হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (9848)


9848 - عن علي أنه دخل على النبي صلى الله عليه وسلم وقد بسط شملة فجلس عليها هو وفاطمة وعلي والحسن والحسين ثم أخذ النبي صلى الله عليه وسلم بمجامعه فعقد عليهم ثم قال:"اللهم! ارض عنهم كما أنا عنهم راض".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (5510) عن محمد بن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا منجاب بن الحارث، حدثنا يحيى بن عبد الملك بن أبي غنيّة، حدثنا عبيد بن طفيل أبو سيدان، عن ربعي بن حراش، عن علي فذكره.

وإسناده حسن من أجل شيخ الطبراني محمد بن عثمان ويحيى بن عبد الملك بن أبي غنية، وعبيد بن طفيل فإن كلا منهم حسن الحديث.
قال الهيثمي (9/ 169):"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح غير عبيد بن طفيل وهو ثقة".

وأما ما روي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يمر بباب فاطمة ستة أشهر إذا خرج إلى صلاة الفجر يقول:"الصلاة يا أهل البيت" {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} [الأحزاب: 33]. فهو ضعيف. رواه الترمذي (3206) عن عبد بن حميد (1232) - وأحمد (14040) - كلاهما عن عفان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد (هو ابن جدعان)، عن أنس بن مالك فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد بن جدعان فإنه ضعيف عند جمهور أهل العلم.

ورواه الحاكم (3/ 158) من طريق الحسين بن الفضل البجلي، ثنا عفان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، أخبرني حميد وعلي بن زيد، عن أنس فذكره.

وهذه الزيادة - يعني زيادة حميد الطويل في الإسناد - زيادة شاذة وذلك لمخالفة الحسين بن الفضل الإمام أحمد وعبد بن حميد.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তখন তিনি একটি চাদর বিছিয়ে রেখেছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী), ফাতিমা, আলী, হাসান ও হুসাইন তার (চাদরের) উপরে বসলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাদরটির চার প্রান্ত ধরলেন এবং তাদের উপর জড়িয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আপনি তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়ে যান, যেমন আমি তাদের প্রতি সন্তুষ্ট।"









আল-জামি` আল-কামিল (9849)


9849 - عن عطاء بن يسار أن رجلا أخبره أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم يضم إليه حسنا وحسينا يقول:"اللهم! إني أحبهما فأحبهما".

صحيح: رواه أحمد (23133) عن سليمان بن داود (هو الهاشمي)، حدثنا إسماعيل - يعني ابن جعفر -، أخبرني محمد - يعني ابن أبي حرملة -، عن عطاء (هو ابن يسار) قال: فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الهيثمي في المجمع (9/ 179):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

وجهالة الصحابي في الحديث لا تضر لأن الصحابة كلهم عدول.




আত্বা ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে জানিয়েছেন যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন, তিনি হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিজের সাথে জড়িয়ে ধরছেন এবং বলছেন: "হে আল্লাহ! আমি এই দু'জনকে ভালোবাসি, সুতরাং আপনিও এদের দু'জনকে ভালোবাসুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (9850)


9850 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للحسن والحسين:"اللهم! إني أحبهما فأحبهما".

صحيح: رواه أحمد (9759)، والبزار (9736)، والطبراني في الكبير (3/ 42) كلهم من طرق، عن أبي حازم (اسمه: سلمان الأشجعي)، عن أبي هريرة قال: فذكره. وزاد الطبراني في آخر الحديث:"وأبغض من أبغضهما". وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তাদের দু'জনকে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাদের ভালোবাসো।"









আল-জামি` আল-কামিল (9851)


9851 - عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال للحسن والحسين:"اللهم! إني أحبهما فأحببهما، ومن أحبهما فقد أحبني".

حسن: رواه البزار (1820) عن يوسف بن موسى، حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم (هو
ابن بهدلة)، عن زيد (هو ابن حبيش)، عن عبد الله فذكره.

ذكره الهيثمي في المجمع (9/ 180) وقال:"رواه البزار وإسناده جيد".

وهو كما قال فإن عاصم بن بهدلة مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তাদের দুজনকে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাদের দুজনকে ভালোবাসো। আর যে তাদের দুজনকে ভালোবাসলো, সে যেন আমাকেই ভালোবাসলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (9852)


9852 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أحب الحسن والحسين فقد أحبني، ومن أبغضهما فقد أبغضني".

حسن: رواه النسائي في الكبرى (8112)، وابن ماجه (143)، وأحمد (7876) كلهم من طريق سفيان الثوري، عن أبي الجحاف داود بن أبي عوف، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي الجحاف فإنه حسن الحديث مع غلوه في تشيعه لكنه توبع تابعه سالم بن أبي حفصة العجلي عن أبي حازم قال: إني لشاهد يوم مات الحسن بن علي، فرأيت الحسين بن علي يقول لسعيد بن العاص: ويطعن في عنقه، ويقول: تقدم، فلولا أنها سنة ما قدمتك وكان بينهم شيء فقال أبو هريرة: لتنفسون على ابن نبيكم صلى الله عليه وسلم بتربة تدفنونه فيها وقد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.

رواه أحمد (10872)، وأبو يعلى (6215)، وصحّحه الحاكم (3/ 171) ولم يذكر القصة إلا الحاكم. ولأبي الجحاف متابعات أخرى.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি হাসান ও হুসাইন-কে ভালোবাসল, সে অবশ্যই আমাকে ভালোবাসল, আর যে ব্যক্তি তাদের উভয়কে ঘৃণা করল, সে অবশ্যই আমাকে ঘৃণা করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (9853)


9853 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي، فإذا سجد وثب الحسن والحسين على ظهره، فإذا منعوهما أشار إليهم أن دعوهما، فلما قضى الصلاة وضعهما في حجره فقال:"من أحبني فليحب هذين".

