হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (968)


968 - عن أبي سعيد قال: لما رجع النبيّ صلى الله عليه وسلم من تبوك سألوه عن السّاعة، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تأتي مائةُ سنة، وعلى الأرض نفسٌ منفوسةٌ اليوم".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2539) من طريقين عن داود، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক থেকে ফিরলেন, তখন তারা তাঁকে কিয়ামত (মহাপ্রলয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "একশ বছর অতিবাহিত হবে না, আর আজ পৃথিবীতে যে প্রাণীই জীবিত আছে, তাদের কেউই (একশ বছর পর) আর জীবিত থাকবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (969)


969 - عن دخل أبو مسعود عقبة بن عمرو الأنصاري على علي بن أبي طالب، فقال له على: أنت الذي تقول: لا يأتي مائة سنة وعلى الأرض عين تطرف، إنّما قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يأتي على النّاس مائةُ سنة وعلى الأرض عينٌ تَطرف ممّن هو حيّ اليوم، واللَّهِ إنّ رخاء هذه الأمّة بعد مائة عام".

حسن: رواه الإمام أحمد (714) من طريق نُعيم بن دجاجة أنه قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل نعيم بن دجاجة روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في الثقات، ووثقه الذهبي في الكاشف، وخرّج له النسائي في المجتبى، وقال الحافظ في التقريب:"مقبول".

قلت: وحديثه هذا ليس فيه ما يستنكر، بل له أصول صحيحة، واللَّه أعلم.




আবূ মাসউদ উক্ববাহ ইবনু আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আপনিই কি সেই ব্যক্তি, যিনি বলেন—শত বছর আসবে না, যখন পৃথিবীতে কারো চোখ পলক ফেলবে? (অর্থাৎ কেউ জীবিত থাকবে না)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো কেবল এই কথাই বলেছেন: "শত বছর এমন অবস্থায় মানুষের উপর আসবে না যখন পৃথিবীতে আজ যারা জীবিত আছে, তাদের মধ্যে থেকে কেউ চোখ পলক ফেলবে।" আল্লাহর কসম! এই উম্মতের সমৃদ্ধি (বা স্বাচ্ছন্দ্য) শত বছর পর আসবে।









আল-জামি` আল-কামিল (970)


970 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أنزل اللَّه بقوم عذابًا، أصاب العذاب من كان فيهم، ثم بُعثوا على أعمالهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7108)، ومسلم في صفة الجنّة والنار (2879) كلاهما
من حديث يونس، عن الزهريّ، أخبرني حمزة بن عبد اللَّه بن عمر، أنه سمع ابن عمر، فذكره، ولفظهما سواء.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ তাআলা কোনো জাতির উপর আযাব নাযিল করেন, তখন সেই আযাব তাদের মধ্যে অবস্থানকারী সকলের উপরই আপতিত হয়, অতঃপর তারা নিজ নিজ আমল অনুযায়ী উত্থিত হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (971)


971 - عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاريّ قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قبل وفاته بثلاث يقول:"لا يموتنَّ أحدكم إلّا وهو يحسنُ باللَّه الظَّنَّ".

صحيح: رواه مسلم في كتاب صفة الجنّة والنار (2877) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا يحيى بن زكريا، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর ওফাতের তিন দিন পূর্বে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যেন এমন অবস্থায় মৃত্যুবরণ না করে যে, সে আল্লাহ সম্পর্কে সুধারণা পোষণ করছে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (972)


972 - عن جابر، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يُبعثُ كلُّ عبد على ما مات عليه".

صحيح: رواه مسلم في صفة الجنّة والنار (2878) من طرق عن جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: প্রত্যেক বান্দাকে সে যে অবস্থায় মৃত্যুবরণ করেছে, সে অবস্থায়ই উত্থিত করা হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (973)


973 - عن فضالة بن عبيد، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من مات على مرتبة من هذه المراتب بُعث عليها". قال حيوة: يقول: رباط، حج، أو نحو ذلك.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23941) عن إبراهيم بن إسحاق، حدّثنا ابن المبارك (والحديث في كتاب الجهاد له: 173) عن حيوة بن شريح، قال: أخبرني أبو هانئ الخولانيّ، أنّ عمرو بن مالك الجَنْبيّ (بفتح الجيم وسكون النون) أخبره أنه سمع فضالة بن عبيد يحدِّث عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (23945)، والطبراني في الكبير (18/ 305) كلاهما من حديث أبي عبد الرحمن المقرئ، حدّثنا حيوة، وابن لهيعة، قالا: أنبأنا أبو هانئ، أنّ أبا على الجنْبيّ حدّثه أنه سمع فضالة بن عبيد، فذكر مثله.

وصحّحه الحاكم في المستدرك (2/ 144) بعد أن رواه من وجه آخر عن عبد اللَّه، قال: أخبرني حيوة بن شريح بإسناده مثله، وزاد فيه فضالة فقال: وسمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"كلّ ميت يُختم على عمله إلّا الذي مات مرابطًا في سبيل اللَّه ينمو له عملُه إلى يوم القيامة، ويؤمن من فتنة القبر". وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".

وأما الهيثمي فأورده في المجمع (1/ 113) ولكنه قصّر في العزو، فلم يعزُ إلى أحمد، وإنما عزاه إلى الطبراني في الكبير فقط وقال:"ورجاله ثقات في أحد السّندين".




ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এই স্তরগুলোর (নেক আমলের) কোনো একটির উপর মৃত্যুবরণ করে, তাকে তার উপরই পুনরুত্থিত করা হবে।" হায়াওয়াহ (রাবী) বলেন, (এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো:) সীমান্ত রক্ষা (রিবাত), হজ্জ, অথবা এর অনুরূপ।









আল-জামি` আল-কামিল (974)


974 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: سمعُت الَّنبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يُبعث كلُّ عبد على ما مات عليه، المؤمن على إيمانه، والمنافق على نفاقه".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (7313) عن الحسن بن سفيان، قال: حدّثنا الحسن بن الصباح البزّار، حدّثنا إسماعيل بن عبد الكريم، قال: أخبرني إبراهيم بن عقيل بن معقل، عن أبيه، عن وهب بن منبّه، عن جابر، فذكره.
وفي الإسناد الحسن بن الصبّاح البزار، وشيخه إسماعيل بن عبد الكريم، وشيخه إبراهيم بن عقيل بن معقل، وأبوه عقيل بن معقل كلّهم صدوق.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: প্রত্যেক বান্দাকে (কিয়ামতের দিন) সে যে অবস্থায় মৃত্যুবরণ করেছে, সে অবস্থাতেই পুনরুত্থিত করা হবে। মুমিনকে তার ঈমানের ওপর এবং মুনাফিককে তার নিফাকের (কপটতার) ওপর।









আল-জামি` আল-কামিল (975)


975 - عن * *




৯৭৫ - থেকে বর্ণিত, * *









আল-জামি` আল-কামিল (976)


976 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"سلوني". فهابوه أن يسألوه، فجاء رجل فجلس عند ركبتيه، فقال: يا رسول اللَّه، ما الإسلام؟ قال:"لا تشركْ باللَّه شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتؤتي الزّكاة، وتصوم رمضان". قال: صدقتَ. قال: يا رسول اللَّه، ما الإيمان؟ قال:"أن تؤمن باللَّه وملائكته، وكتابه، ولقائه، ورسله، وتؤمن بالبعث، وتؤمن بالقدر كلّه". قال: صدقت". فذكر الحديث بطوله.

متفق عليه: رواه مسلم في الإيمان (10) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن عمارة (وهو ابن القعقاع)، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

ورواه البخاريّ في الإيمان (50) من طريق إسماعيل بن إبراهيم، (وهو المعروف بابن علية)، وفي التفسير (4777) من طريق جرير بن عبد الحميد، كلاهما عن أبي حيان التيمي، عن أبي زرعة بإسناده ولفظه:"أن تؤمن باللَّه وملائكته وبلقائه ورسله، وتؤمن بالبعث" ولم يذكر فيه الكتب والقدر، فأما الإيمان بالكتب فهو في رواية الأصيلي كما أشار الحافظ في الفتح، وأما الإيمان بالقدر فزاده الإسماعيلي في مستخرجه.

ورواه أبو داود (4698)، والنسائيّ (4991) كلاهما من طريق جرير، عن أبي فروة الهمداني، عن أبي زرعة بن عمرو بن جرير، عن أبي ذر وأبي هريرة، قالا: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يجلس بين ظهراني أصحابه فيجيء الغريب، فلا يدري أيّهم هو حتّى يسأل، فطلبنا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن نجعل له مجلسًا يعرفه الغريب إذا أتاه، فبنينا له دكَّانًا من طين كان يجلس عليه، وإنّا لجالسون ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في مجلسه إذ أقبل رجل أحسن النّاس وجهًا، وأطيب النّاس ريحًا، كأنّ ثيابه لم يمسّها دنسٌ
حتّى سلَّم في طرف البساط. فذكر الحديث بطوله، واختصره أبو داود.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা আমাকে জিজ্ঞেস করো।" (সাহাবীগণ) তাঁকে প্রশ্ন করতে ভয় পাচ্ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁর হাঁটু বরাবর বসলেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইসলাম কী?" তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করবে না, সালাত কায়েম করবে, যাকাত দেবে এবং রমযান মাসে সাওম (রোজা) পালন করবে।" লোকটি বলল: "আপনি সত্য বলেছেন।" সে আবার বলল: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! ঈমান কী?" তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহ, তাঁর ফেরেশতাগণ, তাঁর কিতাব, তাঁর সাথে সাক্ষাৎ (পুনরুত্থান/আখেরাত), তাঁর রাসূলগণ-এর ওপর ঈমান আনবে, আর তুমি পুনরুত্থান (বা'স)-এর ওপর ঈমান আনবে, এবং তুমি তাকদীর (ভাগ্য) এর সব কিছুর ওপর ঈমান আনবে।" লোকটি বলল: "আপনি সত্য বলেছেন।" এরপর হাদীসটি পূর্ণাঙ্গভাবে উল্লেখ করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (977)


977 - عن ابن الدّيلميّ قال: أتيتُ أُبيَّ بن كعب فقلت له: وقع في نفسي شيءٌ من القدر، فحدّثني بشيء لعلّ اللَّه أن يذهبه من قلبي، قال: لو أنّ اللَّه عذّب أهل سماواته، وأهل أرضه عذَّبهم وهو غير ظالم لهم، ولو رحمهم كانت رحمته خيرًا لهم من أعمالهم، ولو أنفقتَ مثل أُحد ذهبًا في سبيل اللَّه ما قبله اللَّه منك حتى تؤمن بالقدر، وتعلم أنّ ما أصابك لم يكن ليخطئك، وأنّ ما أخطأك لم يكن ليصيبك، ولو مت على غير ذلك لدخلتَ النّارَ. قال: ثم أتيتُ عبد اللَّه بن مسعود، فقال مثل ذلك، ثم أتيتُ حذيفة بن اليمان فقال مثل ذلك، قال: ثم أتيتُ زيد بن ثابت، فحدّثني عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم مثل ذلك.

حسن: رواه أبو داود (4699)، وابن ماجه (77) كلاهما من طريق أبي سنان، عن وهب بن خالد الحمصيّ، عن ابن الدّيلميّ، فذكر مثله.

وصحّحه ابنُ حبان (727) بعد أن رواه من هذا الوجه.

قلت: والحديث من أوله موقوف على أبي بن كعب، وابن مسعود، وحذيفة بن اليمان. مرفوع من حديث زيد بن ثابت.

وإسناده حسن من أجل أبي سنان وهو سعيد بن سنان البرجميّ من رجال مسلم، تكلّم فيه الإمام أحمد وغيره. وقال أبو حاتم: صدوق ثقة، وقال النسائي: ليس به بأس، وذكره ابن حبان في"الثقات".

ولكن جاء الحديث من وجه آخر عن معاوية بن صالح، أنّ أبا الزّاهريّة حدّثه، عن كثير بن مرّة، عن ابن الدّيلميّ، أنّه لقي زيد بن ثابت فقال له: إنّي شككتُ في بعض القدر، فحدِّثْني لعلّ اللَّه يجعل لي عندك فرجًا. قال زيد: نعم يا ابن أخي إنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث نحوه).

