا أبو مالك الأشجعيّ، عن حذيفة، فذكره. وإسناده صحيح.
وفي الباب ما رُوي عن ربعي بن حراش قال: لقيت عبد اللَّه بن سلام فقال: ألا أحدثك حديثًا أجده في كتاب اللَّه عز وجل:"إنّ اللَّه يخرج قومًا من النّار حتى إنّ إبراهيم خليل الرّحمن يقول: أي ربّ، حرَّقْت بني، فيخرجون".
رواه ابن خزيمة في التوحيد (627)، والطبرانيّ في الكبير (قطعة من الجزء 13 - 14 (396) كلاهما من حديث أبي داود، حدّثنا شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش قال: قدمتُ المدينة فلقيتُ عبد اللَّه بن سلام، فذكره.
ولفظهما سواء إِلَّا أنه ذكر في الطبرانيّ خرشة بن الحرّ، وكذلك ذكره أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (10/ 381)، وعزاه إلى الطبرانيّ وقال:"رجاله رجال الصّحيح".
وخرشة بن الحرّ من كبار التّابعين روى عن عبد اللَّه بن سلام، وعنه ربعي بن حراش، ولم أرَ أنَّ ربعي بن حراش روي عن عبد اللَّه بن سلام فالذي يظهر أنّه سقط في إسناد ابن خزيمة خرشة بن الحرّ. ثم هذا لم يسنده عبد اللَّه بن سلام إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم.
وقوله:"أجده في كتاب اللَّه" لعلّه يقصد به التَّوراة؛ لأنّه لا يوجد مثل هذا في القرآن الكريم.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ইবরাহীম (আঃ) কিয়ামতের দিন বলবেন: "হে আমার রব!" তখন মহিমান্বিত রব বলবেন: "আমি তোমার ডাকে সাড়া দিতে প্রস্তুত!" তখন ইবরাহীম বলবেন: "হে রব, আপনি আমার সন্তানদের জ্বালিয়ে দিলেন।" তখন (আল্লাহ) বলবেন: "যার অন্তরে অণু পরিমাণ অথবা যব পরিমাণ ঈমান আছে, তাকে জাহান্নাম থেকে বের করে আনো।"
937 - عن مقدام بن معدي كرب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"للشّهيد ستُّ خصال: يُغفر له في أول دَفْعةٍ، ويرى مقعده من الجنّة، ويجار من عذاب القبر، ويأمن من الفزع الأكبر، ويوضع على رأسه تاج الوقار: الياقوتةُ منها خيرٌ من الدُّنيا وما فيها، ويزوّج اثنين وسبعين زوجة من الحور العين، ويُشفَّع في سبعين من أقاربه".
حسن: رواه الترمذيّ (1661) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، حدّثنا نُعيم بن حمّاد، حدّثنا بقية ابن الوليد، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معدي كرب، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب".
قلت: فيه بقية بن الوليد وهو مدلّس وقد عنعن، ولكنّه توبع.
رواه ابن ماجه (2799)، والآجري في الشريعة (811)، وأحمد (17182) كلّهم من طرق عن إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعد، بإسناده إِلَّا أن الآجرّي قال:"تسع خصال". وزاد الجميع خصلة واحدة وهي:"ويحلّى حلّة الإيمان".
وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن أهل بلده، وبحير بن سعد من أهل بلده، وباقي رجاله ثقات.
وأمّا قوله:"ست خصال" أو"تسع خصال". والعدد الصّحيح في المتن"ثمان خصال". وفي بعض الرّوايات تكرار الزواج هكذا: ويزوَّج من الحور العين، ويزوَّج اثنين وسبعين من الحور العين".
وأظنّ هذا كلّه من تخليط إسماعيل بن عياش، لأنّه كان مختلطًا في غير أهل بلده، وهذا لا يمنع أن يقع له الاختلاط أيضًا في أهل بلده أحيانًا.
فإذا صحّ تكرار الزواج صحَّ عدد الخصال وهو تسع.
ولعلّ ممّا اضطرب فيه إسماعيل بن عياش أنه جعل هذا الحديث مرة من مسند معد يكرب، كما جعل أخرى من مسند عبادة بن الصّامت.