حسن: رواه النسائي في الكبرى (8114)، وصحّحه ابن خزيمة (887) - والسياق له -، وابن حبان (6970)، والطبراني في الكبير (3/ 40) كلهم من طرق عن عاصم (هو ابن بهدلة)، عن زر (هو ابن حبيش)، عن عبد الله فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن بهدلة فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.

وفي الباب عن علي بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ بيد حسن وحسين فقال:"من أحبني وأحب هذين وأباهما وأمهما كان معي في درجتي يوم القيامة".

رواه الترمذي (2733)، وعبد الله بن أحمد في زوائده على المسند (576) كلاهما عن نصر بن علي الجهضمي الأزدي، أخبرني علي بن جعفر بن محمد بن علي، حدثني أخي موسى بن جعفر بن محمد، عن أبيه جعفر بن محمد، عن أبيه محمد بن علي، عن أبيه علي بن الحسين، عن أبيه، عن جده علي بن أبي طالب فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث جعفر بن محمد إلا من هذا الوجه.

وهو كذلك فإن علي بن جعفر بن محمد العلوي لا يعرف فيه جرح ولا تعديل لذا قال فيه الحافظ:"مقبول" يعني إذا توبع وإلا فلين الحديث، ولم أجد له متابعا وذكره الذهبي في السير (3/ 254) وقال:"إسناده ضعيف، والمتن منكر".

وفي الباب عن زيد بن أرقم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لعلي وفاطمة والحسن والحسين:"أنا حرب لمن حاربتم وسلم لمن سالمتم".

رواه الترمذي (3870)، وابن ماجه (145)، وابن حبان (6977) كلهم من طريق أسباط بن نصر الهمداني، عن السدي، عن صُبيح مولى أم سلمة، عن زيد بن أرقم قال: فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث غريب إنما نعرفه من هذا الوجه، وصبيح مولى أم سلمة ليس بمعروف".

وهو كما قال فإن صبيحا مولى أم سلمة لم يوثّقه أحد غير ابن حبان فإنه ذكره في ثقاته على قاعدته في توثيق من لم يوجد فيه جرح.

وفي معناه ما روي عن أسامة بن زيد أنه قال: طرقت النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة في بعض الحاجة فخرج النبي صلى الله عليه وسلم وهو مشتمل على شيء لا أدري ما هو، فلما فرغت من حاجتي. قلت: ما هذا الذي أنت مشتمل عليه؟ فكشفه فإذا حسن وحسين على وركيه، فقال:"هذان ابناي وابنا ابنتي، اللهم! إني أحبهما فأحبهما وأحب من يحبهما".

رواه الترمذي (3769)، والبزار (2580)، وصحّحه ابن حبان (6967) كلهم من طريق موسى بن يعقوب الزمعي، عن عبد الله بن أبي بكر بن زيد المهاجر، أخبرني مسلم بن أبي سهل النبال، أخبرني الحسن بن أسامة بن زيد، أخبرني أبي أسامة بن زيد فذكره.

وعبد الله بن أبي بكر قال ابن المديني:"مجهول" ولم يوثّقه غير ابن حبان على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه جرح، ومسلم النبال، والحسن بن أسامة قال عنهما الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فلين الحديث، ولم أجد لهما متابعا.

لذا أعله ابن المديني فقال:"حديث الحسن بن أسامة حديث مديني، رواه شيخ ضعيف منكر الحديث، يقال له: موسى بن يعقوب الزمعي من ولد عبد الله بن زمعة، عن رجل مجهول عن آخر مجهول". انظر: تهذيب الكمال (ترجمة الحسن بن أسامة).




আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করছিলেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিঠের উপর চড়ে বসতেন। যখন (অন্য লোকেরা) তাঁদের বাধা দিত, তখন তিনি তাঁদের (লোকদের) ইঙ্গিত করতেন যেন তাঁদের ছেড়ে দেওয়া হয়। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তাঁদের দু'জনকে কোলে রাখলেন এবং বললেন: "যে আমাকে ভালোবাসে, সে যেন এই দু'জনকেও ভালোবাসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9854)


9854 - عن بريدة بن الحصيب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطبنا إذ جاء الحسن والحسين عليهما قميصان أحمران يمشيان ويعثران، فنزل رسول الله صلى الله عليه وسلم من المنبر فحملهما ووضعهما بين يديه، ثم قال:"صدق الله {أَنَّمَا أَمْوَالُكُمْ وَأَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌ} نظرت إلى هذين الصبيين يمشيان ويعثران فلم أصبر حتى قطعت حديثي ورفعتهما".
حسن: رواه أبو داود (1109)، والترمذي (3774)، والنسائي (1413، 1585)، وابن ماجه (3600)، وصحّحه ابن خزيمة (1456)، وابن حبان (6039)، والحاكم (1/ 287) كلهم من طرق عن حسين بن واقد، حدثني عبد الله بن بريدة، قال: سمعت أبي بريدة يقول: فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، إنما نعرفه من حديث الحسن بن واقد".