أخرجه الآجريّ في الشّريعة (373) عن الفريابيّ، قال: حدّثني ميمون بن الأصبغ النّصيبي، حدّثنا أبو صالح عبد اللَّه بن صالح، قال: حدّثني معاوية بن صالح، بإسناده.

ومعاوية بن صالح حسن الحديث، وله متابعات أخرى انظر"السنة" لابن أبي عاصم (245).

وأما ما رُوي عن أبي أيوب الأنصاريّ أنه قال: يا رسول اللَّه، أيقدرُ اللَّهُ عليَّ أمرًا ثم يُعذِّبني عليه؟ قال:"نعم، وهو غير ظالم لك يا أبا أيوب، فلو كان لك مثل أحد ذهبًا تنفقه في سبيل اللَّه، ولم تؤمن بالقدر خيره وشرّه لم ينفعك ذلك شيئًا".

رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 614) وفي الإسناد أبو الحجاج وهو رشدين بن سعد المصريّ، ضعيف. قال النسائيّ: متروك الحديث.




যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনুদ দাইলামি বলেন: আমি উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে তাঁকে বললাম, আমার মনে তাকদীর (আল্লাহর ফায়সালা) সম্পর্কে কিছুটা সন্দেহ জেগেছে। আপনি আমাকে এমন কিছু বর্ণনা করুন, সম্ভবত আল্লাহ তা আমার মন থেকে দূর করে দেবেন। তিনি বললেন: যদি আল্লাহ তাঁর আসমানসমূহের অধিবাসী এবং জমিনের অধিবাসীদের শাস্তি দেন, তবে তিনি তাদের প্রতি মোটেই যুলুমকারী হবেন না। আর যদি তিনি তাদের প্রতি দয়া করেন, তবে তাদের আমল অপেক্ষা তাঁর রহমত তাদের জন্য উত্তম হবে। আর যদি তুমি উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনা আল্লাহর রাস্তায় খরচ করো, তবুও আল্লাহ তা তোমার থেকে ততক্ষণ কবুল করবেন না, যতক্ষণ না তুমি তাকদীরের প্রতি ঈমান আনো এবং জানতে পারো যে, যা তোমার উপর পতিত হয়েছে, তা কখনো তোমাকে এড়িয়ে যাওয়ার ছিল না, আর যা তোমাকে এড়িয়ে গেছে, তা কখনো তোমার উপর পতিত হওয়ার ছিল না। আর যদি তুমি এর বিপরীত বিশ্বাস নিয়ে মারা যাও, তবে তুমি জাহান্নামে প্রবেশ করবে। (ইবনুদ দাইলামি) বলেন: এরপর আমি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম, তিনিও একই কথা বললেন। তারপর আমি হুযায়ফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম, তিনিও একই কথা বললেন। এরপর আমি যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ হাদীস আমার নিকট বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (978)


978 - عن أبي الدّرداء، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ولا يدخل الجنّة عاق، ولا مُدمن خمر، ولا مُكذِّب بقدر".

حسن: رواه الإمام أحمد (27484)، والبزّار -كشف الأستار (2182) - كلاهما من طريق سليمان بن عتبة أبي الرّبيع الدِّمشقيّ، قال: سمعتُ يونس بن ميسرة، عن أبي إدريس عائذ اللَّه، عن أبي الدّرداء، فذكر مثله.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن أبي عاصم في السنة (321)، الفريابي في القدر (201)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 696)، وابن ماجه (3376) إلّا أنّ الأخير اقتصر على قوله:"لا يدخل الجنّةَ مُدمنُ خمر".

وإسناده حسن من أجل الكلام في سليمان بن عتبة غير أنّه حسن الحديث.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পিতা-মাতার অবাধ্য সন্তান, মদ্যপানে অভ্যস্ত ব্যক্তি এবং যে তকদীরকে মিথ্যা মনে করে, তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (979)


979 - عن عليّ بن أبي طالب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يؤمنُ عبد حتّى يؤمن بأربع: يشهد أن لا إله إلا اللَّه، وأني رسول اللَّه، بعثني بالحق، ويؤمن بالموت، ويؤمن بالبعث بعد الموت، ويؤمن بالقدر".

صحيح: رواه الترمذيّ (2145) عن محمود بن غيلان، حدّثنا أبو داود، أنبأنا شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن علي، فذكر مثله.

وأبو داود هو الطّيالسيّ والحديث في مسنده (106).

ورواه ابن ماجه (81) من وجه آخر عن شريك، عن منصور، بإسناده مثله.

وشريك هو ابن عبد اللَّه النّخعيّ تُكُلِّم في حفظه إلّا أنّه توبع، تابعه شعبة كما مضى، ولكن أصحاب شعبة اختلفوا عليه، فرواه أبو داود الطيالسي عنه كما مضى. ورواه النّضر بن شُميل عنه نحوه إلّا أنه قال: ربعي، عن رجل، عن علي.

قال الترمذيّ: حديث أبي الدّرداء، عن شعبة عندي أصح من حديث النّضر هكذا روى غير واحد عن منصور، عن ربعي، عن علي. انتهى.

قلت: وهو كما قال، فقد رواه أيضًا سفيان، عن منصور، به، نحوه.

رواه ابن حبان في صحيحه (178)، والحاكم (1/ 32 - 33) كلاهما من طريق محمد بن كثير، عن سفيان، به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، وقد قصر بروايته بعض أصحاب الثوريّ. وهذا عندنا مما لا يعبأ به".

وكذلك رواه أيضًا جرير، عن منصور، ومن طريقه رواه الحاكم وقال:"جرير من أعرف النّاس بحديث منصور".
وخالفهم أبو حذيفة، فرواه عن سفيان، وأدخل بين ربعي وبين عليٍّ رجلًا.

قال الحاكم:"أبو حذيفة موسى بن مسعود النّهدي، وإن كان البخاريّ يحتجّ به، فإنّه كثير الوهم، لا يحكم له على أبي عاصم النّبيل ومحمد بن كثير وأقرانهم، بل يلزم الخطأ إذا خالفهم، والدّليل على ما ذكرته متابعة جرير بن عبد الحميد الثوريّ في روايته عن منصور، عن ربعي، عن علي. وجرير من أعرف النّاس بحديث منصور".