رواه الآجريّ في الشّريعة (812) من طريقه عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير ابن مرة، عن عبادة بن الصّامت، فذكره.
ولكن هذا لا يعلّل ما ثبت، أو أنّ هذا الحديث رُوي عن صحابين وكلاهما صحيح.
মিকদাম ইবনে মা’দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “শহীদের জন্য ছয়টি বিশেষ প্রাপ্তি রয়েছে: প্রথম রক্তবিন্দু পড়ার সাথে সাথেই তার গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়, সে জান্নাতে তার অবস্থান দেখতে পায়, তাকে কবরের আযাব থেকে রক্ষা করা হয়, সে মহাত্রাস (কিয়ামতের দিনের ভয়) থেকে নিরাপদ থাকে, তার মাথায় মর্যাদার মুকুট পরিয়ে দেওয়া হয়—যার একটি ইয়াকুত দানা পৃথিবী এবং এর মধ্যে যা কিছু আছে, তার চেয়েও উত্তম—তাকে বাহাত্তর জন সুন্দরী হুর-আইনের সাথে বিবাহ দেওয়া হয় এবং তাকে তার সত্তর জন নিকটাত্মীয়ের জন্য সুপারিশ করার অনুমতি দেওয়া হয়।”
938 - عن أبي الدّرداء قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يُشفَّع الشّهيد في سبعين من أهل بيته".
حسن: رواه أبو داود (2522) ومن طريقه البيهقيّ (9/ 164) عن أحمد بن صالح، حدّثنا يحيى ابن حسان، حدّثنا الوليد بن رباح الذَّماريّ، حدّثني عمي نمران بن عتبة الذَّماريّ، قال: دخلنا على أمّ الدّرداء ونحن أيتام، فقالت: أبشروا فإنّي سمعتُ أبا الدّرداء يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم (فذكره).
وإسناده حسن من أجل نمران بن عتبة روى عنه حريز بن عثمان، وشيوخ حريز كلّهم ثقات، ولم يوثقه أحدٌ وإنّما ذكره ابن حبان في"ثقاته" (7/ 544) وروى من طريقه في صحيحه (4660)، ومن طريقه رواه أيضًا الآجريّ في الشّريعة (814).
أمّا الوليد بن رباح الذّماريّ فقال أبو داود:"صوابه: رباح بن الوليد". وهو: رباح بن الوليد بن يزيد بن نمران الذَّماريّ فانقلب على بعض الرّواة فقالوا: الوليد بن رباح الذّماريّ وهو"صدوق".
وفي الباب عن عثمان بن عفّان مرفوعًا:"يشفع يوم القيامة ثلاثة: الأنبياء، ثم العلماء، ثم الشّهداء".
رواه ابن ماجه (4313) عن سعيد بن مروان قال: حدّثنا أحمد بن يونس، قال: حدّثنا عنبسة ابن عبد الرحمن، عن عِلاق بن أبي مسلم، عن أبان بن عثمان، عن عثمان بن عفّان، فذكره.
وفيه عنبسة بن عبد الرحمن الأمويّ جمهور أهل العلم متفقون على تضعيفه، وقد رماه أبو حاتم بالوضع، وشيخه علاق بن مسلم أو ابن أبي مسلم"مجهول".
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: শহীদ তার পরিবারের সত্তর জনের জন্য সুপারিশ করবে।
939 - عن أبي أمامة الباهليّ، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"اقرأوا القرآن، فإنّه يأتي يوم القيامة شفيعًا لأصحابه، اقرأوا الزّهراوين البقرة وسورة آل عمران، فإنّهما تأتيان يوم القيامة كأنهما غمامنان، أو كأنهما غياتيان، أو كأنهما فرقان من طير صوافّ تُحاجّان عن أصحابهما. اقرأوا سورة البقرة، فإنّ أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (804) عن الحسن بن علي الحلوانيّ، حدّثنا أبو توبة (وهو الربيع بن نافع)، حدّثنا معاوية (يعني ابن سلّام)، عن زيد، أنه سمع أبا سلّام يقول: حدّثني أبو أمامة، فذكره.
وزيد هو أخو معاوية بن سلّام بن أبي سلّام، فيكون أبو سلّام هو جدّ زيدٍ.
আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: তোমরা কুরআন পাঠ করো। কেননা তা ক্বিয়ামতের দিন তার পাঠকের জন্য সুপারিশকারী হিসেবে আগমন করবে। তোমরা 'আয-যাহরাওয়াইন' (উজ্জ্বলতম দু'টি সূরা) অর্থাৎ সূরা আল-বাক্বারাহ এবং সূরা আলে ইমরান পাঠ করো। কেননা, এই দু'টি সূরা ক্বিয়ামতের দিন আগমন করবে যেন তারা দু'টি মেঘখন্ড, অথবা দু'টি ছায়াদানকারী, অথবা ডানা মেলে উড়ে বেড়ানো পাখির দু'টি ঝাঁক; তারা তাদের পাঠকের পক্ষ থেকে তর্ক করবে (সুপারিশ করবে)। তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ পাঠ করো। কারণ তা গ্রহণ (তথা তিলাওয়াত করা) বরকত এবং তা ত্যাগ করা আক্ষেপের কারণ। আর বাতিলপন্থীরা (জাদুকররা) এর উপর বিজয় লাভ করতে পারে না।
940 - عن أبي هريرة مرفوعًا:"إنّ سورة من القرآن ثلاثون آية شفعت لرجل حتى غفر له هي: {تَبَارَكَ الَّذِي بِيَدِهِ الْمُلْكُ}".
حسن: رواه أبو داود (1400)، والترمذيّ (2891)، وابن ماجه (3786)، وصحّحه ابن حبان (787)، والحاكم (1/ 565) كلّهم من طريق شعبة، عن قتادة، عن عباس الجشميّ، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عباس الجشمي واسم أبيه عبد اللَّه، ذكره ابن حبان في ثقاته، وأخرج حديثه في صحيحه، وصحّحه أيضًا الحاكم، وحسّنه الترمذيّ، وهو من التابعين، وروى عنه جمعٌ، فلا بأس من تحسين حديثه وخاصة في الفضائل والأحكام.
وأمّا ما نقل عن البخاريّ أن الجشمي لم يذكر سماعا فلم أجده في التاريخ (7/ 4)، وإنْ وجد في بعض النسخ فذلك راجع إلى مذهبه، والجشمي لم يتهم بالتدليس، فعنعنته تحمل على الاتصال كما هو رأي الجمهور.
وفي الباب ما رُوي عن علي بن أبي طالب مرفوعًا:"من قرأ القرآن واستظهره، فأحلَّ حلاله، وحرَّم حرامه، أدخله اللَّه به الجنّة، وشفَّعه في عشرة من أهل بيته كلّهم وجبت له النّار".
رواه الترمذيّ (2905) واللّفظ له، وابن ماجه (216) كلاهما من طريق حفص بن سليمان أبي عمرو، عن كثير بن زاذان، عن عاصم بن ضمرة، عن علي بن أبي طالب، فذكره. واختصره ابن ماجه.
ومن هذا الطّريق رواه أيضًا عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (1268)، والآجريّ في الشّريعة (816).
وحفص بن سليمان الأسديّ أبو عمرو مع إمامته في القراءة كان ضعيفًا في الحديث. قال البخاريّ:"تركوه". وقال مسلم:"متروك". وتكلَّم فيه ابنُ معين، وابن المدينيّ، والنسائيّ، والحاكم، وابن عدي وغيرهم. وكان الإمام أحمد حسن الرّأي فيه فقال:"صالح" ولعله يقصد به صلاحه في الدّين، ولجلالته في القراءات، وشيخه كثير بن زاذان مجهول.
قال الذّهبيّ في"الميزان":"كثير بن زاذان عن عاصم بن ضمرة له حديث منكر".
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وليس إسناده صحيح، وحفص ابن سليمان يُضعَّف في الحديث" انتهى.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কুরআনের একটি সূরা রয়েছে, যার মধ্যে ত্রিশটি আয়াত আছে। সেটি এক ব্যক্তির জন্য সুপারিশ করবে যতক্ষণ না তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর সেটি হলো: {তাবারাকাল্লাযী বি ইয়াদিহিল মুল্ক} (সূরা আল-মুলক)।"