وهو كما قال، فإن الحسين بن واقد حسن الحديث.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে খুতবা দিচ্ছিলেন, এমন সময় হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। তাঁদের দু'জনের গায়ে লাল রঙের দুটি জামা ছিল। তাঁরা হেঁটে আসছিলেন এবং হোঁচট খাচ্ছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বর থেকে নেমে আসলেন, তাঁদের দু'জনকে তুলে নিলেন এবং নিজের সামনে রাখলেন। তারপর তিনি বললেন: "আল্লাহ সত্য বলেছেন: {তোমাদের ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্ততি পরীক্ষা (ফিতনা) স্বরূপ}। আমি এই দুটি শিশুকে দেখলাম, তারা হেঁটে আসছিল এবং হোঁচট খাচ্ছিল, ফলে আমি ধৈর্য ধারণ করতে পারলাম না এবং আমার বক্তব্য থামিয়ে দিয়ে তাঁদের দু'জনকে তুলে নিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (9855)


9855 - عن خالد بن معدان قال: وفد المقدام بن معديكرب وعمرو بن الأسود ورجل من بني أسد من أهل قنسرين إلى معاوية بن أبي سفيان، فقال معاوية للمقدام: أعلمت أن الحسن بن علي توفي؟ فرجع المقدام، فقال له رجل: أتراها مصيبة؟ قال له: ولم لا أراها مصيبة وقد وضعه رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجره فقال:"هذا مني وحسين من علي".

حسن: رواه أبو داود (4131)، وأحمد (17189)، والطبراني في الكبير (20/ 269) كلهم من طرق عن بقية بن الوليد، حدثنا بحير بن سعد، عن خالد بن معدان قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد، وقد تقبل عنعنته مطلقا إذا روى عن بحير بن سعد قاله ابن عبد الهادي في تعليقه على علل ابن أبي حاتم.

وهنا قد روى عن بحير بن سعد بالتصريح وقوّى الذهبي هذا الإسناد في السير (3/ 258).

وقوله في الحديث:"هذا مني". يعني الحسن بن علي وذلك من باب إظهار المحبة لأن الحسن كان أكبر من الحسين، ولأنه قال فيه:"إن الله سيصلح على يديه بين فئتين عظيمتين". فقوله:"هذا مني" له مزيد من المزية.

روي عن أنس بن مالك قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم أي أهل بيتك أحب إليك؟ قال:"الحسن والحسين". وكان يقول لفاطمة:"ادعي لي ابنيَّ". فيشمُّهما ويضمُّهما إليه. رواه الترمذي (3772)، وأبو يعلى (4294) كلاهما عن أبي سعيد الأشج، حدثنا عقبة بن خالد، حدثني يوسف بن إبراهيم التميمي أنه سمع أنس بن مالك يقول: فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه من حديث أنس".

وهو كما قال: فإن يوسف بن إبراهيم التميمي ضعيف عند جمهور أهل العلم.




মিকদাম ইবনু মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি, আমর ইবনু আসওয়াদ এবং কিন্নাসরিনের বানু আসাদ গোত্রের এক ব্যক্তি মু'আবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিকদামকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি জানেন যে হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করেছেন? (মিকদাম খবরটি শুনে ফিরে এলে) অন্য একজন লোক তাঁকে জিজ্ঞেস করল: আপনি কি এটিকে মুসিবত (বিপর্যয়) মনে করেন? তিনি তাকে বললেন: কেন আমি এটিকে মুসিবত মনে করব না, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (হাসানকে) নিজের কোলে বসিয়ে বলেছিলেন: "এ (হাসান) আমার থেকে এবং হুসাইন আলীর থেকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9856)


9856 - عن عبد الله بن عمر - وسأله عن المحرم، قال شعبة: أحسبه، يقتل الذباب؟ - فقال: أهل العراق يسألون عن الذباب وقد قتلوا ابن ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هما ريحانتاي من الدنيا".

صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3753) عن محمد بن بشار، حدثنا غندر، ثنا
شعبة، عن محمد بن أبي يعقوب، سمعت ابن أبي نُعْم، سمعت عبد الله بن عمر فذكره.

وفي لفظ:"قال ابن أبي نُعْم: كنت شاهدا لابن عمر، وسأله رجل عن دم البعوض؟ فقال: ممن أنت؟ فقال: من أهل العراق، قال: انظروا إلى هذا يسألني عن دم البعوض، وقد قتلوا ابن النبي صلى الله عليه وسلم …". رواه البخاري في الأدب (5994) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا مهدي، ثنا ابن أبي يعقوب به.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে মুহরিম (ইহরামকারী) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। শু‘বাহ বলেন, আমি মনে করি, সে (প্রশ্নকারী) জিজ্ঞাসা করেছিল যে, মুহরিম কি মাছি হত্যা করতে পারে? তখন তিনি বললেন: ইরাকবাসীরা আমাকে মাছি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে, অথচ তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার পুত্রকে হত্যা করেছে। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তারা দুজন হলো দুনিয়াতে আমার সুগন্ধি ফুল।"

অন্য এক বর্ণনায় (ইবনে আবী নু'ম বলেন), আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। একজন লোক তাঁকে মশার রক্ত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন, ‘তুমি কোন অঞ্চলের লোক?’ সে বলল, ‘আমি ইরাকের অধিবাসী।’ তিনি বললেন: ‘এই লোকটিকে দেখুন, সে আমাকে মশার রক্ত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে, অথচ তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পুত্রকে হত্যা করেছে।’









আল-জামি` আল-কামিল (9857)


9857 - عن سعد بن أبي وقاص قال: دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم والحسن والحسين يلعبان على بطنه فقلت: يا رسول الله أتحبهما؟ قال:"وما لي لا أحبهما، ريحانتاي".

حسن: رواه البزار (1078) عن عباد بن يعقوب، حدثنا علي بن هاشم بن البريد، ثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبي سهيل بن مالك (واسمه: نافع)، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقاص فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (9/ 181):"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح".