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো বান্দা ততক্ষণ পর্যন্ত মুমিন হতে পারে না, যতক্ষণ না সে চারটি বিষয়ের প্রতি ঈমান আনে: সে সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল, যিনি আমাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন; আর সে মৃত্যুর প্রতি ঈমান আনে; এবং মৃত্যুর পরে পুনরুত্থানের প্রতি ঈমান আনে; আর সে তাকদীরের (ভাগ্যের) প্রতি ঈমান আনে।









আল-জামি` আল-কামিল (980)


980 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يؤمنُ المرأُ حتّى يؤمن بالقدر خيره وشرّه".

حسن: رواه الإمام أحمد (6703) عن أنس بن عياض، حدّثنا أبو حازم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكر مثله.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.

وأخرجه ابن أبي عاصم في"السنة" (134) عن يعقوب بن حُميد، ثنا ابن أبي حازم وأنس بن عياض، عن أبي حازم، فذكر بإسناده، مثله.

ورواه الفريابي في القدر (203، 204)، والبيهقي في القضاء والقدر (2/ 421) من طرق عن أبي حازم، بإسناده، مثله.

وللحديث طرق أخرى عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه غير أن ما ذكرته هو أصحها.

وفي الباب عن عبد اللَّه بن عمرو مرفوعًا:"ما هلكتْ أمَّةٌ قطّ إلّا بالشِّرك باللَّه، وما كان بدؤ شركها إلّا التكذيب بالقدر".

رواه ابنُ أبي عاصم في السنة (322)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 683) كلاهما من حديث محمد بن شعيب بن شابور، قال: أخبرني عمر بن يزيد البصريّ، عن عمرو بن المهاجر، عن عمر بن عبد العزيز، عن يحيى بن القاسم بن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص بن وائل السّهميّ، عن أبيه، عن جدّه، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله.

ويحيى بن القاسم وأبوه لا يعرفان، وإن ذكرهما ابن حبان في الثقات على قاعدته في توثيق المجاهيل.

وعمر بن يزيد البصريّ أو النّصريّ قال فيه ابن حبان في المجروحين (644):"كان ممن يقلب الأسانيد، ويرفع المراسيل، لا يجوز الاحتجاج به على الإطلاق، وإن اعتُبر بما وافق الثقات فلا ضير".

قلت: ولم أجد فيما رواه موافقة الثّقات له.

ولا يصحُّ ما رُوي عن أبي أمامة مرفوعًا:"ثلاثة لا يقبل اللَّه لهم صرفًا ولا عدْلًا: عاق، منّان، ومُكذِّب بالقدر".

رواه ابن أبي عاصم في السنة (323)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 699)، والطبراني في
الكبير (8/ 140) كلّهم من طريق عمر بن يزيد البصريّ -أو النّصريّ-، عن أبي سلام، عن أبي أمامة، فذكر مثله.

وفي رواية عند الطّبرانيّ في الكبير (8/ 287)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 697) من طريق بشر بن نمير، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن أبي أمامة مرفوعًا:"أربعة لا ينظر اللَّه إليهم يوم القيامة: عاق، ومنّان، ومدمن خمر، ومكذِّب بقدر". وفيه بشر بن نمير متروك.

قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 206):"رواه الطّبراني بإسنادين في أحدهما بشر بن نمير وهو متروك، وفي الآخر عمر بن يزيد وهو ضعيف".

وكذلك ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"ثلاث من أصل الإيمان: الكفّ عمّن قال لا إله إلّا اللَّه، ولا نكفّره بذنب، ولا نخرجه من الإسلام بعمل، والجهاد ماض منذ بعثني اللَّه إلى أن يقاتل آخرُ أمّتي الدّجال، لا يبطله جورُ جائر، ولا عدل عادل، والإيمان بالأقدار".

رواه أبو داود (2532) عن سعيد بن منصور، حدّثنا أبو معاوية، حدّثنا جعفر بن برقان، عن يزيد بن أبي نُشبة، عن أنس بن مالك، فذكر مثله.

وعنه رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 421 - 422).

وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي نُشْبة -بضم النّون، وسكون المعجمة- السُّلميّ فإنّه"مجهول" كما قال الحافظ في"التقريب".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো ব্যক্তি মু'মিন হতে পারে না, যতক্ষণ না সে তাকদীরের ভালো ও মন্দ—উভয়টার প্রতি ঈমান আনবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (981)


981 - عن أبي الدّرداء، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لكلّ شيء حقيقة، وما بلغ عبد حقيقة الإيمان حتى يعلم أنّ ما أصابه لم يكن ليخطئه، وما أخطأه لم يكن ليصيبه".

حسن: رواه الإمام أحمد (27490) عن هشيم، قال: حدّثنا أبو الرّبيع، عن يونس، عن أبي إدريس، عن أبي الدرداء، فذكر مثله.

ومن هذا الوجه رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 430).

ورواه ابن أبي عاصم في السنة (246) عن هشام بن عمّار، ثنا سليمان بن عتبة أبو الرّبيع، بإسناده مثله.

وإسناده حسن من أجل أبي الرّبيع فإنّه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

انظر حديث أبي الدّرداء:"كلّ ميسّرٌ لما خُلق له".

وقال الهيثمي في المجمع (7/ 197):"رواه أحمد والطبراني، ورجاله ثقات".

قلت: ورواه أيضًا البزّار -كشف الأستار (33) - من وجه آخر عن يونس بن ميسرة بن حلبس، بإسناده مثله. ومن هذا الوجه أخرجه الفريابي في القدر (200).
وقال البزّار: إسناده حسن

وفي الباب أيضًا عن خبّاب بن الأرتّ في حديث طويل، وفيه:"تعلم أنّ ما أصابك لم يكن ليُخطئك، وأنّ ما أخطأك لم يكن ليُصيبك".

رواه الطّبراني في"الكبير" (4/ 93)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 431) كلاهما من حديث هشام بن عمّار، ثنا الوليد بن مسلم، ثنا منير بن الزبير، أنه سمع عبادة بن نُسي، يحدّث ابن خبّاب بن الأرت، فذكر مثله.