وإسناده حسن من أجل عباد بن يعقوب هو الرواجني، وعلي بن هاشم بن البريد، وعبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، فإن كلا من هؤلاء حسن الحديث.

وكون عباد بن يعقوب الرواجني، وعلي بن هاشم بن البريد موصوفا بالتشيع لا يضر ذلك لأن له شاهدا صحيحا.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পেটের উপর খেলছিলেন। আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তাদের দু’জনকে ভালোবাসেন?’ তিনি বললেন, 'আমি কেন তাদের দু’জনকে ভালোবাসব না? তারা আমার দু’টি সুগন্ধি ফুল (রাইহানাতায়)।'









আল-জামি` আল-কামিল (9858)


9858 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".

حسن: رواه الترمذي (3768)، وأحمد (10999)، والنسائي في الكبرى (8473، 8474، 8472) كلهم من طرق، عن عبد الرحمن بن أبي نُعم (هو البجلي الكوفي)، عن أبي سعيد الخدري قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي نُعم فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাসান এবং হুসাইন হলো জান্নাতবাসীদের যুবকদের সরদার।"









আল-জামি` আল-কামিল (9859)


9859 - عن حذيفة قال: سألتني أمي: متى عهدك؟ تعني بالنبي صلى الله عليه وسلم فقلت: ما لي به عهد منذ كذا وكذا، فنالت مني، فقلت لها: دعيني آتي النبي صلى الله عليه وسلم فأصلي معه المغرب وأسأله أن يستغفر لي ولك، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم فصليت معه المغرب، فصلى حتى صلى العشاء ثم انفتل فتبعته، فسمع صوتي فقال:"من هذا؟ حذيفة؟". قلت: نعم، قال:"ما حاجتك، غفر الله لك ولأمك؟". قال:"إن هذا ملك لم ينزل الأرض قط قبل هذه
الليلة، استأذن ربه أن يسلم علي ويبشرني بأن فاطمة سيدة نساء أهل الجنة، وأن الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".

حسن: رواه الترمذي (3781) عن عبد الله بن عبد الرحمن وإسحاق بن منصور قالا: أخبرنا محمد بن يوسف، عن إسرائيل، عن ميسرة بن حبيب، عن المنهال بن عمرو، عن زر بن حبيش، عن حذيفة فذكره.

ورواه ابن خزيمة (1194)، وابن حبان (6960)، والحاكم (3/ 381) كلهم من طريق إسرائيل به مثله إلا أن البعض اقتصر على ذكر الصلاه فقط.

قال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه ولا نعرفه إلا من حديث إسرائيل". انتهى.

قلت: وهو كما قال، فإن إسناده حسن لأجل ميسرة بن حبيب والمنهال بن عمرو فإنهما حسنا الحديث.

ورواه أحمد (23330) من وجه آخر عن إسرائيل، عن أبي السفر، عن الشعبي، عن حذيفة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فصليت معه الظهر والعصر والمغرب والعشاء، تم تبعته وهو يريد يدخل بعض حجره فقام وأنا خلفه، كأنه يكلم أحدا. قال: ثم قال:"من هذا؟". قلت: حذيفة، قال:"أتدري من كان معي؟". قلت: لا، قال:"فإن جبريل جاء يبشرني أن الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة". قال: فقال حذيفة: فاستغفر لي ولأمي، لمحال:"غفر الله لك يا حذيفة ولأمك".

رجال إسناده ثقات، وابن أبي السفر هو: عبد الله بن أبي السفر الثوري الكوفي من رجال الجماعة إلا أن الشعبي وهو: عامر بن شراحيل أبو عمرو الكوفي أدرك زمان حذيفة وهو صغير، فإن صحّ قول ابن السمعاني بأنه ولد سنة عشرين، فيكون عمره عند وفاة حذيفة ستة عشر سنة، لأنه توفي في أول خلافة علي سنة ست وثلاثين. ولذا لم أجد من جزم بعدم سماعه منه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তোমার সাক্ষাতের শেষ সময় কবে? আমি বললাম: অনেক দিন হয়ে গেল, তাঁর সাথে আমার কোনো সাক্ষাৎ নেই। এতে তিনি আমার উপর অসন্তুষ্ট হলেন (বা তিরস্কার করলেন)। আমি তাঁকে বললাম: আমাকে ছেড়ে দাও, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করি, আর তাঁকে অনুরোধ করি যেন তিনি আমার ও তোমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন। অতঃপর আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করলাম। তিনি সালাত আদায় করতে থাকলেন, এমনকি ইশার সালাতও আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে গেলেন, আমিও তাঁর অনুসরণ করলাম। তিনি আমার আওয়াজ শুনতে পেলেন এবং বললেন: "কে এটি? হুযাইফা?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তোমার কী প্রয়োজন? আল্লাহ তোমাকে এবং তোমার মাকে ক্ষমা করুন!" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ এক ফেরেশতা, যিনি আজকের রাতের আগে কখনো পৃথিবীতে অবতরণ করেননি। তিনি তাঁর রবের কাছে অনুমতি চেয়েছেন যেন তিনি আমাকে সালাম দেন এবং আমাকে এই সুসংবাদ দেন যে, ফাতিমা জান্নাতের নারীদের নেত্রী এবং হাসান ও হুসাইন জান্নাতবাসীদের যুবকদের নেতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (9860)


9860 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة، وفاطمة سيدة نساء أهل الجنة، إلا ما كان من مريم ابنة عمران".

حسن: رواه النسائي في الكبرى (8416)، وأحمد في مسنده (11618) (11756) وفي فضائل الصحابة (1331)، وأبو يعلى (1169) كلهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

ويزيد بن أبي زياد ضعيف ولكن تابعه منصور بن أبي الأسود.

رواه الحاكم (3/ 154) من وجه آخر عن منصور بن أبي الأسود، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، عن أبي سعيد الخدري فذكر نحوه.

وقال: هذا حديث صحيح الإسناد.

قلت: إسناده حسن من أجل منصور بن أبي الأسود فإنه حسن الحديث إلا أن في إسناد الحاكم محمد بن الحسين بن أبي الحسين لم يوثّقه أحد، وذكره ابن حبان في"الثقات" (9/ 136).
وفي معناه ما روي عن البراء بن عازب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".

رواه الطبراني في الأوسط (4329) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني علي بن حكيم الأودي، ثنا شريك (هو ابن عبد الله القاضي)، عن أشعث بن سوار، عن عدي بن ثابت، عن البراء قال: فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل أشعث بن سوّار فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم.

وذكره الهيثمي في المجمع (9/ 184) وقال:"رواه الطبراني - يعني في الكبير - وإسناده حسن".

ولم أقف على إسناده في القدر المطبوع من المعجم الكبير فالله أعلم بالصواب.

وفي معناه ما روي أيضا عن أبي هريرة قال: أبطأ رسول الله صلى الله عليه وسلم عنا يوما صدر النهار، فلما كان العشي قال له قائلنا: يا رسول الله! قد شق علينا لم نرك اليوم، قال:"إن ملكا من السماء لم يكن رآني، فاستأذن الله في زيارتي، فأخبرني - أو بشرني - أن فاطمة ابنتي سيدة نساء أمتي، وأن حسنًا وحسينًا سيدا شباب أهل الجنة".

رواه النسائي في الكبرى (8462)، والطبراني في الكبير (3/ 22 و 22/ 403) كلاهما من طريق أبي جعفر محمد بن مروان الذهلي - وقيل الهذلي -، حدثني أبو حازم (واسمه: سلمان الأشجعي)، عن أبي هريرة فذكره.

ومحمد بن مروان لم يوثّقه غير ابن حبان لذا قال الحافظ:"مقبول" يعني يتابع وإلا فلين الحديث، ولم أجد له متابعا.

وفي الباب روي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة، وأبوهما خير منهما". إلا أنه ضعيف جدا.

رواه ابن ماجه (118)، والحاكم (3/ 167) كلاهما من طريق محمد بن موسى الواسطي، حدثنا المعلى بن عبد الرحمن، حدثنا ابن أبي ذئب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

والمعلى بن عبد الرحمن هو الواسطي ضعيف جدا وقد كذبه الدارقطني وقال أبو زرعة: ذاهب الحديث.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হাসান ও হুসাইন জান্নাতের যুবকদের সর্দার এবং ফাতিমা মারইয়াম বিনতে ইমরান (আঃ) ব্যতীত জান্নাতের নারীদের সর্দার।”









আল-জামি` আল-কামিল (9861)


9861 - عن أبي موسى قال: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم وهو نازل بالجعرانة بين مكة والمدينة، ومعه بلال، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم أعرابي فقال: ألا تنجز لي ما وعدتني؟ فقال له: أبشر، فقال: قد أكثرت علي من"أبشر" فأقبل على أبي موسى وبلال كهيئة الغضبان، فقال: رد البشرى فاقبلا أنتما، قالا: قبلنا، ثم دعا بقدح فيه ماء فغسل يديه ووجهه فيه، ومج
فيه، ثم قال: اشربا منه، وأفرغا على وجوهكما ونحوركما، وأبشرا، فأخذا القدح ففعلا، فنادت أم سلمة من وراء الستر: أن أفضلا لأمكما، فأفضلا لها من طائفة.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4328)، ومسلم في فضائل الصحابة (2497) كلاهما عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدثنا أبو أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى قال: فذكره.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, যখন তিনি মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী জি'ররানাহ নামক স্থানে অবস্থান করছিলেন এবং তাঁর সঙ্গে বিলালও ছিলেন। তখন এক বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: আপনি আমার সাথে যে ওয়াদা করেছেন, তা কি পূর্ণ করবেন না? তিনি (নবী) তাকে বললেন: সুসংবাদ গ্রহণ করো। বেদুঈন বলল: আপনি আমার প্রতি ‘সুসংবাদ গ্রহণ করো’ কথাটি বেশি বেশি বলছেন। এরপর তিনি রাগান্বিতের মতো হয়ে আবূ মূসা এবং বিলালের দিকে ফিরলেন এবং বললেন: সুসংবাদটি ফিরিয়ে দাও, তোমরা দু’জন তা গ্রহণ করো। তারা দু’জন বললেন: আমরা গ্রহণ করলাম। অতঃপর তিনি পানির একটি পাত্র চাইলেন, তাতে নিজের উভয় হাত ও মুখমণ্ডল ধুলেন এবং তাতে কুল্লি করলেন (কিছু পানি পাত্রে ফেললেন)। এরপর তিনি বললেন: তোমরা দু’জন তা থেকে পান করো এবং তোমাদের মুখমণ্ডল ও গ্রীবার ওপর ঢেলে দাও। আর সুসংবাদ গ্রহণ করো। তারা দু’জন পাত্রটি নিলেন এবং তা-ই করলেন। তখন পর্দার আড়াল থেকে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ডাক দিয়ে বললেন: তোমাদের মায়ের জন্য কিছু রেখে দাও। তখন তারা দু’জন তার জন্য কিছু পানি দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9862)


9862 - عن أنس أن رجلين خرجا من عند النبي صلى الله عليه وسلم في ليلة مظلمة، وإذا نور بين أيديهما حتى تفرقا، فتفرق النور معهما.