وفي الإسناد منير بن الزبير الشّامي أبو ذر الأزديّ"ضعيف" كما في التّقريب.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد اللَّه بن مسعود مرفوعًا:"لا يذوق عبد طعم الإيمان حتى يعلم أنّ ما أصابه لم يكن ليخطئه، وما أخطأه لم يكن ليصيبه، ويؤمن بالقدر خيره وشره".

رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 433)، وفيه عبد الأعلى وهو ابن أبي المساور الزّهريّ مولاهم"متروك" كذّبه ابن معين.

وفي الباب أيضًا عن جابر مرفوعًا:"لا يؤمنُ عبد حتّى يؤمن بالقدر خيره وشرّه، حتّى يعلم أنّ ما أصابه لم يكن ليُخطئه، وأنّ ما أخطأ لم يكن ليصيبه".

رواه التّرمذيّ (2144) عن أبي الخطّاب زياد بن يحيى البصريّ، حدّثنا عبد اللَّه بن ميمون، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر مثله.

قال الترمذيّ: هذا حديث غريب من حديث جابر، ولا نعرفه إلّا من حديث عبد اللَّه بن ميمون، وعبد اللَّه بن ميمون منكر الحديث".

قلت: وهو كما قال، فإنّ عبد اللَّه بن ميمون هو القدّاح المخزوميّ، قال فيه البخاريّ:"ذاهب الحديث". وقال أبو حاتم:"لا يجوز الاحتجاج به". وقال الحافظ في التقريب:"منكر الحديث، متروك".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر قال: قالت أمُّ سلمة: يا رسول اللَّه، لا يزال يُصيبُك في كلِّ عام وجعٌ من الشّاة المسمومة التي أكلتَ. قال:"ما أصابني شيء منها إلّا وهو مكتوب عليَّ وآدمُ في طينته".

رواه ابن ماجه (3546) عن يحيى بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصيّ، قال: حدّثنا بقية، قال: حدّثنا أبو بكر العنسيّ، عن يزيد بن أبي حبيب، ومحمد بن يزيد المصرييّن، قالا: حدّثنا نافع، عن ابن عمر، قال: فذكر مثله.

ورواه الفريابي في القدر (419)، واللالكائيّ في"أصول الاعتقاد" (1098) من وجهين آخرين عن بقية بإسناده، مثله.

وإسناده ضعيف من أجل أبي بكر العنسيّ -بالنّون- فإنّه مجهول، وله أحاديث مناكير كما قال ابن عدي في"الكامل" ـ
ولكن قال الحافظ ابن حجر في"التقريب":"وأنا أحسب أنه ابن أبي مريم".

قلت: إن كان ابنُ أبي مريم وهو أبو بكر بن عبد اللَّه بن أبي مريم الغسّانيّ الشّاميّ فهو أضعف منه؛ تكلّم فيه الإمام أحمد وأبو داود. وقال أبو زرعة وأبو حاتم والنسائي وغيرهم: ضعيف الحديث.

قال ابن حبان:"كان من خيار أهل الشّام، لكن كان رديء الحفظ، يحدّث بالشّيء فيهم، فكثر ذلك منه حتّى استحقّ التّرك".




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক জিনিসেরই একটি বাস্তবতা আছে। কোনো বান্দা ঈমানের বাস্তবতা অর্জন করতে পারে না, যতক্ষণ না সে জানতে পারে যে, যা তাকে স্পর্শ করেছে (বা তার উপর আপতিত হয়েছে), তা কখনই তাকে এড়িয়ে যেত না; আর যা তাকে এড়িয়ে গেছে, তা কখনও তাকে স্পর্শ করত না।"









আল-জামি` আল-কামিল (982)


982 - عن ابن عباس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"العين حقّ، ولو كان شيءٌ سابق القدر سبقتْه العين، وإذا استُغسلْتُم فأغسلوا".

صحيح: رواه مسلم في كتاب السلام (2188) من طرق عن مسلم بن إبراهيم، قال: حدّثنا وُهيب، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكر مثله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "চোখের নজর (কুনজর) সত্য। যদি কোনো কিছু তকদীরকে অতিক্রম করতে পারত, তবে চোখই তাকে অতিক্রম করত। আর যখন তোমাদেরকে (নজরমুক্ত হওয়ার জন্য) গোসল করতে বলা হয়, তখন তোমরা গোসল করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (983)


983 - عن أسماء بنت عُميس، قالت: يا رسول اللَّه، إنّ بني جعفر تُصيبُهم العين، فأسترقي لهم؟ قال:"نعم، فلو كان شيءٌ سابقَ القدر، سبقتْه العين".

حسن: رواه الترمذيّ (2059)، وابن ماجه (3510) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عروة بن عامر، عن عبيد بن رفاعة الزُّرقيّ، قال: قالت أسماء، فذكرته.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (27470).

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

قلت: هو حسن فقط، فإنّ عروة بن عامر، وشيخه عبيد بن رفاعة"صدوقان" لا غير.

ثم إن قول عبيد بن رفاعة الزرقي قال: قالت أسماء، ظاهره الإرسال، ولكن قال الترمذيّ بعده:"وقد رُوي هذا عن أيوب، عن عمرو بن دينار، عن عروة بن عامر، عن عبيد بن رفاعة، عن أسماء بنت عُميس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، قال: حدّثنا بذلك الحسن بن علي الخلال، حدّثنا عبد الرزاق، عن معمر، عن أيوب، بهذا".

قلت: وهذا إسناد متصل وهو الأصح كما قال الدّارقطني في"العلل" (15/ 304).

وقوله:"ولو كان شيءٌ سابق القدر" أي أنّ الأشياء كلّها بقدر اللَّه تعالى، ولا تقع إلّا على حسب ما قدرها اللَّه تعالى، وسبق بها علمه، فلا يقع ضررُ العين ولا غيره من الخير والشر إلّا بقدر اللَّه تعالى.