وقال معمر: عن ثابت، عن أنس: إن أسيد بن حضير، ورجلًا من الأنصار.

وقال حماد: أخبرنا ثابت عن أنس: كان أسيد بن حضير، وعباد بن بشر عند النبي صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3805) عن علي بن مسلم، ثنا حبان، ثنا همام، أنا قتادة، عن أنس أن رجلين فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দুইজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে এক অন্ধকার রাতে বের হলেন। তখন তাঁদের সামনে একটি আলো দেখা গেল। যতক্ষণ না তাঁরা পরস্পর পৃথক হয়ে গেলেন, ততক্ষণ আলোটি তাঁদের সাথে ছিল। এরপর তাঁদের পৃথক হওয়ার সাথে সাথে আলোটিও পৃথক হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (9863)


9863 - عن عائذ بن عمرو أن أبا سفيان أتى على سلمان وصهيب وبلال في نفر فقالوا: والله! ما أخذت سيوف الله من عنق عدو الله مأخذها، قال: فقال أبو بكر: أتقولون هذا لشيخ قريش وسيدهم؟ فأتى النبي صلى الله عليه وسلم وأخبره فقال:"يا أبا بكر! لعلك أغضبتهم، لئن كنت أغضبتهم لقد أغضبت ربك". فأتاهم أبو بكر فقال: يا إخوتاه، أغضبتكم؟ قالوا: لا، يغفر الله لك يا أخي.

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2504) عن محمد بن حاتم، ثنا بهز، ثنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن معاوية بن قرة، عن عائذ بن عمرو، فذكره.




আয়েয ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা আবূ সুফিয়ান সালমান, সুহাইব ও বিলালের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তারা একটি দলের মধ্যে ছিলেন। তারা (সালমান, সুহাইব ও বিলাল) বলল: আল্লাহর কসম! আল্লাহর তরবারি আল্লাহর শত্রুর গলা থেকে তার প্রাপ্য নেয়নি (অর্থাৎ তাকে তার উচিত শাস্তি দেয়নি)। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কুরাইশের এই প্রবীণ নেতা এবং সরদারের ব্যাপারে তোমরা এমন কথা বলছো? এরপর তিনি (আবূ বকর) নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলেন এবং তাঁকে বিষয়টি জানালেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ বকর! সম্ভবত তুমি তাদেরকে রাগিয়ে দিয়েছ। যদি তুমি তাদেরকে রাগিয়ে থাকো, তবে তুমি অবশ্যই তোমার রবকে (আল্লাহকে) রাগিয়ে দিয়েছ।" অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে গেলেন এবং বললেন: হে আমার ভাইয়েরা, আমি কি তোমাদেরকে রাগিয়ে দিয়েছি? তারা বলল: না, হে আমাদের ভাই, আল্লাহ আপনাকে ক্ষমা করুন।









আল-জামি` আল-কামিল (9864)


9864 - عن البراء قال: اعتمر النبي صلى الله عليه وسلم في ذي القعدة الحديث … وفيه: قصة ابنة حمزة وأنها تبعتهم حين الخروج من مكة، فتناولها علي فأخذ بيدها، وقال لفاطمة: دونك ابنة عمك، حملتها، فاختصم فيها علي، وزيد، وجعفر، فقال علي: أنا أحق بها، وهي ابنة عمي، وقال جعفر: ابنة عمي وخالتها تحتي، وقال زيد: ابنة أخي،
فقضى بها النبي صلى الله عليه وسلم لخالتها وقال:"الخالة بمنزلة الأم"، وقال لعلي:"أنت مني وأنا منك"، وقال لجعفر:"أشبهت خلقي وخلقي"، وقال لزيد:"أنت أخونا ومولانا".

صحيح: رواه البخاري في الصلح (2699) عن عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء قال: فذكره.




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুল-কা‘দাহ মাসে উমরাহ পালন করেন। এই হাদীসে হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মেয়ের ঘটনাও রয়েছে। মক্কা থেকে বের হওয়ার সময় সে তাঁদের পিছু নিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ধরে নিলেন এবং তার হাত ধরলেন। তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তোমার চাচাতো বোন এই নাও, আমি তাকে বহন করলাম। অতঃপর আলী, যায়িদ এবং জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার অভিভাবকত্ব নিয়ে বিবাদে লিপ্ত হলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তার বেশি হকদার, কারণ সে আমার চাচাতো বোন। জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার চাচাতো বোন এবং তার খালা আমার অধীনে (আমার স্ত্রী)। আর যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার ভাইঝি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার খালার পক্ষে (খালার কাছে থাকার) ফায়সালা দিলেন এবং বললেন: "খালা মাতার স্থানে অবস্থান করে।" তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার এবং আমি তোমার।" আর জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি তোমার দৈহিক গঠন ও চরিত্রে আমার সাদৃশ্যপূর্ণ হয়েছ।" আর যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা।"









আল-জামি` আল-কামিল (9865)


9865 - عن علي بن أبي طالب قال: لما خرجنا من مكة اتبعتنا ابنة حمزة تنادي: يا عم، يا عم، قال: فتناولتها بيدها، فدفعتها إلى فاطمة، فقلت: دونك ابنة عمك. قال: فلما قدمنا المدينة اختصمنا فيها أنا وجعفر وزيد بن حارثة. فقال جعفر: ابنة عمي، وخالتها عندي، يعني أسماء بنت عميس، وقال زيد: ابنة أخي، وقلت: أنا أخذتها وهي ابنة عمي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما أنت يا جعفر! أشبهت خلقي وخلقي، وأما أنت يا علي! فمني وأنا منك، وأما أنت يا زيد! فأخونا ومولانا، والجارية عند خالتها فإن الخالة والدة". قلت يا رسول الله! ألا تتزوجها؟ قال:"إنها ابنة أخي من الرضاعة".

حسن: رواه أبو داود (2280)، وأحمد (770) واللفظ له، وصحّحه الحاكم (3/ 120) كلهم من طريق أبي إسحاق، عن هانئ بن هانئ وهبيرة بن يريم، عن علي بن أبي طالب فذكره.

وإسناده حسن من أجل هانئ بن هانئ وهبيرة فإنهما مقبولان لأنه يقوي أحدهما الآخر.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা মক্কা থেকে বের হলাম, তখন হামযা'র কন্যা আমাদের অনুসরণ করে 'হে চাচা, হে চাচা' বলে ডাকতে লাগল। তিনি বলেন: আমি তাকে হাত দিয়ে ধরলাম এবং তাকে ফাতিমার কাছে অর্পণ করলাম এবং বললাম: তোমার চাচাতো বোনকে ধরো। তিনি বলেন: এরপর যখন আমরা মদিনায় পৌঁছলাম, তখন আমি, জাফর এবং যায়েদ ইবনু হারিসা তার অভিভাবকত্ব নিয়ে বিবাদ করলাম। তখন জাফর বললেন: সে আমার চাচাতো বোন, আর তার খালা আমার কাছে আছে (অর্থাৎ আসমা বিনত উমাইস)। আর যায়েদ বললেন: সে আমার ভাইয়ের মেয়ে। আর আমি (আলী) বললাম: আমিই তাকে নিয়ে এসেছি এবং সে আমার চাচাতো বোন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে জাফর! তুমি রূপে ও চরিত্রে আমার সদৃশ হয়েছো। আর হে আলী! তুমি আমার অংশ এবং আমি তোমার অংশ। আর হে যায়েদ! তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা (মুক্ত দাস)। আর মেয়েটি তার খালার কাছে থাকবে। কারণ খালা মায়ের সমতুল্য।” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তাকে বিবাহ করবেন না? তিনি বললেন: “সে আমার দুধভাইয়ের মেয়ে।”









আল-জামি` আল-কামিল (9866)


9866 - عن أسامة بن زيد قال: اجتمع جعفر وعلي وزيد بن حارثة، فقال جعفر: أنا أحبكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال علي: أنا أحبكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال زيد: أنا أحبكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: انطلقوا بنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى نسأله، فقال أسامة بن زيد: فجاؤوا يستأذنونه فقال:"اخرج فانظر من هؤلاء؟" فقلت: هذا جعفر وعلي وزيد - ما أقول: أبي - قال:"ائذن لهم". ودخلوا فقالوا: من أحب إليك؟ قال:"فاطمة". قالوا: نسألك عن الرجال، قال:"أما أنت يا جعفر! فأشبه خُلُقك خُلُقي، وأشبه خَلْقي خَلْقك، وأنت مني وشجرتي، وأما أنت يا عليُّ! فَخَتني وأبو ولدي، وأنا منك وأنت مني، وأما أنت يا زيد! فمولاي ومنّي وإليَّ وأحب القوم إليَّ".

حسن: رواه أحمد (21777)، والنسائي في خصائص علي (138)، والحاكم (3/ 217) كلهم من طريق محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن يزيد بن عبد الله بن قسيط، عن محمد بن أسامة، عن أبيه قال: فذكره.

ومحمد بن إسحاق مدلّس وقد عنعن ولم أقف على تصريحه بالسماع لكن الحديث روي من وجه آخر رواه الترمذي (3819)، والحاكم (3/ 596) كلاهما من طريق أبي عوانة، حدثنا عمر بن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبيه قال: أخبرني أسامة بن زيد قال: كنت جالسا إذ جاء علي
والعباس يستأذنان، فقالا: يا أسامة! استأذن لنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله! علي والعباس يستأذنان، فقال:"أتدري ما جاء بهما؟" قلت: لا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لكني أدري، ائذن لهما"، فدخلا فقالا: يا رسول الله! جئناك نسألك أي أهلك أحب إليك؟ قال:"فاطمة بنت محمد"، فقالا: ما جئناك نسألك عن أهلك. قال:"أحب أهلي إلي من قد أنعم الله عليه وأنعمت عليه أسامة بن زيد". قالا: ثم من؟ قال:"ثم علي بن أبي طالب". قال العباس: يا رسول الله! جعلت عمك آخرهم؟ قال:"لأن عليا قد سبقك بالهجرة".

وعمر بن أبي سلمة قال الترمذي: كان شعبة يضعفه لكن ضعفه ليس بشديد، فقد قال ابن معين: ليس به بأس، وقال البخاري: صدوق إلا أنه يخالف بعض حديثه، وقال ابن عدي: حسن الحديث لا بأس به، وبهذه المتابعة يرتقي الحديث إلى درجة الحسن إلا أن في بعض ألفاظه غرابة.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن".

وقوله:"أبو ولدي" أي أبو الحسن والحسين رضي الله عنهما.




উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাফর, আলী ও যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একত্রিত হলেন। অতঃপর জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়। আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়। এরপর তারা বলল: চলো আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাই এবং তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করি। উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তারা এসে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বের হও এবং দেখ এরা কারা?" আমি বললাম: ইনি জাফর, আলী ও যায়দ – (আমি আমার পিতার নাম বলিনি)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাদেরকে অনুমতি দাও।" তারা প্রবেশ করল এবং জিজ্ঞেস করল: আপনার নিকট সবচেয়ে প্রিয় কে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ফাতিমা।" তারা বলল: আমরা আপনাকে পুরুষদের সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে জাফর! তোমার চরিত্র আমার চরিত্রের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ এবং তোমার দৈহিক গঠন আমার দৈহিক গঠনের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ। আর তুমি আমার এবং আমার বৃক্ষের অংশ। আর হে আলী! তুমি আমার জামাতা এবং আমার সন্তানদের পিতা। আমি তোমার থেকে আর তুমি আমার থেকে। আর হে যায়দ! তুমি আমার মুক্ত করা দাস, আমার থেকে, আমারই জন্য এবং তাদের মধ্যে তুমিই আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (9867)


9867 - عن خالد بن سمير قال: قدم علينا عبد الله بن رباح فوجدته اجتمع إليه ناس من الناس، قال: حدثنا أبو قتادة فارس رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم جيش الأمراء وقال:"عليكم زيد بن حارثة فإن أصيب زيد، فجعفر، فإن أصيب جعفر، فعبد الله بن رواحة الأنصاري". فوثب جعفر فقال: بأبي أنت يا نبي الله وأمي، ما كنت أرهب أن تستعمل علي زيدا، قال:"امضوا فإنك لا تدري أي ذلك خير". قال: فانطلق الجيش فلبثوا ما شاء الله، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم صعد المنبر وأمر أن ينادى: الصلاة جامعة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ناب خبر - أو ثاب خبر، شك عبد الرحمن - ألا أخبركم عن جيشكم هذا الغازي، إنهم انطلقوا حتى لقوا العدو، فأصيب زيد شهيدًا، فاستغفروا له". فاستغفر له الناس،"ثم أخذ اللواء جعفر بن أبي طالب فشد على القوم حتى قتل شهيدًا، أشهد له بالشهادة، فاستغفروا له، ثم أخذ اللواء عبد الله بن رواحة، فأثبت قدميه حتى أصيب شهيدًا فاستغفروا له، ثم أخذ اللواء خالد بن الوليد ولم يكن من الأمراء، هو أمر نفسه". فرفع رسول الله أصبعيه وقال:"اللهم! هو سيف من سيوفك فانصره - وقال عبد الرحمن مرة: فانتصر به". فيومئذ سمي خالد سيف الله، ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"انفروا فأمدوا إخوانكم ولا يتخلفن أحد". فنفر الناس
في حر شديد مشاة وركبانا.

حسن: رواه النسائي في الكبرى (8159)، وأحمد (22551) - والسياق له -، وصحّحه ابن حبان (7048) كلهم من طرق عن الأسود بن شيبان، عن خالد بن سمير قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن سمير فإنه حسن الحديث.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেনাপতিদের একটি বাহিনী প্রেরণ করলেন এবং বললেন: "তোমরা যায়দ ইবনু হারিসা-এর অধীনে থাকবে। যদি যায়দ শাহাদাত বরণ করে, তবে জা'ফর (নেতৃত্ব দেবে), আর যদি জা'ফর শাহাদাত বরণ করে, তবে আনসারী আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (নেতৃত্ব দেবে)।"

তখন জা'ফর লাফিয়ে উঠে বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমার পিতামাতা আপনার উপর কুরবান হোক, যায়দকে আমার উপর সেনাপতি নিযুক্ত করায় আমি মোটেও ভীত নই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা অগ্রসর হও, কারণ তুমি জান না, এর মধ্যে কোনটি তোমাদের জন্য উত্তম।"

তিনি বললেন: এরপর বাহিনী যাত্রা করল এবং আল্লাহ যা চাইলেন, তত দিন তারা অবস্থান করল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং ঘোষণা করার আদেশ দিলেন: "সালাত সমবেতভাবে।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে খবর এসেছে – (অথবা স্থির খবর এসেছে, বর্ণনাকারী আবদুর রহমানের সন্দেহ) – আমি কি তোমাদেরকে এই যুদ্ধগামী বাহিনী সম্পর্কে অবহিত করব না? তারা অগ্রসর হয়েছে যতক্ষণ না তারা শত্রুর মোকাবিলা করেছে। অতঃপর যায়দ শহীদ হয়েছেন। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।" ফলে লোকেরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করল।

"(এরপর) পতাকা গ্রহণ করলেন জা'ফর ইবনু আবী তালিব, অতঃপর তিনি শত্রুদের উপর প্রচণ্ড আঘাত হানলেন এবং শহীদ হলেন। আমি তার জন্য শাহাদাতের সাক্ষ্য দিচ্ছি। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো। এরপর পতাকা গ্রহণ করলেন আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা, অতঃপর তিনি তার পদক্ষেপ সুদৃঢ় রাখলেন এবং শহীদ হলেন। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো। এরপর পতাকা গ্রহণ করলেন খালিদ ইবনু ওয়ালীদ, যদিও তিনি সেনাপতিদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন না; তিনি নিজেই নিজের দায়িত্ব নিলেন।"

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দুই আঙ্গুল উঠিয়ে বললেন: "হে আল্লাহ! সে তোমার তরবারীসমূহের মধ্যে একটি তরবারী, সুতরাং তাকে সাহায্য করো।" (আবদুর রহমান একবার বলেছেন: "সুতরাং তার দ্বারা বিজয় দান করো।") সেদিন থেকেই খালিদকে 'সাইফুল্লাহ' (আল্লাহর তরবারী) নামে নামকরণ করা হয়েছিল।

অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা বেরিয়ে পড়ো এবং তোমাদের ভাইদেরকে সাহায্য করো, কেউ যেন পিছিয়ে না থাকে।" ফলে লোকেরা প্রচন্ত গরমের মধ্যে পায়ে হেঁটে এবং সওয়ার হয়ে বেরিয়ে পড়ল।