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), নিশ্চয় জাফর-এর সন্তানদের চোখে (বদ) নজর লাগে, আমি কি তাদের জন্য ঝাড়ফুঁক করব? তিনি বললেন, "হ্যাঁ। যদি কোনো কিছু তাকদীরকে অতিক্রম করার হতো, তবে বদ নজরই তা অতিক্রম করত।"









আল-জামি` আল-কামিল (984)


984 - عن عُبادة بن الصّامت أنّه قال لابنه: يا بني إنّك لن تجد طعم حقيقة الإيمان
حتى تعلم أنّ ما أصابك لم يكن ليُخطئك، وما أخطأك لم يكن ليصيبك. سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ أول ما خلق اللَّه القلمَ، فقال له: اكتبْ. قال: ربِّ، ماذا أكتب؟ قال: اكتبْ مقادير كلِّ شيءٍ حتّى تقوم السّاعة". يا بني إنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من مات على غير هذا فليس مني".

حسن: رواه أبو داود (4700) عن جعفر بن مسافر الهذليّ، حدّثنا يحيى بن حسّان، حدّثنا الوليد بن رباح، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن أبي حفصة، قال: قال عبادة بن الصّامت لابنه، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل الكلام في جعفر بن مسافر شيخ أبي داود غير أنّه حسن الحديث، وقد توبع، وأبو حفصة هو حبيش بن شريح الحبشي، ويقال: أبو حفص الشّاميّ.

قال عبد الرحمن بن إبراهيم: أدرك عبادة، وحفظ عنه.

ذكره البخاريّ، وابن أبي حاتم، وابن حبان، وغيرهم من التابعين.

وذكره أبو نعيم من الصحابة وهو وهم منه، وثّقه ابن حبان، وروى عنه إبراهيم بن أبي عبلة، وعلي بن أبي حملة، قال فيه الحافظ في التقريب:"مقبول".

قلت: وهو كذلك لكنه توبع، رواه الترمذيّ (2155، 3319) عن يحيى بن موسى، حدّثنا أبو داود الطّيالسيّ (577)، حدّثنا عبد الواحد بن سليم، قال: قدمت مكة فلقيت عطاء بن أبي رباح، فقلت له: يا أبا محمد إنّ أهل البصرة يقولون في القدر، قال: يا بني أتقرأ القرآن؟ قلت: نعم. قال: فاقرأ الزخرف. قال: فقرأت: {حم (1) وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ (2) إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (3) وَإِنَّهُ فِي أُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ} [سورة الزخرف: 1 - 4] فقال: أتدري ما أمُّ الكتاب؟ قلت: اللَّه ورسوله أعلم. قال: فإنّه كتاب كتبه اللَّه قبل أن يخلق السماوات، وقبل أن يخلق الأرض، فيه إنّ فرعون من أهل النّار، وفيه تبَّتْ يدا أبي لهب وتبّ.

قال عطاء: فلقيتُ الوليد بن عبادة بن الصّامت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسألته ما كان وصية أبيك عند الموت؟ قال: دعاني أبي فقال لي: يا بني، اتقِ اللَّه، واعلمْ أنّك لن تتقي اللَّه حتى تؤمن باللَّه، ونؤمن بالقدر كلّه خيره وشرّه، فإن متَّ على غير ذلك دخلت النّار. إنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ أوّل ما خلق اللَّه القلم. فقال: اكتب. فقال: ما أكتب؟ قال: اكتب القدر ما كان وما هو كائن إلى الأبد".

قال الترمذيّ في الموضع الأول:"حديث غريب من هذا الوجه".

وقال في الموضع الثاني بعد ذكره الجزء المرفوع بدون القصّة:"حسن غريب، وفيه عن ابن عباس".

قلت: فيه عبد الواحد بن سليم وهو ضعيف كما في التقريب، إلّا أنّ لهذا الحديث طرقًا أخرى منها ما رواه الإمام أحمد (22705) عن أبي العلاء الحسن بن سوّار، حدّثنا ليث، عن معاوية، عن
أيوب بن زياد، حدّثني عبادة بن الوليد بن عبادة، قال: حدّثني أبي، قال: دخلت على عبادة وهو مريض، فذكر الحديث مع القصّة.

واللّيث هو ابن سعد، وأيوب بن زياد هو أبو زيد الحمصيّ، وثقه ابن حبان، وروى له جماعة فيكون في مرتبة"مقبول" عند الحافظ، وهو من رجال التعجيل. وله أسانيد أخرى أخرج منها ابن أبي عاصم في كتاب السنة، فصحّ قول الترمذيّ بأنه حسن كما صحّ قوله أيضًا بأنه غريب، لأنّ جميع أسانيده تدور على الوليد بن عبادة بن الصّامت وهو ثقة.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বললেন: হে বৎস! তুমি ঈমানের প্রকৃত স্বাদ কখনও পাবে না, যতক্ষণ না তুমি এটা জানবে যে, তোমার যা কিছু হয়েছে, তা তোমাকে এড়িয়ে যাওয়ার ছিল না। আর যা তোমাকে এড়িয়ে গেছে, তা তোমার হওয়ার ছিল না। আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ্ সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন, তা হলো কলম। অতঃপর তিনি তাকে বললেন: লেখো। সে বলল: হে আমার রব! আমি কী লিখব? তিনি বললেন: কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত প্রতিটি জিনিসের তাকদীর (নিয়তি) লিখে দাও।" হে বৎস! আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি এর (এই বিশ্বাসের) ওপর না মারা যাবে, সে আমার দলভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (985)


985 - عن ابن عباس، أنه كان يحدّث أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ أوّل ما خلق اللَّهُ القلم، وأمره أن يكتبَ كلَّ شيء يكون".

صحيح: رواه أبو يعلى (2329) عن أحمد بن جميل المروزيّ، حدّثنا عبد اللَّه بن المبارك، عن رباح بن زيد، عن عمر بن حبيب المكيّ، عن القاسم بن أبي بزة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر مثله.

ومن هذا الوجه أخرجه عبد اللَّه بن أحمد في"السنة" (854).

ورواه أيضّا البزّار - قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 190):"رجاله رجال ثقات".

وأخرجه ابن أبي عاصم في"السنة" (108) من طريق ابن المبارك.

قال البيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 192): قال أبو علي: لم يسنده عن القاسم غير عمر بن حبيب، وهو مكي يجمع حديثه".

قلت: عمر بن حبيب هو المكيّ ثقة فاضل، وثقه أهل العلم فلا يضر تفردّه، وبقية رجاله ثقات.

وقد روي عن ابن عباس موقوفًا بأسانيد ضعاف، وبعضها صالح، أخرجها الفريابي في"القدر" (65، 76، 77، 78) وعنه الآجري في الشّريعة (183) وعن غيره أيضًا. والحكم للرّفع لما فيه من زيادة العلم، ثم إنّ مثل هذا لا يقال بالرّأي فهو مرفوع حكمًا أيضًا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন তা হলো কলম, আর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যেন সে সব কিছু লিখে দেয় যা সংঘটিত হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (986)


986 - عن ابن عمر، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"أوّل ما خلق اللَّهُ تعالى القلم، فأخذه بيمينه -وكلتا يديه يمين- قال: فكتب الدّنيا وما يكون فيها من عمل معمول بر أو فجور، رطب أو يابس، فأحصاه عنده في الذّكر، فقال: اقرأوا إن شئتم: {هَذَا كِتَابُنَا يَنْطِقُ عَلَيْكُمْ بِالْحَقِّ إِنَّا كُنَّا نَسْتَنْسِخُ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ} [سورة الجاثية: 29]، فهل تكون النّسخة إلّا من شيء قد فُرغ منه".

حسن: رواه ابنُ أبي عاصم في"السنة" (106) عن ابن المصفى، ثنا بقية، حدّثني أرطاة بن المنذر، عن مجاهد بن جبير، عن ابن عمر، فذكر مثله.

ورواه الفريابي في"القدر" (416)، وعنه الآجري في الشّريعة (340)، وابن بطّة في"الإبانة" (1365)
من طريقين آخرين عن بقية بن الوليد، بإسناده، فذكر مثله.

وإسناده حسن من أجل الكلام في بقية إلّا أنّه حسن الحديث إذا صرَّح.

وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"أوّل شيء خلقه اللَّهُ عز وجل القلم، ثم خلق النّون -وهي الدّواة-، ثم قال له: أكتبْ، قال: وما أكتبُ. قال: اكتب ما يكون وما هو كائن من عمل، أو أثر، أو رزق، أو أجل. فكتب ما يكون وما هو كائن إلى يوم القيامة. فذلك قوله عز وجل {ن وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ} [سورة القلم: 1] ثم ختم على فِيّ القلم فلم ينطق، ولا ينطق إلى يوم القيامة، ثم خلق العقل فقال: وعزّتي لأكلمنَّك فيمن أحببت، ولأنقصنّك فيمن ابغضتُ" فهو ضعيف.

رواه الفريابيّ في القدر (18) عن أبي مروان هشام بن خالد الأزرق الدّمشقيّ، حدّثنا الحسن بن يحيى الخشنيّ، عن أبي عبد اللَّه مولى بني أميّة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الآجري في الشريعة (179، 345) عن الفريابي.

ورواه ابن بطّة في الإبانة (1364) من وجه آخر عن هشام بن خالد، بإسناده مثله.

وفيه الحسن بن يحيى الخشنيّ، قال فيه النسائيّ: ليس بثقة.

واختلف فيه قول ابن معين، فروى عنه ابن أبي مريم، قال: ثقة خراسانيّ، وروى عنه العباس الدوري فقال: شاميّ ليس بشيء، وقال ابن الجنيد عن يحيى: الحسن بن يحيى الخشنيّ، ومسلمة ابن علي الخشني ضعيفان ليسا بشيء، والحسن بن يحيى أحبُّهما إليَّ. وقال الدّارقطني: متروك.

وذكره ابن حبان في"المجروحين" فقال:"منكر الحديث جدًا، يروي عن الثقات ما لا أصل له، وعن المتقنين ما لا يتابع عليه، وكان رجلًا صالحًا يحدِّث من حفظه، كثير الوهم فيما يرويه حتى فحثتِ المناكير في أخباره، حتى يسبق إلى القلب أنّه كان المتعمِّد لها، فلذلك استحقّ التَّرك، وقد سمعت ابنَ جوصي يوثّقه".

وقال ابن عدي: وللحسن بن يحيى من الحديث جزء، أو أقل، ثناه محمد بن القزاز، عن هشام ابن خالد، عن الحسن بذلك الجزء، وما أظن أنّ له غير هؤلاء إلّا الحديث بعد الحديث، وأنكر ما رأيت له هذه الأحاديث التي أمليتها، وهو ممن تُحتمل روايته". انتهى"الكامل" (2/ 736 - 737).

قلت: ولم يورد ابنُ عدي حديث أبي هريرة المذكور، وراويه هشام بن خالد عن الحسن بن يحيى كان له جزء، والحديث المذكور من هذا الجزء، وأكّد ابنُ عدي أنه ليس من مناكيره، فاللَّه تعالى أعلم من صحة هذا الحديث وعدمه، ولكن لو ذكره ذاكرٌ في الشّواهد فلا يلام عليه.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"سبق العلم، وجفَّ القلم، ومضى القضاء، وتمَّ القدر".

رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 194) من طريق حسان بن حسان، حدّثنا إسماعيل بن
إبراهيم، عن ابن عون، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.

قال البيهقيّ:"تفرّد به حسّان بن حسان، ومعناه موجود في الأحاديث الصّحيحة".

قلت: حسان بن حسان هو الواسطيّ، قال الحافظ في"التقريب":"ضعيف".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তাআলা সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন, তা হলো কলম। তিনি তা নিজ ডান হাতে ধারণ করলেন—আর তাঁর উভয় হাতই ডান। তিনি বললেন: এরপর সে (কলম) লিখল দুনিয়া এবং তাতে যে সকল নেক বা পাপ কাজ, ভেজা বা শুকনো বস্তু হয়েছে বা হবে, তার সবকিছু। অতঃপর তিনি তা নিজের কাছে 'আয-যিকর' (স্মারকলিপি)-এ সংরক্ষিত করলেন। এরপর তিনি বললেন: তোমরা চাইলে এ আয়াতটি পাঠ করো: 'এটা আমাদেরই কিতাব, যা তোমাদের বিরুদ্ধে সত্য কথা বলছে। তোমরা যা করতে, আমরা তা লিপিবদ্ধ করতাম।' [সূরা আল-জাসিয়া: ২৯], যা সমাপ্ত হয়ে গেছে, তা ছাড়া কি কোনো অনুলিপি তৈরি করা যায়?"









আল-জামি` আল-কামিল (987)


987 - عن يحيى بن يعمر قال: كان أوّل من تكلّم في القدر بالبصرة معبد الجهنيّ، فانطلقتُ أنا وحُميد بن عبد الرحمن الحميريّ حاجَيْن أو مُعْتَمِرَيْن، فقلنا: لو لقينا أحدًا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فسألناه عمّا يقول هؤلاء في القدر، فوُفِّق لنا عبد اللَّه بن عمر داخلًا المسجد، فاكتنفْتُه أنا وصاحبي أحدُنا عن يمينه، والآخر عن شماله، فظننتُ أنّ صاحبي سيكل الكلامّ إليَّ. فقلتُ: أبا عبد الرحمن، إنّه قد ظهر قِبِلَنَا ناسٌ يقرؤون القرآن ويتفقرون العلم (أي يطلبونه)، وذكر من شأنهم يزعمون أن لا قَدَرَ، والأمر أُنُف (أي مستأنف، لم يسبق به قدر، ولا علم من اللَّه تعالى، وإنّما يعلمه بعد وقوعه)؟ قال: إذا لقيت هؤلاء فأخبرهم أنّي بريءٌ منهم، وأنّهم براءُ منّي. والذي يحلف به عبد اللَّه بن عمر لو أنّ أحدهم مثل أُحد ذهبًا فأنْفَقَه ما قبل اللَّه منه، حتّى يؤمن بالقدر، ثم قال: حدّثني أبي عمر بن الخطاب قال: بينما نحن عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم، إذْ طلع علينا رجلٌ شديد بياض الثّياب". فذكر الحديث بطوله، وفيه:"أن تؤمن بالقدر خيره وشرّه".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (8) من طرق عن كهمس، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن يحيى بن بعمر، فذكره.

ورواه أيضًا مسلم عن محمد بن حاتم، حدّثنا يحيى بن سعيد القطّان، حدّثنا عثمان بن غياث، حدّثنا عبد اللَّه بن بريدة، عن يحيى بن يعمر وحميد بن عبد الرحمن، قالا: لقينا عبد اللَّه بن عمر، فذكرنا القدر وما يقولون فيه. فاقتصَّ الحديث كنحو حديثهم عن عمر، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، وفيه شيء من زيادة، وقد نقص منه شيئًا". انتهى. قلت: الزّيادة التي أشار إليها مسلم ولم يسقها، ساقها أبو داود (4696) وهي قوله:"وسأله رجل من مزينة أو جهينة، فقال: يا رسول اللَّه فيما العمل؟ أفي شيء قد خلا أو مضى، أو في شيء يُستأنف الآن؟ قال:"في شيء قد خلا ومضى". فقال الرّجل أو بعض القوم: ففيمَ العمل؟ قال:"إنّ أهل الجنّة ييسيرون لعمل أهل الجنّة، وإنّ أهل النّار ييسيرون لعمل أهل النّار". رواه عن مسدّد، عن يحيى بإسناده.

ومعبد هو ابن خالد بن عُويمر الجهني البصري، قال أبو حاتم:"كان أول من تكلم في القدر بالبصرة، وكان رأسا في القدر، قدم المدينة فأفسد بها النّاس، قتله الخليفة عبد الملك بن مروان بن
الحكم في سنة ثمانين، وصلبه بدمشق.




আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাবী] ইয়াহইয়া ইবনু ইয়া'মুর বলেন: বসরায় মা'বাদ আল-জুহানীই প্রথম ব্যক্তি, যে তাকদীর (ভাগ্য) সম্পর্কে কথা বলেছিল। আমি ও হুমাইদ ইবনু আব্দুর রহমান আল-হিমইয়ারী হজ্জ বা উমরাহ পালনের জন্য রওনা হলাম। আমরা বললাম: যদি আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো সাহাবীর সাক্ষাৎ পাই, তবে তাকে এই লোকেরা তাকদীর সম্পর্কে যা বলছে, সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করব। আমরা মসজিদে প্রবেশকালে আব্দুল্লাহ ইবনু উমরকে দেখতে পেলাম। আমি ও আমার সাথী তাকে ঘিরে ধরলাম, আমাদের একজন তার ডানে এবং অন্যজন তার বামে। আমি ভাবলাম, আমার সাথী কথা বলার ভার আমার উপর ছেড়ে দেবে।

তখন আমি বললাম: হে আবূ আব্দুর রহমান, আমাদের এলাকায় এমন কিছু লোক আত্মপ্রকাশ করেছে, যারা কুরআন পাঠ করে এবং জ্ঞানের অন্বেষণ করে। তিনি তাদের অবস্থা সম্পর্কে উল্লেখ করে বললেন যে, তারা দাবি করে—তাকদীর বলতে কিছু নেই, বরং সকল বিষয় নতুন করে (অর্থাৎ আল্লাহ তাআলার কোনো পূর্ব জ্ঞান বা তাকদীর ছাড়াই সৃষ্টি হচ্ছে)।

তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু উমর) বললেন: তুমি যখন তাদের সাথে দেখা করবে, তখন তাদের জানিয়ে দেবে যে, আমি তাদের থেকে মুক্ত এবং তারাও আমার থেকে মুক্ত। আব্দুল্লাহ ইবনু উমর যে সত্তার নামে শপথ করেন, তাদের কেউ যদি উহুদ পাহাড়ের সমপরিমাণ সোনাও খরচ করে ফেলে, আল্লাহ তা কবুল করবেন না, যতক্ষণ না সে তাকদীরের উপর ঈমান আনে। এরপর তিনি বললেন: আমার পিতা উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, একদিন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম, হঠাৎ আমাদের সামনে শুভ্র বসন পরিহিত এক ব্যক্তি এসে উপস্থিত হলো...। এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন। তাতে আছে: "...আর তুমি তাকদীরের ভালো ও মন্দের উপর ঈমান আনো।"